विषयसूची
सामान्य अध्ययन-II
- अविवाहित महिलाओं के लिए “दैहिक स्वायत्तता’ एवं एमटीपी अधिनियम
- आपराधिक मामलों में सांसदों का विशेषाधिकार लागू नहीं होता है: राज्यसभा सभापति
- संसद के मानसून सत्र में ‘विद्युत संशोधन विधेयक’, 2022
- मंकीपॉक्स टास्क फोर्स द्वारा स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने हेतु सिफारिश
सामान्य अध्ययन-III
- आरबीआई की नवीनतम दर वृद्धि और इसका ‘समान मासिक किश्तों’ पर प्रभाव
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
- भारत एवं चीन के बीच नियंत्रण रेखा के समीप हवाई क्षेत्र के उल्लंघन पर वार्ता
- रक्षा और रेलवे अस्पतालों में नए आयुष विंग की स्थापना
- ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ के लाभ और संबंधित चिंताएं
- फसल बीमा योजनाएं
सामान्य अध्ययन–II
विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।
अविवाहित महिलाओं के लिए “दैहिक स्वायत्तता’ एवं एमटीपी अधिनियम
(नोट: यूपीएससी एमटीपी एक्ट आदि के प्रावधानों के बारे में पूछ सकता है।
संदर्भ:
हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने ‘गर्भ के चिकित्सकीय समापन’ अधिनियम (Medical Termination of Pregnancy, Act – MTP Act) के तहत अविवाहित महिलाओं को ‘शारीरिक स्वायत्तता’ हासिल करने में मदद करने के लिए फैसला सुनाया है।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा है, कि अदालत 51 साल पुराने गर्भपात कानून की प्रतिबंधात्मक पकड़ को शिथिल करने पर विचार कर सकती है। उक्त क़ानून के तहत अविवाहित महिलाओं को 24 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने पर रोक लगायी गयी है।
- अदालत के अनुसार, यह प्रावधान स्पष्ट रूप से मनमाना और महिलाओं के ‘दैहिक स्वायत्तता और गरिमा’ के अधिकार का उल्लंघन करता है।
- जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ और जेबी पारदीवाला की पीठ द्वारा सुनाए जाने वाले इस फैसले के परिणामस्वरूप- अविवाहित महिलाओं को, परिवार नियोजन उपकरणों की विफलता के कारण मानसिक रूप से टूटने की कगार पर पहुँच जाने वाली 20 सप्ताह से कम गर्भावस्था वाली पीड़ित महिलाओं के बराबर समझा जाएगा।
पृष्ठभूमि:
अविवाहित महिलाओं के लिए भी समान स्थितियां:
- अदालत के अनुसार, क़ानून में निर्धारित नियमों के तहत, सात विशिष्ट श्रेणियों में 24 सप्ताह तक गर्भावस्था की समाप्ति के लिए योग्य माने जाने हेतु महिलाओं की सात श्रेणियों– जैसेकि ‘बलात्कार-पीड़ित, नाबालिग, वैवाहिक स्थिति में बदलाव (विवाहित से तलाकशुदा), आदि – को निर्धारित किया गया है।
- अदालत के अनुसार, इस बात की पूरी संभावना है, कि 20 सप्ताह से अधिक गर्भावस्था वाली अविवाहित महिलाओं को भी इसी तरह की संवेदनशील स्थिति में गर्भधारण करना पड़ा हो।
विवाहित एवं गैर-विवाहित स्थिति में गर्भावस्था:
- अधिनियम में किए गए एक संशोधन के द्वारा ‘पति’ शब्द को हटाकर ‘पार्टनर’ कर दिया गया था। यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कानून के दायरे में ‘अविवाहित महिलाएं’ भी शामिल हैं।
- अतः, प्रस्तुत विधेयक में विवाहित एवं गैर-विवाहित दोनों स्थितियों में गर्भधारण करने वाली महिलाओं का ध्यान रखा गया है।
- विवाहित और अविवाहित दोनों स्थितियों में महिलाओं के लिए ‘चिकित्सीय जोखिम समान होता है।
- इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा महिलाओं को गर्भपात कराने की अनुमति दी गयी है।
MTP अधिनियम की धारा 3:
- ‘गर्भ के चिकित्सकीय समापन’ अधिनियम, 1971 (Medical Termination of Pregnancy – MTP Act, 1971) की धारा 3 के तहत, “परिवार नियोजन उपायों की विफलता” के कारण गर्भ धारण करने वाली 20 सप्ताह से कम अवधि की गर्भवती महिलाओं को, पंजीकृत चिकित्सक द्वारा गर्भ समापन करने की अनुमति दी गयी है।
- कानून के अनुसार, ऐसे अवांछित गर्भ के कारण होने वाले ‘मनस्ताप’ को गर्भवती स्त्री के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट माना जाएगा।
इंस्टा लिंक्स:
मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) संशोधन अधिनियम, 2021
अभ्यास प्रश्न:
हालांकि, स्वतंत्रता के बाद के भारत में महिलाओं ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है, फिर भी, महिलाओं और नारीवादी आंदोलन के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक रहा है। महिला शिक्षा और महिला सशक्तिकरण योजनाओं के अलावा, कौन से हस्तक्षेप इस परिवेश को बदलने में मदद कर सकते हैं? (यूपीएससी 2021)
स्रोत: द हिंदू
विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
आपराधिक मामलों में सांसदों का विशेषाधिकार लागू नहीं होता है: राज्यसभा सभापति
नोट: यूपीएससी, संसद सत्र आदि के दौरान सांसदों से संवैधानिक विशेषाधिकारों के बारे में पूछ सकता है।
संदर्भ:
हाल ही में, राज्यसभा के सभापति ने सदन में स्पष्ट करते हए कहा है, कि “सांसदों को सत्र के दौरान या किसी अन्य समय, किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार होने से कोई छूट प्राप्त नहीं होती है”।
- आपराधिक मामलों में, संसद सदस्य (सांसद) “एक आम नागरिक की तुलना में एक अलग स्थिति में नहीं होते हैं”।
- सभापति ने यह टिप्पणी, सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा सदन में ‘सत्र के दौरान उन्हें प्रवर्तन निदेशालय द्वारा तलब किए जाने’ के संबंध में मुद्दा उठाने पर की गयी थी।
महत्वपूर्ण बिंदु:
अनुच्छेद 105: संविधान के अनुच्छेद 105 के तहत, संसद सदस्यों को कुछ विशेषाधिकार (Privileges) प्रदान किए गए हैं ताकि वे अपने संसदीय कर्तव्यों को बिना किसी बाधा या बाधा के निभा सकें।
- इनमे से एक विशेषाधिकार यह है, कि संसद सदस्य को किसी भी ‘दीवानी मामले’ (Civil Case) में संसद सत्र या समिति की बैठक शुरू होने से 40 दिन पहले और उसके 40 दिन बाद तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है।
- यह विशेषाधिकार ‘सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908’ की धारा 135A में पहले से ही शामिल है।
विशेषाधिकारों के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण निर्णय:
- डॉ ज़ाकिर हुसैन मामला (1966): 1966 में डॉ जाकिर हुसैन ने यह उल्लेख किया था कि “संसद के सदस्यों को कुछ विशेषाधिकार प्राप्त होते हैं ताकि वे अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें”।
- ‘के आनंदन नांबियार और अन्य’ मामला: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने माना, कि वास्तविक संवैधानिक स्थिति यह है कि जहां तक ‘संरोध’ या ‘हिरासत में लिए जाने’ (Detention) के एक वैध आदेश का संबंध है, एक संसद सदस्य एक सामान्य नागरिक की तुलना में किसी विशेष स्थिति का दावा नहीं कर सकता है, और इस प्रकार वह सत्र के दौरान भी गिरफ्तार किए जाने, हिरासत में लिए जाने या पूछताछ किए जाने के लिए आम नागरिक की भांति उत्तरदायी है।
- ‘केरल राज्य बनाम के. अजित और अन्य’ मामला: सुप्रीम कोर्ट ने ‘केरल राज्य बनाम के. अजित और अन्य’ मामले में कहा, कि “विशेषाधिकार और उन्मुक्तियां देश के सामान्य कानून से छूट का दावा करने के लिए प्रवेश द्वार नहीं हैं, विशेष रूप से जैसा कि इस मामले में, आपराधिक कानून, जो प्रत्येक नागरिक द्वारा की गए कार्रवाईयों को नियंत्रित करते हैं।
इंस्टा लिंक्स:
अभ्यास प्रश्न:
राष्ट्रीय विधि निर्माता के रूप में व्यक्तिगत रूप से सांसद की भूमिका घट रही है, जिसने बदले में, बहस की गुणवत्ता और उनके परिणामों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। विचार-विमर्श कीजिए। (यूपीएससी 2019)
स्रोत: द प्रिंट
विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।
संसद के मानसून सत्र में ‘विद्युत संशोधन विधेयक’, 2022
संदर्भ:
विद्युत मंत्री के अनुसार, सरकार ‘विद्युत (संशोधन) विधेयक’, 2022 (Electricity (Amendment) Bill 2022) को लेकर तैयार है और इसे संसद के वर्तमान में जारी मानसून सत्र में विधेयक पेश करेगी।
- हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा विद्युत (संशोधन) विधेयक को मंजूरी दी गई थी। यह विधेयक ‘खुदरा बिजली वितरण’ में प्रतिस्पर्धा की शुरुआत करेगा।
- अन्य परिवर्तनों के अलावा, ‘विद्युत अधिनियम’ में संशोधन, ‘राज्य विद्युत नियामक आयोगों’ को ‘शुल्कों’ में समय पर संशोधन करने की अनुमति देगा।
- ‘कार्बन बचत प्रमाण पत्र’ जारी करके स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करने जैसे परिवर्तनों को लागू करने के लिए विधेयक में ‘विद्युत संरक्षण अधिनियम’, 2001 में संशोधन करने का प्रस्ताव किया गया है। इस अधिनियम को पिछली बार वर्ष 2010 में संशोधित किया गया था।
प्रमुख प्रस्तावित संशोधन:
- गैर-जीवाश्म स्रोतों का उपयोग: ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2022 (Energy Conservation (Amendment) Bill, 2022) में ‘हरित हाइड्रोजन’ और ‘हरित अमोनिया’ के उपयोग के साथ-साथ ‘ऊर्जा और फीडस्टॉक’ के लिए बायोमास और इथेनॉल सहित गैर-जीवाश्म स्रोतों के उपयोग को अनिवार्य करने का प्रावधान किया गया है।
- अक्षय ऊर्जा का हिस्सा: औद्योगिक इकाइयों या किसी प्रतिष्ठान द्वारा उपभोग की जाने वाली नवीकरणीय / अक्षय ऊर्जा के न्यूनतम हिस्से को परिभाषित किया गया है।
- यह खपत / उपभोग सीधे अक्षय ऊर्जा स्रोत से, या परोक्ष रूप से पावर ग्रिड के माध्यम से की जा सकती है।
- स्वच्छ ऊर्जा के लिए प्रोत्साहन: ‘कार्बन बचत प्रमाण पत्र’ जारी करके स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग के प्रयासों को प्रोत्साहित करना।
- निजी क्षेत्र को ‘जलवायु कार्रवाई’ के लिए आकर्षित करने हेतु स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग के लिए ‘कार्बन क्रेडिट’ जैसे अतिरिक्त प्रोत्साहनों पर विचार करना।
- संबंधित संस्थानों का सुदृढीकरण बनाना: अधिनियम के तहत मूल रूप से स्थापित संस्थानों, जैसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो, को सुदृढ़ बनाना।
- ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा देना: उद्योगों द्वारा उपयोग किए जाने वाले जीवाश्म ईंधन के विकल्प के रूप में ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा देना।
- संरक्षण मानकों के दायरे का विस्तार: स्थायी आवासों को बढ़ावा देने के लिए ऊर्जा संरक्षण मानकों के तहत बड़े आवासीय भवनों को शामिल करना।
- वर्तमान में केवल बड़े उद्योग और उनके भवन ही अधिनियम के दायरे में आते हैं।
विद्युत संरक्षण अधिनियम 2001:
- ऊर्जा दक्षता मानदंड: केंद्र सरकार को, 100 किलोवाट (kW) से अधिक कनेक्टेड लोड या 15 किलोवोल्ट-एम्पीयर (kVA) से अधिक की संविदात्मक मांग वाले उपकरणों, औद्योगिक उपकरणों और भवनों के लिए ऊर्जा दक्षता के मानदंडों और मानकों को निर्दिष्ट करने के लिए अधिकार प्रदान किया गया है।
- ऊर्जा दक्षता ब्यूरो: अधिनियम के तहत ‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’ (Bureau of Energy Efficiency – BEE) की स्थापना की गयी है।
- 2010 के संशोधन के द्वारा ‘‘ऊर्जा दक्षता ब्यूरो’ के महानिदेशक के कार्यकाल को तीन से बढ़ाकर पांच साल कर दिया गया है।
- यह ब्यूरो, विभिन्न उद्योगों की बिजली खपत की निगरानी और समीक्षा करने हेतु ऊर्जा लेखा परीक्षकों के लिए आवश्यक योग्यताएं निर्दिष्ट कर सकता है।
- ऊर्जा व्यापार: सरकार, अपनी अधिकतम आवंटित ऊर्जा से कम खपत करने वाले उद्योगों को ‘ऊर्जा बचत प्रमाण पत्र’ जारी कर सकती है।
- हालांकि, यह प्रमाणपत्र, अपनी अधिकतम अनुमत ऊर्जा सीमा से अधिक खपत करने वाले ग्राहकों को बेचा जा सकता है। इस प्रकार यह प्रावधान ‘ऊर्जा व्यापार’ के लिए एक ढांचा प्रदान करता है।
- निर्दिष्ट मानदंडों के अनुरूप होने तक निषेध: अधिनियम में, केंद्र सरकार को, छह महीने / एक वर्ष पहले जारी किए गए निर्दिष्ट मानदंडों के अनुरूप न होने तक, किसी विशेष उपकरण के निर्माण, बिक्री, खरीद या आयात को प्रतिबंधित करने की अनुमति प्रदान की गयी है।
- जुर्माना: जो उपभोक्ता अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं, उन्हें उनकी अधिक खपत के अनुसार दंडित किया जाएगा।
- केंद्र या राज्य सरकार द्वारा पारित ऐसे किसी भी आदेश के खिलाफ किसी भी अपील की सुनवाई ‘विद्युत् अधिनियम, 2003’ के तहत पहले से स्थापित अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा की जाएगी।
इंस्टा लिंक्स:
अभ्यास प्रश्न:
नवंबर, 2021 में ग्लासगो में आयोजित COP26 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन के ‘वर्ल्ड लीडर्स समिट’ में शुरू की गई ‘ग्रीन ग्रिड पहल’ के उद्देश्य की व्याख्या कीजिए। यह विचार पहली बार अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) में कब लाया गया था? (UPSC 2021)
स्रोत: लाइव मिंट
विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।
मंकीपॉक्स टास्क फोर्स द्वारा स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने हेतु सिफारिश
संदर्भ: विशेषज्ञों की ‘मंकीपॉक्स टास्क फोर्स’ ने स्वदेशी वैक्सीन विकसित करने के लिए अनुसंधान संबंधी बुनियादी ढांचे को विकसित करने की सिफारिश की है।
- भारत में मंकीपॉक्स वायरस के कम से कम आठ मामलों की रिपोर्ट आने के बाद, केंद्र सरकार द्वारा गठित विशेषज्ञों की एक टास्क फोर्स ने स्वदेशी वैक्सीन तैयार करने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को विकसित करने हेतु ‘अनुसंधान’ के लिए निधि देने की योजना तैयार की है।
- ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा ‘मंकीपॉक्स प्रकोप’ को ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित किया जा चुका है, यद्यपि, WHO की एक बैठक में विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति व्यक्त की है, कि ‘मंकीपॉक्स’ बीमारी के लिए तत्काल सामूहिक टीकाकरण की आवश्यकता नहीं है।
पृष्ठभूमि:
मंकीपॉक्स के लिए JYNNEOS टीका: एक डेनिश बायोटेक कंपनी ‘बवेरियन नॉर्डिक’ (Bavarian Nordic) द्वारा चेचक का ‘JYNNEOS’ नामक एक टीका विकसित किया किया गया है। लोगों की सुरक्षा में इस्तेमाल करने हेतु मंकीपॉक्स के खिलाफ प्रभावशीलता के लिए इस टीके का प्रयोगशाला में परीक्षण किया जा चुका है, और इसे ‘यूनाइटेड स्टेट्स फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन’ द्वारा अनुमोदित किया गया है।
- विशिष्ट ज्ञान की कमी: SARS-CoV2 के मामले में, वायरस के जीनोम का तेजी से विश्लेषण और व्याख्या की गई, जिससे वैज्ञानिकों ने स्वस्थ फेफड़ों की कोशिकाओं को संक्रमित करने में स्पाइक प्रोटीन द्वारा निभाई जाने वाली केंद्रीय भूमिका का पता लगाया था।
- इस जानकारी ने बाद में विकसित किए जाने वाले टीकों के आधार के रूप में कार्य किया, हालांकि इन नए टीकों में विभिन्न तरीकों को अपनाया गया।
- मंकीपॉक्स के संभावित टीके के लिए ‘विशिष्ट ज्ञान’ का यह स्तर अभी तक उपलब्ध नहीं है।
- और, इस बीमारी से निपटने के लिए मौजूद पुराने टीके, आधुनिक मानकों द्वारा स्वीकार्य नहीं हैं। पुराने चेचक के टीकों में एक ‘जोखिम प्रोफ़ाइल’ होती है, जोकि आधुनिक मानकों द्वारा स्वीकार्य नहीं होगी।
- इसके टीके को विकसित करने के लिए एक ‘मृत-वायरस’ (killed-virus) का इस्तेमाल सबसे आसान तरीका है क्योंकि इसके बारे में हमें जानकारी हैं, हालांकि हम अभी तक नहीं जानते हैं कि यह मंकीपॉक्स के लिए कितना प्रभावी होगा।
- 85% जीनोम मिलान: अधिकारियों के अनुसार, भारतीय स्ट्रेन के जीनोमिक अनुक्रम का विश्व स्तर पर परिसंचारी पश्चिम अफ्रीकी स्ट्रेन के साथ 99.85% मेल खाता है।
मंकीपॉक्स:
मंकीपॉक्स (Monkeypox) वायरस, पॉक्सविरिडे फैमिली (Poxviridae Family) में ऑर्थोपॉक्सवायरस जीनस (Orthopoxvirus Genus) का सदस्य है। इस वायरस को बंदरों में चेचक जैसी बीमारी के रूप में पहचाना जाता है, इसलिये इसे मंकीपॉक्स नाम दिया गया है। यह नाइजीरिया की स्थानिक बीमारी है।
- ‘मंकीपॉक्स’ एक ज़ूनोटिक रोग (Zoonotic Disease) है अर्थात जानवरों से मनुष्यों में संचरण होने वाला रोग है।
- गिलहरी, गैम्बियन शिकार चूहों, डॉर्मिस और बंदरों की कुछ प्रजातियों में मंकीपॉक्स वायरस के संक्रमण का पता चला है।
- मंकीपॉक्स, चेचक के समान लक्षण पैदा करता है, हालांकि वे कम गंभीर होते हैं।
- 1980 में टीकाकरण से दुनिया भर में चेचक का उन्मूलन हो गया, जबकि मध्य और पश्चिम अफ्रीका के देशों में मंकीपॉक्स का प्रकोप जारी है, और कभी-कभी यह अन्य जगहों पर भी दिखाई देता है।
इंस्टा लिंक्स:
अभ्यास प्रश्न:
‘अनुप्रयुक्त जैव प्रौद्योगिकी’ (applied biotechnology) में अनुसंधान और विकासात्मक उपलब्धियां क्या हैं? ये उपलब्धियां समाज के गरीब तबके के उत्थान में कैसे मदद करेंगी? (यूपीएससी 2021)
स्रोत: द हिंदू
सामान्य अध्ययन–III
विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।
आरबीआई की नवीनतम दर वृद्धि और इसका ‘समान मासिक किश्तों’ पर प्रभाव
संदर्भ:
चूंकि, देश में मुद्रास्फीति ऊंचे स्तर पर बनी हुई है, और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 6 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर है, इसके देखते हुए हाल ही में, ‘मौद्रिक नीति समिति’ (MPC) ने सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो दर को तत्काल प्रभाव से 50 आधार अंक बढ़ाकर 5.4 प्रतिशत करने का निर्णय लिया। परिणामस्वरूप, स्थायी जमा सुविधा (एसडीएफ) दर 5.15 प्रतिशत; तथा सीमांत स्थायी सुविधा (एमएसएफ़) दर और बैंक दर 5.65 प्रतिशत पर समायोजित की गई है।
- इससे मौजूदा होम लोन ग्राहकों के लिए ‘ऋण दरों’ और ‘समान मासिक किश्तों’ (Equated Monthly Installment – EMIs) में वृद्धि होगी।
- जबकि आरबीआई गवर्नर ने ‘वित्त वर्ष 23’ के लिए 7.2 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि को बनाए रखा है, और वर्ष 2022-23 के लिए मुद्रास्फीति 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है।
आरबीआई द्वारा रेपो रेट को 50 बीपीएस से बढ़ाकर 5.4% करने का कारण:
- मुद्रास्फीति, ऊपरी सीमा से ऊपर रहने की संभावना को देखते हुए, ‘मौद्रिक नीति समिति’ (MPC) ने निर्णय लिया कि मुद्रास्फीति की उम्मीदों को स्थिर रखने और दूसरे दौर के प्रभावों को शामिल करने के लिए मौद्रिक निभाव को अंशशोधित रूप से वापस लेने की आवश्यकता है। तदनुसार, MPC ने नीतिगत रेपो दर को 50 आधार अंकों से बढ़ाकर 5.4 प्रतिशत करने का निर्णय लिया है।
- MPC ने निभाव को वापस लेने पर ध्यान केंद्रित करने का निर्णय लिया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मुद्रास्फीति, आगे संवृद्धि का समर्थन करते हुए लक्ष्य के भीतर बनी रहे।
- वैश्विक बाजारों में अस्थिरता: अप्रैल में, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (consumer price index – CPI) अपने उछाल से कम हुआ है, लेकिन असुविधाजनक रूप से उच्च, और 6 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बना हुआ है।
- ‘कोर मुद्रास्फीति’ ऊंचे स्तर पर बनी हुई है और इसका वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव मुद्रा सहित घरेलू बाजारों पर असर पड़ रहा है।
बाहरी कारक भारत को किस प्रकार प्रभावित करेंगे?
मुद्रास्फीति प्रक्षेपवक्रपर प्रभाव: मुद्रास्फीति प्रक्षेपवक्र (Inflation Trajectory) वैश्विक बाजारों और भू-राजनीतिक विकास पर निर्भर करेगा।
- जिंसों / वस्तुओं (Commodity) की कीमतों में कुछ कमी आई है और वैश्विक खाद्य कीमतों में नरमी आई है।
- उन्नत घरेलू मुद्रास्फीति: जबकि घरेलू मुद्रास्फीति में वृद्धि की उम्मीद कम हुई है, यह ऊंचे स्तर पर बनी हुई है।
- यदि मानसून सामान्य रहता है, और वर्ष के लिए कच्चे तेल की औसत कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल रहती है, तो 2022-23 में मुद्रास्फीति 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है।
- मंदी के जोखिम के बारे में आईएमएफ के मुख्य विचार: ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ ने मंदी के जोखिम और संशोधित वैश्विक विकास को उजागर किया है, इसके अनुसार- उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं के लिए जोखिम बढ़ गए हैं क्योंकि उनके पास घरेलू मुद्रास्फीति संबंधी चिंताएं हैं और दुनिया भर में मौद्रिक नीतियों को सख्त किए जाने के प्रभाव का सामना भी करना होगा।
- उच्च मुद्रास्फीति और अस्थिर वित्तीय बाजार: भारतीय अर्थव्यवस्था, वैश्विक आर्थिक स्थिति से प्रभावित हुई है। हम उच्च मुद्रास्फीति से जूझ रहे हैं और हमारा वित्तीय बाजार अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है।”
इंस्टा लिंक्स:
अभ्यास प्रश्न:
क्या आप इस बात से सहमत हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने हाल ही में सुधार का अनुभव किया है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए। (यूपीएससी 2021)
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
भारत एवं चीन के बीच नियंत्रण रेखा के समीप हवाई क्षेत्र के उल्लंघन पर वार्ता
संदर्भ:
भारत और चीन ने ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (Line of Actual Control – LAC) पर हवाई क्षेत्र के प्रबंधन और हवाई क्षेत्र के उल्लंघन से बचने के लिए बेहतर समझ स्थापित करने के तरीकों पर चर्चा की।
- इस सप्ताह की शुरुआत में, पूर्वी लद्दाख में जमीनी स्तर पर आयोजित होने वाली नियमित ‘विश्वास निर्माण उपाय’ (Confidence Building Measures – CBM) वार्ता के दौरान इस पर चर्चा की गई थी।
- 1996 के ‘भारत-चीन सीमा क्षेत्र में LAC के समीप शांति बनाए रखने पर समझौते’ के अनुसार, “लड़ाकू विमान (लड़ाकू, बमवर्षक, टोही, सैन्य प्रशिक्षक, सशस्त्र हेलीकॉप्टर और अन्य सशस्त्र विमान शामिल करने के लिए) ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ के 10 किमी के भीतर उड़ान नहीं भरेंगे।
रक्षा और रेलवे अस्पतालों में नए आयुष विंग की स्थापना
संदर्भ:
हाल ही में, आयुष मंत्रालय द्वारा पांच रेलवे अस्पतालों में आयुष प्रणाली की शुरुआत के लिए रेल मंत्रालय के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए किए गए है, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता और गुवाहाटी में 5 रेलवे क्षेत्रीय अस्पतालों में आयुष इकाइयों की स्थापना की जाएगी।
- आयुष मंत्रालय द्वारा रक्षा मंत्रालय के साथ सहयोग पर समझौता किया गया है, जिसके तहत 12 सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (Armed Force Medical Services – AFMS) अस्पतालों और 37 छावनी बोर्ड अस्पतालों में आयुर्वेद ओपीडी की स्थापना हुई है।
- ये आयुष केंद्र जून 2022 के पहले सप्ताह से सफलतापूर्वक परिचालित हो रहे हैं।
आयुष मंत्रालय द्वारा ‘चिकित्सा मूल्य यात्रा की चैंपियन सेवा क्षेत्र योजना’ (Champion Services Sector Scheme for Medical Value Travel) नामक एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना शुरू की गयी है।
इस योजना के तीन घटक हैं:
- आयुष सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल / डेकेयर सेंटर की स्थापना
- आयुष क्षेत्र में कौशल विकास
- आयुष ग्रिड की स्थापना।
आयुष मंत्रालय की ‘आयुर्स्वास्थ्य योजना’ (Ayurswasthya Yojana):
यह एक एक केंद्रीय क्षेत्रक योजना है।
- इस योजना के तहत, सुविधा-केंद्रों का ‘उत्कृष्टता-केंद्रों (Center of Excellence – CoE) में उन्नयन किया जा रहा है।
- ‘उत्कृष्टता-केंद्र (CoE) घटक का मुख्य उद्देश्य- शिक्षा, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान और नवाचार और आयुष के प्रचार के लिए आवश्यक अन्य क्षेत्रों में आयुष पेशेवरों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों के कार्यों और सुविधाओं दोनों की स्थापना और उन्नयन में सहयोग करना है।
‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ के लाभ और संबंधित चिंताएं
संदर्भ:
नीति आयोग (पूर्ववर्ती योजना आयोग) द्वारा 2016 में “किसानों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य की प्रभावशीलता” शीर्षक से एक अध्ययन-रिपोर्ट जारी की गयी थी।
- अध्ययन में पाया गया, कि अन्य बातों के अलावा, सरकार द्वारा घोषित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (Minimum Support Price – MSP) ने अध्ययन के अंतर्गत आने वाले 78 प्रतिशत किसानों को, खेती के उन्नत तरीकों जैसे कि बीज की अधिक उपज देने वाली किस्मों, जैविक खाद, रासायनिक उर्वरक, कीटनाशकों और उन्नत खेती, कटाई आदि के तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया है।
- सरकार, भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य एजेंसियों के माध्यम से धान और गेहूं के लिए मूल्य समर्थन प्रदान करती है।
- इसके अतिरिक्त,’ प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान’ (PM-AASHA) की अंब्रेला योजना की ‘मूल्य समर्थन योजना’ के तहत पंजीकृत किसानों से ‘उचित औसत गुणवत्ता’ (Fair Average Quality – FAQ) के तिलहन, दालें और खोपरा की खरीद निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार की जाती है।
न्यूनतम समर्थन मूल्य:
‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) वह दर है, जिस पर सरकार किसानों से अनाज खरीदती है। इससे किसानों को कीमतों में उतार-चढ़ाव सहन करने में मदद मिलती है और बुनियादी न्यूनतम आय सुनिश्चित होती है।
MSP में शामिल फसलें:
वर्तमान में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति, खरीफ और रबी, दोनों मौसमों में उगाई जाने वाली 23 फसलों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ निर्धारित करती है।
इन अनिवार्य फसलों में, खरीफ मौसम की 14 फसलें, रबी की 6 फसलें और 2 अन्य वाणिज्यिक फसलें शामिल हैं।
- 14 खरीफ फसलें: धान, ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, अरहर/अरहर, मूंग, उड़द, मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, तिल, नाइजरसीड, कपास।
- छह रबी फसलें: (गेहूं, जौ, चना, मसूर/मसूर, रेपसीड और सरसों, और सूरजमुखी।
- दो व्यावसायिक फसलें: जूट और खोपरा।
फसल बीमा योजनाएं
संदर्भ: राष्ट्रीय फसल बीमा पोर्टल (NCIP), प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के लिए नामांकन का एकमात्र स्रोत है। इस पोर्टल पर बैंकों/वित्तीय संस्थानों सहित विभिन्न नामित स्रोतों से किसान आवेदन दर्ज किए जाते हैं।
प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना:
जनवरी 2016 में शुरू की गई प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY), खराब मौसमी परिघटनाओं के कारण फसलों को होने वाले नुकसान के लिए बीमा सुरक्षा प्रदान करती है।
- वन नेशन – वन स्कीम थीम के अनुरूप इस योजना में, पूर्ववर्ती ‘राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ (NAIS) और ‘संशोधित राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना’ (MNAIS) का विलय कर दिया गया है।
- इस योजना उद्देश्य किसानों पर प्रीमियम का बोझ कम करना और पूर्ण बीमित राशि के लिए फसल बीमा दावे का शीघ्र निपटान सुनिश्चित करना है।
विस्तार:
- सभी खाद्य और तिलहन फसलें और वार्षिक वाणिज्यिक/बागवानी फसलें, जिनके लिए पिछली उपज के आंकड़े उपलब्ध हैं।
प्रीमियम:
- इस योजना के तहत, सभी रबी फसलों के लिए किसानों को प्रीमियम का 1.5% तथा सभी खरीफ फसलों के लिए 2% भुगतान करना होता हैं, और शेष राशि का भुगतान राज्य और केंद्र सरकार द्वारा किया जाता है।
- वार्षिक वाणिज्यिक और बागवानी फसलों के मामले में किसानों के लिए 5% प्रीमियम दर निर्धारित है।













