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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 April 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-II

  1. प्रशासनिक सेवा अधिकारी के इस्तीफे और बहाली संबंधी नियम
  2. राजद्रोह कानून
  3. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा
  4. वैश्विक सुरक्षा पहल

सामान्य अध्ययन-III

  1. अगस्त-सितंबर में 5जी सेवा शुरू होने की संभावना
  2. नासा का एलसीआरडी

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. आदिग्राम (आदिवासी अनुदान प्रबंधन प्रणाली)
  2. वैश्विक सैन्य व्यय
  3. अनंग ताल

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: लोकतंत्र में सिविल सेवाओं की भूमिका।

प्रशासनि क सेवा अधिकारी के इस्तीफे और बहाली संबंधी नियम


(Rules for resignation and reinstatement of an officer)

संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी ‘शाह फैसल’ को पुनः सेवा में ले लिया / बहाल कर दिया गया है। विदित हो कि, ‘शाह फैसल’ ने वर्ष 2019 में कश्मीर में “बेरोकटोक” हो रही हत्याओं के विरोध में ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा’ से इस्तीफा (Resignation) दे दिया था।

यद्यपि, सोशल मीडिया पर उनके द्वारा की गयी कुछ ‘पोस्ट’ की जांच लंबित होने की वजह से, जनवरी 2019 में ‘शाह फैसल’ द्वारा दिया गया त्यागपत्र/ इस्तीफा  सरकार द्वारा स्वीकार नहीं किया गया था।

किसी आईएएस अधिकारी द्वारा त्यागपत्र दिए जाने पर लागू होने वाले नियम:

अखिल भारतीय सेवाओं – भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और भारतीय वन सेवा – में से किसी अधिकारी के त्यागपत्र संबंधी मामले ‘अखिल भारतीय सेवा (मृत्यु सह सेवानिवृत्ति लाभ) नियम’, 1958 (All India Services (Death-cum-Retirement Benefits) Rules, 1958) के नियम 5(1) और 5(1)(A) के तहत शासित होते हैं।

इन नियमों के अनुसार;

  • किसी संवर्ग (राज्य) में सेवारत एक अधिकारी को अपना इस्तीफा राज्य के मुख्य सचिव को प्रस्तुत करना होगा।
  • केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात अधिकारी को अपना त्यागपत्र संबंधित मंत्रालय या विभाग के सचिव को सौंपना होगा।
  • अखिल भारतीय सेवाओं के किसी अधिकारी के त्यागपत्र को, केंद्र सरकार के लिए अग्रेषित करने से पहले, संबंधित राज्य को अपनी सिफारिश के साथ-साथ, उक्त अधिकारी के संबंध में बकाया राशि और सतर्कता स्थिति के मुद्दों पर जानकारी भेजनी अपेक्षित होगी।

क्या किसी अधिकारी द्वारा प्रस्तुत त्यागपत्र को निरस्त किया जा सकता है?

किसी अधिकारी द्वारा त्यागपत्र दिए जाने पर, राज्य सरकार द्वारा, अधिकारी के खिलाफ किसी बकाया, अधिकारी की सतर्कता स्थिति या उसके खिलाफ भ्रष्टाचार आदि के लंबित मामलों आदि के बारे में जांच की जाती है। यदि संबंधित अधिकारी के खिलाफ ऐसा कोई मामला होता है, तो आमतौर पर उसका इस्तीफा खारिज कर दिया जाता है।

इस कार्रवाई के लिए सक्षम अधिकारी:

भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के संबंध में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के राज्य मंत्री, आईपीएस के संबंध में गृह मंत्री और वन सेवा के संबंध में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा किसी अधिकारी के त्यागपत्र पर निर्णय लिया जाता है।

क्या किसी अधिकारी को अपना इस्तीफा वापस लेने की अनुमति होती है?

केंद्र सरकार द्वारा किसी अधिकारी को “जनहित में” अपना इस्तीफा वापस लेने की अनुमति दी जा सकती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘सेवा से इस्तीफा’ सरकार की ‘स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना’ (Voluntary Retirement Scheme – VRS) को स्वीकार करने से बिल्कुल अलग है? VRS लेने वाले अधिकारी या कर्मचारी पेंशन के हकदार होते हैं, जबकि त्यागपत्र देने वाले कर्मियों को यह लाभ नहीं मिलता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. केंद्रीय सिविल सेवा नियम
  2. आईएएस नियम
  3. केंद्रीय सेवा में नियुक्त अधिकारियों का इस्तीफा
  4. अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का इस्तीफा

मेंस लिंक:

क्या एक अधिकारी को पहले दिए गए अपने त्यागपत्र को वापस लेने की अनुमति होती है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

राजद्रोह से संबंधित मुद्दे


(Issues Surrounding Sedition)

संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) अध्यक्ष शरद पवार ने भीमा कोरेगांव जांच आयोग के समक्ष दायर किए गए अपने हलफनामे से हलचल मचा दी है। अपने हलफनामे में उन्होंने पुराने हो चुके ‘राजद्रोह कानून’ को निरस्त किए जाने का सुझाव दिया है।

NCP अध्यक्ष का कहना है, इस तरह की गतिविधियों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए ‘विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम’ (Unlawful Activities (Prevention) Act – UAPA) जैसे क़ानून पर्याप्त हैं।

आवश्यकता:

  • इन दिनों इस ‘राजद्रोह कानून’ (sedition law) का सदुपयोग की तुलना में दुरूपयोग अधिक किया जा रहा है; जो कोई भी सरकार की आलोचना करता है उसे इस कड़े राजद्रोह क़ानून के तहत गिरफ्तार कर लिया जाता है।
  • ज्यादातर मामलों में बेगुनाहों को फंसाया जा रहा है।
  • ‘देशद्रोह के आरोप’ लगाए गए हाल के उन मामलों को देखने पर पता चलता है, कि उनमें से अधिकांश मामले अन्य कानूनों और आदेशों के प्रावधानों के तहत काफी हद तक कवर किए जा सकते हैं।

आईपीसी की धारा 124A के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क:

  • भारतीय दंड संहिता की धारा 124A (देशद्रोह का अपराध) की उपयोग राष्ट्रविरोधी, अलगाववादी और आतंकवादी तत्वों से निपटने में किया जाता है।
  • यह क़ानून, निर्वाचित सरकार को हिंसा और अवैध तरीकों से सरकार को उखाड़ फेंकने के प्रयासों से सुरक्षा प्रदान करता है। कानून द्वारा स्थापित सरकार का निरंतर अस्तित्व, राज्य की स्थिरता के लिए एक अनिवार्य शर्त है।
  • यदि ‘अदालत की अवमानना’ करने पर ​​दंडात्मक कार्रवाई किए जाने का प्रावधान है, तो ‘सरकार की अवमानना’ करने ​​पर भी सजा का प्रावधान होना चाहिए।
  • विभिन्न राज्यों के कई जिलों में ‘माओवादी विद्रोह’ का सामना करना पड़ता हैं और विद्रोही समूह वस्तुतः समानांतर प्रशासन चलाते हैं। ये उग्रवादी समूह खुले-आम क्रांति के माध्यम से राज्य सरकार को उखाड़ फेंकने की वकालत करते हैं।
  • इस पृष्ठभूमि में, मात्र कुछ अत्यधिक प्रचारित मामलों में गलत तरीके से लागू किए जाने की वजह से, धारा 124A को निरसित करने की सलाह सरासर गलत होगी।

देशद्रोह / राजद्रोह (Sedition) के बारे में:

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के अनुसार, “किसी भी व्यक्ति के द्वारा, शब्दों द्वारा, लिखित अथवा बोलने के माध्यम से, अथवा संकेतों द्वारा, या दृश्य- प्रदर्शन द्वारा, या किसी अन्य तरीके से, विधि द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ, घृणा या अवमानना दिखाने, उत्तेजित होने अथवा उत्तेजना भड़काने का प्रयास करने पर उसे, आजीवन कारावास और साथ में जुर्माना, या तीन साल तक की कैद और साथ में जुर्माना, या मात्र जुर्माने का दंड दिया जा सकता है।

एक यथोचित परिभाषा की आवश्यकता:

देशद्रोह कानून लंबे समय से विवादों में रहा है। अक्सर सरकारों के ‘भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124-A कानून का उपयोग करने पर, उनकी नीतियों के मुखर आलोचकों द्वारा आलोचना की जाती है।

इसलिए, इस धारा को व्यक्तियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रतिबंध के रूप में देखा जाता है, और एक प्रकार से संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत प्रदत्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए जाने वाले उचित प्रतिबंधों संबंधी प्रावधानों के अंतर्गत आती है।

इस क़ानून को औपनिवेशिक ब्रिटिश शासकों द्वारा 1860 के दशक में लागू किया गया था, उस समय से लेकर आज तक यह क़ानून बहस का विषय रहा है। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू सहित स्वतंत्रता आंदोलन के कई शीर्ष नेताओं पर राजद्रोह कानून के तहत मामले दर्ज किए गए थे।

  1. महात्मा गांधी द्वारा इस क़ानून को “नागरिक की स्वतंत्रता का हनन करने हेतु तैयार की गई भारतीय दंड संहिता की राजनीतिक धाराओं का राजकुमार” बताया था।
  2. नेहरू ने इस कानून को “अत्यधिक आपत्तिजनक और निंदनीय” बताते हुए कहा, कि “हमारे द्वारा पारित किसी भी कानूनों प्रावधानों में इसे कोई जगह नहीं दी जानी चाहिए” और “जितनी जल्दी हम इससे छुटकारा पा लें उतना अच्छा है।”

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक फैसले:

केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामला (1962):

  1. आईपीसी की धारा 124A के तहत अपराधों से संबंधित मामले की सुनवाई के दौरान, उच्चतम न्यायालय की पांच-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने केदार नाथ सिंह बनाम बिहार राज्य मामले (1962) में कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए थे।
  2. अदालत ने फैसला सुनाया था, कि सरकार के कार्यों की चाहें कितने भी कड़े शब्दों में नापसंदगी व्यक्त की जाए, यदि उसकी वजह से हिंसक कृत्यों द्वारा सार्वजनिक व्यवस्था भंग नहीं होती है, तो उसे दंडनीय नहीं माना जाएगा।

बलवंत सिंह बनाम पंजाब राज्य (1995) मामला:

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था, कि केवल नारे लगाना, इस मामले में जैसे कि ‘खालिस्तान जिंदाबाद’, देशद्रोह नहीं है। जाहिर है, देशद्रोह कानून को गलत तरीके से समझा जा रहा है और असहमति को दबाने के लिए इसका दुरुपयोग किया जा रहा है।

Current Affairs

 

सुप्रीम कोर्ट के हालिया विचार:

जून 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था “अब देशद्रोह के लिए सीमाओं को परिभाषित करने का समय आ गया है”।

उच्चतम न्यायालय द्वारा यह टिप्पणी दो समाचार चैनलों द्वारा दायर की गयी रिट याचिकाओं पर सुनवाई करने के दौरान की गयी।

देशद्रोह के संबंध में अदालत द्वारा की गई सामान्य टिप्पणियां:

  1. अब समय आ गया है, कि हम देशद्रोह की सीमा को परिभाषित करें।
  2. भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A (देशद्रोह) और धारा 153 (समुदायों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना) के, विशेष रूप से प्रेस और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकारों से संबंधित विषयों पर, प्रावधानों की व्याख्या की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि श्री ‘के.एम. मुश्शी के संशोधन’ (K.M. Mushshi’s Amendment) ने संविधान से ‘देशद्रोह’ को हटा दिया गया था, और सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले द्वारा भारत में ‘राजद्रोह कानून’ को फिर से वापस लाया गया था? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए

इतने सारे नकारात्मक तत्व होने के बावजूद, हमारे देश में अभी भी यह कानून प्रचलन में क्यों है? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. देशद्रोह को किस क़ानून के तहत परिभाषित किया गया है?
  2. आईपीसी की धारा 124A किससे संबंधित है?
  3. आईपीसी की धारा 153 किससे संबंधित है?
  4. इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के प्रासंगिक फैसले
  5. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19

मेंस लिंक:

भारत में देशद्रोह कानून लागू करने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

 राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा


(National Curriculum Framework – NCF)

संदर्भ:

हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री  द्वारा ‘कार्यादेश दस्तावेज: राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCF) के विकास के लिए दिशा-निर्देश’ जारी किए गए।

पृष्ठभूमि:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 में चार क्षेत्रों– स्‍कूल शिक्षा, बचपन में आरंभिक देखभाल और शिक्षा (ईसीसीई), अध्‍यापक शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा में ‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा’ (National Curriculum Framework – NCF) विकसित करने की सिफारिश की गयी है।

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCF) के बारे में:

राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा (NCF) में, स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCFSE), प्रारंभिक बचपन की देखभाल और शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCFECCE), शिक्षक शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCFTE), और प्रौढ़ शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा (NCFAE) शामिल हैं।

महत्व:

यह ‘कार्यदेश दस्तावेज़’ (Mandate Document) बच्चों के समग्र विकास, कौशल पर जोर,शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका, मातृभाषा में सीखने, और सांस्कृतिक जुड़ाव पर ध्यान देते हुए एक आदर्श बदलाव लाएगा। यह भारतीय शिक्षा प्रणाली की राजनैतिक स्वतंत्रता की दिशा में भी एक बड़ा कदम है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति के प्रमुख बिंदु:

  1. केंद्र तथा राज्यों द्वारा शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को GDP के 6% तक बढ़ाया जायेगा।
  2. मानव संसाधन विकास मंत्रालय का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया जाएगा।

 

डिजिटल शिक्षा:

  1. सीखने, मूल्यांकन करने, योजना बनाने, प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए, प्रौद्योगिकी का उपयोग करने पर विचारों का मुक्त आदान-प्रदान करने हेतु एक मंच प्रदान करने के लिए एक स्वायत्त निकाय, राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच (National Educational Technology ForumNETF) का निर्माण किया जाएगा।
  2. डिजिटल शिक्षा संसाधनों को विकसित करने हेतु एक प्रौद्योगिकी यूनिट (Technology Unit) का गठन किया जायेगा। यह नयी यूनिट, डिजिटल अवसंरचना, सामग्री तथा क्षमता-निर्माण को समन्वित करेगी।

 

अध्यापक शिक्षण:

  1. वर्ष 2030 तक, शिक्षण कार्य करने के लिए न्यूनतम योग्यता 4 वर्षीय इंटीग्रेटेड बीएड डिग्री की जायेगी।
  2. शिक्षा में डिजिटल-विभाजन को पाटने में सहायता करने के लिए शिक्षकों को भारतीय स्थितियों के अनुकूल ऑनलाइन शैक्षणिक विधियों का प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

 

स्कूली शिक्षा:

  1. 3 वर्ष 6 वर्ष की आयु तक प्री-प्राइमरी शिक्षा को वर्ष 2025 तक सार्वभौमिक किया जायेगा।
  2. वर्ष 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100 नामाकंन के साथ पूर्व-विद्यालय से माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा के सार्वभौमिकरण का लक्ष्य।
  3. स्कूलों में छठे ग्रेड से ही व्यावसायिक शिक्षा शुरू हो जाएगी और इसमें इंटर्नशिप शामिल होगी।
  4. कक्षा 5 तक बच्चे की मातृभाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में उपयोग किया जाएगा।
  5. एक नयी पाठयक्रम संरचना लागू की जायेगी, जिसमें तीन साल की आंगनवाड़ी / प्री स्कूलिंग को सम्मिलित किया जायेगा।
  6. बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान पर एक राष्ट्रीय मिशन’ की स्थापना की जायेगी, जिसके अंतर्गत राज्‍य वर्ष 2025 तक सभी प्राथमिक स्कूलों में कक्षा 3 तक सभी विद्यार्थियों द्वारा सार्वभौमिक बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक ज्ञान प्राप्त करने हेतु एक कार्यान्वयन योजना तैयार करेंगे।
  7. बोर्ड परीक्षाओं के आसान बनाने के लिए उन्हें फिर से डिजाईन किया जायेगा। परीक्षा में तथ्यों को रटने के बजाय मुख्य दक्षताओं का परीक्षण किया जायेगा, जिसमे सभी छात्रों को दो बार परीक्षा देने की अनुमति होगी।
  8. स्कूली प्रशासन में परिवर्तन किया जायेगा, इसके लिए एक नयी स्कूल गुणवत्ता आकलन एवं प्रत्यायन संरचना तथा सार्वजनिक और निजी दोनों प्रकार के स्कूलों को विनियमित करने के लिए एक स्वतंत्र प्राधिकरण का गठन किया जायेगा।

 

उच्च शिक्षा:

  1. विविध प्रवेश तथा निकास विकल्पों के साथ चार-वर्षीय स्नातक डिग्री का आरंभ किया जायेगा।
  2. एम.फिल डिग्री को समाप्त कर दिया जाएगा।
  3. चिकित्सा एवं कानूनी शिक्षा को छोड़कर समस्त उच्च शिक्षा के लिए एकल अति महत्वपूर्ण व्यापक निकाय के रूप में भारत उच्च शिक्षा आयोग (Higher Education Commission of IndiaHECI) का गठन किया जाएगा।
  4. विभिन्न संस्थानों के मध्य अकादमिक क्रेडिटों को अंतरित एवं गणना को आसान करने के लिए एक एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट की स्थापना की जायेगी।
  5. महाविद्यालयों को 15 वर्षों में चरणबद्ध स्वायत्तता के साथ संबद्धता प्रणाली समाप्त की जाएगी, जिससे प्रत्येक महाविद्यालय एक स्वायत्त डिग्री देने वाली संस्था अथवा विश्वविद्यालय के एक घटक कॉलेज के रूप में विकसित हो सकेगा।
  6. NEP 2020 का लक्ष्य व्यवसायिक शिक्षा सहित उच्चतर शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात को 3 प्रतिशत (2018) से बढ़ाकर 2035 तक 50 प्रतिशत करना है। उच्चतर शिक्षा संस्थानों में 3.5 करोड़ नई सीटें जोड़ी जाएंगी।

पारंपरिक ज्ञान (Traditional knowledge):

  1. जनजातीय तथा देशज ज्ञान सहित भारतीय ज्ञान पद्धतियों को पाठ्यक्रम में परिशुद्ध तथा वैज्ञानिक तरीके से सम्मिलित किया जाएगा।

समान और समावेशी शिक्षा:

  1. आकांक्षी जिले जैसे क्षेत्रों, जहाँ बड़ी संख्या में छात्रों को आर्थिक, सामाजिक या जातिगत बाधाओं का सामना करना पड़ता है, को विशेष शैक्षिक क्षेत्र के रूप में नामित किया जाएगा।
  2. सभी लड़कियों तथा ट्रांसजेंडर छात्रों को समान गुणवत्ता युक्त शिक्षा प्रदान करने के लिए, केंद्र सरकार ‘लैंगिक समावेशी कोष’ (Gender Inclusion Fund) की स्थापना करेगी।

 

वित्तीय सहायता:

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग तथा अन्य सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों से संबंधित मेधावी छात्रों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।

नया पाठ्यक्रम और शैक्षणिक संरचना:

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) में मौजूदा 10+2 पाठ्यक्रम और शैक्षणिक संरचना को 5+3+3+4 डिजाइन के साथ बदलने का प्रस्ताव किया गया है, और इसमें 3-18 वर्ष की आयु के बच्चों को शामिल किया गया है। इस के अंर्तगत –

  1. फाउंडेशनल स्टेज के पांच साल: 3 साल का प्री-प्राइमरी स्कूल और ग्रेड 1, 2;
  2. प्रारंभिक (या बाद के प्राथमिक) चरण के तीन वर्ष: ग्रेड 3, 4, 5;
  3. मध्य (या उच्च प्राथमिक) चरण के तीन वर्ष: ग्रेड 6, 7, 8;
  4. उच्च (या माध्यमिक) चरण के चार वर्ष: ग्रेड 9, 10, 11, 12।

आगे की चुनौतियां:

चूंकि शिक्षा एक समवर्ती सूची का विषय है तथा अधिकांश राज्यों के अपने स्कूल बोर्ड हैं। अतः, इस नीति के वास्तविक कार्यान्वयन के लिए सभी राज्य सरकारों को एक साथ लाना होगा।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नई शैक्षणिक संरचना के अंतर्गत 5 + 3 + 3 + 4 डिजाइन का अवलोकन।
  2. नई नीति के अनुसार ‘विशेष शैक्षिक क्षेत्र’ क्या हैं?
  3. पॉलिसी के अनुसार ‘लैंगिक समावेशी कोष’ की स्थापना कौन करेगा?
  4. प्रस्तावित अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट की भूमिका।
  5. उच्च शिक्षा में ‘सकल नामांकन अनुपात’ लक्ष्य?
  6. प्रस्तावित ‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच’ के बारे में।

मेंस लिंक:

हाल ही में घोषित नई शिक्षा नीति 2020 के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

वैश्विक सुरक्षा पहल


(Global Security Initiative)

संदर्भ:

हाल ही में, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग द्वारा एक नई ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’ (Global Security Initiative) पेश की गयी है।

इस पहल को, इंडो-पैसिफिक रणनीति और ‘क्वाड’ – भारत, यू.एस., ऑस्ट्रेलिया, जापान समूह- का मुकाबले के रूप में देखा जा रहा है।

इस पहल का उद्देश्य:

  • चीनी राष्ट्रपति के अनुसार- ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’ सामूहिक, व्यापक, सहकारी एवं सतत सुरक्षा के दृष्टिकोण के प्रति प्रतिबद्ध रहेगी।
  • यह पहल, एकपक्षवाद का विरोध करेगी, और ‘ग्रुप-पॉलिटिक्स’ तथा ‘गुट-टकराव’ में शामिल नहीं होगी।
  • ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’, एकतरफा प्रतिबंधों और अत्याधिक विस्तारित क्षेत्राधिकारों के अनियंत्रित इस्तेमाल का विरोध करेगी।

प्रमुख सिद्धांत:

  • ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’, परस्पर सम्मान, खुलेपन और एकीकरण पर आधारित ‘एशियाई सुरक्षा मॉडल’ का निर्माण करेगी।
  • यह पहल, तथाकथित नियमों के बैनर तले ‘अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था’ को नष्ट किए जाने का विरोध करेगी।
  • यह ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’, विश्व को ‘नए शीत युद्ध के बादलों’ के नीचे खीचने के प्रयासों का भी विरोध करेगी।
  • यह पहल ‘हिंद-प्रशांत क्षेत्र’ को विभाजित करने और एक नए शीत युद्ध का माहौल बनाने के लिए हिंद-प्रशांत रणनीति के उपयोग, और ‘नाटो के एशियाई संस्करण’ (क्वाड) को इकठ्ठा रखने के लिए सैन्य गठबंधनों के उपयोग का विरोध करेगी।

आवश्यकता:

  • एकतरफावाद (Unilateralism), आधिपत्य (Hegemony) और ‘शक्ति की राजनीति’ से उत्पन्न बढ़ते खतरों और शांति, सुरक्षा, विश्वास और शासन में हो रही कमी के साथ, मानव जाति अधिकाधिक कठिन समस्याओं और सुरक्षा खतरों का सामना कर रही है।
  • इस प्रकार, चीन के अनुसार- “अविभाज्य सुरक्षा” (Indivisible Security) के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए ‘वैश्विक सुरक्षा पहल’ की परिकल्पना की गई है।

“अविभाज्य सुरक्षा” के सिद्धांत का अर्थ है, कि कोई भी देश दूसरों की कीमत पर अपनी सुरक्षा को मजबूत नहीं कर सकता है।

‘नए शीत युद्ध’ का संकेत देने वाली घटनाएँ:

  • अपेक्षाकृत प्रबुद्ध अधिनायकवाद के तहत चीन का आक्रामक विकास।
  • चीन की बढ़ती आक्रामकता को रोकने के लिए, अमेरिका द्वारा अपनी ‘एशिया नीति की धुरी’ (Pivot to Asia Policy) के तहत ‘क्वाड’ पहल और इंडो-पैसिफिक कहानी की शुरुआत।
  • हाल ही में, अमेरिका द्वारा चीन को शामिल किए बिना G7 को G-11 तक विस्तारित करने का प्रस्ताव।
  • ‘दक्षिण चीन सागर’ में चीन की कार्रवाइयों- पहले भूमि पुनर्ग्रहण और फिर अतिरिक्त-क्षेत्रीय दावा साबित करने के लिए कृत्रिम द्वीपों के निर्माण- की अमेरिका और उसके सहयोगी देशों द्वारा तीखी आलोचना।

 

क्वाड समूह’ के प्रति चीन का दृष्टिकोण:

  1. यह एक सामान्य समझ है, कि क्वाड किसी भी देश के खिलाफ सैन्य रूप से मुकबला नहीं करेगा। फिर भी, चीन के रणनीतिक समुदाय द्वारा, इसे एक उभरता हुआ “एशियाई नाटो” ब्रांड बताया जाता है।
  2. विशेष रूप से, भारतीय संसद में जापानी पीएम शिंजो आबे द्वारा ‘दो सागरों का मिलन’ (Confluence of Two Seas) संबोधन ने क्वाड अवधारणा को एक नया बल दिया है और इससे भारत के आर्थिक उदय को मान्यता मिली है।

भारत के लिए चिंता का विषय:

  • इस तरह के समझौते ‘नई दिल्ली’ के लिए एक चेतावनी भी हो सकते हैं, कि अन्य देशों द्वारा परस्पर औपचारिक एवं संस्थागत सुरक्षा सहयोग हेतु समझौते किए जा रहे हैं जिनमे भारत को शामिल नहीं किया जा रहा है।
  • कुछ ही महीनों के अंतराल में इस क्षेत्र में दो नए सुरक्षा-समझौते – AUKUS तथा जापान-ऑस्ट्रेलिया रक्षा समझौता- किए गए हैं, तथा अन्य समझौतों पर विभिन्न देशों के मध्य वार्ता जारी है। नई दिल्ली को इस बात पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, कि अन्य देशों के साथ घनिष्ठ सुरक्षा सहयोग स्थापित करने के प्रति निरंतर संदेहात्मक रवैया किस तरह से भारत के सर्वोत्तम हित में है।
  • इसके अलावा अधिक समस्यात्मक यह है, कि भारत का यह रवैया इस बात का एक और संकेत करता है कि, देश अपनी घरेलू क्षमताओं की सीमाएं स्पष्ट रूप से जाहिर होने के बाद भी, ‘बाहरी सुरक्षा भागीदारी’ के प्रति अपने पारंपरिक विरोध से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सका है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘क्वाड प्लस’ के बारे में सुना है? हाल ही में, क्वाड सदस्यों ने तथाकथित क्वाड प्लस के माध्यम से साझेदारी का विस्तार करने की इच्छा का भी संकेत भी दिया गया है, जिसमें दक्षिण कोरिया, न्यूजीलैंड और वियतनाम शामिल होंगे। इसके बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़ें

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्वाड – संरचना।
  2. यह पहली बार कब प्रस्तावित किया गया था?
  3. हिंद महासागर क्षेत्र में देश और महत्वपूर्ण द्वीप।
  4. इंडो-पैसिफिक क्षेत्र का भौगोलिक अवलोकन।
  5. इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण समुद्र और जलडमरूमध्य।

मेंस लिंक:

शांति और सुरक्षा बनाए रखने और संयुक्त राष्ट्र के समुद्रीय कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए क्वाड की औपचारिक बहाली और पुन: सक्रिय की आवश्यकता है। परीक्षण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अगस्त-सितंबर में 5जी सेवा शुरू होने की संभावना


संदर्भ:

केंद्रीय संचार मंत्री, श्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में जानकारी देते हुए कहा है, कि अगस्त-सितंबर 2022 से 5जी सेवाओं के वाणिज्यिक रोलआउट की उम्मीद की जा सकती है।

सरकार, संचार उद्योग के साथ उच्च स्पेक्ट्रम मूल्य निर्धारण से संबंधित मुद्दों को हल करने के प्रति भी आश्वस्त है।

5G तकनीक के बारे में:

5G तकनीक, मोबाइल ब्रॉडबैंड की अगली पीढ़ी है। यह तकनीक अंततः 4G LTE कनेक्शन को प्रतिस्थापित करेगी या इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि करेगी।

5G तकनीक की विशेषताएं और लाभ:

  1. यह तकनीक, ‘मिलीमीटर वेव स्पेक्ट्रम’ (30-300 गीगाहर्ट्ज़) पर कार्य करती है, जिसके द्वारा काफी बड़ी मात्रा में डेटा को बहुत तेज गति से भेजा जा सकता है।
  2. 5G तकनीक, तीन बैंड्स अर्थात् निम्न, मध्य और उच्च आवृत्ति स्पेक्ट्रम में काम करती है।
  3. मल्टी-जीबीपीएस ट्रान्सफर रेट तथा अत्याधिक कम विलंबता (ultra-low latency), 5G तकनीक, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ताकत का उपयोग करने वाली एप्लीकेशंस का समर्थन करेगी।
  4. 5G नेटवर्क की बढ़ी हुई क्षमता, लोड स्पाइक्स के प्रभाव को कम कर सकती है, जैसे कि खेल आयोजनों और समाचार कार्यक्रमों के दौरान होती है।

Current Affairs

प्रौद्योगिकी का महत्व:

भारत की राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति 2018 में 5G के महत्व पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें कहा गया है कि एक वृद्धिशील स्टार्ट-अप समुदाय सहित 5G, क्लाउड, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और डेटा एनालिटिक्स, अवसरों के एक नए क्षितिज को खोलने तथा डिजिटल जुड़ाव को तीव्र एवं गहन करने का वादा करता है।

भारत में 5G रोल-आउट के लिए चुनौतियां:

  1. प्रक्रियात्मक बिलंब (Procedural Delays): भारत का दूरसंचार क्षेत्र ‘प्रक्रियात्मक देरी’ और इसके कई मुद्दों से काफी अधित प्रभावित है।
  2. स्पेक्ट्रम की वहनीयता (Affordability of Spectrum): विश्व के कई देश पहले से ही अपने उपयोगकर्ताओं के लिए 5G कनेक्टिविटी शुरू कर चुके हैं, लेकिन भारत में, 5G स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाना बाकी है।
  3. लास्ट-मील कनेक्टिविटी: टियर-II, टियर-III शहरों और ग्रामीण घरों में लास्ट-मील ब्रॉडबैंड कनेक्टिविटी को पूरा करना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि भारत में ऑप्टिकल फाइबर इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रीनफील्ड परिनियोजन की कमी है, जिसकी वजह से ‘लास्ट-मील कनेक्टिविटी’ अत्यधिक प्रभावित हुई है।
  4. किफायती 5G डिवाइस: उपभोक्ताओं के स्तर पर, किफायती 5G डिवाइस अभी तक बाजार में अपनी जगह नहीं बना पाए हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या भारत 5G सेवाओं को शुरू करने (रोल-आउट) के लिए तैयार है?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. 5G क्या है?
  2. 3G, 4G और 5G के बीच अंतर।
  3. अनुप्रयोग
  4. ‘स्पेक्ट्रम’ क्या होता है?
  5. EMF परियोजना के बारे में।

मेंस लिंक:

5G तकनीक के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

नासा की नई संचार प्रणाली ‘एलसीआरडी’


(NASA’s new communications system LCRD)

संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ (NASA) ने अपनी नयी संचार प्रणाली ‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (Laser Communications Relay Demonstration – LCRD) का प्रदर्शन किया। इस संचार प्रणाली को दिसंबर 2021 में लॉन्च किया गया था।

  • यह एजेंसी की पहली ‘लेजर संचार प्रणाली’ (laser communications system) है।
  • LCRD, एजेंसी को अंतरिक्ष में ऑप्टिकल संचार का परीक्षण करने में मदद करेगी।

एलसीआरडी (LCRD) के बारे में:

‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (LCRD), भविष्य के ऑप्टिकल संचार मिशनों का मार्ग प्रशस्त करने वाली ‘प्रौद्योगिकी’ का प्रदर्शन है।

  • LCRD उपकरणों को अमेरिकी रक्षा विभाग के ‘अंतरिक्ष परीक्षण कार्यक्रम सैटेलाइट 6’ (Space Test Program Satellite 6: STPSat-6) पर स्थापित किया गया है।
  • इसके लिए पृथ्वी से 35,000 किमी की ऊंचाई पर ‘भू-समकालिक कक्षा’ में स्थापित किया जाएगा।

ऑप्टिकल संचार प्रणालियों के लाभ:

ऑप्टिकल संचार प्रणालियाँ (Optical Communications Systems) आकार में छोटी तथा भार में कम होती हैं और इनके लिए रेडियो उपकरणों की तुलना में कम उर्जा की आवश्यकता होती है।

  • ‘छोटे आकार’ के होने का अर्थ है विज्ञान के उपकरणों के लिए अधिक जगह।
  • कम भार का मतलब है, लांच में कम व्यय।
  • कम उर्जा का अर्थ है, अंतरिक्ष यान की बैटरियों का कम उपयोग।
  • ‘रेडियो’ तंत्र के पूरक ‘ऑप्टिकल संचार’ के साथ, भविष्य में मिशन अद्वितीय संचार क्षमताओं से युक्त होंगे।

लेजर प्रणाली बनाम रेडियो प्रणाली:

  • लेजर संचार और रेडियो तरंगें, प्रकाश की विभिन्न तरंग दैर्ध्य का उपयोग करती हैं।
  • लेजर में ‘अवरक्त प्रकाश’ (Infrared Light) का उपयोग किया जाता है और रेडियो तरंगों की तुलना में इसकी तरंग दैर्ध्य कम होती है। इससे, कम समय में ज्यादा डाटा ट्रांसफर करने में मदद मिलेगी।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘ऑप्टिकल संचार’ रेडियो फ़्रीक्वेंसी सिस्टम की तुलना में बैंडविड्थ को 10 से 100 गुना अधिक बढ़ाने में मदद करेगा?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (LCRD) के बारे में
  2. रेडियो फ्रीक्वेंसी
  3. ऑप्टिकल संचार प्रणाली
  4. नासा मिशन

मेंस लिंक:

नासा के ‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (LCRD) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 आदिग्राम (आदिवासी अनुदान प्रबंधन प्रणाली)

हाल ही में, जनजातीय कार्य मंत्रालय (MoTA)  द्वारा झारखंड में ‘आदिग्राम’ (आदिवासी अनुदान प्रबंधन प्रणाली) या (ADIGRAMS – Adivasi Grants Management System) पर एक कार्यशाला का आयोजन किया गया।

  • आदिग्राम एक अनूठा ‘पोर्टल’ है जो मंत्रालय द्वारा राज्यों को दिए गए अनुदान की भौतिक और वित्तीय प्रगति की निगरानी करता है और धन के वास्तविक उपयोग का पता लगा सकता है।
  • ‘आदिग्राम पोर्टल’ जनजातीय कार्य मंत्रालय और राज्य जनजातीय विकास/कल्याण विभाग के लिए योजनावार भौतिक और वित्तीय जानकारी और प्रगति तक पहुंच, बातचीत और विश्लेषण करने हेतु, एक केंद्रीय डेटाबेस प्रदान करेगा।
  • यह पोर्टल केंद्र, राज्य, जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर अधिकारियों/हितधारकों को वास्तविक समय के आधार पर प्रदर्शन तक पहुंच, निगरानी करने और मापने और तदनुसार निर्णय लेने में सक्षम बनाएगा।

वैश्विक सैन्य व्यय

(Global Military Expenditure)

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) द्वारा हाल ही में प्रकाशित ‘वैश्विक सैन्य खर्च’ (Global Military Expenditure) पर नए आंकड़ों के अनुसार, 2021 में कुल वैश्विक सैन्य खर्च वास्तविक रूप से 0.7 प्रतिशत बढ़कर 2113 अरब डॉलर हो गया।

  • वर्ष 2021 में पांच सबसे बड़े सैन्य व्यय करने वाले संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन, भारत, यूनाइटेड किंगडम और रूस थे, और यह व्यय कुल खर्च का 62 प्रतिशत था।
  • भारत, 76.6 अरब डॉलर के सैन्य व्यय के साथ विश्व में तीसरे स्थान पर है। वर्ष 2021 में भारत का सैन्य व्यय 2020 से 0.9 प्रतिशत और 2012 से 33 प्रतिशत अधिक था।
  • कुल वैश्विक सैन्य व्यय में, अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन की 52 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। चीन सर्वाधिक सैन्य व्यय करने वाला दुनिया का दूसरा देश है।

अनंग ताल

  • अनंग ताल (Anang Tal), नई दिल्ली के महरौली में स्थित एक छोटी झील है।
  • इसका निर्माण, दिल्ली के संस्थापक शासक महाराजा अनंग पाल तोमर द्वारा 1052 ई. में करवाया गया था।
  • लगभग एक सहस्राब्दी पुराना यह ‘अनंग ताल’ दिल्ली की शुरुआत का प्रतीक है।
  • ‘अनंग ताल’ का राजस्थान से एक प्रगाढ़ संबंध भी है, क्योंकि महाराजा अनंग पाल को पृथ्वीराज चौहान के नाना (नाना) के रूप में जाना जाता है। पृथ्वीराज चौहान का किला ‘राय पिथौरा’ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की सूची में शामिल है।