विषयसूची
सामान्य अध्ययन-II
- भारत के मुख्य न्यायाधीश- जस्टिस लोढ़ा से जस्टिस रमण तक
मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री
- “सीएम दा हैसी” पोर्टल
- समुद्री शैवाल का शत-प्रतिशत घुलनशील एवं कम लागत वाली पैकेजिंग में रूपांतरण
- डेटा/तथ्य बिंदु
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
- अम्बेडकर परिपथ
- जलवायु परिवर्तन की वजह से भारतीय मानसून में परिवर्तन
- जीवाश्म ईंधनों की वैश्विक रजिस्ट्री
- मृत्युदंड
- चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों को नकद चंदे पर रोक लगाने का प्रस्ताव
- दोषियों के बायोमेट्रिक्स पर गृहमंत्रालय की अधिसूचना
- स्वच्छ सुजल प्रदेश
- भारतीय स्वच्छता लीग
- एशिया में बातचीत और विश्वास निर्माण उपायों पर सम्मेलन
- दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) में परिवर्तन
- बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण तंत्र
- पीएम प्रणाम योजना
- टूटे चावल के निर्यात पर भारत के प्रतिबंध का महत्व
- उंगलियों के निशान की सजीवता
- ‘मर्ज’ सॉफ्टवेयर अपग्रेड
- मानचित्र (चर्चा में)
सामान्य अध्ययन– II
विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।
भारत के मुख्य न्यायाधीश– जस्टिस लोढ़ा से जस्टिस रमण तक
संदर्भ:
स्वतंत्रता के पश्चात 75 वर्षों में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में 49 मुख्य न्यायाधीश हो चुके हैं।
- 1980 के दशक में न्यायमूर्ति वाई.वी. चंद्रचूड़ का सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में कार्यकाल सात साल से अधिक अवधि का असाधारण रूप से लंबा कार्यकाल रहा, जबकि, न्यायमूर्ति के.एन. सिंह का कार्यकाल मात्र 17 दिन का रहा।
न्यायपालिका की भूमिका:
मौलिक अधिकार: न्यायपालिका की प्राथमिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना है कि संविधान के तहत गारंटीकृत नागरिकों के ‘मौलिक अधिकारों’ को राज्य द्वारा कमजोर अथवा समाप्त नहीं किया जाए।
न्यायपालिका अपनी वरिष्ठ प्रकृति को निम्नलिखित प्रावधानों के माध्यम से स्पष्ट करती है:
- केशवानंद भारती (1973): इस मामले में ‘न्यायालय’ ने संवैधानिक संशोधनों की ‘न्यायिक समीक्षा’ करने की शक्ति ग्रहण की।
- न्यायिक नियुक्तियाँ: सुप्रीम कोर्ट ने अपनी अदालत में और उच्च न्यायालयों में न्यायिक नियुक्तियों की शक्ति स्वयं ग्रहण कर ली।
- अनुच्छेद 21: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का विस्तार किया।
- जनहित याचिका: सुप्रीम कोर्ट, जनहित याचिका के माध्यम से अदालतों में जाने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश की साधारण न्यायिक कर्तव्यों के अतिरिक्त शक्तियाँ:
- न्यायाधीशों की नियुक्ति: उच्च न्यायपालिका में नियुक्ति के लिए न्यायाधीशों का चयन करना।
- न्यायिक पीठों की संख्या और संरचना: विभिन्न प्रकार के मामलों पर न्यायनिर्णयन करने वाली पीठों की संख्या और संरचना का निर्णय करना।
‘मूल संरचना का सिद्धांत‘:
- भारतीय न्यायपालिका द्वारा 24 अप्रैल 1973 को ‘केशवानंद भारती मामले’ में संसद की संशोधन शक्तियों पर एक सीमा लगाने के लिए ‘मूल संरचना का सिद्धांत‘ (Doctrine of Basic Structure) प्रतिपादित किया गया था। इसका उद्देश्य, संसद द्वारा ‘देश के मूल कानून की मूल संरचना’ में संशोधन करने हेतु संविधान के तहत अपनी ‘संवैधानिक शक्ति’ के प्रयोग पर नियंत्रण लगाना था।
- यह फैसला एक दृढ़ बहुसंख्यक शासन के दांतों में ‘न्यायालय की न्यायिक शक्ति’ के निश्चयण में एक ‘उच्च वॉटरमार्क’ है। इसके काफी समय बाद, वर्ष 2007 में, आई.आर. कोएल्हो बनाम तमिलनाडु राज्य मामले में नौ न्यायाधीशों की एक अन्य ‘पीठ’ द्वारा एक सर्वसम्मत निर्णय में 7:6 के संकीर्ण बहुमत से ‘केशवानंद भारती मामले’ के निर्णय को आधिकारिक रूप से बरकरार रखा और इसे स्थायी संवैधानिक वैधता प्रदान की गयी।
सर्वोच्च न्यायालय के तीन काल:
1950 से 1971 तक:
- मुख्य न्यायाधीश का ‘न्यायिक नियुक्तियों’ पर पूर्ण अधिकार था।
- मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश का सदैव, यहां तक कि वीटो की शक्तियों की सीमा तक भी, पालन किया जाएगा।
1971 और 1993 तक:
- प्रतिबद्ध न्यायाधीश: कार्यपालिका ने सर्वोच्च न्यायालय में ‘प्रतिबद्ध न्यायाधीशों’ (Committed Judges) की नियुक्ति पर जोर दिया।
- विशेषाधिकार: मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका द्वारा अपने विशेषाधिकार (Prerogative) का प्रयोग किया जाता रहा।
- प्रथम न्यायाधीश का मामला (1981): भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय सरकार पर बाध्यकारी नहीं होगी।
- द्वितीय न्यायाधीशों का मामला (1993): न्यायपालिका द्वारा व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका से नियुक्तियों की शक्ति वापस ले ली गयी।
2014 से 2022 तक:
जस्टिस लोढ़ा: उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में ‘बार से बेंच’ में सीधी नियुक्तियों की निष्क्रिय प्रवृत्ति को पुनर्जीवित किया।
न्यायमूर्ति एच एल दत्तू: चतुर्थ न्यायाधीश का मामला (The fourth judge’s case), ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग’ (NJAC) अधिनियम की वैधता से संबंधित है।
न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर: उन्होंने ‘नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड रोलिंग’ की स्थापना की, जो आज न्यायिक प्रणाली के सभी स्तरों को जोड़ता है और वादियों को लगभग सभी जानकारी प्रदान करता है।
न्यायमूर्ति जे.एस. खेहर:
- ऐतिहासिक निर्णय: निजता के अधिकार और तीन तलाक पर निर्णय।
- उच्चतम न्यायालय में रोस्टर के प्रबंधन में पारदर्शिता और निष्पक्षता की कमी पर बहस फिर से शुरू हुई।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की दोषसिद्धि और बाद में कारावास।
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा:
- प्रेस कॉन्फ्रेंस: इनके कार्यकाल में ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ के आंतरिक प्रशासनिक निर्णयों की निंदा करते हुए, उनके चार साथी न्यायाधीशों द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की गयी।
- महाभियोग: इनके विरुद्ध महाभियोग कार्यवाही शुरू की गई।
- संवैधानिक पीठें: इन्होने ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ के रूप में अधिकतम संवैधानिक पीठों की स्थापना की।
जस्टिस रंजन गोगोई:
- ‘भारत के मुख्य न्यायाधीश’ के पद पर रहने के दौरान, सुप्रीम कोर्ट की एक कर्मचारी द्वारा अपने खिलाफ की गई यौन उत्पीड़न की शिकायत की सुनवाई में भाग लिया।
- गोपनीयता संबंधी मुद्दे: असम का राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) मामला, राफेल विवाद, चुनावी बांड का मुद्दा।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण: अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद कई याचिकाएं दायर की गई।
- अयोध्या विवाद।
न्यायमूर्ति शरद ए बोबडे:
- कुछ मामलों के लिए तरजीही व्यवहार: उदाहरण के लिए, पत्रकार सिद्दीकी कप्पन बनाम अर्नब गोस्वामी के जमानत मामलों में।
- विवादास्पद कृषि कानून पर स्टे जारी किया।
- तदर्थ न्यायाधीश: न्यायिक लंबित मामलों से निपटने के लिए तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति पर दिशानिर्देश जारी किए।
- सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम के भीतर गतिरोध।
न्यायमूर्ति एन.वी. रमण:
- कुछ जमानत आदेश और स्टे (जैसे, राजद्रोह)
- पेगासस पूछताछ
- धन शोधन निवारण अधिनियम पर निर्णय।
- उच्च न्यायपालिका में उल्लेखनीय रूप से बड़ी संख्या में नियुक्तियां, जिनमें कई महिला न्यायाधीशों की नियुक्ति भी शामिल है।
- इनके कार्यकाल में कोई संवैधानिक पीठ गठित नहीं की गई।
अगले मुख्य नयायाधीश:
न्यायमूर्ति यू.यू. ललित:
- बेंचों के गठन में पहल की और उनके द्वारा ‘कप्पन’ और ‘सीतलवाड़ मामले’ में जमानत जैसे कुछ प्रारंभिक आदेश जारी किए गए।
- इन मामलों में ‘मूल अभियोग’ ही आधारहीन था।
निष्कर्ष:
- एक गतिशील और विचारशील नेतृत्व: अवर न्यायाधीशों द्वारा समर्थित, एक गतिशील और विचारशील नेतृत्व को यह सुनिश्चित करने में सक्षम होना चाहिए कि चुनौतियों और जिम्मेदारियों को उचित रूप से पूरा किया जाए।
- वास्तविक संरक्षक: सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के ‘वास्तविक संरक्षक’ और ‘मौलिक अधिकारों के रक्षक’ होने की अपेक्षा पर खरा उतरना चाहिए।
इंस्टा लिंक्स:
मेंस लिंक:
भारत में उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में ‘राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014’ पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (यूपीएससी 2017)
प्रीलिम्स लिंक:
- भारत के मुख्य न्यायाधीश
- भारत के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति
- राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड रोलिंग
- केशवानंद भारती (1973)
- अनुच्छेद 21
- पहले न्यायाधीशों का मामला
- द्वितीय न्यायाधीशों का मामला
- तीसरे न्यायाधीश का मामला
- राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग
स्रोत: द हिंदू
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मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (नैतिकता/मुख्य)
“सीएम दा हैसी” पोर्टल
मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने लोगों को अपनी शिकायतों का निवारण करने और भ्रष्टाचार से संबंधित मुद्दों को उठाने हेतु एक मंच प्रदान करते हुए एक वेब पोर्टल लॉन्च किया है।
- ‘सीएम दा हैसी’ (CM da Haisi) का अर्थ है – ‘चलो मुख्यमंत्री को बताएं’ (Let’s inform the CM)। ‘सीएम दा हैसी’ पोर्टल पर तीन फोन नंबर उपलब्ध कराए गए हैं, जिनमे से दो फोन नंबर ‘भ्रष्टाचार निरोधी प्रकोष्ठ’ से जुड़े हैं।
- मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के अनुसार- यह हमें शासन और सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में पारदर्शिता और जवाबदेही लाने में सक्षम बनाएगा।
समुद्री शैवाल का शत-प्रतिशत घुलनशील एवं कम लागत वाली पैकेजिंग में रूपांतरण
‘गूगल’ में अपनी नौकरी छोड़ने के बाद, नेहा जैन ने एक स्टार्टअप ज़ीरोसर्कल (Zerocircle) लॉन्च किया है। यह स्टार्टअप समुद्री शैवाल (Seaweed) को पैकेजिंग के लिए कम लागत वाले, पर्यावरण के अनुकूल प्लास्टिक विकल्पों में परिवर्तित करता है।
- समुद्री शैवाल को ‘बायोप्लास्टिक’ बनाने के लिए एक संभाव्य संसाधन माना जाता है क्योंकि इसमें जल और स्थल – दोनों का अंश कम पाया जाता है।
- ज़ीरोसर्कल बड़े पैमाने पर लाल, भूरे और हरे समुद्री शैवाल का उपयोग करता है। समुद्री शैवाल को इकट्ठा करने के बाद, इसे सुखा कर पाउडर में बदल दिया जाता है, जिसे बाद में अंतिम सामग्री में परिवर्तित किया जाता है। ज़ीरोसर्कल, इससे हैंडबैग, कपड़ों के लिए बैग, खाने को पैक करने के लिए फिल्म और प्लास्टिक के और भी विकल्प बनाता है।
डेटा/तथ्य बिंदु
एक गैर-लाभकारी संगठन ‘प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन’ द्वारा जारी एक अध्ययन के अनुसार, अधिकांश भारतीय गांवों में कचरा प्रबंधन का कोई बुनियादी ढांचा नहीं है।
- इस अध्ययन में शामिल किए गए 15 राज्यों के 700 गांवों में से केवल 36 प्रतिशत गांवों में सार्वजनिक कचरे के डिब्बे देखे गए।
- सिर्फ 29 फीसदी गांवों के पास ‘सामुदायिक कचरा संग्रहण वाहन’ था, जबकि आधे से भी कम गांवों में सफाई कर्मचारी या सफाई कर्मचारी उपलब्ध था। यह प्रवृत्ति सभी राज्यों और जिलों में देखी गयी।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
अम्बेडकर परिपथ
संदर्भ: शीघ्र ही ‘पंच तीर्थ’ (डॉ बी आर अंबेडकर से जुड़े पांच प्रमुख स्थल) को जोड़ने वाला एक ‘पर्यटन सर्किट’ सरकार द्वारा कनेक्टिविटी में सुधार, पर्यटन को बढ़ाने और इन स्थानों को ब्रांड बनाने के लिए तैयार किया जाएगा। इस ‘पर्यटन सर्किट’ को अम्बेडकर परिपथ (Ambedkar Circuit) कहा जाएगा।
इसी तरह के अन्य सर्किट: रामायण परिपथ और बौद्ध परिपथ
जलवायु परिवर्तन की वजह से भारतीय मानसून में परिवर्तन
संदर्भ: हालिया अध्ययनों के अनुसार, भारतीय मानसून पर जलवायु परिवर्तन का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ा है।
परिवर्तन:
- मानसून में बढ़ता उतार-चढ़ाव – लंबी शुष्क अवधि और भारी बारिश की छोटी अवधि। मानसून लगातार कम और तीव्र होता जा रहा है।
- निम्न वायुदाब और अवनमन क्षेत्रों का अपनी स्थिति से दक्षिण की ओर स्थानान्तरण: इसके परिणामस्वरूप मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में अत्यधिक वर्षा हुई है और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों तथा पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार जैसे अन्य क्षेत्रों में सामान्य बारिश नहीं हुई है।
- प्रभाव: कीटो के बढ़ते हमले, कृषि में उत्पादकता में बदलाव, पानी की बढ़ती कमी, बढ़ती आपदाएं और बीमारियां।
जीवाश्म ईंधनों की वैश्विक रजिस्ट्री
संदर्भ: जलवायु प्रचारकों द्वारा जीवाश्म ईंधन भंडार, उत्पादन और उत्सर्जन से संबंधित विश्व की पहली रजिस्ट्री शुरू की गयी है।
जीवाश्म ईंधन की वैश्विक रजिस्ट्री (Global Registry of Fossil Fuels) विश्व का पहला व्यापक सार्वजनिक डेटाबेस है, जिसके आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि क्या जलाया जाना बाकी है।
- यह वैश्विक रजिस्ट्री, वित्तीय बाजारों पर ऊर्जा संक्रमण के प्रभाव का अध्ययन करने वाले एक गैर-लाभकारी थिंक टैंक ‘कार्बन ट्रैकर’ (Carbon Tracker), और वैश्विक ऊर्जा परियोजनाओं को ट्रैक करने वाली एक संस्था ‘ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर’ द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गयी है।
- इन संगठनों को उम्मीद है कि यह रजिस्ट्री कई परिदृश्यों में- जैसेकि जीवाश्म ईंधन निष्कर्षण के लिए लाइसेंस जारी करते समय- सरकारों को जवाबदेह ठहराने के लिए समूहों को सशक्त बनाएगी ।
- रजिस्ट्री सूची में 89 देशों में 50,000 से अधिक तेल, गैस और कोयला क्षेत्रों के डेटा शामिल हैं, जो वैश्विक उत्पादन का 75 प्रतिशत कवर करते हैं।
मृत्युदंड
संदर्भ: “मौत की सजा के मामलों में अभियुक्तों को एक ट्रायल जज के समक्ष, उनके ‘अपराध की गंभीरता कम करने वाली परिस्थितियों’ की “सार्थक, वास्तविक और प्रभावी” सुनवाई कैसे और कब की जाए”, इस सवाल को सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने के लिए एक संविधान पीठ के पास भेजा है।
महत्वपूर्ण बिंदु:
- महत्वपूर्ण अधिकार: भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली तीन-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कहा कि “मृत्यु की कठोरतम सजा” से बचने के लिए एक आरोपी द्वारा ‘अपराध की गंभीरता कम करने वाली परिस्थितियों’ (Mitigating Circumstances) की प्रस्तुति एक “महत्वपूर्ण अधिकार” है।
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354 (3): अदालतों को अधिकतम दंड देने के लिए लिखित में कारण बताना आवश्यक है।
बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में सुप्रीम कोर्ट का फैसला:
- इस फैसले में, किसी मृत्युदंड की सजा केवल “दुर्लभतम” (Rarest of Rare) अपराध के मामले में दिए जाने के सिद्धांत को स्थापित किया गया था, और सजा सुनाते समय अभियुक्तों के संबंध में ‘उत्तेजक’ तथा ‘गंभीरता कम करने वाली’ परिस्थितियों के तुलनात्मक विश्लेषण को अनिवार्य किया गया था।
माची सिंह बनाम पंजाब राज्य मामला (1983):
इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा “दुर्लभतम” अपराध के सिद्धांत को स्पष्ट किया गया और मौत की सजा के मामलों में कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए गए।
- उत्तेजक या भड़काऊ परिस्थितियों (Aggravating Circumstances) में, अपराध करने का तरीका, अपराध करने का मकसद, अपराध की गंभीरता और अपराध से पीड़ित को शामिल किया गया था।
- ‘गंभीरता कम करने वाली परिस्थितियों’ (Mitigating Circumstances) में, किसी आरोपी के सुधार और पुनर्वास की संभावना, उसका मानसिक स्वास्थ्य और उसके पिछले जीवन को शामिल किया गया था।
चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों को नकद चंदे पर रोक लगाने का प्रस्ताव
संदर्भ:
चुनाव आयोग ने चुनावी चंदे के रूप में दिए जाने वाले काले धन पर रोक लगाने के लिए गुमनाम राजनीतिक चंदे को 20,000 रुपये से घटाकर 2,000 रुपये करने, और नकद दान को 20% या अधिकतम 20 करोड़ रुपये तक सीमित करने का प्रस्ताव दिया है।
उद्देश्य:
- पारदर्शिता: राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में सुधार और पारदर्शिता।
- समान अवसर: चुनाव लड़ने के इच्छुक उम्मीदवारों द्वारा किया गया व्यय।
- रिपोर्ट: ₹2,000 से ऊपर प्राप्त सभी अनुदानों की जानकारी दी जाएगी, जिससे फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ेगी।
अन्य सिफारिशें:
- डिजिटल लेनदेन: चुनाव आयोग ने एक इकाई/व्यक्ति को ₹2,000 से अधिक के सभी खर्चों के लिए ‘डिजिटल लेनदेन’ (Digital transactions) या ‘खाता प्राप्तकर्ता चेक हस्तांतरण’ को अनिवार्य बनाने की मांग की है।
- चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 89 में संशोधन: एक उम्मीदवार को चुनाव से संबंधित प्राप्ति और भुगतान के लिए एक अलग खाता रखना होगा और चुनाव खर्च के खाते के रूप में इसे पारदर्शी रूप से अधिकारियों को बताना होगा।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और विदेशी अंशदान विनियमन (संशोधन) अधिनियम (FCRA), 2010: चुनाव आयोग ने इन कानूनों के तहत पार्टियों के फंड में कोई विदेशी चंदा न आए, यह सुनिश्चित करने के लिए “चुनावी सुधार” की मांग की है।
वर्तमान नियम:
राजनीतिक दलों को 20,000 रुपये से अधिक के सभी चंदे का खुलासा चुनाव आयोग को प्रस्तुत की जाने वाली अपनी योगदान रिपोर्ट के माध्यम से करना होगा।
दोषियों के बायोमेट्रिक्स पर गृहमंत्रालय की अधिसूचना
संदर्भ: गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा ‘आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022’ (Criminal Procedure (Identification) Act, 2022) को नियंत्रित करने वाले नियमों को अधिसूचित किया गया है। ये नियम पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसियों को गिरफ्तार व्यक्तियों के रेटिना और आईरिस स्कैन सहित भौतिक और जैविक नमूने एकत्र करने, संग्रहीत करने और विश्लेषण करने में सक्षम बनाएंगे।
प्रमुख बिंदु:
- प्रक्रिया: इन नियमों में दोषी व्यक्तियों के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का उल्लेख नहीं है।
- गंभीर अपराध या अदालती आदेश: विभिन्न निवारक निरोध कानूनों के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्तियों का ‘माप’ या ‘निशान’ तब तक नहीं लिए जाएंगे जब तक कि उन्हें किसी गंभीर अपराध के साथ जोड़ा न जाए या अदालत द्वारा आदेश न दिया जाए।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB): गृह मंत्रालय के अधीन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB), राज्यों को सूचना एकत्र करने और संग्रहीत करने के तरीके के बारे में निर्देश देगा।
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 53 और 53ए: नियम कहते हैं कि ‘माप’ के रिकॉर्ड को “समय-समय पर NCRB द्वारा निर्धारित मानक संचालन प्रक्रियाओं में निर्दिष्ट एक सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड प्रारूप में संग्रहीत और संरक्षित किया जाएगा।
- भारतीय दंड संहिता, 1860 और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000: अधिनियम के तहत एकत्र किए गए डेटा का अनधिकृत उपयोग, वितरण या साझा करना कानून के अनुसार दंडनीय होगा।
इन “मापों” में शामिल हैं:
- उंगलियों के निशान
- हथेली की छाप और पदचिन्ह
- तस्वीरें
- आइरिस और रेटिना स्कैन
- भौतिक, जैविक नमूने और उनका विश्लेषण
- हस्ताक्षर, हस्तलेखन या किसी अन्य परीक्षा सहित व्यवहार संबंधी विशेषताएं
स्वच्छ सुजल प्रदेश
संदर्भ: अंडमान और निकोबार द्वीपों को जल शक्ति मंत्रालय द्वारा भारत का पहला ‘स्वच्छ सुजल प्रदेश’ का प्रमाण पत्र दिया गया है।
यह प्रमाणीकरण तीन उपलब्धियों को सुनिश्चित करने के लिए प्रदान किया जाता है:
- सुरक्षित और सुरक्षित पेयजल आपूर्ति,
- ओडीएफ प्लस स्थिति,
- स्वच्छता और योजनाओं के अभिसरण के बारे में जागरूकता।
अंडमान और निकोबार द्वीपों के सभी गांवों को ‘हर घर जल’ प्रमाण पत्र मिल चुका है।
भारतीय स्वच्छता लीग
संदर्भ: स्वच्छ भारत मिशन- शहरी 2.0 ( SBM-Urban 2.0) के ‘इंडियन स्वछता लीग’ के पहले संस्करण ने शहरों को स्वच्छ, हरा-भरा और कचरा मुक्त बनाने की दिशा में आधे मिलियन युवाओं और मशहूर हस्तियों को प्रेरित किया है।
स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के बारे में:
2021-22 के बजट में घोषित ‘स्वच्छ भारत मिशन- शहरी 2.0’ ( SBM-Urban 2.0) , स्वच्छ भारत मिशन- शहरी (SBM-U) के पहले चरण (2014 से 2019) का अगला भाग है।
सरकार, शौचालयों से सुरक्षित रोकथाम, परिवहन, मल कीचड़ के निपटान और सेप्टेज का दोहन करने की कोशिश कर रही है।
- ‘स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0’ का लक्ष्य शहरों को कचरा मुक्त यानी मौजूदा 70% से 100% कचरे से मुक्त बनाना है।
- अमृत (AMRUT) योजना के अंतर्गत आने वाले शहरों को छोड़कर, सभी शहरों में ‘गंदले और काले पानी का प्रबंधन’ सुनिश्चित करना है।
- सभी शहरी स्थानीय निकायों को ओडीएफ+ (ODF +) और 1 लाख से कम आबादी वाले निकायों को ओडीएफ++ (ODF ++) बनाना।
- कम करें, पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण (Reduce, Reuse, Recycle) अर्थात 3R के सिद्धांतों का उपयोग करके ठोस अपशिष्ट के स्रोत पृथक्करण पर ध्यान दिया जाएगा।
- प्रभावी ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए सभी प्रकार के नगरपालिका ठोस कचरे का वैज्ञानिक प्रसंस्करण और पुराने डंप साइटों का उपचार किया जाएगा।
- समयावधि: 2021 से 2026 तक पांच साल तक।
- नोडल मंत्रालय: आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय (MoHUA)।
एशिया में बातचीत और विश्वास निर्माण उपायों पर सम्मेलन
संदर्भ: कजाकिस्तान ने भारतीय प्रधान मंत्री को ‘कांफ्रेंस ऑन इंटरेक्शन एंड कॉन्फिडेंस-बिल्डिंग मीज़र्स इन एशिया’ (Conference on Interaction and Confidence-Building Measures in Asia – CICA) में आमंत्रित किया है।
- ‘एशिया में बातचीत और विश्वास निर्माण उपायों पर सम्मेलन’ (CICA) एक ऐसा मंच है, जिसका उद्देश्य एशिया में शांति, सुरक्षा और स्थिरता को बढ़ावा देने की दिशा में बहुपक्षीय दृष्टिकोण विकसित करके सहयोग बढ़ाना है।
- इस मंच पर आर्थिक, पर्यावरण, मानव, नई चुनौतियों और खतरों, सैन्य आदि में विश्वास निर्माण पर चर्चा की जाती है।
CICA के बारे में:
यह एशिया में शांति, सुरक्षा एवं स्थिरता को बढ़ावा देने की दिशा में सहयोग बढ़ाने हेतु, एशिया क्षेत्र के देशों एक बहु-राष्ट्रीय मंच है। भारत इसके 27 सदस्यों में शामिल है।
दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) में परिवर्तन
संदर्भ: भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (Insolvency and Bankruptcy Board of India – IBBI) ने दिवाला और दिवालियापन संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) में संशोधन किया है, जिसका उद्देश्य परिवर्तनों में तेजी लाना और वसूली को अधिकतम करना है।
मुख्य परिवर्तन:
- यदि कोई समाधान योजना नहीं है, तो लेनदार अलग से संपत्ति बेच सकते हैं।
- समाधान पेशेवरों के लिए ‘प्रदर्शन-आधारित वेतन संरचना’ निर्धारित की गयी है।
- समाधान पेशेवरों की प्राथमिक भूमिका ‘कॉर्पोरेट देनदार के पुनरुद्धार’ को सुनिश्चित करना है।
दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) के बारे में:
- IBC को वर्ष 2016 में अधिनियमित किया गया था, इसका उद्देश्य विफल व्यवसायों से संबधित निपटान कार्यवाहियों में तीव्रता लाना तथा आर्थिक सुधारों को प्रोत्साहन देना था।
- यह संहिता, सभी वर्गों के ऋण-दाताओं तथा ऋण-कर्ताओं के लिए इन्सॉल्वेंसी- निपटान हेतु, मौजूदा विधायी ढांचे के प्रावधानों को समेकित करके एक मंच प्रदान करती है।
दिवाला और दिवालियापन संहिता (संशोधन) विधेयक, 2021
- इस विधेयक में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए दिवाला समाधान तंत्र के रूप में प्री-पैकेज्ड इन्सॉल्वेंसी रेज़ोल्यूशन प्रोसेस (PIRP), जिसे ‘प्री-पैक’ भी कहा जाता है, का प्रस्ताव किया गया था।
बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण तंत्र
संदर्भ: “एक राष्ट्र, एक ग्रिड, एक आवृत्ति, एक मूल्य” (One Nation, One Grid, One frequency, One Price) फ्रेमवर्क की ओर बढ़ने के लिए, विद्युत मंत्रालय ने ‘बाजार आधारित आर्थिक प्रेषण’ (Market-Based Economic Dispatch – MBED) तंत्र का उपयोग करते हुए एक केंद्रीकृत बिजली मॉडल का प्रस्ताव किया है।
- MBED के तहत, संपूर्ण वार्षिक विद्युत् खपत को एक केंद्रीय बाजार ऑपरेटर (वर्तमान में भारत एक विकेन्द्रीकृत बिजली खरीद और वितरण प्रणाली का पालन करता है) का उपयोग करके संचालित किया जाएगा।
लाभ: यह बिजली खरीद लागत को कम करने, अधिक लचीलापन प्रदान करने और नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देने में मदद करेगा।
संबंधित मुद्दे:
- इससे राज्यों की स्वायत्तता का नुकसान हो सकता है। बिजली एक समवर्ती विषय है और ग्रामीण और शहरी उपभोक्ताओं को बिजली के वितरण और आपूर्ति की जिम्मेदारी राज्यों की है।
- यह ‘डिस्कॉम’ को पूरी तरह से केंद्रीकृत तंत्र पर निर्भर बना सकता है।
पृष्ठभूमि:
DISCOMS का बढ़ता घाटा: आरबीआई के एक हालिया अध्ययन के अनुसार, 18 बड़े राज्यों में डिस्कॉम के बेलआउट से इन राज्यों के GSDP के लगभग 2.3 प्रतिशत के बराबर बोझ पड़ने की संभावना है।
पीएम प्रणाम योजना
संदर्भ: राज्यों को प्रोत्साहित करके रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा ‘पीएम प्रणाम’ अर्थात कृषि प्रबंधन हेतु वैकल्पिक पोषक तत्त्वों का संवर्द्धन (PM PRANAM -Promotion of Alternate Nutrients for Agriculture Management Yojana) योजना शुरू की गयी है।
योजना के प्रमुख बिंदु:
कोई अलग बजट नहीं: इस योजना का अलग से कोई बजट नहीं होगा और इसे उर्वरक विभाग द्वारा संचालित योजनाओं के तहत “मौजूदा उर्वरक सब्सिडी की बचत” के माध्यम से वित्तपोषित किया जाएगा।
- सब्सिडी बचत का 50%, उस राज्य को अनुदान के रूप में दिया जाएगा जो पैसा बचाता है।
- योजना के तहत प्रदान किए गए अनुदान का 70% – गाँव, ब्लॉक और ज़िला स्तर पर वैकल्पिक उर्वरकों और वैकल्पिक उर्वरक उत्पादन इकाइयों के तकनीकी अपनाने से संबंधित – परिसंपत्ति सृजन के लिये उपयोग किया जा सकता है।
- शेष 30% अनुदान राशि का उपयोग, उर्वरक उपयोग में कमी और जागरूकता पैदा करने में शामिल किसानों, पंचायतों, किसान उत्पादक संगठनों और स्वयं सहायता समूहों को पुरस्कृत करने तथा प्रोत्साहित करने के लिये किया जा सकता है।
- इस उद्देश्य के लिये, उर्वरक मंत्रालय के डैशबोर्ड, एकीकृत उर्वरक प्रबंधन प्रणाली (Integrated Fertilizer Management System – iFMS) पर उपलब्ध डेटा का उपयोग किया जाएगा।
उर्वरक उपयोग और सब्सिडी की स्थिति:
- देश में चार उर्वरकों- यूरिया, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरिएट ऑफ पोटाश (MOP), नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम (NPK) की कुल आवश्यकता में, 2017-2018 से 2021-2022 के बीच 21% की वृद्धि हुई है।
- रासायनिक उर्वरकों पर सब्सिडी-व्यय 2022-2023 में बढ़कर 2.25 लाख करोड़ रुपये होने की उम्मीद है, जो पिछले वर्ष के 1.62 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े से 39% अधिक है।
- वर्ष के खाद्यान्न उत्पादन का लगभग आधा, दलहन का एक तिहाई और लगभग दो-तिहाई तिलहन ‘खरीफ मौसम’ (जून-अक्टूबर) में होता है। इस मौसम के लिए उर्वरक की एक बड़ी मात्रा की आवश्यकता होती है।
टूटे चावल के निर्यात पर भारत के प्रतिबंध का महत्व
संदर्भ: भारत ने ‘टूटे चावल के निर्यात’ (broken rice export) पर प्रतिबंध लगा दिया है और गैर-बासमती चावल के विभिन्न ग्रेड के निर्यात पर 20 प्रतिशत शुल्क लगाया है।
- भारत सालाना 20-22 मिलियन टन चावल का निर्यात करता है जिसमें 4 मिलियन टन बासमती चावल शामिल है।
प्रतिबंध के कारण:
- चालू खरीफ मौसम में धान के रकबे में 6 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है और चावल की कीमतों में वृद्धि हुई है।
- उच्च खाद्य मुद्रास्फीति।
- इथेनॉल मिश्रण में उपयोग के लिए: 2018-19 इथेनॉल आपूर्ति वर्ष (ESY) में, सरकार ने FCI को ईंधन उत्पादन के लिए इथेनॉल संयंत्रों को अधिशेष चावल बेचने की अनुमति दी।
- टूटे चावल का उपयोग पोल्ट्री फीड के रूप में भी किया जाता है।
विवरण:
- भारत, विश्व में चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है: भारत का 2021 में दुनिया के कुल चावल निर्यात का 41% हिस्सा रहा, जो संयुक्त रूप से अगले चार निर्यातकों (थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और संयुक्त राज्य अमेरिका) से अधिक है।
- चीन, सेनेगल, वियतनाम, जिबूती और इंडोनेशिया, अवरोही क्रम में, भारत के टूटे चावल के सबसे बड़े आयातक हैं। इसलिए, ये देश इस प्रतिबंध से प्रभावित होंगे।
- इससे पहले, मई में भारत ने गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।
उंगलियों के निशान की सजीवता
संदर्भ: UIDAI ने धोखाधड़ी से पैसे निकालने के लिए नकली फिंगरप्रिंट के उपयोग को रोकने हेतु, आधार-सक्षम भुगतान प्रणाली (Aadhaar-enabled Payment System – AePS) में एक नई सुरक्षा परत की शुरुआत की है।
बायोमेट्रिक्स में ‘लाइवनेस डिटेक्शन’ (Liveness detection), एक सिस्टम की क्षमता का पता लगाने के लिए है कि क्या कोई फिंगरप्रिंट या चेहरा (या अन्य बायोमेट्रिक्स) असली (कैप्चर के बिंदु पर मौजूद एक जीवित व्यक्ति के) है या नकली (स्पूफ आर्टिफैक्ट या बेजान शरीर के हिस्से के) हैं।
भारत के राष्ट्रीय भुगतान सहयोग की ‘आधार-सक्षम भुगतान प्रणाली’ (Aadhaar-enabled Payment System – AePS) एक बैंक-मॉडल है जो आधार प्रमाणीकरण का उपयोग करके किसी भी बैंक के व्यापार प्रतिनिधि के माध्यम से पीओएस (माइक्रोएटीएम) पर ऑनलाइन इंटरऑपरेबल वित्तीय समावेशन लेनदेन की अनुमति देता है।
AePS आपको निम्न प्रकार के लेनदेन करने की अनुमति देता है।
- नकद जमा
- नकद निकासी
- बैलेंस पूछताछ
- मिनी स्टेटमेंट
- आधार से आधार फंड ट्रांसफर
- प्रमाणीकरण
- भीम आधार भुगतान
इस परिदृश्य के तहत एक ग्राहक को लेनदेन करने के लिए आवश्यक इनपुट के तौर पर केवल बैंक का नाम, आधार संख्या और नामांकन के दौरान प्राप्त फिंगरप्रिंट आवश्यक होते हैं।
‘मर्ज’ सॉफ्टवेयर अपग्रेड
संदर्भ: ‘द मर्ज’ (The Merge) एथेरियम (एक क्रिप्टोकरेंसी) ब्लॉकचेन के सत्यापन में ऊर्जा की खपत को कम करने और इसे और अधिक सुरक्षित बनाने के लिए एक सॉफ्टवेयर अपग्रेड है।
‘द मर्ज’, क्रिप्टो माइनर्स और विशाल माइन फ़ील्ड्स की आवश्यकता को अलग कर देगा, जिन्हें पहले ब्लॉकचैन को ‘प्रूफ-ऑफ-वर्क’ (proof-of-work’ – PoW) नामक एक तंत्र के तहत संचालित किया था। इसको अब ‘प्रूफ-ऑफ-स्टेक’ (proof-of-stake’ – PoS) तंत्र में स्थानांतरित कर दिया गया है जो लेनदेन को मंजूरी देने के लिए यादृच्छिक रूप से ‘सत्यापनकर्ता’ निर्धारित करेगा।
- इस बदलाव से एथेरियम की ऊर्जा खपत में 99.95% की कमी आएगी।
- एथेरियम की वेबसाइट ने स्वीकार किया कि क्रिप्टो की कुल वार्षिक बिजली खपत फिनलैंड से लगभग बराबर है, जबकि इसका कार्बन पदचिह्न स्विट्जरलैंड के बराबर है।
क्या बिटकॉइन एक प्रूफ-ऑफ-स्टेक सर्वसम्मति तंत्र में बदल जाएगा?
- काफ़ी असंभव! ये दोनों तंत्र बिलकुल अलग तरह से काम करते हैं।
- इसके अलावा, बिटकॉइन के छद्म नाम निर्माता ‘सतोशी नाकामोतो’ ने स्पष्ट रूप से ब्लॉकचेन को सुरक्षित करने के लिए ‘प्रूफ-ऑफ-वर्क’ (- PoW) तंत्र के महत्व पर जोर दिया है।
- ‘प्रूफ-ऑफ-स्टेक’ सर्वसम्मति तंत्र पर स्विच करने से बिटकॉइन श्वेत पत्र में उल्लिखित विकेंद्रीकरण के सिद्धांतों का उल्लंघन होगा।
एथेरियम (Ethereum) स्मार्ट अनुबंध कार्यक्षमता के साथ एक विकेन्द्रीकृत, ओपन-सोर्स ब्लॉकचेन है। ‘ईथर’ इस प्लेटफ़ॉर्म की मूल क्रिप्टोक्यूरेंसी है। क्रिप्टोकरेंसियों में, ‘ईथर’ (Ether) बाजार पूंजीकरण में बिटकॉइन के बाद दूसरे स्थान पर है। इथेरियम या एथेरियम (Ethereum) की कल्पना 2013 में प्रोग्रामर ‘विटालिक ब्यूटिरिन’ ने की थी।
‘एथेरियम’ के लिए आगे क्या है?
एथेरियम के सह-संस्थापक विटालिक ब्यूटिरिन ने कहा था कि ‘द मर्ज’ के बाद, नेटवर्क को और अपग्रेड से गुजरना होगा, जिसे उन्होंने “सर्ज,” “वेज,” “पर्ज,” और “स्प्लर्ज” कहा।
मानचित्र (चर्चा में)
सीमावर्ती बाल्टिक सागर: SELLurRGD&PF (सेल योर RGD और पीएफ)
S- स्वीडन, E- एस्टोनिया, L- लातविया, L- लिथुआनिया, R- रूस, G- G जर्मनी, D- डेनमार्क, P- पोलैंड, F- फिनलैंड
























