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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 23 February 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. कृष्णा नदी जल विवाद

2. अकादमिक क्रेडिट बैंक

3. स्थायी सिंधु आयोग

 

सामान्य अध्ययन-III

1. डार्क एनर्जी

2. नासा का लूसी मिशन

3. सीआरजेड मानदंड

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. डोडा ब्रांड उत्पाद

2. मिंस्क समझौता

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप और उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

कृष्णा नदी जल विवाद


(Krishna River water dispute)

संदर्भ:

हाल ही में, कर्नाटक सरकार द्वारा महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों में बहने वाली कृष्णा नदी के पानी के आवंटन पर विवाद से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई हेतु एक पीठ गठित करने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी है।

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने पक्षकारों से विवाद को ‘मध्यस्थता’ के जरिए सुलझाने की संभावना के बारे में पूछा है?

संबंधित प्रकरण:

‘कृष्णा नदी जल विवाद’ (Krishna River water dispute) मामले की सुनवाई हेतु उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना एक खंडपीठ गठित की गयी थी।

हाल ही में, इन दोनों न्यायाधीशों ने, 10 जनवरी को एक तरह का उदहारण प्रस्तुत करते हुए अपने आप को उक्त मामले की सुनवाई से अलग कर लिया क्योंकि दोनों न्यायाधीश मूलतः महाराष्ट्र और कर्नाटक के निवासी है।

  • ‘कृष्णा नदी जल विवाद’ में महाराष्ट्र, कर्नाटक तेलंगाना और आंध्रप्रदेश राज्य शामिल हैं।
  • मामले से खुद को अलग करने वाले न्यायाधीश, जल विवाद का निर्णय करने हेतु गठित पीठ का हिस्सा होने के कारण, उनके खिलाफ आ रहे ईमेल और पत्रों की भाषा और प्रवृत्ति से परेशान थे।

अदालत में विवाद:

कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 नवंबर, 2011 को पारित आदेश से मुक्ति दिए जाने की मांग की गयी है। इस आदेश में अदालत ने, केंद्र सरकार को दिसंबर 2010 में ‘कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण II’ (KWDT) द्वारा कर्नाटक, तत्कालीन आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र को कृष्णा नदी के पानी का आवंटन करने संबंधी जारी अंतिम आदेश को, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 6(1) के तहत, आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित करने से रोक दिया था।

अधिकरण के आदेश का प्रकाशन, इसके कार्यान्वयन के लिए एक आवश्यक पूर्व-शर्त है।

कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) का निर्णय:

कृष्णा नदी जल विवाद की शुरुआत पूर्ववर्ती हैदराबाद और मैसूर रियासतों के बीच हुई थी, जोकि बाद में गठित महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों बीच जारी है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत वर्ष 1969 में  कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (Krishna Water Disputes TribunalKWDT) का गठन किया गया था, जिसके द्वारा वर्ष 1973 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी।

कृष्णा नदी जल विवाद न्यायाधिकरण की वर्ष 1976 में प्रकाशित रिपोर्ट में कृष्णा नदी जल के 2060 TMC (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) को 75 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर तीन भागों में पर विभाजित किया गया था:

  1. महाराष्ट्र के लिए 560 TMC
  2. कर्नाटक के लिए 700 TMC
  3. आंध्र प्रदेश के लिए 800 TMC

 

संशोधित आदेश:

राज्यों के मध्य असंतोष व्यक्त किये जाने पर वर्ष 2004 में दूसरे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) का गठन किया गया।

  • दूसरे KWDT द्वारा वर्ष 2010 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। इस रिपोर्ट में 65 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर कृष्णा नदी के अधिशेष जल का 81 TMC महाराष्ट्र को, 177 TMC कर्नाटक को तथा 190 TMC आंध्र प्रदेश के लिये आवंटित किया गया था।

आदेश अभी तक प्रकाशित क्यों नहीं किया गया?

वर्ष 2014 में तेलंगाना को एक अलग राज्य के रूप में गठित किये जाने के पश्चात, आंध्र प्रदेश द्वारा तेलंगाना को KWDT में एक अलग पक्षकार के रूप में शामिल करने और कृष्णा नदी-जल को तीन के बजाय चार राज्यों में आवंटित किये जाने की मांग की जा रही है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘सीमापारीय जल-धाराओं और अंतर्राष्ट्रीय झीलों के संरक्षण एवं उपयोग पर अभिसमय’ (Convention on the Protection and Use of Transboundary Watercourses and International Lakes) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कृष्णा की सहायक नदियाँ
  2. गोदावरी की सहायक नदियाँ
  3. भारत में पूर्व तथा पश्चिम की बहने वाली नदियाँ
  4. अंतरराज्यीय नदी जल विवाद- प्रमुख प्रावधान
  5. कृष्णा एवं गोदावरी नदी प्रबंधन बोर्ड- गठन, कार्य और अधिदेश

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

अकादमिक क्रेडिट बैंक


(Academic Bank of Credit)

संदर्भ:

देश में इस शैक्षणिक वर्ष से ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (Academic Bank of Credit – ABC) के लागू किए जाने की संभावना है। यद्यपि, इस योजना के कई लाभ और दोष तथा ऐसे मुद्दे हैं, योजना के लागू होने से पहले जिनका समाधान किए जाने की अभी भी आवश्यकता है।

योजना से संबंधित चिंताएँ और चुनौतियाँ:

  • ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) से सुनियोजित एवं व्यवस्थित शिक्षा प्रभावित होगी। छात्रों को विभिन्न विश्वविद्यालयों से कॉलेज बदलने में मुश्किल हो सकती है।
  • जिस विश्वविद्यालय या कॉलेज में छात्र पढता है, नाम और शिक्षा की गुणवत्ता के संदर्भ में, उसके कॉलेज या विश्वविद्यालय बदलने के समय फर्क पड़ता है।
  • दूरस्थ संस्थानों पर प्रभाव: केवल ‘राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद’ (NAAC) द्वारा सूचीबद्ध संस्थान ही ‘अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ में शामिल हो सकते हैं। यह प्रावधान, पहले से ही हाशिए पर स्थित दूरस्थ संस्थानों को और अधिक हाशिए पर जाने के लिए विवश कर सकता है।
  • ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ को लागू करने हेतु अपनी नीतियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता पर, विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा शासित विभिन्न राज्यों के बीच हितों का टकराव हो सकता है।
  • पहले से ही काफी अधिक मांग वाले प्रमुख संस्थानों में, ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ के तहत छात्रों को अतिरिक्त सीटें प्रदान करने से संस्थानों के लिए अतिरिक्त लागत वहन करनी होगी।

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) क्या है?

  • ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ को ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ (UGC) द्वारा स्थापित किया जाएगा।
  • इसके तहत, छात्रों के लिए किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश करने और उसे पूरा करने के कई विकल्प दिए जाएंगे।
  • ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ के तहत, छात्रों के लिए किसी डिग्री या पाठ्यक्रम को छोड़ने और संबंधित प्रमाण पत्र प्राप्त करने का विकल्प दिया जाएगा। एक निश्चित समय के पश्चात, छात्र, अपनी अधूरी छोड़ी हुई पढाई को उसी स्तर से पुनः शुरू कर सकते हैं।
  • इसके द्वारा छात्रों को किसी डिग्री को पूरा करते समय या किसी पाठ्यक्रम को छोड़ने के दौरान संस्थान बदलने की सुविधा भी प्रदान की जाएगी।

कार्यविधि:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ एक वर्चुअल स्टोर-हाउस है, जो एक छात्र के ‘एकेडमिक क्रेडिट’ का रिकॉर्ड रखेगा। यह, सीधे छात्रों से किसी भी पाठ्यक्रम के कोई क्रेडिट कोर्स दस्तावेज़ स्वीकार नहीं करेगा, बल्कि केवल उच्च शिक्षा संस्थानों से, छात्रों के खातों में जमा ‘क्रेडिट कोर्स’ दस्तावेज़ों को स्वीकार करेगा।

लाभ:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ क्रेडिट सत्यापन, क्रेडिट संचय, क्रेडिट ट्रांसफर, छात्रों के विमोचन और छात्रों के प्रमोशन में मदद करेगा।

आसन शब्दों में:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (Academic Bank of Credit) के तहत, कोई भी छात्र, कई प्रवेश और निकास विकल्पों की सहूलियत के साथ, किसी भी उच्च शिक्षा संस्थान से डिग्री हासिल कर सकता है। एक ही कॉलेज में तीन साल बिताने के बजाय, कोई छात्र एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में आसानी से स्विच कर सकता है। डिग्री हासिल करने के लिए, छात्र के लिए अपने अकाउंट (खाते) में एक निश्चित संख्या में ‘क्रेडिट’ रखना आवश्यक होगा।

  • उदाहरण के लिए, यदि बीकॉम का कोई छात्र, किसी कॉलेज में पढ़ता है, तो एक साल बाद वह अपना कॉलेज बदल भी सकता है। और, एक अंतराल के बाद उसी कोर्स में शामिल हो सकता है।
  • तब तक, छात्र द्वारा उस एक वर्ष में अर्जित ‘क्रेडिट’ उसके ABC अकाउंट में रखे जाएंगे तथा छात्र द्वारा किसी अन्य कॉलेज में उसी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने पर, इन ‘क्रेडिट्स’ का उपयोग किया जा सकता है।

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के बारे में अधिक जानने हेतु पढ़ें

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ को ‘नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी – एक वर्चुअल स्टोरहाउस’ की तर्ज पर तैयार किया गया है। ‘नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी’ क्या है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP) के बारे में
  2. ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) क्या है?
  3. विशेषताएं

मेंस लिंक:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत एवं उसके पड़ोसी- संबंध।

स्थायी सिंधु आयोग


(Permanent Indus Commission)

संदर्भ:

एक से तीन मार्च के तक चलने वाली ‘स्थायी सिंधु आयोग’ (Permanent Indus Commission) की वार्षिक बैठक में भाग लेने हेतु 10 सदस्यीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान का दौरा करेगा।

‘सिंधु जल संधि’ (Indus Water Treaty) के तहत, प्रति वर्ष 31 मार्च तक कम से कम एक बार, बारी-बारी से भारत और पाकिस्तान में नियमित रूप से ‘स्थायी सिंधु आयोग’ की बैठक आयोजित किया जाना अनिवार्य है।

महत्व:

दोनों देशों के बीच ‘सिंधु जल समझौते’ पर हस्ताक्षर के बाद, भारतीय प्रतिनिधिमंडल में पहली बार तीन महिला अधिकारी भी भाग लेंगी, तथा बैठक के दौरान विभिन्न मुद्दों पर भारतीय आयुक्त को सलाह देगी।

बैठक में चर्चा के केंद्रीय बिंदु:

बैठक के एजेंडे में, जम्मू और कश्मीर में चिनाब बेसिन में ‘पाकल दुल’ (Pakal Dul) (1,000 मेगावाट), लोअर कलनई (Lower Kalnai) (48 मेगावाट) और किरू (Kiru) (624 मेगावाट) और लद्दाख में स्थापित की जाने वाली कुछ छोटी जलविद्युत परियोजनाओं पर पाकिस्तान की आपत्तियों पर चर्चा होने की संभावना है।

सिंधु जल संधि के बारे में:

यह एक जल-वितरण समझौता है, जिस पर वर्ष 1960 में, विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी के जल का बटवारा:

सिंधु जल समझौते (Indus Water Treaty – IWT) के अनुसार, तीन पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलज- के पानी पर भारत को पूरा नियंत्रण प्रदान किया गया।

पाकिस्तान द्वारा पश्चिमी नदियों- सिंधु, चिनाब और झेलम – को नियंत्रित किया जाता है।

  • 1960 में भारत और पाकिस्तान के मध्य हस्ताक्षरित ‘सिंधु जल संधि’ के प्रावधानों के तहत, पूर्वी नदियों – सतलुज, ब्यास और रावी – की कुल जल की राशि का लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट (MAF) सालाना भारत को बिना रोक टोक के उपयोग करने के लिए आवंटित किया जाता है।
  • पश्चिमी नदियों – सिंधु, झेलम और चिनाब – का लगभग 135 MAF जल सालाना, पूरी तरह से पाकिस्तान द्वारा उपयोग किया जाता है।

जलविद्युत उत्पादन का अधिकार:

  • सिंधु जल समझौते के तहत, भारत को ‘डिजाइन और संचालन के लिए विशिष्ट मानदंडों के अधीन’ पश्चिमी नदियों पर बहती हुई नदी पर परियोजनाओं (Run of the River Projects) के माध्यम से जलविद्युत उत्पन्न करने का अधिकार दिया गया है।
  • समझौते के तहत, पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों पर भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन पर चिंता व्यक्त करने का अधिकार भी है।

स्थायी सिंधु आयोग:

स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission), भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों की सदस्यता वाला एक द्विपक्षीय आयोग है, इसका गठन सिंधु जल संधि, 1960 के लक्ष्यों को कार्यान्वित करने तथा  इनका प्रबंधन करने के लिए किया गया था।

  • ‘सिंधु जल समझौते’ के अनुसार, इस आयोग की, वर्ष में कम से कम एक बार, बारी-बारी से भारत और पाकिस्तान में नियमित रूप से बैठक आयोजित की जानी चाहिए।

आयोग के कार्य:

  • नदियों के जल संबंधी किसी भी समस्या का अध्ययन करना तथा दोनो सरकारों को रिपोर्ट करना।
  • जल बंटवारे को लेकर उत्पन्न विवादों को हल करना।
  • परियोजना स्थलों और नदी के महत्वपूर्ण सिरों पर होने वाले कार्यों के लिए तकनीकी निरीक्षण की व्यवस्था करना।
  • प्रत्येक पाँच वर्षों में एक बार, तथ्यों की जांच करने के लिए नदियों के निरीक्षण हेतु एक सामान्य दौरा करना।
  • समझौते के प्रावधानों के कार्यान्वयन हेतु आवश्यक कदम उठाना।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सिंधु और उसकी सहायक नदियाँ।
  2. सिंधु जल समझौते पर हस्ताक्षर कब किए गए थे?
  3. समझौते को किसने भंग किया?
  4. समझौते की मुख्य विशेषताएं?
  5. स्थायी सिंधु आयोग के कार्य।
  6. इससे संबंधित चर्चित पनबिजली परियोजनाएं।

मेंस लिंक:

सिंधु जल समझौते के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

डार्क एनर्जी एवं डार्क मैटर


(Dark Energy and Dark Matter)

संदर्भ:

खगोलीय प्रेक्षणों से पता चलता है, कि ब्रह्मांड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा ‘डार्क मैटर’ (Dark Matter) से बना हुआ है, जोकि केवल गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के माध्यम से शेष ब्रह्मांड के साथ अंतःक्रिया करता है।

प्रयोगशालाओं में किए गए कई बड़े प्रयोगों में डार्क मैटर के संभावित ‘मौलिक कणों’ का पता लगाने की कोशिश की गयी है। हालांकि, अब तक इन डार्क मैटर कणों का पता नहीं चल सका है।

डार्क मैटर का आकलन:

शोधकर्ताओं द्वारा ‘लेंसिंग सिग्नेचर’ के ‘अप्रेक्षण’ (Non-Observation) अर्थात ‘लेंसिंग सिग्नेचर’ (Lensing Signatures) के दिखाई नहीं देने का उपयोग यह आकलन करने के लिए किया जाता है, कि ब्लैक होल का कितना भाग ‘डार्क मैटर’ से बना हुआ हो सकता है। चूंकि ‘गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग’ (Gravitational lensing) डार्क मैटर की मात्रा और वितरण के प्रति प्रत्यक्ष रूप से संवेदनशील होती है, अतः यह ‘ब्रह्मांड विज्ञानियों’ के लिए काफी उपयोगी होती है।

‘गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग’ एवं इसकी क्रियाविधि:

‘गुरुत्वाकर्षण लेंसिंग’, आइंस्टीन के ‘सामान्य सापेक्षता सिद्धांत’ (Theory of General Relativity) का एक प्रभाव है – सीधे शब्दों में कहें, तो ‘द्रव्यमान’, प्रकाश को मोड़ देता है।

  • किसी विशालकाय पिंड का गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र अंतरिक्ष में काफी दूर तक विस्तारित होता है, और उस पिंड के करीब से गुजरने वाली प्रकाश किरणों को (और अपने गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के माध्यम से) किसी अन्य दिशा में मोड़ने और दोबारा से केंद्रित करने का कारण बनता है।
  • पिंड, जितनी अधिक विशालकाय होता है, उसका गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र उतना ही सशक्त होता है और इसलिए प्रकाश किरणों का झुकाव भी अधिक होता है। जिस प्रकार ‘ऑप्टिकल लेंस’ बनाने के लिए सघन सामग्री का उपयोग करने से ‘अपवर्तन’ की मात्रा अधिक होती है।

‘डार्क एनर्जी’ क्या है?

अब तक जितना कुछ ज्ञात है उससे कही अधिक अज्ञात है। हम अंतरिक्ष में ‘डार्क एनर्जी’ (Dark Matter) की मौजूद मात्रा के बारे में जानते हैं, क्योंकि हम यह ज्ञात है कि यह ब्रह्मांड के विस्तार को किस प्रकार प्रभावित करती है। इसके अलावा, ‘डार्क एनर्जी’ एक पूर्ण रहस्य है। यह एक अति महत्वपूर्ण रहस्य है, क्योंकि ब्रह्मांड का लगभग 68% हिस्सा ‘डार्क एनर्जी’ से ही बना हुआ है।

  • ‘डार्क एनर्जी’ ऊर्जा का एक काल्पनिक रूप है, जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत व्यवहार करते हुए एक नकारात्मक, प्रतिकारक दबाव को दर्शाती है।
  • यह, हमारे ब्रह्मांड के विस्तार की दर को धीमा करने के बजाय समय के साथ तेज कर रही है, जोकि बिग बैंग से उत्पन्न हुए ब्रह्मांड से जो अपेक्षा की जा सकती है, उसके ठीक विपरीत है।

 

‘डार्क एनर्जी’, डार्क मैटर से किस प्रकार भिन्न है?

हम जो कुछ भी देखते हैं – ग्रह, चंद्रमा, विशाल आकाशगंगाएँ – यह ब्रह्मांड का 5% से भी कम हिस्सा हैं। पूरे ब्रह्मांड में, लगभग 27% डार्क मैटर है और 68% डार्क एनर्जी है।

  • ‘डार्क मैटर’ (Dark Matter), आकाशगंगाओं को परस्पर आकर्षित करता है और एक साथ जोड़कर रखता है, और ‘डार्क एनर्जी’ हमारे ब्रह्मांड के विस्तार का कारण बनती है।
  • डार्क मैटर के अस्तित्व का संकेत 1920 के दशक में मिल गया था, जबकि ‘डार्क एनर्जी’ की खोज वर्ष 1998 तक नहीं हुई थी।

 

XENON1T प्रयोग के बारे में:

यह विश्व का सबसे संवेदनशील ‘डार्क मैटर’ प्रयोग है, और इसे इटली की ‘INFN लेबोरेटोरी नाज़ियोनाली डेल ग्रान सासो’ (INFN Laboratori Nazionali del Gran Sasso) में भूमिगत रूप से काफी गहराई में संचालित किया जा रहा है।

इस प्रयोग में, दोहरे चरण (तरल/गैस) वाली ज़ीनान (XENON) तकनीक का उपयोग किया गया है।

सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत:

भौतिकी के प्रमुख सिद्धांतों में ‘डार्क एनर्जी’ को अंतरिक्ष का एक विशिष्ट गुण माना जाता है। ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ यह समझने वाले पहले व्यक्ति थे कि अंतरिक्ष मात्र खाली जगह नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि, अंतरिक्ष का विस्तार होना भी जारी रह सकता है। अन्य वैज्ञानिकों के विचार में ब्रह्माण्ड स्थिर था, इसे देखते हुए, आइंस्टीन ने अपने ‘सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत’ (Theory of General Relativity) में,  ‘ब्रह्माण्ड संबंधी स्थिरांक’ को शामिल किया था।

  • हबल दूरबीन से ब्रह्मांड के विस्तारित होने की जानकारी मिलने के बाद, आइंस्टीन ने अपने ‘स्थिरांक’ को अपनी “सबसे बड़ी भूल” कहा।
  • लेकिन, आइंस्टीन की यह भूल ‘डार्क एनर्जी’ को समझने के लिए सबसे उपयुक्त हो सकती है। यह अनुमान लगाते हुए कि ‘रिक्त स्थान’ की भी अपनी ऊर्जा हो सकती है, आइंस्टीन के ‘स्थिरांक’ इंगित करता है कि जैसे-जैसे अंतरिक्ष का निर्माण होता जाता है, ब्रह्मांड में अधिक ऊर्जा जुड़ती जाएगी, और इसका विस्तार होता जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप LUX-Zeplin और PandaX-xT प्रयोगों के बारे में जानते हैं? इनके बारे में जानने के लिए पढ़िए

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा का लूसी मिशन


(NASA’s Lucy mission)

संदर्भ:

‘लूसी मिशन’ (Lucy mission) के तहत भेजा गया अंतरिक्ष यान अगले 12 वर्षों में जिन कुछ क्षुद्रग्रहों का भ्रमण करेगा, ‘यूरीबेट्स’ (Eurybates) उन क्षुद्रग्रहों में से एक है।

  • हाल ही में, ‘लास वेगास’ में खगोलविदों ने एक तारे का अवलोकन करने के दौरान, उस तारे को कुछ समय के लिए गायब होते हुए देखा, क्योंकि ‘यूरीबेट्स’ क्षुद्रग्रह इस तारे के सामने से होकर गुजरा था।
  • जैसे ही यूरीबेट्स ने तारे को अपनी छाया में लिया – वैज्ञानिक शब्दावाली में इस घटना को ‘ग्रहण’ (Occultation) कहा जाता है- क्षुद्रग्रह के आकार की लगभग एक 40-मील- (64-किलोमीटर-) चौड़ी छाया इस क्षेत्र के ऊपर से गुजरती हुई देखी गयी।
  • इस जानकारी का उपयोग ‘लूसी मिशन’ के शोधकर्ताओं द्वारा, वर्ष 2027 में लूसी अंतरिक्ष यान के यूरीबेट्स के नजदीक से गुजरने के दौरान एकत्र किए गए डेटा को पूरा करने के लिए किया जाएगा।

‘आकल्टेशन’ या ‘ग्रहण’ क्या होता है?

  • एक खगोलीय पिंड के किसी अन्य खगोलीय पिंड के सामने से गुजरने के दौरान, पहला पिंड, दूसरे पिंड को पर्यवेक्षक की दृष्टि से ओझल कर देता है। इस जटिल परिघटना को ‘ग्रहण’‘ या ‘आकल्टेशन’ (Occultations) कहा जाता है।
  • इस परिघटना का सबसे प्रमुख उदाहरण ‘सूर्य ग्रहण’ है, जो चंद्रमा के सूर्य और पृथ्वी के बीच से होकर गुजरने पर घटित होती है। इस दौरान चंद्रमा, सूर्य को हमारी दृष्टि से ओझल कर देता है।

‘लूसी मिशन’ के बारे में:

यह, बृहस्पति ग्रह के ‘ट्रोजन क्षुद्रग्रहों’ (Trojan asteroids) का अन्वेषण करने हेतु नासा द्वारा भेजा जाने वाला पहला मिशन है।

  • यह मिशन, सौर ऊर्जा से संचालित है।
  • इस मिशन के पूरा होने में 12 साल से अधिक लंबा समय लगने का अनुमान है। इस दौरान, अंतरिक्ष यान “युवा सौर मंडल” के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लगभग 6.3 बिलियन किमी की यात्रा करते हुए ‘आठ क्षुद्रग्रहों’ का दौरा करेगा।

मिशन का उद्देश्य:

‘लूसी मिशन’ को ‘ट्रोजन क्षुद्रग्रहों’ के समूह में शामिल विविध क्षुद्रग्रहों की संरचना को समझने, क्षुद्रग्रहों के द्रव्यमान और घनत्व को निर्धारित करने तथा ट्रोजन क्षुद्रग्रहों की परिक्रमा करने वाले उपग्रहों और रिंगों को देखने और उनका अध्ययन करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

 

‘ट्रोजन क्षुद्रग्रह’ के बारे में:

‘ट्रोजन क्षुद्रग्रहों’ (Trojan asteroids) को प्रारंभिक सौर मंडल का अवशेष माना जाता है, और इनका अध्ययन करने से वैज्ञानिकों को इनकी उत्पत्ति, विकास और इनके वर्त्तमान स्वरूप को समझने में मदद मिलेगी।

माना जाता है, कि इन ‘क्षुद्रग्रहों’ की उत्पत्ति, लगभग 4 अरब साल पहले सौर मंडल का निर्माण होने के साथ ही हुई थी, और ट्रोजन क्षुद्रग्रहों का निर्माण, उन्ही पदार्थों से हुआ है, जिनसे सौर मंडल के अन्य ग्रह बने थे।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि नासा ने इस मिशन का नाम 3.2 मिलियन वर्ष पुरानी, ‘होमिनिन’ प्रजाति (जिसमें मानव और इसके पूर्वज) के पूर्वज ‘लूसी’ के नाम पर रखा है?

क्या आप जानते हैं कि क्षुद्रग्रहों को ‘तीन श्रेणियों’ में बांटा गया है?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) मानदंड


(Coastal Regulation Zone norms)

संदर्भ:

‘अवैध निर्माण’ एवं ‘तटीय विनियमन क्षेत्र’ (Coastal Regulation Zone – CRZ) नियमों के उल्लंघन की शिकायत मिलने के बाद बृहन्मुंबई नगर निगम (BMC) द्वारा जुहू में स्थित केंद्रीय मंत्री ‘नारायण राणे’ के बंगले का निरीक्षण पूरा कर लिया गया है।

संबंधित प्रकरण:

केंद्रीय मंत्री का बंगला ‘तटीय विनियमन क्षेत्र’ (CRZ) नियमों का उल्लंघन करते हुए, समुद्र से 50 मीटर दूरी के भीतर अवैध रूप से बनाया गया है।.

‘तटीय विनियमन क्षेत्र’ मानदंड:

  • भारत के पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 3 के तहत, पहली बार फरवरी 1991 में, ‘तटीय विनियमन क्षेत्र’ अधिसूचना जारी की गई थी।
  • वर्ष 2018 में, तटीय विनियमन क्षेत्र संबंधी नए नियम जारी किए गए। इनका उद्देश्य इस क्षेत्र में निर्माण पर लगे कुछ प्रतिबंधों को हटाना, अनापत्ति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करना और तटीय क्षेत्रों में पर्यटन को प्रोत्साहित करना था।

तटीय विनियमन क्षेत्र मानदंडों का उद्देश्य:

ये मानदंड, सागर तट से एक निश्चित दूरी के भीतर कुछ विशेष गतिविधियों, जैसे- बड़े निर्माण, नए उद्योगों की स्थापना, खतरनाक सामग्री का भंडारण या निपटान, खनन, भूमि-उपयोग परिवर्तन और बांध निर्माण पर रोक लगाते हैं।

‘विनियमन क्षेत्र’ की परिभाषा:

सभी नियमों में, विनियमन क्षेत्र (Regulation Zone) को उच्च-ज्वार रेखा से 500 मीटर तक के क्षेत्र के रूप में परिभाषित किया गया है।

CRZ में प्रतिबंध:

  • CRZ में प्रतिबंध, क्षेत्र की आबादी, पारिस्थितिक संवेदनशीलता, किनारे से दूरी तथा क्षेत्र के प्राकृतिक उद्यान अथवा वन्यजीव क्षेत्र के रूप में अधिसूचित होने जैसे मानदंडों पर निर्भर करते है।
  • नए नियमों के अनुसार, मुख्यभूमि के तट के निकटवर्ती सभी द्वीपों और मुख्य भूमि के सभी अप्रवाही जल वाले (Backwater) द्वीपों के लिए 20 मीटर की सीमा तक नो-डेवलपमेंट ज़ोन घोषित किया गया है।

CRZ-III (ग्रामीण) के लिए प्रतिबंधो की दो भिन्न श्रेणियों को निर्धारित किया गया है:

  • वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, 2,161 प्रति वर्ग किमी जनसंख्या घनत्व सहित घनी आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों (CRZ-IIIA) में, नो-डेवलपमेंट ज़ोन की सीमा, उच्च-ज्वार रेखा से 50 मीटर तक निर्धारित की गयी है, जबकि पहले यह सीमा 200 मीटर थी।
  • CRZ-IIIB श्रेणी (2,161 प्रति वर्ग किमी से कम जनसंख्या घनत्व वाले ग्रामीण क्षेत्र) में नो-डेवलपमेंट ज़ोन की सीमा, उच्च-ज्वार रेखा से 200 मीटर तक निर्धारित की गयी है।

कार्यान्वयन:

हालांकि, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) संबंधी नियम केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा बनाए गए हैं, किन्तु, इनका कार्यान्वयन तटीय क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरणों (Coastal Zone Management Authorities) के माध्यम से राज्य सरकारों द्वारा किया जाता है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CRZ मानदंड क्या हैं?
  2. CRZ की परिभाषा
  3. तटीय विनियमन क्षेत्रों का वर्गीकरण
  4. CRZ-III (ग्रामीण) क्षेत्रों के अंतर्गत श्रेणियाँ

मेंस लिंक:

पर्यावरणीय न्याय और वितरणात्मक न्याय के दृष्टिकोण से तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) नियमों का क्या तात्पर्य है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


डोडा ब्रांड उत्पाद

हाल ही में, ‘लैवेंडर’ (Lavender) को एक ‘डोडा ब्रांड उत्पाद’ (Doda Brand Product) के रूप में नामित किया गया है।

  • ‘डोडा’, भारतीय केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर के ‘डोडा जिले’ का एक कस्बा और अधिसूचित क्षेत्र समिति है।
  • डोडा भारत की बैंगनी क्रांति (अरोमा मिशन) का जन्मस्थान है और कृषि-स्टार्टअप उद्यमियों और किसानों को आकर्षित करने के लिए मोदी सरकार की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ पहल के तहत लैवेंडर को बढ़ावा दिया जा सकता है।

 

मिंस्क समझौता

(Minsk Agreements)

हाल ही में, अमेरिकी अधिकारियों ने रूस को यूक्रेन पर आक्रमण नहीं करने की चेतावनी दी है और दोनों देशों से, पूर्वी यूक्रेन में रूसी प्रवक्ताओं द्वारा अलगाववादी युद्ध को समाप्त करने के लिए डिज़ाइन किए गए 2014 और 2015 में मिन्स्क में हस्ताक्षरित समझौतों पर लौटने का आग्रह किया है।

पहला मिंस्क समझौता (Minsk I): यूक्रेन और रूसी समर्थित अलगाववादियों ने सितंबर 2014 में बेलारूस की राजधानी मिंस्क में 12-सूत्रीय संघर्ष विराम समझौते पर सहमति व्यक्त की।

  • इसके प्रावधानों में कैदियों का आदान-प्रदान, मानवीय सहायता का वितरण और भारी हथियारों को तैनाती से हटाया जाना शामिल थे।
  • दोनों पक्षों द्वारा उल्लंघन किए जाने से यह समझौता शीघ्र ही टूट गया।

दूसरा मिंस्क समझौता (Minsk II):

  • वर्ष 2015 में, फ्रांस और जर्मनी की मध्यस्थता के तहत,दूसरे मिंस्क शांति समझौते’ पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद एक खुला संघर्ष टल गया था।
  • इस समझौते को विद्रोही क्षेत्रों में लड़ाई समाप्त करने और सीमा को यूक्रेन के राष्ट्रीय सैनिकों को सौंपने के लिए तैयार किया गया था।

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