विषयसूची
सामान्य अध्ययन-I
- अल्लूरी सीताराम राजू
सामान्य अध्ययन-II
- सरकारी भोजन कार्यक्रमों में प्रोटीन और पोषक तत्वों को बढ़ावा देने की आवश्यकता: समिति
- भारत के पेटेंट कानून संरक्षोपाय विवादों के घेरे में
- राष्ट्रीय जांच एजेंसी की कार्यप्रणाली
- भारतीयों को विदेश में बसे रिश्तेदारों से ₹10 लाख तक प्राप्त करने की अनुमति
सामान्य अध्ययन-III
- संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC): लिस्बन घोषणा
- पौधों में नाइट्रेट अवशोषण को विनियमित करने का नया तरीका
मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (नैतिकता/निबंध)
- विभिन्न उदाहरण जो मुख्य परीक्षा में उपयोग किए जा सकते हैं
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
- कर्नाटक का लोककथा विश्वविद्यालय
- मयूरभंज के सुपरफूड ‘चींटी की चटनी’ (काई की चटनी) के लिए जीआई टैग की मांग
- भारत की डिजिटल पहल पर डेटा बिंदु:
- प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम का औपचारिककरण (PMFME) योजना
- स्थानिक ट्रांसक्रिपटॉमिक्स
- 2021 में भारत के जीव डेटाबेस में 540 प्रजातियाँ और वनस्पतियों में 315 प्रजातियाँ शामिल
- ऑपरेशन “नार्कोस”
सामान्य अध्ययन–I
विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।
अल्लूरी सीताराम राजू
संदर्भ:
पीएम मोदी ‘अल्लूरी सीताराम राजू’ (Alluri Sitarama Raju) की 125वीं जयंती पर साल भर चलने वाले समारोह का शुभारंभ करेंगे, जिससे नई पीढ़ी ‘अल्लूरी’ की वीरता और आदिवासी समुदाय के लिए उनके द्वारा किए गए बलिदानों से अवगत हो सके।
अल्लूरी सीताराम राजू: परिचय
- अल्लूरी सीताराम राजू (1897 – 1924), भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ एक सशस्त्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले एक महान भारतीय क्रांतिकारी थे।
- ‘अल्लूरी सीताराम राजू’ को उनकी वीरता के लिए स्थानीय ग्रामीणों द्वारा उन्हें ‘मान्यम वीरुडु’ (Manyam Veerudu), या ‘वन नायक’ की उपाधि प्रदान की गयी।
प्रमुख कार्य:
- वर्तमान ‘आंध्र प्रदेश’ में जन्मे, अल्लूरी सीताराम राजू ‘मद्रास वन अधिनियम’, 1882 को लागू किए जाने पर ‘ब्रिटिश राज के खिलाफ गतिविधियों’ में शामिल हो गए।
- इस कानून के तहत आदिवासियों की उनके ही वनों में मुक्त आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। इस अधिनियम के लागू से, आदिवासी समुदाय ‘पारंपरिक पोडु कृषि पद्धति’ के तहत खेती नहीं कर पा रहे थे। ‘पोडु कृषि पद्धति’ (Podu agricultural system) में ‘झूम खेती’ शामिल होती है।
- प्रारंभ में, सीताराम राजू ने गांधी के असहयोग आंदोलन के प्रभाव में, आदिवासियों को स्थानीय पंचायत अदालतों में न्याय मांगने और औपनिवेशिक अदालतों का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया।
- इन्होने वर्ष 1922 के ‘रम्पा विद्रोह’/ ‘मान्यम विद्रोह’ का नेतृत्व किया।
- मृत्यु: इस सशस्त्र ‘रम्पा विद्रोह’ का अंत वर्ष 1924 में एक हिंसक कारवाई के साथ हुआ, जिसमे ‘सीताराम राजू’ को ब्रिटिश सिपाहियों के पकड़ कर पेड़ से बांध दिया, और एक फायरिंग दस्ते द्वारा उसे गोली मार दी गई।
रंपा (रम्पा) विद्रोह (1922-24):
वर्ष 1922 का ‘रम्पा विद्रोह’, (Rampa Rebellion) जिसे ‘मान्यम विद्रोह’ (Manyam Rebellion) के रूप में भी जाना जाता है, ब्रिटिश भारत के अधीन ‘मद्रास प्रेसीडेंसी’ की गोदावरी शाखा में ‘अल्लूरी सीताराम राजू’ के नेतृत्व में एक शुरू किया गया आदिवासी विद्रोह था। यह विद्रोह अगस्त 1922 में शुरू हुआ और मई 1924 में ‘राजू’ को कैद करने और उसकी हत्या किए जाने तक जारी रहा।
‘रम्पा प्रशासनिक क्षेत्र’ में लगभग 28,000 आदिवासी आबादी निवास करती थी। वनों को साफ करने के लिए पारित ‘मद्रास वन अधिनियम, 1882’, ने आदिवासी समुदायों के वनों में मुक्त आवाजाही पर रोक लगा दी थी और उन्हें अपनी पारंपरिक ‘पोडु कृषि प्रणाली’ अपनाने से प्रतिबंधित कर दिया था।
उनकी विरासत:
- ‘अल्लूरी सीताराम राजू’ ने अपने पीछे ‘साम्राज्यवाद विरोधी विद्रोह’ की प्रेरक विरासत छोड़ी है।
- आंध्र प्रदेश सरकार हर साल उनकी जन्म तिथि, 4 जुलाई को राज्य उत्सव के रूप में मनाती है।
उनके मूल्य/ मान्यताएं:
- देशभक्ति: देशभक्ति की वह चिंगारी जिसे उन्होंने और देश भर के कई अन्य ‘नायकों’ ने प्रबल किया है और वह हम सभी के भीतर अभी भी पनप रही है।
- बलिदान: अंग्रेजों की रीढ़ तक ठंडक पहुंचाने के बाद, इस उग्र क्रांतिकारी ने 1924 में 27 साल की छोटी उम्र में मातृभूमि की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
- स्वतंत्रता के लिए प्रतिबद्धता: अल्लूरी सीताराम राजू और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों से देश के युवाओं को बलिदान की भावना और स्वतंत्रता के प्रति अटूट प्रतिबद्धता सीखनी चाहिए।
स्रोत: द न्यू इंडियन एक्सप्रेस
सामान्य अध्ययन–II
विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।
सरकारी भोजन कार्यक्रमों में प्रोटीन और पोषक तत्वों को बढ़ावा देने की आवश्यकता: समिति
संदर्भ:
हाल ही में, एक अंतर-मंत्रालयी समिति ने ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ (NFSA), 2013 के तहत स्कूलों और आंगनवाड़ी में ‘खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों’ के माध्यम से दिए जाने वाले भोजन में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे अंडे को कानूनी रूप से अनिवार्य किए जाने की सिफारिश की है।
- अत्यधिक अल्पपोषण (Acute undernutrition): कोविड-19 महामारी ने भारत में ‘अल्पपोषण’ के “ख़ामोश संकट” के और गंभीर होने की संभावना है।
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार- “अधिकांश राज्यों में बाल कुपोषण, नाटेपन और दुर्बलता की दर” में वृद्धि के साथ-साथ गर्भवती महिलाओं और प्रजनन क्षमता आयु-वर्ग वाले लोगों में रक्ताल्पता (एनीमिया) के प्रसार में वृद्धि हो रही है।“
- वर्तमान में, पूरक पोषण की लागत ‘राज्य’ वहन करते हैं: उदाहरण के लिए- 13 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में “अतिरिक्त खाद्य पदार्थों” के हिस्से के रूप में मध्याह्न भोजन में अंडे परोसे जाते हैं।
समिति की रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:
- प्रोटीन युक्त भोजन: रिपोर्ट में प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थ जैसे अंडे, सूखे मेवे और ‘फलियां’, साथ ही कैल्शियम, आयरन, जिंक, फोलेट और विटामिन ए जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों को भोजन में शामिल करने की सिफारिश की गई है।
- रिपोर्ट में कहा गया है कि जो लोग अंडे का सेवन नहीं करते हैं, उन्हें “सूखे मेवे और अंकुरित अनाज’ को प्रस्तावित मात्रा से दोगुना प्रदान किया जा सकता है।
- ‘सूक्ष्म पोषक तत्वों’ को शामिल करने के लिए NFSA में बदलाव की आवश्यकता: ‘राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ की अनुसूची II में मध्याह्न भोजन, पीएम पोषण और एकीकृत बाल विकास सेवा योजना (ICDS) जैसे सरकारी खाद्य सुरक्षा कार्यक्रमों के लिए ‘पोषण मानकों’ को निर्धारित किया गया है। वर्तमान में, इसमें केवल कैलोरी और प्रोटीन के संदर्भ में प्रति भोजन पोषण की मात्रा निर्धारित की गयी है, लेकिन अंतर-मंत्रालयी पैनल ने ‘सूक्ष्म पोषक तत्वों’ को भी ध्यान में रखने के लिए कहा है।
‘एकीकृत बाल विकास सेवा योजना’ (Integrated Child Development Services Scheme – ICDS) में छह महीने से छह साल की उम्र के बच्चों और गर्भवती / स्तनपान कराने वाली माताओं को शामिल किया गया है।
‘पीएम पोषण योजना’ में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में निम्न प्राथमिक कक्षाओं, उच्च प्राथमिक कक्षाओं के छात्र शामिल हैं।
NFSA में अनुशंसित अन्य परिवर्तन:
- नीति आयोग के प्रस्ताव: नीति आयोग ने सुझाव दिया है कि राष्ट्रीय ग्रामीण और शहरी कवरेज अनुपात को मौजूदा 75-50 से घटाकर 60-40 किया जाए, इससे समाज के हाशिए पर पड़े गरीब वर्ग पर अधिक ध्यान देने के साथ-साथ ‘सब्सिडी’ लागत में कमी आएगी। साथ ही योजना को उसके इच्छित लाभार्थी पर फिर से केंद्रित किया जाए।
- जहां तक कीमतों का सवाल है, ‘एक समान दरों’ (flat rates) की मौजूदा व्यवस्था को ‘स्लैब सिस्टम’ से बदला जाना चाहिए।
- खाद्य टोकरी का विस्तार: पीडीएस को मजबूत किया जाना चाहिए और बाजरा, दाल और तेल को शामिल करने के लिए ‘खाद्य टोकरी’ (food basket) को बढ़ाया जा सकता है। यह निश्चित रूप से छिपी हुई भूखमरी के मुद्दे को संबोधित करने में मदद कर सकता है।
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) में बताए गए ‘जीवन चक्र दृष्टिकोण’ पर ध्यान दिया जाए, विशेष रूप से ‘बच्चे के जीवन के पहले हजार दिनों में’ जब बच्चे की संज्ञानात्मक क्षमताओं को आकार दिया जाता है।
- ‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ के पूर्ण कार्यान्वयन से यह सुनिश्चित होगा कि सभी लाभार्थी विशेष रूप से प्रवासी अपनी पसंद की किसी भी पीडीएस दुकान से देश भर में पीडीएस का उपयोग कर सकते हैं।
- NFSA के तहत विकलांगता को मानदंड के रूप में शामिल करना: NFSA की धारा 38 में कहा गया है कि केंद्र सरकार समय-समय पर अधिनियम के प्रावधानों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए राज्य सरकारों को निर्देश दे सकती है।
- सभी राज्यों में ‘एकीकृत पीडीएस प्रबंधन’ (Integrated Management of PDS – IMPDS) के दायरे का विस्तार किया जाए।
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013:
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (National Food Security Act- NFSA) 2013 का उद्देश्य एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए लोगों को वहनीय मूल्यों पर अच्छी गुणवत्ता के खाद्यान्न की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध कराते हुए उन्हें मानव जीवन-चक्र दृष्टिकोण में खाद्य और पौषणिक सुरक्षा प्रदान करना है।
अधिनियम के प्रमुख बिंदु:
- लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के तहत कवरेज और पात्रता: TPDS के अंतर्गत 5 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति माह की एक-समान हकदारी के साथ 75% ग्रामीण आबादी और 50% शहरी आबादी को कवर किया जाएगा। हालांकि, मौजूदा अंत्योदय अन्न योजना (AAY) में सम्मिलित निर्धनतम परिवारों की 35 किलोग्राम प्रति परिवार प्रति माह की हकदारी सुनिश्चित रखी जाएगी।
- टीपीडीएस के अंतर्गत राजसहायता प्राप्त मूल्य और उनमें संशोधन: इस अधिनियम के लागू होने की तारीख से 3 वर्ष की अवधि के लिए टीपीडीएस के अंतर्गत खाद्यान्न अर्थात् चावल, गेहूं और मोटा अनाज क्रमश: 3/2/1 रूपए प्रति किलोग्राम के राजसहायता प्राप्त मूल्य पर उपलब्ध कराया जाएगा। तदुपरान्त इन मूल्यों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ उचित रूप से जोड़ा जाएगा।
- परिवारों की पहचान: टीपीडीएस के अंतर्गत प्रत्येक राज्य के लिए निर्धारित कवरेज के दायरे में पात्र परिवारों की पहचान संबंधी कार्य राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों द्वारा किया जाएगा।
- महिलाओं और बच्चों के लिए पोषण सहायता: गर्भवती महिलाएं और स्तनपान कराने वाली माताएं तथा 6 माह से लेकर 14 वर्ष तक की आयु वर्ग के बच्चे एकीकृत बाल विकास सेवाओं (आईसीडीएस) और मध्याह्न भोजन (एमडीएम) स्कीमों के अंतर्गत निर्धारित पौषणिक मानदण्डों के अनुसार भोजन के हकदार होंगे । 6 वर्ष की आयु तक के कुपोषित बच्चों के लिए उच्च स्तर के पोषण संबंधी मानदण्ड निर्धारित किए गए हैं।
- महिलाओं और बच्चों को पोषण संबंधी सहायता: 6 महीने से 14 वर्ष की आयु के बच्चों और गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को एकीकृत बाल विकास सेवा (ICDS) और मिड-डे मील (MDM) योजनाओं के तहत निर्धारित पोषण मानदंडों के अनुसार भोजन का अधिकार होगा। 6 वर्ष की आयु तक के कुपोषित बच्चों के लिए उच्च पोषण मानदंड निर्धारित किये गए है।
- मातृत्व लाभ: गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को 6,000 रु. का मातृत्व लाभ भी प्रदान किया जाएगा।
- महिला सशक्तीकरण: राशन कार्ड जारी करने के उद्देश्य से, परिवार में 18 वर्ष या उससे अधिक आयु की महिला को परिवार का मुखिया माना जाएगा।
- शिकायत निवारण तंत्र: जिला और राज्य स्तर पर शिकायत निवारण तंत्र उपलब्ध कराया जाएगा।
- खाद्यान्न की रखरखाव व परिवहन लागत तथा उचित मूल्य की दुकान (FPS) व्यापारियों का लाभ: राज्य के भीतर खाद्यान्न के परिवहन पर खर्च, इसके रखरखाव तथा उचित मूल्य की दुकान (FPS) व्यापारियों के लाभ को इस प्रयोजन हेतु तैयार किए गए मानदंडों के अनुसार निर्धारित किया जाएगा, तथा उपरोक्त व्यय को पूरा करने के राज्यों केंद्र सरकार द्वारा सहायता प्रदान की जाएगी।
- पारदर्शिता और जवाबदेही: पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने हेतु, पीडीएस, सामाजिक लेखापरीक्षा और सतर्कता समितियों के गठन से संबंधित रिकॉर्ड को दिखाए जाने संबंधी प्रावधान किए गए हैं।
- खाद्य सुरक्षा भत्ता: उपयुक्त खाद्यान्न अथवा भोजन की आपूर्ति नहीं होने की स्थिति में, लाभार्थियों के लिए खाद्य सुरक्षा भत्ता का प्रावधान किया गया है।
- दंड अथवा जुर्माना: यदि कोई लोक सेवक या प्राधिकरण, जिला शिकायत निवारण अधिकारी द्वारा अनुशंसित राहत सहायता प्रदान करने में विफल रहता है, तो प्रावधान के अनुसार राज्य खाद्य आयोग द्वारा जुर्माना लगाया जाएगा।
इंस्टा लिंक:
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण
अभ्यास प्रश्न:
हाशिए पर पड़े वर्गों के बीच अब तक भूख मिटाने में चिंता के कारण के रूप में ‘ICDS और NFSA हस्तक्षेपों में कमियों’ पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस
विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।
भारत के पेटेंट कानून संरक्षोपाय विवादों के घेरे में
संदर्भ:
प्रधान मंत्री की ‘आर्थिक सलाहकार परिषद’ (Economic Advisory Council) द्वारा किसी पेटेंट आवेदन को जनता द्वारा चुनौती देने के लिए निर्धारित अवधि, इसके प्रकाशन की तारीख से केवल छह महीने तक सीमित करने की सिफारिश की गयी है।
- पृष्ठभूमि: वर्ष 2005 में, विधि-निर्माताओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए ‘भारतीय पेटेंट कानून’ में संशोधन किया था, कि ‘भारतीय पेटेंट कार्यालय’, पुराने विज्ञान पर या पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में मौजूद अवयवों के लिए किसी को एकाधिकार प्रदान नहीं करे।
- इस प्रावधान ने ‘दवा निगमों’ के ‘एवरग्रीनिंग’ (Evergreening) प्रक्रिया में लिप्त रहने को प्रतिबंधित किया। ‘एवरग्रीनिंग’ एक सामान्य अनुचित ‘पेटेंटिंग’ प्रक्रिया होती है, जिसका उद्देश्य ‘एक ही दवा’ अर्थात समान दावा से संबंधित एक अलग पेटेंट एकाधिकार प्राप्त करना है।
नई सिफारिशें:
सार्वजनिक चर्चा की अवधि में कमी: ‘परिषद’ द्वारा पेटेंट आवेदनों को चुनौती देने के लिए निर्धारित अवधि को घटकर छह महीने करने की सिफारिश की गयी है।
संबंधित चिंताएं:
- पूर्व-अनुमति विरोध प्रणाली को कमजोर करेगा: चूंकि भारतीय पेटेंट कार्यालयों को एक वर्ष में औसतन 50,000 पेटेंट आवेदन प्राप्त होते हैं, और परीक्षक अक्सर विचाराधीन पेटेंट आवेदन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी से चूक जाते हैं।
- भारत में ‘फार्मास्युटिकल पेटेंट अनुमति’ पर हाल के एक अध्ययन से पता चला है कि 10 में से 7 पेटेंट भारतीय पेटेंट कार्यालय द्वारा गलती से दिए गए हैं।
- एक सशक्त अनुमति-पूर्व विपक्षी प्रणाली, जांच की एक अतिरिक्त प्रशासनिक परत प्रदान करती है जो समीक्षा प्रक्रिया में तीसरे पक्ष की भागीदारी के माध्यम से ‘तुच्छ पेटेंट’ के अनुदान को रोकती है।
- बड़ी-फार्मा कंपनियों का दबाव: पेटेंट अधिनियम को प्रशासित करने के लिए जिम्मेदार वाणिज्य मंत्रालय पर पूर्व-अनुदान पेटेंट विरोधों को प्रतिबंधित करने का दबाव है, इसलिए यह सिफारिश की गई है।
एवरग्रीनिंग ऑफ़ पेटेंट:
‘एवरग्रीनिंग ऑफ़ पेटेंट’, यह नए पेटेंट लेकर, उनसे रॉयल्टी बनाए रखने के लिए, किसी क्षेत्राधिकार में समाप्त होने वाले पेटेंट की अवधि को बढ़ाने के लिए एक कॉर्पोरेट, कानूनी, व्यावसायिक और तकनीकी रणनीति है।
- भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 (2005 में संशोधित) की धारा 3(d) के तहत, किसी ज्ञात पदार्थ के नए रूपों को शामिल करने वाले आविष्कारों को पेटेंट देने की अनुमति नहीं है, जब तक कि यह प्रभावकारिता के संबंध में गुणों में महत्वपूर्ण रूप से भिन्न न हो।
- इसका मतलब यह है, कि ‘भारतीय पेटेंट अधिनियम पेटेंट’ की ‘एवरग्रीनिंग’ अनुमति नहीं देता है।
‘अनिवार्य लाइसेंसिंग’ (Compulsory Licencing – CL):
अनिवार्य लाइसेंस, किसी आवेदककर्ता को पेटेंटकर्ता की सहमति के बिना, किसी पेटेंट उत्पाद का निर्माण करने, प्रयोग करने अथवा बेचने हेतु, अथवा पेटेंट प्रक्रिया के प्रयोग करने हेतु सरकार द्वारा जारी अधिकार-पत्र पत्र होता है।
- भारतीय पेटेंट अधिनियम 1970 के अध्याय XVI तथा ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं’ (Trade Related Aspects of Intellectual Property Rights-TRIPS) समझौते के अंतर्गत अनिवार्य लाइसेंसिंग पर विचार किया जाता है।
- किसी उत्पाद के पेटेंट प्राप्त करने की तिथि से 3 वर्ष पश्चात किसी भी समय अनिवार्य लाइसेंस के लिए आवेदन किया जा सकता है।
इंस्टा लिंक:
स्रोत: द हिंदू
विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।
राष्ट्रीय जांच एजेंसी के कामकाज
संदर्भ:
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (National Investigation Agency- NIA) ने, हाल ही में राजस्थान के उदयपुर में हुई दर्जी कन्हैया लाल (48) की हत्या की जांच अपने हाथ में ले ली है।
अब, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने महाराष्ट्र में फार्मासिस्ट उमेश कोल्हे की इसी तरह की हत्या की जांच एजेंसी को सौंप दी है।
NIA: परिचय
राष्ट्रीय जांच एजेंसी या ‘राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण’ (National Investigation Agency- NIA) का गठन ‘राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम’, 2008 (National Investigation Agency (NIA) Act, 2008) के तहत किया गया था।
यह निम्नलिखित मामलों में अपराधों की जाँच करने तथा अभियोग चलाने हेतु एक केंद्रीय एजेंसी है:
- भारत की संप्रभुता, सुरक्षा एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध को प्रभावित करने वाले अपराध।
- परमाणु और परमाणु प्रतिष्ठानों के विरुद्ध अपराध।
- उच्च गुणवत्तायुक्त नकली भारतीय मुद्रा की तस्करी।
इसके अतिरिक्त NIA ‘केंद्रीय आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी’ (Central Counter Terrorism Law Enforcement Agency) के रूप में भी कार्य करती है।
- इसे राज्यों की विशेष अनुमति के बगैर, राज्यों में आतंकवाद संबंधित अपराधों से निपटने हेतु शक्ति प्राप्त है।
- NIA की स्थापना राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम 2008 के तहत की गयी है।
- यह गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है।
मुख्यालय: नई दिल्ली
शाखाएँ: हैदराबाद, गुवाहाटी, कोच्चि, लखनऊ, मुंबई, कोलकाता, रायपुर और जम्मू।
अधिसूचित अपराध: NIA अधिनियम की अनुसूची उन अपराधों की एक सूची निर्दिष्ट करती है जिनकी जांच और मुकदमा NIA द्वारा चलाया जाना है। इनमें परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम, 1967 जैसे अधिनियमों के तहत अपराध शामिल हैं।
अधिकार-क्षेत्र:
- राज्य सरकार, किसी मामले की जांच को NIA के लिए सौंपने हेतु केंद्र सरकार से आग्रह कर सकती है, बशर्ते ‘मामला’ NIA अधिनियम की अनुसूची में निहित अपराधों के अंर्तगत आता हो।
- केंद्र सरकार, NIA के लिए भारत में कहीं भी और किसी भी अधिसूचित अपराध की जांच करने का आदेश भी दे सकती है।
- NIA अधिनियम पूरे भारतीय अधिकार-क्षेत्र में और देश के बाहर भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है।
- यह एजेंसी सरकार की सेवा में कार्यरत सभी व्यक्तियों की जांच कर सकती है, चाहें वे कहीं भी तैनात हों।
- भारत में पंजीकृत जहाजों और विमानों पर व्यक्ति, चाहें वे कहीं भी हों।
- ऐसे व्यक्ति, जो भारत के बाहर भारतीय नागरिक के विरुद्ध अधिसूचित अपराध करते हैं या भारत के हितों को प्रभावित करते हैं।
‘राष्ट्रीय जांच एजेंसी’, जांच को अपने अधिकार में किस प्रकार लेती है?
- ‘’राज्य सरकार’ मामले को संदर्भित करती है: जैसा कि अधिनियम की धारा 6 के तहत प्रावधान है, राज्य सरकारें किसी भी पुलिस स्टेशन में दर्ज अनुसूचित अपराधों से संबंधित मामले को NIA जांच के लिए केंद्र सरकार (केंद्रीय गृह मंत्रालय) को संदर्भित कर सकती हैं।
- केंद्र सरकार एजेंसी को निर्देश देती है: उपलब्ध कराए गए विवरण का आकलन करने के बाद, केंद्र एजेंसी को मामले को संभालने का निर्देश दे सकता है।
- राज्य सरकारों को NIA को सभी प्रकार से सहायता प्रदान करना आवश्यक होता है।
- भारत के बाहर: केंद्र सरकार को, भारत के बाहर किसी भी स्थान पर – जहां यह अधिनियम लागू होता है – कोई अधिसूचित अपराध किए जाने की जानकारी मिलती है, तब वह एनआईए को मामला दर्ज करने और जांच करने का निर्देश भी दे सकती है।
- संबद्ध अपराधों की जांच: एक अधिसूचित अपराध की जांच करते समय, एजेंसी किसी अन्य अपराध की भी जांच कर सकती है, जिसे आरोपी ने कथित रूप से किया है यदि अपराध अधिसूचित अपराध से जुड़ा है।
इंस्टा लिंक्स:
अभ्यास प्रश्न:
राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अधिदेश पर चर्चा कीजिए, इसके संचालन में क्या बाधाएं आ सकती हैं? इन चिंताओं को कैसे दूर किया जा सकता है? स्पष्ट कीजिए। (250 शब्द)
स्रोत: द हिंदू
विषय: कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्य- सरकार के मंत्रालय एवं विभाग, प्रभावक समूह और औपचारिक/अनौपचारिक संघ तथा शासन प्रणाली में उनकी भूमिका।
भारतीयों को विदेश में बसे रिश्तेदारों से ₹10 लाख तक प्राप्त करने की अनुमति
संदर्भ:
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ (Foreign Contribution (Regulation) Act – FCRA) से संबंधित कुछ नियमों में संशोधन किया है, जिसके तहत भारतीयों को अधिकारियों को सूचित किए बिना विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से एक वर्ष में ₹10 लाख तक प्राप्त करने की अनुमति दी गयी है। पहले यह सीमा ₹1 लाख तक ही थी।
नए नियम:
- विदेशी अंशदान की सीमा में वृद्धि: नए नियमों के तहत, भारतीयों को अधिकारियों को सूचित किए बिना विदेश में रहने वाले रिश्तेदारों से एक वर्ष में ₹10 लाख तक प्राप्त करने की अनुमति दी गयी है। पहले की सीमा ₹1 लाख थी।
- अधिकारियों को सूचित करने के लिए दिनों की संख्या में वृद्धि: जारी अधिसूचना में, मंत्रालय ने यह भी कहा कि यदि राशि इससे अधिक हो जाती है, तो व्यक्तियों के पास अब 30 दिनों के बजाय सरकार को सूचित करने के लिए 90 दिन होंगे।
- समाधेय अपराधों (Compoundable offences) की संख्या में वृद्धि: नए नियमों के तहत, संगठनों या व्यक्तियों पर सीधे मुकदमा चलाने के बजाय FCRA “कंपाउंडेबल” के तहत पांच और अपराधों को शामिल किया गया है । इससे पहले, FCRA के तहत केवल सात अपराध कंपाउंडेबल थे।
- बैंक खातों के बारे में जानकारी: संशोधित नियमों ने व्यक्तियों और संगठनों या गैर सरकारी संगठनों को उन बैंक खातों के बारे में गृह मंत्रालय को सूचित करने के लिए 45 दिन का समय दिया है जिनका उपयोग इस तरह के धन के उपयोग के लिए किया जाना है।
- नियम 13 में प्रावधान B का लोप: सरकार ने नियम 13 में विदेशी धन की घोषणा से संबंधित ‘प्रावधान ‘बी’ को भी “छोड़ दिया” है।
निधियों के उपयोग में पारदर्शिता: अब, विदेशी धन प्राप्त करने वाले किसी भी व्यक्ति को आय और व्यय विवरण, रसीद और भुगतान खाते, और शेष राशि सहित विदेशी योगदान की प्राप्तियों और उपयोग पर खातों के लेखा परीक्षित विवरण रखने और वित्तीय वर्ष की समाप्ति के नौ महीने के भीतर अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर या केंद्र द्वारा निर्दिष्ट वेबसाइट पर अपलोड करने के मौजूदा प्रावधान का पालन करना होगा।
FCRA के तहत विदेशी अंशदान:
- विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के तहत एफसीआरए के तहत “विदेशी अंशदान” (Foreign contribution) में ‘किसी विदेशी स्रोत द्वारा – व्यक्तिगत उपयोग के लिए उपहार के रूप में दी जाने वाली वस्तुओं को छोड़कर – किए जाने वाले किसी भी वस्तु के दान, अंतरण अथवा हस्तांतरण’ को शामिल किया जाता है।
- इसके अलावा, इस प्रकार से दान की जाने वस्तु का भारतीय बाजार में मूल्य, अनुदान के समय समय-समय पर केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट किए जाने वाली कीमत या राशि से अधिक नहीं होना चाहिए।
अपवाद:
- अधिनियम के दायरे में, किसी भी मुद्रा या प्रतिभूति को शामिल किया जा सकता है। हालांकि किसी भी व्यक्ति द्वारा भारत की सीमा में या इसके बाहर अपने व्यवसाय, कारोबार अथवा वाणिज्य की सामान्य गतिविधियों के तहत प्रदान की जाने वाली वस्तुओं या सेवाओं के बदले प्राप्त किसी भी धन-राशि को FCRA में शामिल नहीं किया गया है।
- अधिनियम के तहत, अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा किए गए दान को “विदेशी अंशदान” नहीं माना जाता है, हालांकि विदेशी नागरिकता हासिल कर चुके भारतीय मूल के किसी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले अनुदान को “विदेशी अंशदान” के रूप में माना जाता है।
विदेशी अनुदान ग्रहण करने हेतु निम्नलिखित व्यक्ति अथवा संगठन पात्र नहीं होते है:
- चुनावी उम्मीदवार
- किसी भी विधायिका (सांसद और विधायक) के सदस्य
- राजनीतिक दल या पदाधिकारी
- राजनीतिक प्रकृति का संगठन
- पंजीकृत समाचार पत्र के संवाददाता, स्तंभकार, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक।
- न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी, तथा सरकार के स्वामित्व वाले किसी भी निगम अथवा किसी अन्य निकाय के कर्मचारी।
- किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ऑडियो न्यूज, ऑडियो विजुअल न्यूज या करंट अफेयर्स प्रोग्राम के उत्पादन या प्रसारण में संलग्न एसोसिएशन अथवा कंपनी।
- केंद्र सरकार द्वारा विशेष रूप से निषिद्ध कोई अन्य व्यक्ति अथवा संगठन।
इंस्टा लिंक्स:
स्रोत: द हिंदू
सामान्य अध्ययन–III
विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC): लिस्बन घोषणा
संदर्भ:
हाल ही में, दूसरा ‘संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन’ (UN Ocean Conference – UNOC), ‘हमारा महासागर, हमारा भविष्य: कार्रवाई हेतु आवश्यकता’ (Our Ocean, Our Future: call for action) शीर्षक से ‘लिस्बन घोषणा’ (Lisbon Declaration) के साथ समाप्त हुआ।
- इस ‘सम्मेलन’ की मेजबानी, पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में केन्या और पुर्तगाल द्वारा संयुक्त रूप से की गयी ।
- पहला संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC) वर्ष 2017 में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय (न्यूयॉर्क) में आयोजित हुआ था।
- इस कार्यक्रम के दौरान ‘यूनेस्को’ द्वारा ‘स्टेट ऑफ द ओशन रिपोर्ट’ भी जारी की गयी।
लिस्बन घोषणा:
- वर्ष 2030 तक कम से कम 30% राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्रों की रक्षा करना।
- वर्ष 2040 तक कार्बन तटस्थता हासिल करना।
- समुद्र के अम्लीकरण, जलवायु लचीलापन और निगरानी पर अनुसंधान के लिए धन आवंटित करना।
- महासागरीय आपात स्थिति से निपटने के लिए विज्ञान आधारित और नवोन्मेषी कार्रवाइयां बढ़ाना।
- महिलाओं और लड़कियों को सशक्त बनाकर SDG14 (जलीय जीवों की सुरक्षा) के कार्यान्वयन में सहायता करना- एक संधारणीय महासागर आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए महिलाओं और लड़कियों की भागीदारी को पहचानना महत्वपूर्ण है।
- राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे – देशों के 200-मील (322-किलोमीटर) विशेष आर्थिक क्षेत्रों के बाहर स्थित क्षेत्रों में जैव विविधता की रक्षा करना।
भारत:
- तटीय स्वच्छ समुद्र अभियान (‘स्वच्छ सागर, सुरक्षित सागर’) शुरू किया जाएगा।
- सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध।
समुद्री प्रदूषण को नियंत्रित करने हेतु:
- पोषक तत्व प्रदूषण (Nutrient pollution)
- अनुपचारित अपशिष्ट जल
- ठोस अपशिष्ट निर्वहन
- खतरनाक पदार्थ
- नौवहन, जलपोतों सहित समुद्री क्षेत्र से उत्सर्जन
- पानी की सतह के नीचे मानवजनित शोर
महासागरों पर इस तरह की अन्य पहलें:
स्वच्छ समुद्र अभियान (Clean Sea Campaign):
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा ने समुद्री प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ लड़ाई में सरकारों, आम जनता और निजी क्षेत्र को शामिल करने के उद्देश्य से फरवरी 2017 में ‘स्वच्छ समुद्र’ (#CleanSeas) अभियान लॉन्च किया।
- इसका उद्देश्य पांच साल के भीतर ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ और ‘माइक्रोबीड्स’ पर प्रतिबंध लगाना है।
वन ओशन समिट:
- वन ओशन समिट (One Ocean Summit) का लक्ष्य समुद्री मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की महत्वाकांक्षा के सामूहिक स्तर को ऊपर उठाना है।
- भारत ‘राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता पर उच्च महत्वाकांक्षा गठबंधन’ की फ्रांसीसी पहल का समर्थन करता है।
BBNJ संधि:
- ‘राष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों से परे समुद्री जैविक विविधता क्षेत्रों’ (Marine Biodiversity of Areas Beyond National Jurisdiction – BBNJ) को ‘खुले सागरों पर संधि’ या “उच्च समुद्र की संधि” (Treaty of the High Seas) के रूप में भी जाना जाता है।
- वर्तमान में, यह संधि संयुक्त राष्ट्र में वार्ता के अधीन, ‘राष्ट्रीय क्षेत्राधिकारों से परे समुद्री जैविक विविधता क्षेत्रों के संरक्षण और संधारणीय उपयोग’ पर एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है।
ग्लोलिटर पार्टनरशिप प्रोजेक्ट (GloLitter Partnerships Project):
- यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) और FAO द्वारा शुरू किया गया है और नॉर्वे सरकार द्वारा इसका प्रारंभिक वित्त पोषण किया गया है। इसका उद्देश्य शिपिंग और मत्स्य पालन से समुद्री प्लास्टिक कूड़े को रोकना और कम करना है।
सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान का दशक:
- संयुक्त राष्ट्र ने महासागरीय स्वास्थ्य में गिरावट के चक्र को उलटने के प्रयासों का सहयोग करने के लिए सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान के एक दशक (2021-2030) की घोषणा की है।
इंस्टा लिंक
अभ्यास प्रश्न:
तटों और तटीय पारिस्थितिकी पर समुद्री प्रदूषण के प्रभाव का परीक्षण कीजिए। इसके अलावा, तटों को साफ करने के लिए संरक्षण विधियों पर चर्चा कीजिए। (15अंक)
स्रोत: द हिंदू
विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।
पौधों में नाइट्रेट अवशोषण को विनियमित करने का नया तरीका
संदर्भ:
नेशनल सेंटर ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, बेंगलुरु (NCBS-TIFR) के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने एक नया मार्ग खोजा है जो पौधों में नाइट्रेट अवशोषण को नियंत्रित करता है।
नई विधि:
- ‘जीन प्रतिलेखन कारक’ (gene transcription factor) MADS27, जो नाइट्रेट अवशोषण, जड़ विकास और तनाव सहिष्णुता को नियंत्रित करता है, माइक्रो-आरएनए ( miR444) द्वारा सक्रिय होता है, और यह पौधे के इन गुणों को नियंत्रित करने का एक नया तरीका पेश करता है।
- इस ‘miR444’ का उपयोग नाइट्रेट अवशोषण को बढ़ाने, जड़ विकास को बढ़ाने और पौधे को अधिक तनाव सहन करने में मदद करने के लिए किया जा सकता है।
‘प्रतिलेखन कारक’ (Transcription Factor), डीएनए को आरएनए में परिवर्तित करने, या प्रतिलेखन करने की प्रक्रिया में शामिल होने वाले ‘प्रोटीन’ होते हैं। प्रतिलेखन कारकों में ‘आरएनए पोलीमरेज़’ को छोड़कर बड़ी संख्या में प्रोटीन शामिल हैं होते, जो जीन के प्रतिलेखन को आरंभ और विनियमित करते हैं।
नाइट्रोजन को विनियमित करने का महत्व:
- पौधे का विकास: नाइट्रोजन एक पौधे के विकास के लिए आवश्यक सबसे महत्वपूर्ण सूक्षम पोषक तत्वों से एक है। यह अन्य पोषक तत्वों के बीच क्लोरोफिल, अमीनो एसिड और न्यूक्लिक एसिड का एक हिस्सा है।
- जीन अभिव्यक्ति: नाइट्रेट ‘जीनोम-व्यापक जीन अभिव्यक्ति’ (genome-wide gene expression) को नियंत्रित करने में भी एक भूमिका निभाते हैं जो बदले में, ‘रूट सिस्टम आर्किटेक्च’र, फूल आने का समय, पत्तियों विकास आदि को नियंत्रित करता है।
- प्रदूषण नियंत्रण: उर्वरकों में नाइट्रेट्स के अति प्रयोग से पानी और मिट्टी में नाइट्रेट्स जमा हो जाते हैं। यह संचय मिट्टी और जल प्रदूषण में जोड़ता है और ग्रीनहाउस गैसों के योगदान में वृद्धि करता है।
अभ्यास प्रश्न:
भारत में कृषि और अर्थव्यवस्था के लिए सतत नाइट्रोजन प्रबंधन के महत्व पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)
स्रोत: द हिंदू
मुख्य परीक्षा संवर्धन हेतु पाठ्य सामग्री (नैतिकता/निबंध)
मुख्य परीक्षा में उपयोग किए जाने वाले उदाहरण:
सामाजिक न्याय: समावेशी नीतियां बनाने की आवश्यकता– DGCA द्वारा एडम हैरी को ‘जेंडर डिस्फोरिया’ (gender dysphoria) अर्थात “जन्म के समय निर्धारित लिंग और किसी व्यक्ति की लैंगिक पहचान के बीच बेमेल के कारण बेचैनी” के आधार पर “अस्थायी रूप से अयोग्य” घोषित कर दिया गया, और इसके अलावा एडम हैरी “क्रॉस- सेक्स हार्मोन थेरेपी” से गुजर रहा था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले (NALSA मामला) और ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम’, 2019 के बाद भी, ट्रांसजेंडर के खिलाफ भेदभाव अभी भी समाज में प्रचलित है।
सामाजिक न्याय: निक्षय मित्रा: टीबी के लिए सामुदायिक पहल-
- स्वास्थ्य मंत्रालय ‘निक्षय मित्र’ (Nikshay Mitra) नामक एक पहल पर काम कर रहा है। इसके तहत- व्यक्तियों को तपेदिक के रोगियों को अपनाने और उनकी पोषण एवं चिकित्सा आवश्यकताओं की देखभाल करने की अनुमति दी जाएगी ताकि भारत में इस बीमारी से जुड़े कलंक को दूर किया जा सके।
- 5 मिलियन रोगियों के साथ, भारत में टीबी का दुनिया में सबसे अधिक बोझ है। सरकार का लक्ष्य 2025 तक इस बीमारी को खत्म करना है।
समाज: समावेशिता के लिए संवेदीकरण: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), बॉम्बे, जाति जागरूकता और नस्लीय भेदभाव पर एक अनिवार्य पाठ्यक्रम शुरू करने की योजना बना रहा है। पिछले साल इसने ‘लैंगिक संवेदीकरण’ (Gender sensitisation) पर एक कोर्स शुरू किया था।
पर्यावरण: सरोजिनी वन- ओडिशा के वन विभाग ने केवल दो वर्षों में बंजर भूमि को जंगल में बदलने के लिए सरोजिनी के समर्पण के सम्मान में इस पहल को शुरू किया गया है।
शिक्षा: प्रधानमंत्री के सुझाव:
- ग्रामीण स्कूलों में छद्म शिक्षकों पर अंकुश लगाया जाए: प्रधानमंत्री ने हर कक्षा में शिक्षकों की तस्वीरें लगाने का सुझाव दिया है, राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में इसका प्रयोग किया गया है, जिसे अन्य राज्यों में भी दोहराया जा सकता है।
- 2018 में, भारत पर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में- प्रॉक्सी शिक्षकों की समस्या पर प्रकाश डाला गया, जहां सरकार द्वारा नियोजित शिक्षक, अवैध रूप से अन्य व्यक्तियों को अपने स्थान पर पढ़ाने के लिए भेज देते हैं।
- दूरदराज के क्षेत्रों में स्कूली शिक्षा के मानकों में सुधार: प्रधानमंत्री ने CSR मॉडल का पालन करते हुए दूरदराज के क्षेत्रों में स्कूलों को गोद लेने वाले निजी स्कूलों की पद्धति को लागू करने का सुझाव दिया।
- छात्र विनिमय: औपचारिक स्कूली शिक्षा के लिए पूर्व-विद्यालय के छात्रों को तैयार करने के लिए आंगनवाड़ियों और एक दूसरे के करीब स्थित स्कूलों के लिए ‘विनिमय कार्यक्रम मॉडल’ शुरू किया जाए।
- एकल-शिक्षक विद्यालयों को समाप्त किया जाए: 2021 में जारी यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, देश में लगभग 1.2 लाख एकल-शिक्षक विद्यालय हैं, जिनमें से 89 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में हैं।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
कर्नाटक का लोककथा विश्वविद्यालय
संदर्भ:
- कर्नाटक जनपद विश्व विद्यालय (कर्नाटक लोककथा विश्वविद्यालय – Karnataka Folklore University), लोक कला और संस्कृति में पाठ्यक्रम प्रदान करने वाला दुनिया का एकमात्र विश्वविद्यालय है। इस विश्वविद्यालय ने अब विश्व स्तर पर अपनी पहुंच बढ़ाने के लक्ष्य पर अपनी नजरें जमा ली हैं।
- यह डोड्डा (लोक नाटक), डोलू कुनिथा, कम्सले, थोगलू बॉम्बेयता (कठपुतली शो), पारंपरिक कढ़ाई, लोक पर्यटन, लोक गीत, लोक नृत्य, बांस कला, लोक मार्शल आर्ट, लोक खेल, ताल वाद्य और योग में सर्टिफिकेट कोर्स प्रदान करता है। .
मयूरभंज के सुपरफूड ‘चींटी की चटनी’ (काई की चटनी) के लिए जीआई टैग की मांग
बुनकर चींटियाँ (Weaver ants), जिन्हें वैज्ञानिक रूप से ‘ओकोफिला स्मार्गडीना’ (Oecophylla smaragdina) कहा जाता है, मयूरभंज में पूरे वर्ष बहुतायत से पाई जाती हैं। ये चीटियाँ मेजबान पेड़ों की पत्तियों से अपने घोंसले का निर्माण करते हैं। इन्हें कच्चा अथबा मसालों के साथ मिलाकर खाया जाता है।
कीमती प्रोटीन, कैल्शियम, जिंक, विटामिन बी-12, आयरन, मैग्नीशियम, पोटेशियम, सोडियम, कॉपर, फाइबर और 18 अमीनो एसिड से भरपूर यह नमकीन खाद्य पदार्थ, प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा देने और बीमारियों को दूर रखने के लिए जाना जाता है।
भारत की डिजिटल पहल पर डेटा बिंदु:
- भारत में रीयल-टाइम डिजिटल भुगतान: दुनिया का 40% (2021)
- मोबाइल डेटा की न्यूनतम लागतों में से एक
- 133 करोड़+ आधार संख्या
- डीबीटी भुगतान: 23 लाख करोड़ से अधिक सीधे हस्तांतरित
- सामान्य सेवा केंद्र: 5.5 लाख
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम का औपचारिककरण (PMFME) योजना
प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम का औपचारिककरण (PM Formalisation of Micro Food processing enterprise – PMFME) योजना ने अपने कार्यान्वयन के दो साल पूरे कर लिए हैं।
प्रमुख बिंदु:
- PMFME आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत ‘खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय’ (MoFPI) के तहत केंद्र प्रायोजित योजना है।
- उद्देश्य: ‘एक जिला एक उत्पाद’ दृष्टिकोण के माध्यम से असंगठित सूक्ष्म उद्यमों को सशक्त बनाना। राज्यों को खाद्य उत्पादों जैसे, खराब होने वाले कृषि-उत्पाद और अनाज आधारित उत्पादों की पहचान करनी होगी।
- समयावधि: 2020-21 से 2024-25
- अभिसरण: NULM के साथ- क्षेत्र में सूक्ष्म उद्यमों को अनुदान देने के लिए खाद्य प्रसंस्करण में शामिल क्षेत्र स्तरीय संघ को बीज पूंजी प्रदान करेगा।
- उपलब्धियां: 35 राज्यों में कार्यान्वित, डिजिटल ओडीओपी मानचित्र विकसित, 1 लाख से अधिक SHG सदस्य।
स्थानिक ट्रांसक्रिपटॉमिक्स
- शोधकर्ता यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि इस ‘स्थानिक ट्रांसक्रिपटॉमिक्स’ (Spatial transcriptomics) पद्धति के माध्यम से कोशिका या ऊतक में प्रत्येक जीन कहाँ ‘अभिव्यक्त’ किया जाता है।
- ‘स्थानिक ट्रांसक्रिपटॉमिक्स’, ऊतकीय वर्गों में उनके स्थानों के लिए ‘सेल प्रकार’ (एमआरएनए रीडआउट द्वारा पहचाने गए) को निर्दिष्ट करने के लिए डिज़ाइन की गई विधियों की एक श्रृंखला है। इस विधि का उपयोग mRNA अणुओं के उप-कोशिकीय स्थानीयकरण को निर्धारित करने के लिए भी किया जा सकता है।
2021 में भारत के जीव डेटाबेस में 540 प्रजातियाँ और वनस्पतियों में 315 प्रजातियाँ शामिल
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाई जाने वाली नई स्तनपायी प्रजाति ‘क्रोसिडुरा नारकोंडामिका’ (Crocidura narcondamica), एक सफेद दांतों वाली छछूंदर (shrew) है।
प्रमुख बिंदु:
- 540 जीवों की प्रजातियों में से 406 प्रजातियाँ नई खोजी गयी हैं और 134 भारत में नयी रिकॉर्ड की गयी हैं। नई खोजों की सबसे अधिक संख्या जीव समूह- कीटों का एक क्रम- ‘हाइमनोप्टेरा’ से थी, जिसमें आरी, ततैया, मधुमक्खियां और चींटियां शामिल थीं।
- जीवों की 1.03 लाख प्रजातियों के साथ, भारत दुनिया में जीव विविधता में 6.1% का योगदान देता है।
- पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर क्षेत्रों जैसे क्षेत्रों ने कुल खोजों का 28% योगदान दिया है। राज्य-वार विश्लेषण में, केरल से सबसे अधिक खोज की गई, जिसमें 51 टैक्सा थे, उसके बाद महाराष्ट्र और अरुणाचल प्रदेश थे।
ऑपरेशन “नार्कोस“
- NDPS के खतरे की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए, रेल के माध्यम से नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ एक महीने तक चलने वाले अखिल भारतीय अभियान को कोड नाम ऑपरेशन “नार्कोस” (NARCOS) के तहत जून -2022 के महीने में शुरू किया गया था।
- RPF को अप्रैल 2019 से ‘एनडीपीएस अधिनियम’ के तहत तलाशी, जब्ती और गिरफ्तारी करने का अधिकार दिया गया है और इस अवैध व्यापार को प्रतिबंधित करने के सरकार के प्रयासों में सक्रिय रूप से भाग ले रहा है।
















