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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 28 April 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

  1. उष्ण लहर / हीटवेव

सामान्य अध्ययन-II

  1. ‘मूल संरचना’ का सिद्धांत और केशवानंद भारती मामला
  2. हेपेटाइटिस बी
  3. कर्नाटक द्वारा मलेरिया मुक्त बनने के लिए 2027 का लक्ष्य

सामान्य अध्ययन-III

  1. भारतीय दंड सहिंता की धारा 144

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. iRAD: ‘एकीकृत सड़क दुर्घटना डेटाबेस’
  2. इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ आदि।

उष्ण लहर / हीटवेव


संदर्भ:

महाराष्ट्र के विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्र, फिर से ‘उष्ण लहर’ / ‘ग्रीष्म लहर’ (Heat Waves) की गिरफ्त में आ गए हैं। पिछले दो महीनों में यह चौथी और अप्रैल में दूसरी ‘उष्ण लहर’ / हीटवेव है। वस्तुतः, 26 अप्रैल को ‘विदर्भ’ देश का सबसे गर्म क्षेत्र था।

‘उष्ण लहर’ के बारे में:

  • ‘भारतीय मौसम विज्ञान विभाग’ के अनुसार, जब किसी जगह पर तापमान, मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक, तथा तटीय क्षेत्रों में 37 डिग्री सेल्सियस या इससे अधिक तथा पर्वतीय क्षेत्रों न्यूनतम 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है, तो इसे ‘गर्म हवा की लहर’ अर्थात ‘ग्रीष्म लहर’ / ‘उष्ण लहर’ (Heat Wave) माना जाता है।
  • भारत मौसम विभाग (IMD) द्वारा तापमान में सामान्य से 5 से 6.4 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होने पर ‘ग्रीष्म लहर’ की स्थिति घोषित कर दी जाती है।
  • तापमान में सामान्य से 4 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि होने पर इसे ‘प्रचंड ग्रीष्म लहर’ (severe heatwave) कहा जाता है।
  • इसके अलावा, मैदानी इलाकों के लिए, यदि कोई क्षेत्र किसी भी दिन 45 डिग्री और 47 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान रिकॉर्ड करता है, तो भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा, क्रमशः ‘ग्रीष्म लहर’ तथा ‘प्रचंड ग्रीष्म लहर’ घोषित की जाती है।

महाराष्ट्र में उष्ण लहरों के आने का कारण:

पूर्व-मानसून वर्षा की कमी से समग्र रूप से अधिकतम तापमान में वृद्धि की है। महाराष्ट्र में 1 मार्च से 26 अप्रैल तक 63 प्रतिशत वर्षा में कमी दर्ज की गयी है।

भारत में अधिक ‘ग्रीष्म लहरें’ आने का कारण:

  1. शहरी क्षेत्रों में पक्की और कंक्रीट सतहों से गर्मी का आवर्धित प्रभाव और वृक्षावरण की कमी।
  2. शहरी गर्म द्वीपीय प्रभाव (Urban heat island effects) के कारण आस-पास का तापमान, वास्तविक तापमान से 3 से 4 डिग्री अधिक महसूस होता है।
  3. पिछले 100 वर्षों में वैश्विक स्तर पर तापमान में औसत 0.8 डिग्री की वृद्धि होने से ‘ग्रीष्म लहरों’ की तीव्रता में वृद्धि होने की संभावना है। रात्री-कालीन तापमान में भी वृद्धि हो रही है।
  4. जलवायु परिवर्तन के कारण, वैश्विक स्तर पर दैनिक उच्च तापमान में वृद्धि, लंबे समय तक चलने वाली और और अधिक तीव्र ‘ग्रीष्म लहरों’ की आवृति में लगातार वृद्धि होती जा रही है।
  5. मध्यम से उच्च ‘ग्रीष्म लहर’ क्षेत्रों में पराबैगनी किरणों की उच्च तीव्रता।
  6. असाधारण गर्मी का दबाव और मुख्यतः ग्रामीण आबादी का संयोजन, भारत को ‘ग्रीष्म लहरों’ के प्रति अधिक संवेदनशील बना देता है।

भारत के लिए आगे की राह: भारत को ‘ग्रीष्म लहरों’ से किस प्रकार निपटना चाहिए?

  1. मौसम संबंधी आंकड़ों की उपयुक्त ट्रैकिंग के माध्यम से ‘ऊष्मा हॉट-स्पॉट’ की पहचान करना और संबंधित संस्थाओं के मध्य रणनीतिक समन्वय के साथ, सबसे कमजोर समूहों को लक्षित करते हुए स्थानीय स्तर पर ‘गर्मी कार्य योजना’ के निर्माण, कार्यान्वयन तथा प्रतिक्रिया को बढ़ावा देना।
  2. जलवायु परिस्थितियों के संबंध में श्रमिकों की सुरक्षा हेतु मौजूदा व्यावसायिक स्वास्थ्य मानकों, श्रम कानूनों और क्षेत्रीय नियमों की समीक्षा करना।
  3. स्वास्थ्य, जल और विद्युत, तीनो क्षेत्रों में नीतिगत हस्तक्षेप और समन्वय की आवश्यकता है।
  4. पारंपरिक अनुकूलन पद्धतियों, जैसेकि घर के अंदर रहना और आरामदायक कपड़े पहनना आदि को बढ़ावा देना।
  5. सरल डिजाइन सुविधाओं जैसेकि छायादार खिड़कियां, भूमिगत जल भंडारण टैंक और ‘ऊष्मा-रोधी भवन सामग्री’ को प्रचलित करना।
  6. कमजोर समूहों को सुरक्षित करने के क्रम में सरकार द्वारा, स्थानीय स्तर पर ‘ग्रीष्म कार्य योजनाओं’ (Heat Action Plans) का अग्रिम कार्यान्वयन तथा साथ ही विभिन्न संस्थाओं के मध्य प्रभावी रणनीतिक समन्वय, महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया साबित हो सकती है।

सर्वाधिक उष्ण लहर प्रवण क्षेत्र:

देश में निम्नलिखित सर्वाधिक उष्ण लहर प्रवण क्षेत्रों – ‘कोर हीटवेव ज़ोन’ (CHZ) – के रूप में जाना जाता है:

राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, पश्चिम मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, महाराष्ट्र में विदर्भ, गंगा घाटी क्षेत्र में पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्से, तटीय आंध्र प्रदेश, और तेलंगाना।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘समुद्री हीटवेव’ के बारे में जानते हैं?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘हीट वेव’ कब घोषित की जाती है?
  2. मानदंड?
  3. हीटवेव और सुपर हीटवेव के बीच अंतर?
  4. IMD क्या है?

मेंस लिंक:

गीष्म लहरों के कारण पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों का परीक्षण कीजिए तथा भारत को इससे कैसे निपटना चाहिए?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

‘मूल संरचना’ का सिद्धांत और केशवानंद भारती मामला


संदर्भ:

अब से ठीक उनतालीस पहले, 24 अप्रैल, 1973 को, भारत के मुख्य न्यायाधीश ‘सर्व मित्र सीकरी’ (एस एम सीकरी) और सर्वोच्च न्यायालय के 12 न्यायाधीश अपने इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय देने के लिए एकत्रित हुए थे।

  • सर्वोच्च न्यायालय की इस संवैधानिक पीठ के समक्ष ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में 68 दिनों तक सुनवाई हुई। इस मामले में बहस 31 अक्टूबर 1972 को शुरू होकर 23 मार्च 1973 को समाप्त हुई।
  • मामले में 7-6 के फैसले से, 13-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया, कि संविधान की ‘बुनियादी संरचना’ अनुल्लंघनीय है, और संसद द्वारा इसे संशोधित नहीं किया जा सकता है।
  • तब से ‘मूल संरचना के सिद्धांत’ (Basic Structure Doctrine) को ‘भारतीय संवैधानिक कानून के सिद्धांत’ के रूप में माना जाता है।

मामले की पृष्ठभूमि:

यह सब प्रयास सिर्फ एक मुख्य प्रश्न का उत्तर देने के लिए गए थे; कि क्या संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति असीमित है?

दूसरे शब्दों में, कि क्या संसद को संविधान के किसी भी हिस्से को इस हद तक – यहां तक ​​कि सभी मौलिक अधिकारों को भी रद्द करने तक- परिवर्तित, संशोधित या निरसित करने की शक्ति है?

  • 1970 के दशक की शुरुआत में, तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने ‘आरसी कूपर’ (1970), माधवराव सिंधिया (1970), माधवराव सिंधिया ( 1970) और पहले उल्लेखित किए जा चुके गोलकनाथ मामले में सुप्रीमकोर्ट के फैसलों से पार पाने के लिए संविधान में प्रमुख संशोधन (24वें, 25वें, 26वें और 29वें) अधिनियमित किए थे।
  • ‘आर सी कूपर’ मामले में, शीर्ष न्यायालय ने इंदिरा गांधी की ‘बैंक राष्ट्रीयकरण नीति’ को निरस्त कर दिया था और ‘माधवराव सिंधिया’ मामले में पूर्व शासकों के ‘प्रिवीपर्स’ को समाप्त करने संबंधी सरकार के आदेश को रद्द कर दिया था।
  • गोलकनाथ मामले सहित सभी चारो संविधान संशोधन, ‘केशवानंद भारती मामले’ में दी गयी चुनौती के दायरे में आ गए थे। इस मामले में, एक धार्मिक सन्यासी स्वामी केशवानंद भारती द्वारा केरल सरकार के खिलाफ ‘राज्य भूमि सुधार संबंधी दो कानूनों’ के खिलाफ राहत मांगी गई थी।

‘मूल संरचना’ का सिद्धांत

संवैधानिक पीठ ने 7-6 से निर्णय दिया, कि संसद को संविधान की मूल संरचना में परिवर्तन करने से रोका जाना चाहिये।

  • उच्चत्तम न्यायालय के अनुसार, अनुच्छेद 368, जो संसद को संविधान में संशोधन करने की शक्तियाँ प्रदान करता है, के तहत संविधान की मूल संरचना में बदलाव नहीं किया जा सकता है।
  • यद्यपि उच्चत्तम द्वारा संविधान की मूल संरचनाको परिभाषित नहीं किया गया, किंतु संविधान की कुछ विशेताओं, संघवाद, पंथनिरपेक्षता, लोकतंत्र, मौलिक अधिकार, न्यायिक समीक्षा आदि को ‘मूल संरचना’ के रूप निर्धारित किया है। तब से न्यायालय द्वारा इस सूची का विस्तार किया जा रहा है।

‘केशवानंद भारती वाद’ के पश्चात मूल संरचना‘:

‘केशवानंद भारती वाद’ के बाद से संविधान की ‘मूल संरचना’ के सिद्धांत में ‘’संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, संघवाद, धर्मनिरपेक्षता, संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य, सरकार की संसदीय प्रणाली, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, कल्याणकारी राज्य’’ इत्यादि को सम्मिलित किया गया है।

आलोचना:

  • संविधान की ‘मूल संरचना के सिद्धांत’ (Basic Structure Doctrine) के आलोचकों द्वारा इस सिद्धांत को ‘अलोकतांत्रिक’ बताया जाता है, क्योंकि इसके तहत अनिर्वाचित न्यायाधीश को किसी संवैधानिक संशोधन को रद्द करने की शक्ति होती है।
  • साथ ही, इस सिद्धांत के समर्थकों द्वारा, इसको बहुसंख्यकवाद और सत्तावाद के खिलाफ एक ‘सुरक्षा वाल्व’ के रूप में अवधारणा बाटते हुए सराहना की जाती है।

केशवानंद भारती मामले में फैसले के परिणाम और निहितार्थ:

  • यदि सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने बहुमत से यह मान लिया होता, कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से को बदल सकती है, तो भारत निश्चित रूप से एक ‘सर्वसत्तावादी राज्य’ (totalitarian State) में बदल गया होता या देश में ‘एक-दलीय शासन’ व्यवस्था लागू हो गयी होती।
  • हर हाल में, संविधान अपनी सर्वोच्चता खो चुका होता।
  • संविधान के 39वें संशोधन में, चुनावी कदाचार के बावजूद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, अध्यक्ष और प्रधान मंत्री के चुनाव को किसी भी चुनौती पर रोक लगा दी गयी थी। यह इंदिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय के प्रतिकूल फैसले को रद्द करने का एक स्पष्ट प्रयास था।
  • 41वें संशोधन में, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधान मंत्री या राज्यपालों के खिलाफ- न केवल उनके कार्यकाल के दौरान, बल्कि सदैव के लिए- दायर किए जाने वाले किसी भी मामले, दीवानी या आपराधिक पर रोक लगा दी गयी थी। इस प्रकार, यदि कोई व्यक्ति केवल एक दिन के लिए राज्यपाल बन गया, तो उसे जीवन भर के लिए किसी भी कानूनी कार्यवाही से छूट प्राप्त हो जाती।

यदि, वास्तव में संसद सर्वोच्च होती, तो ये चौंकाने वाले संशोधन, संविधान का हिस्सा बन जाते।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधन और अन्य संवैधानिक संशोधन
  2. संशोधन के प्रकार
  3. 25, 26, 39 और 41वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा लागू किए गए प्रमुख परिवर्तन
  4. सुप्रीम कोर्ट की विभन्न पीठें
  5. मूल/ बुनियादी संरचना की परिभाषा और उसका दायरा
  6. मूल अधिकार बनाम राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत

मेंस लिंक:

‘केशवानंद भारती वाद’ में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

हेपेटाइटिस बी


(Hepatitis B)

संदर्भ:

पूरे विश्व में बच्चों में हेपेटाइटिस बी (Hepatitis B) के अस्पष्टीकृत मामलों की एक श्रृंखला देखी जा रही है। अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई देशों में कुछ बच्चों में ‘हेपेटाइटिस बी’ पाए जाने के रहस्यमय मामलों की सूचना दर्ज की गयी है।

हेपेटाइटिस बी’ के बारे में:

  • हेपेटाइटिस बी (Hepatitis B), यकृत अर्थात लीवर में होने वाला एक संक्रमण है, जो ‘हेपेटाइटिस बी वायरस’ (Hepatitis B virus – HBV) के कारण होता है।
  • यह वायरस आमतौर पर रक्त, वीर्य या शरीर से निस्सृत होने वाले अन्य तरल पदार्थों से फैलता है।

निवारण:

हेपेटाइटिस बी संक्रमण का टीकाकरण के माध्यम से इसे रोका जा सकता है या इससे बचाव किया जा सकता है।

लक्षण:

  • पीलिया, बुखार, हफ्तों या महीनों तक बनी रहने वाली थकान, उल्टी, भूख न लगना और जोड़ों या पेट में दर्द होन आदि, हेपेटाइटिस बी संक्रमण के सबसे आम लक्षण हैं।
  • हेपेटाइटिस बी संक्रमण के तीव्र होने की स्थिति में, तो वायरस कम समय तक रहता है और हमेशा उपचार की आवश्यकता नहीं होती है, हालांकि यह कभी-कभी गंभीर होने पर अंगों पर घाव, यकृत की विफलता और यहां तक ​​कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण बन सकता है।

एडेनोवायरस और बच्चों में हेपेटाइटिस बी का कारण:

‘एडेनोवायरस’ (Adenovirus) विषाणुओं का एक समूह होता है, जो आमतौर पर सर्दी या फ्लू जैसे लक्षणों, बुखार, गले में खराश, तीव्र ब्रोंकाइटिस, निमोनिया, नेत्रश्लेष्मलाशोथ, पेट की तीव्र सूजन, दस्त, उल्टी, मतली और पेट दर्द आदि का कारण बनता है।

  • एडीनोवायरस, एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में निकट संपर्क में आने, खांसने, छींकने और यहां तक ​​कि एडेनोवायरस-युक्त किसी वस्तु को छूने और फिर मुंह, नाक या आंखों को छूने से फैलता है।
  • ‘टाइप 41 एडिनोवायरस’ की वजह से, बच्चों में हेपेटाइटिस बी होने का संदेह किया जा रहा है।
  • यद्यपि एडेनोवायरस के 50 से अधिक प्रकार खोजे जा चुके हैं, और जिसमे ‘टाइप 41 एडिनोवायरस, ’सांस की समस्याओं के साथ दस्त, उल्टी और बुखार का कारण बनता है।

Hepatitis

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. हेपेटाइटिस बी संक्रमण के कारण
  2. लक्षण
  3. रोग की रोकथाम
  4. चिंताएं
  5. रोग का प्रसार और रोकथाम के तरीके

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

कर्नाटक द्वारा मलेरिया मुक्त बनने के लिए 2027 का लक्ष्य


संदर्भ:

कर्नाटक ने, मलेरिया को खत्म करने के लिए – केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित 2030 के लक्ष्य से तीन साल पहले- 2027 तक का लक्ष्य निर्धरित किया है।

‘भारत में मलेरिया उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय रूपरेखा’ (National Framework for Malaria Elimination in India – NFMEI) पहल के एक भाग के रूप में, पिछले छह वर्षों के दौरान- 2015 और 2021 के बीच – मलेरिया को खत्म करने के अपने प्रयासों के लिए कर्नाटक को राष्ट्रीय स्तर सम्मान और प्रशंसा मिल चुकी है।

‘मलेरिया’ के बारे में:

मलेरिया (Malaria) एक परजीवी-जनित जानलेवा बीमारी है, जो संक्रमित मादा एनोफिलीज (Anopheles) मच्छरों के काटने से लोगों में फैलती है।

संपूर्ण विश्व में मलेरिया का भार:

मलेरिया का प्रकोप स्थानिक रूप से अफ्रीका में सबसे अधिक है। मलेरिया से होने वाली कुल मौतों में आधे से अधिक मौतें, अफ्रीकी देश नाइजीरिया, कांगो, तंजानिया, मोजाम्बिक, नाइजर और बुर्किना फासो में संयुक्त रूप से होती है।

  • WHO के आंकड़ों के अनुसार, अब भी, यह बीमारी हर साल चार लाख से अधिक लोगों की जान लेती है।
  • मलेरिया से सबसे अधिक प्रभावित समूह, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चे हैं; वर्ष 2019 में, मलेरिया से होने वाली कुल मौतों में, 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की संख्या 67% (274,000) थी।
  • वर्ष 2019 में, भारत में मलेरिया के अनुमानित 6 मिलियन मामले थे, जबकि वर्ष 2020 में इनकी संख्या लगभग 20 मिलियन थी।

WHO का मलेरिया मुक्त प्रमाणपत्र:

  1. किसी देश द्वारा पिछले तीन वर्षो तक लगातार ‘एनोफिलीज मच्छरों’ (Anopheles mosquitoes) द्वारा स्थानीय रूप से मलेरिया संक्रमण श्रृंखला को देशव्यापी स्तर पर समाप्त करने के प्रमाण दिए जाने पर ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्वारा ‘‘मलेरिया मुक्त प्रमाणपत्र’ (Malaria-Free Certification) प्रदान किया जाता है।
  2. इस प्रमाणपत्र को हासिल करने के आकांक्षी किसी देश को बीमारी के पुनः संक्रमण को रोकने की क्षमता भी प्रदर्शित करनी आवश्यक होती है।
  3. ‘मलेरिया मुक्त प्रमाणन प्रदान करने’ का अंतिम निर्णय, एक स्वतंत्र ‘मलेरिया उन्मूलन प्रमाणन समिति’ (Malaria Elimination Certification Panel MECP) की सिफारिश के आधार पर WHO महानिदेशक के द्वारा लिया जाता है।

WHO विश्व मलेरिया रिपोर्ट 2020 के प्रमुख निष्कर्ष:

  • भारत ने मलेरिया के भार को कम करने में काफी प्रगति की है।
  • भारत उच्च स्थानिक मलेरिया वाला एकमात्र देश है, जिसने वर्ष 2018 की तुलना में 2019 में 6% की गिरावट दर्ज की है।

मलेरिया का टीका अभी तक विकसित नहीं होने के कारण:

  1. मलेरिया उत्पन्न करने वाले परजीवी के जीवन-चक्र की जटिलता। इस परजीवी के जीवन का एक हिस्सा परपोषी मानव में ही गुजरता है।
  2. ये परजीवी, प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा पहचाने जाने से बचने के लिए मानव कोशिकाओं के अंदर छिपने में भी सक्षम होते हैं, जिससे कई चुनौतियां उत्पन्न होती हैं।
  3. मलेरिया का टीका विकसित करने में धन और रुचि की कमी।
  4. वैक्सीन निर्माताओं के लिए मलेरिया का टीका विकसित करने में कम लाभ और बहुत कम प्रोत्साहन।

इंस्टा जिज्ञासु:

70 साल के प्रयासों के बाद, चीन को ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) द्वारा मलेरिया-मुक्त होने का प्रमाण पत्र दिया गया है। यह 1940 के दशक में हर साल 30 मिलियन मलेरिया मामले दर्ज करने वाले देश के लिए एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।

  • ‘WHO पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र’ में चीन पहला देश है जिसे तीन दशकों से ज्यादा समय में मलेरिया मुक्त प्रमाणन से सम्मानित किया गया है।
  • इस दर्जे को हासिल करने वाले ‘WHO पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र’ के अन्य देशों में ऑस्ट्रेलिया (1981), सिंगापुर (1982) और ब्रुनेई दारुस्सलाम (1987) शामिल हैं।
  • विश्व स्तर पर, 40 देशों और क्षेत्रों को WHO से मलेरिया-मुक्त प्रमाणन प्रदान गया है। हाल ही में, यह प्रमाणन हासिल करने वाले देशों में अल सल्वाडोर (2021), अल्जीरिया (2019) शामिल हैं।

सफलता की कुंजी- चीन द्वारा उठाए गए कदम:

  1. चीन द्वारा अपने देशवासियों को एक बुनियादी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पैकेज निःशुल्क प्रदान किया जाता है। इस पैकेज के एक भाग के रूप में, चीन में सभी लोगों के लिए, बगैर किसी विधिक या वित्तीय स्थिति के, मलेरिया के निदान और उपचार के लिए सस्ती सेवाएँ उपलब्ध कराई जाती हैं।
  2. चीन की इस सफलता के लिए ‘प्रभावी बहु-क्षेत्रीय सहयोग’ ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्ष 2010 में, चीन में स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त, अनुसंधान और विज्ञान, विकास आदि का प्रतिनिधित्व करने वाले 13 मंत्रालयों द्वारा देश भर में मलेरिया को समाप्त करने के लिए संयुक्त रूप से मोर्चा संभाला।
  3. “1-3-7” रणनीति: इस रणनीति के तहत “1” स्वास्थ्य सुविधाओं को मलेरिया निदान की रिपोर्ट करने के लिए एक दिन की समय सीमा को दर्शाता है; “3”, तीसरे दिन के अंत तक, स्वास्थ्य अधिकारियों को मामले की पुष्टि करने और इसके प्रसार संबंधी जोखिम को निर्धारित करना आवश्यक होता है; और “7”, सात दिनों के भीतर बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए उचित उपाय किए जाने को व्यक्त करता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ओडिशा अपनी ‘दमन पहल’ (DAMaN initiative) के माध्यम से, मलेरिया के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में एक प्रेरणा के रूप में उभरा है? इस पहल के बारे में जानने हेतु पढ़िए।  

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वायरस और बैक्टीरिया के कारण होने वाले विभिन्न रोगों में अंतर और उदाहरण
  2. मलेरिया- कारण और उपचार
  3. डब्ल्यूएचओ प्रमाणन प्रक्रिया के बारे में
  4. डब्ल्यूएचओ विश्व मलेरिया रिपोर्ट 2020 का अवलोकन

मेंस लिंक:

मलेरिया नियंत्रण पर लक्षित भारत के प्रयासों की चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।

भारतीय दंड सहिंता की धारा 144


(Section 144 CrPC)

इसके बारे में:

भारतीय दंड सहिंता में शामिल ‘औपनिवेशिक युग के इस कानून’ के तहत, एक जिला मजिस्ट्रेट, एक उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत किसी अन्य कार्यकारी मजिस्ट्रेट को संभावित खतरे या उपद्रव के तत्काल मामलों को रोकने और उनका समाधान करने के लिए आदेश जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी है।

  • इस धारा के तहत, किसी निर्दिष्ट अधिकारी द्वारा किसी व्यक्ति या किसी विशेष क्षेत्र में रहने वाले व्यक्तियों या बड़े पैमाने पर जनता के खिलाफ लिखित आदेश जारी किया जा सकता है।
  • अत्यावश्यक मामलों में, मजिस्ट्रेट द्वारा लक्षित व्यक्ति को पूर्व सूचना दिए बिना भी आदेश पारित किया जा सकता है।

इस प्रावधान के तहत शक्तियां:

  • इस प्रावधान में, मजिस्ट्रेट के लिए, किसी व्यक्ति को एक निश्चित कार्य से दूर रहने का निर्देश देने या उस व्यक्ति के कब्जे में या उसके प्रबंधन के अधीन किसी निश्चित परिसंपत्ति के संबंध में एक आदेश पारित करने की शक्ति प्रदान की गयी है।
  • आमतौर पर इस धारा के लागू होने का मतलब- आवाजाही, हथियार रखने और गैरकानूनी तरीके से इकट्ठा होने पर पर प्रतिबंध होता है ।
  • आम तौर पर यह समझा जाता है, कि धारा 144 के तहत तीन या अधिक लोगों के एक साथ इकठ्ठा होने पर प्रतिबंध होता है।

अवधि:

इस धारा 144 के तहत पारित आदेश, जब तक कि राज्य सरकार इसे बढ़ाना जरूरी नहीं समझती- दो महीने तक लागू रहते हैं । लेकिन किसी भी स्थिति में, आदेश के प्रभावी होने की कुल अवधि छह महीने से अधिक नहीं हो सकती है।

आलोचनाएं:

  • इस धारा के तहत लगाए गए प्रतिबंध काफी व्यापक / अतिरंजित होते है, और मजिस्ट्रेट को अनुचित रूप से पूर्ण शक्ति का प्रयोग करने की अनुमति दी गयी है।
  • कानून के तहत, इस धारा के तहत जारी आदेश के खिलाफ पहला उपाय ‘एक पुनरीक्षण आवेदन’ दायर करना होता है, जिसे उसी अधिकारी के समक्ष दायर किया जाना होता है जिसने पहली बार आदेश जारी किया था।
  • पीड़ित व्यक्तियों का तर्क है, कि कई मामलों में उच्च न्यायालय के हस्तक्षेप से पहले ही राज्य द्वारा उनके अधिकारों का उल्लंघन किया जा चुका होता।
  • एक बहुत बड़े क्षेत्र पर ‘निषेधाज्ञा’ लागू करना उचित नहीं है क्योंकि सुरक्षा की स्थिति अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग होती है और इससे एक ही तरीके से निपटा नहीं जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले:

  1. बाबूलाल पराटे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य1961 (Babulal Parate vs State of Maharashtra and Others) मामला: इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए ‘धारा 144’ को रद्द करने से इनकार कर दिया कि “यह कहना सही नहीं है कि धारा के तहत जारी आदेश से पीड़ित व्यक्ति के लिए उपलब्ध उपचार मात्र भ्रामक हैं”।
  2. 1967 में, अदालत ने यह कहते हुए कानून को चुनौती देने से इनकार कर दिया कि ” यदि ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ को नागरिकों के एक वर्ग द्वारा स्वतंत्र रूप से भंग करने की अनुमति दी जाती है, तो कोई भी लोकतंत्र मौजूद नहीं रह सकता है”।
  3. 1970 में (‘मधु लिमये बनाम उप-मंडल मजिस्ट्रेट’), अदालत ने कहा कि धारा 144 के तहत एक मजिस्ट्रेट की शक्ति “प्रशासन से मिलने वाली एक सामान्य शक्ति नहीं है, बल्कि न्यायिक तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली शक्ति है और जिसकी आगे न्यायिक जांच की जा सकती है” .
  4. अदालत ने, हालांकि, इस कानून की संवैधानिकता को बरकरार रखा, यह फैसला सुनाया कि धारा 144 के माध्यम से लगाए गए प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के तहत निर्धारित मौलिक अधिकारों के लिए “उचित प्रतिबंध” के अंतर्गत आते हैं।

चर्चा का कारण:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को- 27 अप्रैल को गांव में हिंदू धार्मिक नेताओं द्वारा नियोजित महापंचायत के दौरान कोई “अप्रिय स्थिति” नहीं हो या “अस्वीकार्य बयान” नहीं दिए जाने के लिए प्रतिबद्धता देने का निर्देश दिया था, जिसके बाद उत्तराखंड सरकार ने धारा 144 लागू कर दी है।

आवश्यकता:

पिछले साल दिसंबर में हरिद्वार में आयोजित एक सहित, इस तरह की सभाओं में हिंदू धार्मिक नेताओं द्वारा मुसलमानों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए गए थे।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय दंड सहिंता की धारा 144
  2. यह धारा कब और क्यों लागू की जाती है?
  3. इसके निहितार्थ?
  4. चुनौतियां और उनसे निपटने के तरीके।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 iRAD: ‘एकीकृत सड़क दुर्घटना डेटाबेस’

‘एकीकृत सड़क दुर्घटना डेटाबेस’ (Integrated Road Accident Database – iRAD), देश में सड़क सुरक्षा में सुधार लाने के उद्देश्य से ‘सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय’ (MoRTH) की एक पहल है।

  • इसका मुख्य उद्देश्य सड़क सुरक्षा को बढ़ावा देना है, और विभिन्न विभागों/हितधारकों द्वारा दुर्घटना संबंधी सभी डेटा को होस्ट और एक्सेस करने के लिए एक ‘केंद्रीकृत दुर्घटना डेटाबेस’ बनाना है।
  • इस पहल को हाल ही में चंडीगढ़ में लॉन्च किया गया था।

 

इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक’ (IPPB) के लिए ₹820 करोड़ की वित्तीय सहायता को मंजूरी दी गयी है।

IPPB के बारे में:

‘इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक’ (IPPB) की स्थापना संचार मंत्रालय के डाक विभाग के तहत, भारत सरकार के स्वामित्व वाली 100% इक्विटी के साथ की गई है।

  • आईपीपीबी को 1 सितंबर, 2018 को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा लॉन्च किया गया था।
  • यह भारतीय डाक विभाग का एक भुगतान बैंक है जो डाकघरों और लगभग 4 लाख डाकियों के नेटवर्क के माध्यम से काम करता है। यह भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा शासित होता है।
  • इस बैंक की स्थापना भारत में आम आदमी के लिए सबसे सुलभ, किफायती और भरोसेमंद बैंक बनाने की दृष्टि से की गई है।
  • आईपीपीबी का मूल उद्देश्य बिना बैंक वाले और कम बैंकिंग सुविधा वाले लोगों के लिए बाधाओं को दूर करना है और डाक कर्मचारियों के नेटवर्क का लाभ उठाकर अंतिम मील तक पहुंचना है।
  • आईपीपीबी कम नकदी वाली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने और डिजिटल इंडिया के विजन में योगदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।