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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 12 March 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-I

1. चार धाम

सामान्य अध्ययनII

1. एक राष्ट्र, एक चुनाव।

2. लोकपाल की तीन वर्षों में किसी को भी अभियोजन की मंजूरी देने में विफलता

3. मॉडल किरायेदारी अधिनियम

4. ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम’, 2007 की अपर्याप्तता

5. ईरान परमाणु समझौता

6. अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय

 


सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

चार धाम


(Char Dham)

संदर्भ:

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व न्यायाधीश एके सीकरी से “चार धाम महामार्ग विकास परियोजना’ (Char Dham Highway Development Project) का संपूर्ण हिमालय घाटी में पड़ने वाले समग्र प्रभाव पर विचार करने के लिए” शीर्ष अदालत द्वारा गठित ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ के अध्यक्ष के रूप में कार्यभार संभालने का आग्रह किया है।

संबंधित प्रकरण:

फरवरी 2022 में,, वयोवृद्ध पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा ने ‘चार धाम परियोजना’ (Char Dham project) पर ‘सुप्रीम कोर्ट’ की ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ (High Powered Committee – HPC) के अध्यक्ष के रूप में इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कहा है, “उनका विश्वास था कि उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ इस संवेदनशील (हिमालयी) पारिस्थितिकी की रक्षा कर सकती है, जोकि अब टूट चुका है”।

27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के महासचिव को सौंपे गए अपने त्याग पत्र में, पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा ने शीर्ष अदालत के दिसंबर 2021 के आदेश का उल्लेख किया, जिसमें ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ (HPC) द्वारा की गयी सिफारिशों को ‘सुप्रीम कोर्ट’ द्वारा सितंबर 2020 में जारी पहले आदेश में स्वीकार किए जाने, तथा बाद में HPC की सिफारिशों को लागू करने की बजाय ‘रक्षा जरूरतों को पूरा करने’ का हवाला देकर सड़क मार्ग को चौड़ा करने के लिए सरकार की मांग को स्वीकार कर लिया गया था।

इस प्रकरण में अदालत की अब तक की कार्यवाही:

  • वर्ष 2018 में, इस परियोजना को एक ‘गैर सरकारी संगठन’ द्वारा पेड़ों की कटाई, पहाड़ियों को काटने और खुदाई की गई सामग्री को डंप करने’की वजह से हिमालयी पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले इसके संभावित प्रभाव के कारण चुनौती दी गई थी।
  • वर्ष 2019 में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा परियोजना से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए ‘रवि चोपड़ा’ का अध्यक्षता एक ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ (HPC) का गठन किया गया, और अदालत ने सितंबर 2020 में, सड़क की चौड़ाई आदि पर समिति द्वारा दी गयी सिफारिश को स्वीकार कर लिया।
  • नवंबर 2020 में, रक्षा मंत्रालय ने सेना की आवश्यकता को पूरा करने के लिए सड़कों को चौड़ा करने की मांग की।
  • दिसंबर 2021 में, सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2020 के अपने आदेश को इस आधार पर संशोधित किया कि अदालत “राष्ट्र की रक्षा हेतु कानून द्वारा निर्धारित संस्था की नीतिगत पसंद पर पूछताछ नहीं कर सकती”।

‘चारधाम परियोजना’ (Chardham Project) के बारे में:

  • चारधाम परियोजना में, हिंदूओं के पवित्र तीर्थ स्थलों- बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री- को आपस में जोड़ने के लिए, 12,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 900 किलोमीटर लंबाई के राष्ट्रीय राजमार्गों को विकसित और चौड़ा किया जाना शामिल है।
  • इस राजमार्ग को ‘चार धाम महामार्ग’ (चार धाम राजमार्ग) और ‘राजमार्ग निर्माण परियोजना’ को ‘चार धाम महामार्ग विकास परियोजना’ कहा जाएगा।

 

संबंधित पर्यावरणीय चिंताएं:

  1. पर्वतीय इलाकों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य, आपदा के लिए एक नुस्खा होते है क्योंकि पेड़ों की कटाई किए जाने और चट्टानों के ढीले होने से भूस्खलन का खतरा बढ़ जाता है।
  2. ‘अनिवार्य पर्यावरण मंजूरी’ और ‘पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन’ (Environment Impact Assessment – EIA) प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए परियोजना को निष्पादित किया जा रहा है।
  3. परियोजना के तहत सड़क बनाने के लिए कथित तौर पर 25,000 से अधिक पेड़ काटे गए है, जोकि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
  4. चूंकि चौपहिया वाहनों के लिए चौड़े मार्ग बनाने के लिए ज्यादा उत्खनन और विस्फोटन करना होगा, जिससे इस क्षेत्र की स्थलाकृति फिसलन और भूस्खलन के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाएगी, परिणामस्वरूप सभी मौसमों में चालू रहने वाले राजमार्ग बनाने का उद्देश्य प्रभावित हो सकता है।

चारधाम परियोजना (Chardham Project) में अब तक का घटनाक्रम:

  1. चार धाम सड़क परियोजना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिसंबर 2016 में रखी गयी थी।
  2. लेकिन, इस परियोजना को पर्यावरणीय आधार पर अदालतों में चुनौती दी गयी थी, जिसमे याचिकाकर्ताओं ने परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी में अनियमितताओं का आरोप लगाया और कहा कि मौजूदा मानदंडों के उल्लंघन करते हुए परियोजना पर कार्य किया जा रहा है।
  3. इस परियोजना को सितंबर 2018 में ‘राष्ट्रीय हरित अधिकरण’ (NGT) द्वारा मंजूरी प्रदान की गयी थी, लेकिन, इसके आदेश को इस आधार पर अदालत में चुनौती दी गयी, कि यह आदेश, मामले की सुनवाई करने वाली पीठ बेंच से अलग अन्य पीठ बेंच द्वारा पारित किया गया है। जिस पर, सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2018 में NGT के आदेश पर रोक लगा दी।
  4. सितंबर 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए एक आदेश पारित किया जिसमें कहा गया था, कि केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय के 2018 के परिपत्र में निर्धारित ‘चार धाम परियोजना’ के लिए राजमार्गों की चौड़ाई 5 मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। लेकिन रक्षा मंत्रालय ने उसी वर्ष दिसंबर में, राजमार्गों की चौड़ाई 10 मीटर किए जाने की अनुमति देने के लिए, अदालत से आदेश में संशोधन करने का अनुरोध किया।
  5. जिसके बाद, शीर्ष अदालत ने एक ‘उच्चाधिकार प्राप्त समिति’ (High-Powered CommitteeHPC) को राजमार्गों की चौड़ाई पर केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए तर्कों पर गौर करने के लिए कहा।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. परियोजना का अवलोकन
  2. इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य
  3. इन स्थानों से बहने वाली महत्वपूर्ण नदियाँ
  4. राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के बीच अंतर

मेंस लिंक:

चारधाम परियोजना के महत्व की विवेचना कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।

एक देश, एक चुनाव


(One Nation, One Election)

संदर्भ:

मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुशील चंद्रा ने हाल ही में कहा है, कि ‘निर्वाचन आयोग’ एक साथ या ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ कराने के लिए तैयार है।

इस साल की शुरुआत में, राष्ट्रीय मतदाता दिवस पर, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन के दौरान ‘एक राष्ट्र, एक मतदाता’ / ‘समान मतदाता सूची’ (Common Electoral Roll) और “एक राष्ट्र, एक चुनाव” (One Nation, One Election) जैसे विषयों को उठाया था, और कहा था कि चुनाव परिणामों का निरंतर चक्र विकास कार्यों को प्रभावित करता है।

एक राष्ट्र, एक चुनाव’ के बारे में:

एक राष्ट्र-एक चुनाव / ‘वन नेशन वन इलेक्शन’ (One Nation-One Election) का तात्पर्य लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, पंचायतों और शहरी स्थानीय निकायों के लिए प्रति पांच वर्षो में एक बार और एक साथ चुनाव कराने से है।

बहुधा होने वाले चुनावों होने से उत्पन्न चुनौतियाँ:

  1. भारी व्यय।
  2. चुनाव के समय में आदर्श आचार संहिता लागू होने के परिणामस्वरूप नीतियों में रूकावट।
  3. आवश्यक सेवाओं के वितरण पर प्रभाव।
  4. चुनाव के दौरान तैनात किये जाने वाले जन-बल पर अतिरिक्त भार।
  5. राजनीतिक दलों, विशेषकर छोटे दलों पर दबाव में वृद्धि, क्योंकि दिन प्रतिदिन महंगे होते जा रहे हैं।

एक साथ चुनाव कराए जाने के लाभ:

  • प्रशासन एवं अनुरूपता: सत्तारूढ़ दल, हमेशा चुनाव अभियान मोड में रहने के बजाय कानून और प्रशासन पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।
  • धन के व्यय और प्रशासन में किफ़ायत।
  • नीतियों और कार्यक्रमों में निरंतरता।
  • प्रशासन क्षमता: सरकारों द्वारा लोकलुभावन उपायों में कमी।
  • सभी चुनाव एक ही बार होने से मतदाताओं पर काले धन के प्रभाव में कमी।

क्षेत्रीय दलों पर प्रभाव:

लोकसभा और राज्य विधान सभा चुनाव एक साथ होने पर, मतदाताओं में केंद्र व राज्य, दोनों में एक ही पार्टी को सत्ता में लाने के लिए मतदान करने की प्रवृत्ति हमेशा रहती है।

एक साथ चुनाव कराए जाने संबंधी प्रावधान लागू किए जाने हेतु, संविधान और कानूनों में किए जाने वाले परिवर्तन:

  1. अनुच्छेद 83, संसद के सदनों के कार्यकाल से संबंधित है, इसमें संशोधन किए जाने की आवश्यकता होगी।
  2. अनुच्छेद 85 (राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा को भंग करने संबंधी अनुच्छेद)
  3. अनुच्छेद 172 (राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल से संबंधित अनुच्छेद)
  4. अनुच्छेद 174 (राज्य विधानसभाओं के विघटन से संबंधित अनुच्छेद)
  5. अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन से संबंधित अनुच्छेद)

संसद और विधानसभाओं, दोनों के कार्यकालों की स्थिरता हेतु ‘जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of People Act), 1951’ में संशोधन किये जाने की आवश्यकता होगी। इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण तत्व सम्मिलित किए जाने चाहिए:

  1. एक साथ चुनाव कराने संबंधी आवश्यक प्रक्रियाओं को सुविधाजनक बनाने हेतु भारत के निर्वाचन आयोग (ECI) की शक्तियों और कार्यों का पुनर्गठन।
  2. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 2 में ‘एक साथ चुनाव’ की परिभाषा जोड़ी जा सकती है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आदर्श आचार संहिता क्या है?
  2. निर्वाचन आयोग की चुनाव कराने संबंधी शक्तियाँ
  3. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 अधिनियम का अवलोकन
  4. अनुच्छेद 83, 85 और 172 का अवलोकन

मेंस लिंक:

भारतीय राजनीति के लिए “एक देश- एक चुनाव” की अवधारणा के लाभ और हानियों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

लोकपाल की तीन वर्षों में किसी को भी अभियोजन की मंजूरी देने में विफलता


संदर्भ:

एक आरटीआई के जवाब में ‘भ्रष्टाचार विरोधी प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी’ (Anti-Graft Ombudsman) द्वारा प्रदान की गयी जानकारी के अनुसार, लगभग तीन साल पहले अपने गठन के बाद से अब तक ‘लोकपाल’ (Lokpal), भ्रष्टाचार के आरोपित लोक सेवकों पर ‘अभियोजन’ की स्वीकृति प्रदान करने में विफल रहा है।

अन्य मामले:

भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करने और आरोपी लोक सेवकों के खिलाफ मुकदमा चलाने हेतु, दो शीर्ष कर्मियों- जांच निदेशक (Directors of Inquiry) और अभियोजन निदेशक (Directors of Prosecution) की नियुक्ति किया जाना अभी शेष है।

‘जांच निदेशक’ के बारे में:

‘लोकपाल एवं लोकायुक्त अधिनियम’, 2013 के अनुसार:

  • लोकपाल के अन्य अधिकारियों में एक ‘जांच निदेशक’ (Directors of Inquiry) होगा, जो भारत सरकार के अपर सिचव या समतुल्य पंक्ति से निम्न पंक्ति का नहीं होगा, जिसकी नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा भेजे गए नामों के पैनल से अध्यक्ष द्वारा की जाएगी।
  • ‘जांच निदेशक’, लोकपाल द्वारा ‘केंद्रीय सतर्कता आयोग’ (CVC) को संदर्भित मामलों की प्रारंभिक जांच करेगा।

लोकपाल अधिनियम, 2013 के प्रमुख बिंदु:

  • अधिनियम में केंद्र-स्तर पर लोकपाल और राज्य स्तर पर लोकायुक्त नामक भ्रष्टाचार रोधी लोकपाल की स्थापना किए जाने का प्रावधान किया गया है।
  • लोकपाल में एक अध्यक्ष और अधिकतम आठ सदस्य होंगे।
  • प्रधान मंत्री सहित सभी श्रेणियों के लोक सेवक, लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र के अंर्तगत शामिल होंगे। किंतु सशस्त्र बल लोकपाल के दायरे से बाहर रहेंगे।
  • अधिनियम में, अभियोजन के लंबित होने के बावजूद, भ्रष्ट तरीकों से अर्जित संपत्ति की कुर्की और जब्ती के प्रावधान किए गए हैं।
  • राज्यों के लिए, अधिनियम के प्रवर्तित होने के एक वर्ष के भीतर ‘लोकायुक्त’ की स्थापना करना अनिवार्य होगा।
  • अधिनियम में ‘व्हिसलब्लोअर’ (Whistleblowers) के रूप में कार्य करने वाले लोक सेवकों की रक्षा सुनिश्चित की गयी है।

लोकपाल की शक्तियां:

  1. लोकपाल के पास ‘प्रशासनिक शिकायत जाँच अधिकारी’ (Ombudsman) द्वारा भेजे गए मामलों में सीबीआई सहित किसी भी जांच एजेंसी का अधीक्षण करने और निर्देश देने की शक्ति होगी।
  2. अधिनियम के अनुसार- लोकपाल, किसी लोक सेवक के खिलाफ प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार का मामला सामने आने पर, किसी जांच एजेंसी (जैसे सतर्कता या सीबीआई) द्वारा जांच शुरू किए जाने से पहले ही, उस व्यक्ति को अपने समक्ष हाजिर होने आदेश दे सकता है तथा पूछताछ कर सकता है।
  3. लोकपाल द्वारा निर्दिष्ट मामले की जांच कर रहे सीबीआई के किसी भी अधिकारी को लोकपाल की मंजूरी के बिना स्थानांतरित नहीं किया जाएगा।
  4. अधिनियम में किसी भी जांच को छह महीने के भीतर पूरा किए जाने को अनिवार्य किया गया है। हालाँकि, लोकपाल या लोकायुक्त द्वारा जांच के संदर्भ में, एक बार में छह महीने के विस्तार की अनुमति दी जा सकती है, बशर्ते ऐसे विस्तार की आवश्यकता के कारण लिखित रूप में दिए गए हों।
  5. लोकपाल द्वारा भेजे गए मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित की जाएंगी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘लोकपाल’ की अवधारणा की उत्पत्ति के बारे में संक्षेप में पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लोकपाल
  2. लोकपाल एवं लोकायुक्त की नियुक्ति कौन करता है?
  3. शक्तियाँ और कार्य
  4. पात्रता
  5. लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 का अवलोकन

मेंस लिंक:

लोकपाल अधिनियम में किए गए परिवर्तनों और इसके प्रवर्तन में देरी पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

मॉडल किरायेदारी अधिनियम


(Model Tenancy Act)

संदर्भ:

लंबे समय से प्रतीक्षित ‘चंडीगढ़ किरायेदारी अधिनियम’ अब संसद द्वारा अधिनियमित होने की कतार में शामिल किया जाएगा।

केंद्र शासित प्रदेश प्रशासन ने केंद्र सरकार के ‘मॉडल किरायेदारी अधिनियम’, 2021 (Model Tenancy Act – MTA), 2021 के आधार पर प्रस्तावित अधिनियम को अनुमोदन और अधिनियमन के लिए केंद्र सरकार को भेजने का निर्णय लिया है।

Current Affairs

 

पृष्ठभूमि:

जून 2021 में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा ‘मॉडल किरायेदारी अधिनियम’ (MTA) को मंजूरी प्रदान की गयी थी। इस अधिनियम के अनुसार- राज्य और केंद्र शासित प्रदेश, नए कानून बनाकर ‘मॉडल किरायेदारी अधिनियम’ लागू कर सकते हैं या वे अपने मौजूदा किरायेदारी कानूनों में अपने हिसाब से संशोधन कर सकते हैं।

मॉडल किरायेदारी कानून के प्रमुख बिंदु:

  1. ये क़ानून उत्‍तरव्यापी प्रभाव से लागू होंगे तथा मौजूदा किरायेदारी को प्रभावित नहीं करेंगे।
  2. सभी नई किरायेदारिर्यों के लिए लिखित अनुबंध जरूरी होगा। इस अनुबंध को संबंधित जिला किराया प्राधिकरण के पास जमा करना होगा।
  3. इस कानून में मकान मालिक और किरायेदारों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के बारे में भी स्पष्ट किया गया है।
  4. कोई भी मकान मालिक या संपत्ति प्रबंधक, किरायेदार के कब्जे वाले परिसर हेतु किसी भी आवश्यक आपूर्ति को रोक नहीं सकता है।
  5. किरायेदारी का नवीनीकरण नहीं किये जाने पर, पुराने अनुबंध के नियमों और शर्तों सहित किरायेदारी को मासिक आधार पर, अधिकतम छह महीने की अवधि तक, नवीनीकृत मान लिया जाएगा।
  6. मकान खाली नहीं करने के मामले में मुआवजा: तय किरायेदारी अवधि के बाद छह महीने पूरे हो जाने पर अथवा किसी आदेश या नोटिस से किरायेदारी समाप्त करने पर, किरायेदार एक ‘बकाया किरायेदार’ (Tenant in Default) बन जाएगा, और उसे अगले दो महीने के लिए निर्धारित किराए का दोगुना, तथा इससे आगे के महीनों के लिए मासिक किराए का चार गुना भुगतान करना होगा।
  7. कोई मकान मालिक या संपत्ति प्रबंधक, किरायेदार के परिसर में, घुसने के कम से कम चौबीस घंटे पहले इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से लिखित सूचना या नोटिस देने के बाद ही प्रवेश कर सकता है।

महत्व:

यह, दीवानी अदालतों पर भार कम करने, कानूनी विवादों में फंसी किराये की संपत्तियों को खोलने और किरायेदारों और मकान-मालिकों के हितों को संतुलित करके भविष्य की उलझनों को रोकने का वादा करने वाला एक महत्वपूर्ण कानून है।

इस संबंध में ‘कानून’ की आवश्यकता:

  1. बड़े महानगरों में प्रवास करने वाले युवा, नौकरी की खोज में शिक्षित व्यक्ति, अक्सर किराए पर रहने के लिए जगह के लिए, किरायेदारी की दुष्कर शर्तों और सुरक्षा-जमा के रूप में बेहिसाब रकम मांगे जाने की शिकायत करते हैं। कुछ शहरों में, किरायेदारों को 11 महीने के किराए के बराबर सुरक्षा-जमा राशि का भुगतान करने के लिए कहा जाता है।
  2. इसके अलावा, कुछ मकान मालिक नियमित रूप से विविध मरम्मत कार्यों के लिए अघोषित रूप से किरायेदारों के परिसर में जाकर उनकी निजता के अधिकार का उल्लंघन करते हैं।
  3. किराए में मनमानी बढ़ोतरी भी किरायेदारों के लिए एक और समस्या है, जिनमें से कई “बंदी ग्राहक” की तरह निचोड़े जाने की शिकायत करते हैं।
  4. इसके अलावा, किरायेदारों पर अक्सर किराए के परिसर में “अवैध रूप से रहने” या संपत्ति हथियाने की कोशिश करने का आरोप लगाया जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि मकान-मालिक और किराएदार के संबंध, किराएदारी अवधि और किराए का संग्रह, भारतीय संविधान की राज्य सूची (7वीं अनुसूची) का विषय हैं? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘मॉडल किरायेदारी कानून’ के बारे में- प्रमुख बिंदु
  2. राज्यों की भूमिका

मेंस लिंक:

‘मॉडल किरायेदारी कानून’ के महत्व और प्रासंगिकता की विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम’, 2007 की अपर्याप्तता


संदर्भ:

कोविड -19 महामारी ने हमें दिखाया है, कि वृद्ध व्यक्तियों को किस प्रकार की अद्वितीय चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

इनके समक्ष आने वाली चुनौतियों / कमजोरियों में शामिल हैं:

  • ‘वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Ageist attitudes) और रूढ़िवादिता की वजह से वृद्ध व्यक्तियों को भेदभाव और नकारात्मक व्यवहार का सामना करना पड़ता है, जोकि लिंग, नस्ल और विकलांगता आधारित अन्य कलंकों के साथ मिलकर और कष्टदायी हो जाता है।
  • उनकी बीमारियों और मौत को “स्वीकार्य” माना जाता है, और अक्सर इसे उम्र बढ़ने का एक हिस्सा माना जाता है।
  • ‘हेल्पएज इंडिया’ की प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, महामारी के दौरान बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार में तेजी से वृद्धि हुई है।
  • वृद्धावस्था के बारे में गलत सूचना और मिथक, विशिष्ट स्वास्थ्य और नीतिगत उपायों की कमी, समाज में आयुवाद और सीमित डिजिटल साक्षरता, वृद्ध व्यक्तियों की अद्वितीय कमजोरियों में योगदान करती है।

‘वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहार’ (Ageism) पर हाल ही में जारी WHO की रिपोर्ट के अनुसार:

  • संपूर्ण विश्व में, प्रति तीन में से एक व्यक्ति को ‘वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहारवादी दृष्टिकोण (Ageist attitudes) और रूढ़िवादिता का सामना करना पड़ता है।
  • इसकी वजह से वृद्ध व्यक्ति समाज में हाशिए पर पहुँच जाते हैं और, एक गंभीर मानवाधिकार संकट पैदा हो चुका है।
  • इससे वृद्ध व्यक्तियों के अधिकारों के उल्लंघन होता है, जिसमे इनकी गरिमा, स्वायत्तता, सम्मान, क्षमता, समावेश और समानता के अधिकारों आदि का उल्लंघन शामिल होता है।
  • सामाजिक कलंक, ‘वृद्धों के प्रति अनुचित व्यवहार’, और अधिकारों के उल्लंघन से वृद्ध व्यक्तियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकते हैं।
  • इससे ‘गैर-संचारी रोगों’ जैसे मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, स्ट्रोक और मानसिक विकारों (अवसाद, चिंता, अनिद्रा और मनोभ्रंश) के जोखिम में वृद्धि हो जाती है।
  • शोध से पता चलता है, कि वृद्ध लोगों की उपेक्षा करने से अकेलापन, संक्रमण, गिरना, यांत्रिक चोटें और समय से पहले मृत्यु हो सकती है।
  • अंत में, तनाव और अलगाव की वजह से वृद्ध व्यक्ति, बुढ़ापे में प्रायः होने वाली किसी भी दीर्घकालिक बीमारी से ग्रसित हो सकते हैं।

वृद्ध व्यक्तियों के अधिकारों और स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु मौजूदा कानूनी प्रावधान:

  1. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007, (Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007) वृद्ध व्यक्तियों के अधिकारों और स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु समर्पित एकमात्र विशिष्ट कानून है।
  2. वृद्ध व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय नीति (National Policy for Older Persons – NPOP) के अनुसरण में, नीति के कार्यान्वयन की निगरानी और सरकार को सलाह देने के लिए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री की अध्यक्षता में 1999 में ‘वृद्ध व्यक्तियों के लिए एक राष्ट्रीय परिषद’ (National Council for Older Persons – NCOP) का गठन किया गया था।

वर्तमान प्रणाली के साथ समस्याएं:

  • योजनाओं और नीतियों का ‘कागज-से-हकीकत’ में बदलना अभी बहुत दूर है। अभी तक बनाए गए कई अधिनियम और उपाय, सेवा प्रदाताओं और उपयोगकर्ताओं- दोनों के बीच समान रूप से न्यूनतम जागरूकता और खराब तरीके से लागू किए गए हैं।
  • लांगिट्यूडनल एजिंग स्टडीज ऑफ इंडिया (Longitudinal Ageing Study in India- LASI) के हालिया आंकड़ों से पता चलता है, कि पांच में से केवल एक वृद्ध व्यक्ति अपने हितों के लिए उपलब्ध सामाजिक सुरक्षा और कानूनी उपायों से अवगत है।
  • इसके अलावा, कानूनी झंझटों और अंतर्निहित कलंक के डर के कारण, बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार को काफी कम रिपोर्ट किया जाता है।
  • याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं वाले वुजुर्गों को अतिरिक्त दुर्दशा का सामना करना पड़ता है।

‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 का अवलोकन:

  1. इस अधिनियम के तहत, वयस्क बच्चों एवं उत्तराधिकारियों के लिए, माता-पिता को मासिक भत्ता के रूप में भरण-पोषण प्रदान करना, कानूनी रूप से बाध्य बनाया गया है।
  2. इस अधिनियम में ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के लिए मासिक भरण-पोषण का दावा करने के लिए एक सस्ती और त्वरित प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है।
  3. इस अधिनियम के अनुसार, माता-पिता का अर्थ जैविक, दत्तक या सौतेले माता-पिता हो सकता है।
  4. इस अधिनियम के तहत ऐसे व्यक्तियों (बुजुर्गों) के जीवन और संपत्ति की रक्षा के प्रावधान भी किए गए हैं।

क्या कानून के अनुसार, राज्य के लिए ‘वृद्धाश्रम’ स्थापित करना अनिवार्य है?

कानून की धारा 19 के अनुसार-

  • राज्य सरकार, चरणबद्ध रीति से, सुलभ स्थानों पर, जितने वह आवश्यक समझे, उतने वृद्धाश्रम स्थापित करेगी और उनका अनुरक्षण करेगी और आरंभ में प्रत्येक जिले में कम-से-कम एक वृद्धाश्रम स्थापित करेगी।
  • राज्य सरकार, वृद्धाश्रमों के प्रबंधन के लिए एक योजना भी निर्धारित करेगी।

समय की मांग:

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, हमें वृद्ध व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए विशिष्ट ढांचे की आवश्यकता है। इसके लिए, ‘संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ तथा ‘वृद्ध लोगों के अधिकारों के लिए वैश्विक गठबंधन’ (Global Alliance for the Rights of Older People – GAROP) एक उपयुक्त कदम हो सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने ठीक ही कहा है, “जनसंख्या की उम्र बढ़ना मानवता की सबसे बड़ी जीत है”। ऐसा क्यों है? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अधिनियम के अनुसार ‘निर्धन वरिष्ठ नागरिक’ कौन हैं?
  2. अधिनियम के अनुसार राज्यों की भूमिका
  3. अधिनियम की अन्य प्रमुख विशेषताएं
  4. संशोधन प्रस्तावित

मेंस लिंक:

बुढ़ापा एक बड़ी सामाजिक चुनौती बन गया है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

ईरान परमाणु समझौता


(Iran Nuclear Deal)

संदर्भ:

अंतिम क्षणों में रूस की मांगों पर अनिश्चितकालीन विराम की घोषणा के बाद ‘ईरान परमाणु समझौते’ (Iran Nuclear Deal) के पुनरुद्धार पर जारी वार्ता, यूक्रेन-रूस युद्ध का एक शिकार बन गई है।

संबंधित प्रकरण:

अमेरिका और ईरान को ‘ईरान परमाणु समझौते’ में वापस लाने के लिए किए जाने वाले समझौते के तहत, ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोकेमिकल्स के निर्यात पर प्रतिबंध सहित, ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधो को हटाए जा सकता है। बदले में तेहरान को अपनी ‘परमाणु गतिविधियों’ को सीमित करना होगा।

हालांकि, पिछले सप्ताह से मास्को, समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद वाशिंगटन से रूस और ईरान के बीच किसी भी व्यापार पर प्रतिबंध नहीं लगाने का वचन दिए जाने पर जोर दे रहा है।

आगे की चिंता:

लगभग एक साल से ‘विएना’ में जारी श्रमसाध्य वार्ता में रूस एक प्रमुख भागीदार रहा है। यदि यही गतिरोध लंबे समय तक बना रहता है, तो इस बात पर बहस होने की संभावना है कि क्या मास्को द्वारा संयुक्त राष्ट्र के वीटो का उपयोग ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (JCPOA) समझौते पर किया जा सकता है।

रूस और JCPOA:

संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (JCPOA) के कार्यान्वयन में रूस की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका ईरान के अतिरिक्त ‘संवर्धित यूरेनियम भंडार’ के आयातक के रूप में होगी। इस यूरेनियम भंडार को जहाज के माध्यम से रूस ले जाया जाएगा और बदले में ‘प्राकृतिक यूरेनियम’ वापस भेजा जाएगा।

ईरान परमाणु समझौते’ के बारे में:

  • इसे ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (Joint Comprehensive Plan of Action – JCPOA) के रूप में भी जाना जाता है।
  • यह समझौता अर्थात ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’, ईरान तथा P5 + 1+ EU (चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जर्मनी, और यूरोपीय संघ) के मध्य वर्ष 2013 से 2015 से तक चली लंबी वार्ताओं का परिणाम था।
  • इस समझौते के तहत, तेहरान द्वारा, परमाणु हथियारों के सभी प्रमुख घटकों – अर्थात सेंट्रीफ्यूज, संवर्धित यूरेनियम और भारी पानी, के भण्डार में महत्वपूर्ण कटौती करने पर सहमति व्यक्त की गई थी।

भारत के लिए इस समझौते का महत्व:

  • ईरान पर लगे प्रतिबंध हटने से, चाबहार बंदरगाह, बंदर अब्बास पोर्ट, और क्षेत्रीय संपर्को से जुडी अन्य परियोजनाओं में भारत के हितों को फिर से सजीव किया जा सकता है।
  • इससे भारत को, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीनी उपस्थिति को बेअसर करने में मदद मिलेगी।
  • अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों की बहाली से भारत को ईरान से सस्ते तेल की खरीद और ऊर्जा सुरक्षा में सहायता मिलेगी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘व्यापक परमाणु परीक्षण-प्रतिबंध संधि’ (CTBT) के बारे में सुना है? क्या भारत इस संधि का सदस्य है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. JCPOA क्या है? हस्ताक्षरकर्ता
  2. ईरान और उसके पड़ोसी।
  3. IAEA क्या है? संयुक्त राष्ट्र के साथ संबंध
  4. यूरेनियम संवर्धन क्या है?

मेंस लिंक:

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA)  पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष


(International Fund for Agricultural Development)

संदर्भ:

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा ‘अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष’ (International Fund for Agricultural Development – IFAD) के साथ साझेदारी में, महिलाओं को संतुलित भोजन पकाने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए दो सस्ते और सरल विचार प्रस्तावित किए गए हैं।

जोकि निम्नलिखित हैं:

  1. 7 दिन 7 क्यारी’ कार्यक्रम (‘7 days 7 plots’ programme):

इसके तहत, गांव की महिलाओं को सिखाया जाता है कि अपने बगीचे में अलग-अलग सब्जियां- सात सब्जियां- सप्ताह के हर दिन के लिए एक- कैसे उगाएं।

  • सप्ताह के अंत तक, पहली क्यारी में उगाई गयी सब्जी फिर से कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इस तरह, परिवारों को ताजी, सस्ती सब्जियां खाने को मिलती हैं, जिनका वे अधिक समय तक और अधिक मात्रा में उपभोग कर सकते हैं, और इससे बीमारी भी कम होती है।
  • यह, मध्य प्रदेश में संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध आईएफएडी द्वारा कार्यान्वित ‘तेजस्विनी ग्रामीण महिला अधिकारिता कार्यक्रम’ की सहायक योजना है।
  1. तिरंगा थाली:

अधिक संतुलित भोजन को प्रोत्साहित करने के लिए, परियोजना के तहत “तिरंगा थाली” (Tiranga Thali) की अवधारणा पेश की गयी है, जिसके तहत प्रत्येक प्लेट में भारतीय ध्वज के तीन रंगों के मिलती-जुलती सामग्री मौजूद होगी।

  • केसरिया – सभी दालें जैसे पीली फूटी मटर, अरहर की दाल, और विभाजित लाल मसूर प्रोटीन का प्रतिनिधित्व करती हैं;
  • सफेद – चावल, दूध और रोटी कार्बोहाइड्रेट का प्रतिनिधित्व करते हैं; और
  • हरा- हरी पत्तेदार सब्जियां विटामिन और खनिजों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) के बारे में:

  1. यह वर्ष 1977 में गठित, संयुक्त राष्ट्र की एक विशिष्ट एजेंसी है। यह विकासशील देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में काम कर रही है तथा संबद्ध परियोजनाओं के लिये कम ब्याज के साथ अनुदान और ऋण प्रदान करने का कार्य करती है।
  2. आईएफएडी, ग्रामीण आबादी के साथ कार्य करता है, और उन्हें अपनी खाद्य सुरक्षा में वृद्धि करने, पोषण-स्तर में सुधार करने और आय बढ़ाने में सक्षम बनाता है।
  3. यह लोगों को उनके कारोबार का विस्तार करने में भी मदद करता है।
  4. यह संगठन, वर्ष 1974 में आयोजित ‘विश्व खाद्य सम्मेलन’ (World Food Conference) का परिणाम है।
  5. इसका मुख्यालय रोम में है।
  6. इसमें 177 देश सदस्य के रूप में शामिल हैं।
  7. अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष’ द्वारा प्रतिवर्ष ‘ग्रामीण विकास रिपोर्ट’ जारी की जाती है।

IFAD के उद्देश्य:

  1. गरीब लोगों की उत्पादक क्षमता में वृद्धि करना।
  2. बाज़ार की भागीदारी के माध्यम से उनके लाभ में वृद्धि करना।
  3. उनकी आर्थिक गतिविधियों की पर्यावरणीय स्थिरता और जलवायु अनुकूलता को मज़बूती प्रदान करना।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) और ‘संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन’ (FAO) की भूमिकाओं और कार्यों में क्या भिन्नताएं हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. IFAD के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. रिपोर्ट

मेंस लिंक:

अंतर्राष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) की भूमिकाओं और कार्यों के बारे में चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में गुजरात में गांधीनगर के समीप निर्मित ‘राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय’ (Rashtriya Raksha University) के भवन को राष्ट्र को समर्पित किया।

  • ‘राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय’ राष्ट्रीय महत्व का एक संस्थान है, और इसे भारतीय संसद अधिनियम द्वारा स्थापित किया गया है।
  • विश्वविद्यालय का लक्ष्य, राष्ट्रीय सुरक्षा और पुलिस के लिए एक अकादमिक-अनुसंधान-प्रशिक्षण पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में विकसित होना है।

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