विषयसूची
सामान्य अध्ययन-II
- केंद्र-दिल्ली सरकार विवाद पर संवैधानिक पीठ द्वारा सुनवाई
- राष्ट्रपति शासन
- पुनर्गठित UNSC और NSG में स्थायी सदस्यता के लिए भारत का प्रयास
सामान्य अध्ययन-III
- असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021
- खाद्य संकट 2022 पर वैश्विक रिपोर्ट
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
- हाल ही में चर्चित ‘रो बनाम वेड’ (Roe v. Wade) मामला क्या है?
- परशुराम थीम पार्क
- मस्जिद से लाउडस्पीकर का प्रयोग मौलिक अधिकार नहीं
सामान्य अध्ययन–II
विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।
केंद्र-दिल्ली सरकार विवाद पर संवैधानिक पीठ द्वारा सुनवाई
संदर्भ:
केंद्र सरकार और अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार के बीच राजधानी में नौकरशाहों पर नियंत्रण के लिए चल रही लड़ाई को सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने संविधान पीठ के पास भेज दिया है।
संबंधित प्रकरण:
केंद्र और दिल्ली सरकारों के बीच ‘सेवाओं’ या ‘नौकरशाही’ से जुड़े सीमित सवाल को लेकर खींचतान जारी है।
दिल्ली सरकार के तर्क:
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार द्वारा ‘सेवाओं’ पर नियंत्रण के बिना अपनी ‘स्थिति’ की तुलना, ‘बिना राज्य के राजा’ से की है।
- उदाहरण के लिए, दिल्ली सरकार को स्वास्थ्य सचिव या वाणिज्य सचिव की नियुक्ति करने के लिए उपराज्यपाल की मंजूरी लेनी आवश्यक होती है। यह स्थिति प्रशासन को वास्तव में कठिन और अलोकतांत्रिक बनाती है।
- सरकार का तर्क है कि अधिकारियों के तबादलों और पोस्टिंग को नियंत्रित करने की शक्ति के बिना, “सामूहिक उत्तरदायित्व” के सिद्धांत को बरकरार नहीं रखा जा सकेगा।
केंद्र सरकार का तर्क:
- केंद्र सरकार का तर्क है, कि देश की राजधानी और विशाल महानगर दिल्ली उसके नियंत्रण में होना चाहिए।
- केंद्र का कहना है, कि दिल्ली को एक राज्य विधायिका की “छोटी-छोटी अनुकम्पाओं और कम संसाधनों” के ऊपर नहीं छोड़ा जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संदर्भ में दिए गए अब तक के फैसले:
2018 का फैसला:
- संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से कहा था कि दिल्ली के उपराज्यपाल, दिल्ली सरकार की “सहायता और सलाह” के प्रति बाध्य हैं और दोनों को एक-दूसरे के साथ सौहार्दपूर्वक काम करना चाहिए।
- लोकतंत्र में ‘अराजकता’ या ‘निरंकुशता’ के लिए कोई जगह नहीं होती है।
- सुप्रीम कोर्ट द्वारा वर्ष 2018 में सुनाए गए फैसले में विशेष रूप से ‘सेवाओं’ संबंधी मुद्दे का समाधान नहीं किया गया था।
उच्चत्तम न्यायलय के निर्णय में अनिर्णीत क्षेत्र:
अतिव्यापी क्षेत्र (Overlapping Areas): यद्यपि इस फैसले में शीर्ष अदालत ने यह तय किया था, कि ‘भूमि’, ‘लोक-व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ से संबंधित मामलों को छोड़कर, दिल्ली के उपराज्यपाल अन्य मामलों में दिल्ली सरकार की सहायता और सलाह पर कार्य करने के लिए बाध्य है। किंतु, ‘लोक व्यवस्था’ का अर्थ अपने आप में बहुत व्यापक है, जोकि बाद में कार्यकारी शक्तियों को अतिव्यापी बनाता है।
अनुच्छेद 239AA (4) पर स्पष्टता का आभाव (No Clarity on Article 239AA (4): अदालत ने मंत्रिमंडल द्वारा निर्णय लिए गए किसी विषय पर उपराज्यपाल और राज्य सरकार के बीच मतभेद होने की स्थिति में, राष्ट्रपति को संदर्भित किए जाने वाले ‘विषयों’ स्पष्ट रूप से निर्धारित या निरुपित नहीं किया है।
खुली शब्दावली (Open-Ended Terminologies): किसी मामले को राष्ट्रपति के लिए संदर्भित करने की स्थिति में, न्यायालय ने स्पष्ट कहा है, कि उपराज्यपाल को सहकारी संघवाद, संवैधानिक संतुलन और संवैधानिक शासन की अवधारणा के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हालाँकि, ये शब्द बहुत व्यापक और खुले हुए हैं। तथा इनकी अलग-अलग व्याख्यायें की जा सकती हैं।
फरवरी 2019 में सुनाया गया निर्णय:
राजधानी में ‘सेवाओं’ पर नियंत्रण के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा फरवरी 2019 में सुनाए गए फैसले में विभाजित राय दी गयी थी।
- जस्टिस भूषण ने माना, कि दिल्ली सरकार के पास ‘सेवाओं’ पर कोई अधिकार नहीं है।
- जबकि, जस्टिस सीकरी ने बीच का रास्ता अपनाया और निष्कर्ष निकाला कि सचिव, विभाग प्रमुख और संयुक्त सचिव के रैंक के अधिकारियों के स्थानांतरण और पोस्टिंग की फाइलें सीधे उपराज्यपाल को प्रस्तुत की जा सकती हैं।
- जहां तक ‘दिल्ली अंडमान निकोबार द्वीप समूह सिविल सेवा’ (DANICS) कैडर का संबंध है, फाइलों को मुख्यमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद द्वारा संसाधित करके उपराज्यपाल को भेजा जा सकता है।
- और, फिर से किसी मतभेद की स्थिति में, उपराज्यपाल का निर्णय प्रभावी होगा।
दिल्ली सरकार की नवीनतम मांगें:
- दिल्ली सरकार ने ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार अधिनियम’, 2021 (Government of National Capital Territory (GNCTD) Act, 2021), और ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के कार्रवाई नियम, 1993’ के नियम 13 (13 Rules of the ‘Transaction of Business of the Government of National Capital Territory of Delhi Rules, 1993’) में संशोधन को रद्द करने की अलग से मांग की है।
- राज्य सरकार का तर्क है, कि ये संशोधन संविधान की मूल संरचना के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं और केंद्र सरकार द्वारा इन परिवर्तनों के माध्यम से, दिल्ली के लोगों की निर्वाचित सरकार की तुलना में उपराज्यपाल को अधिक शक्ति दी गयी है।
(नोट: क्या आप ‘राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार (जीएनसीटीडी) संशोधन अधिनियम, 2021’ के बारे में अधिक जानना चाहते हैं? यह काफी महत्पूर्ण आर्टिकल है)।
दिल्ली का प्रशासन:
दिल्ली एक विधायिका सहित ‘केंद्र शासित प्रदेश’ है।
- वर्ष 1991 में संविधान (उनहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1991 के द्वारा संविधान में अनुच्छेद 239AA को जोड़ा गया था, इसके तहत एक विधायिका सहित केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली का गठन किया गया था।
- मूल अधिनियम के अनुसार, दिल्ली विधान सभा को लोक व्यवस्था, पुलिस और भूमि को छोड़कर सभी मामलों में कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।
प्रीलिम्स लिंक:
- अनुच्छेद 239A बनाम 239AA
- दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यपाल की शक्तियाँ
- दिल्ली का प्रशासन, विधायिका वाले अन्य राज्यों के प्रशासन से किस प्रकार भिन्न है?
- दिल्ली को विधायिका कब प्रदान की गयी?
- दिल्ली उपराज्यपाल की नियुक्ति किस प्रकार की जाती है?
मेंस लिंक:
संविधान (उनहत्तरवां संशोधन) अधिनियम, 1991 पर एक टिप्पणी लिखिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।
राष्ट्रपति शासन
(President’s Rule)
संदर्भ:
केंद्रीय गृह मंत्रालय अमित शाह ने ‘राज्य’ में राष्ट्रपति शासन की संभावना से इनकार किया है, क्योंकि भारी जनादेश वाली निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करना अनुचित होगा।
संबंधित प्रकरण:
कानून व्यवस्था चरमराने का आरोप लगाते हुए राज्य में केंद्रीय शासन की मांग उठ रही है। कार्यकर्ताओं के अपनी मांग को जायज ठहराने के लिए राजनीतिक हत्याओं, सामूहिक बलात्कार और हिंसा के अन्य स्वरूपों रूपों का हवाला दिया जा रहा है।
भारतीय संदर्भ में राष्ट्रपति शासन:
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत, भारत के राष्ट्रपति को, यह समाधान होने पर कि, ‘राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसमें उस राज्य का शासन संविधान के उपबंधों के अनुसार नहीं चलाया जा सकता है’, राज्य सरकार को निलंबित करने और देश के किसी भी राज्य के राष्ट्रपति शासन लगाने की शक्ति प्रदान की गयी है।
इसके लिए ‘राज्य आपातकाल’ (State Emergency) या ‘संवैधानिक आपातकाल’ (Constitutional Emergency) के रूप में भी जाना जाता है।
- राष्ट्रपति शासन लागू होने पर कोई मंत्रिपरिषद नहीं होती है। इस दौरान विधान सभा या तो स्थगित या भंग हो जाती है।
- राज्य की सरकार केंद्र सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आ जाती है और राज्यपाल भारत के राष्ट्रपति का प्रतिनिधित्व करते हुए कार्यवाही जारी रखते हैं।
संसदीय अनुमोदन और अवधि:
- राष्ट्रपति शासन लागू करने के लिए संसद के दोनों सदनों की मंजूरी की आवश्यकता होती है।
- अनुमोदित होने के बाद किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन छह महीने की अवधि तक लागू रह सकता है।
- राष्ट्रपति शासन को अधिकतम तीन साल तक के लिए लगाया जा सकता है और इसके लिए प्रति छह महीने के बाद संसद के दोनों सदनों से अनुमोदन लेना आवश्यक होता है।
राज्यपाल की रिपोर्ट:
अनुच्छेद 356 के तहत, राष्ट्रपति को राज्यपाल से रिपोर्ट प्राप्त करने अथवा इस तथ्य से संतुष्ट होने पर कि, राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है, कि राज्य सरकार संविधान के प्रावधानों के अनुसार शासन नहीं चला पा रही है, राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है।
निरसन (Revocation):
राष्ट्रपति शासन को राष्ट्रपति द्वारा एक घोषणा के बाद किसी भी समय निरसित किया जा सकता है। इस तरह की उद्घोषणा को संसदीय अनुमोदन की आवश्यकता नहीं होती है।
प्रीलिम्स लिंक:
- राष्ट्रपति शासन क्या होता है?
- राष्ट्रपति शासन कब और किस प्रकार लागू किया जाता है?
- संबंधित प्रावधान
- राज्यपाल की रिपोर्ट
- संसदीय अनुमोदन और अवधि
- राष्ट्रपति शासन का निरसन
- राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य विधायिका की स्थिति
मैंस लिंक:
राष्ट्रपति शासन क्या है, इससे संबंधित मुद्दों पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया।
विषय: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, एजेंसियां और मंच, उनकी संरचना, अधिदेश।
पुनर्गठित UNSC और NSG में स्थायी सदस्यता के लिए भारत का प्रयास
(India’s bid for permanent membership in reformed UNSC, NSG)
संदर्भ:
फ्रांस ने, फिर से गठित की गयी ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ (UNSC) में स्थायी सदस्यता के लिए भारत के दावे और ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’ (Nuclear Suppliers’ Group – NSG) में नई दिल्ली के प्रवेश का समर्थन करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।
भारत की मांग का समर्थन:
‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ के पांच स्थायी सदस्यों में से चार सदस्यों द्वारा द्विपक्षीय रूप से ‘भारत की उम्मीदवारी’ के लिए समर्थन व्यक्त किया जा चुका है।
‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ (UNSC) के बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।
‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ तथा ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’ में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का आधार:
- भारत, संयुक्त राष्ट्र संघ का संस्थापक सदस्य है।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि विभिन्न अभियानों में तैनात, भारत के शांति सैनिकों की संख्या, P5 देशों की तुलना में लगभग दोगुनी है।
- भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र और दूसरा सबसे अधिक आबादी वाला देश भी है।
- मई 1998 में भारत को एक परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र (Nuclear Weapons State – NWS) का दर्जा प्राप्त हुआ था, और वह मौजूदा स्थायी सदस्यों के समान परमाणु हथियार संपन्न है, इस आधार पर भी भारत सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का स्वभाविक दावेदार बन जाता है।
- भारत, तीसरी दुनिया के देशों का निर्विवाद नेता है, और यह ‘गुटनिरपेक्ष आंदोलन’ और जी-77 समूह में भारत द्वारा नेतृत्व की भूमिका से सपष्ट परिलक्षित होता है।
‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’ (NSG) के बारे में:
48 सदस्यीय ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’, परमाणु हथियारों के अप्रसार में योगदान करने वाले तथा परमाणु प्रौद्योगिकी और विखंडनीय सामग्री के व्यापार से संबंधित देशों का एक विशिष्ट क्लब है।
- स्थापना: इस समूह की स्थापना वर्ष 1974 में भारत द्वारा किए गए परमाणु परीक्षण (स्माइलिंग बुद्धा) के प्रत्युत्तर में की गयी थी।
- ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों’ का यह समूह, परमाणु हथियारों के निर्माण में इस्तेमाल की जा सकने वाली सामग्रियों, उपकरणों और प्रौद्योगिकी के निर्यात को नियंत्रित करके परमाणु प्रसार को रोकने की कोशिश करता है।
- NSG की पहली बैठक नवंबर 1975 में लंदन में हुई थी, और इसलिए इसे आमतौर पर “लंदन क्लब” के रूप में भी जाना जाता है।
- इसके दिशानिर्देश बाध्यकारी नहीं होते हैं।
NSG सदस्यता से जुड़े लाभ-
समूह में शामिल होने के बाद ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’ के सदस्य निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- ‘परमाणु मामलों’ पर समय पर सूचना।
- सूचना साझा करने के माध्यम से योगदान।
- सदस्य देश की साख की पुष्टि होती है।
- सदस्य देश सामंजस्य और समन्वय के साधन के रूप में कार्य कर सकते हैं।
- समूह की सदस्य बहुत ही पारदर्शी प्रक्रिया का हिस्सा होता है।
भारत की NSG सदस्यता के प्रयास का विरोध:
पांच परमाणु हथियार संपन्न देशों में से एक चीन, भारत की NSG सदस्यता के प्रयास का मुख्य रूप से इस आधार पर कड़ा विरोध करता है कि नई दिल्ली परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है।
- चीन के विरोध ने ‘समूह’ में भारत के प्रवेश को कठिन बना दिया है क्योंकि एनएसजी आम सहमति के सिद्धांत पर काम करता है।
- हिंद महासागर क्षेत्र से आगे अपनी सैन्य शक्ति को प्रक्षेपित करने की भारत की क्षमता का परीक्षण किया जाना बाकी है।
- इसके अलावा, भारत अपनी सैन्य आवश्यकताओं के लिए अमेरिका और रूस से हथियारों के आयात पर काफी अधिक निर्भर है।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप जानते हैं कि एनएसजी की सदस्यता के लिए निर्धारित मानदंडों के बारे में जानते हैं?
प्रीलिम्स लिंक:
- ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ के बारे में।
- सदस्य
- चुनाव
- कार्य
- UNSC प्रेसीडेंसी के बारे में
- संयुक्त राष्ट्र चार्टर के बारे में
- ‘परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह’ (NSG) के बारे में
मेंस लिंक:
‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ में सुधारों की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: बिजनेस स्टैंडर्ड।
सामान्य अध्ययन–III
विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।
असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021
(Assam Cattle Preservation Act, 2021)
संदर्भ:
असम में लगभग एक साल से भी कम समय पहले लागू किए गए गौ संरक्षण कानून – असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021 (Assam Cattle Preservation Act, 2021) की वजह से मेघालय में ‘बीफ संकट’ (Beef Crisis) की विकट स्थिति उत्पन्न हो गयी है।
- इस पर्वतीय राज्य में उपभोग के लिए मवेशियों के उपलब्ध नहीं होने के कारण राज्य का मुख्य पशु बाजार भी बंद कर दिया गया है।
- असम में ‘विभिन्न दबाव समूहों’ ने हाल ही में ‘असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021’ के खिलाफ एक रैली आयोजित की, जिसमें इस कानून को धर्म के नाम पर कृषि अर्थव्यवस्था पर हमला बताया गया है।
- इस कानून का उद्देश्य मवेशियों के वध, उपभोग और परिवहन को विनियमित करना है।
अधिनियम के प्रमुख बिंदु:
- इस क़ानून के तहत, गाय, बछड़ा और बछिया का वध वर्जित किया गया है।
- असम राज्य से अथवा राज्य से होकर मवेशियों का परिवहन प्रतिबंधित किया गया है।
- मुख्य रूप से हिंदू, जैन, सिख और अन्य गैर-बीफ खाने वाले समुदायों के निवास वाले क्षेत्रों में बीफ (गौमांस) या बीफ उत्पादों की बिक्री प्रतिबंधित की गयी है।
- किसी भी मंदिर, सत्र (Satra) या अन्य हिंदू धार्मिक संस्थानों के 5 किमी के दायरे में बीफ या बीफ उत्पादों की बिक्री प्रतिबंधित होगी।
असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 2021 का उल्लंघन करने पर सजा:
अधिनियम के तहत, नियमों का उल्लंघन करने वालों के लिए, न्यूनतम तीन साल से आठ साल तक का कारावास या 3 लाख रुपये से 5 लाख रुपये के बीच जुर्माना, या कारावास और जुर्माना दोनों की सजा हो सकती है। अगर कोई दोषी व्यक्ति, उसी प्रकार का समान या संबंधित अपराध करने का दूसरी बार दोषी पाया जाता है, तो सजा दोगुनी हो जाएगी।
इस कानून की आवश्यकता:
- राज्य में, पर्याप्त सुरक्षा बलों की तैनाती के बावजूद भारत-बांग्लादेश सीमा पर अवैध मवेशियों की तस्करी में वृद्धि हुई है।
- केंद्र सरकार के अनुसार, सीमा सुरक्षा बलों द्वारा वर्ष 2016 और 2020 के बीच भारत-बांग्लादेश सीमा पर 476,035 मवेशियों के सिर जब्त किए गए है।
कानून से संबंधित विवादास्पद प्रावधान/आलोचनाएं:
- यह कानून किसी भी प्रावधान पर ध्यान दिए बिना, गोहत्या को पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है।
- इसके तहत, किसी भी मंदिर से 5 किमी के दायरे में बीफ और बीफ उत्पादों की बिक्री पर रोक लगायी गयी है। यह प्रतिबंध, 5 किमी के दायरे में रहने वाले निवासियों पर ‘बीफ’ का उपभोग करने पर पूर्ण प्रतिबंध जैसा प्रतीत होता है।
- कानून में यह निर्दिष्ट किया गया है, कि इस संबंध में निरीक्षण करने, तलाशी और हिरासत में लेने का अधिकार किसे होगा, और यह शक्ति, पशु चिकित्सा अधिकारी, पुलिस अधिकारी (उप निरीक्षक या ऊपर के पद पर तैनात अधिकारी), और राज्य सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति को प्रदान की गई है। इस शक्ति का राजनीतिक या सांप्रदायिक दुरुपयोग भी हो सकता है।
- कानून में उल्लंघन करने पर दी जाने सजा और जुर्माना काफी कठोर है। भारतीय दंड संहिता, 1860 में इस प्रकार की सजा बहुत गंभीर अपराधी को दी जाती है।
पृष्ठभूमि:
असम बांग्लादेश के साथ 263 किमी की सीमा साझा करता है, जिसमें से 143.9 किमी सीमा स्थलीय और 119.1 किमी नदीय सीमा है।
आगे की चुनौतियां:
- असम में, भारत-बांग्लादेश सीमा पर आवाजाही के कई निकास बिंदु हैं, जिनके माध्यम से अवैध पशु तस्करी की सुविधा मिलती रहती है।
- पशुओं की अवैध तस्करी, बांग्लादेश की सीमा से लगे पश्चिम बंगाल और मेघालय राज्यों से भी होती है।
- कुछ साल पहले, ‘सीमा सुरक्षा बल’ (बीएसएफ) ने सीमा पर 65 मवेशी गलियारों की पहचान की थी और सरकार के लिए ‘पशु तस्करी’ को रोकने के लिए कुछ उपायों का सुझाव दिया था।
- असम में स्थानीय पुलिस अधिकारी अक्सर दावा करते हैं, कि कानून उन्हें किसी को मवेशियों को दूसरे राज्य में ले जाने से रोकने की अनुमति नहीं देता है। यदि मवेशियों का परिवहन करने वालों को रोका जाता है, तो तस्कर लोग इन्हें अपने निजी मवेशी बता देते हैं।
इंस्टा जिज्ञासु:
गोहत्या का निषेध भी संविधान के अनुच्छेद 48 में निहित राज्य नीति के निदेशक सिद्धांतों में से एक है। गांधीवादी विचारों से प्रेरित ‘राज्य के नीति निदेशक तत्वों’ को जानिए।
प्रीलिम्स लिंक:
- ‘असम मवेशी संरक्षण अधिनियम’ के बारे में
- प्रमुख प्रावधान
- प्रयोज्यता
मेंस लिंक:
‘असम मवेशी संरक्षण अधिनियम’ से संबंधित चिंताओं और मुद्दों पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।
खाद्य संकट 2022 पर वैश्विक रिपोर्ट
संदर्भ:
हाल ही में, ‘ग्लोबल नेटवर्क अगेंस्ट फूड क्राइसिस’ (Global Network Against Food Crises – GNAFC) द्वारा ‘खाद्य संकट 2022 पर वैश्विक रिपोर्ट’ (Global Report on Food Crises 2022) जारी की गई है।
यह GNAFC द्वारा प्रकाशित की जाने वाली प्रमुख रिपोर्ट है और इसे ‘खाद्य सुरक्षा सूचना नेटवर्क’ (Food Security Information Network – FSIN) की सहायता से तैयार किया गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:
- वैश्विक स्तर पर वर्ष 2020 की तुलना में 2021 में लगभग 40 मिलियन अधिक लोगों को खाद्य संकट या बदतर स्तर पर ‘तीव्र खाद्य असुरक्षा’ का सामना करना पड़ा है।
- आधा मिलियन से अधिक इथियोपियाई, दक्षिणी मेडागास्कर, दक्षिण सूडानी और यमनवासी तीव्र खाद्य असुरक्षा के शिकार हैं।
- 53 देशों या क्षेत्रों में 193 मिलियन से अधिक लोगों ने वर्ष 2021 में खाद्य संकट या बदतर स्तर पर तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना किया था।
इन संकटों के पीछे के कारण:
- विभिन्न क्षेत्रों में जारी ‘संघर्ष’ की वजह से, 24 देशों / क्षेत्रों में 139 मिलियन लोगों को तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इन देशों/क्षेत्रों में इस समस्या से ग्रस्त लोगो की संख्या में 2020 में 99 मिलियन की वृद्धि हुई है।
- चरम मौसम (Weather Extremes) की घटनाओं की वजह से आठ देशों / क्षेत्रों में 23 मिलियन से अधिक लोग ‘तीव्र खाद्य असुरक्षा’ का सामना करने के लिए विवश हुए है, जोकि 2020 में 15 देशों / क्षेत्रों में इससे ग्रसित लोगों की संख्या से 15.7 मिलियन से अधिक है।
- 2021 में ‘आर्थिक झटकों’ के कारण 21 देशों / क्षेत्रों में 30 मिलियन से अधिक लोगों को तीव्र खाद्य असुरक्षा का सामना करना पड़ा, जोकि 2020 में 17 देशों / क्षेत्रों में इस स्थित से प्रभावित 40 मिलियन से अधिक लोगों से कम है।
क्या किये जाने की आवश्यकता है?
- खाद्य संकट के मूल कारणों का स्थायी रूप से समाधान करने के लिए रोकथाम, प्रत्याशा और बेहतर लक्ष्यीकरण के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए।
- पहुंच संबंधी बाधाओं को दूर करने और नकारात्मक दीर्घकालिक प्रवृत्तियों को दूर करने के समाधान के रूप में, अग्रिम पंक्ति की मानवीय प्रतिक्रिया के रूप में छोटे जोत वाली कृषि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
‘ग्लोबल नेटवर्क अगेंस्ट फूड क्राइसिस’ (GNAFC) के बारे में:
- इसकी स्थापना 2016 में यूरोपीय संघ, ‘खाद्य एवं कृषि संगठन’ (Food and Agriculture Organization – FAO), और विश्व खाद्य कार्यक्रम (World Food Programme – WFP) द्वारा की गई थी।
- यह, खाद्य संकटों को रोकने, तैयारी करने और प्रतिक्रिया देने और ‘भुखमरी को समाप्त करने के लिए सतत विकास लक्ष्य’ (SDG 2) को सहायता प्रदान करने के लिए एक साथ काम करने वाले ‘मानवीय और विकास अभिकर्ताओं’ का एक गठबंधन है।
खाद्य सुरक्षा सूचना नेटवर्क (FSIN) के बारे में:
- यह, खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO), विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और अंतर्राष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान (International Food Policy Research Institute – IFPRI) द्वारा सह-प्रायोजित एक वैश्विक पहल है।
- खाद्य सुरक्षा सूचना नेटवर्क का उद्देश्य, विश्लेषण और निर्णय लेने हेतु मार्गदर्शन के लिए विश्वसनीय और सटीक डेटा तैयार करने के लिए ‘खाद्य और पोषण सुरक्षा सूचना प्रणाली’ को मजबूत करना है।
‘तीव्र खाद्य असुरक्षा’ क्या है?
जब किसी व्यक्ति की पर्याप्त भोजन का उपभोग करने में असमर्थता की वजह से उसका जीवन या आजीविका तत्काल खतरे में पड़ जाती है, तो इसे ‘तीव्र खाद्य असुरक्षा’ (Acute food insecurity) की स्थिति माना जाता है।
- यह संयुक्त राष्ट्र की वार्षिक ‘स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड रिपोर्ट’ द्वारा हर साल रिपोर्ट की गई दीर्घकालिक भुखमरी की तुलना में अधिक गंभीर स्थिति होती है।
- जब कोई व्यक्ति सामान्य, सक्रिय जीवन शैली को बनाए रखने के लिए एक लंबी अवधि तक पर्याप्त भोजन का उपभोग करने में असमर्थ होता है, तो उसे ‘दीर्घकालिक भुखमरी’ (Chronic Hunger) की स्थिति समझा जाता है।
प्रीलिम्स लिंक:
- विश्व खाद्य कार्यक्रम
- खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की संरचना और उद्देश्य।
- यूरोपीय संघ बनाम यूरोज़ोन
- विश्व मानवतावादी शिखर सम्मेलन (WHS) क्या है?
- खाद्य संकट के खिलाफ वैश्विक नेटवर्क की शुरुआत
मेंस लिंक:
भारत में खाद्य सुरक्षा की स्थिति की विवेचना कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
हाल ही में चर्चित ‘रो बनाम वेड’ (Roe v. Wade) मामला क्या है?
उत्तर: यह 1973 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया ऐतिहासिक निर्णय है।
इस फैसले के द्वारा अमेरिका में गर्भपात को वैध बना दिया गया था।
चर्चा का कारण:
जानकारी के मुताबिक, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट अपने इस फैसले को पलटने के लिए तैयार है।
- चूंकि अमेरिका में ‘गर्भपात के अधिकार’ की रक्षा करने वाला कोई संघीय कानून नहीं है, इसलिए ‘रो बनाम वेड’ मामले के फैसले को पलटने से ‘गर्भपात कानून’ पूरी तरह से राज्यों का विषय बन जाएगा।
- हालंकि, इसके बाद ‘रूढ़िवादी राज्य’ (Conservative states) अपने राज्यों में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा 1973 में ‘भ्रूण व्यवहार्यता मानक’ निर्धारित करने से पहले के गर्भपात को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों को वापस लागू कर सकते हैं।
भारत में गर्भापात संबंधी प्रावधान:
भारत में ‘मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट’, 1971 (Medical Termination of Pregnancy Act, 1971) के अंतर्गत, गर्भावस्था के 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति प्रदान की गयी है।
- 2021 में एक संशोधन के माध्यम से, विशेष परिस्थितयों में गर्भवती महिलाओं- जैसे बलात्कार या अनाचार के शिकार लोगों के लिए, दो पंजीकृत डॉक्टरों की मंजूरी से गर्भपात की अनुमति के लिए निर्धारित 20 सप्ताह की ऊपरी सीमा को बढाकर 24 सप्ताह कर दिया गया था।
- विकलांग भ्रूण होने के मामले में, गर्भपात के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है, लेकिन इसके लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सरकारों द्वारा स्थापित विशेषज्ञ डॉक्टरों के एक मेडिकल बोर्ड द्वारा अनुमति लेनी आवश्यक है।
परशुराम थीम पार्क
कर्नाटक सरकार द्वारा ‘करकला’ (Karkala) में बनने वाले ‘परशुराम थीम पार्क’ के लिए ₹1.5 करोड़ जारी किए जाएंगे।
- पौराणिक रूप से परशुराम को ‘मालाबार’ का संस्थापक माना जाता है और कहा जाता है कि उन्होंने क्षत्रियों का वध करने का प्रायश्चित करने के लिए उत्तर क्षेत्र से लाए गए पुरोहित वर्ग के सदस्यों को जमीन दान में दी थी।
- इनको हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के दशावतारों में से छठा अवतार माना जाता है।
- परशुराम को चिरंजीवी (अमर) माना जाता है, और यह कहा जाता है कि वे कलियुग के अंत में विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार, कल्कि के गुरु के रूप में प्रकट होंगे।
मस्जिद से लाउडस्पीकर का प्रयोग मौलिक अधिकार नहीं
हाल ही में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि मस्जिद से लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करना ‘मौलिक अधिकार’ नहीं है।
- मई 2020 में, उच्च न्यायालय ने माना कि ‘अज़ान’ इस्लाम का एक अनिवार्य और अभिन्न अंग हो सकता है, लेकिन लाउडस्पीकर या अन्य ध्वनि-प्रवर्धक उपकरणों के माध्यम से प्रार्थना करने को धर्म का अभिन्न अंग नहीं कहा जा सकता है; और
- संविधान के अनुच्छेद 25 में निहित सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का समान अधिकार- लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्नय तथा इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन है।












