[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 6th October 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

  1. अनुसूचित जाति के दर्जे हेतु मानदंड

सामान्य अध्ययन-III

  1. ओपेक प्लस द्वारा तेल-उत्पादन में कटौती हेतु सहमति के परिणाम

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना में संशोधन
  2. असंभव त्रियी
  3. चीनी उद्योग
  4. IFSCA को प्रस्तुत सतत वित्त पर रिपोर्ट
  5. विश्व व्यापार संगठन द्वारा ‘अंधकारमय’ व्यापार दृष्टिकोण की चेतावनी
  6. रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार
  7. मानचित्रण

 


सामान्य अध्ययन-II


विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

अनुसूचित जाति के दर्जे हेतु मानदंड

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश (Constitution (Scheduled Castes) Order of 1950) और दलित ईसाईयों को ‘अनुसूचित जाति’ के तहत शामिल किए जाने को चुनौती देने वाली याचिका पर सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है।

1950 के संवैधानिक आदेश में किन समुदायों को शामिल किया गया है?

1950 के संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश में केवल हिंदुओं को ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में मान्यता दी गयी है।

इस आदेश में 1956 और 1990 के संशोधन:

  • 1956 के संशोधन में, सिख धर्म में परिवर्तित हो चुके दलितों को ‘अनुसूचित जाति’ में शामिल किया गया।
  • 1990 के संशोधन में बौद्ध धर्म में परिवर्तित चुके दलितों को ‘अनुसूचित जाति’ में शामिल किया गया।

इन दोनों संशोधनों को निम्नलिखित रिपोर्टों का समर्थन मिला:

  • 1955 में गठित काका कालेलकर आयोग
  • 1983 में गठित अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति पर उच्चाधिकार प्राप्त समिति।

सरकार की स्थिति:

  • केंद्र सरकार: वर्ष 2019 में दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति के सदस्य के रूप में शामिल करने की संभावना को खारिज कर दिया।
  • इंपीरियल ऑर्डर ऑफ़ 1936 के तहत ‘डिप्रेस्ड क्लासेस’ की एक सूची को वर्गीकृत किया गया और इसमें विशेष रूप से “भारतीय ईसाइयों” को बाहर रखा गया।

‘दलित ईसाइयों’ को ‘अनुसूचित जाति’ की सूची से बाहर रखे जाने संबंधी कारण:

  • अस्पृश्यता की प्रथा: अस्पृश्यता (untouchability) केवल हिंदू धर्म और उसकी शाखाओं की एक विशेषता थी, जबकि इस्लाम या ईसाई धर्म में इसका कोई प्रचलन नहीं था।
  • भारत के महापंजीयक (The Registrar General of India – RGI) ने सरकार को आगाह करते हुए कहा था, कि ‘अनुसूचित जाति का दर्जा’ अस्पृश्यता की प्रथा से उत्पन्न होने वाली सामाजिक अक्षमताओं से पीड़ित समुदायों के लिए है।
  • वर्ष 1999 में ‘समावेशन हेतु नियमों में एक अधिदेश’ (A mandate in rules for inclusion) तैयार किया गया था और इसके लिए भारत के महापंजीयक (RGI) के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। बौद्ध धर्मांतरितों को ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में शामिल करने के लिए वर्ष 1990 में संशोधन पारित किया गया था।
  • समावेशन हेतु अनुच्छेद 341 का खंड (2): इस्लाम या ईसाई धर्म में परिवर्तित होने वाले दलित विभिन्न जाति समूहों के थे, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें “एकल जातीय समूह (समावेशन के लिए आवश्यक)” के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता है।

‘अनुसूचित जाति’ में शामिल करने हेतु विषय:

  • कई स्वतंत्र आयोगों की रिपोर्ट में भारतीय ईसाइयों और भारतीय मुसलमानों के बीच जाति और जातिगत असमानताओं की मौजूदगी का दस्तावेजीकरण किया गया है।
  • जातिवाद: सिख धर्म और बौद्ध धर्म में जातिवाद मौजूद भी नहीं है और फिर भी उन्हें ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में शामिल किया गया है।
  • दलित ईसाई निकायों का प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ताओं के अनुसार- सिख या बौद्ध धर्मांतरितों को शामिल करने के लिए अनुभवसिद्ध साक्ष्य मौजूद नहीं थे और फिर भी उन्हें ‘अनुसूचित जाति’ के रूप में शामिल किया गया था।

भारत के महापंजीयक (RGI) के बारे में:

  • RGI की स्थापना 1961 में गृह मंत्रालय के अधीन भारत सरकार द्वारा की गई थी।
  • इसका कार्य जनसंख्या के आकार, उसकी वृद्धि आदि पर आँकड़ों का एक व्यवस्थित संग्रह तैयार करना है।
  • बाद में, इस कार्यालय को देश में जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 को लागू करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई।
  • यह जनसांख्यिकीय सर्वेक्षणों (भारत की जनगणना और भारतीय भाषाई सर्वेक्षण सहित) के परिणामों का संचालन और विश्लेषण करता है।

इंस्टा लिंक्स:

मेंस लिंक:

क्या राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थानों में अनुसूचित जातियों के लिए संवैधानिक आरक्षण के कार्यान्वयन को लागू कर सकता है। परीक्षण कीजिए। (यूपीएससी 2018)

स्रोत: द हिंदू

 


सामान्य अध्ययन-III


विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

ओपेक प्लस द्वारा तेल-उत्पादन में कटौती हेतु सहमति के परिणाम

संदर्भ: ओपेक प्लस (OPEC+) समूह ने वर्ष 2020 की कोविड महामारी के बाद, एक तंग बाजार और संयुक्त राज्य अमेरिका और अन्य देशों द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती का विरोध किए जाने के बावजूद, सर्वाधिक कटौती के लिए सहमति व्यक्त की है। इसके बाद से तेल की वैश्विक कीमतों में तेजी आई है और अमेरिकी भंडार में गिरावट हुई है।

उत्पादन में कटौती के कारण:

  • मंदी का डर: ओपेक+ द्वारा 20 लाख बैरल प्रति दिन (barrel-per-day – BPD) में कटौती किए जाने से तेल की कीमतों में सुधार हो सकता है। विदित हो कि, तीन महीने पहले तेल की कीमत 120 डॉलर से गिरकर लगभग 90 डॉलर हो गई थी।
  • बढ़ती अमेरिकी ब्याज दरें: संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि किए जाने का अर्थ ओपेक प्लस देशों के लिए कम निवेश उपलब्ध होगा।
  • मजबूत डॉलर: ओपेक प्लस देशों की मुद्राओं की तुलना में ‘डॉलर’ के मजबूत से पेट्रोलियम उत्पादक देशों के लिए कम लाभ होगा।

प्रभाव:

  • कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती से, भारत सहित पेट्रोलियम पर निर्भर देशों के लिए, कच्चा तेल महंगा हो जाएगा।
  • महंगाई में वृद्धि होने की आंशका।
  • कम विदेशी मुद्रा वाले आयात पर निर्भर देशों, जैसेकि श्री लंका, के लिए भुगतान-संतुलन (BOP) संकट बढ़ सकता है।

हालांकि, ओपेक प्लस समूह के कुछ सदस्य देश अपने आउटपुट कोटा तक पहुंचने में विफल हो रहे हैं, इसे देखते हुए तेल के उत्पादन में बड़ी कटौती का वास्तविक प्रभाव छोटा होगा।

इस कदम का विरोध:

  • अमेरिका में मध्यावधि कांग्रेस के चुनाव होने वाले है, और राष्ट्रपति ‘जो बाइडेन’ चाहते हैं कि अमेरिकी पेट्रोल की कीमतें कम बनी रहें।
  • आयात पर निर्भर विकासशील और विकसित देश, अपने आर्थिक सुधार को बनाए रखने के लिए पेट्रोल की कीमतें कम रखना चाहते हैं।

‘ओपेक प्लस’ के बारे में:

ओपेक प्लस (OPEC+) कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले देशों का एक गठबंधन है। यह गठबंधन वर्ष 2017 से तेल बाजारों में की जाने वाली आपूर्ति में सुधार कर रहा है।

  • ओपेक प्लस देशों में अज़रबैजान, बहरीन, ब्रुनेई, कजाकिस्तान, मलेशिया, मैक्सिको, ओमान, रूस, दक्षिण सूडान और सूडान शामिल हैं।

‘ओपेक’ के बारे में:

ओपेक (OPEC- Organization of the Petroleum Exporting Countries) ‘पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन’ है।

  1. इसकी स्थापना, सितंबर, 1960 में आयोजित बगदाद सम्मेलन, इराक में पांच देशों, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान, इराक, कुवैत, सऊदी अरब और वेनेजुएला द्वारा समझौते पर हस्ताक्षर के साथ की गयी थी। ये पांचो देश ओपेक संगठन के संस्थापक सदस्य थे।
  2. OPEC एक स्थायी, अंतर-सरकारी संगठन है।
  3. इस संगठन का उद्देश्य अपने सदस्य देशों के मध्य पेट्रोलियम नीतियों का समन्वय और एकीकरण करना तथा उपभोक्ता राष्ट्रों के लिए पेट्रोलियम की सफल, आर्थिक और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु तेल बाज़ारों का स्थिरीकरण सुनिश्चित करना है।
  4. इसका मुख्यालय ऑस्ट्रिया के ‘वियना’ शहर में है।
  5. पर्याप्त मात्रा में तेल निर्यात करने वाला, तथा संगठन के आदर्शों को साझा करने वाला कोई भी देश OPEC का सदस्य बन सकता है।

तेल के संदर्भ में भारत की स्थिति:

  • भारत 5.35 मिलियन बैरल प्रति दिन के साथ कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है, जो अमेरिका (21.2 mbpd) और चीन (15.1 mbpd) से पीछे है।
  • भारत हर साल अपने कुल कच्चे तेल की खपत का लगभग 85% आयात करता है।
  • भारत का अपना उत्पादन लंबे समय से प्रति दिन 700,000 बैरल से नीचे रहा है।
  • इराक, भारत के लिए तेल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है।
  • इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (ISPRL) द्वारा पूर्वी तट पर विशाखापत्तनम (1.33 MMT) और पश्चिमी तट पर मंगलुरु (1.5MMT) और पादुर (2.5 MMT) में विशाल भूमिगत ‘शैल गुफाओं’ में तीन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों का निर्माण किया गया है।

इंस्टा लिंक्स:

ब्रेंट क्रूड ऑयल तथा ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट ऑयल’ (“West Texas Intermediate” – WTI oil ) के बीच अंतर?

मेंस लिंक:

सामरिक पेट्रोलियम भंडार के संदर्भ में भारत की योजना पर एक टिप्पणी लिखिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कच्चे तेल और उसके उपोत्पादों के बारे में।
  2. ओपेक क्या है?
  3. ओपेक प्लस के बारे में।

स्रोत: द हिंदू

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना में संशोधन

संदर्भ: वित्त मंत्रालय के अधीन ‘वित्तीय सेवा विभाग’ (Department of Financial Services) द्वारा विमानन क्षेत्र के लिए आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) को संशोधित किया है, ताकि इस क्षेत्र को नकदी प्रवाह की समस्याओं से निपटने में मदद मिल सके।

संशोधित ECLGS:

  • योजना के तहत, सस्ती ऋण सीमा को ₹400 करोड़ से बढ़ाकर ₹1,500 करोड़ कर दिया गया है।
  • ECLGS 3.0 के तहत अधिकतम ऋण राशि बढ़ाने के लिए एयरलाइन कंपनियों की पात्रता उनकी निधि-आधारित या गैर-निधि-आधारित ऋण का 100 प्रतिशत या 1,500 करोड़ रुपये, जो भी कम हो, का प्रावधान किया गया है।
  • इससे पहले, इस ऋण सीमा को मार्च 2022 से मार्च 2023 तक बढ़ा दिया गया था।

उड्डयन क्षेत्र के साथ हालिया मुद्दे: उच्च ईंधन लागत, भारी लागतों को बनाए रखने और लंबित बकाया का भुगतान करने के लिए धन की आवश्यकता।

ECLGS के बारे में:

आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) को मई 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान पैकेज के एक भाग के रूप में शुरू किया गया था।

  • इसका उद्देश्य कोरोनोवायरस के कारण लगाए गए लॉकडाउन से उत्पन्न संकट को कम करने के लिए, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को क्रेडिट प्रदान करना था।
  • इसके तहत, MSME, व्यावसायिक उद्यमों, MUDRA उधारकर्ताओं और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए निजी ऋणों को 29 फरवरी 2020 तक उनके बकाया ऋण के 20% की सीमा तक पूरी तरह से गारंटीकृत और संपार्श्विक-मुक्त अतिरिक्त ऋण प्रदान करता है।
  • नेशनल क्रेडिट गारंटी ट्रस्टी कंपनी (NCGTC) द्वारा ‘सदस्य ऋण संस्थानों’ (Member Lending Institutions – MLIs) – बैंकों, वित्तीय संस्थानों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFCs) को 100% गारंटी प्रदान की जाती है।
  • पहली बार उधारकर्ता और गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) खाते इस योजना के तहत धन प्राप्त करने के पात्र नहीं होंगे।

 

असंभव त्रियी

संदर्भ: अमेरिकी फेडरल रिजर्व बढ़ती बढ़ती कीमतों का मुकाबला करने के लिए ब्याज दरों में वृद्धि किए जाने के बाद से ‘त्रिधापाश’ / ‘ट्राइलेम’ (trilemma) हाल ही में चर्चा का विषय बन गया है।

असंभव त्रियी (Impossible Trinity), या ‘ट्राइलेम’ का तात्पर्य इस विचार से है, कि कोई अर्थव्यवस्था एक ही समय में, ‘स्वतंत्र मौद्रिक नीति का पालन नहीं कर सकती है, न ही निश्चित विनिमय दर बनाए रख सकती है, और न ही अपनी सीमाओं के पार पूंजी के मुक्त प्रवाह की अनुमति दे सकती है’।

  • अर्थशास्त्रियों के अनुसार, कोई भी अर्थव्यवस्था लंबे समय में एक साथ ऊपर बताए गए तीन नीति विकल्पों में से केवल दो को ही अपनाना चुन सकती है। यह विचार कनाडा के अर्थशास्त्री रॉबर्ट मुंडेल और ब्रिटिश अर्थशास्त्री मार्कस फ्लेमिंग द्वारा 1960 के दशक की शुरुआत में स्वतंत्र रूप से प्रस्तावित किया गया था।
  • चूंकि, पूंजी काफी हद तक आसानी से सीमापार जाने के लिए स्वतंत्र होती है, अतः नीति निर्माताओं के सामने एक निश्चित विनिमय दर बनाए रखने और एक स्वतंत्र मौद्रिक नीति का पालन करने के बीच चुनाव करने का विकल्प होता है।
  • उदाहरण के लिए, यदि किसी देश के नीति निर्माता चाहते हैं कि उनकी मुद्रा, विदेशी मुद्राओं के मुकाबले बढ़े, या मजबूत हो, तो वे सख्त घरेलू मौद्रिक नीति का रुख अपनाए बिना, इस लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकते हैं तथा लंबे समय तक मुद्रा की बाह्य ताकत को को बनाए नहीं रख सकते हैं। और, सख्त घरेलू मौद्रिक नीति अपनाने से घरेलू मांग भी कमजोर हो सकती है।
  • दूसरी ओर, यदि किसी देश के नीति निर्माता ‘स्वतंत्र मौद्रिक नीति’ अपनाने का विकल्प चुनते हैं, तो वे अपनी मुद्रा के विदेशी मुद्रा मूल्य को वांछित स्तर पर बनाए रखने में सक्षम नहीं हो सकते हैं।

भारत के संदर्भ में:

भारतीय रिजर्व बैंक को ‘रुपये की कीमत’ को बनाए रखने और अपनी ‘मौद्रिक नीति की स्वतंत्रता’ को बनाए रखने के बीच चयन करने की दुविधा का भी सामना करना पड़ सकता है। जैसा कि, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाई जाने से रुपये पर दबाव बढ़ रहा है, और ‘रुपये की कीमत’ इस साल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगभग 10% कम हो गयी है।

चीनी उद्योग

संदर्भ: भारत, दुनिया का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक और उपभोक्ता होने के साथ-साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक के रूप में उभरा है।

चीनी सत्र (अक्टूबर-सितंबर) 2021-22, भारतीय चीनी क्षेत्र के लिए एक ‘वाटरशेड सीजन’ साबित हुआ है और भारत ने 109 लाख मीट्रिक टन से अधिक का उच्चतम निर्यात दर्ज किया है।

उच्च उत्पादन के कारण:

  • चीनी की उच्च अंतरराष्ट्रीय कीमतें।
  • केंद्र और राज्य सरकार की सहयोगी नीति।

इन नीतियों की वजह से, चीनी को इथेनॉल में बदलने और निर्यात के कारण पूरे उद्योग की मूल्य श्रृंखला का विस्तार हुआ और साथ ही चीनी मिलों की वित्तीय स्थिति में सुधार हुआ जिससे आगामी सीजन में और अधिक वैकल्पिक मिलों का निर्माण हुआ है।

चीनी उत्पादन के बारे में:

  • ‘चीनी उद्योग’ (Sugar Industry) मोटे तौर पर उत्पादन के दो प्रमुख क्षेत्रों में विभाजित है- उत्तर में उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और पंजाब और दक्षिण में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश।
  • दक्षिण भारत में उष्णकटिबंधीय जलवायु के कारण, इसमें उत्तर भारत की तुलना में प्रति इकाई क्षेत्र में अधिक उपज देने वाले सुक्रोज की मात्रा अधिक होती है।
  • महत्व: यह श्रम प्रधान क्षेत्र, जैव ईंधन के लिए महत्वपूर्ण कई उप-उत्पाद उपलब्ध कराता है।
  • समस्याएं: दुनिया के अन्य हिस्सों की तुलना में कम उपज, कम चीनी प्रतिलाभ दर, उच्च उत्पादन लागत, और किसानों के लिए कम और विलंबित पारिश्रमिक।

चीनी उद्योग को विनियमित करने के लिए, सी रंगराजन समिति (2012) ने चीनी के निर्यात और आयात पर मात्रात्मक नियंत्रण को समाप्त करने सहित कई सुधारों की सिफारिश की है।

IFSCA को प्रस्तुत सतत वित्त पर रिपोर्ट

संदर्भ: पूर्व पर्यावरण और वन सचिव सी के मिश्रा की अध्यक्षता में गठित एक विशेषज्ञ समिति ने ‘कार्बन बाजार’ के विकास का सुझाव देते हुए ‘सतत वित्त’ (Sustainable Finance) पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है।

समिति द्वारा की गयी प्रमुख सिफारिशें:

  • स्वैच्छिक कार्बन बाजार विकसित करना;
  • संक्रमण बांड के लिए ढांचा निर्माण;
  • जोखिम कम करने वाले तंत्र को सक्षम करना;
  • ग्रीन फिनटेक के लिए नियामक सैंडबॉक्स को बढ़ावा देना;
  • वैश्विक जलवायु गठबंधन के निर्माण को सुगम बनाना;
  • स्थायी ऋण देने के लिए एक समर्पित MSME मंच की स्थापना;
  • आपदा बांड, नगरपालिका बांड, हरित प्रतिभूतिकरण, मिश्रित वित्त जैसे नवीन उपकरणों का उपयोग।

सस्टेनेबल फाइनेंस क्या है?

सतत वित्त या हरित वित्त (Green Finance) एक पर्यावरणीय उद्देश्य- विशेष रूप से ऊर्जा संक्रमण को सुविधाजनक बनाने के लिए- का अनुसरण करने वाले वित्तीय नियमों, मानकों, मानदंडों और उत्पादों का समूह होता है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA):

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (International Financial Services Centres Authority – IFSCA) का मुख्यालय GIFT -सिटी, गांधीनगर, गुजरात में स्थित है।

  • यह भारत में अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र (International Financial Services Centres – IFSC) में वित्तीय उत्पादों, वित्तीय सेवाओं और वित्तीय संस्थानों के विकास और विनियमन के लिए एक एकीकृत प्राधिकरण है।
  • इसकी स्थापना ‘अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण अधिनियम’, 2019 के तहत की गई थी।
  • यह संस्था भारत में वित्तीय उत्पादों, वित्तीय सेवाओं और वित्तीय संस्थानों के नियमन तथा विकास के लिये एक एकीकृत प्राधिकार के रूप में काम करती है।
  • इस समय GIFT – IFSCA भारत में पहला अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र है।

मुख्य उद्देश्य: एक मजबूत वैश्विक संबंध विकसित करना और भारतीय अर्थव्यवस्था की जरूरतों पर ध्यान केंद्रित करना और साथ ही पूरे क्षेत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंच के रूप में कार्य करना।

विश्व व्यापार संगठन द्वारा ‘अंधकारमय’ व्यापार दृष्टिकोण की चेतावनी

संदर्भ: तेजी से बढ़ती ऊर्जा और खाद्य कीमतों तथा बढ़ती ब्याज दरों की वजह से आयात मांग में कमी आने, और यूक्रेन में युद्ध की स्थिति और अधिक बिगड़ने पर वैश्विक व्यापार में संभावित संकुचन की चेतावनी देते हुए, विश्व व्यापार संगठन (WTO) ने अगले साल वैश्विक व्यापार वृद्धि में मंदी का अनुमान लगाया है।

वैश्विक व्यापार वृद्धि में मंदी के कारण:

  • यूक्रेन में युद्ध और परिणामस्वरूप आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान;
  • विभिन्न देशों द्वारा खाद्य और उर्वरक निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध;
  • मांग में कमी;
  • खाद्य-उत्पादक क्षेत्रों में मौसम की घटनाओं से हुई क्षति या ऊर्जा निर्यात संबधी बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचने से तथा कोविड-19 के प्रकोप की वजह से उत्पादन बाधित होने के कारण चीन की कमजोरी से व्यापार वृद्धि पर और असर पड़ सकता है।

प्रभाव: वैश्विक व्यापार वृद्धि में मंदी से मुद्रास्फीति का दबाव और अधिक होगा और जीवन स्तर में गिरावट आयेगी तथा यह स्थिति संभवत: हम जिस संकट से जूझ रहे हैं, उसके प्रति कम संवेदनशील होने के बजाय हमें अधिक संवेदनशील बना देंगे।

सिफारिश: विश्व को विकास को बढ़ावा देने, लचीलापन बढ़ाने और चरम मौसम की घटनाओं और स्थानीय व्यवधानों के जोखिम को कम करके दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता को बढ़ावा देने वाली वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन के लिए एक अधिक विविध और कम केंद्रित आधार की आवश्यकता है।

रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार

संदर्भ: रसायन विज्ञान में 2022 का नोबेल पुरस्कार अमेरिका के रसायनज्ञ कैरोलिन आर बर्टोजी (Carolyn R. Bertozzi) और के. बैरी शार्पलेस (K. Barry Sharpless) तथा डेनमार्क के ‘मार्टेंन मेल्डल’ (Morten Meldal) को ‘क्लिक केमिस्ट्री’ और ‘बायोऑर्थोगोनल केमिस्ट्री’ के क्षेत्र में उनके काम के लिए प्रदान किया गया है।

‘क्लिक केमिस्ट्री’ क्या है?

  • सरल शब्दों में, क्लिक केमिस्ट्री (Click Chemistry) समान व्यवहार रखने वाले छोटे छोटे अणुओं को जोड़ने की प्रक्रिया है।
  • यह विज्ञान की एक शाखा है जो अणुओं के संयोजन की खोज करती है।

उपयोग:

  • ‘क्लिक केमिस्ट्री’ और बायोऑर्थोगोनल अभिक्रियाओं का प्रयोग भविष्य में इंसानों और अन्य जीवों के शरीर में ऐसे अणु बनाने में होगा, जो उन्हें निरोग रख सकें।
  • ‘क्लिक कैमेस्ट्री’ डीएनए में बदलाव करने और कैंसर उपचार की दवा बनाने में उपयोगी होगी ।

‘क्लिक केमिस्ट्री’ की आवश्यकता:

  • कार्बन परमाणुओं के बीच बंधों को शामिल करने वाली ‘प्रतिकृति अभिक्रियाएँ’ (Replicating reactions) महंगी होती हैं और इनमे अक्सर साइड रिएक्शन और सामग्री की हानि होती है।
  • क्लिक केमिस्ट्री में, कार्बन परमाणुओं को एक दूसरे के साथ अभिक्रिया करने की कोशिश करने के बजाय, यह छोटे अणुओं -जिनमें पहले से ही एक पूर्ण कार्बन फ्रेम होता है- का उपयोग करने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।
  • सरल अभिक्रियाएं, “जहां अणुओं के एक साथ बंधने के लिए एक मजबूत आंतरिक प्रवृत्ति होती है”, सामग्री के नुकसान के साथ-साथ अवांछित अभिक्रियाओं से बचा सकती हैं।

‘शार्पलेस’ क्लिक केमिस्ट्री पर काम करने वाले पहले वैज्ञानिक थे। इससे पहले उन्होंने 2001 में इस विषय में पुरस्कार जीता था।

मानचित्रण