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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 29 April 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

  1. भीमा-कोरेगांव युद्ध

सामान्य अध्ययन-II

  1. समान नागरिक संहिता
  2. कर्नाटक गौहत्या-रोधी कानून

सामान्य अध्ययन-III

  1. सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम
  2. साइबर अतिक्रमणों को रोकने के लिए उठाए गए हालिया कदम

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. श्रम बल भागीदारी दर
  2. विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस 2022
  3. निर्यात ऋण गारंटी निगम
  4. विश्व कोयला संघ

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।

भीमा-कोरेगांव युद्ध


(Bhima- Koregaon Battle)

संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) अध्यक्ष शरद पवार ने ‘कोरेगांव भीमा जांच आयोग’ (Koregaon Bhima inquiry commission) के समक्ष कुछ “कानूनी सुधारों” का सुझाव देते हुए एक अतिरिक्त हलफनामा दायर किया है, जिसमे शामिल है:

  1. भारतीय दंड संहिता की धारा 124A (देशद्रोह का अपराध) का “निरसन” किया जाना चाहिए।
  2. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A को फिर से लागू किया जाना चाहिए।

आवश्यकता:

यह परिवर्तन कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ​​कानून और व्यवस्था बनाए रखने तथा दंगों को रोकने में सक्षम बनाने को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।

धारा 124A का दुरुपयोग:

धारा 124A (Section 124A) का दुरुपयोग प्रायः “सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ, उनकी स्वतंत्रता को दबाने, और शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से उठाए गई असंतोष की किसी भी आवाज को दबाने के लिए किया जाता हैं”।

इस कानून के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

आईटी अधिनियम की धारा 66A (Section 66A of the IT Act):

इस कानून के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

भीमा कोरेगांव: जांच आयोग

9 फरवरी, 2018 को राज्य सरकार द्वारा सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जेएन पटेल की अध्यक्षता में तथा अन्य सदस्य के रूप में पूर्व मुख्य सचिव सुमित मलिक को शामिल करते हुए दो सदस्यीय जांच आयोग का गठन किया गया था।

इस आयोग को 1 जनवरी 2018 को ‘भीमा- कोरेगांव की लड़ाई’ की 200वीं बरसी पर हुई हिंसा से संबंधित घटनाओं के “सटीक क्रम” की जांच करने का कार्य सौंपा गया था।

भीमा-कोरेगांव लड़ाई के बारे में:

  • पुणे के एक जिले ‘भीमा कोरेगांव’ में 1 जनवरी, 1818 को पेशवा सेनाओं और अंग्रेजों के बीच हुई एक प्रसिद्ध युद्ध हुआ था, जिसका दलितों के साथ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक संबंध है।
  • इस युद्ध में ब्रिटिश सेना, जिसमें मुख्य रूप से दलित सैनिक शामिल थे, ने उच्च जातियों के वर्चस्व वाली पेशवा सेना का मुकाबला किया और युद्ध में ब्रिटिश सेना ने पेशवा सेना को पराजित किया था।

लड़ाई के परिणाम:

  • भीमा-कोरेगांव लड़ाई (Bhima Koregaon Battle) में विजय को जाति-आधारित भेदभाव और उत्पीड़न के खिलाफ एक जीत के रूप में देखा गया। पेशवा, महार दलितों के उत्पीड़न और उन पर अत्याचार करने के लिए कुख्यात थे। इस लड़ाई में पेशवाओं के ऊपर विजय ने दलितों को एक नैतिक जीत प्रदान की, जोकि जाति आधारित भेदभाव एवं उत्पीड़न और पहचान की भावना के खिलाफ एक जीत थी।
  • हालाँकि, अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति ने भारतीय समाज में कई दरारें पैदा कर दी, जो आज भी जाति और धार्मिक भेदभाव के विकराल रूप में दिखाई देती है जिस पर संविधान के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए रोक लगाने की आवश्यकता है।

‘भीमा कोरेगांव’ को ‘दलित गौरव के प्रतीक’ के रूप में क्यों देखा जाता है?

  • इस लड़ाई को दलित गौरव के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है क्योंकि कंपनी की सेना में अधिकाँश सैनिक ‘महार’ दलित थे। चूंकि पेशवा, जोकि ब्राह्मण थे और उन्हें दलितों के उत्पीड़क के रूप में देखा जाता था, और इसलिए पेशवा सेना पर महार सैनिकों की जीत को दलित शक्ति के रूप में देखा जाता है।
  • 1 जनवरी 1927 को डा. भीमराव अंबेडकर ने युद्धस्थल पर बने ‘स्मारक-स्तंभ’ का दौरा किया, इस स्तंभ पर लगभग दो दर्जन महार सैनिकों सहित मृतकों के नाम दर्ज हैं। कोरेगांव की लड़ाई में भाग लेने वाले सैनिक महार थे और महारों को अछूत माना जाता था।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘भीमा कोरेगांव’ लड़ाई के बारे में
  2. किनके बीच लड़ी गयी थी?
  3. परिणाम
  4. भीमा कोरेगांव को दलित प्रतीक के रूप में क्यों देखा जाता है?

मेंस लिंक:

भीमा कोरेगांव लड़ाई का विजय उत्सव न केवल उपनिवेशवाद-विरोधी परंपरा को चुनौती देता है, बल्कि यह जातियों की हीन संस्कृति के खिलाफ दलितों की एक स्वतन्त्र संस्कृति बनाने की कहानी का भी वर्णन करता है। आलोचनात्मक चर्चा कीजिए।

स्रोत: टाइम्स ऑफ इंडिया।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

समान नागरिक संहिता


(Uniform Civil Code)

संदर्भ:

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने एक बार फिर ‘समान नागरिक संहिता’ (Uniform Civil Code – UCC) पर कड़ी आपत्ति जताते हुए, इसे असंवैधानिक, अल्पसंख्यक विरोधी और मुसलमानों के लिए अस्वीकार्य बताया है।

AIMPLB ने इस बात पर भी जोर देते हुए कहा है, कि वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने और नफरत और भेदभाव के एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए समान नागरिक संहिता’ (UCC) मुद्दे को उठाया जा रहा है।

‘समान नागरिक संहिता’ क्या है?

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code), सभी नागरिकों के लिए, एक धर्म-निरपेक्ष रूप से अर्थात धर्म को ध्यान में रखे बिना, तैयार किए गए शासकीय कानूनों का एक व्यापक समूह होती है।

संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

संविधान के अनुच्छेद 44 में कहा गया है, कि देश में एक ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) होनी चाहिए। इस अनुच्छेद के अनुसार, ‘राज्य, भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक ‘समान सिविल संहिता’ सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा।‘ चूंकि ‘नीति-निदेशक सिद्धांत’ प्रकृति में केवल दिशा-निर्देशीय हैं, अतः राज्यों के लिए इनका पालन करना अनिवार्य नहीं है।

भारत में निम्नलिखित कारणों से एक ‘समान नागरिक संहिता’ की आवश्यकता है:

  • एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में धार्मिक प्रथाओं के आधार पर विभेदित नियमों के बजाय सभी नागरिकों के लिए ‘एक समान कानून’ की आवश्यकता होती है।
  • ‘लैंगिक न्याय’: धार्मिक कानूनों के अतर्गत, चाहे वे हिंदू हो या मुस्लिम, आमतौर पर महिलाओं के अधिकार काफी सीमित होते हैं। धार्मिक परम्पराओं के अंतर्गत प्रचलित कई प्रथाएं भारतीय संविधान में प्रदत्त ‘मौलिक अधिकारों की गारंटी’ के विपरीत होती हैं।
  • न्यायालयों ने भी, अक्सर, शाह बानो मामले में दिए गए फैसले सहित, अपने निर्णयों में कहा है कि सरकार के लिए एक ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए।

क्या भारत में पहले से ही नागरिक मामलों में ‘एक समान संहिता’ नहीं है?

भारतीय कानून के अंतर्गत, अधिकांश नागरिक मामलों, जैसे कि- भारतीय अनुबंध अधिनियम, नागरिक प्रक्रिया संहिता, माल बिक्री अधिनियम, संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, भागीदारी अधिनियम, साक्ष्य अधिनियम आदि- में एक समान संहिता का पालन किया जाता है। हालांकि, राज्यों द्वारा इन कानूनों में सैकड़ों संशोधन किए गए हैं और इसलिए कुछ मामलों में, इन धर्मनिरपेक्ष नागरिक कानूनों के अंतर्गत भी काफी विविधता है।

इस समय ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) वांछनीय क्यों नहीं है?

  • धर्मनिरपेक्षता, देश में फ़ैली हुई बहुलता / अनेकता के प्रतिकूल नहीं हो सकती है।
  • सांस्कृतिक विविधता को इस हद तक जोखिम में नहीं डाला जा सकता है, जिससे ‘एकरूपता’ के लिए हमारा आग्रह ही राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता के लिए खतरा बन जाए।

संवैधानिक व्यवधान:

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25, जो किसी भी धर्म को मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता को संरक्षित करने का प्रयास करता है, का भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत निहित समानता की अवधारणाओं के साथ विरोधाभास उत्पन्न हो जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि गोवा में ‘समान नागरिक संहिता’ लागू है?

  1. गोवा की पुर्तगाली नागरिक संहिता, 1867, मूलतः पुर्तगालियों द्वारा बनाया गया एक विदेशी संहिता / कोड है।
  2. गोवा की ‘नागरिक संहिता’ / सिविल कोड के चार भाग हैं, जो ‘नागरिकों की धारण शक्ति’ (Civil Capacity), ‘अधिकारों का अधिग्रहण’, ‘संपत्ति का अधिकार’ और ‘अधिकारों और उपचारों का उल्लंघन’ से संबंधित हैं।
  3. इसकी शुरुआत, ‘गॉड और डोम लुइस, पुर्तगाल के राजा और अल्गार्वे’ के नाम से होती है।
  4. यह संहिता, गोवा, दमन और दीव प्रशासन अधिनियम, 1962 की धारा 5 (1) के कारण अभी भी लागू है, इस अधिनियम के तहत गोवा की ‘नागरिक संहिता’ को जारी रखने की अनुमति दी गई थी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) के बारे में।
  2. ‘राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत’ (DPSP) क्या हैं।
  3. DPSP का प्रवर्तन।
  4. शाह बानो केस किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

इस समय ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) वांछनीय क्यों नहीं है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

कर्नाटक का गौहत्यारोधी कानून


(Karnataka anti-cow slaughter legislation)

संदर्भ:

हाल ही में आयोजित डेयरी किसानों के एक सम्मलेन में, सरकार पर ‘कर्नाटक मवेशी वध रोकथाम एवं संरक्षण अधिनियम’ (Karnataka Prevention of Slaughter and Preservation of Cattle Act) का उपयोग कर किसानों के बीच भय का माहौल पैदा करने का आरोप लगाते हुए, इन किसानों के हित में इस कानून को जल्द से जल्द रद्द किए जाने की मांग की गयी है।

संबंधित चिंताएं:

  • पुलिस द्वारा इस कानून के प्रावधानों का इस्तेमाल कर किसानों को परेशान किया जा रहा है।
  • जहां गोहत्या पर प्रतिबंध लगाकर किसानों की निगरानी की जा रही हैं, वहीं बड़े कॉरपोरेट्स द्वारा गोमांस की बिक्री और निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।
  • किसानों पर, उनकी गायों के अनुपजाऊ हो जाने पर भी, उनको बूचड़खानों में बेचने पर प्रतिबंध लागू है। इसके परिणामस्वरूप अधिकांश किसान, विशेष रूप से डेयरी किसान, कृषि और संबद्ध गतिविधियों से अलग होते जा रहे हैं।
  • यहां तक ​​कि मवेशियों का परिवहन भी मुश्किल हो गया है, क्योंकि किसानों को इसके लिए भी संबंधित विभिन्न अधिकारियों से अनुमति लेने की जरूरत होती है।

डेयरी किसानों की मांगें:

  • जब तक कि यह कानून वापस नहीं लिया जाता है, तब तक सरकार को किसानों से अनुपजाऊ गायों को बाजार दरों पर खरीदना चाहिए।
  • कानून में ‘मवेशी’ (cattle) शब्द को “गाय, गाय का बछड़ा और बैल, भैंसा, और 13 साल से कम उम्र की भैंस” के रूप में परिभाषित किया गया है।

क़ानून के तहत विवादास्पद प्रावधान

जांच करने की शक्ति:

  • क़ानून का उल्लंघन करने संबंधी मामलों को जांच करने की शक्ति पुलिस सब-इंस्पेक्टर या उसके ऊपर के सक्षम अधिकारी को दी गयी है। जांच अधिकारी के पास किसी परिसर की तलाशी लेने और मवेशियों तथा अपराध में उपयोग किये गए या उपयोग करने के इरादे से रखे गए उपकरणों को जब्त करने की शक्ति होगी।
  • इस तरह की कोई बरामदगी होने पर, बिना किसी देरी के सब डिविजनल मजिस्ट्रेट के सामने रिपोर्ट की जाएगी।

दंड-विधान

  • गौ-हत्या एक संज्ञेय अपराध है और इसका उल्लंघन करने पर तीन से सात साल के कारावास दंड दिया जा सकता है।
  • पहली बार किये गए अपराध के लिए 50,000 रुपये से 5 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है, दूसरी बार या इसके आगे पुनः अपराध करने पर 1 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।

डेयरी अर्थशास्त्र:

  • इस कानून से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला क्षेत्र डेयरी उद्योग है। भारत का डेयरी उद्योग 5 लाख करोड़ रुपये का वार्षिक कारोबार करता है – जो इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा ‘कृषि उत्पाद’ बनाता है।
  • भारत के किसान, गेहूँ और चावल संयुक्त रूप से दोनों की तुलना में ‘डेयरी’ से अधिक कमाते हैं। भारत में दुधारू पशुओं की संख्या संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रति व्यक्ति दुधारू पशु की तुलना में अधिक हैं।
  • इस क़ानून के साथ समस्या यह है, कि मवेशी-वध डेयरी उद्योग के आर्थिक कामकाज का अभिन्न अंग है। भारत में डेयरी फार्मिंग छोटे लाभ पर काम करती है। नतीजतन, अनुत्पादक जानवरों के रखरखाव से उनकी आर्थिक स्थिति, अनुकूलता से बाहर हो जाएंगी।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क़ानून की प्रमुख विशेषताएं
  2. अन्य राज्यों में इस प्रकार के कानून
  3. भारत में दूध उत्पादन और खपत।
  4. श्वेत क्रांति- विशेषताएं और प्रभाव।

मेंस लिंक:

गौ-हत्या रोधी कानूनों के पीछे तर्क और निहितार्थ पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम


(Armed Forces (Special Powers) Act – AFSPA)

संदर्भ:

हाल ही में, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है, कि विवादास्पद ‘सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम’, 1958 (Armed Forces (Special Powers) Act, 1958 – AFSPA) पूर्वोत्तर से पूरी तरह से हटाने के लिए कानून-व्यवस्था की स्थिति में सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि 2014 से जारी शांतिपूर्ण परिस्थितियों के कारण आंशिक रूप से असम, मणिपुर और नागालैंड से AFSPA को (1 अप्रैल से) वापस लिया जा सकता है।

AFSPA का तात्पर्य:

साधारण शब्दों में, सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) के तहत सशस्त्र बलों के पास ‘अशांत क्षेत्रों’ में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति होती है।

सशस्त्र बलों को प्राप्त शक्तियां:

  • इसके तहत सशस्त्र बलों को किसी क्षेत्र में पाँच या अधिक व्यक्तियों के जमावड़े को प्रतिबंधित करने अधिकार होता है, इसके अलावा, इन्हें किसी व्यक्ति द्वारा कानून का उल्लंघन करने संबंधी शंका होने पर उचित चेतावनी देने के बाद बल प्रयोग करने अथवा गोली चलाने की भी शक्ति प्राप्त होती है।
  • यदि उचित संदेह होने पर, सेना किसी व्यक्ति को बिना वारंट के भी गिरफ्तार कर सकती है; बिना  वारंट के किसी भी परिसर में प्रवेश और जांच कर सकती है, तथा आग्नेयास्त्र रखने पर प्रतिबंध लगा सकती है।
  • गिरफ्तार किए गए या हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति को एक रिपोर्ट तथा गिरफ्तारी के कारणों से संबधित विवरण के साथ निकटतम पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को सौंपाजा सकता है।

‘अशांत क्षेत्र’ और इसे घोषित करने की शक्ति:

  • अशांत क्षेत्र (disturbed area) को सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) की धारा 3 के तहत अधिसूचना द्वारा घोषित किया जाता है। विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषा या क्षेत्रीय समूहों या जातियों या समुदायों के बीच मतभेद या विवाद के कारण किसी क्षेत्र को अशांत घोषित किया जा सकता है।
  • केंद्र सरकार, या राज्य के राज्यपाल या केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक राज्य या केंद्रशासित प्रदेश के पूरे या हिस्से को अशांत क्षेत्र घोषित कर सकते हैं।

AFSPA अधिनियम की समीक्षा:

19 नवंबर, 2004 को केंद्र सरकार द्वारा उत्तर पूर्वी राज्यों में अधिनियम के प्रावधानों की समीक्षा करने के लिए न्यायमूर्ति बी पी जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय समिति नियुक्त की गयी थी।

समिति ने अपनी रिपोर्ट वर्ष 2005 में प्रस्तुत की, जिसमें निम्नलिखित सिफारिशें शामिल थीं:

  1. AFSPA को निरस्त किया जाना चाहिए और विधिविरूद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (Unlawful Activities (Prevention) Act), 1967 में उचित प्रावधान सम्मिलित किये जाने चाहिए;
  2. सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों की शक्तियों को स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट करने के लिए विधिविरूद्ध क्रियाकलाप अधिनियम को संशोधित किया जाना चाहिए और
  3. सशस्त्र बलों को तैनात किए जाने वाले प्रत्येक जिले में शिकायत सेल स्थापित किए जाने चाहिए।

लोक व्यवस्था पर दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की 5 वीं रिपोर्ट में भी AFSPA को निरस्त करने की सिफारिश की गयी है।

AFSPA लागू करने के लिए दिशानिर्देश:

‘नागा पीपुल्स मूवमेंट फॉर ह्यूमन राइट्स बनाम भारत संघ’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1997 के फैसले में AFSPA का इस्तेमाल करने के लिए दिशानिर्देश निर्धारित किए गए है:

  • संविधान पीठ ने 1997 के फैसले में कहा है, कि AFSPA की धारा 4(a) के तहत घातक बल का उपयोग करने की शक्ति, केवल “कुछ परिस्थितियों” में ही प्रयुक्त की जानी चाहिए।
  • अदालत ने कहा कि “मृत्यु कारित करने की शक्ति, किसी अशांत क्षेत्र में सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव से संबंधित है और इसका निश्चित परिस्थितियों में ही प्रयोग किया जाना चाहिए”।
  • इन पूर्व-शर्तों में एक उच्च-स्तरीय प्राधिकरण द्वारा किसी क्षेत्र को “अशांत” करने की घोषणा शामिल है। संबंधित अधिकारी इस बात का निर्णय करेगा, कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर घातक बल प्रयोग करना “आवश्यक” है। लेकिन उसे घातक बल का प्रयोग करने से पहले “उचित चेतावनी” देनी होगी।
  • जिन व्यक्तियों के खिलाफ सशस्त्र बलों द्वारा कार्रवाई की जाने वाली हो, उनके द्वारा घोषित “अशांत क्षेत्र में कुछ समय के लिए लागू किसी भी कानून या व्यवस्था का उल्लंघन किया होन चाहिए”।

नागा हत्याओं से AFSPA के खतरों की ओर संकेत:

दिसंबर 2021 में, नागालैंड में अपने गांव लौट रहे दिहाड़ी मजदूरों का एक समूह, 21 पैरा कमांडो यूनिट के जवानों द्वारा मार दिया गया था। बताया जाता है, कि सेना को इस क्षेत्र से NSCN(K) आतंकवादियों के गुजरने की सूचना मिली थी।

  • नागालैंड में 14 नागरिकों की हत्या के बाद, मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो ने ‘सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम’ (Armed Forces (Special Powers) Act – AFSPA) को निरस्त करने की मांग की है।
  • श्री रियो ने हर साल नागालैंड के लिए “अशांत क्षेत्र” टैग का विस्तार करने के लिए केंद्र सरकार की आलोचना भी की है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि पूर्वोत्तर में, असम, नागालैंड, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के तिरप, चांगलांग और लोंगडिंग जिलों, और असम की सीमा से लगे राज्य के आठ पुलिस स्टेशनों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले क्षेत्रों में AFSPA लागू है?

स्रोत: द हिंदू।

 

 

विषयसाइबर सुरक्षा से संबंधित मुद्दे।

साइबर अतिक्रमण को रोकने के लिए उठाए गए हालिया कदम


(Recent steps to prevent Cyber Breaches)

संदर्भ:

भारत की केंद्रीय साइबर सुरक्षा एजेंसी, ‘कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम’ (Computer Emergency Response Team – CERT-In) ने साइबर-अतिक्रमणों (Cyber Breaches) को रोकने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए हैं:

  • सभी सेवा प्रदाताओं, मध्यस्थों, डेटा सेंटर प्रदाताओं, कॉरपोरेट्स और सरकारी संगठनों को साइबर अतिक्रमण संबंधी घटनाओं का पता चलने के छह घंटे के भीतर रिपोर्ट करना होगा।
  • नए निर्देशों के तहत वर्चुअल एसेट, एक्सचेंज और कस्टोडियन वॉलेट प्रदाताओं के लिए पांच साल की अवधि तक KYC और वित्तीय लेनदेन पर रिकॉर्ड बनाए रखना अनिवार्य होगा।
  • क्लाउड एवं वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (VPN) प्रदान करने वाली कंपनियों के लिए, ग्राहकों के प्रमाणित नाम, ईमेल और आईपी पते पंजीकृत करना अनिवार्य होगा।
  • साइबर अतिक्रमण घटना के प्रभाव को कम करने के लिए, सेवा प्रदाताओं को किसी भी कार्रवाई के लिए CERT-In को जानकारी और सहायता भी देनी होगी।
  • साइबर अतिक्रमण घटनाओं की श्रृंखला को समय सीमा में सटीक रूप से परिलक्षित होने को सुनिश्चित करने के लिए, सेवा प्रदाताओं को अपनी सभी ‘आईसीटी सिस्टम घड़ियों’ को राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) या ‘राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला’ के ‘नेटवर्क टाइम प्रोटोकॉल’ (NTP) सर्वर से जोड़ने और सिंक्रनाइज़ करने के लिए कहा गया है।

आवश्यकता:

CERT-In द्वारा साइबर अतिक्रमण घटनाओं विश्लेषण में बाधा उत्पन्न करने वाली कुछ ‘खामियां’ पाए जाने के बाद ‘सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम’, 2000 की धारा 70बी की उप-धारा (6) के प्रावधानों के तहत निर्देश जारी किए गए हैं।

महत्व:

‘कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम’ (CERT-In) के अनुसार, ये निर्देश देश में “समग्र साइबर सुरक्षा मुद्रा” को बढ़ाएंगे और “सुरक्षित और विश्वसनीय इंटरनेट” की गारंटी प्रदान करेंगे।

 

NTP के बारे में:

‘नेटवर्क टाइम प्रोटोकॉल’ (NTP) एक प्रोटोकॉल है जिसका उपयोग TCP/IP -आधारित नेटवर्क पर विश्वसनीय रूप से सटीक समय स्रोतों को प्रसारित करने और प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

इसका उपयोग कंप्यूटर की आंतरिक घड़ी को एक सामान्य समय स्रोत से सिंक्रनाइज़ करने के लिए किया जाता है।

देश में साइबर हमले:

हाल के वर्षों में भारतीय संस्थाओं पर होने वाले साइबर हमलों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गयी है। उदाहरण के लिए, एक  सुरक्षा फर्म ‘पालो ऑल्टो नेटवर्क्स’ की रिपोर्ट के अनुसार, 2021 में भारतीय संगठनों पर रैंसमवेयर हमलों में ‘साल-दर-साल’ (YoY) 218% की वृद्धि हुई थी।

‘सीईआरटी-इन’ के बारे में:

सीईआरटी-इन (CERT-In) कंप्यूटर सुरक्षा संबंधी घटनाओं के होने पर प्रतिक्रिया देने हेतु एक ‘राष्ट्रीय नोडल एजेंसी’ है।

  • सीईआरटी-इन का कार्य क्षेत्र ‘भारतीय साइबर समुदाय’ है।
  • सीईआरटी-इन की स्थापना 2004 में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के एक ‘कार्यात्मक संगठन’ के रूप में की गई थी।

कार्य:

‘सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम’ 2008 के द्वारा साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में निम्नलिखित कार्यों को निष्पादित करने के लिए ‘राष्ट्रीय एजेंसी’ के रूप में कार्य करने के लिए ‘सीईआरटी-इन’ को अभिहित किया गया है:

  • साइबर अतिक्रमण घटनाओं पर सूचना का संग्रह, विश्लेषण और प्रसार।
  • साइबर सुरक्षा घटनाओं का पूर्वानुमान और अलर्ट।
  • साइबर सुरक्षा घटनाओं से निपटने के लिए आपातकालीन उपाय।
  • साइबर घटना प्रतिक्रिया गतिविधियों का समन्वय।
  • सूचना से संबंधित दिशा-निर्देश, सलाह, भेद्यता नोट और श्वेतपत्र जारी करना।
  • साइबर घटनाओं की सुरक्षा प्रथाओं, प्रक्रियाओं, रोकथाम, प्रतिक्रिया और रिपोर्टिंग।
  • साइबर सुरक्षा से संबंधित विहित किए गए अन्य कार्य।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘साइबर अपराध पर बुडापेस्ट कन्वेंशन’ (Budapest Convention) के बारे में जानते हैं?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के बारे में
  2. राष्ट्रीय महत्वपूर्ण सूचना अवसंरचना संरक्षण केंद्र (NCIIPC)
  3. CERT- In
  4. साइबर स्वच्छता केंद्र

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 श्रम बल भागीदारी दर

श्रम बल भागीदारी दर (Labour force participation rate – LFPR), मुख्यतः नौकरी की मांग करने वाली काम करने की उम्र (15 वर्ष या अधिक) वाली आबादी का प्रतिशत होता है; LFPR किसी अर्थव्यवस्था में नौकरियों के लिए “मांग” का प्रतिनिधित्व करती है।

इसमें कार्यरत और बेरोजगार, दोनों तरह के लोग शामिल होते हैं।

चर्चा का कारण:

  • भारत में ‘श्रम बल भागीदारी दर’ (LFPR) न सिर्फ बाकी दुनिया के मुकाबले कम है बल्कि इसमें लगातार पतन भी होता जा रहा है।
  • विश्व भर में, ‘श्रम बल भागीदारी दर’ लगभग 60% है। भारत में, यह दर पिछले 10 वर्षों से नीचे की ओर फिसलती जा रही है और 2016 में 47% से घटकर दिसंबर 2021 तक मात्र 40% रह गयी है।

 

विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस 2022

हर साल 23 अप्रैल को पुस्तकों को पढ़ने के लाभों के बारे में जागरूकता को बढ़ावा देने हेतु ‘विश्व पुस्तक दिवस’ मनाया जाता है, इस दिवस को ‘विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस’ (World Book and Copyright Day) के रूप में भी जाना जाता है।

  • यह दिवस, यूनेस्को और अन्य संबंधित संगठनों द्वारा विश्व भर के लेखकों, और पुस्तकों को सम्मानित करने, पढ़ने की कला को बढ़ावा देने आदि के लिए मनाया जाता है।
  • वर्ष 2022 में, मैक्सिकन शहर ‘ग्वाडलजारा’ (Guadalajara) को ‘वर्ल्ड बुक कैपिटल’ घोषित किया गया है।
  • वर्ष 2021 में, ‘वर्ल्ड बुक कैपिटल’ जॉर्जिया का ‘तिबलिसी’ शहर था।
  • विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस 2022 का विषय: “पढ़ें, ताकि आप कभी कम महसूस न करें” (Read, so you never feel low)।

 

इस दिन को क्यों चुना गया?

UNESCO ने विलियम शेक्सपियर, मिगुएल सर्वेंट्स और इंका गार्सिलासो डे ला वेगा सहित महान साहित्यकारों को श्रद्धांजलि देने के लिए 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस के रूप में चुना है। इस तारीख को ही इन साहित्यकारों का निधन हुआ था।

निर्यात ऋण गारंटी निगम

‘निर्यात ऋण गारंटी निगम’ लिमिटेड (Export Credit Guarantee Corporation of India Ltd- ECGC), एक सरकारी स्वामित्व वाली निर्यात ऋण प्रदाता कंपनी है।

इसकी स्थापना वाणिज्यिक और राजनीतिक कारणों से विदेशी खरीदारों द्वारा गैर-भुगतान जोखिमों के खिलाफ निर्यातकों को ऋण बीमा सेवाएं प्रदान करके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।

  • यह भारतीय निर्यातकों को ‘निर्यात ऋण बीमा सहायता’ प्रदान करती है।
  • यह वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय, भारत सरकार के स्वामित्व में कार्य करती है।
  • यह मुंबई में स्थित है।
  • इसकी स्थापना 1957 में हुई थी।

 

विश्व कोयला संघ

वर्ल्ड कोल एसोसिएशन (World Coal Association – WCA) लंदन, यूनाइटेड किंगडम में स्थित एक अंतरराष्ट्रीय गैर-लाभकारी, गैर-सरकारी संघ है।

  • इसकी स्थापना ‘वैश्विक कोयला उद्योग का प्रतिनिधित्व’ करने के लिए की गयी थी।
  • इस संघ को पहले विश्व कोयला संस्थान (WCI) कहा जाता था, लेकिन नवंबर 2010 में इसका नाम बदल दिया गया।
  • WCA उद्योग के लिए लॉबिंग, कार्यशालाओं का आयोजन आदि करता है, और नीति निर्माताओं को कोयले की जानकारी प्रदान करता है।
  • ‘वर्ल्ड कोल एसोसिएशन’ आसियान देशों में कोयले के भविष्य पर एक रिपोर्ट का सह-लेखक भी है।