[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 9 April 2022

विषयसूची

सामान्य अध्ययन-I

  1. लिंगराज मंदिर

सामान्य अध्ययन-II

  1. संघ लोक सेवा आयोग अध्यक्ष
  2. भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण का CAG ऑडिट
  3. मिशन वात्सल्य
  4. सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची
  5. विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2020 में संशोधन

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. इंडियन टेंट टर्टल
  2. बैजयंत पांडा समिति
  3. कुथिरन सुरंग

 


सामान्य अध्ययनI


विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

लिंगराज मंदिर

संदर्भ:

केंद्र सरकार ने ओडिशा सरकार से कहा है, कि भुवनेश्वर में अवस्थित 11वीं सदी के लिंगराज मंदिर  (Lingaraj Temple) और उससे जुड़े मंदिरों को एक विशेष कानून के तहत लाने संबंधी राज्य सरकार का अध्यादेश ‘राज्य विधानमंडल’ की विधायी क्षमता से बाहर है।

लिंगराज मंदिर के बारे में:

  • लिंगराज मंदिर, भगवान शिव को समर्पित है तथा ओडिशा के सबसे पुराने और भुवनेश्वर के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है।
  • इसका निर्माण 10वीं शताब्दी में सोम वंशी राजा ययाति केसरी द्वारा कराया गया था, और 11वीं शताब्दी में राजा लालतेंदु केशरी द्वारा पूरा किया गया। 
  • यह मंदिर देउला शैली (Deula style) में बना हुआ है और लाल पत्थर से निर्मित है तथा वास्तुकला की कलिंग शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर भुवनेश्वर में ‘मंदिर वास्तुकला’ का चरम-उत्कर्ष का प्रतीक है, तथा इसे मंदिर वास्तुकला की कलिंग पद्धति का उद्गम स्थल माना जाता है।

लिंगराज मंदिर अध्यादेश, 2020 का अवलोकन:

  1. वर्ष 2020 में पारित इस अध्यादेश में, लिंगराज मंदिर और तीन जलाशयों सहित 12 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों को समाविष्ट किया गया है।
  2. अध्यादेश में मंदिरों के अंदर या बाहर वस्तुओं की बिक्री के लिए खुदरा दुकानों का प्रावधान किया गया है।
  3. एक प्रबंध समिति द्वारा ‘लिंगराज मंदिर’ से जुड़ी चल या अचल संपत्ति के पट्टे या बिक्री की देखरेख की जाएगी।
  4. अध्यादेश में नए भवनों की मरम्मत और निर्माण का प्रावधान भी किया गया है।

संबंधित प्रकरण:

  • केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) के अनुसार, प्रस्तावित अध्यादेश के कई प्रावधान ‘प्राचीन संस्‍मारक तथा पुरातत्‍वीय स्‍थल और अवशेष अधिनियम’1958 (Ancient Monuments and Archaeological Sites and Remains – AMASR, 1958) का उल्लंघन करते हैं
  • पहली बात यह, कि यह अध्यादेश राज्य विधायिका की विधायी क्षमता से बाहर था, क्योंकि यह AMASR अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। AMASR अधिनियम के तहतइन 12 केंद्रीय संरक्षित स्मारकों के संरक्षण और संरक्षण के लिए ‘भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण’ (ASI) जिम्मेदार है।
  • AMASR अधिनियम के अनुसार, किसी स्मारक का उपयोग किसी अन्य उद्देश्य के लिए नहीं किया जाना चाहिए जो उसके चरित्र के अनुरूप न हो। अध्यादेश के तहत ‘खुदरा दुकानों’ के निर्माण की अनुमति देना इस प्रावधान का उल्लंघन है।
  • AMASR अधिनियम के अनुसार, निषिद्ध क्षेत्रों (संरक्षित स्मारक से 100 मीटर क्षेत्र) में नए निर्माण की अनुमति नहीं है।

Current Affairs

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लिंगराज मंदिर का निर्माण किसने कराया था?
  2. वास्तुकला की कलिंग शैली क्या है?
  3. देउला शैली क्या है?
  4. नागर और द्रविड़ शैलियों के बीच अंतर।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनII


विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

संघ लोक सेवा आयोग अध्यक्ष


(UPSC chairman)

संदर्भ:

‘स्वामीनारायण संप्रदाय’ के ‘अनूपम मिशन’ से जुड़े एक सन्यासी डॉ मनोज सोनी को 5 अप्रैल को देश की प्रमुख सरकारी भर्ती एजेंसी अर्थात संघ लोक सेवा आयोग (Union Public Service Commission – UPSC) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है।

मनोज सोनी के बारे में:

डॉ मनोज सोनी वर्तमान में ‘संघ लोक सेवा आयोग’ (UPSC) के सदस्य हैं। यूपीएससी के प्रमुख नियुक्त होने से पहले, मनोज सोनी ने तीन कार्यकालों तक कुलपति (Vice-Chancellor) रह चुके हैं। इसमें डॉ बाबासाहेब अम्बेडकर मुक्त विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में लगातार दो बार – छह साल (2009-2015) तथा महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय बड़ौदा (MSU बड़ौदा) के कुलपति के रूप में एक कार्यकाल (2005-2008) शामिल है। 40 वर्ष की आयु में, महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय बड़ौदा में पदभार ग्रहण करते समय डॉ. सोनी भारत और MSU के अभी तक के सबसे युवा कुलपति थे

‘संघ लोक सेवा आयोग’ के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति 

अनुच्छेद- 316: सदस्यों की नियुक्ति और पदावधि: 

लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति – संघ आयोग या संयुक्त आयोग के मामले में – राष्ट्रपति द्वारा और राज्य आयोग के मामले में –  राज्य के राज्यपाल द्वारा की जाएगी। 

पदावधि:

लोक सेवा आयोग का सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से छह वर्ष की अवधि तक या संघ आयोग की दशा में पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक और राज्य आयोग या संयुक्त आयोग की दशा में [बासठ वर्ष] की आयु प्राप्त कर लेने तक इनमें से जो भी पहले हो, अपना पद धारण करेगा।

पुनर्नियुक्ति:

कोई व्यक्ति जो लोक सेवा आयोग के सदस्य के रूप में पद धारण करता है, अपनी पदावधि की समाप्ति पर उस पद पर पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा। 

  1. संघ लोक सेवा आयोग का अध्‍यक्ष भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी और नियोजन का पात्र नहीं होगा;
  2. लेकिन, संघ लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष से भिन्न कोई अन्य सदस्य संघ लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष के रूप में या किसी राज्य लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा। 
  3. साथ ही, किसी राज्य लोक सेवा आयोग का अध्‍यक्ष संघ लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में अथवा किसी अन्य राज्य लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा।

अनुच्छेद- 317: लोक सेवा आयोग के किसी सदस्य का हटाया जाना और निलंबित किया जाना –

लोक सेवा आयोग के अध्‍यक्ष या किसी अन्य सदस्य को राष्ट्रपति के आदेश से केवल कदाचार के आधार पर उसके पद से हटाया जाएगा। आयोग के अध्‍यक्ष या किसी अन्य सदस्य के विरुद्ध कदाचार की जांच उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अनुच्छेद 145 के अधीन इस निमित्त विहित प्रक्रिया के अनुसार की जायेगी। जांच में दोषी पाए जाने पर न्यायालय, राष्ट्रपति को अपने प्रतिवेदन में संबधित सदस्य अथवा आयोग को पद से हटाए जाने की सिफारिश करेगा।

इसके अतिरिक्त, राष्ट्रपति, लोक सेवा आयोग के  अध्यक्ष अथवा किसी अन्य सदस्य को निम्नलिखित स्थितियों में पद से हटा सकता है- यदि अध्यक्ष अथवा ने सदस्य:

  1. दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है,या
  2. अपनी पदावधि में अपने पद के कर्तव्यों के बाहर किसी सवेतन नियोजन में कार्य करता है,या
  3. राष्ट्रपति की राय में मानसिक या शारीरिक शैथिल्य के कारण अपने पद पर बने रहने के लिए अयोग्य है।

कदाचार का दोषी:

यदि लोक सेवा आयोग का अध्‍यक्ष या कोई अन्य सदस्य, निगमित कंपनी के सदस्य के रूप में और कंपनी के अन्य सदस्यों के साथ सम्मिलित रूप से अन्यथा, उस संविदा या करार से, जो भारत सरकार या राज्य सरकार के द्वारा या निमित्त की गई या किया गया है, किसी प्रकार से संपृक्त या हितबद्ध है या हो जाता है या उसके लाभ या उससे उद्‌भूत किसी फायदे या उपलब्धि में भाग लेता है तो वह कदाचार का दोषी समझा जाएगा।

(नोट: यह एक महत्वपूर्ण और संपूर्ण विषय है। इसके बारे में अधिक जानने हेतु कृपया इस लिंक को देखें और विभिन्न संबंधित तथ्यों को नोट करें।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लोक सेवा आयोगों से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  2. यूपीएससी के कार्य
  3. यूपीएससी के अध्यक्ष और सदस्य- पात्रता, नियुक्ति और पद-मुक्ति
  4. आयोग के सदस्यों और कर्मचारियों की सेवा शर्तों से संबधित नियम बनाने की शक्ति
  5. लोक सेवा आयोगों के कार्यों का विस्तार करने की शक्ति
  6. लोक सेवा आयोगों की रिपोर्ट

स्रोत: पीआईबी।

 

 

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण का CAG ऑडिट

संदर्भ:

हाल ही में, भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा ‘आधार’ की नियामक संस्था, ‘भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण’ (Unique Identification Authority of India – UIDAI) का ‘प्रदर्शन लेखा परीक्षण’ (Performance Audit) प्रस्तुत किया है। यह लेखा परीक्षण वित्तवर्ष 2015- 2019 के बीच चार साल की अवधि में किया गया था।

सीएजी का ऑडिट, UIDAI में सिस्टम और प्रक्रियाओं की असंतोषजनक तस्वीर पेश करता है।

रिपोर्ट में उजागर किए गए मुद्दे:

  1. डुप्लीकेट आधार कार्ड जारी किए जाने संबंधी मुद्दे।
  2. उप- संविदाकारों / उप- ठेकेदारों (Subcontractors) की निगरानी का अभाव: कई उप- ठेकेदार अपने कार्यों का सालाना ऑडिट कराने में विफल रहे हैं।
  3. भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण’ (UIDAI) के पास न तो सूक्षम बीजमय डेटा है और न ही यह विफलता के कारण का पता लगाने में सक्षम है।
  4. निवास के प्रमाण के लिए कोई दस्तावेज नहीं: यूआईडीएआई ने ‘आवेदक निर्दिष्ट अवधि के लिए भारत में रहता है या नहीं’- यह पुष्टि करने के लिए कोई विशिष्ट प्रमाण / दस्तावेज या प्रक्रिया निर्धारित नहीं की है।
  5. दोषपूर्ण नामांकन प्रक्रिया: ऐसा प्रतीत होता है कि यूआईडीएआई ने नामांकन के दौरान खराब गुणवत्ता वाले डेटा को फीड किए जाने पर बायोमेट्रिक अपडेट के लिए लोगों से शुल्क लिया गया था। यूआईडीएआई ने खराब गुणवत्ता वाले बायोमेट्रिक्स की जिम्मेदारी स्वयं नहीं ली।
  6. बाल आधार (Bal Aadhar): ‘बाल आधार’ नामक एक पहल के तहत बायोमेट्रिक्स के बिना बच्चों और नवजात शिशुओं को आधार कार्ड जारी करने के यूआईडीएआई के कदम का ऑडिट भी महत्वपूर्ण है। इसकी पुनर्समीक्षा करने की आवश्यकता है क्योंकि वैसे भी 5 साल बाद बच्चे को नए नियमित आधार के लिए आवेदन करना होता है।
  7. डेटा सुरक्षा से संबंधित मुद्दे।

रिपोर्ट में की गयी सिफारिशें:

  1. स्व-घोषणा (Self-Declaration) के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की जाए।
  2. बायोमेट्रिक सर्विस प्रोवाइडर्स (BSPs) के सर्विस लेवल एग्रीमेंट (SLA) मापदंडों को सख्त बनाया जाए।
  3. अवयस्कों के लिए बायोमेट्रिक पहचान की ‘विशिष्टता’ हासिल करने के वैकल्पिक तरीकों की खोज की जाए।
  4. लापता दस्तावेजों की पहचान करने और उन्हें पूरा करने के लिए सक्रिय कदम उठाए जाएँ।
  5. एक उपयुक्त डेटा अभिलेख नीति (Data Archival Policy) तैयार की जाए।

UIDAI की कार्य-प्रणाली:

भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण’ (UIDAI) उप-ठेकेदारों की परतों के माध्यम से ‘आधार’ संबंधी कार्यों को संचालित करता है। इसलिए, जब किसी आवेदक के बायोमेट्रिक्स को ‘सेंट्रल आइडेंटिटी डेटा रिपोजिटरी’ में अपलोड किया जाता है, तो इसे उप-ठेकेदारों की तीसरी परत द्वारा निष्पादित किया जा सकता है। किसी वित्तीय मध्यस्थ आधार डेटाबेस का उपयोग करके संभावित ग्राहक की पहचान को प्रमाणित करने के लिए भी इसी तरह की प्रणाली लागू होती है।

UIDAI के बारे में:

भारतीय विशिष्‍ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) दिनांक 12 जुलाई, 2016 को भारत सरकार द्वारा स्थापित एक सांविधिक प्राधिकरण है।

  • इसकी स्‍थापना आधार (वित्‍तीय और अन्‍य सहायकियों, प्रसुविधाओं और सेवाओं के लक्षित परिदान) अधिनियम, 2016 (‘आधार अधिनियम 2016’) के उपबंधों के अंतर्गत की गई थी। 
  • मूल निकाय: ‘इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय’ के अधिकार क्षेत्र में काम करता है।
  • प्रारंभ में, UIDAI की स्थापना भारत सरकार द्वारा जनवरी 2009 में योजना आयोग के तत्वावधान में एक संलग्न कार्यालय के रूप में की गई थी।
  • अधिदेश: यूआईडीएआई को भारत के सभी निवासियों को ‘आधार’ नामक 12-अंकीय विशिष्‍ट पहचान संख्‍या (यूआईडी) जारी करने का कार्य सौंपा गया है।
  • प्रदर्शन: 31 अक्टूबर 2021 तक, UIDAI ने 131.68 करोड़ आधार नंबर जारी किए थे।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UIDAI के बारे में
  2. आधार (AADHAAR) के बारे में
  3. UIDAI का पंजीकरण
  4. योजना आयोग
  5. बायोमेट्रिक जानकारी
  6. डेटा गोपनीयता

स्रोत: द हिंदू।

 

 

 

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

मिशन वात्सल्य


(Mission Vatsalya)

संदर्भ:

हाल ही में, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा ‘मिशन वात्सल्य’ (Mission Vatsalya) योजना हेतु तैयार किए गए दिशा-निर्देशों के मसौदे को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को उनके सुझाव लेने के लिए भेजा गया है।

  • मिशन वात्सल्य, मिशन शक्ति और पोषण 2.0 सहित उन तीन योजनाओं में से एक है, जिसका उद्देश्य हर बच्चे के लिए एक स्वस्थ और खुशहाल बचपन हासिल करना है।
  • यह मिशन बाल संरक्षण सेवाओं और बाल कल्याण सेवाओं पर केंद्रित है।
  • यह अभियान मुख्यतः ‘बाल संरक्षण सेवा’ नामक पहले से मौजूद योजना का एक परिवर्तित नया नाम है।

मिशन के उद्देश्य:

  1. भारत में हर बच्चे के लिए एक स्वस्थ और खुशहाल बचपन सुनिश्चित करना।
  2. बच्चों के विकास के लिए एक संवेदनशील, सहायक और समकालिक पारितंत्र को बढ़ावा देना।
  3. किशोर न्याय अधिनियम’ 2015 के अधिदेश को पूरा करने में राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों की सहायता करना।
  4. सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करना।

घटक:

इस मिशन में निम्नलिखित घटक शामिल होंगे:

  1. वैधानिक निकाय
  2. सेवा वितरण संरचनाएं
  3. संस्थागत देखभाल/सेवाएं
  4. गैर-संस्थागत समुदाय-आधारित देखभाल
  5. आपातकालीन आउटरीच सेवाएं (चाइल्डलाइन या बच्चों के लिए राष्ट्रीय हेल्पलाइन 1098 के माध्यम से)
  6. प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण।

कार्यान्वयन:

  • मिशन के तहत, परित्यक्त या लापता बच्चों जैसे असुरक्षित बच्चों की सुरक्षा हेतु अपनी इस योजना के लिए सरकार की योजना निजी क्षेत्र के साथ-साथ स्वयंसेवी समूहों के साथ भागीदारी करने की है।
  • इसके लिए एक ‘वात्सल्य पोर्टल’ विकसित किया जाएगा जहाँ पट स्वयंसेवक अपना पंजीकरण कर सकेंगे, जिससे इनके लिए राज्य और जिला प्राधिकरण द्वारा विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित करने हेतु संलग्न किया जा सकेगा।

स्रोत: द हिंदू।

 

 

 

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची


(Positive indigenisation list)

संदर्भ:

हाल ही में, रक्षा मंत्रालय द्वारा 101 वस्तुओं की तीसरी ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची’ (Positive indigenisation list) जारी की है, जिसमें प्रमुख उपकरण/प्लेटफॉर्म शामिल हैं।

  • 101 वस्तुओं वाली पहली नकारात्मक स्वदेशीकरण‘  (First Negative Indigenisation list) सूची अगस्त 2020 में अधिसूचित की गई थी।
  • दूसरी स्वदेशीकरण सूची को जून 2021 में 108 वस्तुओं के लिए जारी आयात सूची में अधिसूचित किया गया था।

तीसरी सूची में शामिल उपकरण एवं प्लेटफ़ॉर्म: 

हाईली कॉम्प्लेक्स सिस्टम, सेंसर, हथियार और गोला-बारूद जैसे हल्के टैंक, माउंटेड आर्टी गन सिस्टम, नई पीढ़ी की अपतटीय पेट्रोल पोत / नेक्स्ट जेनरेशन ऑफशोर पेट्रोल वेसल (NGOPV) आदि।

‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची’ क्या है?

  • अगस्त 2020 में पेश की गईनकारात्मक सूची’ का मुख्य रूप से मतलब है कि सभी सशत्र बल- थल सेना, वायु सेना, नौसेना- सूची में शामिल सभी 101 वस्तुओं की खरीद केवल घरेलू निर्माताओं से करेंगे।
  • इन वस्तुओं / उपकरणों का निर्माण, निजी क्षेत्र अथवा रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (Defence Public Sector Undertakings- DPSUs) द्वारा किया जायेगा।

इस नीति की आवश्यकता तथा प्रभाव:

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार, इस अवधि के दौरान भारत $ 16.75 बिलियन मूल्य के अमेरिकी और 2014 से 2019 के बीच दूसरा सबसे बड़ा आयातक रहा है।

  • सरकार रक्षा क्षेत्र में आयातित वस्तुओं पर निर्भरता को कम करना चाहती है और घरेलू रक्षा विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा देना चाहती है।
  • नकारात्मक आयात सूची में सम्मिलित वस्तुओं के आयात की संभावना को नकारते हुए, भारतीय सैन्य बलों की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए घरेलू रक्षा उद्योग को आगे बढ़ने तथा निर्माण करने का अवसर दिया गया है।

दूसरी सूची:

मई 2021 में रक्षा मंत्रालय द्वारा 108  वस्तुओं की दूसरी ‘नकारात्मक आयात सूची’ (Negative Import List) जारी की गई है, और इसका नाम परिवर्तित कर ‘सकारात्मक स्वदेशीकरण सूची‘ (Positive Indigenisation List) कर दिया गया था। इन सभी 108  वस्तुओं की खरीद स्वदेशी स्रोतों से की जाएगी। 

  1. नई सूची में कुल वस्तुओं की संख्या 209 कर दी गयी थी।
  2. इस सूची में जटिल प्रणालियां, सेंसर, सिम्युलेटर, हथियार और गोला-बारूद जैसे हेलीकॉप्टर, नेक्स्ट जेनरेशन कॉर्वेट, एयर बोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) सिस्टम, टैंक इंजन, आदि को शामिल किया गया। 

इस कदम का महत्व और निहितार्थ:

  1. सूची में स्थानीय रक्षा उद्योग की क्षमता को मान्यता दी गई है।
  2. यह प्रौद्योगिकी व विनिर्माण क्षमताओं में नए निवेश को आकर्षित करके घरेलू अनुसंधान और विकास को भी बढ़ावा देगा।
  3. यह सूची स्टार्ट-अपके साथ-साथ सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए भी एक उत्कृष्ट अवसर प्रदान करती है जिसे इस पहल से जबरदस्त बढ़ावा मिलेगा।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘कर अधिकारियों’ द्वारा भी एक ‘नकारात्मक सूची’ बनाई गई है? (हालांकि इस विषय इस आर्टिकल से सीधे संबंधित नहीं है, किंतु इस बारे में जानना महत्वपूर्ण हो सकता है)।

वैश्विक सैन्य व्यय के रुझानों पर जारी रिपोर्ट के बारे में जानिए।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘नकारात्मक आयात सूची’ नीति कब शुरू की गई थी?
  2. विशेषताएं
  3. अपवाद
  4. कार्यान्वयन मंत्रालय

मेंस लिंक:

‘नकारात्मक आयात सूची’ नीति की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

 

 

विषय: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिका।

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम में संशोधन


(Amendments to the Foreign Contribution (Regulation) Act)

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ 2010 (Foreign Contribution (Regulation) Act 2010) में किए गए 2020 के संशोधनों को बरकरार रखा है। इन संशोधनों के माध्यम से भारत में कार्यरत संस्थाओं को प्राप्त विदेशी अंशदान के उपयोग करने पर प्रतिबंध लगाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्णय, विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन अधिनियम 2020 (नोएल हार्पर और अन्य बनाम भारत संघ और जुड़े मामलों) को चुनौती देने वाली जनहित याचिकाओं के जवाब में सुनाया है। 

याचिकाकर्ताओं द्वारा मुख्य रूप से निम्नलिखित संशोधनों के लिए चुनौती दी गयी थी:

  1. अधिनियम की धारा 7 में संशोधन – इसके तहत विदेशी अंशदान प्राप्तकर्ता को, प्राप्त अनुदान को किसी अन्य संस्था को हस्तांतरित करने से प्रतिबंधित किया किया गया है।
  2. अधिनियम की धारा 8(1)(b) में संशोधन–  इसके तहत गैर-सरकारी संगठनों के प्रशासनिक व्यय के लिए विदेशी अंशदान के उपयोग की सीमा को 50% से घटाकर 20% किया गया है। 
  3. अधिनियम की धारा 11(2) के प्रावधान में संशोधन– इसमें कहा गया है कि केंद्र सरकार किसी संगठन को संदिग्ध उल्लंघनों की जांच तक ‘विदेशी योगदान’ का उपयोग नहीं करने का निर्देश दे सकती है।
  4. अधिनियम में नई जोड़ी गई धारा 12 और धारा 17-  जिसमें कहा गया है कि विदेशी योगदान ‘अनुसूचित बैंक की निर्दिष्ट शाखा’ में बनाए गए FCRA खाते में जमा किया जाना चाहिए। बाद में इसके लिए भारतीय स्टेट बैंक की नई दिल्ली शाखा को अधिसूचित किया गया था। 
  5. नई जोड़ी गई धारा 12A – इसके तहत, किसी संस्था के अनुमोदन के लिए केंद्र सरकार को संगठन के प्रमुख पदाधिकारियों के आधार नंबर प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है।

केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया:

याचिकाकर्ताओं ने FCRA अधिनियम में संशोधनों को मनमाना और कठोर बताते हुए चुनौती दी है, और कहा है कि इन संशोधनों के माध्यम से गैर सरकारी संगठनों के कामकाज को बेहद कठिन बना दिया गया है। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि गैर-सरकारी संगठनों द्वारा कदाचार और धन के डायवर्जन को रोकने के लिए कानून में बदलाव आवश्यक थे।

FCRA के माध्यम से NGO के वित्तीयन पर नियंत्रण:

‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ (Foreign Contribution (Regulation) Act – FCRA) के माध्यम से विदेशों से प्राप्त होने वाले अनुदान को नियमित नियंत्रित किया जाता है, तथा यह अधिनियम सुनिश्चित करता है, कि इस तरह के अनुदान से देश की आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। 

  • इस अधिनियम को पहली बार वर्ष 1976 में अधिनियमित किया गया था, इसके बाद वर्ष 2010 और फिर 2020 में इसे संशोधित किया जा चुका है।
  • विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 (Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010) की धारा 5 में, केंद्र सरकार के लिए किसी संगठन को राजनीतिक प्रकृति के रूप में घोषित करने और विदेशी स्रोतों से प्राप्त होने वाले धन तक पहुंच को रोकने के लिए “अनियंत्रित और बेलगाम शक्तियां” दी गयी हैं।
  • FCRA का कार्यान्वयन गृह मंत्रालय द्वारा किया जाता है।

प्रयोज्यता:

  • ‘विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ के प्रावधान, संपूर्ण भारतीय सीमा पर, देश से बाहर रहने वाले भारतीय नागरिकों तथा भारत में पंजीकृत या निगमित किंतु देश से बाहर कार्यरत कंपनियों अथवा उनकी शाखाओं पर लागू होते हैं।
  • इस अधिनियम के अधिकार-क्षेत्र में आने वाली संस्थाओं में, व्यक्ति, अविभाजित हिंदू परिवार, संस्था या पंजीकृत कंपनी आदि शामिल होती हैं।

FCRA पंजीकरण की बैधता:

  • एक बार अनुमोदन होने के पश्चात्, FCRA पंजीकरण पांच साल के लिए वैध होता है। सभी गैर सरकारी संगठनों के लिए ‘पंजीकरण समाप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर, इसका नवीनीकरण करने हेतु आवेदन करना होता है।
  • नवीनीकरण हेतु आवेदन करने में विफल रहने पर, NGO का पंजीकरण रद्द समझा जाता है, और इसके बाद गृह मंत्रालय की अनुमति के बगैर ‘एनजीओ’ को विदेशी धन प्राप्त करने अथवा अपने मौजूदा धन का उपयोग करने का अधिकार नहीं होता है।

अधिनियम के तहत ‘पूर्व संदर्भ श्रेणी’:

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम’ के तहत ‘पूर्व संदर्भ श्रेणी’ (Prior Reference Category) का तात्पर्य है कि, किसी गैर सरकारी संगठन को दान करने के लिए, विदेशी दाता को गृह मंत्रालय से पूर्व अनुमति लेनी आवश्यक है।

FCRA के तहत ‘विदेशी अंशदान’:

  • एफसीआरए के तहत “विदेशी अंशदान” (Foreign contribution) में ‘किसी विदेशी स्रोत द्वारा – व्यक्तिगत उपयोग के लिए उपहार के रूप में दी जाने वाली वस्तुओं को छोड़कर – किए जाने वाले किसी भी वस्तु के दान, अंतरण अथवा हस्तांतरण’ को शामिल किया जाता है। 
  • इसके अलावा, इस प्रकार से दान की जाने वस्तु का भारतीय बाजार में मूल्य, अनुदान के समय समय-समय पर केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट किए जाने वाली कीमत या राशि से अधिक नहीं होना चाहिए।

अपवाद:

  • अधिनियम के दायरे में, किसी भी मुद्रा या प्रतिभूति को शामिल किया जा सकता है। हालांकि किसी भी व्यक्ति द्वारा भारत की सीमा में या इसके बाहर अपने व्यवसाय, कारोबार अथवा वाणिज्य की सामान्य गतिविधियों के तहत प्रदान की जाने वाली वस्तुओं या सेवाओं के बदले प्राप्त किसी भी धन-राशि को FCRA में शामिल नहीं किया गया है।
  • अधिनियम के तहत, अनिवासी भारतीयों (NRIs) द्वारा किए गए दान को “विदेशी अंशदान” नहीं माना जाता है, हालांकि विदेशी नागरिकता हासिल कर चुके भारतीय मूल के किसी व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले अनुदान को “विदेशी अंशदान” के रूप में माना जाता है।

विदेशी अनुदान ग्रहण करने हेतु निम्नलिखित व्यक्ति अथवा संगठन पात्र नहीं होते है:

  1. चुनावी उम्मीदवार
  2. किसी भी विधायिका (सांसद और विधायक) के सदस्य
  3. राजनीतिक दल या पदाधिकारी
  4. राजनीतिक प्रकृति का संगठन
  5. पंजीकृत समाचार पत्र के संवाददाता, स्तंभकार, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक।
  6. न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी, तथा सरकार के स्वामित्व वाले किसी भी निगम अथवा किसी अन्य निकाय के कर्मचारी।
  7. किसी इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ऑडियो न्यूज, ऑडियो विजुअल न्यूज या करंट अफेयर्स प्रोग्राम के उत्पादन या प्रसारण में संलग्न एसोसिएशन अथवा कंपनी।
  8. केंद्र सरकार द्वारा विशेष रूप से निषिद्ध कोई अन्य व्यक्ति अथवा संगठन।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. FCRA के बारे में
  2. गैर सरकारी संगठनों का विदेशी वित्त पोषण के बारे में
  3. FCRA की प्रयोज्यता
  4. विदेशी अंशदान प्राप्त करने से प्रतिबंधित व्यक्ति तथा संस्थाएं
  5. FCRA संशोधन
  6. FCRA के तहत विदेशी अंशदान की परिभाषा
  7. पूर्व संदर्भ श्रेणी

मेंस लिंक:

विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के प्रमुख प्रावधानों और ऐसे कानून की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

इंडियन टेंट टर्टल

  • ‘इंडियन टेंट टर्टल’ (Indian tent turtle) को वन्य जीवन (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची -1 में सूचीबद्ध किया गया है और इस प्रकार, इस प्रजाति को उच्चतम स्तर की सुरक्षा प्रदान की गयी है।
  • ‘इंडियन टेंट टर्टल’ नर आकार में मादा से छोटे होते हैं और उनकी पूंछ लंबी और मोटी होती है।
  • कछुए की यह प्रजाति भारत, नेपाल और बांग्लादेश के मूल निवासी है, और यह भारतीय छत वाले कछुए (Indian Roofed Turtle) के समान है। 
  • IUCN: कम जोखिम/ संकटमुक्त (Least Concern)

हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने संसद में कहा है, नर्मदा नदी में अवैध खनन के कारण ‘इंडियन टेंट टर्टल’ के विलुप्त होने के कगार पर पहुचने के संकेत देने वाली कोई रिपोर्ट नहीं है।

 

 

 

बैजयंत पांडा समिति

‘बैजयंत पांडा समिति’ राष्ट्रीय कैडेट कोर (NCC) की व्यापक समीक्षा के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा गठित एक उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति है।

Current Affairs


समिति के उद्देश्य:

  1. यह समिति एनसीसी कैडेटों को राष्ट्र निर्माण की दिशा में अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने के लिए सशक्त बनाने के उपायों का सुझाव देगी।
  2. संगठन की बेहतरी के लिए एनसीसी के पूर्व छात्रों की लाभदायक भागीदारी के तरीकों का प्रस्तावित करना।
  3. एनसीसी पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए इसी तरह के अंतर्राष्‍ट्रीय युवा संगठनों की सर्वोत्तम प्रथाओं की सिफारिश करना।

 

 

 

कुथिरन सुरंग

यह भारत में केरल राज्य के त्रिशूर जिले के ‘कुथिरन’ (Kuthiran) में निर्मित की जाने वाली जुड़वां-ट्यूब सुरंग है।

  • यह राष्ट्रीय राजमार्ग 544 पर स्थित है, जिसका स्वामित्व और संचालन ‘भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण’ के अधीन है।
  • ‘सड़क परिवहन’ के लिए यह केरल की पहली सुरंग है और दक्षिण भारत की सबसे लंबी 6-लेन सड़क सुरंग है।

1.6 किमी लंबी सुरंग को ‘पीची- वजहानी वन्यजीव अभयारण्य’ (Peechi- Vazahani wildlife sanctuary) से होकर गुजरने के लिए डिजाइन किया गया है।