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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 4 May 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

  1. दया याचिका
  2. राष्ट्रभाषा संबंधी बहस
  3. टीकाकरण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय
  4. टीकाकरण हिचकिचाहट

सामान्य अध्ययन-III

  1. मौद्रिक नीति समिति
  2. नेटग्रिड

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. ऑपरेशन सतर्क
  2. जिव्हाळा योजना
  3. कान्स फिल्म मार्केट में ‘कंट्री ऑफ़ ऑनर’

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

दया याचिका


(Mercy Plea)

संदर्भ:

हाल में ‘सुप्रीम कोर्ट’ ने केंद्र सरकार को पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के मामले में दोषी अपराधी को रिहा करने की सलाह दी है, क्योंकि वह पहले ही तीन दशक से अधिक की सजा काट चुका है।

आगे की कार्रवाई:

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तमिलनाडु के राज्यपाल के खिलाफ कार्रवाई करने की सलाह भी दी है, क्योंकि राज्यपाल ने ‘दोषी’ को रिहा करने के संबंध में ‘राज्य मंत्रिमंडल’ की बाध्यकारी सलाह को “अनदेखा” करने का निर्णय लिया है।

संबंधित प्रकरण:

तमिलनाडु के राज्यपाल ने ‘राज्य मंत्रिमंडल’ की सलाह को नजरअंदाज करते हुए कहा है, कि ‘दया याचिका’ / ‘क्षमादान याचिका’ (Mercy Plea) याचिका पर फैसला करने का अधिकार राष्ट्रपति के पास है।

Current Affairs

 

‘अनुच्छेद 161 के बारे में:

संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत, किसी राज्य के राज्यपाल को उस विषय संबंधी, जिस विषय पर उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, किसी विधि के विरुद्ध किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा, उसका प्रविलंबन, विराम या परिहार करने की अथवा दंडादेश में निलंबन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्रदान की गयी है।

अनुच्छेद 72 बनाम अनुच्छेद 161:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के अंर्तगत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का विस्तार, अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल की क्षमादान शक्ति से अधिक व्यापक है।

ये शक्ति निम्नलिखित दो प्रकार से भिन्न होती है:

  1. अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का विस्तार सजा कोर्ट मार्शल द्वारा प्रदान की गयी सजा अथवा दंड पर भी होता है, जबकि, अनुच्छेद 161 के अंतर्गत राज्यपाल के लिए ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं की गयी है।
  2. राष्ट्रपति को मृत्युदंड के सभी मामलों में क्षमा प्रदान करने की शक्ति प्राप्त है लेकिन राज्यपाल को प्राप्त क्षमादान शक्ति का विस्तार मृत्युदंड के मामलों पर नहीं है।

क्षमादान शक्ति का महत्व:

कार्यपालिका की क्षमादान शक्ति काफी महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह न्यायपालिका द्वारा की गई त्रुटियों में सुधार करती है। इसके द्वारा अभियुक्त के अपराध या निर्दोषता पर विचार किए बगैर उसे दोषसिद्धि किए जाने संबंधी प्रभाव को समाप्त किया जाता है।

  1. क्षमादान शक्ति, न्यायपालिका की त्रुटि अथवा संदेहात्मक दोषसिद्धि के मामले में किसी निर्दोष व्यक्ति को दंडित होने से बचाने में काफी सहायक होती है।
  2. क्षमादान शक्ति का उद्देश्य न्यायिक त्रुटियों को ठीक करना है। क्योंकि कोई भी न्यायिक प्रशासन संबंधी मानव प्रणाली खामियों से मुक्त नहीं हो सकती है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 161 के बारे में
  2. अनुच्छेद 72
  3. राष्ट्रपति बनाम राज्यपालों की क्षमादान शक्ति
  4. क्षमादान संबंधी विषयों पर राज्यपाल को कैबिनेट की सलाह
  5. न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप- न्यायिक समीक्षा

मेंस लिंक:

राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

राष्ट्रभाषा संबंधी बहस


संदर्भ:

हाल ही में, हिंदी सिनेमा के एक अभिनेता द्वारा इस आशय की टिप्पणी की गयी कि, ‘हिंदी, भारत की राष्ट्रीय भाषा’ (National Language) है, जिससे संविधान के अंतर्गत ‘भाषा’ की स्थिति पर विवाद खड़ा कर दिया।

क्या भारत की कोई राष्ट्रभाषा है?

भारत के संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रीय दर्जा नहीं दिया गया है।

हिंदी की संवैधानिक स्थिति:

संविधान के अनुच्छेद 343 (Article 343) के अनुसार– संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी, संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा।

  • संविधान सभा की चर्चाओं में यह निर्णय लिया गया कि, इस संविधान के प्रारंभ से पंद्रह वर्ष की अवधि तक संघ के उन सभी शासकीय प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी भाषा का प्रयोग किया जाता रहेगा।
  • संविधान में कहा गया है कि, 15 साल के बाद, संसद कानून द्वारा अंग्रेजी के उपयोग और निर्दिष्ट उद्देश्यों के लिए अंकों के देवनागरी रूप में उपयोग पर निर्णय ले सकती है।

अनुच्छेद 351: हिंदी भाषा के विकास के लिए निदेश–

संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे जिससे वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और उसकी प्रकृति में हस्तक्षेप किए बिना हिंदुस्थानी में और आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करते हुए उसकी समृद्धि सुनिश्चित करे।

हिंदी अधिरोपण के विरोध की शुरुआत:

संविधान में मूल रूप से आधिकारिक उद्देश्यों के लिए 15 वर्ष तक अंग्रेजी के उपयोग की अनुमति दी गयी थी। इस अवधि के समाप्त होने से पहले संसद द्वारा ‘राजभाषा अधिनियम, 1963’ (The Official Languages Act, 1963) पारित किया गया था।

  • इस अधिनियम के कार्यात्मक अनुभाग में, 15 साल की अवधि पूरी होने के बावजूद अंग्रेजी का उपयोग जारी रखने के संबंध में प्रावधान किए गए हैं।
  • तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वर्ष 1959 में आश्वासन दिया था कि आधिकारिक कार्यों में अंग्रेजी का उपयोग जारी रहेगा, और यह केंद्र एवं राज्यों के बीच संचार की भाषा रहेगी।
  • राजभाषा अधिनियम, 1963 में, प्रधानमंत्री के इस आश्वासन को स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया था, जिससे कुछ राज्यों में ‘जनवरी 1965 की समय सीमा’ नजदीक आने पर भाषा को लेकर आशंकाएं पैदा हो गईं।
  • उस समय, प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने सभी उद्देश्यों के लिए हिंदी को आधिकारिक भाषा बनाने की दिशा में सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया था।
  • इससे एक और आशंका पैदा हुई कि, पूरे देश में हिंदी को इस तरह से थोपा जाएगा कि गैर-हिंदी भाषी लोगों के लिए भविष्य में रोजगार की संभावनाएं धूमिल हो जाएंगी।

हिंदी भाषा अधिरोपण के संभावित प्रभाव:

  • हिंदी भाषा का अधिरोपण, गैर-हिंदी भाषियों की सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होगा।
  • यह, अन्य भाषाओं के असितत्व को खतरे में भी डाल सकता है और विविधता को कम कर सकता है।
  • इससे भारत की विविधता और संघवाद को भी खतरा हो सकता है।

‘त्रिभाषा सूत्र’ (Three-Language Formula) क्या है?

1960 के दशक से, केंद्र की शिक्षा नीति के दस्तावेजों में ‘तीन भाषाओं को पढ़ाने’ की बात की जाती है – हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा, और अन्य राज्यों में हिंदी, अंग्रेजी और आधिकारिक क्षेत्रीय भाषा।

  • हालांकि, व्यवहार में, केवल कुछ राज्यों में अंग्रेजी के अलावा अपनी प्रमुख भाषा और हिंदी दोनों को पढाया जाता है।
  • जिन राज्यों में हिंदी ‘आधिकारिक भाषा’ है, वहां तीसरी भाषा को ‘अनिवार्य विषय के रूप में’ शायद ही कभी पढ़ाया जाता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत के किन राज्यों में अदालती कार्यवाही में हिंदी के वैकल्पिक उपयोग का प्रावधान है?
  2. भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची क्या है
  3. अनुच्छेद 348 किससे संबंधित है?
  4. उच्च न्यायालय की कार्यवाही में हिंदी के उपयोग को अधिकृत करने के लिए राज्यपालों की शक्तियां
  5. आठवीं अनुसूची में भाषाओं को सम्मिलित करने अथवा हटाने की शक्ति
  6. राजभाषा अधिनियम 1963 का अवलोकन

मेंस लिंक:

सरकार को प्रशासन में हिंदी और अंग्रेजी भाषा तक सीमित नहीं रहते हुए, अन्य देशज भाषाओं को शामिल करने के लिए आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1963 में संशोधन करने पर विचार करना चाहिए। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

टीकाकरण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता: सर्वोच्च न्यायालय


संदर्भ:

हाल ही में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा है कि, किसी को भी टीकाकरण के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है, क्योंकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के अंतर्गत ‘शरीर की स्वायत्तता और अखंडता’ को सुरक्षा प्रदान की गयी है।

पृष्ठभूमि:

सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में ‘वैक्सीन ट्रायल डेटा’ का खुलासा करने और वैक्सीन लगवाने की अनिवार्यता पर रोक लगाने की मांग की गई थी।

शीर्ष अदालत की टिप्पणियाँ:

  • अदालत ने स्पष्ट करते हुए कहा है, कि वैक्सीन / टीके को अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता है, और किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध टीका लगाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
  • ऐसा इसलिए है क्योंकि, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत किसी व्यक्ति को प्राप्त ‘शरीर की अखंडता के अधिकार’ में ‘टीकाकरण से इंकार का अधिकार’ भी समाहित है।
  • किंतु, “सामुदायिक स्वास्थ्य” के मामले में, सरकार को इस प्रकार के विषयों को विनियमित करने का अधिकार है।
  • इसके अलावा, अदालतों को इस संदर्भ में सरकार द्वारा किए जाने वाले ‘हस्तक्षेप’ की समीक्षा करने का भी अधिकार है, कि क्या सरकार द्वारा बनाए गए नियम ‘के.एस. पुट्टस्वामी मामले’ में संवैधानिक पीठ के निर्णय में प्रतिपादित ‘तीन-स्तरीय’ आवश्यकताओं को पूरा करते हैं? इस निर्णय में, ‘निजता के अधिकार’ को अनुच्छेद 21 के तहत एक ‘संवैधानिक अधिकार’ के रूप में बरकरार रखा गया था।

आगे की कार्रवाई:

  • अदालत ने केंद्र को जल्द से जल्द एक ‘वर्चुअल पब्लिक प्लेटफ़ॉर्म’ स्थापित करने का निर्देश दिया है, ताकि व्यक्तियों और निजी डॉक्टरों को, अपनी निजता को खतरे में डाले बिना टीकाकरण के बारे में प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट करने की सुविधा मिल सके।
  • अदालत ने केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि, बच्चों के टीकाकरण के लिए नियामक अधिकारियों द्वारा पहले से अनुमोदित किए जा चुके टीकों के ‘नैदानिक ​​​​परीक्षणों’ के प्रासंगिक चरणों के निष्कर्ष और परिणाम जल्द से जल्द सार्वजनिक किए जाएं।
  • वैक्सीन परीक्षण डेटा के पृथक्करण के संबंध में, व्यक्तियों की निजता को ध्यान में रखते हुए, परीक्षण किए जा चुके और बाद में किए जाने वाले परीक्षणों से संबंधित सभी डेटा को बिना किसी देरी के जनता के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

‘न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ’ मामला

‘के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ’ (K.S. Puttaswamy vs. Union of India) मामले में सुप्रीमकोर्ट के नौ न्यायाधीशों की पीठ ने वर्ष 2017 में सर्वसम्मति से फैसला सुनाया कि ‘भारत का संविधान प्रत्येक व्यक्ति को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता के मौलिक अधिकार की गारंटी देता है’।

अनुच्छेद 21: किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं।

इस निर्णय में निर्धारित ‘तीन-स्तर’ परीक्षण:

अदालतों को यह तय करने का अधिकार है, क्या सरकार द्वारा किए जाने वाले हस्तक्षेप, किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता में ‘तीन-स्तरीय’ शर्तों को पूरा करते हैं अथवा नहीं।

इस ‘तीन-स्तरीय’ शर्तों में शामिल हैं:

  1. सरकार द्वारा की गयी कार्रवाई किसी कानून के द्वारा समर्थित होनी चाहिए।
  2. मौलिक अधिकारों के विरोध में इस तरह का कानून लाने के लिए, राज्य का वैध हित होना चाहिए।
  3. राज्य द्वारा मूल अधिकारों का किया जाने वाला अतिक्रमण, उसके उद्देश्य के समानुपाती होना चाहिए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘पुन:प्रवर्तन का सिद्धांत’  (Doctrine of Revival) के बारे में जानते हैं?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आईटी अधिनियम की धारा 66ए के बारे में।
  2. संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 के बारे में।
  3. श्रेया सिंघल मामला किससे संबंधित है?
  4. नया आईटी अधिनियम।

मेंस लिंक:

आईटी अधिनियम की धारा 66ए को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा क्यों निरसित कर दिया गया था? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

टीकाकरण में हिचकिचाहट


(Vaccine Hesitancy)

संदर्भ:

पिछले साल, महामारी की दूसरी लहर से पहले, कम टीकाकरण को ‘टीका लगवाने में हिचकिचाहट’ (Vaccine Hesitancy) के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। अब इस बात की काफी संभावना है कि लोग अधिक प्रकार के टीके आने की प्रतीक्षा में, टीका लगवाने के लिए दिए गए अपने विकल्प का प्रयोग कर रहे हैं।

वर्तमान रवैया उस जमीनी हकीकत को सामने रखता है, कि सामान्य जीवन के पूर्ण रूप से खुलने के बावजूद कोविड महामारी का दैनिक संक्रमण अब कम है।

संबंधित चिंताएं:

महामारी के खिलाफ लड़ाई में वैक्सीन, ‘चिकित्सीय साधनों’ (Armamentarium) के आवश्यक हथियारों में से एक है। टीका लगवाने में किसी भी तरह की हिचकिचाहट, महामारी को नियंत्रित करने के प्रयासों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

समय की मांग:

  1. इस झिझक के पीछे के कारणों का उचित समाधान।
  2. दवा / टीके के निर्माण में शामिल विभिन्न प्रक्रियाओं-नैदानिक ​​परीक्षण डिजाइन, संचालन, निगरानी, ​​विश्लेषण, रिपोर्टिंग और स्वीकृत होने से पहले होने वाली नियामक समीक्षा- पर विस्तार से चर्चा करके जनता को विश्वास दिलाना।
  3. इससे जनता, नैदानिक ​​परीक्षणों के दौरान की जाने वाली कठोर प्रक्रियाओं और नियामकों द्वारा किए जाने वाले अनुमोदन के बारे में जागरूक होगी।

टीकाकरण में हिचकिचाहट: संकट में पीढ़ी

  • WHO द्वारा टीकाकरण में हिचकिचाहट को ‘टीकाकरण सेवाओं की उपलब्धता के बावजूद टीके की स्वीकृति में देरी या मनाही’ के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • ‘टीकाकरण में हिचकिचाहट’ को वैश्विक स्वास्थ्य के लिए इस वर्ष घोषित किए गए 10 खतरों में शामिल किया गया है।

प्रीलिम्स और मेंस लिंक:

टीकाकरण-हिचकिचाहट (Vaccine Hesitancy) का तात्पर्य, चिंताएं, चुनौतियां और इनका समाधान करने के तरीके।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

मौद्रिक नीति समिति


(Monetary Policy Committee – MPC)

संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के केंद्रीय निदेशक मंडल द्वारा ‘राजीव रंजन’ को ‘मौद्रिक नीति समिति’ (Monetary Policy Committee – MPC) के पदेन सदस्य के रूप में नामित करने को मंजूरी प्रदान की गयी है।

‘मौद्रिक नीति समिति’ के बारे में:

  • केंद्र सरकार द्वारा गठित आरबीआई की ‘मौद्रिक नीति समिति’ (MPC) का कार्य, रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, बैंक दर, नकद आरक्षित अनुपात (CRR) जैसे उपकरणों का उपयोग करके ‘मौद्रिक नीति’ तैयार करने का है।
  • इसका गठन, भारत की केंद्र सरकार द्वारा 1934 में संशोधित आरबीआई अधिनियम की धारा 45ZB के तहत किया गया है।

कार्य:

‘मौद्रिक नीति समिति’ (MPC) को सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility – MSF) , रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और चलनिधि समायोजन सुविधा (Liquidity Adjustment Facility) सहित विभिन्न नीतिगत दरों को तय करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

‘मौद्रिक नीति समिति’ की संरचना:

इस समिति में छह सदस्य होंगे। छह सदस्यों में से तीन को सरकार द्वारा मनोनीत किया जाएगा। इस समिति में किसी भी सरकारी अधिकारी को मनोनीत नहीं किया जाएगा।

  • समिति के अन्य तीन सदस्य, आरबीआई से शामिल किए जाएंगे।
  • आरबीआई का गवर्नर,‘मौद्रिक नीति समिति’ पदेन अध्यक्ष होंगे।
  • मौद्रिक नीति के प्रभारी आरबीआई के डिप्टी गवर्नर, इस समिति के सदस्य होंगे।
  • साथ ही, केंद्रीय बैंक के कार्यकारी निदेशक भी इस समिति के सदस्य के रूप में कार्य करेंगे।

सदस्यों का चयन एवं कार्यकाल:

चयन: ‘मौद्रिक नीति समिति’ के लिए सरकार द्वारा मनोनीत किए जाने वाले सदस्यों का चयन, कैबिनेट सचिव के नेतृत्व में रिजर्व बैंक के गवर्नर और आर्थिक मामलों के सचिव एवं अर्थशास्त्र या बैंकिंग या वित्त या मौद्रिक नीति के क्षेत्र में तीन विशेषज्ञ सदस्यों की एक खोज-सह-चयन समिति द्वारा किया जाएगा।

कार्यकाल: ‘मौद्रिक नीति समिति’ के सदस्यों को चार साल की अवधि के लिए नियुक्त किया जाएगा और वे पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होंगे।

समिति की निर्णय प्रक्रिया:

‘मौद्रिक नीति समिति’ के निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाएंगे। समिति के प्रत्येक सदस्य को मत देना का अधिकार होगा।

आरबीआई गवर्नर की भूमिका: आरबीआई गवर्नर समिति की अध्यक्षता करेंगे। हालांकि, गवर्नर के पास समिति के अन्य सदस्यों को खारिज करने के लिए वीटो शक्ति नहीं होगी, किंतु ‘बराबर मत होने की स्थिति’ में उनका मत निर्णायक होगा।

‘आरबीआई की मौद्रिक नीति’ के बारे में:

‘मौद्रिक नीति’ शब्द का तात्पर्य ‘भारतीय रिजर्व बैंक’ की उस नीति से है जिसके तहत, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि को प्राप्त करने और मुद्रास्फीति दर को कम करने के उद्देश्य, से आरबीआई द्वारा अपने नियंत्रण में आने वाले मौद्रिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है।

‘भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम 1934’ के अंतर्गत आरबीआई को मौद्रिक नीति बनाने की शक्ति प्रदान की गयी है।

मौद्रिक नीति के लक्ष्य:

मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य वृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है। मूल्य स्थिरता संधारणीय वृद्धि की आवश्यक पूर्व शर्त है।

  • ‘चक्रवर्ती समिति’ द्वारा दिए गए सुझावों के अनुसार, भारत की मौद्रिक नीति की कुछ महत्वपूर्ण भूमिकाएँ, मूल्य स्थिरता, आर्थिक विकास, इक्विटी, सामाजिक न्याय और नए वित्तीय उद्यमों के विकास को प्रोत्साहित करने जैसे पहलू हैं।
  • भारत सरकार द्वारा भारत की जीडीपी के विकास दर में तेजी लाने की कोशिश की जाती है, जबकि आरबीआई मुद्रास्फीति की दर को एक स्थायी सीमा के भीतर नीचे लाने की कोशिश में रहती है।
  • अपने मुख्य उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए, ‘मौद्रिक नीति समिति’ देश के समक्ष मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करने हेतु एक आदर्श नीति ब्याज दर निर्धारित करती है।

मौद्रिक नीति की लिखतें एवं उनका प्रबंधन:

(Monetary Policy Instruments and how they are managed)

मौद्रिक नीति लिखत (Monetary Policy Instruments) दो प्रकार के होते हैं, अर्थात् गुणात्मक लिखित और मात्रात्मक लिखित।

  1. मात्रात्मक लिखितों (Quantitative Instruments) की सूची में, ओपन मार्केट ऑपरेशंस, बैंक रेट, रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, कैश रिजर्व रेशियो, वैधानिक लिक्विडिटी रेशियो, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी (LAF) शामिल होते हैं।
  2. गुणात्मक लिखितों (Qualitative Instruments) के तहत प्रत्यक्ष कार्रवाई, मार्जिन मनी में परिवर्तन और नैतिक दबाव (Moral Suasion) शामिल होते हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘मौद्रिक नीति समिति’ (MPC) के बारे में
  2. संरचना
  3. कार्य
  4. स्थापना

मेंस लिंक:

देश की मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में ‘मौद्रिक नीति समिति’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

 

विषय: विभिन्न सुरक्षा बल और संस्थाएँ तथा उनके अधिदेश।

नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड या नेटग्रिड


(National Intelligence Grid NATGRID)

संदर्भ:

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा हाल ही में बेंगलुरु में ‘नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड’ (National Intelligence Grid NATGRID) परिसर का उद्घाटन किया गया।

नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (NATGRID):

NATGRID की परिकल्पना वर्ष 2009 में की गयी थी, इसका उद्देश्य सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों के लिए एक ‘सुरक्षित मंच’ पर आव्रजन संबधी प्रविष्टियों अर्थात प्रवासियों के आने व जाने संबंधित सूचनाओं, किसी संदिग्ध का टेलीफ़ोन विवरण तथा बैंकिंग संबंधी जानकारी प्राप्त करने हेतु ‘वन-स्टॉप केंद्र’ का निर्माण करना था।

  • वर्ष 2010 में, सुरक्षा मामलों पर कैबिनेट समिति (CCS) द्वारा 3,400 करोड़ रुपये की NATGRID परियोजना को मंजूरी दी गयी थी।
  • NATGRID समाधानों के विकास के लिए, C-DAC पुणे को प्रौद्योगिकी भागीदार और आईआईटी, भिलाई को योजना प्रबंधन सलाहकार के रूप में शामिल किया गया है।

NATGRID के डेटा का उपयोग करने का अधिकार:

यह इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R & AW) सहित कम से कम 10 केंद्रीय एजेंसियों के लिए सुरक्षित प्लेटफॉर्म पर डेटा एक्सेस करने का माध्यम होगा। NATGRID, दूरसंचार, कर-रिकॉर्ड, बैंक, आव्रजन आदि 21 संस्थाओं से डेटा संग्रह करेगा।

आलोचनाएँ:

  1. NATGRID का निजता के संभावित उल्लंघन तथा निजी गोपनीय जानकारी के लीक होने की संभावना के आधार पर विरोध किया जा रहा है।
  2. आतंकवाद को रोकने में इसकी प्रभावकारिता पर भी सवाल उठाया गया है, क्योंकि किसी भी राज्य एजेंसी या पुलिस बल को NATGRID डेटाबेस एक्सेस करने की अनुमति नहीं है, जिससे तत्काल प्रभावी कार्रवाई की संभावना कम हो जाती है।
  3. कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, NATGRID जैसे डिजिटल डेटाबेस का दुरुपयोग किया जा सकता है। पिछले दो दशकों में, आतंकवादियों द्वारा डिजिटल उपकरणों का उपयोग हिंसक गतिविधियों को अंजाम देने के लिए किया गया है।
  4. NATGRID के संदर्भ में खुफिया एजेंसियों ने भी आशंका व्यक्त की है, इनका कहना कि यह उनके कार्य-क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है तथा उनके काम के संदर्भ में अन्य एजेंसियों को जानकारी लीक कर सकता है।

NATGRID की आवश्यकता:

  1. NATGRID जैसे परिष्कृत माध्यमों के न होने का नुकसान यह है, कि पुलिस को कोई जानकारी प्राप्त करने के लिए कठोर तथा अपमानजनक तरीकों को अपनाने के लिए विवश होना पड़ता है।
  1. प्रत्येक आतंकवादी घटना के बाद, पुलिस कई संदिग्धों को गिरफ्तार करती है, जिनमे से अधिकाँश निर्दोष होते हैं। यदि इसके स्थान पर, एक अन्वेषण व पहचान तंत्र के होने पर, मानवाधिकारों के उल्लंघन संबंधी मामलों में कमी आयेगी।
  2. NATGRID, इंटेलिजेंस ब्यूरो के लिए संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों पर नजर रखने में भी मदद करेगा।
  3. पुलिस के पास संदिग्ध व्यक्ति के सभी डेटा तक पहुंच होगी तथा डेटा बेस की मदद से इसकी गतिविधियों को ट्रैक किया जा सकेगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CCTNS क्या है?
  2. NATGRID- उद्देश्य और उद्देश्य।
  3. NCRB क्या है?
  4. NATGRID के अंतर्गत आने वाली एजेंसियां।

मेंस लिंक:

NATGRID के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 ऑपरेशन सतर्क

रेलवे सुरक्षा बल द्वारा, हाल ही में, कर चोरी/तस्करी/अपराध /आतंक के कृत्यों को अंजाम देने के लिए अवैध शराब / एफआईसीएन / अवैध तंबाकू उत्पादों / बेहिसाब सोने / नकदी / कीमती वस्तुओं / अन्य वस्तुएं रेलवे नेटवर्क से परिवहन किये जाने पर कार्रवाई करने के उद्देश्य से “ऑपरेशन सतर्क” (Operation Satark) शुरू किया गया है।

जिव्हाळा योजना

(Jivhala)

जिव्हाळा (Jivhala), जेलों में सजा काट रहे कैदियों के लिए महाराष्ट्र कारागार विभाग द्वारा शुरू की गई एक ऋण योजना है।

  • यह ऋण योजना, महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक द्वारा की पेश की जा रही है।
  • इस योजना को प्रायोगिक तौर पर पुणे के यरवदा सेंट्रल जेल में कैदियों के लिए शुरू किया गया है, और इसे धीरे-धीरे राज्य भर की लगभग 60 जेलों में विस्तारित किया जाएगा।
  • बैंक और जेल अधिकारियों के अनुसार, यह संभवतः भारत में कैदियों के लिए अपनी तरह की पहली क्रेडिट योजना है।
  • इसके तहत, ऋण कैदी के नाम पर वितरित किया जाएगा, लेकिन यह धनराशि नामित परिवार के सदस्यों को जारी की जायगी।
  • योजना के शुरुआती चरण में 7 प्रतिशत ब्याज दर पर 50,000 रुपये का ऋण दिया जाएगा।
  • बैंक द्वारा अर्जित ब्याज का एक प्रतिशत ‘सिस्टम’ को वापस कैदी कल्याण कोष में अंशदान के रूप में दिया जाएगा। यह ऋण बिना किसी बंधक या गारंटर की आवश्यकता के प्रदान किया जाएगा।

कान्स फिल्म मार्केट में ‘कंट्री ऑफ़ ऑनर’

17 मई से 25 मई तक चलने वाले ‘कान्स फिल्म मार्केट’ (Cannes Film Market) में भारत को आधिकारिक रूप से ‘कंट्री ऑफ़ ऑनर’ (Country Of Honour) का दर्जा प्रदान किया गया है।

  • ‘कान्स फिल्म मार्केट’, व्यावसायिक तौर पर ‘कान्स फिल्म फेस्टिवल’ (Cannes Film Festival) का समकक्ष है और दुनिया के सबसे बड़े फिल्म बाजारों में से एक है।
  • 1959 में स्थापित, ‘कान्स फिल्म मार्केट’, ‘फेस्टिवल डे कान्स’ (Festival de Cannes) के साथ प्रतिवर्ष आयोजित किया जाता है।