विषयसूची
सामान्य अध्ययन-II
- सामूहिक संहार के आयुध संशोधन विधेयक, 2022
- बांध सुरक्षा अधिनियम
- स्टैंड अप इंडिया योजना
- चुनावी बांड
- केंद्रीय तिब्बती राहत समिति
- मानवाधिकार परिषद
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
- एशिया का सबसे बड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
- विश्व स्वास्थ्य दिवस
- अश्विनी वैष्णव समिति
- अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी
सामान्य अध्ययन–II
विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
सामूहिक संहार के आयुध संशोधन विधेयक, 2022
(The Weapons of Mass Destruction Amendment Bill, 2022)
संदर्भ:
हाल ही में ‘सामूहिक संहार के आयुध और उनकी परिदान प्रणाली (विधिविरूद्ध क्रियाकलापों का प्रतिषेध) संशोधन विधेयक’, 2022 लोकसभा में पारित किया गया है।
- 2005 में पारित ‘सामूहिक संहार के आयुध और उनकी परिदान प्रणाली (विधिविरूद्ध क्रियाकलापों का प्रतिषेध) अधिनियम’ (The Weapons of Mass Destruction and their Delivery Systems (Prohibition of Unlawful Activities) Act) के अंतर्गत केवल सामूहिक संहार के हथियारों के निर्माण पर प्रतिबंध लगाया गया था।
- संशोधन विधेयक का उद्देश्य, इस अधिनियम के दायरे का विस्तार करना है।
संशोधन की आवश्यकता:
- सामूहिक संहार के आयुधों / हथियारों (Weapons of Mass Destruction – WMDs) को समर्थन देने वाली गतिविधियों के वित्तीय पहलू पर ध्यान केंद्रित करना। देश में, सामूहिक संहार के हथियारों के लिए वित्तपोषण पर प्रतिबंध लगाने के प्रावधान की तत्काल आवश्यकता थी। मौजूदा कानून, इस पहलू पर खामोश था।
- सरकार को आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए और अधिक अधिकार प्रदान करना। वर्तमान विधेयक, सरकार को सामूहिक विनाश के हथियारों और उनकी वितरण प्रणालियों के संबंध में किसी भी निषिद्ध गतिविधि के लिए धन, वित्तीय संपत्ति या आर्थिक संसाधन उपलब्ध कराने पर रोक लगाने के लिए केंद्र सरकार को सशक्त बनाता है।
विधेयक के प्रमुख बिंदु:
- कुछ गतिविधियों के वित्तपोषण पर प्रतिबंध: यह विधेयक व्यक्तियों को सामूहिक विनाश के हथियारों और उनकी वितरण प्रणालियों से संबंधित किसी भी निषिद्ध गतिविधि को वित्तपोषित करने पर प्रतिबंध लगाता है।
- विधेयक में, केंद्र सरकार को किसी व्यक्ति के धन, वित्तीय संपत्ति, या आर्थिक संसाधनों (चाहे उसके स्वामित्व वाले, उसके द्वारा धारित यानी हेल्ड, या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित हों) को फ्रीज, जब्त या कुर्क करने की शक्ति प्रदान की गयी है।
- विधेयक में, अगर कोई व्यक्ति प्रतिबंधित गतिविधियों में संलग्न है, तो किसी दूसरे व्यक्ति द्वारा उस व्यक्ति को वित्त या संबंधित सेवाएं उपलब्ध कराने पर भी बिल रोक लगाने का प्रावधान किया गया है।
‘सामूहिक संहार के आयुध / हथियार’ क्या हैं?
सामूहिक संहार के आयुध / हथियार (Weapons of Mass Destruction – WMDs), व्यापक पैमाने पर और इतने अंधाधुंध तरीके से मौत और विनाश करने की क्षमता वाले हथियार होते हैं, कि एक दुश्मन शक्ति के हाथों में इसकी मौजूदगी को एक गंभीर खतरा माना जा सकता है।
- भारत में ‘सामूहिक संहार के आयुध (WMDs) अधिनियम, 2005 में ‘सामूहिक विनाश के हथियारों को जैविक, रासायनिक या परमाणु हथियारों’ के रूप में परिभाषित किया गया है।
- संयुक्त राज्य अमेरिका में, WMD के अंतर्गत परमाणु, रेडियोलॉजिकल, रासायनिक, जैविक, या बड़ी संख्या में लोगों को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य वाले अन्य उपकरण शामिल है।
WMD से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर भारत की स्थिति:
भारत द्वारा ‘सामूहिक संहार के आयुधों (WMDs) से संबंधित निम्नलिखित दोनों संधियों पर हस्ताक्षर और पुष्टि की गयी है:
- जैविक हथियार अभिसमय, 1972 (Biological Weapons Convention, 1972)
- रासायनिक हथियार अभिसमय, 1992 (Chemical Weapons Convention, 1992)
हालांकि, भारत ने परमाणु हथियारों के उपयोग और प्रसार को नियंत्रित करने वाली संधियों (जिसमें NPT और CTBT शामिल हैं) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप ‘जिनेवा प्रोटोकॉल, 1925’ के बारे में जानते हैं? इस प्रोटोकॉल के तहत, रासायनिक और जैविक हथियारों के उपयोग पर प्रतिबंध लगा गया है।
प्रीलिम्स लिंक:
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद
- वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (Financial Action Task Force)
- 1968 की परमाणु अप्रसार संधि
- 1972 का जैविक हथियार अभिसमय
- 1993 का रासायनिक हथियार अभिसमय
- ‘सामूहिक विनाश के हथियार’ क्या हैं?
मेंस लिंक:
सामूहिक संहार के आयुध और उनकी परिदान प्रणाली (विधिविरूद्ध क्रियाकलापों का प्रतिषेध) संशोधन विधेयक, 2022 के महत्व के बारे में चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
बांध सुरक्षा अधिनियम
(Dam Safety Act)
संदर्भ:
सुप्रीम कोर्ट ने ‘बांध सुरक्षा अधिनियम’, 2021 (Dam Safety Act of 2021) में मुल्लापेरियार बांध को लेकर तमिलनाडु और केरल के बीच ‘लगातार चलने वाली’ / “बारहमासी” कानूनी लड़ाई को समाप्त करने के लिए रामबाण सामाधान खोजा है।
संबंधित प्रकरण:
केरल और तमिलनाडु द्वारा ‘मुल्लापेरियार बांध’ (Mullaperiyar dam) की सुरक्षा, संचालन और रखरखाव को लेकर एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाए जाते रहते हैं।
- केरल का दावा है, कि 126 साल पुराना ‘मुल्लापेरियार बांध’ असुरक्षित है, और इसकी देखरेख ख़राब तरह से की जा रही है, जिससे नीचे की ओर रहने वाले हजारों लोगों के लिए खतरा है। दूसरी ओर तमिलनाडु इन सब आरोपों से इनकार करता है।
- केरल द्वारा मौजूदा बांध की जगह एक नए बांध की मांग की जा रही है, जबकि तमिलनाडु, जो बाँध के जलाशय का संचालन और रखरखाव करता है, का तर्क है कि बांध अच्छी तरह से संरक्षित है और इतना मजबूत है कि जल स्तर की ऊंचाई 152 फीट तक भी बढ़ायी जा सकती है।
‘बांध सुरक्षा अधिनियम’ और ‘मुल्लापेरियार बांध’ के बीच संबंध:
अधिनियम के अनुसार, ‘राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण’ (National Dam Safety Authority – NDSA) एक राज्य में स्थित और दूसरे राज्य द्वारा उपयोग किए जाने वाले बांध के लिए ‘राज्य बांध सुरक्षा संगठन’ (State Dam Safety Organisation) की भूमिका निभाएगा। इसलिए मुल्लापेरियार बांध NDSA के अधिकार-क्षेत्र में आता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बात की पूरी संभावना है कि केंद्र सरकार अदालत में ‘राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण’ (NDSA) द्वारा ‘पर्यवेक्षी समिति’ के कार्यों को अपने में समाहित करने का संकेत दिया जा सकता है।
‘मुल्लापेरियार विवाद’ के बारे अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।
बांध सुरक्षा अधिनियम के प्रमुख बिंदु:
- ‘बांध सुरक्षा अधिनियम’ (Dam Safety Act), देश में सभी निर्दिष्ट बांधों की निगरानी, निरीक्षण, परिचालन और रखरखाव संबंधी प्रावधान करता है।
- यह अधिनियम ‘बांध सुरक्षा पर एक राष्ट्रीय समिति’ (NCDS) के गठन का प्रावधान करता है। यह समिति बांध सुरक्षा नीतियों को विकसित करेगी और इस उद्देश्य के लिए आवश्यक नियमों की सिफारिश करेगी।
- अधिनियम, देश में बांध सुरक्षा के लिए नीति, दिशानिर्देशों और मानकों को लागू करने के लिए कार्यों का निर्वहन करने हेतु एक नियामक संस्था के तौर पर ‘राष्ट्रीय बांध सुरक्षा प्राधिकरण’ (NDSA) की स्थापना का प्रावधान करता है।
- ‘बांध सुरक्षा अधिनियम’ राज्य सरकार द्वारा ‘बांध सुरक्षा पर एक राज्य समिति’ के गठन का प्रावधान करता है।
महत्व:
- ‘बांध सुरक्षा अधिनियम’, भारत के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक समान बांध सुरक्षा प्रक्रियाओं को अपनाने में मदद करेगा, जो बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगी और ऐसे बांधों से होने वाले लाभों की सुरक्षा हो सकेगी। इससे मानव जीवन, पशुधन और संपत्ति की सुरक्षा में भी मदद मिलेगी।
- अधिनियम में, बांधों के नियमित निरीक्षण, आपातकालीन कार्य योजना, व्यापक बांध सुरक्षा समीक्षा, बांध सुरक्षा के लिए पर्याप्त मरम्मत और रखरखाव निधि, उपकरण और सुरक्षा नियमावली सहित बांध सुरक्षा से संबंधित सभी मुद्दों पर प्रावधान किए गए हैं।
- अधिनियम में ‘बांध सुरक्षा’ की जिम्मेदारी बांध के मालिक पर निर्धारित की गयी है, और कुछ कृत्यों के करने पर तथा किसी लापरवाही के लिए दंडात्मक प्रावधानों का प्रावधान भी किया गया है।
आवश्यकता:
- पिछले पचास वर्षों में, भारत में बांधों और संबंधित बुनियादी ढांचे में काफी निवेश किया गया है, और वर्तमान में भारत, बड़े बांधों की संख्या में संयुक्त राज्य अमेरिका और चीन के बाद तीसरे स्थान पर है। मौजूदा समय में, देश में 5254 बड़े बांध कार्यशील हैं और 447 अन्य बड़े बांध निर्माणाधीन हैं।
- इसके अलावा, देश में हजारों मध्यम और छोटे बांध मौजूद हैं।
- जहां बांधों ने भारत में तेजी से और सतत कृषि विकास और विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं बांध सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक समान कानून और प्रशासनिक ढांचे की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही है।
- केंद्रीय जल आयोग द्वारा ‘राष्ट्रीय बांध सुरक्षा समिति’ (NCDS), केंद्रीय बांध सुरक्षा संगठन (CDSO) और राज्य बांध सुरक्षा संगठन (SDSO) के माध्यम से इस दिशा में लगातार प्रयास किया जा रहा है, लेकिन इन संगठनों के पास कोई वैधानिक शक्ति नहीं है, और ये केवल सलाहकार प्रकृति के हैं।
- भारत में लगभग 75 प्रतिशत बड़े बांध 25 वर्ष से अधिक पुराने हैं और लगभग 164 बांध 100 वर्ष से अधिक पुराने हो चुके हैं, ऐसे में यह चिंता का विषय है।
- ख़राब रखरखाव वाले, असुरक्षित बांध मानव जीवन, वनस्पतियों और जीवों, सार्वजनिक और निजी संपत्तियों और पर्यावरण के लिए खतरा हो सकते हैं।
- अतीत में, भारत में 42 बांध विफल हो चुके हैं।
संबंधित चिंताएं:
- इस अधिनियम में बांधो की ‘परिचालन सुरक्षा’ की तुलना में ‘संरचनात्मक सुरक्षा’ पर बहुत अधिक ध्यान दिया गया है।
- बांधों से प्रभावित लोगों को अपर्याप्त मुआवजा दिया जाता है।
- विधेयक में हितधारकों की सटीक परिभाषा दिए जाने के साथ-साथ एक ‘स्वतंत्र नियामक’ का प्रावधान किए जाने की आवश्यकता है।
- कई राज्यों का कहना है कि यह क़ानून, राज्यों के अपने बांधों के प्रबंधन के संबंध में इनकी संप्रभुता का अतिक्रमण करता है, और संविधान में निहित संघवाद के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
- ये राज्य इसे सुरक्षा-संबंधी चिंताओं की आड़ में केंद्रीय सत्ता को मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखते हैं।
प्रीलिम्स लिंक:
- बांध सुरक्षा अधिनियम।
- बांध सुरक्षा प्राधिकरण।
- बांध सुरक्षा अधिनियम के प्रमुख बिंदु।
- भारत में बांध सुरक्षा।
- ड्रिप परियोजना।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।
उतिष्ठ भारत (स्टैंड अप इंडिया) योजना
(Stand Up India Scheme)
5 अप्रैल 2016 को, भारत सरकार द्वारा उतिष्ठ भारत (स्टैंड अप इंडिया) योजना (Stand Up India Scheme) शुरू की गई थी। 5 अप्रैल 2022 को इस योजना ने छह साल पूरे किए हैं।
इस योजना की उपलब्धियां:
- इस योजना के तहत 1.33 लाख से अधिक नए रोजगार सृजनकर्ताओं और उद्यमियों को सहायता प्रदान की गई है।
- पिछले छह वर्षों में इस योजना के तहत 1 लाख से अधिक महिला उद्यमी लाभान्वित हुई हैं।
- इस योजना के तहत रु. सरकार द्वारा 21 मार्च 2022 तक कुल 1,33,995 खातों में 30,160 करोड़ रुपये अनुमोदित किए गए हैं।
- कुल अनुमोदित खातों में से, अनुसूचित जनजाति के ऋणकर्ताओं के 6,435 खातों में 1373.71 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे, तथा अनुसूचित जाति के ऋणकर्ताओं के 19,310 खातों में 3976.84 करोड़ रुपये मंजूर किए गए थे।
- खाता रखने वाली 1,08,250 महिला उद्यमियों को रु. 24809.89 करोड़ स्वीकृत किए गए हैं।
‘उतिष्ठ भारत’ योजना / ‘स्टैंड अप इंडिया’ स्कीम के बारे में:
- आर्थिक सशक्तिकरण के जमीनी स्तर पर उद्यमशीलता को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन हेतु 5 अप्रैल 2016 को ‘उतिष्ठ भारत’ योजना की शुरुआत की गई थी।
- इस योजना का लक्ष्य, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला उद्यमियों जैसे सीमित सेवा लाभ प्राप्त करने वाले लोगों तक संस्थागत ऋण संरचनाओं का लाभ प्रदान करना है।
- इसके तहत, SIDBI और NABARD के कार्यालयों को ‘स्टैंड-अप कनेक्ट सेंटर’ (SUCC) के रूप में अभिहित किया जाएगा।
- योजना के तहत ऋण केवल ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के लिए उपलब्ध कराया जाता हैं।
योजना का उद्देश्य:
- इसका उद्देश्य, प्रत्येक बैंक शाखा द्वारा कम से कम एक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला उद्यमी को विनिर्माण, सेवा या व्यापार क्षेत्र में नई (ग्रीनफील्ड) परियोजना की स्थापना करने हेतु अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) से 10 लाख से 1 करोड़ रुपये के बीच बैंक ऋण प्रदान करना है।
योजना के अंतर्गत पात्रता:
- 18 वर्ष से अधिक आयु के अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति और / महिला उद्यमी।
- योजना के अंतर्गत ऋण सहायता केवल ग्रीनफील्ड परियोजना के लिए प्रदान की जाएगी।
- उधारकर्ता के लिए किसी भी बैंक अथवा वित्तीय संस्थान में ‘डिफ़ॉल्ट’ (बकाया) नहीं होना चाहिए।
- गैर-निजी उद्यमों के मामले में, कम से कम 51% हिस्सेदारी और नियंत्रण, अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति और / महिला उद्यमी के पास होना चाहिए।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप ‘स्टार्टअप इंडिया सीड फंड योजना’ (Startup India Seed Fund Scheme) के बारे में जानते हैं?
प्रीलिम्स लिंक:
- योजना के प्रमुख बिंदु।
- पात्रता।
- लाभ।
मेंस लिंक:
उतिष्ठ भारत (स्टैंड अप इंडिया) योजना के महत्व पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएँ, सीमाएँ और संभावनाएँ; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।
चुनावी बांड
(Electoral Bonds)
संदर्भ:
भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण ने ‘चुनावी बांड योजना’, 2018 (Electoral Bond Scheme, 2018) को चुनौती देने वाली एक लंबित याचिका पर याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई किए जाने का आश्वासन दिया है।
संबंधित प्रकरण:
दो गैर-सरकारी संगठनों – कॉमन कॉज और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) – ने ‘चुनावी बांड योजना’ को चुनौती देते हुए इस पर “लोकतंत्र को विकृत करने” का आरोप लगाया है। मुख्य न्यायाधीश ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए कोई तारीख निर्दिष्ट नहीं की है।
चुनावी बांड्स / ‘इलेक्टोरल बांड’ क्या होते हैं?
- चुनावी बॉन्ड / ‘इलेक्टोरल बांड’ (Electoral Bond), राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए एक वित्तीय साधन है।
- इन बांड्स के लिए, 1,000 रुपए, 10,000 रुपए, 1 लाख रुपए, 10 लाख रुपए और 1 करोड़ रुपए के गुणकों में जारी किया जाता है, और इसके लिए कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की गयी है।
- इन बॉन्डों को जारी करने और भुनाने के लिए ‘भारतीय स्टेट बैंक’ को अधिकृत किया गया है। यह बांड जारी होने की तारीख से पंद्रह दिनों की अवधि के लिए वैध होते हैं।
- ये बॉन्ड किसी पंजीकृत राजनीतिक दल के निर्दिष्ट खाते में प्रतिदेय होते हैं।
- ये बांड, केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर महीनों में प्रत्येक दस दिनों की अवधि में किसी भी व्यक्ति द्वारा खरीदे जा सकते है, बशर्ते उसे भारत का नागरिक होना चाहिए अथवा भारत में निगमित या स्थित होना चाहिए ।
- कोई व्यक्ति, अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से इन बांड्स को खरीद सकता है।
- बांड्स पर दान देने वाले के नाम का उल्लेख नहीं होता है।
योजना से जुड़े विवाद:
‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ योजना, पारंपरिक रूप से ‘अंडर-द-टेबल’ चंदा देने के खिलाफ एक प्रतिरोध के रूप में कार्य करती है, क्योंकि इसमें लेनदेन, चेक और डिजिटल रूप से किया जाता है। हालांकि, योजना के कई प्रमुख प्रावधान इसे अत्यधिक विवादास्पद बनाते हैं।
- अनामिकता (Anonymity): योजना के तहत, अनुदान / चंदा देने वाला (जो व्यक्ति या कॉर्पोरेट कोई भी हो सकता है) अपनी जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं होता है, तथा राजनीतिक दल भी यह बताने के लिए बाध्य है कि चंदा किस व्यक्ति या निकाय से आया है।
- असममित रूप से अपारदर्शी: चूंकि बांड भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के माध्यम से खरीदे जाते हैं, इसलिए सरकार हमेशा यह जानने की स्थिति में होती है कि दाता कौन है।
- ब्लैकमनी का मार्ग: कॉरपोरेट डोनेशन पर 7.5% की अधिकतम सीमा को खत्म करना, प्रॉफिट एंड लॉस स्टेटमेंट्स में राजनीतिक अनुदान को प्रकट करने की आवश्यकता को खत्म करना आदि।
प्रीलिम्स लिंक:
- चुनावी बांड क्या हैं?
- पात्रता
- बांड का मूल्यवर्ग
- विशेषताएं
- ये बांड कौन जारी कर सकता है?
मेंस लिंक:
पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण सुनिश्चित करने में चुनावी बांड की प्रभावशीलता की आलोचनात्मक रूप से परीक्षण कीजिए तथा इसके लिए विकल्प सुझाएँ?
स्रोत: द हिंदू।
विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।
केंद्रीय तिब्बती राहत समिति
(Central Tibetan Relief Committee – CTRC)
संदर्भ:
हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा दलाई लामा की ‘केंद्रीय तिब्बती राहत समिति’ (Central Tibetan Relief Committee – CTRC) को और पांच वर्षों के लिए – वित्तीय वर्ष 2025-26 तक – ₹40 करोड़ अनुदान सहायता प्रदान करने की योजना को बढ़ा दिया गया है।
योजना के प्रमुख बिंदु:
- केंद्रीय तिब्बती राहत समिति (CTRC) को सहायता अनुदान योजना को 2015 में लॉन्च किया गया।
- यह विभिन्न राज्यों में 36 तिब्बती बस्ती कार्यालयों के प्रशासनिक और सामाजिक कल्याण गतिविधियों के खर्चों को पूरा करने के लिए ‘केंद्रीय तिब्बती राहत समिति’ को 40 करोड़ रुपये की सहायता अनुदान प्रदान करने की एक योजना है।
भारत में तिब्बती:
- एक लाख से अधिक तिब्बती शरणार्थी भारत में बसे हुए हैं।
- कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और जम्मू-कश्मीर में तिब्बती शरणार्थी बड़ी संख्या में निवास करते हैं।
- 1959 में तिब्बत से दलाई लामा के पलायन के बाद, तिब्बती शरणार्थियों का भारत में आना शुरू हो गया था।
- सरकार ने उन्हें शरण देने के साथ-साथ अस्थायी बंदोबस्त के लिए सहायता देने का फैसला किया गया।
विदेशों में तिब्बती:
पूरे भारत में 1 लाख से अधिक तिब्बती बसे हुए हैं, जबकि शेष तिब्बती संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, कनाडा, कोस्टा रिका, फ्रांस, मैक्सिको, मंगोलिया, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, स्विटजरलैंड और कई अन्य देशों में बसे हैं।
क्या आप तिब्बती निर्वासित-संसद (Tibetan Parliament-in-Exile – TPiE) के बारे में जानते हैं?
तिब्बती निर्वासित-संसद के प्रमुख ‘स्पीकर’ और ‘डिप्टी स्पीकर’ होते हैं।
16वीं TPiE में 45 सदस्य हैं: जिनमे निम्नलिखित प्रतिनिधि शामिल हैं-
- तिब्बती के प्रत्येक पारंपरिक प्रांत, यू-त्सांग (U-Tsang), धोतो (Dhotoe) और धोमे (Dhomey) के दस प्रतिनिधि;
- पूर्व-बौद्ध बॉन धर्म और तिब्बती बौद्ध धर्म के चार संप्रदायों में से प्रत्येक के दो प्रतिनिधि;
- उत्तरी अमेरिका और यूरोप, प्रत्येक में से, तिब्बती समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले दो प्रतिनिधि;
- आस्ट्रेलिया और एशिया से (भारत, नेपाल और भूटान को छोड़कर) एक प्रतिनिधि।
तिब्बती संविधान:
तिब्बती लोगों का केंद्रीय प्रशासन, तिब्बती सरकार के संविधान के आधार पर कार्य करता है जिसे ‘निर्वासित तिब्बतियों का चार्टर‘ (The Charter of the Tibetans in Exile) कहा जाता है।
- वर्ष 1991 में, दलाई लामा द्वारा गठित संविधान पुनर्निर्माण समिति द्वारा निर्वासित तिब्बतियों के लिए चार्टर तैयार किया गया था।
- 28 जून, 1991 को इस संविधान के लिए दलाई लामा द्वारा मंजूरी दी गई।
वोट देने का अधिकार
केवल भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर रहने वाले तिब्बती अपने वर्तमान भौगोलिक स्थान के आधार पर अपने सांसदों का चुनाव करेंगे। वे सांसदों के अलावा, अपनी पसंद का एक अध्यक्ष भी चुन सकते हैं।
चुनाव प्रक्रिया:
तिब्बती निर्वासित-संसद के लिए मतदान दो दौरों में किया जाएगा।
- प्रारंभिक दौर में, कोई आधिकारिक उम्मीदवार नहीं होगा, अर्थात मतदाता अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति को चुन सकता है, जो संभावित उम्मीदवारों में से एक होगा और मतदाताओं के बीच प्रचार करेगा।
- पहले दौर में 60 प्रतिशत मत हासिल करने वाले शीर्ष दो उम्मीदवारों को 11 अप्रैल को होने वाले दूसरे दौर के चुनावों के लिए आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया जाएगा।
‘कशाग’ (Kashag) क्या होता है?
कशाग (मंत्रिमंडल) केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का सर्वोच्च कार्यकारी कार्यालय होता है और इसमें सात सदस्य होते हैं।
इसका नेतृत्व सिक्योंग (Sikyong) अर्थात राजनीतिक नेता, द्वारा किया जाता है। सिक्योंग को सीधे निर्वासित तिब्बती आबादी द्वारा चुना जाता है।
- बाद में, सिक्योंग द्वारा सात कलोन (Kalons) अर्थात मंत्रियों को नामित किया जाता है और इसके लिए संसद की मंजूरी प्राप्त की जाती है।
- कशाग का कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है।
तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) के लिए विश्व के देशों द्वारा आधिकारिक मान्यता:
तिब्बती निर्वासित-संसद (TPiE) के लिए भारत सहित विश्व के किसी भी देश देश द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है।
- हालांकि, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय देशों सहित कई अन्य देश विभिन्न मंचों के माध्यम से सीधे सिक्योंग और अन्य तिब्बती नेताओं के साथ संवाद किया जाता है।
- TPiE का दावा है कि लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया से तिब्बती मामलों का प्रबंधन करने और विश्व भर में तिब्बती मुद्दों को उठाने में मदद मिलती है।
- वर्तमान सिक्योंग, लोबसांग सांगे, मई 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथग्रहण समारोह में शामिल होने वाले अतिथियों में सम्मिलित थे और संभवतः पहले तिब्बती प्रमुख थे।
मौजूदा सिक्योंग, लोबसंग सांगे, संभवतः पहली बार मई 2014 में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने वाले मेहमानों में शामिल थे।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।
भारत रूसी कार्रवाइयों की जांच के लिए ‘मानवाधिकार परिषद’ में मतदान से अलग
संदर्भ:
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा हाल ही में आयोजित एक बैठक के दौरान रूस को ‘मानवाधिकार परिषद’ (UN Human Rights Council – UNHRC) से निलंबित कर दिया गया है।
- निन्यानवे सदस्यों ने प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया जबकि 24 ने विरोध में मतदान किया और 58 सदस्यों ने भाग नहीं लिया।
- भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा रूस को निलंबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के कराए गए मतदान में भी भाग नहीं लिया था। इस प्रस्ताव में अमेरिका ने आरोप लगाया गया था कि रूसी सैनिकों ने यूक्रेन के शहरों से पीछे हटने के दौरान नागरिकों को प्रताड़ित किया और नागरिकों को मार डाला।
यूक्रेन मामले पर भारत की स्थिति:
‘मानवाधिकार परिषद’ में भारत की स्थिति, 24 फरवरी को यूक्रेन में रूसी सैन्य अभियानों की शुरुआत के बाद से संयुक्त राष्ट्र और बहुपक्षीय संगठनों में होने वाले मतदानों से अनुपस्थित रहने की श्रंखला में कड़ी जोड़ती है। जबकि यूक्रेन में जारी रूसी सैन्य हमलों की बढ़ोत्तरी को देखते हुए, मास्को की आलोचना करने वाले प्रस्तावों के पक्ष में अधिक से अधिक देशों द्वारा मतदान किया जा रहा है।
UNHRC के बारे में:
‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद‘ (UNHRC) का पुनर्गठन वर्ष 2006 में इसकी पूर्ववर्ती संस्था, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UN Commission on Human Rights) के प्रति ‘विश्वसनीयता के अभाव’ को दूर करने में सहायता करने हेतु किया गया था।
इसका मुख्यालय जिनेवा, स्विट्जरलैंड में स्थित है।
संरचना:
- वर्तमान में, ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद‘ (UNHRC) में 47 सदस्य हैं, तथा समस्त विश्व के भौगोलिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने हेतु सीटों का आवंटन प्रतिवर्ष निर्वाचन के आधार पर किया जाता है।
- प्रत्येक सदस्य तीन वर्षों के कार्यकाल के लिए निर्वाचित होता है।
- किसी देश को एक सीट पर लगातार अधिकतम दो कार्यकाल की अनुमति होती है।
UNHRC के कार्य:
- परिषद द्वारा संयुक्त राष्ट्र के सभी 193 सदस्य देशों की ‘सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा‘ (Universal Periodic Review- UPR) के माध्यम से मानव अधिकार संबंधी विषयों पर गैर-बाध्यकारी प्रस्ताव पारित करता है।
- यह विशेष देशों में मानवाधिकार उल्लंघनों हेतु विशेषज्ञ जांच की देखरेख करता है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के समक्ष चुनौतियाँ तथा इसमें सुधारों की आवश्यकता:
- ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के सदस्य-देशों जैसे सऊदी अरब, चीन और रूस के मानवाधिकार रिकॉर्ड इसके उद्देश्य और मिशन के अनुरूप नहीं हैं, जिसके कारण आलोचकों द्वारा परिषद की प्रासंगिकता पर सवाल उठाये जाते है।
- UNHRC में कई पश्चिमी देशों द्वारा निरंतर भागीदारी के बावजूद भी ये मानव अधिकारों संबंधी समझ पर गलतफहमी बनाये रखते हैं।
- UNHRC की कार्यवाहियों के संदर्भ में गैर-अनुपालन (Non-compliance) एक गंभीर मुद्दा रहा है।
- अमेरिका जैसे शक्तिशाली राष्ट्रों की गैर-भागीदारी।
वर्तमान में चिंता का विषय:
कुछ लोगों का कहना है, कि भारत का मतदान से दूर रहने का निर्णय किसी राष्ट्र के पक्ष अथवा विपक्ष में नहीं है, बल्कि यह अपने स्वयं के राष्ट्रीय हित में हैं।
- हालांकि, इन निर्णयों को अधिकांश भारतीय टिप्पणीकारों द्वारा एक ‘ख़राब स्थिति को सर्वश्रेष्ठ बनाने’ के प्रयास के रूप में माना जाना रहा है।
- हमारे सबसे बड़े हथियार आपूर्तिकर्ता के रूप में, रूस एक भरोसेमंद सहयोगी रहा है। इनका कहना है, कि 1971 में बांग्लादेश के निर्माण का उल्लेख नहीं करके, कश्मीर मुद्दे पर रूस ने संयुक्त राष्ट्र में भारत का बचाव किया है।
- इसके अलावा, रूस के खिलाफ मतदान करने से, रूस के चीन के अधिक नजदीक जाने की बढ़ जाएगी, जिससे भारत के लिए देश की सुरक्षा का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।
क्या भारत को रूस पर अपनी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए?
ऊपर दिए गए तर्क तीन दशक पहले शीत युद्ध की समाप्ति और 20 साल पहले व्लादिमीर पुतिन के उदय से पहले के हैं। और भी खतरनाक रूप से, उपरोक्त तर्क भारत के अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के प्रति एक नियतिवाद को प्रकट करते हैं, जो समय बीतने के साथ हमें और नुकसान पहुंचा सकते हैं।
- हां यह सच है, कि रूस हमारे लिए सबसे बड़ा हथियार प्रदाता देश है और अगर हम इसके खिलाफ मतदान करते हैं तो हमारी आपूर्ति प्रभावित होगी। किंतु, अब रूस एक विश्वसनीय हथियार प्रदाता देश नहीं है; पुतिन के सत्ता में आने के बाद से इसकी विश्वसनीयता कभी साबित नहीं हुई है।
- रूस से आने वाले हथियारों की आपूर्ति में अक्सर देरी होती है, और पुतिन द्वारा कीमतों को बढ़ाने के लिए ‘देरी करने की तरकीब’ का इस्तेमाल भी किया गया, और कभी-कभी तो कीमतों को दोगुना भी कर दिया गया। इसके विपरीत, राफेल जेट विमानों की फ्रांसीसी डिलीवरी तुलनात्मक रूप से काफी तेज रही है।
- हमारी मदद करना तो दूर, पुतिन ने चीन की भारत के खिलाफ आक्रामकता के कई कृत्यों पर आंखें मूंद ली हैं।
- रूस की वजह से ही, भारत को, हाल के दिनों में अफगान शांति वार्ता से दूर रखा गया था।
- 2019 और 2020 में जब चीन ने UNSC में कश्मीर को उठाया तो रूस ने हमारी मदद करने के लिए बहुत कम प्रयास किए। उस समय अमेरिका और यूरोपीय देशों ने- अपने स्वयं के मानवाधिकार सिद्धांतों के खिलाफ जाकर- हमारी मदद की थी।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप ‘संयुक्त राष्ट्र न्यासी परिषद’ (United Nations Trusteeship Council) के बारे में जानते हैं?
प्रीलिम्स लिंक:
- UNHRC के बारे में
- संरचना
- कार्य
- ‘सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा‘ (UPR) क्या है?
- UNHRC का मुख्यालय
- हाल ही में UNHRC की सदस्यता त्यागने वाले देश
मेंस लिंक:
‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद‘ (UNHRC) के महत्व पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
एशिया का सबसे बड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट
- ओखला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (Okhla Sewage Treatment Plant) से यमुना की सफाई प्रक्रिया में एक प्रमुख भूमिका निभाने की उम्मीद की जा रही है।
- यह संयंत्र दिल्ली में स्थित है।
- यह संयंत्र इस साल दिसंबर में पूरा हो जाएगा, इसके बाद यह एशिया का सबसे बड़ा सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होगा।
विश्व स्वास्थ्य दिवस
हर साल 7 अप्रैल को ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ (World Health Day) के रूप में मनाया जाता है।
- यह दिवस, 7 अप्रैल 1948 को ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) की नींव रखने की याद को ताजा करने के लिए मनाया जाता है।
- इसका विचार 1948 में पहली ‘स्वास्थ्य सभा’ में परिकल्पित किया गया था और यह 1950 में लागू हुआ।
- 2022 के लिए विश्व स्वास्थ्य दिवस’ की थीम: हमारा ग्रह, हमारा स्वास्थ्य।
अश्विनी वैष्णव समिति
- भारत में सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए सलाहकार समिति का गठन किया गया है।
- समिति की अध्यक्षता इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्री ‘अश्विनी वैष्णव’ करेंगे।
- यह समिति एक संरचित, कुशल और रणनीतिक तरीके से उद्देश्यों को आगे बढ़ाएगी, और इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) के अधिकारियों को आवश्यक मार्गदर्शन प्रदान करेगी।
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (International Energy Agency – IEA), एक अंतर-सरकारी स्वायत्त संगठन है। इसकी स्थापना आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (Organisation of Economic Cooperation and Development- OECD) फ्रेमवर्क के अनुसार वर्ष 1974 में की गई थी।
- इसके कार्यों का फोकस मुख्यतः चार मुख्य क्षेत्रों पर होता है: ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक विकास, पर्यावरण जागरूकता और वैश्विक सहभागिता।
- इसका मुख्यालय (सचिवालय) पेरिस, फ्रांस में है।
भूमिकाएँ और कार्य:
- अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की स्थापना वर्ष 1973-1974 के तेल संकट के दौरान सदस्य देशों के लिए तेल आपूर्ति व्यवधानों का सामना करने में मदद करने के लिए की गयी थी। IEA द्वारा यह भूमिका वर्तमान में भी निभाई जा रही है।
- अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अधिदेश में समय के साथ विस्तार किया गया है। इसके कार्यों में वैश्विक रूप से प्रमुख ऊर्जा रुझानों पर निगाह रखना और उनका विश्लेषण करना, मजबूत ऊर्जा नीतियों को बढ़ावा देना और बहुराष्ट्रीय ऊर्जा प्रौद्योगिकी सहयोग को बढ़ावा देना शामिल किया गया है।
IEA की संरचना एवं सदस्यता हेतु पात्रता:
वर्तमान में ‘अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी’ में 30 सदस्य देश तथा में आठ सहयोगी देश शामिल हैं। इसकी सदस्यता होने के लिए किसी देश को आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) का सदस्य होना अनिवार्य है। हालांकि OECD के सभी सदस्य आईईए के सदस्य नहीं हैं।
किसी देश को अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का सदस्यता के लिए निम्नलिखित शर्ते पूरा करना आवश्यक है:
- देश की सरकार के पास पिछले वर्ष के 90 दिनों में किए गए निवल आयात के बराबर कच्चे तेल और / अथवा उत्पाद भण्डार मौजूद होना चाहिए। भले ही यह भण्डार सरकार के प्रत्यक्ष स्वामित्व में न हो किंतु वैश्विक तेल आपूर्ति में व्यवधान को दूर करने के इसका उपयोग किया जा सकता हो।
- देश में राष्ट्रीय तेल खपत को 10% तक कम करने के लिए एक ‘मांग नियंत्रण कार्यक्रम’ लागू होना चाहिए।
- राष्ट्रीय स्तर पर समन्वित आपातकालीन प्रतिक्रिया उपाय (CERM) लागू करने के लिए क़ानून और संस्था होनी चाहिए।
- मांग किये जाने पर देश की सीमा में कार्यरत सभी तेल कंपनियों द्वारा जानकारी दिए जाने को सुनिश्चित करने हेतु क़ानून और उपाय होने चाहिए।
- अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के सामूहिक कार्रवाई में अपने योगदान को सुनिश्चित करने के लिए देश में क़ानून अथवा उपाय होने चाहिए।
आइईए द्वारा प्रकाशित की जाने वाली रिपोर्ट्स:
- वैश्विक ऊर्जा और CO2 स्थिति रिपोर्ट
- विश्व ऊर्जा आउटलुक
- विश्व ऊर्जा सांख्यिकी
- विश्व ऊर्जा संतुलन
- ऊर्जा प्रौद्योगिकी परिप्रेक्ष्य










योजना से जुड़े विवाद:
