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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 10 August 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

  1. वर्ष 1947 में भारत को ‘स्वराज’ की प्राप्ति और वर्तमान में ‘सुशासन’ के लिए कोशिश

सामान्य अध्ययन-II

  1. भारतीय आर्थिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप
  2. अदालतों से आगे, पुलिस और मीडिया तक ‘निष्पक्ष सुनवाई’
  3. अर्थहीन ‘रैंकिंग’
  4. नाबालिगों की संरक्षकता और दत्तक-ग्रहण
  5. भारत, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान: पश्चिमी देश, पूरब से क्या सीख सकते हैं?

सामान्य अध्ययन-III

  1. भारत का सौर ऊर्जा स्वप्न

मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (निबंध/नैतिकता)

  1. अंडे और आस्था
  2. डेटा पॉइंट्स

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान
  2. निकोबार में कच्छल द्वीप
  3. वाहिकाशोथ / वास्कुलिटिस
  4. लांग्या हेनिपावायरस
  5. एजीएम-88 हार्म
  6. ‘हिम ड्रोन-ए-थॉन’ कार्यक्रम
  7. “वज्र प्रहार, 2022” युद्धाभ्यास

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ, भारत की विविधता।

वर्ष 1947 में भारत को ‘स्वराज’ की प्राप्ति और वर्तमान में ‘सुशासन’ के लिए कोशिश

संदर्भ: यह आर्टिकल ‘भारत, लोकतंत्र और वादा किए गए गणतंत्र’ शीर्षक से दिए गए पिछले आर्टिकल के आगे का भाग है।

(नोट: वेंकैया नायडू द्वारा लिखित इस आर्टिकल के कुछ बिंदु एक बार देखे जा सकते हैं। नोट्स बनाने की जरूरत नहीं है।)

वर्तमान भारत को किन प्राचीन सांस्कृतिक लोकाचारों का पालन करने की आवश्यकता है?

  • अहिंसा या अहिंसा का सिद्धांत: ‘अहिंसा का मंत्र’, हमारे महान राष्ट्र के सांस्कृतिक और सभ्यतागत लोकाचार में निहित है।
  • कठिन समय में अनुकूलन एवं आशा का पाठ: जो सांस्कृतिक और सभ्यतागत निरंतरता हमें एक साथ बांधती है, उसे न तो आक्रमणकारी और न ही उपनिवेशवादी तोड़ सके।
  • समानता, एकता और समावेशिता का विचार।
  • प्रकृति संरक्षण: भारत के प्राचीन ग्रंथ, ‘तत्वों – नदियाँ, पहाड़, पवित्र वृक्ष और पौधों- में परमात्मा की पूजा’ के उदाहरणों से भरे हुए हैं। यह सब हमें ‘प्रकृति के संरक्षण’ के लिए प्रोत्साहित करता है।

वर्तमान में, भारत अभी भी गरीबी, निरक्षरता, लैंगिक भेदभाव, भ्रष्टाचार और असमानता जैसे मुद्दों से ग्रसित है।

इन सब मुद्दों को दूर करने के लिए, श्री नायडू निम्नलिखित सुझाव देते हैं:

  • गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल के लिए सार्वभौमिक और सस्ती पहुंच।
  • देश भर में ग्रामीण बुनियादी ढांचे में तेजी से सुधार।
  • मातृभाषा को बढ़ावा देने से शैक्षिक परिदृश्य को और अधिक समावेशी और न्यायसंगत बनाकर क्रांतिकारी बदलाव आएगा।

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

भारतीय आर्थिक निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप

संदर्भ: हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने कार्यकारिणी द्वारा दिए गए मुफ्त-उपहारों का आर्थिक प्रभाव देखने के लिए निर्वाचन आयोग, वित्त आयोग, नीति आयोग, आरबीआई के अधिकारियों और अन्य लोगों की एक विशेषज्ञ समिति बनाने का प्रस्ताव रखा है।

(नोट: भारतीय राजनीति में ‘न्यायिक समीक्षा’, ‘न्यायिक सक्रियता’ और ‘न्यायिक अतिक्रमण’ हमेशा महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। इस पर एक तैयार नोट जरूर रखें।)

आर्थिक विकास के क्षेत्रों में न्यायिक हस्तक्षेप संबंधी मुद्दे:

  • आर्थिक विकास के क्षेत्रों में ‘न्यायिक हस्तक्षेप’ निवेश को हतोत्साहित करता है। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2G स्पेक्ट्रम और कोयला लाइसेंसिंग को रद्द किए जाने के कारण, निजी क्षेत्र को भविष्य में अपने निवेश पर संदेह होने लगा है।
  • नीतिगत पक्षाघात (Policy Paralysis): सिविल सेवकों द्वारा लिए गए प्रमाणिक निर्णयों को न्यायालयों में फिर से खोला जा रहा है, जिससे महत्वपूर्ण निर्णय लेने में भय पैदा हो रहा है।
  • उदाहरण के लिए, वर्ष 2021 में, सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने सीबीआई को ‘हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड’ (HZL) के रणनीतिक विनिवेश संबंधी दो दशक पुराने मामले की जांच करने का निर्देश दिया था। इस मामले में सीबीआई ने ही प्रारंभिक जांच को बंद कर दिया था।
  • भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व अध्यक्ष ‘प्रतीप चौधरी’ को, सेवानिवृत्ति के लंबे समय बाद, एक ‘आस्ति पुनर्रचना’ (Asset Reconstruction) मामले में, एक मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश पर गिरफ्तार किया गया था। विडंबना यह है कि उस मामले की सुनवाई के लिए उपयुक्त मंच ‘राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण’ (National Company Law Appellate Tribunal – NCLAT) था।
  • शक्ति के पृथक्करण’ सिद्धांत का उल्लंघन: आर्थिक विकास का अध्यारोहण करने वाले न्यायपालिका के फैसले या पहले से ही निपटाए गए मामलों को अदालत द्वारा फिर से खोलना, कार्यपालिका और न्यायपालिका के उद्देश्यों को एक-दूसरे के आमने सामने खड़ा कर देता है।
  • ‘न्यायपालिका’ के पास नीतिगत मामलों में विशेषज्ञता का अभाव होता है। सरकारें, नागरिकों को एक अच्छा जीवन स्तर प्रदान करने के लिए जवाबदेह हैं, लेकिन न्यायपालिका सीधे लोगों के प्रति जवाबदेह नहीं है। इसके अलावा, न्यायपालिका के पास कई मामलों में विशेषज्ञता नहीं होती है।
  • न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach) संबंधी मुद्दे: उदाहरण- ‘गोवा फाउंडेशन बनाम सेसा स्टरलाइट मामले’ (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने लौह अयस्क के खनन पर रोक लगा दी। जिससे अब तक बड़ी संख्या में नौकरियां जा चुकी हैं।
  • पर्यावरण मूल्यांकन समिति और NGT द्वारा नियत प्रक्रिया का पालन करने के बावजूद 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने MOPA हवाई अड्डे की परियोजना की पर्यावरण मंजूरी (Environmental Clearance) को निलंबित कर दिया।

न्यायपालिका के लिए सुझाव:

  • न्यायपालिका को अपने निर्णयों का समग्र प्रभाव मूल्यांकन करना चाहिए। उदाहरण के लिए ‘शिव शक्ति शुगर्स लिमिटेड बनाम श्री रेणुका शुगर लिमिटेड’ के फैसले (2017) में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कि निर्णय देने से पहले किसी निर्णय के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  • न्यायाधीशों के लिए जिम्मेदार और स्थायी निर्णय लेने के लिए, आर्थिक प्रभाव/लागत-लाभ विश्लेषण का इस्तेमाल किया जाना, एक मौलिक प्रक्रिया बनाया जाना चाहिए।
  • विशेषज्ञों की मदद लेना: सुप्रीम कोर्ट, विशेषज्ञों की एक स्वतंत्र समिति का गठन कर सकता है, जो मात्रात्मक विश्लेषण की पेशकश करके अपने अंतिम मूल्यांकन को संतुलित करने में अदालत की सहायता कर सकती है।

निष्कर्ष:

आर्थिक निहितार्थ वाले न्यायिक हस्तक्षेपों के लिए, विचार-विमर्श, बाहरी विशेषज्ञता, एक नए मूल्यांकन ढांचे और एक वृहद-परिप्रेक्ष्य की आवश्यकता होती है।

इंस्टा लिंक:

न्यायिक सक्रियता और न्यायिक अतिक्रमण

मेंस लिंक:

न्यायिक अतिक्रमण (ज्यूडिशियल ओवररीच) क्या है? न्यायिक अतिक्रमण के लिए कौन से कारक जिम्मेदार हैं? प्रासंगिक उदाहरणों के साथ चर्चा कीजिए।

स्रोत: द टाइम्स ऑफ इंडिया

 

विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।

अदालतों से आगे, पुलिस और मीडिया तक निष्पक्ष सुनवाई

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कानूनी मुद्दों के मीडिया कवरेज में मीडिया की जवाबदेही की कमी पर आपत्ति जताई थी।

यह आर्टिकल, ‘पक्षपातपूर्ण मीडिया एवं एजेंडा संचालित बहसों की लोकतंत्र को कमजोर करने में भूमिका’ शीर्षक से दिए गए ‘आर्टिकल’ का अगला भाग है।

(नोट: इस वर्ष मुख्य परीक्षा में भाग लेने वाले अभ्यर्थी कुछ मुद्दों और सुझावों को नोट कर सकते हैं यह इस वर्ष की परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।)

मीडिया ट्रायल’ में पुलिस की भूमिका:

  • न्यायपालिका के लिए मीडिया एवं संचार हेतु महत्वपूर्ण स्रोत: पुलिस, ‘मीडिया’ के लिए एक सूचनाओं का महत्वपूर्ण स्रोत होती है, और न्यायपालिका एवं पुलिस के बीच ‘संचार’ या ‘संप्रेषण’ (Communication) अक्सर मीडिया ट्रायल्स की परेशानियों का एक प्रारंभिक बिंदु होता है।
  • अधिकारों का सार्वजनिक रूप से हनन: किसी अधीर पुलिस बल द्वारा मामले के विवरण संबंधी अनियंत्रित खुलासे के परिणामस्वरूप, आम तौर पर एक निष्पक्ष सुनवाई से जुड़े अधिकारों को सार्वजनिक रूप से छीन लिया जाता है।

उदाहरण के लिए, दिल्ली पुलिस ने स्वीकार किया है कि ऑल्टन्यूज़ के सह-संस्थापक ‘मोहम्मद जुबैर’ की जमानत पर सुनवाई के परिणाम के बारे में खुली अदालत में फैसला आने से पहले ही मीडिया को सूचित कर दिया गया था।

मीडिया की भूमिका:

  • घातक प्रभावों को रोकने में भूमिका: राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कभी-कभी ‘पुलिस आख्यानों’ (Police narratives) को डिज़ाइन किया जाता है, और इन आख्यानों की मीडिया द्वारा तत्काल स्वीकृति, उनके कपटपूर्ण / घातक प्रभावों को रोकने के लिए बहुत कम काम करती है।
  • राजनीतिक अभिमतों को आकार देना: ‘राजनीतिक अभिमतों’ (Political Opinion) को आकार देने की मीडिया की क्षमता को देखते हुए, कानून प्रवर्तन एजेंसियों पर कभी-कभी जांच के कुछ पहलुओं को चुनिंदा रूप से प्रकट करने या घटनाओं को सांप्रदायिक रूप में या प्रणालीगत के रूप में ‘गलत तरीके’ से पेश करने का दबाव होता है।
  • भीम कोरेगांव मामला: उदाहरण के लिए, भीमा कोरेगांव हिंसा (2018) की जांच में सरकार की आलोचना करने वाले कई लोकप्रिय असंतुष्टों की प्रायोजित गिरफ्तारियां हुईं।
  • यद्यपि, मामले की जांच अभी भी जारी है, फिर भी पुलिस ने इन कार्यकर्ताओं द्वारा कथित रूप से लिखे गए पत्रों को उजागर कर दिया, जबकि ये पत्र अभी भी फोरेंसिक विश्लेषण के दौर से गुजर रहे हैं।
  • इन पत्रों को व्यापक समाचार कवरेज प्राप्त हुआ, लेकिन इनमें से कोई भी अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था।

मीडिया के साथ समस्याएं:

  • गैर-समान सरकारी नियम: प्रिंट और टेलीविजन मीडिया के लिए सरकारी विनियमन एक समान नहीं है और इन विनियमों का प्रवर्तन, जहां भी होता है, काफी धीमा है।
  • किसी न किसी तरह, मीडिया का ‘सरकारी विनियमन’ (Government regulation) समस्याग्रस्त है, और इससे प्रेस के राजनीतिकरण में वृद्धि होने की संभावना है।
  • ‘स्व-नियमन’ से आसानी से टाला जा सकता है: ‘राष्ट्रीय प्रसारण मानक प्राधिकरण’ और ‘भारतीय प्रसारण फाउंडेशन’ जैसे ‘स्व-विनियमन सेट-अप’ सदस्यता-आधारित हैं और इन समूहों से अलग होने पर आसानी से ‘स्व-विनियमन’ जैसे दायित्वों से बचा जा सकता है।
  • कमजोर नियामक मानदंड: एक ‘कमजोर नियामक परिवेश’, वस्तुतः रिपोर्टिंग मानदंडों को प्रभावी रूप से पत्रकारों और उनके संपादकों के विवेक पर छोड़ देता है।
  • उचित जानकारी के बिना गिरफ्तारी का उल्लेख करना: कई रिपोर्टों में बिना किसी जानकारी के “गिरफ्तारी” का उल्लेख किया गया है, और इस बात के बारे में कोई छानबीन या जानकारी प्राप्त नहीं की जाती है. कि क्या इस तरह की ‘गिरफ्तारी’ जांच के दौरान की गयी है, या चार्जशीट दाखिल करने के बाद की दौरान है।
  • मीडिया संगठनों पर दबाव: मीडिया संगठनों पर बढ़ते वित्तीय दबाव के परिणामस्वरूप अपराधों और कानूनी रिपोर्टिंग में विशेषज्ञता रखने वाले ‘इलाका पत्रकार’ (Beat Reporters) दुर्लभ होते जा रहे हैं।

अब तक उठाए गए कदमों का विश्लेषण:

  • ‘रोमिला थापर बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट: अदालतों ने बार-बार ‘कानून प्रवर्तन’ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपनी जांच के विवरण, विशेष रूप से आरोपी के व्यक्तिगत विवरण को सुनवाई के पूरा होने से पहले प्रकट न करें।
  • वैधानिक प्रतिबंध: केरल, उन कुछ राज्यों में से एक है, जहां पुलिस अधिनियम के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के फोटो और परेड की अनुमति नहीं है।
  • मीडिया नीति दिशानिर्देश: अधिकांश राज्यों ने अलग-अलग ‘मीडिया नीति दिशानिर्देश’ जारी किए हैं। हालांकि, इनके प्रवर्तन तंत्र कमजोर बने हुए हैं।
  • गृह मंत्रालय के निर्देश: गृह मंत्रालय ने एक मीडिया नीति को रेखांकित करते हुए एक कार्यालय ज्ञापन जारी किया है। हालांकि, इसके कार्यान्वयन में कमी है क्योंकि ‘पुलिस’ राज्य सूची में शामिल एक प्रविष्टि है और इस प्रकार यह मुख्य रूप से राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती है।

निष्कर्ष:

  • नैतिक संकट का एक अंतर्मुखी समाधान: मीडिया विनियमन की बढ़ती आवश्यकता के साथ, अब यह मीडिया के तत्काल हित और स्वतंत्र प्रेस के सामान्य हित में है, कि मीडिया संस्थान इस बात का उत्तर खोजने के लिए अपने भीतर देखें कि अनिवार्य रूप से एक ‘नैतिक संकट’ क्या है।
  • न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को कायम रखना: न्याय की सार्वजनिक धारणाओं के बारे में ‘आख्यानों’ को आकार देने की मीडिया की अपार शक्ति इसे न्याय प्रणाली का एक करीबी सहयोगी बनाती है, इसके साथ ही मीडिया पर हमारी न्याय प्रणाली के बुनियादी सिद्धांतों को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी आती है।
  • मीडिया को इन सिद्धांतों को संरक्षित करने के उद्देश्य से ‘सहायता तंत्र में अपनी भूमिका निभाने के दायित्व’ के अधीन महसूस करना चाहिए।
  • संरचित और अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई मीडिया नीति: पुलिस के लिए ‘प्रशिक्षण और प्रवर्तन तंत्र के साथ एक संरचित और अच्छी तरह से डिज़ाइन की गई मीडिया नीति’ समय की मांग है।

इंस्टा लिंक्स:

सोशल मीडिया

मेंस लिंक:

‘न्यायिक विधान’ भारतीय संविधान में परिकल्पित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है। इस संदर्भ में कार्यकारी अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी करने के लिए प्रार्थना करने वाली बड़ी संख्या में जनहित याचिकाओं को दाखिल करने का औचित्य सिद्ध कीजिए। (यूपीएससी 2021)

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

अर्थहीन ‘रैंकिंग’

संदर्भ:

जुलाई में ‘राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क’ (NIRF) द्वारा जारी ‘उच्च शिक्षा संस्थानों’ (Higher Education Institutions – HEIs) की रैंकिंग की काफी आलोचना हुई है।

‘उच्च शिक्षा संस्थानों’ (HEIs) की समग्रता, विश्वविद्यालय-वार, कॉलेज-वार और कानून, चिकित्सा, फार्मेसी, प्रबंधन, वास्तुकला और इंजीनियरिंग जैसे विषयों के तहत भी रैंकिंग की जाती है।

(नोट: केवल एक बार पढ़ लीजिए, अधिक महत्वपूर्ण नहीं है।)

रैंकिंग के पैरामीटर:

  1. शिक्षण, अध्ययन एवं संसाधन (Teaching, Learning and Resources)
  2. अनुसंधान एवं व्यावसायिक क्रियाएं (Research and Professional Practices)
  3. स्नातक परिणाम (Graduation Outcomes)
  4. पहुँच एवं समावेशिता (Outreach and Inclusivity)
  5. धारणा (Peer Perception)

 

डेटा के साथ समस्याएं:

निजी संस्थानों को ‘राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों’ से ऊपर रखा जाना:

  • ‘राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क’ (NIRF) की रैंकिंग में, कुछ निजी बहु-विषयक संस्थानों को कई प्रतिष्ठित ‘राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों’ (National Law Universities – NLUs) और कानून विभागों से ऊपर रखा गया है।
  • आम तौर पर, जो छात्र NLUs में सीट सुरक्षित नहीं कर पाते है, उन्हें निजी संस्थानों में प्रवेश दिया जाता है।

उच्च रैंकिंग वाले संस्थान पहली पसंद नहीं होते हैं:

NIRF रैंकिंग से पता चलता है कि एक निजी विधि विश्वविद्यालय ने ‘धारणा’ (Peer Perception) श्रेणी में 100% स्कोर किया है।

  • इन अंकों को ध्यान में रखते हुए यह संस्थान छात्रों के लिए सबसे पसंदीदा स्थान होना चाहिए था।
  • लेकिन ‘कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट’ में प्रवेश के विकल्प अलग तस्वीर दिखाते हैं-यह संस्थान अध्ययन के लिए पसंदीदा स्थान के रूप में 10 NLUs से नीचे है।

कड़ी प्रणाली का अभाव:

  • NIRF के तहत विभिन्न श्रेणियों में भाग लेने वाले कुछ ‘बहु-विषयक निजी विश्वविद्यालयों’ द्वारा प्रस्तुत डेटा का विश्लेषण करने पर, ‘डेटा के साथ हेराफेरी’ (Data Fudging) का प्रमाण मिलता है।

संकाय-छात्र अनुपात:

साक्ष्य बताते हैं, कि कुछ निजी बहु-विषयक विश्वविद्यालयों ने, एक से अधिक विषयों में ‘एक ही ‘संकाय’/‘अध्यापक’ (Faculty) का दावा किया है, मतलब, एक ही अध्यापक कई विषयों को पढाता है।

अनुसंधान में अनुदान: अनुसंधान परियोजनाओं और परामर्श के लिए ‘अनुसंधान निधीयन’ (Research funding), रैंकिंग के लिए एक अनिवार्य मानदंड है।

डेटा से पता चलता है, कि अन्य विषयों में प्राप्त ‘अनुसंधान अनुदान और परामर्श शुल्क’ को ‘विधि विषय’ के तहत प्राप्त दिखाया गया है।

कोई पारदर्शिता नहीं:

  • NIRF द्वारा निर्धारित नियमों के अनुसार, इसके पास जमा किए गए डेटा को सभी प्रतिभागी ‘उच्च शिक्षा संस्थानों’ द्वारा अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करना अनिवार्य है, ताकि ऐसे डेटा की जांच की जा सके।
  • कुछ निजी बहु-विषयक विश्वविद्यालयों द्वारा अपनी वेबसाइट पर इस प्रकार के डेटा तक मुफ्त पहुंच प्रदान नहीं की गयी है; इसके बजाय, इनकी एक्सेस चाहने वाले व्यक्ति को अपने विवरण के साथ एक ऑनलाइन फॉर्म भरना होता है।

डेटा में विसंगति: उदाहरण के लिए, वेबसाइटों पर अपलोड किए गए डेटा में संकाय की संख्या, नाम, योग्यता और अनुभव के विवरण नहीं होते हैं।

सभी संस्थानों के लिए समान मानदंड: NIRF  द्वारा अनुसंधान और पेशेवर कोर्सेज के विभिन्न विषयों में सभी संस्थानों के लिए लगभग समान पैरामीटर लागू किए जाते हैं।

केवल स्कोपस और वेब विज्ञान से डेटा का प्रकाशन: यद्यपि, ‘राष्ट्रीय मूल्यांकन और प्रत्यायन परिषद’ द्वारा ‘यूजीसी-केयर सूचीबद्ध पत्रिकाओं’ में किए गए प्रकाशनों को उचित महत्व देती है, जबकि NIRF केवल स्कोपस (Scopus) और वेब ऑफ साइंस (Web of Science) पर छपे डेटा का उपयोग करता है।

निष्कर्ष:

संशोधित कार्यप्रणाली: ‘राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग फ्रेमवर्क’ (NIRF) में गंभीर कार्यप्रणाली और संरचनात्मक समस्याएं इसकी ‘रैंकिंग प्रक्रिया’ को कमजोर करती हैं।

सभी हितधारकों के परामर्श से NIRF की कार्यप्रणाली को संशोधित किया जाना चाहिए।

इंस्टा लिंक:

उच्च शिक्षण संस्थानों की भारत रैंकिंग 2022

मेंस लिंक:

भारत की ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’, सतत विकास लक्ष्य-4 (2030) के अनुरूप है। इसका उद्देश्य भारत में शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन और पुन: अभिविन्यास करना है। इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (UPSC 2020)

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

नाबालिगों की संरक्षकता और दत्तक-ग्रहण

संदर्भ: हाल ही में, एक ‘संसदीय स्थायी समिति’ ने कहा है कि “हिन्दू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956” (Hindu Minority and Guardianship Act,1956 – HMGA,1956) में संशोधन करने, तथा  ‘माता और पिता’ दोनों को ‘प्राकृतिक अभिभावक’ के रूप में समान व्यवहार करने, की तत्काल आवश्यकता है।”

(नोट: बस एक बार पढ़ लीजिए। इतना महत्वपूर्ण नहीं है।)

वर्तमान कानूनी स्थिति:

भारतीय कानून में ‘अवयस्क की संरक्षकता’ के मामले में ‘पिता’ को प्रधानता प्रदान की जाती है।

  • मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 के अनुसार, ‘संरक्षकता’ के मामले में शरीयत या धार्मिक कानून लागू होगा, जिसके अनुसार पिता ‘प्राकृतिक अभिभावक’ होता है, लेकिन जब तक ‘पुत्र’ सात साल की आयु प्राप्त करने तक और ‘पुत्री’ यौवन-वस्था (puberty) तक पहुँचने तक, उसकी ‘संरक्षकता’ मां के पास रहती है।
  • दत्तक ग्रहण विनियम, 2017, LGBTQI लोगों द्वारा ‘दत्तक ग्रहण’ संबंधी मामले पर मौन है और न तो उन्हें बच्चे को गोद लेने पर प्रतिबंध लगाता है और न ही उन्हें गोद लेने की अनुमति देता है।
  • 1999 के ‘गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक’ मामले में, सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने HMGA को भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत ‘लैंगिक समानता’ की गारंटी के उल्लंघन के लिए चुनौती दी थी।
  • लेकिन, शीर्ष अदालत अपने फैसले में माता और पिता, दोनों को ‘समान अभिभावक’ के रूप में मान्यता देने में विफल रहा, माता की भूमिका को पिता के अधीन कर दिया।

समिति द्वारा की गयी सिफारिशें:

  • HMGA 1956 के तहत, माताओं को उनके पति के अधीनस्थ के रूप में मानने के बजाय उन्हें समान अधिकार प्रदान किया जाए।
  • वैवाहिक विवादों के दौरान ‘माताओं’ को वरीयता देने के बजाय ‘बच्चों की संयुक्त अभिरक्षा’ का प्रावधान किया जाए।
  • LGBTQI समुदाय को ‘बच्चों को गोद लेने’ की अनुमति दी जाए। एक ऐसे नए कानून की आवश्यकता है जो ‘किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम’, 2015 और ‘हिंदू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम’ (HAMA), 1956 के अनुरूप हो, तथा इस तरह के कानून में LGBTQI समुदाय भी शामिल होना चाहिए।

इंस्टा लिंक:

बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया का सरलीकरण

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

भारत, बांग्लादेश एवं पाकिस्तान: पश्चिमी देश, पूरब से क्या सीख सकते हैं?

संदर्भ: इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। इस आर्टिकल में इस बात पर चर्चा की गयी है, कि ‘भारत-बांग्लादेश संबंध’, ‘भारत-पाकिस्तान संबंधों’ का किस प्रकार मार्गदर्शन कर सकते हैं।

(नोट: सी राजा मोहन द्वारा लिखित उपरोक्त आर्टिकल ‘अंतर्राष्ट्रीय संबंधों’ के लिए महत्वपूर्ण हैं।)

भारत-बांग्लादेश संबंध- सकारात्मक बिंदु:

सुरक्षा आयाम:

  • सीमा विवादों का निपटारा: उदाहरण के लिए, भारत और बांग्लादेश के बीच 2015 का ‘स्थलीय सीमा समझौता’, और ‘समुद्री विवाद’ का समाधान।
  • भारत सरकार ने दिल्ली और ढाका के बीच ‘समुद्री सीमा विवाद’ को निपटाने पर ‘अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता का निर्णय’ स्वीकार किया है।
  • सीमा पार आतंकवाद को कम करने में सहयोग: बांग्लादेश में विद्रोहियों से समर्थन दिए जाने की घटनाओं में काफी कमी आई है। इसने दोनों राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थाओं के बीच बहुत जरूरी ‘राजनीतिक विश्वास’ बनाने में मदद की है।

आर्थिक आयाम:

  • फलता-फूलता सीमा व्यापार: भारत ने बांग्लादेशी वस्तुओं के लिए भारतीय बाजार खोल दिया, और ढाका ने भारतीय वस्तुओं को भारत के उत्तर-पूर्व में प्रवेश करने की अनुमति दी है।
  • सीमा-पार बस सेवाएं, जैसे कि ‘अगरतला-ढाका-कोलकाता ‘मैत्री’ बस सेवा, रेलवे लाइनों जैसे कि ‘बंधन एक्सप्रेस’ को फिर से शुरू करना, और जलमार्गों के पुनरोद्धार से पूर्वी उपमहाद्वीप में कनेक्टिविटी, जो पहले टूटी हुई थी, फिर से बहाल हो रही है।

व्यापार में वृद्धि:

  • भारत और बांग्लादेश के बीच द्विपक्षीय व्यापार पिछले साल लगभग 16 अरब डॉलर तक पहुंच गया। बांग्लादेश, भारत के शीर्ष निर्यात बाजारों में से एक है।
  • ढाका को भारत से बिजली की खरीद को सुगम बनाने के लिए ‘इंटर-कनेक्टेड पावर ग्रिड’ विकसित की गयी है। वर्तमान में, बांग्लादेश, भारत से 1200 मेगावाट बिजली का आयात करता है, और इसमें 1500 मेगावाट अधिक बिजली जोड़ने की योजना है।

भू-राजनीतिक आयाम:

  • सहकारी रणनीति: बांग्लादेश ने भारत के साथ संतुलन स्थापित करने / बराबरी करने के प्रलोभन को त्याग दिया है। इसके बजाय, बांग्लादेश ने अपने आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित हुए भारत के साथ एक सहकारी रणनीति शुरू की है, और ‘क्षेत्रीय’ और ‘वैश्विक पदानुक्रम’ में खुद को ऊपर उठा रहा है।

भारत-पाकिस्तान संबंधों में समस्याएं:

  • सीमा पार आतंकवाद की निरंतरता
  • सीमा विवाद, जैसे कश्मीर पर युद्ध,
  • सीमा का सैन्यीकरण
  • संपर्क का अभाव: भारत और पाकिस्तान के बीच व्यापार वर्तमान में लगभग नगण्य है।
  • आधिकारिक अंतर-सरकारी संवाद का अभाव: दोनों देशों के बीच कोई औपचारिक अंतर-सरकारी वार्ता नहीं हो रही है।

बांग्लादेश-भारत के अच्छे संबंधों से सीखे जा सकने वाले सबक:

  • पारस्परिक रूप से लाभकारी भविष्य के निर्माण हेतु अतीत से बाहर निकलना: उदाहरण के लिए, दोनों देशों के प्रधान मंत्रियों, शेख हसीना और नरेंद्र मोदी ने भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों में “सोनाली अध्याय” या “सुनहरा अध्याय” घोषित किया है।
  • कम रक्षा व्यय: रक्षा पर होने वाले खर्च में कमी से हुई बचत को ‘सामाजिक लक्ष्यों’ की ओर निर्देशित किया जा सकता है। बांग्लादेश के साथ अच्छे संबंधों ने भारत की सुरक्षा चुनौतियों को काफी कम कर दिया है। भारत के पूर्वोत्तर में व्यापार और आर्थिक संपर्कों में वृद्धि भी हुई है।
  • वैश्विक शासन संबंधी मुद्दों पर समान रुख: दक्षिण एशिया, एक समान मुद्दों का सामना कर रहा है और विकास के समान स्तर पर है। इस प्रकार, परस्पर अच्छे संबंधों ने उन्हें जलवायु परिवर्तन, विश्व व्यापार संगठन शासन, UNSC सुधार आदि जैसे वैश्विक मुद्दों पर एक समान रुख अपनाने में मदद की है।

निष्कर्ष:

पूरब में दिल्ली और ढाका के बीच कई मुद्दों का समाधान होना अभी बाकी है। उदाहरण के लिए, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, 50 से अधिक नदियों के पानी को साझा करना, व्यापार को सुविधाजनक बनाने और अवैध प्रवास को रोकने के लिए सीमा पार निवेश को बढ़ावा देना आदि। स्वतंत्रता की 75 वीं वर्षगांठ, दिल्ली और ढाका को द्विपक्षीय साझेदारी हेतु अपनी महत्वाकांक्षा को बढ़ाने के लिए एक विशेष अवसर प्रदान करती है।

संबंधित चर्चित विषय:

भारत और बांग्लादेश के बीच प्रमुख नदी समझौतों पर वार्ता:

  • संयुक्त नदी आयोग (Joint River Commission – JRC) की आगामी बैठक में, भारत और बांग्लादेश असम से बांग्लादेश में बहने वाली कुशियारा नदी (Kushiyara River) पर और साथ ही ‘गंगा जल संधि’ (1996 में हस्ताक्षरित और इसे 2026 में नवीनीकृत किया जाएगा) पर एक समझौते पर पहुंचने का प्रयास करेंगे।)
  • इसके अलावा, मनु, मुहुरी, खोवाई, गोमती, धरला और दूधकुमार जैसी नदियों पर दोनों देश ‘सहयोग’ को तेज करेंगे।
  • बांग्लादेश और भारत 54 नदियों को साझा करते हैं और ढाका, बेहतर मत्स्य पालन और बाढ़ नियंत्रण रणनीतियों की योजना बनाने के लिए भारतीय पक्ष से अधिक डेटा तक पहुंच पाने का इच्छुक है।

भारत-बांग्लादेश तीस्ता विवाद: यह संधि भारत-बांग्लादेश की सीमा के समीप ‘फरक्का बैराज’ में सतही जल साझा करने के लिए एक समझौता है। बांग्लादेश ने गंगा जल संधि 1996 की तर्ज पर भारत से ‘तीस्ता नदी के जल’ का निष्पक्ष और समान वितरण की मांग की है।

इंस्टा लिंक:

मूल बातें: भारत-बांग्लादेश संबंध

मेंस लिंक:

भारत-बांग्लादेश संबंधों में हाल के घटनाक्रमों पर प्रकाश डालिए। द्विपक्षीय संबंधों में तनावपूर्ण बिंदु और प्रमुख मुद्दे कौन से हैं? समझाएं। (15 अंक)

स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

 भारत का सौर ऊर्जा स्वप्न

संदर्भ: ‘इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित इस आर्टिकल में, भारत में ‘सोलर फोटोवोल्टिक’ (PV) / सोलर पैनलों के विनिर्माण में आने वाली चुनौतियों के बारे में बात की गयी है।

(नोट: विषय को समझने के लिए इस आर्टिकल को एक बार पढ़ लीजिए। नोट्स बनाने की जरूरत नहीं है।)

वस्तुस्थिति:

  • वर्ष 2010 में 10 मेगावाट से भी कम सौर पीवी क्षमता से शुरूआत करके, भारत ने पिछले एक दशक में सौर पीवी क्षमता में महत्वपूर्ण वृद्धि की है, और वर्ष 2022 तक 50 गीगावाट से अधिक हासिल कर ली है।
  • भारत, वर्ष 2030 तक, लगभग 500 GW अक्षय ऊर्जा परिनियोजन का लक्ष्य बना रहा है, जिसमें से 280 GW अक्षय ऊर्जा, सौर पीवी से अपेक्षित है।

‘सोलर फोटोवोल्टिक पैनल’ (Solar PV panels) के बारे में:

पीवी,जो एक ऐसी प्रौद्योगिकी है जो धूप को सीधे विद्युत में परिवर्तित करती है, नवीकरणीय ऊर्जा उद्योग की सबसे तेज उत्‍पादक भागों में से एक है।

  • सोलर पैनल बहुत सारे ‘फोटोवोल्टिक’ (Photo Voltaic) सेलो का समूह होता है। इस फोटोवोल्टिक सेलो को आपस में श्रेणी तथा समांतर क्रम में जोड़कर एक प्लेट पर व्यवस्थित कर दिया जाता है। इसके ऊपर कांच की एक ‘केसिंग’ कर दी जाती है, ताकि यह सेल बाहरी वातावरण के प्रभाव तथा पानी के प्रभाव से बचे रहें।
  • एक विशिष्ट ‘सौर पीवी मूल्य श्रृंखला’, ‘पॉलीसिलिकॉन सिल्लियों’ (polysilicon ingots) से बनी होती है, जिनको ‘पतले सिलिकॉन वेफर्स’ (Thin Silicon Wafers) में परिवर्तित किया जाता है। पीवी मिनी-मॉड्यूल’ के निर्माण के लिए इन ‘सिलिकॉन वेफर्स’ की जरूरत होती है।
  • सौर वेफर का आकार जितना बड़ा होगा, प्रति वेफर सिलिकॉन लागत के मामले में उतना ही लाभ होता है।

सोलर पीवी पैनल की कार्यविधि:.

जब सूर्य का प्रकाश, ‘सौर पैनल’ पर आपतित होता है, तो सूर्य के प्रकाश से ऊर्जा पैनल में ‘पीवी सेल’ द्वारा अवशोषित का ली जाती है। यह ऊर्जा, ‘विद्युत आवेश’ का निर्माण करती है जो सेल में मौजूद ‘आंतरिक विद्युत क्षेत्र’ की प्रतिक्रिया में गति करते है, जिससे बिजली प्रवाहित होती है।

 

भारत में सोलर पीवी निर्माण में चुनौतियाँ:

  • आयात पर निर्भरता: भारत की वर्तमान ‘सौर मॉड्यूल निर्माण क्षमता’ प्रति वर्ष 15 GW तक सीमित है।
  • भारत में ‘सोलर वेफर्स’ और ‘पॉलीसिलिकॉन सिल्लियों’ के लिए निर्माण क्षमता का अभाव नहीं है, और वर्तमान में 100% सिलिकॉन वेफर्स और लगभग 80% सौर सेल का आयात किए जाते है।
  • पुरानी तकनीक: भारतीय निर्माता अभी भी पुरानी ‘एल्यूमीनियम बैक सरफेस फील्ड सोलर सेल तकनीक’ (Al-BSF technology) पर निर्भर हैं, जोकि क्षमता में 18-19% तक कम होती है, जबकि दुनिया भर में ‘पीवी सेल दक्षता’ 21% से अधिक है।
  • भारत, एक विनिर्माण केंद्र की तुलना में एक ‘संयोजन केंद्र’ (Assembly Hub) के रूप में अधिक है। कई कच्चे माल, जैसे कि सिलिकॉन वेफर्स, इलेक्ट्रिकल कॉन्टेक्ट्स बनाने के लिए चांदी और एल्यूमीनियम के धात्विक पेस्ट भी, लगभग 100% आयात किए जाते हैं।
  • भारत ‘सिलिकॉन वेफर्स’ (सबसे महंगा कच्चा माल) के लिए चीन पर निर्भर है। दुनिया के 90% से अधिक सोलर वेफर का निर्माण वर्तमान में चीन में होता है।
  • अनुसंधान में खराब निवेश: भारत ने लागत प्रभावी तरीके से सौर प्रौद्योगिकियों के परीक्षण और परीक्षण के लिए केंद्र बनाने में शायद ही निवेश किया हो।
  • विश्व व्यापार संगठन में चुनौतियां: भारत के आयात शुल्क को लेकर विश्व व्यापार संगठन (अमेरिकी पीवी निर्माताओं द्वारा चुनौती दी गई) में भारत हार चुका है।

सरकार की पहलें:

  • भारत ने मॉड्यूल के आयात पर 40% शुल्क और सेल के आयात पर 25% शुल्क लागू किया है।
  • विनिर्माण पूंजीगत व्यय को सहयोग देने के लिए पीएलआई योजना।
  • सरकार ने राज्य/केंद्र सरकार के ग्रिड से अनुबंधित परियोजनाओं के लिए केवल निर्माताओं की अनुमोदित सूची (Approved List Of Manufacturers – ALMM), जिसमे अब तक केवल भारत-आधारित निर्माताओं को अनुमोदित किया गया है, से मॉड्यूल खरीदना अनिवार्य कर दिया है।

आवश्यकता:

  • वैश्विक निर्माताओं के साथ प्रौद्योगिकी संबद्धता: सौर सेल निर्माण के लिए उपयुक्त ग्रेड की सिलिकॉन बनाने के लिए भारत को प्रौद्योगिकी गठजोड़ पर काम करना होगा।
  • आत्मनिर्भर विनिर्माण की ओर अग्रसर: भारत को स्थानीय स्तर पर ऐसे घटक बनाकर मूल्य श्रृंखला को आगे बढ़ाना चाहिए जो सेल और मॉड्यूल दोनों की कीमत और गुणवत्ता को बढ़ा सकें।
  • पीवी पैनल मैन्युफैक्चरिंग पार्क: भारत को लघु एवं दीर्घावधि के लिए स्पष्ट रोडमैप और डिलिवरेबल्स के साथ विशिष्ट प्रौद्योगिकी डोमेन पर काम करने के लिए उद्योग जैसे केंद्र बनाने की जरूरत है।
  • घरेलू प्रौद्योगिकियों का विकास शुरू करने के लिए एक अभिनव तरीके से मजबूत उद्योग-अकादमिक सहयोग।

इंस्टा लिंक:

भारत की सौर क्षमता: मील के पत्थर और चुनौतियाँ

मेंस लिंक:

भारत को ‘सौर अपशिष्ट प्रबंधन एवं विनिर्माण मानक नीति’ (सोलर वेस्ट मैनेजमेंट और मैन्युफैक्चरिंग स्टैंडर्ड पॉलिसी) की जरूरत है। क्या आप सहमत हैं? टिप्पणी कीजिए। (10 अंक)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (निबंध/नैतिकता)


अंडे और आस्था

  • कर्नाटक सरकार द्वारा दो जिलों में 4,500 से अधिक छात्रों को कवर करने वाले हालिया अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार,- मध्याह्न भोजन के हिस्से के रूप में अंडे दिए जाने वाले ‘बच्चों की वृद्धि’ में “महत्वपूर्ण सुधार के स्पष्ट प्रमाण” मिले हैं। अध्ययन के अनुसार, कक्षा 8 में, जिन छात्रों को अंडे नहीं दिए गए थे, उनकी तुलना में अंडे दिए जाने वाले बच्चों में 71% अधिक वजन बढ़ा है।
  • वर्तमान में, 13 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में “अतिरिक्त खाद्य पदार्थों” के हिस्से के रूप में मध्याह्न भोजन में अंडे परोसे जाते हैं, जिनका व्यय इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा उठाया जाता है। मध्याह्न भोजन में अंडे परोसे जाने की आवृत्ति, इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में, सप्ताह में पांच दिन से लेकर महीने में एक बार तक होती है।
  • कर्नाटक में, मध्याह्न भोजन में अंडे शामिल करने के प्रस्तावों का लिंगायत और जैन संतों द्वारा अतीत में जमकर विरोध किया गया है।

इस उदाहरण को निम्नलिखित को दर्शाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

  • ‘भोजन का अधिकार’ बनाम ‘आस्था का अधिकार’
  • अंडे के साथ-साथ कुछ खाद्य पदार्थों को आस्था और धर्म से ऊपर क्यों देखा जाना चाहिए, ताकि स्वास्थ्य और पोषण से संबंधित मुद्दों से निपटा जा सके।

डेटा पॉइंट्स:

बच्चों के खिलाफ साइबर अपराध

  • महाराष्ट्र में सर्वाधिक दर्ज
  • खराब चार्जशीटिंग दर: केवल 27%
  • खराब दोषसिद्धि दर: केवल 0.5%

शून्य- जीरो प्रदूषण गतिशीलता अभियान: इसे आजादी का अमृत महोत्सव के तहत शुरू किया गया है और इसका उद्देश्य इलेक्ट्रिक वाहनों की परिनियोजन में तेजी लाकर भारत में वायु गुणवत्ता में सुधार करना है।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान

संदर्भ: ‘खारे पानी के मगरमच्छों’ के विशेषज्ञों का कहना है कि ‘भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान’ (Bhitarkanika National Park) एक ‘अनुवेधन सीमा’ (saturation point) पर पहुंच चुका है। यदि इसे ठीक से संबोधित नहीं किया गया तो यह एक बड़ी समस्या साबित हो सकती है।

  • भीतरकणिका राष्ट्रीय उद्यान, सुंदरबन के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा मैंग्रोव वन, और एक सफल ‘खारे पानी के मगरमच्छ संरक्षण कार्यक्रम’ के लिए जाना जाता है।
  • यह पाया गया है, कि पार्क में और उसके आसपास मगरमच्छों ने 2012 से अब तक 50 लोगों की जान ले ली है, जबकि इसी अवधि में 25 मगरमच्छों की मानव बस्तियों में प्रवेश करने, या मछली पकड़ने के जाल में फंसने से मृत्यु हो गई।

 

निकोबार में कच्छल द्वीप

संदर्भ: ‘यूनाइटेड स्टेट्स नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ (NASA) ने हाल ही में भारत के निकोबार द्वीपसमूह के एक हिस्से, कच्छल द्वीप (Katchal island) पर मैंग्रोव क्षेत्र के नुकसान पर प्रकाश डाला है।

हिंद महासागर में आयी सुनामी के कारण द्वीप पर 90% से अधिक मैंग्रोव क्षेत्र नष्ट हो गया था।

वाहिकाशोथ / वास्कुलिटिस

संदर्भ: हॉलीवुड अभिनेता एश्टन कचर को दो साल पहले एक “अजीब, अति दुर्लभ प्रकार का ‘वाहिकाशोथ’ (vasculitis) हुआ था, जिसने उनकी दृष्टि, श्रवण और “संतुलन” को बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर दिया था। हाल ही में, उन्होंने एक ट्वीट में इसका जिक्र किया था।

  • ‘वास्कुलिटिस’ एक सूजन-संबंधी बीमारी है, जो आपके रक्त वाहिकाओं, धमनियों, नसों और केशिकाओं को ‎प्रभावित करती है।
  • यह रक्त वाहिकाओं की दीवारों में परिवर्तन करती है जो रक्त प्रवाह बाधित होने लगता है ‎और अंततः ऊतक और अंगों को नुकसान पहुंचाता है।

लांग्या हेनिपावायरस

प्रसंग: चीन के शेडोंग और हेनान प्रांतों में एक नए ‘लांग्या वायरस’ (Langya virus – LayV) के मामले सामने आए हैं। लांग्या वायरस को ‘हेनिपावायरस’ (Henipavirus) के नाम से भी जाना जाता है।

  • द न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक हालिया अध्ययन – ए जूनोटिक हेनिपावायरस इन फेब्राइल पेशेंट्स इन चाइना – के अनुसार, नया खोजा गया वायरस एक “फाइलोजेनेटिक रूप से भिन्न हेनिपावायरस” है।
  • निपाह और हेंड्रा वायरस भी पैरामाइक्सोविरिडे परिवार से एक ही जीनस ‘हेनिपावायरस’ से संबंधित हैं। पैरामाइक्सोविरिडे (Paramyxoviridae), सिंगल-स्ट्रैंड राइबोन्यूक्लिक एसिड (RNA) वायरस का एक परिवार है जो विभिन्न प्रकार के वायरल संक्रमण का कारण बनता है।
  • ये वायरस चमगादड़, कृन्तकों और छछूँदर में पाए जाते हैं और मनुष्यों को संक्रमित करने के लिए जाने जाते हैं, तथा संभावित रूप से घातक बीमारियों का कारण बनते हैं।
  • लांग्या वायरस के लिए वर्तमान में कोई टीकाकरण या चिकित्सा उपलब्ध नहीं है, इसलिए जूनोटिक रोग की जटिलताओं के इलाज के लिए सहायक देखभाल ही इसका प्राथमिक विकल्प है।

एजीएम-88 हार्म

संदर्भ: अमेरिका यूक्रेन को एजीएम -88 हार्म (AGM-88 HARM) मिसाइलें भेजने की घोषणा की हैं। इन मिसाइलों को रडार सिस्टम को ट्रैक और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह कदम, रूसी वायु रक्षा के खिलाफ प्रतिरोधी उपायों को काफी बढ़ावा दे सकता है।

  • फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स मिलिट्री एनालिसिस नेटवर्क के अनुसार, AGM-88 HARM (हाई-स्पीड एंटीरेडिएशन मिसाइल) एक सुपरसोनिक हवा से सतह पर मार करने वाली सामरिक मिसाइल है जिसे दुश्मन के रडार से लैस वायु रक्षा प्रणालियों की तलाश और नष्ट करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। एजीएम-88 न्यूनतम एयरक्रू इनपुट के साथ लक्ष्य का पता लगा सकता है, हमला कर सकता है और नष्ट कर सकता है।

‘हिम ड्रोन-ए-थॉन’ कार्यक्रम

संदर्भ: हाल ही में भारतीय सेना द्वारा ड्रोन फेडरेशन ऑफ इंडिया के सहयोग से ‘हिम ड्रोन-ए-थॉन’ (Him Drone-e-thon) कार्यक्रम का अनावरण किया गया था।

  • रक्षा विनिर्माण में आत्मनिर्भरता के अनुरूप इस पहल का उद्देश्य भारतीय ड्रोन परितंत्र को उत्प्रेरित करना और उसे केंद्रित अवसर प्रदान करना है ताकि अग्रिम पंक्ति के सैन्य-दल की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अग्रणी ड्रोन क्षमताओं का विकास किया जा सके।
  • ‘हिम ड्रोन-ए-थॉन’ एक अखिल भारतीय कार्यक्रम है। यह उद्योग, सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, शिक्षाविदों और ड्रोन उत्पाद निर्माताओं सहित सभी हितधारकों को जोड़ने का प्रयास करता है।

वज्र प्रहार, 2022 युद्धाभ्यास

संदर्भ: भारत-अमेरिका संयुक्त विशेष सैन्य बलों के 13वें संस्करण का संयुक्त युद्धाभ्यास “वज्र प्रहार, 2022” (Vajra Prahar 2022) हिमाचल प्रदेश के बकलोह में शुरू हुआ है।

  • उद्देश्य: वज्र प्रहार की श्रृंखला के संयुक्त अभ्यास का उद्देश्य दोनों देशों के विशेष बलों के बीच संयुक्त मिशन योजना और परिचालन रणनीतियों जैसे क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ परिपाटियों और अनुभवों को साझा करने के साथ ही अंतर संचालन में सुधार करना है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ भारत के अन्य युद्धाभ्यास: युद्धअभ्यास (सेना); कोप इंडिया (वायु सेना); रेड फ्लैग (यूएसए का बहुपक्षीय हवाई अभ्यास); मालाबार अभ्यास (भारत, अमेरिका और जापान का त्रिपक्षीय नौसैनिक अभ्यास)।