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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 14th October 2022

विषय सूची

सामान्य अध्ययन-II

  1. मिशन कर्मयोगी : सिविल सेवाओं का चेहरा बदलने का प्रयास
  2. मानवाधिकारों का महत्व
  3. भारत को ‘जनसंख्या नीति’ की आवश्यकता

सामान्य अध्ययन-III

  1. लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2022

मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री

  1. एक केस स्टडी – कृषि: आंध्र प्रदेश में ‘रायथू भरोसा केंद्र’
  2. युवाओं पर मीडिया का प्रतिकूल प्रभाव
  3. लद्दाख को कचरा मुक्त बनाने हेतु प्रयास
  4. रिवर्स शॉपिंग

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. कर्नाटक में हिजाब-प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट का खंडित फैसला
  2. भाषा समिति की अनुशंसाएँ और ‘हिंदी अधिरोपण’ को लेकर नवीनतम विवाद
  3. मनरेगा द्वारा महामारी के दौरान 80% तक की आय हानि की भरपाई
  4. निर्वाचन आयोग द्वारा जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों के नामांकन का आदेश वापस
  5. ‘बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम’ में संशोधन
  6. धान की परली का पेलेटाइजेशन और टॉरफेक्शन
  7. इसरो का अगली-पीढी का अपना प्रक्षेपण वाहन

सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: लोकतंत्र में सिविल सेवाओं की भूमिका।

मिशन कर्मयोगी : सिविल सेवाओं का चेहरा बदलने का प्रयास

संदर्भ: इस आर्टिकल में ‘मिशन कर्मयोगी’ (Mission Karmayogi) की विशेषताओं और कुछ अच्छे उदाहरणों की अच्छी जानकारी दी गयी है। आप इसे नोट कर सकते हैं।

 

मिशन कर्मयोगी” – राष्ट्रीय सिविल सेवा क्षमता विकास कार्यक्रम (National Programme for Civil Services Capacity Building – NPCSCB):

इसका उद्देश्य सिविल सेवाओं को ‘नियम आधारित’ से ‘भूमिका आधारित’ मानव संसाधन प्रबंधन में परिवर्तित करना तथा सिविल सेवकों को उनके पद की आवश्यकताओं के अनुसार आवंटित कार्य को उनकी क्षमताओं के साथ जोड़ना है, ताकि सिविल सेवाओं को “एक प्रभावी नागरिक-केंद्रित नागरिक सेवा” बनाया जा सके।”

प्रमुख विशेषताएं:

  • ऑफ साइट सीखने की पद्धति’ को बेहतर बनाते हुए ‘ऑन साइट सीखने की पद्धति’ पर बल देना। उदाहरणार्थ- मिशन के तहत, सभी टिकट कंडक्टरों, आरक्षण और माल ढुलाई क्लर्कों और स्टेशन मास्टरों सहित लगभग 95,000 रेलवे कर्मचारियों को बेहतर सेवा वितरण में प्रशिक्षित किया जा रहा है।
  • शिक्षण सामग्री, संस्थानों तथा कार्मिकों सहित साझा प्रशिक्षण अवसंरचना परितंत्र का निर्माण करना।
  • सावधानीपूर्वक व्यवस्थित और पुनरीक्षित डिजिटल ई–लर्निंग सामग्री उपलब्ध कराने हेतु एक एकीकृत सरकारी ऑनलाइन प्रशिक्षण-‘आईजीओटी कर्मयोगी’ (Igot Karmayogi Platform) प्लेटफ़ॉर्म की स्थापना करना।
  • “70-20-10” फॉर्मूले का उपयोग करना: वयस्कों में प्रवीणता, सत्तर प्रतिशत नौकरी के अनुभव से आती है, 20 प्रतिशत सहकर्मी से सहकर्मी जानकारी साझा करने का परिणाम होती है, और केवल 10 प्रतिशत कक्षा शिक्षण से आती है।
  • सिविल सेवकों की उचित निगरानी और मूल्यांकन के लिए ‘आईगॉट पोर्टल’ (iGOT portal) पर ‘मुख्य प्रदर्शन संकेतकों’ (Key Performance Indicators – KPI) का डैशबोर्ड बनाना।
  • वास्तविक समय के मूल्यांकन और निरंतर प्रशिक्षण के माध्यम से शासन में जवाबदेही और पारदर्शिता लाना।
  • प्रधानमंत्री की ‘लोक मानव संसाधन परिषद’ सिविल सेवा सुधार और क्षमता निर्माण के कार्य को दिशा प्रदान करेगी।
  • सहयोगात्मक और सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र: यह कोष्ठागारों में काम करने की संस्कृति को समाप्त करेगा, प्रयासों के दोहराव को कम करेगा और एक नई कार्य संस्कृति लाएगा जो व्यक्ति के साथ-साथ संस्थागत क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगी।
  • क्षमता विकास आयोग: यह वार्षिक क्षमता विकास योजनाओं को मंजूरी देने में ‘प्रधानमंत्री लोक मानव संसाधन परिषद’ की सहायता करेगा। जैसेकि, नागरिक उड्डयन मंत्रालय की वार्षिक क्षमता विकास योजना में मंत्रालय के कर्मचारियों के लिए ‘क्रॉस इमर्सिव लर्निंग’ के तहत लोक अधिकारियों को उनकी प्रबंधकीय प्रक्रियाओं का पालन करने के लिए निजी एयरलाइनों/हवाई अड्डों पर भेजा गया था।
  • कुशल सेवा वितरण सुनिश्चित करना: विशिष्ट भूमिका दक्षताओं के अनुसार काम सौंपा जाएगा, अर्थात सही काम के लिए सही आदमी नियोजित किया जाएगा।
  • सभी स्तरों पर मध्य स्तर के प्रशिक्षण की कमी के कारण मौजूद ‘सामान्यीकरण और विशेषज्ञता के बीच की खाई’ को पाटना जाएगा।
  • कुशल, प्रभावी और सहानुभूतिपूर्ण सिविल सेवाएं: उदाहरण के लिए, पुडुचेरी के एक एसएचओ ‘इंस्पेक्टर इनियन’ ने मिशन कर्मयोगी के तहत सॉफ्ट स्किल्स प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद कहा कि एक माँ की शिकायत मिलने के बाद, उन्होंने उसके खोए हुए बच्चे को खोजने के लिए अपने पेशेवर कौशल का इस्तेमाल किया। और कहा कि, इससे उन्हें पदोन्नति या वेतन वृद्धि की तुलना में कहीं अधिक खुशी मिली।
  • मिशन कर्मयोगी का एक उद्देश्य सिविल सेवा से संबंधित सभी पदों को भूमिकाओं, गतिविधियों तथा दक्षता के ढांचे (Framework of Roles, Activities and Competencies- FRACs) संबंधी दृष्टिकोण के साथ अद्यतन करना और प्रत्येक सरकारी निकाय में चिन्हित FRAC के लिए प्रासंगिक अधिगम विषय-वस्तु का सृजन करना और प्रदान करना है।
  • “संपूर्ण शासन प्रणाली” दृष्टिकोण: विभागों में प्रशिक्षण संसाधनों को साझा किया जा रहा है और ‘साइलो’ को तोड़ा जा रहा है।

निष्कर्ष:

महात्मा गांधी ने ‘लोक सेवा’ की तुलना सार्वजनिक संसाधनों के ट्रस्टी होने से की है। सिविल सेवक 170 मिलियन से अधिक को गरीबी से समृद्धि की ओर ले जाने में भूमिका निभाने के लिए विशिष्ट रूप से तैनात हैं। जरूरत है, पेशेवर नौकरशाही यानी रूप और संरचना में नौकरशाही और रवैये और भावना में गैर-नौकरशाही की।

इंस्टा लिंक:

मिशन कर्मयोगी

मेंस लिंक:

मिशन कर्मयोगी का उद्देश्य भारतीय सिविल सेवकों को विशिष्ट भूमिका दक्षताओं और उच्च दक्षता के साथ सशक्त बनाने के साथ-साथ अभिनव, सक्रिय और प्रौद्योगिकी-सक्षम बनाना है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

मानवाधिकारों का महत्व

संदर्भ: राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के 30वें स्थापना दिवस समारोह को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि, लोकतंत्र के फलने-फूलने के लिए मानवाधिकार सर्वोत्कृष्ट हैं तथा उन्होंने प्रत्येक नागरिक से दूसरों के मानवाधिकारों के संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए काम करने का आग्रह किया क्योंकि “यह उनके अपने मानवाधिकारों के संरक्षण की सबसे सुरक्षित गारंटी है।”

‘मानवाधिकार’ (Human rights) मानव व्यवहार के निश्चित मानकों के लिए नैतिक सिद्धांत या मानदंड होते हैं और नागरिक तथा अंतरराष्ट्रीय कानूनों में समान रूप से संरक्षित होते हैं।

मानव अधिकारों का संवर्धन और संरक्षण:

  • अनुच्छेद 51 A (g): संविधान का अनुच्छेद 51 A (g) प्रत्येक नागरिक को प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा जीवित प्राणियों के लिए दया दर्शाने का आदेश देता है।
  • मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (2019 में संशोधित) में संघ स्तर पर एक ‘राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग’ के गठन का प्रावधान किया गया है। यह आयोग राज्यों में ‘राज्य मानवाधिकार आयोग’ और ‘मानवाधिकार न्यायालयों’ का मार्गदर्शन करता है।
  • ‘मानवाधिकारों पर सार्वभौमिक घोषणा’ (Universal Declaration of Human Rights): यह संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) द्वारा अपनाया गया एक अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज है। इसमें मानव जाति के सभी सदस्यों के अधिकारों और स्वतंत्रता को स्थापित किया गया है।
  • पूरे विश्व में 10 दिसंबर को ‘मानवाधिकार दिवस’ मनाया जाता है।
  • ‘फ्रीडम इन द वर्ल्ड 2021’ रिपोर्ट ने इस साल की शुरुआत में भारत की स्थिति को ‘स्वतंत्र’ से घटाकर ‘आंशिक रूप से ‘स्वतंत्र’ कर दिया।
  • मानवाधिकार परिषद: ‘मानवाधिकार परिषद’ (Human Rights Council) संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के भीतर एक अंतर-सरकारी निकाय है जो मानवाधिकारों के प्रचार और संरक्षण को मजबूत करने के लिए जिम्मेदार है।
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल: यह मानव अधिकारों के लिए अभियान चलाने वाले स्वयंसेवकों का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है।

मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए उठाए गए कदम:

  • शासन व्यवस्थागत सुधार और सकारात्मक पहल: विशेष रूप से स्वास्थ्य और आर्थिक क्षेत्रों में।
  • समावेशी विकास: यह मानव अधिकारों के उल्लंघन के लिए भी प्रतिकारक (Antidotal) है।
  • बैंकिंग नेटवर्क: 400 मिलियन परिवार बैंकिंग नेटवर्क में शामिल हो रहे हैं और 200 मिलियन से अधिक परिवार मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन से लाभान्वित हो रहे हैं।

मानवाधिकारों के लिए चुनौतियां:

  • मानव अधिकारों के स्वरूप की परस्पर विरोधी परिभाषा: जैसेकि, जहाँ चीन द्वारा ‘उइगर समुदाय’ किए जाने पर मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए पूरा विश्व ने निंदा की है, वहीं चीन इसे आतंकवाद विरोधी / अलगाववादी विरोधी उपायों के रूप में देखता है।
  • मौन : हमारे अधिकांश नागरिकों का मौन और मूक रहना।
  • भ्रष्टाचार: भ्रष्टाचार के सामने मानवाधिकारों से समझौता किया जाता है।

मानवाधिकारों का महत्व:

  • लोकतंत्र का फलना-फूलना: लोकतंत्र को फलने-फूलने के लिए मानवाधिकार ‘अति महत्वपूर्ण’ हैं।
  • लोकतांत्रिक मूल्य: मानवाधिकारों के अभाव में लोकतांत्रिक मूल्यों कोई महत्व नहीं है।
  • गरिमा: ‘मानव अधिकारों का पोषण’ गरिमा और गरिमामय मानव अस्तित्व के लिए ‘अमृत’ के समान है।
  • सकारात्मक पारिस्थितिकी तंत्र: समृद्ध मानव अधिकार एक सकारात्मक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं, जिससे मानव प्रतिभा के इष्टतम उपयोग का अवसर मिलता है।
  • विकास: ‘मानव अधिकार’ समग्र विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • भारतीय संस्कृति: भारतीय संस्कृति की मानव-समर्थक मूलभूत भावना, बृहद आरण्यक उपनिषद में परिलक्षित होती है।

भारतीय राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के बारे में:

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन 12 अक्तूबर, 1993 को हुआ था। यह मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के प्रावधानों के तहत स्थापित एक वैधानिक निकाय है।

  • आयोग का अधिदेश, मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 द्वारा यथासंशोधित मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 में निहित है।
  • राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन पेरिस सिद्धांतों के अनुरूप है जिन्हें अक्तूबर, 1991 में पेरिस में मानव अधिकार संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए राष्ट्रीय संस्थानों पर आयोजित पहली अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला में अंगीकृत किया गया था तथा 20 दिसम्बर, 1993 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संकल्प 48/134 के रूप में समर्थित किया गया था।
  • यह आयोग, मानव अधिकारों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के प्रति भारत की चिंता का प्रतीक अथवा संवाहक है।
  • मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम की धारा 12 (1)(घ) में मानव अधिकारों को संविधान द्वारा गारंटीकृत अथवा अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में समाविष्ट तथा भारत में न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय व्यक्ति के अधिकारों के रूप में परिभाषित किया गया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की संरचना

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग का गठन एक अध्यक्ष, चार पूर्ण कालिक सदस्यों तथा चार मानद सदस्यों से होता है।

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, के अध्यक्ष पद पर उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ-साथ उच्चतम न्यायालय के अन्य न्यायाधीश भी नियुक्त किये जा सकते हैं।

इसके अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति एक छह सदस्यीय समिति की सिफारिशों पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। इस समिति के सदस्यों में निम्नलिखित को सम्मिलित किया जाता है:

  1. प्रधान मंत्री (प्रमुख)
  2. लोकसभा के अध्यक्ष
  3. राज्य सभा के उपाध्यक्ष
  4. संसद के दोनों सदनों में विपक्ष के नेता
  5. केंद्रीय गृह मंत्री।

कार्यकाल तथा पदत्याग

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों का कार्यकाल तीन वर्ष अथवा 70 वर्ष की आयु (जो भी पहले हो) तक निर्धारित है।

विशेष परिस्थितियों में, इन्हें राष्ट्रपति द्वारा पद से हटाया जा सकता है।

इंस्टा लिंक:

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC)

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (10 अंक)

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

भारत को ‘जनसंख्या नीति’ की आवश्यकता

संदर्भ: संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकशित आंकड़ों के अनुसार- भारत 2023 तक विश्व के सबसे अधिक आबादी वाले देश के रूप में चीन को पीछे छोड़ देगा।

  • 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश 2041 के आसपास चरम पर होगा।

क्या हमें जनसंख्या नीति की आवश्यकता है?

हाँ। भारत में एक जनसंख्या नीति लागू किए जाने की आवश्यकता है।

  • पिछली जनसंख्या नीति, काफी पहले वर्ष 2000 में पहले तैयार की गई थी।
  • हमारी जनसंख्या नीति में ‘संशोधन’ और ‘आयु-वृद्धि’ को शामिल करने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
  • नीति में ‘प्रजनन स्वास्थ्य’ को बढ़ाने के साथ-साथ अन्य चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
  • भारत के विकास के लिए हमें एक ऐसी नीति तैयार करनी चाहिए जिसमे ‘जनसंख्या’ को संसाधन के रूप में विकसित किया जाए, और यह सुनिश्चित करे कि जनसंख्या खुश, स्वस्थ और उत्पादक हो।
  • हमें ‘दो-बच्चे के मानदंड’ पर ध्यान केंद्रित करने से दूर जाने की आवश्यकता है।

बढ़ती आबादी के बीच उठाए जाने वाले कदम:

  • परिवार कल्याण: ‘परिवार नियोजन दृष्टिकोण’ से ‘परिवार कल्याण दृष्टिकोण’ की ओर अग्रसर होना।
  • पुरुषों और महिलाओं को सशक्त बनाना: उनकी प्रजनन क्षमता, स्वास्थ्य और कल्याण के बारे में सूचित विकल्प बनाने में सक्षम होना।
  • स्किलिंग: नए कौशल सीखना।
  • आर्थिक नियोजन: जो अच्छी नौकरियां, कृषि उत्पादकता आदि सुनिश्चित करता है।
  • सार्वजनिक नीति: जनसंख्या प्रबंधन के लिए सार्वजनिक नीति में तीव्र परिवर्तन करना।
  • ‘उर्वरता दर’ पर नहीं बल्कि ऐसी स्थिति बनाने पर ध्यान दें जिसमें बढ़ती अर्थव्यवस्था के संदर्भ में परिवार के आकार में धीमी गति से परिवर्तन हो।
  • 2050 तक प्रत्येक पाँचवाँ भारतीय 65 वर्ष से अधिक आयु का होगा। इसलिए इस आयुवर्ग के लिए योजना बनाना ‘समान रूप से विचार’ करने योग्य है।
  • किशोर कल्याण में लाभ प्राप्त करने के लिए निवेश करने की जरूरत है।
  • रोजगार के अवसरों में सुधार: युवा महिलाओं के लिए और महिला रोजगार दर में वृद्धि।
  • सामाजिक सहयोग: बुजुर्ग महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक सहयोग नेटवर्क की आवश्यकता होती है।

इंस्टा लिंक्स:

एक साल में सर्वाधिक आबादी वाले देश के रूप में चीन को पीछे छोड़ देगा भारत: संयुक्त राष्ट्र

मेंस लिंक:

उच्च विकास के लगातार अनुभव के बावजूद, भारत अभी भी मानव विकास के संकेतकों में निचले स्थानों पर है। संतुलित और समावेशी विकास को दुश्कर बनाने वाले मुद्दों का परीक्षण कीजिए। (यूपीएससी 2021)

स्रोत: द हिंदू


सामान्य अध्ययन-III


विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2022

संदर्भ: हाल ही में अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी संगठन, ‘वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर’ (World Wide Fund for Nature – WWF) द्वारा अपनी द्विवार्षिक ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट’ 2022 (Living Planet report 2022) जारी की गयी है। इस रिपोर्ट में वैश्विक जैव विविधता और ग्रह के स्वास्थ्य के रुझान को दर्शाया गया है।

लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट, वर्ल्ड वाइड फंड (WWF) फॉर नेचर और जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन, द्वारा वन्यजीव आबादी पर प्रेक्षणों के आधार पर तैयार की जाती है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • वन्य जीव आबादी में गिरावट: पिछले 50 वर्षों में दुनिया भर में स्तनधारियों, पक्षियों, उभयचरों, सरीसृपों और मछलियों की वन्यजीव आबादी में 69 प्रतिशत की गिरावट आई है।
  • विश्व स्तर पर मीठे पानी की प्रजातियों की आबादी में 83 प्रतिशत की कमी आई है। साइकैड (Cycads) – बीजीय पौधों का एक प्राचीन समूह – सबसे अधिक संकटग्रस्त प्रजाति है, जबकि प्रवाल सबसे तेजी से घट रहे हैं, इसके बाद उभयचरों का स्थान है।
  • क्षेत्र-विशिष्ट आकलन: लैटिन अमेरिका और कैरेबियन क्षेत्र में, वन्य जीव आबादी में सबसे अधिक गिरावट (94 प्रतिशत) दर्ज की गयी।
  • अफ्रीका ने 1970-2018 की अवधि में अपनी वन्यजीव आबादी में 66 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की है।
  • मैंग्रोव: जलीय कृषि, कृषि और तटीय विकास के लिए प्रति वर्ष0. 13 प्रतिशत की दर से ‘मैंग्रोव’ नष्ट किए जा रहे है।
  • मैंग्रोव-क्षति, जैव विविधता के लिए आवास के नुकसान और तटीय समुदायों के लिए पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के नुकसान का प्रतिनिधित्व करता है।
  • मूंगा या प्रवाल: लगभग 50% उष्ण जल के प्रवाल (Corals) पहले ही नष्ट हो चुके हैं और1.5 डिग्री सेल्सियस की तापमान वृद्धि से 70-90% उष्ण जल के प्रवाल नष्ट हो जाएँगे।
  • शार्क: पिछले 50 वर्षों में 31 में से 18 समुद्री शार्क की वैश्विक आबादी में 71% की गिरावट आई है। 2020 तक तीन-चौथाई शार्क और रे के विलुप्त होने का खतरा था।

अन्य हाइलाइट्स:

  • नदियाँ: 1,000 किमी से अधिक लंबी केवल 37% नदियाँ, अपनी प्राकृतिक अवस्था में मुक्त प्रवाहित रहती हैं।

रिपोर्ट में भारत-विशिष्ट बिंदु:

  • हिमालयी क्षेत्र और पश्चिमी घाट, जैव विविधता के नुकसान के मामले में देश में सबसे संवेदनशील क्षेत्र हैं।
  • सुंदरवन: 1985 के बाद से सुंदरवन मैंग्रोव वन का 137 किमी का क्षरण हुआ है, जिससे वहां रहने वाले लोगों के लिए भूमि और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में कमी आई है।
  • देश में इस अवधि के दौरान मधुमक्खियों और मीठे पानी के कछुओं की 17 प्रजातियों की आबादी में गिरावट देखी गई है।

रिपोर्ट द्वारा उद्धृत चुनौतियाँ:

  • वास-स्थानों की क्षति और प्रवास के मार्ग में बाधाएं।
  • जैव विविधता के नुकसान के लिए छह प्रमुख खतरे हैं – आवास का क्षरण और नुकसान, शोषण, आक्रामक प्रजातियों की शुरूआत, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और बीमारी।
  • ‘भूमि-उपयोग परिवर्तन’ अभी भी प्रकृति के लिए सबसे बड़ा वर्तमान खतरा है।
  • कई मैंग्रोव भी अतिदोहन और प्रदूषण के कारण नष्ट हो जाते हैं, साथ ही तूफान और तटीय कटाव जैसे प्राकृतिक तनाव का सामना भी करना पड़ता है।
  • जलवायु परिवर्तन- जल संसाधन, कृषि, प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र, स्वास्थ्य और खाद्य श्रृंखला जैसे प्रमुख क्षेत्रों को प्रभावित करेगा।
  • उभयचरों के लिए कृषि सबसे आम खतरा है जबकि शिकार और जाल से पक्षियों और स्तनधारियों के लिए सबसे अधिक खतरा है।

आवश्यकता:

  • अंतर्संबंध: जैव विविधता के नुकसान और जलवायु संकट को दो अलग-अलग मुद्दों के बजाय एक के रूप में निपटाया जाना चाहिए क्योंकि वे आपस में जुड़े हुए हैं।
  • सर्व-समावेशी सामूहिक दृष्टिकोण: ताकि हमें अधिक टिकाऊ रास्ते पर लाया जा सके और यह सुनिश्चित किया जा सके कि हमारे कार्यों से होने वाली लागत और लाभ सामाजिक रूप से न्यायसंगत और समान रूप से साझा किए जाएँ।
  • प्रकृति-सकारात्मक भविष्य के लिए हम कैसे उत्पादन करते हैं, हम कैसे उपभोग करते हैं, हम कैसे शासन करते हैं और हमारा वित्त-पोषण किस प्रकार होता है- इस सब में परिवर्तनकारी बदलाव की आवश्यकता है।

‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट’ क्या है?

  • लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट (Living Planet Report), वर्ल्ड वाइड फंड (WWF) द्वारा प्रति दो वर्ष में प्रकाशित की जाती है।
  • यह वैश्विक जैव विविधता तथा पृथ्वी ग्रह के स्वास्थ्य संबंधी प्रवृत्तियों का एक व्यापक अध्ययन है।
  • रिपोर्ट, लिविंग प्लैनेट इंडेक्स (Living Planet Index- LPI) के माध्यम से प्राकृतिक जगत की स्थिति का व्यापक अवलोकन प्रस्तुत करती है।

‘लिविंग प्लैनेट इंडेक्स’ (LPI) क्या है?

यह समूचे विश्व के स्थलीय, मीठे पानी और समुद्री आवासों में कशेरुकी प्रजातियों (Vertebrate Species)  की आबादी में आने वाले रुझानों के आधार पर वैश्विक जैविक विविधता की स्थिति का संकेतक है।

मेंस लिंक: लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2022 के प्रमुख निष्कर्षों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: डीटीई, इंडियन एक्सप्रेस


मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री


एक केस स्टडी – कृषि: आंध्र प्रदेश में ‘रायथू भरोसा केंद्र’

देश में पहली बार स्थापित, ‘रायथू भरोसा केंद्र’ (Rythu Bharosa Kendras) किसानों के लिए एक अनोखी पहल है, जहाँ बीज से लेकर बिक्री तक ‘एकल-खिड़की’ सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। ये सेवा केंद्र पूरे राज्य में स्थापित किए गए हैं।

रायथू भरोसा केंद्र’ सीधे ग्रामीण स्तर पर किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विस्तार अधिकारियों के बीच बातचीत की सुविधा प्रदान करते हैं।

सुविधाएं:

  • पूर्व-परीक्षण गुणवत्ता वाले बीज, प्रमाणित उर्वरक और पशु चारा की बिक्री;
  • किराए पर कृषि उपकरण;
  • मृदा परीक्षण के लिए नमूना जाना करने की सुविधा;
  • फसल बीमा प्रक्रिया;
  • ई-फसल की सहायता प्रणाली,
  • जिओ-टैगिंग, और यहां तक ​​​​कि MSP पर अपनी उपज को मौजूदा समय में बेच सकते हैं।

सफलता: कई किसानों ने अपने फसल पैटर्न को बदल दिया है, और नकली बीज और अप्रमाणित और खतरनाक उर्वरकों को खत्म करने में मदद की है। 10,700 से अधिक ‘रायथू भरोसा केंद्र’ – डिजिटल आधार प्रमाणीकरण उपकरण के साथ बहु-कार्यात्मक कियोस्क – पूरे राज्य में स्थापित किए गए हैं।

केंद्र ने हाल ही में खाद्य और कृषि संगठन के “चैंपियन” पुरस्कार के लिए ‘रायथू भरोसा केंद्र’ अवधारणा को नामित किया है।

युवाओं पर मीडिया का प्रतिकूल प्रभाव

लद्दाख को कचरा मुक्त बनाने हेतु प्रयास

संदर्भ: एक अपशिष्ट प्रबंधन सामाजिक उद्यम ‘प्लैनेटफर्स्ट रीसाइक्लिंग’ (PlanetFirst Recycling) ने लद्दाख में कचरे की बढ़ती समस्या से निपटने का फैसला किया है।

  • प्लैनेटफर्स्ट ने केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन द्वारा चलाए जा रहे सभी सैटेलाइट सॉलिड रिसोर्स मैनेजमेंट सेंटर्स से जुड़े एक ‘स्क्रैप खरीद और बिक्री नेटवर्क’ और ‘जैविक अपशिष्ट कॉम्पोस्टर’ की स्थापना की है।
  • प्लैनेटफर्स्ट की टीम ने, नार्वे की एक कंपनी, रिवर्स वेंडिंग मशीन (आरवीएम) के आविष्कारक, टोमरा (TOMRA) को इस अद्वितीय और आधुनिक संग्रह तंत्र को पेश करने में शामिल किया है। इस मॉडल का पूरे यूरोप में कुशल अपशिष्ट रिकवरी के लिए प्रयोग किया जा रहा है।
  • इस मॉडल में सभी पैकेजिंग सामग्री पर उपभोक्ताओं के लिए एक ‘जमा राशि’ स्थापित करना शामिल है। ‘पैकेजिंग सामग्री’ वापस करने के बाद, एकत्र की गई जमा राशि उपभोक्ता को वापस कर दी जाएगी। यह प्रणाली, समाज के सभी वर्गों से उत्पन्न फेंकी गयी सामग्री और कबाड़ के संग्रह को प्रोत्साहित करती है।

रिवर्स शॉपिंग

संदर्भ: रिवर्स शॉपिंग (Reverse Shopping) को बढ़ावा देने के लिए, खेल के सामान की दिग्गज कंपनी ‘डेकाथलॉन’ (Decathlon) ने एक महीने के लिए अपना नाम बदलने का फैसला किया है। बेल्जियम के तीन शहरों में ‘डेकाथलॉन’ स्टोर के बोर्ड पर “NOLHTACED” लिखा जाएगा।

  • ‘रिवर्स शॉपिंग’ का मूल रूप से मतलब है कि ग्राहक पुराने या अप्रयुक्त खेल के सामान को वापस स्टोर में बेच सकते हैं, और कंपनी फिर आइटम की मरम्मत करेगी और वारंटी के तहत उन्हें किसी न किसी रूप में फिर से बेचेगी।
  • इसका उद्देश्य पर्यावरण के अनुकूल प्रक्रियाओं के बारे में सामान्य जागरूकता को बढ़ावा देना है।


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


कर्नाटक में हिजाब-प्रतिबंध पर सुप्रीम कोर्ट का खंडित फैसला

संदर्भ:

कर्नाटक के सरकारी स्कूल, कॉलेजों में छात्राओं के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने बंटा हुआ फैसला दिया है।

प्रमुख बिंदु:

विभाजित फैसला: विभाजित फैसले (Split verdict) का मतलब है, कि मामले को अब आगे के निर्देशों के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा।

भारत के मुख्य न्यायाधीश का निर्णय आने तक कर्नाटक की कक्षाओं में हिजाब पर प्रतिबंध (Hijab Ban) यथावत रहेगा।

न्यायमूर्ति हेमंत गुप्ता ने कर्नाटक के निषेधात्मक सरकारी आदेश को बरकरार रखा। इनके अनुसार-

  • धार्मिक विश्वास के स्पष्ट प्रतीकों को राज्य निधि से बनाए गए धर्मनिरपेक्ष स्कूलों में नहीं पहना जा सकता है।
  • ‘धर्मनिरपेक्षताका अर्थ एकरूपता है। यह ‘एकरूपता’ (Uniformity) के संदर्भ में छात्रों के बीच समानता द्वारा प्रकट होती है।
  • हिजाब पर प्रतिबंध ‘शिक्षा से वंचित करने’ के बराबर नहीं है। हालांकि, यदि छात्रों को कक्षाओं में जाने से रोका जाता है, तो यह राज्य द्वारा शिक्षा से वंचित किए जाने के बराबर नहीं होगा।

जस्टिस सुधांशु धूलिया द्वारा की गयी टिप्पणियाँ:

  • धर्मनिरपेक्षता: का अर्थ है “विविधता” के प्रति सहिष्णुता।
  • स्कूल में हिजाब पहनना या न पहनना, यह अंततः व्यक्तिगत पसंद का मामला है। (अनुच्छेद 19(1)(ए))
  • लड़कियों से हिजाब उतारने के लिए कहना, उनकी निजता का हनन और उनकी मर्यादा पर हमला है (अनुच्छेद 21) तथा यह उनके लिए धर्मनिरपेक्ष शिक्षा से वंचित करना है।

अनुच्छेद 25:

  • संविधान का अनुच्छेद 25, अनिवार्य धार्मिक प्रक्रियों की बात नहीं करता है।
  • यदि धार्मिंक आस्था सच्ची है और वह किसी को नुकसान नहीं पहुँचाती है, तो कक्षा में हिजाब पर प्रतिबंध लगाने का कोई न्यायोचित कारण नहीं हो सकता है।

‘हिजाब’ के संदर्भ में केरल उच्च न्यायालय के अन्य फैसले:

  • आमना बिंत बशीर बनाम केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (2016) मामले में, केरल उच्च न्यायालय ने हिजाब (HIJAB) पहनने की प्रथा को एक अनिवार्य धार्मिक प्रथा के रूप में माना, किंतु सीबीएसई द्वारा निर्धारित ड्रेस कोड को रद्द नहीं किया। इसके बजाय, अदालत ने अतिरिक्त सुरक्षा उपायों- जैसे कि जरूरत पड़ने पर यह जांच करना कि छात्रों ने पूरी बाजू के कपडे पहने हैं अथवा नहीं – का प्रावधान किया था।
  • फातिमा तसनीम बनाम केरल राज्य (2018) मामले में, केरल उच्च न्यायालय ने कहा, कि किसी संस्था के सामूहिक अधिकारों को, याचिकाकर्ता के व्यक्तिगत अधिकारों पर प्राथमिकता दी जाएगी। इस मामले में दो लड़कियां शामिल थीं जो हेडस्कार्फ़ पहनना चाहती थीं। स्कूल ने हेडस्कार्फ की अनुमति देने से इनकार कर दिया। हालाँकि, अदालत ने अपील को खारिज कर दिया क्योंकि उस समय याचिकाकर्ता छात्राएं प्रतिवादी-विद्यालय में अध्ययन नहीं कर रही थी।

 

भाषा समिति की अनुशंसाएँ और हिंदी अधिरोपण को लेकर नवीनतम विवाद

संदर्भ: गृह मंत्री की अध्यक्षता में गठित ‘राजभाषा समिति’ द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के समक्ष प्रस्तुत एक रिपोर्ट पर नाराज प्रतिक्रियाएं दी जा रही हैं। हालाँकि यह रिपोर्ट अभी तक जनता के लिए सार्वजनिक नहीं की गई है।

  • कुछ रिपोर्टों के अनुसार- ‘राजभाषा समिति’ की रिपोर्ट में उच्च शिक्षा, उच्च न्यायालयों और आधिकारिक उपयोग में ‘हिंदी’ को निर्देशों का माध्यम बनाने की अनुसंशा की गयी है।
  • हालांकि, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों को राजभाषा अधिनियम, 1963 और नियमों और विनियमों (अधिनियम के), 1976 के अनुसार छूट दी गई है।
  • यह कानून केवल श्रेणी के राज्यों में, जिनमें आधिकारिक भाषा हिंदी है, लागू किए जाने की सिफारिश की गयी है।

संवैधानिक प्रावधान:

संविधान में तय किया गया था, कि गणतंत्र के पहले 15 वर्षों के लिए हिंदी और अंग्रेजी दोनों को आधिकारिक भाषाओं के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। लेकिन, दक्षिण में तीव्र हिंदी विरोधी आंदोलनों के मद्देनजर, केंद्र ने 1965 के बाद भी अंग्रेजी का उपयोग जारी रखने की घोषणा की थी।

संविधान के अनुच्छेद 351 में ‘हिंदी के सक्रिय प्रचार’ संबंधी अधिदेश के तहत, आधिकारिक संचार में हिंदी के उपयोग की समीक्षा और प्रचार करने के लिए ‘राजभाषा समिति’ का गठन किया गया था। समिति की पहली रिपोर्ट 1987 में प्रस्तुत की गई थी।

राजभाषा कार्यान्वयन के लिए राज्यों की श्रेणियाँ:

  • श्रेणी ‘ – इसमें वे राज्य शामिल हैं जिनकी आधिकारिक राज्य भाषा हिंदी है जैसे बिहार, राजस्थान आदि।
  • श्रेणी बी‘ – इसमें मुख्य रूप से वे राज्य शामिल हैं जिनकी दूसरी आधिकारिक भाषा हिंदी है। उदा. पंजाब, गुजरात आदि।
  • श्रेणी सी‘- अन्य राज्य, जहां हिंदी का उपयोग 65 प्रतिशत से कम है। तमिलनाडु, केरल आदि।

 

मनरेगा द्वारा महामारी के दौरान 80% तक की आय हानि की भरपाई

संदर्भ: ‘सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्प्लॉयमेंट’ द्वारा, ‘कोविड19 महामारी के दौरान मनरेगा के प्रभाव’ पर किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि अधिनियम के तहत अर्जित मजदूरी ने 20 से 80% तक आय हानि की भरपाई करने में मदद की।

  • हालांकि, मनरेगा के तहत काम करने के इच्छुक सभी जॉब कार्ड धारकों में से लगभग 39% को 2020-21 के कोविड वर्ष में एक भी दिन का काम नहीं मिला।
  • 2022-23 तक, मनरेगा के तहत 15.4 करोड़ सक्रिय श्रमिक सूचीबद्ध हैं।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (MGNREGA) के बारे में:

  • मनरेगा (MGNREGA) को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में एक सामाजिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके अंतर्गत ‘काम करने के अधिकार’ (Right to Work) की गारंटी प्रदान की जाती है।
  • इस सामाजिक उपाय और श्रम कानून का मुख्य सिद्धांत यह है, कि स्थानीय सरकार को ग्रामीण भारत में न्यूनतम 100 दिनों का वैतनिक रोजगार प्रदान करना होगा ताकि ग्रामीण श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि की जा सके।

पात्रता:

  1. मनरेगा योजना का लाभ लेने के लिए भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. कार्य हेतु आवेदन करने के लिए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष अथवा इससे अधिक होनी चाहिए।
  3. आवेदक के लिए किसी स्थानीय परिवार का हिस्सा होना चाहिए (अर्थात, आवेदन स्थानीय ग्राम पंचायत के माध्यम से किया जाना चाहिए)।
  4. आवेदक को स्वेच्छा से अकुशल श्रम के लिए तैयार होना चाहिए।

क्रियान्वयनः इस योजना का कार्यान्वयन ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा राज्य सरकारों के सहयोग से किया जाता है। यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है।

  1. आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग होती है, उस दिन से आवेदक को वैतनिक रोजगार प्रदान किया जाएगा।
  2. रोजगार उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, आवेदन जमा करने के पंद्रह दिनों के भीतर या काम की मांग करने की तिथि से बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार होगा।
  3. मनरेगा के कार्यों का सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit) अनिवार्य है, जिससे कार्यक्रम में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
  4. मजदूरी की मांग करने हेतु अपनी आवाज उठाने और शिकायतें दर्ज कराने के लिए ‘ग्राम सभा’ इसका प्रमुख मंच है।
  5. मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों को मंजूरी देने और उनकी प्राथमिकता तय करने का दायित्व ‘ग्राम सभा’ और ‘ग्राम पंचायत’ का होता है।

निर्वाचन आयोग द्वारा जम्मू-कश्मीर में बाहरी लोगों के नामांकन का आदेश वापस

संदर्भ: जम्मू चुनाव अधिकारी ने तहसीलदारों को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए एक वर्ष से अधिक समय से जम्मू जिले में रहने वाले बाहरी लोगों को मतदाता के रूप में नामांकित करने के निर्देश को वापस ले लिया है।

मतदाता सूची को संशोधित क्यों किया जा रहा है?

परिसीमन आयोग (Delimitation Commission): इस साल की शुरुआत में जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग द्वारा जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत, जम्मू-कश्मीर में सात नए विधानसभा क्षेत्र-  जम्मू संभाग के लिए छह और एक कश्मीर – बनाए जाने के नयी मतदाता सूची पर कार्य किया जा रहा है।

  • जम्मू में अब 43 सीटें है, जबकि कश्मीर में 47 सीटें हैं।
  • चुनाव आयोग ने फैसला किया है कि वह 1 अक्टूबर 2022 को या उससे पहले 18 वर्ष की आयु प्राप्त करने वाले किसी भी व्यक्ति को नई मतदाता सूची में शामिल करेगा।
  • जम्मू-कश्मीर में 2018 से राज्यपाल शासन है और 2014 में पिछला विधानसभा चुनाव हुआ था।

‘बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम’ में संशोधन

संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘बहु-राज्य सहकारी समितियां (संशोधन) विधेयक’, 2022 (Multi-State Cooperative Societies (Amendment) Bill, 2022) को मंजूरी दे दी है।

इस विधेयक का उद्देश्य इस क्षेत्र में पारदर्शिता लाने और चुनावी प्रक्रिया में सुधार के लिए बहु-राज्य सहकारी समिति अधिनियम, 2002 में संशोधन करना है।

प्रमुख बिंदु:

  • 97वां संविधान संशोधन: प्रस्तावित विधेयक 97वें संविधान संशोधन के प्रावधानों को शामिल करेगा।
  • संरचना में सुधार: इसमें बोर्ड की संरचना में सुधार और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • धन जुटाना: बहु-राज्य सहकारी समितियों में धन जुटाने में सक्षम बनाना।

नए निकायों की स्थापना:

  • सहकारिता चुनाव प्राधिकरण
  • सहकारिता सूचना अधिकारी
  • सहकारिता लोकपाल

इन संशोधनों का उद्देश्य:

  • शासन में सुधार;
  • चुनावी प्रक्रिया में सुधार;
  • निगरानी तंत्र को मजबूत बनाना;
  • पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना।

97वां संशोधन अधिनियम:

  • अनुच्छेद 19(1)(c): संविधान के भाग III के तहत अनुच्छेद 19(1)(c) में “संघों और समितियों” के बाद “सहकारिता” शब्द जोड़ा गया था।
  • अनुच्छेद 43B: इसे “सहकारी समितियों के प्रचार” के संबंध में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों (भाग IV) में जोड़ा गया था।

धान की परली का पेलेटाइजेशन और टॉरफेक्शन

संदर्भ– पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने धान की पुआल ‘पेलेटाइजेशन’ (बड़े-बड़े गोले बनाना) और ‘टॉरफेक्शन’ (TORREFACTION) संयंत्रों की स्थापना के लिए वित्तीय सहायता (50 करोड़ रुपये) के अनुदान के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।

अनुदान की विशेषताएं:

  • इस योजना के तहत, केंद्र क्षमता के अधीन नए पेलेटिज़ेशन संयंत्रों (सामान्य लागत ₹35 लाख) को अधिकतम ₹70 लाख तक निधि देगा।
  • टॉरफेक्शन प्लांट (सामान्य लागत ₹70 लाख), अधिकतम ₹4 करोड़ के वित्त पोषण के लिए पात्र होंगे।

आवश्यकता: पंजाब और हरियाणा में हर साल 27 मिलियन टन से अधिक धान की पराली उत्पन्न होती है, जिनमें से कई को आमतौर पर जला दिया जाता है जो वायु प्रदूषण को बढ़ाता है।

  • पेलेटिज़ेशन (PELLETISATION): पेलेटिज़िंग एक सामग्री (धान की भूसी या पराली) को एक गोली के आकार में संपीड़ित या ढालने की प्रक्रिया होती है।
  • टॉरफेक्शन (TORREFECTION) – टॉरफेक्शन एक ‘थर्मल प्री-ट्रीटमेंट’ तकनीक है। यह एक ठोस जैव ईंधन उत्पाद का उत्पादन करता है जिसमें अन्य बायोमास ईंधन की तुलना में बेहतर संचालन, मिलिंग और सह-फायरिंग क्षमताएं होती हैं।

लाभ:

  • धान की पराली को गुटिकाओं में बनाया जाता है, या ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ मिलाया जा सकता है। इससे कोयले की बचत होती है और साथ ही कार्बन उत्सर्जन भी कम होता है
  • पराली जलाने में कमी आएगी और एनसीआर और पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में वायु गुणवत्ता में सुधार होगा।
  • रोजगार सृजन और ऊर्जा सुरक्षा।

इसरो का अगली-पीढी का अपना प्रक्षेपण वाहन

संदर्भ: इसरो (ISRO) द्वारा PSLV को बदलने के लिए एक ‘अगली-पीढी का प्रक्षेपण वाहन’ (Next-Gen Launch Vehicle – NGLV) विकसित किया जा रहा है।

NGLV की विशेषताएं:

  • इसमें तीन चरण होगें, पुन: प्रयोज्य होगा और भारी उपग्रहों को उठाने में सक्षम होगा;
  • बूस्टर चरणों के लिए सेमी-क्रायोजेनिक प्रणोदन का प्रयोग;
  • जियोस्टेशनरी ट्रांसफर ऑर्बिट में 10 टन की पेलोड क्षमता;
  • लागत प्रभावी;
  • सरल, मजबूत डिजाइन, थोक निर्माण का अवसर।

संभावित उपयोग:

  • संचार उपग्रहों का प्रक्षेपण।
  • गहरे अंतरिक्ष मिशन।
  • भविष्य की मानव अंतरिक्ष उड़ान और कार्गो मिशन।
  • इसरो का उद्देश्य वाणिज्यिक और साथ ही राष्ट्रीय मिशनों को लॉन्च करने के लिए NGLV के लिए एक व्यवसाय मॉडल विकसित करने का है।

इसरो के प्रक्षेपण वाहन:

  1. सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (SLV): एक छोटे उपग्रह के लिए इसरो द्वारा विकसित पहला रॉकेट।
  2. ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान (PSLV): पहला प्रक्षेपण 1994 में किया गया था। यह तरल चरणों से लैस होने वाला पहला भारतीय प्रक्षेपण यान है।
  3. जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (GSLV): स्वदेश में विकसित क्रायोजेनिक अपर स्टेज (सीयूएस), जीएसएलवी एमके II का तीसरा चरण है।
  4. लघु उपग्रह प्रक्षेपण यान (SSLV): SSLV का लक्ष्य छोटे और सूक्ष्म उपग्रहों के प्रक्षेपण की वैश्विक मांग में वृद्धि करना है। एसएसएलवी 500 किलोग्राम तक के उपग्रहों के लिए लागत प्रभावी प्रक्षेपण सेवाएं प्रदान करने के लिए है।
  5. पुन: प्रयोज्य रॉकेट: इसरो ने एक पुन: प्रयोज्य (Reusable Rocket) रॉकेट भी विकसित किया है, जिसे पुन: प्रयोज्य लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी डिमॉन्स्ट्रेटर (RLV-TD) कहा जाता है। वर्ष 2016 में इसका सफल परीक्षण किया गया था।

सम्बंधित खबर:

इसरो ने भारत कृषि उपग्रह कार्यक्रम और भू प्रेक्षण परिषद के तहत कृषि को सहयोग देने हेतु एक समर्पित उपग्रह बनाने का प्रस्ताव दिया है।

  • देश के कृषि क्षेत्र के पर्याप्त कवरेज के लिए कम से कम दो उपग्रहों की आवश्यकता होगी।
  • वर्तमान में कृषि के लिए उपयोग किए जाने वाले उपग्रह: रिसोर्ससैट (फसल उत्पादन पूर्वानुमान के लिए); कार्टोसैट (स्थलाकृतिक मानचित्रण); RISAT (मौसम इमेजिंग)
  • ‘अर्थ ऑब्जर्वेशन काउंसिल’ वर्तमान कमियों जैसे प्रेक्षण में रुकावट, उपलब्ध रिमोट सेंसिंग डेटा का कम उपयोग, और डेटा प्रोसेसिंग और प्रसार की कमी को दूर करेगी।