Print Friendly, PDF & Email

[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 25 July 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

  1. पक्षपातपूर्ण मीडिया एवं एजेंडा संचालित बहसों की लोकतंत्र को कमजोर में भूमिका
  2. भारतीय अंटार्कटिक विधेयक 2022 पारित
  3. म्यांमार के खिलाफ नरसंहार के मामले में अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का नवीनतम फैसला

सामान्य अध्ययन-III

  1. बैंक का राष्ट्रीयकरण: गलती या मास्टरस्ट्रोक?

मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री

  1. विषमलैंगिकतावाद
  2. राज्य सरकार द्वारा शुरू की गयी पहल: गुजरात

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. तटीय अपरदन
  2. जैव अर्थव्यवस्था
  3. मंकीपॉक्स, अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित
  4. प्रवासी राजा तितलियां, आधिकारिक तौर पर ‘लुप्तप्राय’ घोषित
  5. भारत द्वारा ‘संयुक्त थिएटर कमांड’ का गठन

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।

पक्षपातपूर्ण मीडिया एवं एजेंडा संचालित बहसों की लोकतंत्र को कमजोर में भूमिका

संदर्भ: भारत के मुख्य न्यायाधीश ने मीडिया संबंधी चिंताओं को उजागर करते हुए कहा है कि “आधी-अधूरी जानकारी और एजेंडा से चलने वाली बहसें” तथा “पक्षपातपूर्ण नजरिए” लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं।

न्यायपालिका का महत्व: न्यायपालिका “संविधान में प्राण फूंकने वाला अंग है। विधायी और कार्यकारी कार्यों की न्यायिक समीक्षा, संवैधानिक योजना का एक अभिन्न भाग है। यह भारतीय संविधान का दिल और आत्मा है।”

अन्य चिंताएं:

  • जजों का मीडिया ट्रायल: ‘न्याय करना’ आसान जिम्मेदारी नहीं है। कई बार मीडिया में भी, खासकर सोशल मीडिया पर जजों के खिलाफ आयोजित अभियान चलाए जाते हैं।
  • नए मीडिया उपकरणों में किसी भी मामले का ‘व्यापक विस्तार’ करने की क्षमता होती है, लेकिन ये मीडिया उपकरण सही और गलत, अच्छे और बुरे, और असली और नकली के बीच अंतर करने में असमर्थ होते हैं। मीडिया ट्रायल, मामलों को तय करने में ‘मार्गदर्शक कारक’ नहीं हो सकते हैं।
  • कोई जवाबदेही नहीं: प्रिंट मीडिया अभी भी कुछ हद तक जवाबदेह है। जबकि, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की कोई जवाबदेही नहीं होती है क्योंकि यह जो दिखाता है वह हवा में गायब हो जाता है। सोशल मीडिया इससे भी बदतर है।
  • कोई सुरक्षा नहीं: राजनेताओं, नौकरशाहों, पुलिस अधिकारियों और अन्य जन प्रतिनिधियों को उनकी नौकरी की संवेदनशीलता के कारण सेवानिवृत्ति के बाद भी अक्सर सुरक्षा प्रदान की जाती है। विडंबना यह है कि न्यायाधीशों को इसी तरह की सुरक्षा नहीं दी जाती है।
  • न्यायनिर्णयन संबंधी मुद्दे: वर्तमान में न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ‘निर्णय के लिए मामलों को प्राथमिकता देना’ है क्योंकि न्यायाधीश सामाजिक वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंद सकते हैं।
  • खराब न्यायिक अवसंरचना: कुछ स्थानों पर बुनियादी ढांचे को बढ़ाने के लिए कुछ बिना सोचे-समझे प्रतिक्रियाएँ हुई हैं। हालांकि, निकट भविष्य की चुनौतियों का सामना करने के लिए न्यायपालिका को तैयार करने हेतु कोई ठोस योजना नहीं बनाई गई है।

सिफारिशें:

  • जिम्मेदार मीडिया: मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया को जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए।
  • मीडिया को “स्व-विनियमित होना चाहिए और अपने शब्दों का माप-तौल कर इस्तेमाल करना चाहिए”।
  • न्यायपालिका को मजबूत करने और न्यायाधीशों को सशक्त बनाने की आवश्यकता: न्यायाधीशों पर शारीरिक हमलों की संख्या में वृद्धि देखी जा रही है।

समाधान:

  • ‘न्यायिक आचरण का बैंगलोर सिद्धांत’ (Bangalore Principles of Judicial Conduct): इन सिद्धांतों में न्यायाधीशों को अपने आचरण में बनाए रखने वाले मूल्यों, जैसेकि स्वतंत्रता, निष्पक्षता, अखंडता, औचित्य, समानता, क्षमता और परिश्रम को स्थापित किया गया है।
  • केरल उच्च न्यायालय ने, जिला न्यायपालिका को सरकार और उसके संस्थानों, मंत्रियों और न्यायाधीशों की नीतियों और कार्यों की आलोचना करने या किसी भी मामले पर चर्चा करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग नहीं करने का निर्देश देते हुए एक ज्ञापन पारित किया है।
  • अदालतों में उपलब्ध कराए गए कंप्यूटर और इंटरनेट सिस्टम को देखने और सुरक्षित करने और सोशल मीडिया के दुरुपयोग के बारे में रिपोर्ट करने हेतु, उच्च न्यायालय के पास एक निगरानी प्रकोष्ठ होगा।
  • सोशल मीडिया के विनियमित उपयोग के लिए, भारत सरकार द्वारा ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम’ 2021 अधिसूचित किए गए हैं।
  • जर्मनी में ‘नेटवर्क प्रवर्तन अधिनियम’ (NetzDG) लागू किया गया ​​है, जिसके तहत लिए पिछले दो वर्षों से सोशल नेटवर्क मालिकों को फर्जी समाचार, अभद्र भाषा, और अन्य व्यक्तियों, या न्यायपालिका जैसे राज्य संस्थानों के खिलाफ अन्य आपराधिक पोस्ट का समाधान करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है।
  • बेहतर उपयोग के लिए सामाजिक क्षमता निर्माण की आवश्यकता: उदाहरण- डिजिटल साक्षरता, कानूनी साक्षरता और वास्तविक तथ्यों की अधिक से अधिक अंतःक्रिया, और कानूनी मिथकों का भंडाफोड़।

सोशल मीडिया और न्यायपालिका

न्यायपालिका पर सोशल मीडिया का प्रभाव

आरोपी पर प्रभाव:

आरोपी की गरिमा को नुकसान: सोशल मीडिया, आमतौर पर किसी आरोपी को एक खलनायक के रूप में चित्रित करता है, जोकि तथ्यों पर आधारित नहीं होता है, बल्कि केवल खबरों को सनसनीखेज बनाने के लिए होता है। इससे आरोपी की गरिमा को नुकसान पहुंचता है। उदाहरण: आरुषि हत्याकांड (2008) में आरुषि तलवार के माता-पिता।

मीडिया ट्रायल का मुद्दा: ‘मीडिया ट्रायल’ (Media trial), किसी मामले पर सुनवाई शुरू होने से पहले ही मीडिया द्वारा आरोपी को दोषी ठहराने के प्रयास के माध्यम से एक मामले पर टेलीविजन और प्रिंट मीडिया कवरेज के प्रभाव का वर्णन करता है।

  • मीडिया द्वारा प्रचारित किए जा रहे पक्षपातपूर्ण विचार लोगों को प्रभावित करते हैं, लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं और व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इस प्रक्रिया में न्याय वितरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  • उदाहरण: जेसिका लाल (2006), प्रियदर्शिनी मट्टू, नीतीश कटेरा और आरुषि तलवार केस (2008) की हत्या के मामलों में मीडिया का प्रभाव, जांच और न्याय में हस्तक्षेप करते देखा गया है।

पीड़ित पर प्रभाव:

पीड़ित व्यक्ति को मानसिक आघात: यौन अपराध के मामलों में, टेलीविजन पर उसके कटु अनुभवों का स्पष्ट वर्णन पीड़ित को मानसिक प्रताड़ना देता है। इससे निजता का उल्लंघन होता है, जनता की राय में पूर्वाग्रह विकसित होता है, साथ ही सजा प्रक्रिया में भी हस्तक्षेप होता है।

न्यायाधीशों पर प्रभाव:

  • जज के फैसले में विश्वास कम करता है।
  • न्यायाधीश को प्रभावित करता है। सोशल मीडिया, न्यायाधीश का ध्यान उन विवरणों की ओर आकर्षित करता है जिन्हें मामले के निर्णय में संबोधित नहीं किया जाना चाहिए और जो अवचेतन रूप से न्यायाधीश के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं।
  • भारत के ‘अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल’ माधवी दीवान ने कहा है कि “न्यायाधीशों पर दबाव डाला जा सकता है क्योंकि वे किसी और की तरह इंसान हैं”।

समाज और कानूनी व्यवस्था पर प्रभाव

  • सोशल मीडिया न्यायिक संस्थानों के लिए खतरा हैं।
  • यह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करता है
  • न्यायिक मामलों में नैतिकता और निजता का प्रभाव: एक खुली अदालती सुनवाई में, निजता की रक्षा करना, खासकर महिलाओं, बच्चों और किशोरों के लिए और उन लोगों के लिए भी जो वेब पर अपनी व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा करना नहीं जानते हैं, बहुत मुश्किल हो जाता है।

इंस्टा लिंक

सोशल मीडिया का विनियमन

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

 भारतीय अंटार्कटिक विधेयक 2022 पारित

संदर्भ: हाल ही में, अंटार्कटिक संधि (Antarctic treaty) के हस्ताक्षरकर्ता के रूप में अपने दायित्वों के तहत, भारत ने भारतीय अंटार्कटिका विधेयक, 2022 (Indian Antarctica Bill, 2022) ‘लोकसभा’ में पारित कर दिया है।

उद्देश्य: विधेयक का उद्देश्य भारत द्वारा अंटार्कटिक पर्यावरण और इस पर आश्रित व संबद्ध पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा के लिए राष्ट्रीय उपाय करना है।

इसके अन्य प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित लक्ष्यों को सुनिश्चित करना है-

  • खनन या अवैध गतिविधियों से छुटकारा पाने के साथ-साथ अंटार्कटिका क्षेत्र का विसैन्यीकरण;
  • इसका उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हो क्षेत्र में कोई परमाणु परीक्षण/विस्फोट नहीं होना चाहिए।
  • अंटार्कटिका में अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देने और क्षेत्रीय संप्रभुता संबंधी विवादों को समाप्त करना।

कानून की आवश्यकता:

  • वर्ष 1959 में हस्ताक्षरित और 1961 में लागू ‘अंटार्कटिक संधि’ के तहत, 54 हस्ताक्षरकर्ता देशों को, जिन क्षेत्रों में उनके ‘स्टेशन’ स्थित हैं, उन क्षेत्रों को नियंत्रित करने वाले कानूनों को निर्दिष्ट करना अनिवार्य किया गया है।
  • भारत 1983 से ‘अंटार्कटिका संधि’ (Antarctica Treaty) का एक हस्ताक्षरकर्ता देश है। इसलिए अंटार्कटिक के आरंभिक पर्यावरण और इसके आसपास के महासागर को संरक्षित करने के लिए एक कानून की आवश्यकता थी।

भारत, अंटार्कटिक क्षेत्र से संबंधित निम्नलिखित अन्य सगठनों का भी सदस्य है?

  1. अंटार्कटिक समुद्री जीवित संसाधन संरक्षण आयोग (Commission for Conservation of Antarctic Marine Living Resources)
  2. राष्ट्रीय अंटार्कटिक कार्यक्रम प्रबंधक परिषद (Council of Managers of National Antarctic Programme – COMNAP)
  3. अंटार्कटिका अनुसंधान वैज्ञानिक समिति (Scientific Committee of Antarctica Research – SCAR)

विधेयक के प्रमुख बिंदु:

  • प्रयोज्यता: यह विधेयक सभी भारतीयों, विदेशी नागरिकों, निगमों, फर्मों और भारत में काम कर रहे संयुक्त उद्यमों और किसी भी जहाज या विमान पर लागू होगा जो या तो भारतीय है या भारतीय अभियान का हिस्सा है।
  • केंद्रीय समिति: केंद्र सरकार अंटार्कटिका शासन और पर्यावरणीय संरक्षण समिति बनाएगी। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सचिव इस समिति के अध्यक्ष होंगे। रक्षा, विदेशी मामलों जैसे विभिन्न मंत्रालयों तथा राष्ट्रीय ध्रुवीय और महासागरीय अनुसंधान केंद्र और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय जैसे संगठनों से 10 सदस्यों को नामित किया जाएगा।
  • यह समिति, विभिन्न गतिविधियों के लिए अनुमति प्रदान करेगी तथा अंटार्कटिका के वातावरण के संरक्षण के लिए प्रासंगिक अंतरराष्ट्रीय कानूनों का कार्यान्वयन और उनके अनुपालन को सुनिश्चित करेगी।
  • यह विधेयक, बिना परमिट के अथवा प्रोटोकॉल से संबंधित किसी अन्य पार्टी की लिखित अनुमति के बिना, अंटार्कटिका के लिए किसी भारतीय अभियान या अंटार्कटिका में कुछ निश्चित क्रियाकलापों को प्रतिबंधित करता है।
  • ‘पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन’ और ‘अपशिष्ट प्रबंधन योजना’ तैयार होने के बाद ही परमिट दिया जा सकता है।
  • अंटार्कटिक कोष: विधेयक में ‘अंटार्कटिक फंड’ के नाम से एक कोष के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसे अंटार्कटिक अनुसंधान कार्य के कल्याण और अंटार्कटिक पर्यावरण की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

प्रतिबंधित गतिविधियां:

विधेयक में अंटार्कटिका में कुछ गतिविधियों को प्रतिबंधित किया गया है। इसमें निम्नलिखित शामिल हैं:

  1. परमाणु विस्फोट या रेडियोएक्टिव कचरे का निस्तारण,
  2. उपजाऊ मिट्टी को ले जाना, और
  3. समुद्र में कचरा, प्लास्टिक या समुद्री वातावरण के लिए नुकसानदेह पदार्थों को निस्तारित करना।

अपराध और सजा (भारतीय न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को अंटार्कटिका तक विस्तारित करता है):

विधेयक में प्रावधानों के उल्लंघन पर सजा भी निर्दिष्ट की गयी है। जैसेकि;

  • अंटार्कटिका में परमाणु विस्फोट करने पर 20 वर्ष की कैद की सजा हो सकती है, जोकि उम्रकैद तक बढ़ाई जा सकती है, और कम से कम 50 करोड़ रुपए का जुर्माना।
  • बिना परमिट के अंटार्कटिका में खनिज संसाधनों के लिए ड्रिलिंग करना या गैर-देशीय जानवरों या पौधों को ले जाने पर सात वर्ष तक की कैद और 10 लाख रुपए से 50 लाख रुपए तक का जुर्माना हो सकता है।

केंद्र सरकार बिल के तहत एक या एक से अधिक सत्र न्यायालयों को नामित न्यायालय के रूप में अधिसूचित कर सकती है और बिल के तहत दंडनीय अपराधों की सुनवाई के लिए अपने क्षेत्राधिकार को निर्दिष्ट कर सकती है।

‘अंटार्कटिक संधि’ के बारे में:

अंटार्कटिक महाद्वीप को केवल वैज्ञानिक अनुसंधान के लिये संरक्षित करने एवं असैन्यीकृत क्षेत्र बनाए रखने हेतु 1 दिसंबर 1959  को वाशिंगटन में 12 देशों द्वारा अंटार्कटिक संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे।

  • इन बारह मूल हस्ताक्षरकर्ता देशों में अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, चिली, फ्रांस, जापान, न्यूजीलैंड, नॉर्वे, दक्षिण अफ्रीका, सोवियत समाजवादी गणराज्य संघ, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं।
  • यह संधि 1961 में लागू हुई और वर्तमान में इसमें 54 देश शामिल हैं। भारत, वर्ष 1983 में इस संधि का सदस्य बना था।
  • मुख्यालय: ब्यूनस आयर्स, अर्जेंटीना।

इस संधि के सभी प्रयोजनों के लिए, अंटार्कटिका को 60 °S अक्षांश के दक्षिण में स्थित बर्फ से आच्छादित भूमि के रूप में परिभाषित किया गया है।

संधि के प्रमुख प्रावधान:

  1. अंटार्कटिका का उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए किया जाएगा (अनुच्छेद -I)।
  2. अंटार्कटिका में वैज्ञानिक शोध की स्वतंत्रता और इस दिशा में सहयोग जारी रहेगा (अनुच्छेद-II)।
  3. अंटार्कटिका से वैज्ञानिक प्रेक्षणों और परिणामों का आदान-प्रदान किया जाएगा और इन्हें स्वतंत्र रूप से उपलब्ध कराया जाएगा (अनुच्छेद – III)।
  4. अनुच्छेद IV के द्वारा, क्षेत्रीय संप्रभुता को निष्प्रभावी रहेगी अर्थात् किसी देश द्वारा इस पर कोई नया दावा करने या मौजूदा दावे का विस्तार नहीं किया जाएगा।
  5. इस संधि के द्वारा इस महाद्वीप पर किसी भी देश द्वारा किए जाने वाले दावेदारी संबंधी सभी विवादों पर रोक लगा दी गई।

 

भारत का अंटार्कटिक कार्यक्रम

  • दक्षिण गंगोत्री: यह पहला भारतीय वैज्ञानिक अनुसंधान बेस स्टेशन था। अब सिर्फ एक आपूर्ति बेस के रूप में कार्य करता है।
  • मैत्री (1989 में समाप्त): शिरमाकर ओएसिस के पास स्थित। भारत ने इसके चारों ओर एक मीठे पानी की झील भी बनाई है जिसे प्रियदर्शिनी झील कहा जाता है।
  • भारती (2012): अनुसंधान केंद्र।
  • सागर निधि (2008) : यह अंटार्कटिक जल को नेविगेट करने वाला पहला भारतीय पोत है।

नोडल एजेंसी: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत वर्ष 1998 में स्थापित ‘राष्ट्रीय अंटार्कटिक और महासागर अनुसंधान केंद्र’ (National Centre for Antarctic and Ocean Research – NCPOR)।

अभ्यास प्रश्न:

अंटार्कटिक संधि के उद्देश्यों की चर्चा कीजिए। क्या यह आज भी प्रासंगिक है? विचार-विमर्श कीजिए। (15 अंक)

स्रोत: द हिंदू

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

नरसंहार के मामले में म्यांमार के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय का नवीनतम फैसला

संदर्भ:

रोहिंग्या विद्रोही समूह के हमले के बाद म्यांमार की सेना ने 2017 में रखाइन राज्य में एक सफाया अभियान शुरू किया था। सेना के उत्पीड़न और अत्याचारों से बचने के लिए 700,000 से अधिक रोहिंग्या पड़ोसी देशों बांग्लादेश में पलायन कर गए। म्यांमार के सुरक्षा बलों पर सामूहिक बलात्कार, हत्याओं और हजारों रोहिंग्या घरों में आग लगाने का आरोप लगाया गया है।

  • रोहिंग्याओं के साथ इस व्यवहार पर अंतरराष्ट्रीय आक्रोश के बीच, ‘गाम्बिया’ ने नवंबर 2019 में ‘विश्व अदालत’ में मामला दायर किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि म्यांमार द्वारा ‘नरसंहार अभिसमय’ (Genocide Convention) का उल्लंघन किया जा रहा है।
  • अब तक, द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से दुनिया भर में ‘नरसंहार’ के केवल तीन मामलों – कंबोडिया (1970 के दशक के अंत में), रवांडा (1994), और सेरेब्रेनिका, बोस्निया (1995) – को मान्यता दी गई है।

‘अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ (ICJ) के बारे में:

  • अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय’ (International Court of JusticeICJ)  की स्थापना वर्ष 1945  में संयुक्त राष्ट्र के एक चार्टर द्वारा की गई थी और इसके द्वारा अप्रैल 1946 में कार्य आरंभ किया गया था।
  • यह संयुक्त राष्ट्र का प्रमुख न्यायिक अंग है तथा हेग (नीदरलैंड) के ‘पीस पैलेस’ में स्थित है।
  • यह, संयुक्त युक्त राष्ट्र के छह प्रमुख संस्थानों के विपरीत एकमात्र संस्थान है जो न्यूयॉर्क में स्थित नहीं है।
  • यह राष्ट्रों के बीच कानूनी विवादों का निपटारा करता है और अधिकृत संयुक्त राष्ट्र के अंगों तथा विशेष एजेंसियों द्वारा इसके लिए निर्दिष्ट किये गए कानूनी प्रश्नों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार सलाह देता है।

‘नरसंहार अभिसमय (Genocide Convention):

नरसंहार के अपराध की रोकथाम और सजा पर अभिसमय (Convention on the Prevention and Punishment of the Crime of Genocide – Genocide Convention) अंतरराष्ट्रीय कानून की एक लखित  या लेखपत्र (instrument) है जिसे पहली बार ‘नरसंहार के अपराध’ के लिए संहिताबद्ध किया गया था।

‘नरसंहार अभिसमय’ के अनुसार, नरसंहार एक ऐसा अपराध है, जो युद्ध के समय और साथ ही शांति के समय दोनों में हो सकता है।

  • ‘नरसंहार अभिसमय’, 9 दिसंबर 1948 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा अपनाई गई पहली ‘मानवाधिकार संधि’ थी और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किए गए अत्याचारों के बाद ‘ऐसा फिर कभी नहीं’ के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
  • अभिसमय में निर्धारित ‘नरसंहार के अपराध’ की परिभाषा को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर व्यापक रूप से अपनाया गया है, जिसमें 1998 में ‘अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय’ (International Criminal Court – ICC) की रोम संविधि भी शामिल है।
  • रोम संविधि (Rome Statute) के तहत चार प्रमुख अंतरराष्ट्रीय अपराधों – नरसंहार, मानवता के खिलाफ अपराध, युद्ध अपराध और आक्रामकता का अपराध – को निर्धारित किया गया है। ये अपराध “सीमाओं के किसी क़ानून के अधीन नहीं होंगे”।
  • महत्वपूर्ण रूप से, अभिसमय में नरसंहार के अपराध को रोकने और दंडित करने के लिए उपाय करने का दायित्व पक्षकार देशों पर निर्धारित किया गया है, जिसमें प्रासंगिक कानून बनाना और अपराधियों को दंडित करना शामिल है, “चाहे वे संवैधानिक रूप से जिम्मेदार शासक, सार्वजनिक अधिकारी या निजी व्यक्ति हों” (अनुच्छेद IV) ।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

टैग: अंतर्राष्ट्रीय संबंध

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, औद्योगिक नीति में परिवर्तन तथा औद्योगिक विकास पर इनका प्रभाव।

बैंक का राष्ट्रीयकरण: गलती या मास्टरस्ट्रोक?

संदर्भ: प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण किए जाने की 53वीं वर्षगांठ। सरकार, संसद के मौजूदा सत्र में एक ‘विधायी बदलाव’ लाएगी ताकि वह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण कर सके।

(यह आर्टिकल केवल ‘मुख्य परीक्षा’ के परिप्रेक्ष्य से तैयार किया जाना चाहिए।)

राष्ट्रीयकरण:

‘राष्ट्रीयकरण’ (Nationalization) वह प्रक्रिया होती है, जिसमें किसी देश या राज्य की सरकार किसी विशिष्ट कंपनी या उद्योग का नियंत्रण अपने अधीन कर लेती है। 1967 के बाद की अवधि में क्रांतिकारी आर्थिक नीतियों की एक श्रृंखला, जैसे कि 14 सबसे बड़े वाणिज्यिक बैंकों (1969), बीमा (1972), कोयला उद्योग (1973) का राष्ट्रीयकरण, थोक गेहूं के व्यापार का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास (1973), ‘बीमार’ कंपनियों का अधिग्रहण आदि देखी गई।

कई अर्थशास्त्रियों के अनुसार, इन निर्णयों का दीर्घकालिक प्रभाव अब उभरते हुए बैंकिंग संकट, अक्षम कोयला क्षेत्र, और खराब बीमा पहुँच (2019 में 3.76%; दुनिया में सबसे कम में से एक) के रूप में महसूस किया जा रहा है।

 

वर्ष 1969 के बैंक राष्ट्रीयकरण का उद्देश्य: सरकार ने कुछ निजी कारोबारियों से नियंत्रण छीनने और ग्रामीण भारत में बैंकिंग कवरेज का विस्तार करने का लक्ष्य रखा ताकि कृषि और छोटे उद्योगों जैसे क्षेत्रों को बेहतर ऋण सुविधाएं मिल सकें, इस प्रकार उद्यमियों का एक नया वर्ग तैयार हो सके।

1970 के दशक का राष्ट्रीयकरण एक गलत कदम था क्योंकि इसके कारण:

  • अक्षमता को जन्म देने वाली संरचनात्मक विशेषताओं का उदय: ‘आयात-प्रतिस्थापन-औद्योगीकरण’ (Import-Substitution-Industrialization: ISI) और ‘लाइसेंस कोटा राज’ के साथ राष्ट्रीयकरण की रणनीति ने उद्यमिता और नवाचार को दबा दिया।
  • राष्ट्रीयकरण ने सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्रों के बीच ‘कम प्रतिस्पर्धा’ को जन्म दिया, इसने फिर से सार्वजनिक उपक्रमों के कामकाज में नौकरशाही के रवैये, नई पहलों और जिम्मेदारी की कमी, लोकलुभावन उपायों का दबाव, गैर-जिम्मेदार ट्रेड यूनियनवाद, लालफीताशाही आदि को जन्म दिया।

भारत उत्पादन के अंतर्राष्ट्रीयकरणमें पिछड़ गया: भारत की राष्ट्रीयकरण नीति और ‘संरक्षणवादी’ अंतर्मुखी अर्थव्यवस्था’,  वैश्वीकरण का लाभ उठाने में विफल रही, जबकि ‘वैश्वीकरण’ की वजह से पूर्वी एशिया में चमत्कारिक अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण हुआ।

  • भारत की नीतियों का परिणाम यह रहा कि, 1980 में भारत का निर्यात 4% (1948) से घटकर 0.42 रह गया।

राजकोषीय सावधानी का क्षरण: सब्सिडी और अनुदानों के प्रसार, दक्षता या उत्पादन से कोई संबंध नहीं होने पर भी वेतन में वृद्धि, ओवरस्टाफिंग, और अन्य ‘लोकलुभावन उपायों’ के कारण सरकारी खर्च बढ़ता रहा।

‘निष्पादन लेखापरीक्षा’ (performance audit) की कमी के कारण, सार्वजनिक बैंकों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से प्राप्त ‘वित्त’ बड़े जनहित को पूरा करने में विफल रहा।

वर्तमान प्रभाव:

  • ‘गैर-निष्पादित आस्ति’ संकट (NPA crisis) को, 1970 और 80 के दशक के बैंकों के राष्ट्रीयकरण की विरासत माना जाता है। सरकारी स्वामित्व और राजनीतिक हस्तक्षेप ने बैंकों की जवाबदेही को कम कर दिया और बारह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (public-sector banks- PSBs) ने 47 लाख करोड़ रुपये का सकल ‘गैर-निष्पादित आस्तियों’ (NPA) को दर्ज किया, जो कि, 2020 में 19 निजी बैंकों के NPA के दोगुने से अधिक था।
  • इसके अलावा, राष्ट्रीयकृत बैंक या तो घाटे में चल रहे हैं या गिरते लाभांश का सामना कर रहे हैं।
  • बीमा क्षेत्र, कम पैठ (भारत में समग्र बीमा पैठ का केवल 76%), सार्वजनिक क्षेत्र का एकाधिकार, निम्न गैर-जीवन बीमा (1% से कम), और सार्वजनिक क्षेत्र के बीमाकर्ताओं के ‘खराब वित्तीय स्वास्थ्य’ के मुद्दों का सामना कर रहा है।
  • सरकार अभी भी सभी राष्ट्रीयकृत ‘बीमार’ सार्वजनिक उपक्रमों को बंद नहीं कर पाई है, जिससे करदाताओं का पैसा खत्म हो रहा है।
  • नायक समिति की रिपोर्ट (2014): सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की, खराब वित्तीय स्थिति, चयन प्रक्रिया से समझौता और गैर-पारदर्शी, उच्च एनपीए, कमजोर बोर्ड प्रशासन है।
  • बैंक राष्ट्रीयकरण की आर्थिक सर्वेक्षण समीक्षा (2020): ‘सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों’ में निवेश किए गए करदाताओं के पैसे का प्रत्येक रुपया केवल 71 पैसे का बाजार मूल्य प्राप्त करता है। इसके विपरीत निजी क्षेत्र के बैंकों का बाजार मूल्य 70 रुपये है।
  • फोन बैंकिंग” का मुद्दा: सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अधिकारियों को ऋण देने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जबकि ऐसे ऋणों के कोई ‘आर्थिक मायने’ नहीं होते हैं।
  • आर्थिक सर्वेक्षण 2020 में बताया गया है कि अधिकाँश सरकारी स्वामित्व के कारण, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को रणनीतिक और परिचालन स्वतंत्रता कम प्राप्त होती है।

हालाँकि, राष्ट्रीयकरण ने भारतीय अर्थव्यवस्था की मदद की क्योंकि इससे:

  • ग्रामीण क्षेत्रों और अविकसित क्षेत्रों में बैंकिंग की उच्च पैठ: वर्ष 1969 में केवल 8,262 बैंक शाखाओं से यह संख्या वर्ष 1979 में बढ़कर 30,303 हो गई।
  • बैंकों द्वारा उदार ऋण उपलब्धता ने भारत की विकास प्रक्रिया – विशेष रूप से हरित क्रांति के दौरान – को आगे बढ़ाया।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए ऋण बीस गुना बढ़कर, 115 करोड़ रुपये से बढ़कर 3,000 करोड़ रुपये हो गया, जो बीस गुना वृद्धि है।
  • 1969 के राष्ट्रीयकरण के बाद ग्रामीण बैंक जमा संग्रहण और ग्रामीण ऋण दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
  • प्राथमिकता-क्षेत्रक ऋण: अर्थात कृषि, सूक्ष्म और लघु उद्यमों, शिक्षा, आवास और “कमजोर” वर्गों के लिए ‘बैंकों के शुद्ध बैंक ऋण’ का 40% अलग निर्धारित करना।
  • घरेलू बचत: घरेलू बचत और निवेश की दर 1950 के दशक में 10% से तेजी से बढ़कर 1980 के दशक में 20% हो गई।
  • कोयला जैसे कुछ क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के एकाधिकार का अंत: भारत में कोयला उद्योग के राष्ट्रीयकरण के बाद, भारत में 1991 तक कभी भी मांग-आपूर्ति का अंतर नहीं देखा गया।
  • सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश: हाल के वर्षों में सरकारी और अन्य अनुमोदित प्रतिभूतियों में बैंकों के निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
  • भुगतान संतुलन में सुधार: राष्ट्रीयकरण के बाद भुगतान संतुलन की स्थिति में काफी सुधार हुआ, क्योंकि हरित क्रांति के कारण खाद्य और अन्य आयातों में कमी आई। 1978-79 तक, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर लगभग 3 बिलियन डॉलर के शिखर पर पहुंच गया था।
  • रोजगार के अवसरों में वृद्धि: सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के व्यापक विस्तार ने रोजगार के अवसर पैदा किए, जिससे देश में बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं को रोजगार मिला।
  • “JAM त्रियी” की सफलता: JAM का मतलब जन-धन, आधार और मोबाइल नंबर है। यदि देश में केवल निजी बैंक होते और कोई सार्वजनिक क्षेत्र का बैंक नहीं होता तो यह पहल शुरू नहीं होती।
  • कुल 46 करोड़ लाभार्थियों में से केवल 3 करोड़ के खाते निजी क्षेत्र के बैंकों में हैं – जो कि कुल खातों का मात्र 2.82% है।

इस प्रकार, वैचारिक रूप से राष्ट्रीयकरण एक अच्छा विचार था क्योंकि इसने धन के पुनर्वितरण, रोजगार सृजन और वित्तीय समावेशन पर जोर दिया। हालांकि, दक्षता में सुधार और PSUs को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए थे जैसा कि चीन ने किया था।

इंस्टा लिंक

बैंकों का राष्ट्रीयकरण

अभ्यास प्रश्न:

कौन से कारक बैंकों के राष्ट्रीयकरण  किए जाने हेतु उत्तरदायी थे? आर्थिक विकास और रोजगार सृजन पर इसके प्रभाव का परीक्षण कीजिए। (15एम)

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस

 


मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री


विषमलैंगिकतावाद

संदर्भ: भारत में, ‘विषमलैंगिकतावाद’ (Heteropessimism) का एक हालिया उदाहरण, दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध बनाने के लिए एक याचिका पर सुनवाई करने के दौरान, ट्विटर पर #MarriageStrike ट्रेंड करने वाले पुरुष हैं।

  • लेखक आसा सेरेसिन द्वारा 2019 में गढ़ा गया, ‘विषमलैंगिकतावाद’ विषमलैंगिक संबंधों की स्थिति में निराशा, शर्मिंदगी या निराशा का एक दृष्टिकोण है ।
  • ‘विषमलैंगिकतावाद’ को उन लोगों द्वारा विषमलैंगिक संबंधों के प्रति नापसंदगी की सार्वजनिक घोषणा के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो उन रिश्तों में बने रहते हैं। विषमलैंगिकतावाद एक नकारात्मक दृष्टिकोण का वर्णन करता है जो विषमलैंगिक संस्कृति में व्याप्त है, कई पुरुषों और महिलाओं के भीतर जो इसे सह-निर्माण करते हैं।
  • ‘विषमलैंगिकतावाद’ को पितृसत्ता, लिंग असमानता, महिलाओं पर गृहकार्य का अनुचित बोझ और पुरुषों पर ‘प्रदाता और रक्षक’ भूमिकाओं के दबाव से उपजे बड़े सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक धाराओं के कारण आकार दिया गया है।

राज्य सरकार द्वारा शुरू की गयी पहल: गुजरात

हाल ही में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कई परियोजनाओं का उद्घाटन किया और कई अन्य योजनाओं की आधारशिला रखी।

  • TRINETRA- राज्य स्तरीय कमान और नियंत्रण केंद्र
  • e-FIR: मोबाइल या दोपहिया चोरी जैसे अपराधों के लिए ‘ई-एफआईआर’ सेवा।
  • ये डिजिटल गवर्नेंस की ओर उठाए गए कदम हैं।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


तटीय अपरदन

संदर्भ: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (MoES) के अनुसार भारत के समुद्र तट का 34% हिस्सा कटाव या अपरदन (Erosion) के अधीन है। पश्चिम बंगाल को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है जहाँ इसके तट का 60.5% हिस्सा ‘कटाव’ की वजह से खतरे में है।

परिभाषा: तटीय अपरदन (Coastal Erosion) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा स्थानीय समुद्र-स्तर में वृद्धि, प्रबल लहरों का प्रभाव, और तटीय बाढ़- जो तट के साथ चट्टानों, मिट्टी और/या रेत को अपने साथ बहा ले जाती है।

प्रक्रिया: तटीय अपरदन की चार मुख्य प्रक्रियाएं हैं। ये संक्षारण (Corrosion), अपघर्षण (Abrasion), जलीय अभिक्रियाएँ और सन्निघर्षण (Attrition) हैं।

एजेंसी: पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अधीन ‘राष्ट्रीय तटीय अनुसंधान केंद्र’ (NCCR) 1990 से तटरेखाओं की निगरानी कर रहा है।

तटीय अपरदन का प्रभाव: जैव विविधता और आवास का विनाश, उपजाऊ भूमि की हानि, पर्यटन की हानि, आदि।

शमन:

  • तटीय अपरदन संरचनाएं जैसे ‘समुद्र को रोकने की दीवार’ (Seawalls), पुश्ता दीवारी (Revetments), भित्ति (Bulkheads), श्रोणि या कच्छ (Groins) और तरंगरोध (Breakwaters) अल्पावधि में अपरदन को कम कर सकते हैं।
  • भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) ने संपूर्ण तटरेखा के लिए ‘तटीय सुभेद्यता सूचकांक’ (Coastal Vulnerability Index – CVI) मानचित्रों का एक एटलस तैयार और प्रकाशित किया है।
  • एकीकृत तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजना (ICZM): यह तटीय प्राकृतिक संसाधनों का इष्टतम उपयुक्त उपयोग सुनिश्चित करती है
  • राष्ट्रीय सतत तटीय प्रबंधन केंद्र (NSCSCM): तटीय संसाधनों और पर्यावरण सहित CZM के क्षेत्रों पर शोध करना।

 

जैव अर्थव्यवस्था

संदर्भ: हाल ही में, जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (BIRAC) ने ‘भारतीय जैव-अर्थव्यवस्था रिपोर्ट’ 2022 (Indian Bio-economy Report, 2022 – IBER) जारी की है।

  • परिभाषा: FAO के अनुसार, जैव अर्थव्यवस्था (Bioeconomy), “एक सतत अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ने के उद्देश्य से जैविक संसाधनों का उत्पादन, उपयोग और संरक्षण” है।
  • उद्देश्य: इसका अंतिम उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा करना, प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से बचना और जैव विविधता को बढ़ाना है।
  • उदाहरण: बायोप्लास्टिक, जैव ईंधन, बायोडिग्रेडेबल कपड़े, बायोमास (ऊर्जा के लिए), प्राकृतिक खेती (भोजन के लिए) आदि।
  • रिपोर्ट के निष्कर्ष: भारत में जैव अर्थव्यवस्था का आकार 80 अरब अमेरिकी डॉलर है।
  • भारत की पहल: जैव अर्थव्यवस्था पर राष्ट्रीय मिशन (2016); राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन (उद्योग + बायोफार्मा में स्वदेशी निर्माण के लिए अकादमिक); बायो-इनक्यूबेटर्स (स्टार्टअप); बायो-क्लस्टर (जैसे एनसीआर, बैंगलोर, पुणे आदि); इथेनॉल सम्मिश्रण लक्ष्य; जैव ईंधन पर राष्ट्रीय नीति।

मंकीपॉक्स, अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल घोषित

हाल ही में, ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने मंकीपॉक्स को ‘अंतरराष्ट्रीय चिंता का सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल’ (public health emergency of international concern – PHEIC) घोषित कर दिया है।

  • PHEIC वैश्विक स्वास्थ्य निकाय द्वारा जारी किया जाने वाला उच्चतम स्तर का अलर्ट है।
  • मंकीपॉक्स से पहले केवल पोलियो और SARS-CoV-2 को PHEIC घोषित किया गया था।

 

प्रवासी राजा तितलियां, आधिकारिक तौर पर ‘लुप्तप्राय’ घोषित

हाल ही में, प्रवासी राजा तितलियों (Monarch Butterflies) को  आधिकारिक तौर पर ‘लुप्तप्राय’ घोषित कर दिया गया है।

‘अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति के संरक्षण संघ’ (IUCN) के अनुसार, इसके किए पर्यावास विनाश और जलवायु परिवर्तन सबसे बड़े योगदानकर्ता हैं।

  • राजा या मोनार्क (Monarchs), तितली की सबसे अधिक पहचानी जाने वाली प्रजाति एवं महत्वपूर्ण परागणकर्ता हैं। यह प्रजाति वैश्विक खाद्य श्रंखला को बनाए रखने जैसी विभिन्न पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएं प्रदान करती है।
  • ये तितलियाँ एक अनूठी जीवन शैली का पालन करती हैं: वे साल में दो बार अमेरिकी महाद्वीप की लंबाई और चौड़ाई को पार करती हैं, विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों से प्राप्त मधु पर दावत देती हैं। लेकिन वे केवल एक विशेष पौधे – ‘मिल्कवीड’ में प्रजनन करते हैं।

 

भारत द्वारा ‘संयुक्त थिएटर कमांड’ का गठन

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सशस्त्र बलों के बीच समन्वय बढ़ाने के लिए तीनों सेनाओं के ‘संयुक्त थिएटर कमांड’ (Joint Theatre Commands) की स्थापना की घोषणा की है।

रक्षा मंत्री ने यह भी कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े रक्षा उपकरणों के आयातक से एक निर्यातक के रूप में तेजी से आगे बढ़ रहा है।

‘ज्वाइंट थिएटर कमांड’ के बारे में:

एक एकीकृत या संयुक्त थिएटर कमांड के तहत, भौगोलिक थिएटरों (क्षेत्रों) के लिए – जो सामरिक और सुरक्षा संबंधी चिंता का विषय हैं – एक कमांडर के अधीन तीनों सेनाओं की एकीकृत कमान की परिकल्पना की गयी है।

  • इस तरह के बल का कमांडर अपने नियंत्रण में सभी संसाधनों – सेना, भारतीय वायु सेना और नौसेना से – निर्बाध प्रभावकारिता के साथ उपयोग करने में सक्षम होगा।
  • ‘एकीकृत थिएटर कमांडर’ व्यक्तिगत सेवाओं के प्रति जवाबदेह नहीं होगा।
  • तीनों सेनाओं के एकीकरण और एकता से संसाधनों के दोहराव से बचा जा सकेगा। प्रत्येक सेवा के तहत उपलब्ध संसाधन अन्य सेवाओं के लिए भी उपलब्ध होंगे।
  • रक्षा प्रतिष्ठान में एकता को मजबूत करते हुए सेवाओं को एक दूसरे को बेहतर तरीके से जानने का मौका मिलेगा।
  • शेकतकर समिति ने 3 एकीकृत थिएटर कमांड – उत्तरी चीन सीमा के लिए, पश्चिमी पाकिस्तान सीमा के लिए, और दक्षिणी समुद्री भूमिका के लिए- बनाने की सिफारिश की है।