[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 13 May 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

  1. गोवा नागरिक संहिता
  2. नियामकों को संवैधानिक दर्जे की आवश्यकता नहीं
  3. भारत में गर्भपात की कानूनी स्थिति।

 

सामान्य अध्ययन-III

  1. सतही पारिस्थितिकीवाद और गहन पारिस्थितिकीवाद
  2. WMO की वैश्विक जलवायु पर वार्षिक एवं दशकीय अद्यतन रिपोर्ट
  3. ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. चर्चित स्थल – ओडेसा
  2. भारत का पहला ‘धूम्र-मुक्त राज्य’
  3. ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स
  4. चक्रवात करीम
  5. एसएसआर और श्रीमान दिशानिर्देश
  6. भोजशाला
  7. वीरता पुरस्कार
  8. रॉयल गोल्ड मेडल 2022

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

गोवा नागरिक संहिता


संदर्भ:

हाल ही में, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कहा है, कि ‘गोवा नागरिक संहिता’ (Goa Civil Code) एक ऐसा मॉडल है जिसका अन्य राज्य अनुकरण कर सकते हैं। मुख्यमंत्री का यह व्यक्तव्य, भारत में ‘समान नागरिक संहिता’ को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच आया है।

‘गोवा नागरिक संहिता’ के बारे में:

गोवा की पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867, मूलतः पुर्तगालियों द्वारा बनाया गया एक विदेशी संहिता / कोड है।

  • गोवा की ‘नागरिक संहिता’ / सिविल कोड के चार भाग हैं, जो ‘नागरिकों की धारण शक्ति’ (Civil Capacity), ‘अधिकारों का अधिग्रहण’, ‘संपत्ति का अधिकार’ और ‘अधिकारों और उपचारों का उल्लंघन’ से संबंधित हैं।
  • वर्ष 1867 में ‘पुर्तगाल’ द्वारा एक ‘पुर्तगाली नागरिक संहिता’ लागू की गयी थी, जिसे 1869 में पुर्तगाल के विदेशी प्रांतों (जिसमें गोवा भी शामिल था) तक बढ़ा दिया गया था। इसे ‘समान नागरिक संहिता’ (Uniform Civil Code) माना जाता है।
  • जब देश में शादी और गोद लेने की बात आती है, तो इसके लिए पूरे देश कानूनी तौर पर पूर्ण एकरूपता नहीं है। आम तौर पर, ‘गोवा नागरिक संहिता’ देश के अन्य कानूनों की तुलना में कहीं अधिक ‘लैंगिक-न्यायपूर्ण’ (Gender-Just) है।
  • ‘गोवा नागरिक संहिता’ में मुस्लिमों सहित किसी धर्म या सुमदाय के ‘द्विविवाह’ या ‘बहुविवाह’ को मान्यता नहीं दी गयी है, लेकिन अपवाद-स्वरूप, इस क़ानून में, यदि किसी हिंदू पुरुष की पत्नी 21 वर्ष की आयु तक गर्भ धारण नहीं कर पाती है, या 30 वर्ष की आयु तक एक नर-संतान को जन्म नहीं दे पाती है, तो उस हिंदू पुरुष को एक बार फिर से शादी करने की अनुमति दी गयी है। .

इस कानून के प्रमुख प्रावधान:

  • क़ानून के तहत, एक ‘नागरिक प्राधिकरण’ के समक्ष विवाह का अनिवार्य पंजीकरण कराना अनिवार्य होगा, इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ‘पत्नी’ संपत्ति में एक समान उत्तराधिकारी है और तलाक आदि के मामले में अपने पति को विरासत में मिली संपत्ति सहित “सामान्य संपत्ति” के आधे हिस्से की हकदार होगी।
  • माता-पिता को संपत्ति का कम से कम आधा हिस्सा, बेटियों सहित अपने सभी बच्चों के साथ अनिवार्य रूप से साझा करना होगा।

पुर्तगालियों द्वारा अधिनियमित ‘नागरिक संहिता’ आज भी क्यों मौजूद है?

यह संहिता, गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम, 1962 की धारा 5 (1) के कारण अभी भी लागू है, इस अधिनियम के तहत गोवा की ‘नागरिक संहिता’ को जारी रखने की अनुमति दी गई थी।

  • गोवा में ‘पुर्तगाली नागरिक संहिता’, “गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम”, 1962 (Goa, Daman and Diu Administration Act, 1962) की धारा 5(1) के कारण भारत में अभी भी लागू है।
  • गोवा को पुर्तगाली शासन से आजाद करने के समय, 1962 में अधिनियम की धारा 5(1) के माध्यम से भारत सरकार ने फैसला किया था, कि “गोवा, दमन और दीव या किसी भी हिस्से में लागू सभी कानून, जब तक सक्षम विधायिका या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा संशोधित या निरस्त नहीं किए जाते हैं, तब तक यथावत लागू रहेंगे।”
  • इस वजह से गोवा में ‘पुर्तगाली नागरिक संहिता’ अभी भी लागू है।

‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) क्या है?

‘समान नागरिक संहिता’ (Uniform Civil Code), मुख्यतः देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने वाले कानूनों के एक सामान्य समूह को संदर्भित करती है।

  • संविधान के अनुच्छेद 44जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक है- में कहा गया है, कि देश में एक ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) होनी चाहिए। इस अनुच्छेद के अनुसार, ‘राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक ‘समान सिविल संहिता’ सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।‘
  • चूंकि ‘नीति-निदेशक सिद्धांत’ प्रकृति में केवल दिशा-निर्देशीय हैं, अतः राज्यों के लिए इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है।
  • हालांकि, आजादी के बाद से विभिन्न सरकारों ने भारत की विविधता का सम्मान करने करने हेतु ‘संबंधित धर्म-आधारित नागरिक संहिताओं’ को भी अनुमति प्रदान की है।

भारत में अब ‘समान नागरिक संहिता’ के क्या लाभ और नुकसान हैं? इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि भारतीय कानूनों में, भारतीय अनुबंध अधिनियम 1872, नागरिक प्रक्रिया संहिता, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम 1882, भागीदारी अधिनियम 1932, साक्ष्य अधिनियम, 1872 आदि जैसे अधिकांश नागरिक मामलों में ‘एक समान संहिता’ का पालन किया जाता है?

हालांकि, राज्यों द्वारा अब तक सैकड़ों संशोधन किए जा चुके हैं और इसलिए, कुछ मामलों में, इन धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानूनों के तहत भी विविधता देखने को मिलती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) के बारे में।
  2. ‘राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत’ (DPSP) क्या हैं।
  3. DPSP का प्रवर्तन।
  4. शाह बानो केस किससे संबंधित है?
  5. अनुच्छेद 44

मेंस लिंक:

इस समय ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) वांछनीय क्यों नहीं है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: हिंदुस्तान टाइम्स।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

नियामकों को संवैधानिक दर्जे की आवश्यकता नहीं


(Regulators don’t need constitutional status)

संदर्भ:

यह आर्टिकल ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ समाचार पत्र के ‘ओपिनियन सेक्शन’ से लिए गया है। इसमें ‘नियामकों’ (Regulators) को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की आवश्यकता, संविधान द्वारा वर्तमान व्यवस्थाओं के पीछे तर्क और उपलब्ध विकल्प के बारे में बात की गयी है।

‘भारतीय नियामक एजेंसियों’ को संवैधानिक दर्जा दिए जाने के पक्ष में तर्क:

  • भारतीय नियामक एजेंसियों (Indian Regulatory Agencies) पर बहुत अधिक राजनीतिक दबाव रहता है। जोकि उनके कार्य करने के तरीके को प्रभावित करता है।
  • नियामक एजेंसियों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने से, इनके और निर्वाचित सरकार के बीच सममिति और संतुलन बहाल होगा।

नियामक निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने से उत्पन्न होने वाले मुद्दे:

इससे ‘प्रापती प्रभाव’ (Cascading Effects) पड़ना शुरू हो जाएगा।

  • उदाहरण के लिए, हम उच्च शिक्षण संस्थानों, स्टॉक एक्सचेंज (मिनी-नियामक) बैंकों के मामलों में सरकारी हस्तक्षेप को नापसंद करते हैं। तो क्या हमें आईआईटी, स्टॉक एक्सचेंज और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करना चाहिए?
  • यदि इन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा दे भी दिया जाता है, तो इससे हमारा संविधान और अधिक भारी तथा संभावित रूप से आसानी से संशोधन योग्य बन जाएगा। और यह भारतीय संविधान की मूल भावना का उल्लंघन होगा।

कुछ संस्थानों को संवैधानिक आधार दिए जाने की आवश्यकता क्यों है?

  • संविधान, निर्वाचित निकायों पर नियंत्रण और संतुलन बनाने तथा इनको बहुसंख्यकवादी प्रवृत्तियों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किए गए ‘संस्थानों’ को सशक्त करता है।
  • उदाहरण के लिए, भारतीय संविधान, ‘उच्च न्यायपालिका’, ‘नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के कार्यालय’ और ‘चुनाव आयोग’ की स्थिति को सुदृढ़ करता है। ये सभी निकाय एक निर्वाचित सरकार पर नियंत्रण रखने के लिए स्थापित किए गए हैं।

नियामक एजेंसियों को संवैधानिक आधार दिए जाने की आवश्यकता क्यों नहीं है?

‘नियामक एजेंसियों’ में जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल नहीं होते हैं। वास्तव में, कई लोग तर्क देते हैं कि इन संस्थाओं में तकनीकज्ञ अभिजात वर्ग के लोग शामिल होते हैं, जो ऐसे नियम बनाते हैं जिनका कानून तौर पर बाध्यकारी प्रभाव होता है, तथा ये लाइसेंस और मध्यस्थ फर्मों को विनियमित करते हैं।

‘निर्वाचित निकायों’ के होने पर हमें नियामक निकायों की आवश्यकता क्यों है?

जटिल क्षेत्रों को विनियमित करने के लिए ‘विशेषज्ञता और क्षमता’ में वृद्धि करना।

विश्वसनीय प्रतिबद्धता: जब सरकार द्वारा किसी एक ‘नियामक’ की स्थापना की जाती है, तो वह अर्थव्यवस्था के उस क्षेत्र को नियंत्रित करने के लिए अपनी संप्रभु शक्तियों को त्याग देती है। ऐसा करके, सरकार, नीति स्थिरता के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का संकेत देती है।

जनहित: इस विश्वसनीय प्रतिबद्धता पर टिके रहने से जनता में यह विश्वास पैदा होता है कि ‘उस क्षेत्र में नीति निर्माण’ चुनावी चक्रों की बजाय जनहित को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा।

अन्य उपलब्ध विकल्प:

  • इन एजेंसियों के लिए उनके शासी कानून के तहत “उचित अनुबंध शर्तें” प्रदान की जाएँ।
  • नियामक एजेंसियों का नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों के प्रोत्साहन को जनहित के साथ संरेखित किया जाए।
  • नियामक एजेंसियों के प्रमुखों से अपने कार्यों को जनता को लगातार समझाने की अपेक्षा की जाए।
  • आचरण की पारदर्शिता, एजेंसी को जनहित में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है, इसे भी अपनाया जाना चाहिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संविधान में संशोधन
  2. संशोधन की प्रक्रिया
  3. संवैधानिक निकाय
  4. नियामक निकाय

मेंस लिंक:

देश में नियामक निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान करने की आवश्यकता क्यों है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

भारत में गर्भपात की विधिक स्थिति


(Legal Status of abortion in India)

संदर्भ:

हाल ही में, संयुक्त राज्य अमेरिका में ‘गर्भपात के अधिकार’ (Abortion Rights) को संहिताबद्ध करने के उद्देश्य से पेश किया गया एक विधेयक ‘सीनेट’ में पारित नहीं हो सका।

‘महिला स्वास्थ्य संरक्षण अधिनियम’ (Women’s Health Protection Act) शीर्षक से इस विधेयक को ‘प्रतिनिधि सभा’ (House of Representatives) में पारित क्र दिया गया था, किंतु ऊपरी सदन में 49-51 मतों से इसे विफल कर दिया गया था।

संबंधित प्रकरण:

इस विधेयक का उद्देश्य ‘गर्भपात के अधिकार’ को संघीय कानून के रूप में संहिताबद्ध करना था।

रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों ने यह कहते हुए इस विधेयक की आलोचना की है कि, इस विधेयक में गर्भपात अधिकारों के समर्थक अधिकांश अमेरिकियों द्वारा की जा रही मांग की तुलना में, और भी अधिक प्रावधान किए गए हैं।

भारत में गर्भपात की विधिक स्थिति:

भारतीय दंड संहिता:

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 312 के अनुसार, जो भी कोई गर्भवती स्त्री का स्वेच्छा पूर्वक गर्भपात कारित करेगा, और यदि ऐसा गर्भपात उस स्त्री का जीवन बचाने के प्रयोजन से सद्भावपूर्वक कारित न किया गया हो, तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास जिसे तीन वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, या आर्थिक दण्ड, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
  • इस प्रावधान के तहत, स्वेच्छा से गर्भपात कराने वाली गर्भवती महिला, तथा गर्भपात करने वाले व्यक्ति, जोकि ज्यादातर मामलों में एक चिकित्सक होता है, भी अपराधी होगा।

गर्भ का चिकित्सकीय समापन अधिनियम, 1971 या ‘MTP एक्ट’ 1971:

(Medical Termination of Pregnancy Act, 1971)

इस कानून में, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के उपरोक्त प्रावधानों से छूट के प्रावधान किए गए हैं और यह ‘गर्भ के चिकित्सकीय समापन’ (Medical Termination of Pregnancy – MTP) हेतु नियम निर्धारित करता है।

  • इस कानून में दो बार संशोधन किया जा चुका है, और इसमें नवीनतम संशोधन वर्ष 2021 में किए गए थे।
  • हालांकि, यह कानून ‘गर्भवती महिला के ‘गर्भपात कराने के बारे में निर्णय लेने के अधिकार’ को मान्यता नहीं देता है और/या स्वीकार नहीं करता है।

‘MTP एक्ट’ 1971 के अनुसार, ‘गर्भ का चिकित्सकीय समापन’ (MTP) कब किया जा सकता है?

  1. गर्भ के बने रहने से गर्भवती स्त्री का जीवन जोखिम में पड़ने अथवा उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति का जोखिम होने की स्थिति में ‘गर्भ का चिकित्सकीय समापन’ (MTP) किया जा सकता है।
  2. जब, किसी विवाहिता स्त्री या उसके पति द्वारा बच्चों की संख्या सीमित रखने के प्रयोजन से उपयोग में लाई गई किसी प्रयुक्ति या व्यवस्था की असफलता के फलस्वरूप कोई गर्भ हो जाए, या बलात्कार किए जाने के परिणामस्वरूप महिला के गर्भवती होने की स्थिति में इस प्रावधान का प्रयोग किया जा सकता है।
  3. ऐसे अवांछित गर्भ के कारण होने वाले मनस्ताप को गर्भवती स्त्री के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चोट माना जाएगा।
  4. यदि इस बात का पर्याप्त जोखिम है कि यदि बच्चा पैदा हुआ तो वह ऐसी शारीरिक या मानसिक अप्रसामान्यताओं से पीड़ित होगा और गंभीर रूप से विकलांग होगा, तो ऐसी स्थिति में ‘गर्भ के चिकित्सकीय समापन’ की मांग की जा सकती है।

प्रक्रिया:

  • गर्भावस्था अवधि के 20 सप्ताह पूरे होने तक, किसी एक पंजीकृत चिकित्सक की राय पर उपरोक्त में से किसी भी कारण से गर्भ को समाप्त किया जा सकता है।
  • 20 सप्ताह से 24 सप्ताह तक के गर्भ को समाप्त करने के लिए दो पंजीकृत चिकित्सकों की राय आवश्यक होगी।
  • गर्भावस्था अवधि 24 सप्ताह से अधिक होने पर गर्भ को समाप्त करने का कोई भी निर्णय, केवल भ्रूण संबंधी असामान्यताओं के आधार पर, कानून के अनुसार प्रत्येक राज्य में स्थापित मेडिकल बोर्ड द्वारा लिया जा सकता है।
  • गर्भवती महिला की सहमति के अभाव में, चाहे उसकी उम्र और/या मानसिक स्वास्थ्य कुछ भी हो, गर्भ की समाप्ति नहीं की जा सकती है।

स्वास्थ्य का अधिकार:

विभिन्न मामलों में, अदालतों द्वारा फैसला सुनाया गया है, कि गर्भवती महिला को अपना ‘गर्भ जारी रखने का निर्णय लेने का अधिकार’ उसके स्वास्थ्य के अधिकार और जीवन के अधिकार का एक हिस्सा है। इसलिए, यह अधिकार गैर-परक्राम्य (non-negotiable) है।

भारत में गर्भपात कानूनों से संबंधित विवादों के बारे में जानकारी हेतु पढ़िए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत में गर्भपात कानून
  2. भारतीय दंड संहिता
  3. एमटीपी अधिनियम, 1971
  4. एमटीपी अधिनियम में संशोधन
  5. भारत में गर्भपात के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया

मेंस लिंक:

भारत में गर्भपात कानूनों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

सतही पारिस्थितिकीवाद और गहन पारिस्थितिकीवाद


(Shallow and Deep Ecologism)

संदर्भ:

जलवायु परिवर्तन के हालिया प्रभावों (ग्रीष्म लहरों, सूखा आदि) ने ‘पर्यावरण दर्शन’ (Environmental Philosophy) के, प्रकृति और मनुष्यों के बीच संबंधों को फिर से स्पष्ट करने वाले दो पहलुओं – सतही पारिस्थितिकीवाद (Shallow Ecologism) और गहन पारिस्थितिकीवाद (Deep Ecologism) पर ध्यान केंद्रित किया है।

  • 1970 के दशक में नॉर्वेजियन दार्शनिक ‘अर्ने नेस’ (Arne Næss) द्वारा पर्यावरणीय क्षरण के समाधान हेतु अपने परिवेश में जारी प्रदूषण और संरक्षण आंदोलनों से परे देखने का प्रयास करने पर इन ‘दोनों अवधारणाओं’ ने जन्म लिया था।
  • मानव को पर्यावरण संकट के केंद्र में रखते हुए, ‘अर्ने नेस’ ने पारिस्थितिकीवाद की दो अवधारणाओं के बीच के अंतर को रेखांकित किया था।

‘सतही पारिस्थितिकीवाद’ (Shallow Ecologism) के बारे में:

इसके लिए ‘दुर्बल पारिस्थितिकीवाद’ (Weak Ecologism) के रूप में भी जाना जाता है।

प्रदूषण और संसाधनों की कमी के खिलाफ शक्तिशाली और फैशनेबल लड़ाई’, ‘सतही पारिस्थितिकीवाद’ या ‘सतही पर्यावरणवाद’ होता है।

  • इस दर्शन के प्रतिपादक, पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के उद्देश्य से विशिष्ट बदलाव के साथ, हमारी वर्तमान जीवन शैली को जारी रखने में विश्वास करते हैं।
  • उदहारण के तौर पर, इस दर्शन के अनुसार, कम प्रदूषण करने वाले वाहनों अथवा क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) नहीं छोड़ने वाले एयर कंडीशनरों का उपयोग किया जा सकता है।

‘गहन पारिस्थितिकीवाद’ (Deep Ecologism) के बारे में:

‘गहन पारिस्थितिकीवाद’ का मानना ​​है कि मनुष्य को प्रकृति के साथ अपने संबंधों को जड़-मूल से बदल देना चाहिए।

  • इसके तहत, हमारी जीवन शैली में बड़े पैमाने पर परिवर्तन करके प्रकृति को बनाए रखने पर जोर दिया जाता है।
  • इन परिवर्तनों में, वन क्षेत्रों को संरक्षित करने के लिए ‘मांस’ की व्यावसायिक खेती को सीमित करना और जानवरों को कृत्रिम रूप से मोटा करने को कम करना, या परिवहन प्रणालियों को फिर से आकार देना, जैसे कि आंतरिक दहन इंजन का उपयोग करना, आदि शामिल हो सकते हैं।

‘गहन पारिस्थितिकीवाद’ किन विषयों पर जोर देता है?

  • सशक्त नीति निर्माण और इसका कार्यान्वयन।
  • नीति-निर्माण के लिए, पारिस्थितिक रूप से जिम्मेदार तकनीकी कौशल के पुनर्विन्यास तथा आविष्कारों के लिए नए दिशा-निर्देशों के माध्यम से सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
  • ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ (Survival of the Fittest) सिद्धांत का पुनर्मूल्यांकन किया जाए। ‘योग्यतम की उत्तरजीविता’ को, प्रकृति का शोषण करने या उस पर हावी होने की बजाय, प्रकृति के साथ सहयोग करने और सहअस्तित्व की मानवीय क्षमता के माध्यम से समझा जाना चाहिए।
  • इस प्रकार, गहन पारिस्थितिकीवाद ‘आप या मैं’ दृष्टिकोण की बजाय ‘जियो और जीने दो’ के दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है।

‘सतही पारिस्थितिकीवाद’ से जुड़ी समस्याएं:

  1. ‘गहन पारिस्थितिकीवाद’ के समर्थक, ‘सतही पारिस्थितिकीवाद’ में ‘मनुष्यों’ को जीवन के अन्य रूपों- जैसे कि जीव, जंतु, पक्षी आदि- से अधिक प्राथमिकता दिए जाने तथा आधुनिक समाजों में ‘पर्यावरण के लिए विनाशकारी जीवन-शैली को संरक्षित करने के के तरीके को खारिज करते हैं।
  2. ‘गहन पारिस्थितिकीवाद’ का मानना है कि इस तरह की जीवन शैली को जारी रखने से, सतही पारिस्थितिकीवाद विभिन्न देशों के बीच असमानताओं में और अधिक वृद्धि करता है।
  3. उदाहरण के लिए, दुनिया की आबादी का केवल पांच प्रतिशत होने के बावजूद, संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया की 17% ऊर्जा खपत के लिए जिम्मेदार है, और चीन के बाद विद्युत् का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नॉर्वेजियन दार्शनिक अर्ने नेस
  2. पारिस्थितिकीवाद
  3. सतही पारिस्थितिकी
  4. गहन पारिस्थितिकी

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

WMO की वैश्विक जलवायु पर वार्षिक एवं दशकीय अद्यतन रिपोर्ट


(WMO Global Annual to Decadal Climate Update)

संदर्भ:

हाल ही में, विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) द्वारा ‘वैश्विक जलवायु पर वार्षिक एवं दशकीय अद्यतन’ (Global Annual to Decadal Climate Update) रिपोर्ट जारी की गई है।

इस वार्षिक अपडेट में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित जलवायु वैज्ञानिकों की विशेषज्ञता, और निर्णय-लेने वालों के लिए कार्रवाई योग्य जानकारी प्रदान करने हेतु, दुनिया भर के प्रमुख जलवायु केंद्रों की सर्वोत्तम भविष्यवाणी प्रणालियों का उपयोग किया गया है।

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष:

  1. इस बात की 50 प्रतिशत संभावना है कि विश्व, अगले पांच वर्षों के किसी एक साल में अस्थायी रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस उष्मन को पार कर सकती है।
  2. 93 प्रतिशत संभावना है कि वर्ष 2022 और 2026 के बीच कम से कम एक वर्ष, सबसे गर्म वर्ष के रूप में वर्ष 2016 के रिकॉर्ड को तोड़ देगा।
  3. वैश्विक उष्मन में अस्थायी रूप से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने की संभावना 2015 से लगातार बढ़ रही है। वर्ष 2015 में उष्मन शून्य के करीब था। 2017 और 2021 के बीच के वर्षों में, इसके 10% से अधिक होने की संभावना थी। 2022-2026 की अवधि के लिए यह संभावना बढ़कर लगभग 50% हो गई है।
  4. वर्ष 2022 और 2026 के बीच प्रत्येक वर्ष के लिए ‘वार्षिक औसत वैश्विक ‘सतह के निकट’ तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर (वर्षों 1850-1900 में औसत) से अधिक बढ़कर, 1.1 डिग्री सेल्सियस और 1.7 डिग्री सेल्सियस के बीच होने का अनुमान है।
  5. आर्कटिक तापमान विसंगति, 1991-2020 के औसत की तुलना में, उत्तरी गोलार्ध में अगली पांच विस्तारित सर्दियों में औसत निकले जाने पर, वैश्विक औसत विसंगति से तीन गुना अधिक होने का अनुमान है।
  6. दिसंबर-फरवरी 2022/23 के लिए ‘अल नीनो दक्षिणी दोलन’ परिघटना होने के कोई संकेत नहीं है, लेकिन 2022 में ‘दक्षिणी दोलन सूचकांक’ के सकारात्मक होने की भविष्यवाणी की गई है।

रिपोर्ट में भारत विशिष्ट निष्कर्ष:

  • भारत, विश्व स्तर पर उन कुछ क्षेत्रों में शामिल हो सकता है, जिनके लिए वर्ष 2022 और अगले चार वर्षों में ‘तापमान सामान्य से कम’ रहने की भविष्यवाणी की गई है।
  • इसका कारण, इस दशक में वर्षा गतिविधियों में संभावित वृद्धि हो सकती है। भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक बारिश होगी। इससे तापमान कम रहेगा।

इंस्टा जिज्ञासु:

  • तापमान को ‘1.5 डिग्री सेल्सियस’ तक रखने का लक्ष्य पेरिस समझौते में निहित है, जिसका उद्देश्य “पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को 2 से नीचे, अधिमानतः 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना है।”
  • ‘1.5 डिग्री सेल्सियस’ 1800 के दशक के अंत में पृथ्वी के औसत तापमान, और आज के औसत तापमान के बीच का अंतर है।
  • इस सीमा को पार करने से पृथ्वी ग्रह के नाजुक पारिस्थितिक तंत्र को अपरिवर्तनीय क्षति होगी, और मानव, पौधे और पशु जीवन पर कठोर प्रभाव पड़ेगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पेरिस समझौता
  2. जलवायु परिवर्तन
  3. जलवायु वित्त
  4. UNFCCC
  5. UNCCD

मेंस लिंक:

WMO की ‘वैश्विक जलवायु पर वार्षिक एवं दशकीय अद्यतन रिपोर्ट’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क


(Open Radio Access Network – Open RAN)

संदर्भ:

‘ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क’ (Open Radio Access Network) या ‘ओपन आरएएन’ (Open RAN),  5जी तकनीक के परिनियोजन के लिए महत्वपूर्ण है। भारत में, ‘ओपन आरएएन’ आर्किटेक्चर आवश्यक है, लेकिन यह चुनौतियों से परिपूर्ण भी है।

‘ओपन आरएएन’ के बारे:

ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क, या ओपन आरएएन, मोबाइल नेटवर्क सिस्टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमे अलग-अलग उपकरणों को, नेटवर्क के अन्य हिस्सों से जोड़ने के लिए सेलुलर रेडियो कनेक्शन का उपयोग किया जाता है।

  • इसमें एंटेना का इस्तेमाल किया जाता है, यह एंटेना हमारे स्मार्टफोन या अन्य संगत उपकरणों को सिग्नल भेजता और प्राप्त करता है। फिर इन सिग्नलों को RAN-बेस स्टेशन में अंकीकरण / डिजिटाइज़ (Digitised) किया जाता है और नेटवर्क से जोड़ा जाता है।
  • ओपन आरएएन या ‘ओ-आरएएन’ (O-RAN), विभिन्न कंपनियों द्वारा निर्मित हार्डवेयर को एक साथ काम करने के लिए, एक सॉफ्टवेयर का उपयोग करता है।

ओपन-आरएएन के लाभ:

  • एक खुला वातावरण, पारितंत्र का विस्तार करता है, और ऑपरेटरों को अधिक विकल्प प्रदान करता है।
  • यह भारतीय संस्थाओं के लिए नेटवर्क उपकरण बाजार में प्रवेश करने के नए अवसरों को बढ़ावा देगा।
  • इससे, 5G को अधिक अनुकूलित और लागत प्रभावी बनाने की उम्मीद है।
  • ‘ओपन आरएएन आर्किटेक्चर’, ओपन इंटरफेस के साथ हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर को अलग करने या पृथक्करण करने की अनुमति देता है।

ओपन आरएएन, पारंपरिक आरएएन से किस प्रकार भिन्न है?

  • पारंपरिक सेट-अप में, ‘रेडियो एक्सेस नेटवर्क’ हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों के एकीकृत प्लेटफॉर्म के रूप में प्रदान किया जाता है। इसमें, विक्रेताओं के लिए रेडियो और बेसबैंड यूनिट को संयोजित करना मुश्किल हो जाता है, और इसीलिए ज्यादातर मामलों में, रेडियो और बेसबैंड यूनिट एक ही आपूर्तिकर्ता से लिए जाते हैं।
  • ‘ओपन आरएएन’ का विचार इस सिस्टम को बदलना है, और ऑपरेटरों के लिए घटकों को संयोजित करने में सक्षम बनाना है।

रेडियो एक्सेस नेटवर्क (RAN):

यह मोबाइल दूरसंचार प्रणाली का एक भाग है। और इसमें ‘रेडियो एक्सेस तकनीक’ का उपयोग किया जाता है।

  • संकल्पनात्मक रूप से, यह मोबाइल फोन, कंप्यूटर या किसी दूरस्थ रूप से नियंत्रित मशीन जैसे उपकरण के बीच स्थापित होता है और अपने कोर नेटवर्क (Core Network) के साथ कनेक्शन प्रदान करता है।
  • RAN की कार्यात्मकता, आम तौर पर कोर नेटवर्क के साथ-साथ उपयोगकर्ता उपकरण दोनों में मौजूद एक सिलिकॉन चिप द्वारा प्रदान की जाती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रेडियो एक्सेस नेटवर्क (RAN)
  2. ओपन आरएएन’ (Open RAN)
  3. 5G तकनीक
  4. TRAI

मेंस लिंक:

‘ओपन रेडियो एक्सेस नेटवर्क’  या ‘ओपन आरएएन’ (Open RAN),  क्या है? इसके महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 चर्चित स्थल – ओडेसा

हाल ही में, रूसी सेना द्वारा यूक्रेन में आपूर्ति लाइनों और हथियारों के लदान को बाधित करने के एक स्पष्ट प्रयास के तहत ‘ओडेसा’ (Odessa) शहर के महत्वपूर्ण बंदरगाह पर हमला किया गया।

  • ‘ओडेसा’, यूक्रेन का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला शहर और एक प्रमुख बंदरगाह तथा परिवहन केंद्र है।
  • यह शहर, देश के दक्षिण-पश्चिम में ‘काला सागर’ के उत्तर-पश्चिमी तट पर स्थित है।
  • ओडेसा को कभी-कभी “पर्ल बाय द सी”, “दक्षिणी राजधानी”, “ओडेसा-ममा” और “द ह्यूमर कैपिटल” के साथ-साथ “दक्षिणी पलमायरा” भी कहा जाता है।
  • ओडेसा, एक उष्ण पानी का बंदरगाह है।

 

भारत का पहला ‘धूम्र-मुक्त राज्य’

हिमाचल प्रदेश, जनवरी 2022 में, भारत में पहला ‘धूम्र-मुक्त राज्य’  (Smoke-Free State) बन गया है।

  • हिमाचल प्रदेश, ने यह उपलब्धि, केंद्र की ‘उज्ज्वला योजना’ और ‘राज्य सरकार की हिमाचल गृहिणी सुविधा योजना’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं के बल पर हासिल की है।
  • यह देश का 100 प्रतिशत एलपीजी-सक्षम राज्य भी है। इसका मतलब है कि हिमाचल में 100% घरों में एलपीजी कनेक्शन हैं।

चर्चा का कारण:

एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वित्तीय वर्ष में, मोदी सरकार की प्रमुख कल्याणकारी योजना ‘प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना’ के 90 लाख लाभार्थियों ने अपने सिलेंडरों को फिर से नहीं भरवाया था। इसी रिपोर्ट में हिमाचल प्रदेश को, भारत में पहला ‘धूम्र-मुक्त राज्य’ बनने की उपलब्धि के लिए सराहना की है’।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान और गुजरात की सरकारों को 20 जुलाई, 2022 से पहले बिजली लाइनों पर ‘बर्ड-डायवर्टर’ की स्थापना सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।

इस कदम का उद्देश्य राजस्थान के राज्य पक्षी ‘ग्रेट इंडियन बस्टर्ड’ (Great Indian Bustard – GIB), और क्षेत्र में पाए जाने वाले ‘खरमोर’ (Lesser Florican)  पक्षी प्रजातियों की रक्षा करना है।

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स (GIB):

  • IUCN स्थिति: गंभीर रूप से संकटग्रस्त।
  • भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 और CMS कन्वेंशन तथा CITES की परिशिष्ट I में सूचीबद्ध।
  • पर्यावरण और वन मंत्रालय के वन्यजीव आवास के एकीकृत विकास कार्यक्रम के तहत पुन:प्राप्ति कार्यक्रम के लिए चिह्नित।
  • प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड – राजस्थान: मौजूदा संरक्षित क्षेत्रों में बस्टर्ड प्रजनन स्थलों की पहचान करना और बाड़ लगाना और साथ ही संरक्षित क्षेत्रों के बाहर के क्षेत्रों में सुरक्षित प्रजनन बाड़ा प्रदान करना।
  • संरक्षित क्षेत्र: मरुस्थल राष्ट्रीय उद्यान अभयारण्य – राजस्थान, रोलपाडु वन्यजीव अभयारण्य – आंध्र प्रदेश और करेरा वन्यजीव अभयारण्य- मध्य प्रदेश।

भारत में वास-स्थल:

राजस्थान में केवल दो जिले – जैसलमेर और बाड़मेर के वन्य क्षेत्रों में प्रजनन करने वाली ग्रेट इंडियन बस्टर्ड्स की आबादी पायी जाती है। यह पक्षी मामूली संख्या में गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में भी पाया जाते हैं।

 

चक्रवात करीम

चक्रवात करीम (Cyclone Karim), वर्तमान में बंगाल की खाड़ी में सक्रिय ‘चक्रवात असानी’ का दक्षिणी गोलार्ध में सक्रिय एक जुड़वां चक्रवात है।

  • दोनों चक्रवातों की उत्पत्ति ‘हिंद महासागर क्षेत्र’ में हुई थी।
  • दोनों चक्रवात एक ही देशांतर में उत्पन्न हुए थे और अब एक दूसरे से अलग रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं।
  • चक्रवात करीम, ऑस्ट्रेलिया के पश्चिम में खुले समुद्र में आगे बाद रहा है।
  • ‘चक्रवात करीम’ का नामकरण, दक्षिण अफ्रीकी देश ‘सेशेल्स’ द्वारा किया गया है।

एसएसआर और श्रीमान दिशानिर्देश

11 मई को प्रौद्योगिकी दिवस के अवसर पर भारत सरकार द्वारा ‘SSR और SRIMAN दिशानिर्देश’ (SSR and SRIMAN Guidelines) जारी किए गए।

  • ‘वैज्ञानिक सामाजिक उत्तरदायित्व’ (Scientific Social Responsibility – SSR) दिशानिर्देशों का व्यापक उद्देश्य विज्ञान और समाज के संबंधों को मजबूत करने के लिए स्वैच्छिक आधार पर वैज्ञानिक समुदाय की गुप्त क्षमता का दोहन करना है और इस तरह एस एंड टी इकोसिस्टम को सामाजिक जरूरतों के लिए उत्तरदायी बनाना है।
  • दिशा-निर्देशों में, मुख्य रूप से विज्ञान-समाज, विज्ञान-विज्ञान और समाज-विज्ञान की खाई को पाटना शामिल है, जिससे सामाजिक लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में विज्ञान के प्रति विश्वास, साझेदारी और जिम्मेदारी त्वरित गति से आती है।
  • श्रीमान दिशानिर्देशों अर्थात साइंटिफिक रिसर्च इन्फ्रास्ट्रक्चर शेयरिंग मेंटेनेंस एंड नेटवक्र्स (Scientific Research Infrastructure Sharing Maintenance and Networks – SRIMAN)) दिशानिर्देशों का उद्देश्य देश भर के वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और उद्योग के पेशेवरों के लिए रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर (आरआई) के कुशल उपयोग और व्यापक पहुंच को बढ़ावा देना है।

भोजशाला

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य के धार जिले में स्थित ‘भोजशाला’ (Bhojshala) स्मारक पर विवाद से संबंधित एक याचिका पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई), केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है।

  • भोजशाला, एएसआई द्वारा संरक्षित 11वीं सदी का स्मारक है, जिसके बारे में हिंदुओं का दावा है कि यह वागदेवी (देवी सरस्वती) का मंदिर है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे ‘कमल मौला मस्जिद’ के रूप में मानता है।
  • भोजशाला का नाम, मध्य भारत के परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज से लिया गया है, जो शिक्षा और कला के संरक्षक थे और जिनके लिए काव्य, योग और वास्तुकला पर प्रमुख संस्कृत कार्यों का श्रेय दिया जाता है।
  • 7 अप्रैल 2003 को एएसआई द्वारा की गई व्यवस्था के अनुसार, हिंदू प्रत्येक मंगलवार को परिसर में पूजा करते हैं, जबकि मुसलमान शुक्रवार को परिसर में नमाज अदा करते हैं।

वीरता पुरस्कार

(Gallantry awards)

हाल ही में, राष्ट्रपति ने रक्षा अलंकरण समारोह (चरण -1) के दौरान सशस्त्र बलों के कर्मियों को 13 शौर्य चक्र प्रदान किए, जिनमे छह कर्मियों को मरणोपरांत यह पुरुस्कार प्रदान किए गए।

सर्वोच्च वीरता पुरस्कार’:

  1. परमवीर चक्र: यह भारत का सर्वोच्च सैन्य अलंकरण है, जो युद्ध के समय, चाहे जमीन पर, समुद्र में या हवा में, वीरता के विशिष्ट कार्यों का प्रदर्शन करने के लिए दिया जाता है।
  2. महावीर चक्र: यह जमीन पर, समुद्र में या हवा में दुश्मन की उपस्थिति में विशिष्ट वीरता के कार्यों के लिए दिया जाने दूसरा सर्वोच्च वीरता पुरस्कार है।
  3. वीर चक्र: यह परमवीर चक्र और महावीर चक्र के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा युद्धकालीन वीरता पुरस्कार है।

रॉयल गोल्ड मेडल 2022

भारतीय वास्तुकार ‘बालकृष्ण विट्ठलदास दोशी’ को वर्ष 2022 के लिए प्रतिष्ठित ‘रॉयल गोल्ड मेडल’ (Royal Gold Medal) से सम्मानित किया गया।

  • रॉयल इंस्टिट्यूट ऑफ़ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स (आरआईबीए), लंदन, यूनाइटेड किंगडम (यूके) द्वारा रॉयल गोल्ड मेडल, वास्तुकला के लिए दुनिया के सर्वोच्च सम्मानों में से एक है।
  • रॉयल गोल्ड मेडल, को यूनाइटेड किंगडम की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा व्यक्तिगत रूप से अनुमोदित किया जाता है, और यह पुरस्कार, वास्तुकला की उन्नति पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ने वाले किसी व्यक्ति या लोगों के समूह को दिया जाता है।