विषयसूची
सामान्य अध्ययन-II
1. दिल्ली के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोकपाल का स्थायी कार्यालय
2. सीलबंद लिफाफा न्याय-प्रणाली
3. हरियाणा पंचायत राज अधिनियम
4. प्रेस फ्रीडम इंडेक्स
सामान्य अध्ययन-III
1. शुक्र ग्रह पर इसरो का मिशन
2. आपदा अनुकूलित अवसंरचना पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
1. लैप्सस$
2. भारत में जन्म के समय लिंगानुपात
सामान्य अध्ययन–II
विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।
दिल्ली के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में लोकपाल का स्थायी कार्यालय
संदर्भ:
‘लोकपाल’ (Lokpal) के लिए ‘दक्षिण दिल्ली’ में स्थित ‘वर्ल्ड ट्रेड सेंटर’ में अपना नया कार्यालय दिया गया है।
पृष्ठभूमि:
वर्ष 2013 में ‘लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम’ पारित होने के पांच साल बाद, न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष (सेवानिवृत्त) को मार्च 2019 में आठ अन्य सदस्यों के साथ भारत का पहला लोकपाल नियुक्त किया गया था।
लोकपाल अधिनियम 2013 के बारे में प्रमुख तथ्य:
लोकपाल अधिनियम 2013 (Lokpal Act of 2013), में केंद्र-स्तर पर लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्त नामक भ्रष्टाचार रोधी लोकपाल की स्थापना किए जाने का प्रावधान किया गया है।
- संरचना: लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होंगे।
- अधिनियम में, अभियोजन के लंबित होने के बावजूद, भ्रष्ट तरीकों से अर्जित संपत्ति की कुर्की और जब्ती के प्रावधान किए गए हैं।
- राज्यों के लिए, अधिनियम के प्रवर्तित होने के एक वर्ष के भीतर ‘लोकायुक्त’ की स्थापना करना अनिवार्य होगा।
- अधिनियम में ‘व्हिसलब्लोअर’ (Whistleblowers) के रूप में कार्य करने वाले लोक सेवकों की रक्षा सुनिश्चित की गयी है।
लोकपाल के अधिकार क्षेत्र और शक्तियां:
- लोकपाल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर सकता है। प्रधान मंत्री या केंद्र सरकार में मंत्री, या संसद सदस्य सहित समूह ए, बी, सी और डी के तहत केंद्र सरकार के अधिकारी, लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र के अंर्तगत शामिल होंगे। किंतु सशस्त्र बल लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे।
- लोकपाल निकाय, किसी भी बोर्ड, निगम, सोसाइटी, ट्रस्ट या स्वायत्त निकाय के अध्यक्षों, सदस्यों, अधिकारियों और निदेशकों तथा संसद के किसी अधिनियम द्वारा स्थापित या केंद्र द्वारा पूर्ण या आंशिक रूप से वित्त पोषित और किसी भी समाज या ट्रस्ट या निकाय, जो ₹10 लाख से ऊपर का विदेशी योगदान प्राप्त करता हो, के खिलाफ शिकायतों की जांच कर सकता है।
लोकपाल की शक्तियां:
- लोकपाल के पास ‘प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी’ (Ombudsman) द्वारा भेजे गए मामलों में सीबीआई सहित किसी भी जांच एजेंसी का अधीक्षण करने और निर्देश देने की शक्ति होगी।
- अधिनियम के अनुसार- लोकपाल, किसी लोक सेवक के खिलाफ प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार का मामला सामने आने पर, किसी जांच एजेंसी (जैसे सतर्कता या सीबीआई) द्वारा जांच शुरू किए जाने से पहले ही, उस व्यक्ति को अपने समक्ष हाजिर होने आदेश दे सकता है तथा पूछताछ कर सकता है।
- लोकपाल द्वारा निर्दिष्ट मामले की जांच कर रहे सीबीआई के किसी भी अधिकारी को लोकपाल की मंजूरी के बिना स्थानांतरित नहीं किया जाएगा।
- अधिनियम में किसी भी जांच को छह महीने के भीतर पूरा किए जाने को अनिवार्य किया गया है। हालाँकि, लोकपाल या लोकायुक्त द्वारा जांच के संदर्भ में, एक बार में छह महीने के विस्तार की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते ऐसे विस्तार की आवश्यकता के कारण लिखित रूप में दिए गए हों।
- लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित की जाएंगी।
इंस्टा जिज्ञासु:
‘लोकपाल’ की अवधारणा की उत्पत्ति के बारे में संक्षेप में पढ़िए।
प्रीलिम्स लिंक:
- लोकपाल
- लोकपाल एवं लोकायुक्त की नियुक्ति कौन करता है?
- शक्तियाँ और कार्य
- पात्रता
- लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 का अवलोकन
मेंस लिंक:
लोकपाल अधिनियम में किए गए परिवर्तनों और इसके प्रवर्तन में देरी पर टिप्पणी कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।
सीलबंद लिफाफा न्याय-प्रणाली
(Sealed cover jurisprudence)
संदर्भ:
‘मीडिया वन’ (Media One) पर प्रतिबंध संबंधी मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों द्वारा आरोपी/अन्य पक्ष के साथ जानकारी साझा किए बिना ‘सीलबंद लिफाफे’ (Sealed Covers) में ‘अपराध-संकेती दस्तावेज’ / सामग्री (Incriminating Material) पेश किए जाने की वैधता की जांच करने संबंधी अपने इरादे को फिर से दोहराया है।
‘सीलबंद लिफाफा न्याय-प्रणाली’ (Sealed cover jurisprudence) का मुद्दा शीर्ष अदालत में जारी सुनवाई के दौरान, 15 मार्च केंद्र सरकार द्वारा ‘मीडिया वन’ पर प्रतिबंध लगाए जाने के संबंध में आंतरिक फाइलों को ‘सीलबंद लिफाफे’ में दिए जाने की कोशिश किए जाने पर उठा था।
‘सीलबंद लिफाफा न्याय-प्रणाली’ क्या है?
यह सर्वोच्च न्यायालय और कभी-कभी निचली अदालतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली एक व्यवस्था है, जिसमे अदालत द्वारा सरकारी एजेंसियों से सीलबंद लिफाफों में जानकारी की मांग जाती है अथवा स्वीकार की जाती है, जिसे केवल न्यायाधीश ही देख सकते हैं।
- यद्यपि किसी विशिष्ट कानून में ‘सीलबंद लिफ़ाफ़े’ के सिद्धांत को परिभाषित नहीं किया गया है, तथापि सुप्रीम कोर्ट को, उच्चतम न्यायालय नियमावली के अनुक्रम XIII के नियम 7 (Rule 7 of order XIII of the Supreme Court Rules) और 1872 के ‘भारतीय साक्ष्य अधिनियम’ (Indian Evidence Act of 1872) की धारा 123 से इसका उपयोग करने की शक्ति प्राप्त होती है।
उच्चतम न्यायालय नियमावली के अनुक्रम XIII का नियम 7:
उक्त नियम के तहत यह कहा गया है, कि यदि मुख्य न्यायाधीश या अदालत द्वारा किसी जानकारी को सीलबंद लिफाफे में रखने का निर्देश दिया जाता है अथवा इसे गोपनीय प्रकृति का माना जाता है, तो किसी भी पक्ष को ऐसी जानकारी की सामग्री तक पहुंच की अनुमति नहीं दी जाएगी।
अपवाद:
- यदि मुख्य न्यायाधीश स्वयं आदेश देते हैं, कि विरोधी पक्ष को इस जानकारी को देखने या एक्सेस करने की अनुमति दी जाए।
- उच्चतम न्यायालय नियमावली के अनुसार, यदि ऐसा माना जाता है कि किसी जानकारी के खुलासा जनता के हित में नहीं है, तो ऐसी जानकारी को गोपनीय रखा जा सकता है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 123:
इस क़ानून के तहत, राज्य के मामलों से संबंधित आधिकारिक अप्रकाशित दस्तावेज संरक्षित किए जाएंगे और किसी ‘लोक अधिकारी’ को ऐसे दस्तावेजों का खुलासा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है।
‘गोपनीय’ या ‘विश्वासनीय’ तरीके से मांगे जाने के अन्य उदाहरण: जब किसी जानकारी- जैसेकि पुलिस केस डायरी में दर्ज विवरण आदि- का खुलासा चल रही जांच में बाधा डालता है, तो ऐसी जानकारी को ‘सीलबंद लिफाफे’ में प्रस्तुत किए जाने की मांग की जा सकती है।
‘सीलबंद लिफाफों’ के पक्ष में तर्क:
- जब मामला ‘सरकारी गोपनीयता अधिनियम’ (Official Secrets Act) से संबंधित होता है।
- सरकारी एजेंसी में जनता का विश्वास बनाए रखना।
- जानकारी का संबंध, संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं या सुरक्षा के संवेदनशील पहलुओं से संबंधित मामलों से होने पर।
- यौन उत्पीड़न या बाल शोषण के शिकार लोगों के बारे में विवरण, जो उनके भविष्य के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं और ‘गरिमा के साथ जीने के अधिकार’ को प्रभावित करने वाली अनावश्यक शर्मिंदगी ला सकते हैं।
- जानकारी का खुलासा, कभी-कभी चल रही जांच को भी प्रभावित करता है।
‘सीलबंद लिफाफा न्याय-प्रणाली’ के साथ समस्याएं:
- यह ‘पारदर्शिता और जवाबदेही’ के सिद्धांतों के खिलाफ है।
- तर्क वितर्क के दायरे को कम करता है।
- निष्पक्ष सुनावी और न्यायनिर्णयन में बाधा उत्पन्न करता है।
- प्रकृति में मनमानी / इच्छाधीन है।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।
हरियाणा पंचायत राज अधिनियम
संदर्भ:
हरियाणा में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल फरवरी, 2021 में समाप्त हो गया था। लेकिन, ‘हरियाणा पंचायत राज (द्वितीय संशोधन) अधिनियम’, 2020 (Haryana Panchayat Raj (Second Amendment) Act, 2020) के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा किए गए कुछ संशोधनों को चुनौती देते हुए ‘पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय’ में दायर कई याचिकाओं के कारण अगले चुनावों में देरी हो रही है।
अधिनियम में किए गए जिन संशोधनों पर सवाल उठाया गया है, वे पंचायतों में पिछड़ी जातियों और महिलाओं के लिए आरक्षण से संबंधित हैं।
संबंधित प्रकरण:
- ‘हरियाणा पंचायत राज (द्वितीय संशोधन) अधिनियम’, 2020 के खिलाफ दायर याचिकाओं में ‘संशोधनों’ को “मनमाना, अनुचित और अवैध” बताया गया है।
- याचिका में कहा गया है कि ‘हरियाणा पंचायती राज अधिनियम’, 1994 (Haryana Panchyati Raj Act, 1994) के अनुसार, यदि गांव की कुल जनसंख्या में आधी आबादी अनुसूचित जाति की है, तो पंचायत क्षेत्र में 50 प्रतिशत सीटों को अनुसूचित जाति द्वारा भरा जाना आवश्यक है और इन सीटों को विशेष रूप से अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित किया जाएगा।
हरियाणा पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) अधिनियम, 2020 के प्रमुख बिंदु:
- इस अधिनियम में, निर्वाचक जनता के लिए ‘पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों’ को ‘वापस बुलाने का अधिकार’ (Right to Recall) प्रदान किया गया है।
- अधिनियम के तहत, इन ग्रामीण निकायों में महिलाओं को 50% आरक्षण प्रदान किया गया है।
- पिछड़े वर्गों में “अधिक वंचितों” को 8% आरक्षण दिए जाने का प्रावधान किया गया है।
- प्रदर्शन करने में विफल रहने पर, ग्राम सरपंचों और ब्लॉक-स्तरीय पंचायत समितियों और जिला-स्तरीय जिला परिषदों के सदस्यों को वापस बुलाने की अनुमति देती गयी है।
अनुपालन प्रक्रिया:
किसी सरपंच और निकायों के सदस्यों को वापस बुलाने के लिए, एक वार्ड या ग्राम सभा के 50% सदस्यों को लिखित में देना होगा कि वे उक्त प्रतिनिधियों को वापस बुलाने की कार्यवाही शुरू करना चाहते हैं।
इसके बाद एक गुप्त मतदान होगा, जिसमें प्रतिनिधियों को वापस बुलाने के लिए ‘दो-तिहाई सदस्यों’ द्वारा उनके खिलाफ मतदान किया जाना अनिवार्य होगा।
73वें और 74वें संशोधन के प्रमुख अधिदेशात्मक प्रावधान:
- सभी स्थानीय निकायों के लिए नियमित प्रत्यक्ष चुनाव।
- राज्य स्तरीय चुनाव आयोग और वित्त आयोगों की स्थापना।
- प्रत्येक स्थानीय निकाय में दलितों और आदिवासियों के लिए- कुल जनसंख्या में उनके हिस्से के अनुपात में- सीटों का अनिवार्य आरक्षण।
- महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण।
- ग्रामीण और शहरी निकायों की योजनाओं को समेकित करने हेतु ‘जिला योजना समितियों’ की स्थापना।
प्रीलिम्स लिंक:
- 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों का अवलोकन।
- भारतीय संविधान की 11वीं अनुसूची में शामिल विषयों की सूची।
- ‘राज्य चुनाव आयोग’ के बारे में।
- हरियाणा पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2020 का अवलोकन।
मेंस लिंक:
हरियाणा पंचायती राज (द्वितीय संशोधन) विधेयक, 2020 के प्रावधानों पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
विषय: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएँ, सीमाएँ और संभावनाएँ; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।
प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक
(Press Freedom Index)
संदर्भ:
हाल ही में, ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (Reporters Without Borders) द्वारा ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’, 2022 / ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’, 2022 (20 वां संस्करण) द्वारा प्रकाशित किया गया है।
- यह ‘सूचकांक’ 3 मई को ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ के अवसर पर जारी किया गया।
- इस रिपोर्ट में, ‘मीडिया ध्रुवीकरण’ (Media Polarisation) – जिससे देशों के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देशों के बीच विभाजन पैदा होता है – में कुल मिलाकर दो गुना वृद्धि होने की ओर इशारा किया गया है।
‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ के बारे में:
- वर्ष 2002 से प्रतिवर्ष, ‘रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर’ (Reporters Sans Frontieres – RSF) या ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ (Reporters Without Borders) द्वारा ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ का प्रकाशन किया जाता है।
- पेरिस स्थित, ‘रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर’ (RSF) एक स्वतंत्र गैर सरकारी संगठन है, और इसे संयुक्त राष्ट्र, यूनेस्को, यूरोपीय परिषद और अंतर्राष्ट्रीय फ्रैंकोफोनी संगठन (International Organization of the Francophonie – OIF) में सलाहकार का दर्जा प्राप्त है।
- यह सूचकांक, पत्रकारों के लिए उपलब्ध स्वतंत्रता के स्तर के अनुसार देशों और क्षेत्रों को रैंक प्रदान करता है। हालांकि, यह ‘पत्रकारिता की गुणवत्ता’ का संकेतक नहीं होता है।
- प्रत्येक देश या क्षेत्र के अंकों का आंकलन, पांच प्रासंगिक संकेतकों – राजनीतिक संदर्भ, कानूनी ढांचा, आर्थिक संदर्भ, सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ और सुरक्षा- का उपयोग करके किया जाता है।
सूचकांक में भारत का प्रदर्शन:
- वर्ष 2022 में भारत, 180 देशों की सूची में, आठ स्थान नीचे फिसलकर 142वें स्थान से 150वें स्थान पर आ गया है।
- रिपोर्ट के अनुसार, भारत की रैंकिंग “पत्रकारों के खिलाफ हिंसा” और “राजनीतिक रूप से पक्षपातपूर्ण मीडिया” के कारण नीचे गिरी है। इसकी वजह से, प्रेस की स्वतंत्रता विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में “संकट” की स्थिति में पहुँच गयी है।
- अधिक लोकतांत्रिक होने वाले राष्ट्रों के बीच, भारत की मीडिया को “उत्तरोत्तर सत्तावादी और/या राष्ट्रवादी सरकारों” के दबाव का सामना करना पड़ता है।
- रिपोर्ट में, भारत के नीतिगत ढांचे को दोष दिया गया है, जोकि सैद्धांतिक रूप में सुरक्षा प्रदान करने वाला है, लेकिन और सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को “राष्ट्र-विरोधी” बताते हुए इनके खिलाफ मानहानि, देशद्रोह, अदालत की अवमानना का उपयोग करने और ‘राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा’ जैसे आरोपों का सहारा लेता है।
सूचकांक में अन्य देशों का प्रदर्शन:
- ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’, 2022 में, नॉर्वे (पहला) डेनमार्क (दूसरा), स्वीडन (तीसरा) एस्टोनिया (चौथा) और फ़िनलैंड (5 वां) ने शीर्ष स्थान हासिल किया है।
- 180 देशों की सूची में, ‘उत्तर कोरिया’ सबसे निचले स्थान पर है।
- ‘सूचकांक’ में रूस को 155वें स्थान पर रखा गया है।
भारत के पड़ोसी देशों का प्रदर्शन:
- नेपाल, वैश्विक रैंकिंग में 30 अंकों की बढ़त के साथ 76वें स्थान पर पहुंच गया है।
- सूचकांक में पाकिस्तान को 157वें, श्रीलंका को 146वें, बांग्लादेश को 162वें और म्यांमार को 176वें स्थान पर रखा गया है।
- चीन को सूचकांक में 175वें स्थान पर रखा गया है।
‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ के बारे में:
वर्ष 1991 में ‘यूनेस्को’ की महासभा द्वारा सिफारिश किए जाने के बाद 1993 में ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ द्वारा ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस’ (World Press Freedom Day – WPFD) की घोषणा की गई थी।
- यह दिवस, यूनेस्को द्वारा ‘विंडहोक घोषणा’, 1991 (Windhoek Declaration) अपनाए जाने को भी चिह्नित करता है।
- इसका उद्देश्य, ‘स्वतंत्र, स्वतंत्र और बहुलवादी प्रेस का विकास’ करना है।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप 2020 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा स्थापित ‘सूचकांक निगरानी प्रकोष्ठ’ / इंडेक्स मॉनिटरिंग सेल (IMC) के बारे में जानते हैं?
प्रीलिम्स लिंक:
- ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ के बारे में।
- भारत और उसके पड़ोसी देशों का प्रदर्शन।
- सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश।
- पिछले वर्षों के दौरान विभिन्न देशों का प्रदर्शन और उनकी तुलना।
मेंस लिंक:
भारत के संदर्भ में ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ के निष्कर्षों पर टिप्पणी कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
सामान्य अध्ययन–III
विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।
शुक्र ग्रह के लिए इसरो का मिशन
(ISRO mission to Venus)
संदर्भ:
चंद्रमा और मंगल पर ‘मिशन’ भेजने के बाद, इसरो (ISRO) द्वारा सौर मंडल के सबसे गर्म ग्रह – शुक्र की सतह के निचले भाग का अध्ययन करने तथा इसको चारों ओर से घेरे हुए ‘सल्फ्यूरिक एसिड’ के बादलों के रहस्यों को उजागर करने हेतु ‘शुक्र ग्रह’ की कक्षा में भेजने के लिए एक ‘अंतरिक्ष यान’ तैयार किया जा रहा है।
इसरो द्वारा इस मिशन को दिसंबर 2024 में लॉन्च करने की योजना बनाई जा रही है।
शुक्र ग्रह के बारे में:
- शुक्र (Venus), सूर्य से दूसरा ग्रह है और सौरमंडल का सबसे गर्म ग्रह है, जिसकी सतह का तापमान 500C है – जो सीसा को पिघलाने के लिए पर्याप्त है।
- ग्रह का वातावरण काफी सघन है, जो मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फ्यूरिक एसिड के समूहन से बना है।
- शुक्र ग्रह के परिघूर्णन में पृथ्वी के 0226 दिनों के बराबर समय लगता है। अर्थात शुक्र ग्रह पर एक दिन की अवधि, ग्रह के एक वर्ष से अधिक होती है, क्योंकि शुक्र को सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा लगाने में पृथ्वी के 225 दिनों के बराबर समय लगता है।
- पृथ्वी की तुलना में शुक्र ग्रह के कोर का व्यास लगभग 4,360 मील (7,000 किमी) है।
- शुक्र ग्रह, पूर्व से पश्चिम की ओर घूर्णन करने वाले मात्र दो ग्रहों में से एक है। केवल शुक्र और यूरेनस “विपरीत दिशा में” घूर्णन करते है।
शुक्र ग्रह के लिए भेजे गए ऐतिहासिक मिशन:
- मैगलन (Magellan) – नासा मिशन. जो 1994 में समाप्त हो गया।
- वीनस एक्सप्रेस (Venus Express) – यूरोपीय मिशन- वायुमंडलीय विज्ञान पर केंद्रित है।
- अकात्सुकी (Akatsuki) – जापानी अंतरिक्ष यान- वायुमंडलीय विज्ञान पर केंद्रित।
शुक्र ग्रह के नासा के दो नए मिशन:
- डाविंसी प्लस (Davinci+)
डाविंसी प्लस’ ‘डीप एटमॉस्फियर वीनस इन्वेस्टिगेशन ऑफ नोबल गैस, केमिस्ट्री, एंड इमेजिंग’ (Deep Atmosphere Venus Investigation of Noble gases, Chemistry, and Imaging : Davinci+) का संक्षिप्त रूप है। और इस मिशन के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे:
- शुक्र ग्रह का निर्माण और विकास किस प्रकार हुआ, इस बारे में जानकारी हासिल करने के लिए ग्रह के वायुमंडल का आकलन करना।
- शुक्र ग्रह पर क्या कभी कोई महासागर था, इसका निश्चय करना।
- शुक्र ग्रह के ‘गोलीय आकार’ (Tesserae) वाली भूगर्भीय विशेषताओं (ये विशेषताएं पृथ्वी पर स्थित महाद्वीपों के समान हो सकती हैं), की पहली उच्च रिज़ॉल्यूशन वाले चित्र भेजना)।
- वेरिटास (Veritas):
वेरिटास, ‘वीनस एमिस्सिविटी, रेडियो साइंस, आईएनएसएआर, टोपोग्राफी और स्पेक्ट्रोस्कोपी’ (Venus Emissivity, Radio Science, InSAR, Topography, and Spectroscopy : VERITAS) का संक्षिप्त रूप है।
- यह मिशन, शुक्र ग्रह की सतह का, उसके भूगर्भीय इतिहास को समझने के लिए, मानचित्र तैयार करेगा और यह जांच करेगा कि, पृथ्वी की तुलना में यह ग्रह इतने भिन्न तरीके से किस प्रकार विकसित हुआ।
- इस मिशन में, ग्रह की सतह पर स्थित ऊँचे स्थानों का चार्ट बनाने तथा ग्रह पर ज्वालामुखी और भूकंप की घटनाओं के होने अथवा न होने के बारे में पता लगाने के लिए एक तरह के राडार का प्रयोग किया जाएगा।
इंस्टा जिज्ञासु:
- क्या आप जानते हैं कि सोवियत संघ ने ही 1960 के दशक में ‘शुक्र -मिशन’ शुरू किया था? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।
- क्या आप जानते हैं कि कैलिफोर्निया के मोजावे रेगिस्तान में नासा के गोल्डस्टोन एंटीना से शोधकर्ताओं ने 2006 से 2020 तक 21 बार शुक्र की ओर रेडियो तरंगों को प्रसारित किया? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।
प्रीलिम्स लिंक:
- शुक्र ग्रह से जुड़े प्रमुख तथ्य
- इसे ‘पृथ्वी का जुड़वां ग्रह’ क्यों कहा जाता है?
- नासा द्वारा घोषित नवीनतम मिशनों के बारे में
- पिछले ऐतिहासिक मिशन
- शुक्र बनाम पृथ्वी- तुलना
मेंस लिंक:
नासा द्वारा शुक्र ग्रह पर भेजे जाने वाले नवीनतम मिशन के महत्व पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: आपदा और आपदा प्रबंधन।
आपदा अनुकूलित अवसंरचना पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन
(International Conference on Disaster Resilient Infrastructure)
संदर्भ:
हाल ही में, अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure – CDRI) द्वारा ‘यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट’ (USAID) के साथ साझेदारी में ‘आपदा अनुकूलित अवसंरचना पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन’, 2022 (International Conference on Disaster Resilient Infrastructure – ICDRI, 2022) की शुरूआत की गयी।
इस सम्मलेन में भारत सहित CDRI सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भाग लिया।
अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन (CDRI):
‘अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन’, राष्ट्रीय सरकारों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और कार्यक्रमों, बहुपक्षीय विकास बैंकों, निजी क्षेत्र, शैक्षणिक और ज्ञान संस्थानों की एक बहु-हितधारक वैश्विक भागीदारी है।
- ‘सीडीआरआई’ का नेतृत्व और प्रबंधन राष्ट्रीय सरकारों द्वारा किया जाता है। और इसके तहत ‘बुनियादी ढांचे’ / ‘अवसंरचनाओं’ के आपदा-अनुकूलन-लचीलापन के विभिन्न पहलुओं पर उपलब्ध जानकारी पर चर्चा और इसका आदान-प्रदान किया जाता है।
- सीडीआरआई का सचिवालय- नई दिल्ली, भारत में स्थित है।
- गठन: 23 सितंबर, 2019।
- सदस्य: मार्च 2021 तक, अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन’ (CDRI) में 29 सदस्य, जिनमें 22 राष्ट्रीय सरकारें और 7 संगठन शामिल हो चुके हैं।
आपदा अनुकूलित अवसंरचना पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन:
आपदा अनुकूलित अवसंरचना पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन (ICDRI), आपदा एवं जलवायु प्रत्यास्थ बुनियादी ढांचे पर वैश्विक विमर्श को मजबूत करने हेतु सदस्य देशों, संगठनों और संस्थानों के साथ साझेदारी में ‘अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन’ (CDRI) द्वारा वार्षिक रूप से आयोजित किया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन है।
आपदा अनुकूलित बुनियादी ढांचे की आवश्यकता:
‘आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिए सेंडाई फ्रेमवर्क’ (SFDRR) के अंतर्गत, सतत विकास के लिए आधारशिला के रूप में अवसंरचना के बेहतर आपदा-लचीलापन की भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।
SFDRR में नुकसान के न्यूनीकरण से संबंधित चार विशिष्ट लक्ष्य शामिल हैं:
- वैश्विक आपदा मृत्यु दर में कमी।
- प्रभावित लोगों की संख्या में कमी करना।
- प्रत्यक्ष आपदा आर्थिक नुकसान को कम करना।
- महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को आपदा-नुकसान को कम करना।
फ्रेमवर्क में निर्धारित अन्य नुकसानों को कम करने के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ‘बुनियादी ढांचे’ पर लक्ष्य संख्या 4 एक महत्वपूर्ण शर्त है।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप जानते हैं कि ‘अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन’ (CDRI) की शुरुआत भारतीय प्रधान मंत्री द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन 2019 में की गई थी। रतीय प्रधान मंत्री ने इसे जलवायु परिवर्तन शमन की दिशा में एक “व्यावहारिक दृष्टिकोण और रोडमैप” करार दिया है।
स्रोत: द हिंदू।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
लैप्सस$
लैप्सस$ (Lapsus$) एक साइबर अपराध समूह है जिसे दक्षिण अमेरिका में स्थित बताया जाता है।
यह समूह अपेक्षाकृत नया है, लेकिन उसने माइक्रोसॉफ्ट जैसी प्रमुख फर्मों में सफलतापूर्वक सेध लगा चुका है।
- इस अपराधी समूह ने अपने शिकार के स्रोत कोड और आंतरिक दस्तावेज़ों को लीक करते हुए उनको सार्वजनिक रूप से तमाचा मारा है।
- इसकी हैकिंग रणनीति में, फोन आधारित सोशल इंजीनियरिंग, अकाउंट अधिग्रहण की सुविधा के लिए सिम-स्वैपिंग, लक्षित संगठनों में कर्मचारियों के व्यक्तिगत ईमेल खातों तक पहुंच आदि शामिल हैं।
चर्चा का कारण:
22 मार्च को, प्रमाणीकरण मंच ‘ओक्टा’ (Okta) ने पुष्टि की है, कि साइबर अपराध समूह लैप्सस $ के हैकर्स ने तीन महीने पहले उसके सिस्टम में घुसपैठ करने की कोशिश की थी।
भारत में जन्म के समय लिंगानुपात
नागरिक पंजीकरण प्रणाली रिपोर्ट, 2020 पर आधारित ‘महत्वपूर्ण सांख्यिकी’ पर वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार:
- केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख (1104) ने 2020 में देश में जन्म के समय सबसे अधिक लिंगानुपात दर्ज किया है, इसके बाद अरुणाचल प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, त्रिपुरा और केरल का स्थान है।
- जन्म के समय सबसे कम लिंगानुपात मणिपुर (880), उसके बाद दादरा और नगर हवेली और दमन और दीव (898), गुजरात (909), हरियाणा (916) और मध्य प्रदेश (921) में दर्ज किया गया।
- 2019 में, जन्म के समय सबसे अधिक लिंगानुपात अरुणाचल प्रदेश (1024) में दर्ज किया गया, इसके बाद नागालैंड (1001) का स्थान रहा।
जन्म के समय लिंगानुपात ‘प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं’ की संख्या होता है।











