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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 3 February 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव

2. आपराधिक कानूनों में संशोधन

3. लोकायुक्त की शक्तियों को सीमित करने संबंधी प्रस्ताव

4. चुनावी बांड

5. स्थायी सिंधु आयोग

 

सामान्य अध्ययनIII

1. आभासी डिजिटल संपत्ति

2. इसरो द्वारा हैक-प्रूफ क्वांटम संचार का प्रदर्शन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. आंध्र प्रदेश का CLAP अभियान

2. हाइनीट्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल (HNLC)

3. केसर का कटोरा परियोजना

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।

राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव


(Motion of thanks to President’s Address)

संदर्भ:

बजट सत्र की शुरुआत में, भारत के राष्ट्रपति, संसद की संयुक्त बैठक को संबोधित करते हैं। राष्ट्रपति के अभिभाषण में, आमतौर पर पिछले एक साल के दौरान सरकार की उपलब्धियों और भविष्य के लिए लक्ष्यों और योजनाओं की रूपरेखा पर प्रकाश डाला जाता है।

इस संबोधन के पश्चात राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव (Motion of thanks to President’s Address) पर चर्चा की जाती है।

धन्यवाद प्रस्ताव:

राष्ट्रपति के अभिभाषण के पश्चात प्रत्येक सदन में सत्तापक्ष के सांसदों द्वारा ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ (Motion of thanks) प्रस्तुत किया जाता है।

  • इस दौरान, राजनीतिक दल धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा करते हैं तथा संशोधन करने हेतु सुझाव भी देते हैं।
  • ‘राष्ट्रपति का अभिभाषण’ और ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ की कार्रवाई, संविधान के अनुच्छेद 86(1) और 87(1) और लोकसभा में प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमवाली के नियम 16 ​​से लेकर नियम 24 तक के अनुसार की जाती है।

‘धन्यवाद प्रस्ताव’ में संशोधन:

राष्ट्रपति द्वारा सदन को संबोधित करने के पश्चात, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ में संशोधन सदन के पटल पर पेश किया जा सकता है।

  • संशोधन में अभिभाषण में निहित मामलों के साथ-साथ उन विषयों को भी संदर्भित किया जा सकता है, जिनका, संशोधन प्रस्ताव पेश करने वाले सदस्य की राय में, अभिभाषण में उल्लेख नहीं किया गया था।
  • ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ में संशोधन को, अध्यक्ष अपने विवेकानुसार उचित तरीके से पेश कर सकता है।

सीमाएं:

  • ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ के तहत, सदस्य उन विषयों पर चर्चा नहीं कर सकते हैं, जिनके लिए केंद्र सरकार प्रत्यक्ष रूप से जिम्मेदार नहीं होती है।
  • इसके अलावा, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान राष्ट्रपति का उल्लेख नहीं किया जा सकता, क्योंकि अभिभाषण की विषयवस्तु राष्ट्रपति द्वारा नहीं, बल्कि केंद्र सरकार द्वारा तैयार की जाती है।

‘धन्यवाद प्रस्ताव’ किस प्रकार पारित होता है?

संसद सदस्यों द्वारा ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ पर मतदान किया जाता है। यह प्रस्ताव, दोनों सदनों में पारित होना आवश्यक होता है।

‘धन्यवाद प्रस्ताव’ के पारित न होने को, सरकार की हार समझा जाता है और यह सरकार के पतन का कारण बन सकता है। यही कारण है, कि ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ को ‘अविश्वास प्रस्ताव’ के समान माना जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि यदि राष्ट्रपति के अपने भाषण की विषयवस्तु से असहमत होने की स्थिति में क्या होता है? क्या ऐसी स्थिति में भी वह अपने भाषण को पढ़ने के लिए बाध्य होते हैं?

क्या आप ‘पहले संविधान संशोधन’ के बारे में जानते हैं? मूल रूप से, संविधान में राष्ट्रपति द्वारा “प्रत्येक सत्र” के प्रारंभ में संसद के दोनों सदनों को संबोधित करने का प्रावधान किया गया था। इस प्रावधान को संविधान में पहले संशोधन द्वारा बदल दिया गया।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘धन्यवाद प्रस्ताव’ क्या है?
  2. संशोधन
  3. यह किस प्रकार पारित होता है?
  4. इससे संबंधित प्रावधान
  5. राष्ट्रपति का अभिभाषण
  6. राष्ट्रपति के अभिभाषण हेतु प्रकियाएं
  7. पहला संविधान संशोधन
  8. यदि राष्ट्रपति अपने भाषण की विषयवस्तु से असहमत होता हैं, तो क्या वह इसे पढ़ने के लिए बाध्य होता हैं?

मैंस लिंक:

‘धन्यवाद प्रस्ताव’ क्या है? इसके महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

आपराधिक कानूनों में संशोधन


(Amendments to Criminal Laws)

संदर्भ:

हाल ही में, सरकार द्वारा राज्यसभा को सूचित करते हुए दी गयी जानकारी के अनुसार, ‘आपराधिक कानूनों में व्यापक संशोधनों’ (Amendments to Criminal Laws) के लिए प्रक्रिया शुरू कर दी गयी है।

यह जानकारी सरकार ने लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर देते हुए प्रदान की, जिसमे पूछा गया था कि, क्या केंद्र सरकार ने ‘वैवाहिक बलात्कार’ (Marital Rape) को भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध के रूप में शामिल करने पर कोई निर्णय लिया है?)।

वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण:

कृपया ध्यान दें, कि ‘दिल्ली उच्च न्यायालय’ में वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण किए जाने की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी है।

  • इस विषय पर व्यापक विचार-विमर्श की जरूरत बताते हुए, केंद्र सरकार द्वारा इस मुद्दे पर अपना रूख स्पष्ट करने के लिए पहले ही अतरिक्त समय मांगा जा चुका है।
  • उच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं में, आईपीसी की धारा 375 के तहत ‘अपवाद’ को खत्म करने की मांग की गई है। इस ‘अपवाद’ अथवा ‘छूट’ के तहत, यदि पत्नी की आयु 15 वर्ष से अधिक है, तो पति द्वारा जबरन यौन संबंध बनाने को ‘बलात्कार’ का अपराध नहीं माना जाता है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 375:

‘भारतीय दंड संहिता’ की धारा 375 (Section 375 of the Indian Penal Code), में एक पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ जबरदस्ती यौन संभोग को एक विशिष्ट शर्त के साथ बलात्कार के अपराध से ‘छूट’ दी गयी है। इस छूट को “वैवाहिक बलात्कार अपवाद” (Marital Rape Exception) के रूप में भी जाना जाता है।

आईपीसी की धारा 375 के अनुसार, “यदि पत्नी की आयु 15 वर्ष से कम नहीं है तो, अपनी पत्नी के साथ एक पुरुष द्वारा संभोग करना, बलात्कार नहीं है”।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के निष्कर्ष:

  • कभी भी विवाहित रह चुकी अथवा वर्तमान में विवाहित महिलाओं में से 7% महिलाओं को वैवाहिक यौन हिंसा का सामना करना पड़ा है।
  • 15-49 आयु वर्ग की विवाहित रह चुकी अथवा वर्तमान में विवाहित एवं वैवाहिक यौन हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं में से 83% महिलाओं ने अपने वर्तमान पति को, और 9% महिलाओं ने अपने पूर्व पति को यौन हिंसा करने वाला अपराधी बताया है।

वैवाहिक बलात्कार से छूट संबंधी वर्तमान विवाद:

यद्यपि, सरकार कई मौकों पर कह चुकी है, कि ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध घोषित करने से ‘विवाह- संस्था’ संकट में पड़ जाएगी, किंतु विशेषज्ञों के अनुसार, ‘निजता के अधिकार’ सहित शीर्ष अदालत द्वारा दिए गए हाल के फैसलों ने सरकार के इस तर्क को कमजोर कर दिया है।

सरकार के इस दृष्टिकोण पर प्रश्नवाचक चिह्न लगाने वाले हालिया फैसले:

  • ‘इंडिपेंडेंट थॉट बनाम भारत संघ’ (Independent Thought vs. Union of India) मामले में अक्टूबर 2017 का फैसला। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ‘नाबालिग पत्नी के साथ बलात्कार’ को अपराध घोषित कर दिया था।
  • न्यायमूर्ति के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (सितंबर 2018) मामले में, शीर्ष अदालत ने सर्वसम्मति से संविधान द्वारा गारंटीकृत प्रत्येक व्यक्ति की ‘निजता के मौलिक अधिकार’ को मान्यता प्रदान की थी।
  • ‘जोसेफ शाइन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामला (अक्टूबर 2018)। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा ‘व्यभिचार’ (Adultery) को अपराध घोषित करते हुए इसकी भर्त्सना की थी।

वैवाहिक बलात्कार के पीड़ितों के लिए उपलब्ध उपाय:

पीड़ितों के पास ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम’, 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) के तहत प्रदान किए गए नागरिक उपचार का ही सहारा होता है।

वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किए जाने की आवश्यकता:

  1. कई अध्ययनों के अनुसार, अपनी पत्नियों के साथ गैर-सहमति से यौन संबंध बनाना और शारीरिक रूप से अपनी पत्नियों को यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करना एक आम बात पायी गयी है।
  2. विवाह एक ‘समान-संबंधों’ का अनुबंध होता है, और यह हर चीज के लिए एक बार में ही प्रदान की गयी सहमति नहीं है।
  3. कानून में ‘पति को बलात्कार करने की दी गयी विधिक छूट’ पुरुषों को असमान विशेषाधिकार प्रदान करती है।
  4. वैवाहिक बलात्कार से पीड़ित महिलाओं को दीर्घ-गामी मनोवैज्ञानिक चोट झेलनी पड़ती है।
  5. धारा 375 के तहत अपवाद, महिला को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करता है।
  6. भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक प्रकृति से पुरुषों के दिमाग में यह बात बस जाती है, कि महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि जब उनके पति सेक्स की मांग करें तो वे इसका पालन करें।
  7. वैवाहिक बलात्कार से पीड़ित महिला को शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है, साथ ही उसकी मर्यादा भंग होने का मानसिक आघात भी सहना पड़ता है।

‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध घोषित करने के विपक्ष में तर्क:

  1. ‘वैवाहिक बलात्कार’ (Marital Rape) को अपराध घोषित किया जाना, “पति को परेशान करने का एक आसान साधन होने के अलावा विवाह की संस्था को अस्थिर कर सकता है”।
  2. दहेज कानून के रूप में जाना जाने वाली ‘आईपीसी की धारा 498A’ का दुरुपयोग “पतियों को परेशान करने के लिए” किया जाता है।
  3. अन्य देशों, ज्यादातर पश्चिमी देशों द्वारा ‘वैवाहिक बलात्कार’ को अपराध घोषित किया जा चुका है, इसका मतलब यह नहीं है कि आँख बंद करके उनका अनुसरण करते हुए भारत को भी ऐसा करना चाहिए।
  4. ‘बलात्कार कानूनों की समीक्षा हेतु गठित विधि आयोग’ ने इस मुद्दे की जांच की है, और वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण किए जाने के संबंध में कोई सिफारिश नहीं की है।
  5. जो यौन संबंध पत्नी के लिए ‘वैवाहिक बलात्कार’ प्रतीत हो सकते हैं, हो सकता है कि वह दूसरों को ऐसा नहीं लगे।
  6. पुरुष और उसकी अपनी पत्नी के मध्य यौन-कार्यों के मामले में कोई स्थायी सबूत नहीं मिल सकता है।

आपराधिक कानून में सुधार हेतु गठित समिति:

  • गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा आपराधिक कानून में सुधार करने हेतु एक राष्ट्रीय स्तर की समिति का गठन किया है।
  • इस समिति के अध्यक्ष रणबीर सिंह (कुलपति,नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली) हैं।
  • यह समिति, सरकार को दी जाने वाली रिपोर्ट के लिए, विशेषज्ञों से ऑनलाइन परामर्श करके विचार एकत्र करेगी और उपलब्ध सामग्री का मिलान करेगी।

आपराधिक कानूनों से संबंधित पिछली समितियाँ:

  • माधव मेनन समिति: इसने 2007 में CJSI में सुधारों पर विभिन्न सिफारिशों का सुझाव देते हुए अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
  • मलिमथ कमेटी की रिपोर्ट: इसने अपनी रिपोर्ट 2003 में आपराधिक न्याय प्रणाली (CJSI) पर प्रस्तुत की।

Current Affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि निर्भया गैंगरेप के बाद वर्ष 2013 में गठित ‘जे.एस. वर्मा कमेटी’ ने वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किए जाने की सिफारिश की थी? इस समिति की अन्य सिफारिशें के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मलिमथ कमेटी किससे संबंधित है?
  2. संविधान की 7 वीं अनुसूची के तहत आपराधिक कानून।
  3. भारत में आपराधिक कानूनों को किसने संहिताबद्ध किया?
  4. विवादास्पद IPC कानून।
  5. रणबीर सिंह समिति किससे संबंधित है?
  6. वैवाहिक बलात्कार।

मेंस लिंक:

भारत में आपराधिक न्याय सुधार पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

लोकायुक्त की शक्तियों को सीमित करने संबंधी प्रस्ताव


संदर्भ:

हाल ही में, केरल सरकार द्वारा एक अध्यादेश के माध्यम से ‘केरल लोकायुक्त अधिनियम’ (Kerala Lok Ayukta Act) में संशोधन करने का प्रस्ताव पेश किया गया है।

सरकार के इस कदम की विपक्ष ने आलोचना की है।

प्रस्तावित परिवर्तन:

  • सुनवाई का अवसर प्रदान करने के बाद, सरकार ‘लोकायुक्त’ के फैसले को स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।
  • वर्तमान में, ‘केरल लोकायुक्त अधिनियम’ की धारा 14 के तहत, लोकायुक्त द्वारा निर्देशित किए जाने पर एक लोक सेवक को पद खाली करना अनिवार्य है।

संशोधन के विरोध का कारण:

संशोधनों का विरोध दो कारणों से किया जा रहा है:

  1. अधिनियम के प्रावधान एक अध्यादेश के माध्यम से संशोधित किए जा रहे हैं, और इसलिए इस विषय पर कोई उचित चर्चा नहीं की गयी है।
  2. प्रस्तावित संशोधन, ‘केंद्रीय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम’, 2013 की मूल भावना का उल्लंघन करते है।

‘लोकायुक्त’ कौन होता है?

‘केंद्रीय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम’, 2013 (The central Lokpal and Lokayuktas Act, 2013), 1 जनवरी 2014 को अधिसूचित किया गया था।

  • राज्य में ‘लोकायुक्त’ केंद्र में ’लोकपाल’ के समान पद होता है।
  • मूल रूप से, केंद्रीय क़ानून में अनिवार्यतः हर राज्य में ‘लोकायुक्त’ नियुक्त किए जाने की परिकल्पना की गई थी।
  • हालांकि, इस प्रावधान का विरोध होने के बाद, केंद्रीय कानून में केवल एक फ्रेमवर्क का निर्धारण किया गया, तथा इसके बारे में विशिष्ट प्रावधान निर्धारित करने का कार्य राज्यों पर छोड़ दिया गया।

इस संबंध में, क़ानून के तहत राज्यों को अपने स्वयं के कानून बनाने की स्वायत्तता प्रदान की गयी है, अतः हर राज्य में विभिन्न पहलुओं – जैसेकि कार्यकाल, और अधिकारियों पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी की आवश्यकता आदि के संदर्भ में लोकायुक्त की शक्तियाँ अलग-अलग होती हैं।

‘लोकपाल’ कौन होता है?

‘केंद्रीय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम’ में एक ‘लोकपाल’ (Lokpal) का गठन किए जाने का प्रावधान किया गया है।

  • यह एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमे एक अध्यक्ष (चेयरपर्सन) और अधिकतम 8 सदस्यों शामिल होंगे है।
  • ‘लोकपाल’ का अध्यक्ष भारत का पूर्व मुख्य न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायालय का पूर्व न्यायाधीश या निर्दिष्ट पात्रता मानदंडों को पूरा करने वाला एक प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा।

सदस्य:

इसके आठ अधिकतम सदस्यों में से आधे न्यायिक सदस्य तथा न्यूनतम 50 प्रतिशत सदस्य अनु. जाति/अनु. जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग/अल्पसंख्यक और महिला श्रेणी से होने चाहिये।

भूमिकाएं और कार्य:

लोकपाल और लोकायुक्त द्वारा ‘लोक सेवकों’ के खिलाफ शिकायतों का समाधान किया जाएगा। लोकपाल के क्षेत्राधिकार में प्रधानमंत्री, मंत्री, संसद सदस्य, समूह ए, बी, सी और डी अधिकारी तथा केंद्र सरकार के अधिकारी शामिल होंगे।

  • लोकपाल की नियुक्ति, मार्च 2019 में हुई थी और, संबंधित नियम बनाए जाने के पश्चात इसने मार्च 2020 से कार्य करना शुरू कर दिया।
  • वर्तमान में ‘लोकपाल’ के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश ‘पिनाकी चंद्र घोष’ हैं।

इस प्रकार के संस्थानों की आवश्यकता:

  • कुशासन (Maladministration) एक दीमक की तरह है जो एक राष्ट्र की नींव को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है और प्रशासन को अपना कार्य पूरा करने से रोकता है।
  • इस समस्या का मूल कारण ‘भ्रष्टाचार’ (Corruption) है। अधिकांश भ्रष्टाचार रोधी संस्थाएं स्वतंत्र रूप से कार्य नहीं कर पाती हैं। यहां तक ​​कि सुप्रीम कोर्ट भी सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ और ‘उसके मालिक की आवाज’ बता चुका है।
  • इनमें से कई एजेंसियां मात्र एक सलाहकार निकाय हैं और इनके पास कोई प्रभावी शक्ति नहीं है। इनकी सलाह का शायद ही कभी पालन किया जाता है।
  • इन सबके अलावा, संस्थाओं के कामकाज में आंतरिक पारदर्शिता और जवाबदेही की समस्या भी है। साथ ही, इन एजेंसियों पर नियंत्रण करने के लिए कोई अलग और प्रभावी तंत्र नहीं है।

इस संदर्भ में, ‘लोकपाल’ नामक एक स्वतंत्र संस्था, भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐतिहासिक कदम है, जिसने भ्रष्टाचार के कभी न खत्म होने वाले खतरे का समाधान पेश किया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘केंद्रीय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम’, 2013 पारित करने के समय, मध्य प्रदेश और कर्नाटक सहित कुछ राज्यों में, पहले से ही ‘लोकायुक्त’ कार्य कर रहे थे?

‘लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम’, 2013 के अनुसार ‘जांच निदेशक’ कौन होता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. किन राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति नहीं की गयी है?
  2. लोकायुक्त नियुक्त करने वाला भारत का पहला राज्य कौन सा था?
  3. लोकायुक्त की नियुक्ति कौन करता है?
  4. शक्तियाँ और कार्य।
  5. पात्रता।
  6. लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 का अवलोकन।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: शासन व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण पक्ष, ई-गवर्नेंस- अनुप्रयोग, मॉडल, सफलताएँ, सीमाएँ और संभावनाएँ; नागरिक चार्टर, पारदर्शिता एवं जवाबदेही और संस्थागत तथा अन्य उपाय।

चुनावी बांड


(Electoral Bonds)

संदर्भ:

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया द्वारा इस वर्ष जनवरी माह के दौरान कुल ₹1,213 करोड़ के ‘चुनावी बांड’ (Electoral Bonds) बेचे गए।

इनमे से अधिकांश बांड्स (₹784.84 करोड़) को एसबीआई की नई दिल्ली शाखा में भुनाया गया, जोकि राष्ट्रीय पार्टियों को मिलने वाले चंदे की ओर इशारा करता है। जबकि ‘चुनावी बांड’ की सर्वाधिक बिक्री (₹489.6 करोड़ कीमत के) एसबीआई की मुंबई शाखा से हुई।

Current Affairs

 

चुनावी बांड्स / ‘इलेक्टोरल बांड’ क्या होते हैं?

  • चुनावी बॉन्ड / ‘इलेक्टोरल बांड’ (Electoral Bond), राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए एक वित्तीय साधन है।
  • इन बांड्स के लिए, 1,000 रुपए, 10,000 रुपए, 1 लाख रुपए, 10 लाख रुपए और 1 करोड़ रुपए के गुणकों में जारी किया जाता है, और इसके लिए कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की गयी है।
  • इन बॉन्डों को जारी करने और भुनाने के लिए ‘भारतीय स्टेट बैंक’ को अधिकृत किया गया है। यह बांड जारी होने की तारीख से पंद्रह दिनों की अवधि के लिए वैध होते हैं।
  • ये बॉन्ड किसी पंजीकृत राजनीतिक दल के निर्दिष्ट खाते में प्रतिदेय होते हैं।
  • ये बांड, केंद्र सरकार द्वारा निर्दिष्ट जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर महीनों में प्रत्येक दस दिनों की अवधि में किसी भी व्यक्ति द्वारा खरीदे जा सकते है, बशर्ते उसे भारत का नागरिक होना चाहिए अथवा भारत में निगमित या स्थित होना चाहिए ।
  • कोई व्यक्ति, अकेले या अन्य व्यक्तियों के साथ संयुक्त रूप से इन बांड्स को खरीद सकता है।
  • बांड्स पर दान देने वाले के नाम का उल्लेख नहीं होता है।

 

योजना से जुड़े मुद्दे:

‘इलेक्टोरल बॉन्ड’ योजना, पारंपरिक रूप से ‘अंडर-द-टेबल’ चंदा देने के खिलाफ एक प्रतिरोध के रूप में कार्य करती है, क्योंकि इसमें लेनदेन, चेक और डिजिटल रूप से किया जाता है। हालांकि, योजना के कई प्रमुख प्रावधान इसे अत्यधिक विवादास्पद बनाते हैं।

  • अनामिकता (Anonymity): योजना के तहत, अनुदान / चंदा देने वाला (जो व्यक्ति या कॉर्पोरेट कोई भी हो सकता है) अपनी जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं होता है, तथा राजनीतिक दल भी यह बताने के लिए बाध्य है कि चंदा किस व्यक्ति या निकाय से आया है।
  • असममित रूप से अपारदर्शी: चूंकि बांड भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के माध्यम से खरीदे जाते हैं, इसलिए सरकार हमेशा यह जानने की स्थिति में होती है कि दाता कौन है।
  • ब्लैकमनी का मार्ग: कॉरपोरेट डोनेशन पर 5% की अधिकतम सीमा को खत्म करना, प्रॉफिट एंड लॉस स्टेटमेंट्स में राजनीतिक अनुदान को प्रकट करने की आवश्यकता को खत्म करना आदि।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. चुनावी बांड क्या हैं?
  2. पात्रता
  3. बांड का मूल्यवर्ग
  4. विशेषताएं
  5. ये बांड कौन जारी कर सकता है?

मेंस लिंक:

पारदर्शी राजनीतिक वित्तपोषण सुनिश्चित करने में चुनावी बांड की प्रभावशीलता की आलोचनात्मक रूप से परीक्षण कीजिए तथा इसके लिए विकल्प सुझाएँ?

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत एवं उसके पड़ोसी- संबंध।

स्थायी सिंधु आयोग


(Permanent Indus Commission)

संदर्भ:

भारत और पाकिस्तान के मध्य ‘स्थायी सिंधु आयोग’ (Permanent Indus Commission) की वार्षिक बैठक होने वाली है, लेकिन अभी तक कोई कार्यक्रम तय नहीं किया गया है।

सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) के तहत, हर साल ‘स्थायी सिंधु आयोग’ की कम से कम एक बार बैठक आयोजित करना अनिवार्य है, और इसके अनुसार 31 मार्च को समाप्त हो रही है।

सिंधु जल संधि के बारे में:

यह एक जल-वितरण समझौता है, जिस पर वर्ष 1960 में, विश्व बैंक की मध्यस्थता से भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान ने हस्ताक्षर किए थे।

Current Affairs

 

भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी के जल का बटवारा:

सिंधु जल समझौते (Indus Water Treaty – IWT) के अनुसार, तीन पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलज- के पानी पर भारत को पूरा नियंत्रण प्रदान किया गया।

पाकिस्तान द्वारा पश्चिमी नदियों- सिंधु, चिनाब और झेलम – को नियंत्रित किया जाता है।

  • 1960 में भारत और पाकिस्तान के मध्य हस्ताक्षरित ‘सिंधु जल संधि’ के प्रावधानों के तहत, पूर्वी नदियों – सतलुज, ब्यास और रावी – की कुल जल की राशि का लगभग 33 मिलियन एकड़-फीट (MAF) सालाना भारत को बिना रोक टोक के उपयोग करने के लिए आवंटित किया जाता है।
  • पश्चिमी नदियों – सिंधु, झेलम और चिनाब – का लगभग 135 MAF जल सालाना, पूरी तरह से पाकिस्तान द्वारा उपयोग किया जाता है।

 

जलविद्युत उत्पादन का अधिकार:

  • सिंधु जल समझौते के तहत, भारत को ‘डिजाइन और संचालन के लिए विशिष्ट मानदंडों के अधीन’ पश्चिमी नदियों पर बहती हुई नदी पर परियोजनाओं (Run of the River Projects) के माध्यम से जलविद्युत उत्पन्न करने का अधिकार दिया गया है।
  • समझौते के तहत, पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों पर भारतीय जलविद्युत परियोजनाओं के डिजाइन पर चिंता व्यक्त करने का अधिकार भी है।

स्थायी सिंधु आयोग:

  • स्थायी सिंधु आयोग (Permanent Indus Commission), भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों की सदस्यता वाला एक द्विपक्षीय आयोग है, इसका गठन सिंधु जल संधि, 1960 के लक्ष्यों को कार्यान्वित करने तथा इनका प्रबंधन करने के लिए किया गया था।
  • ‘सिंधु जल समझौते’ के अनुसार, इस आयोग की, वर्ष में कम से कम एक बार, बारी-बारी से भारत और पाकिस्तान में नियमित रूप से बैठक आयोजित की जानी चाहिए।

आयोग के कार्य:

  • नदियों के जल संबंधी किसी भी समस्या का अध्ययन करना तथा दोनो सरकारों को रिपोर्ट करना।
  • जल बंटवारे को लेकर उत्पन्न विवादों को हल करना।
  • परियोजना स्थलों और नदी के महत्वपूर्ण सिरों पर होने वाले कार्यों के लिए तकनीकी निरीक्षण की व्यवस्था करना।
  • प्रत्येक पाँच वर्षों में एक बार, तथ्यों की जांच करने के लिए नदियों के निरीक्षण हेतु एक सामान्य दौरा करना।
  • समझौते के प्रावधानों के कार्यान्वयन हेतु आवश्यक कदम उठाना।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सिंधु और उसकी सहायक नदियाँ।
  2. सिंधु जल समझौते पर हस्ताक्षर कब किए गए थे?
  3. समझौते को किसने भंग किया?
  4. समझौते की मुख्य विशेषताएं?
  5. स्थायी सिंधु आयोग के कार्य।
  6. इससे संबंधित चर्चित पनबिजली परियोजनाएं।

मेंस लिंक:

सिंधु जल समझौते के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सरकारी बजट।

आभासी डिजिटल संपत्ति


(Virtual Digital Assets)

संदर्भ:

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने 1 फरवरी को दिए गए बजटीय भाषण में ‘वर्चुअल डिजिटल संपत्ति’ (Virtual Digital Assets) से होने वाली आय पर 30 प्रतिशत कर लगाने की घोषणा की है।

इस फैसले के पीछे का तर्क:

हाल के वर्षों में, डिजिटल माध्यम से होने वाले लेन-देन में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और इन लेनदेन की परिमाण और आवृत्ति की वजह से, एक विशिष्ट ‘कर व्यवस्था’ का प्रावधान करना अनिवार्य हो गया है।

‘वर्चुअल डिजिटल संपत्ति’ क्या हैं और ये ‘डिजिटल मुद्रा’ से किस प्रकार भिन्न हैं?

सरल शब्दों में कहा जाए, तो ‘वर्चुअल डिजिटल परिसंपत्तियों’ में क्रिप्टोकरेंसी, डीसेंट्रलाइज्ड फाइनेंस (Decentralised Finance – DeFi) और गैर-प्रतिमोच्य टोकन (Non-Fungible Tokens – NFTs) शामिल किया जाता है। प्रथम दृष्टया, इसमें डिजिटल सोना, केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) या कोई अन्य पारंपरिक डिजिटल परिसंपत्तियों को शामिल नहीं किया जाता है। इसलिए, सरकार के उपरोक्त कदम का उद्देश्य विशेष रूप से क्रिप्टोकरेंसी पर ‘कर’ लगाना है।

वित्त विधेयक के अनुसार, एक आभासी / वर्चुअल डिजिटल संपत्ति का तात्पर्य, “क्रिप्टोग्राफिक माध्यमों या किसी अन्य माध्यम से उत्पन्न होने वाली, चाहे उसे किसी भी कोई नाम से जाना जाता हो बशर्ते विनिमय के लिए डिजिटल रूप से इसका प्रतिनिधित्व करती हो, अंतर्निहित कीमत के वादे या प्रतिनिधित्व करने वाली, अथवा कीमत भंडार के रूप में कार्य करने वाली तथा जिसका प्रयोग किसी भी वित्तीय लेनदेन या निवेश में किया जाता है किंतु केवल निवेश योजनाओं तक सीमित नहीं हो, और जिसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से हस्तांतरित, संग्रहीत या कारोबार किया जा सकता हो, किसी भी जानकारी या कोड या संख्या या टोकन (भारतीय मुद्रा या किसी विदेशी मुद्रा के अलावा) से है”। ‘गैर-प्रतिमोच्य टोकन’ (Non fungible token) और इसी तरह की प्रकृति के किसी भी अन्य टोकन को ‘वर्चुअल डिजिटल संपत्ति’ की परिभाषा में शामिल किया गया है।”

क्या वर्चुअल डिजिटल संपत्तियों पर 30% कर लगाए जाने का अर्थ, भारत में मतलब क्रिप्टो संपत्तियों को वैध कर देना है?

एक ‘कर कानून’ कुछ भी कानूनी या अवैध नहीं बना सकता – इसकी वैधता एक अलग क़ानून के माध्यम से निर्धारित की जा सकती है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

इसरो द्वारा हैक-प्रूफ क्वांटम संचार का प्रदर्शन


(ISRO demonstrates hack-proof quantum communication)

संदर्भ:

उपग्रह आधारित क्वांटम संचार (Quantum Communication) की दिशा में एक बड़ा कदम आगे बढ़ाते हुए अहमदाबाद स्थित ‘अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र’ और ‘भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला’ के वैज्ञानिकों द्वारा हाल ही में, ‘क्वांटम उलझाव’ (Quantum Entanglement) का सफलतापूर्वक प्रदर्शन किया गया।

रीयल-टाइम ‘क्वांटम कुंजी वितरण’ (Quantum Key Distribution- QKD) तकनीक  का उपयोग करते हुए, वैज्ञानिकों ने 300 मीटर की दूरी रखते हुए दो अलग स्थानों के बीच हैक-प्रूफ संचार का प्रदर्शन किया।

महत्व:

  • ‘क्वांटम संचार’ दो स्थानों को, उच्च स्तर के कोड और क्वांटम क्रिप्टोग्राफी के माध्यम जोड़ने के सबसे सुरक्षित तरीकों में से एक है, जिसे किसी बाहरी उपकरण द्वारा डिक्रिप्ट या तोड़ा नहीं जा सकता है।
  • अगर कोई हैकर क्वांटम कम्युनिकेशन में किसी संदेश (मैसेज) को क्रैक करने की कोशिश करता है, तो संदेश अपना स्वरूप (फॉर्म) इस तरह से बदल लेता है, जिससे संदेश भेजने वाला सावधान हो जाता है और मैसेज को बदल देता है या डिलीट कर देता है।

Current Affairs

 

‘क्वांटम कुंजी वितरण’ (QKD) प्रौद्योगिकी के बारे में:

आदर्श रूप से कूटलेखन / एन्क्रिप्शन (Encryption) पारंपरिक गणित पर निर्भर होता है और अभी की जरूरतों के लिए काफी हद तक पर्याप्त है और हैकिंग से सुरक्षित है, हालांकि क्वांटम कंप्यूटिंग का विकास होने से इस तकनीक पर संकट आ सकता है।

  • क्वांटम कंप्यूटिंग, तीव्र और अधिक शक्तिशाली कंप्यूटरों के एक नए युग को संदर्भित करती है, और यह माना जाता है, कि यह तकनीक वर्तमान स्तर के कूटलेखन (Encryption) को तोड़ने में सक्षम होंगे।
  • क्वांटम कुंजी वितरण (QKD) प्रौद्योगिकी में डेटा स्थानांतरित करने के लिए फोटॉन– प्रकाश उत्सर्जन करने वाले कण- का उपयोग किया जाता है।
  • QKD में दूर स्थित दो उपयोगकर्ता, जिनके पास पहले से कोई गुप्त कुंजी (secret key) नहीं होती है, ‘सीक्रेट की’ (secret key) कही जाने वाली एक सामूहिक, सीक्रेट बिट्स की यादृच्छिक लड़ी (random string) बनाने में सक्षम होते हैं।
  • वन-टाइम पैड एन्क्रिप्शन का उपयोग करते हुए यह कुंजी किसी संदेश को एन्क्रिप्ट करने और डिक्रिप्ट करने के लिए सुरक्षित साबित हुई है, तथा इस प्रकार के संदेश को सुरक्षित रूप से किसी भी मानक संचार चैनल पर भेजा जा सकता है।

इस तकनीक का महत्व:

  • इस तकनीक के माध्यम से की गयी एन्क्रिप्शन ‘अभेद्य’ होती है, क्योंकि इसमें डेटा का संचरण फोटॉन के माध्यम से होता है। फोटॉन को पूरी तरह से कॉपी नहीं किया जा सकता है और इस तरह का कोई भी प्रयास करने पर संदेश अस्त-व्यस्त हो जाएगा। इसके अलावा, डेटा इंटरसेप्ट करने की कोशिश करने वाले व्यक्ति का पता भी लग सकेगा।
  • इस तकनीक के साइबर सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ हो सकते हैं। इससे कार्यो का संपादन सुरक्षित तरीके से किया जा सकेगा, लेकिन साथ ही सरकारों को लिए संदेशों को हैक करने में अधिक कठिनाई होगी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्यूबिट्स क्या होते हैं?
  2. क्वांटम तकनीक क्या है?
  3. फोटॉन क्या होते हैं?
  4. QSD क्या है?

मेंस लिंक:

अन्य तकनीकों की तुलना में QSD को बेहतर तकनीक के रूप में क्यों देखा जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


आंध्र प्रदेश का CLAP अभियान

आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा 2 अक्टूबर को ‘स्वच्छ आंध्र प्रदेश- जगन्ना स्वच्छ संकल्प कार्यक्रम’ (Clean Andhra Pradesh (CLAP) – Jagananna Swachha Sankalpam programme) की शुरुआत ग्रामीण क्षेत्रों को साफ करने, स्वच्छता की स्थिति में सुधार और सार्वजनिक भागीदारी के साथ अपशिष्ट प्रबंधन के उद्देश्य से की गयी थी।

  • इस अभियान के तहत, ग्रामीण परिवारों से कूड़ा-करकट को सड़कों पर न फेकने और उसे कूड़ा उठाने वाले को सौंपने का आग्रह किया जाता है।
  • घर-घर जाकर कचरे का संग्रह करने के अलावा, इस अभियान का उद्देश्य, तरल और ठोस कचरे को अलग करना, कचरे का यथा-स्थल पर उपचार करना और घर में खाद बनाने को प्रोत्साहित करना है।

 

हाइनीट्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल (HNLC)

हाल ही में हुए एक कम-तीव्रता वाले IED विस्फोट की जिम्मेदारी, एक प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन ‘हाइनीट्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल’ (Hynniewtrep National Liberation Council – HNLC) ने ली है।

  • मेघालय में एक संप्रभु खासी होमलैंड की मांग करने वाला ‘हाइनीट्रेप नेशनल लिबरेशन काउंसिल’ (HNLC), वर्ष 1980 के दशक के मध्य में गठित राज्य के पहले उग्रवादी आदिवासी संगठन, हाइनीट्रेप अचिक लिबरेशन काउंसिल (Hynniewtrep Achik Liberation Council HALC) से पृथक हुआ एक गुट है।
  • हाइनीट्रेप (Hynniewtrep), खासी और जयंतिया समुदायों को संदर्भित करता है, और ‘अचिक’ गारो समुदाय को संदर्भित करता है। HNLC को खासी पहचान और गौरव के प्रतिनिधि के रूप में देखा जाता है, और अधिकांश शीर्ष नेतृत्व बांग्लादेश से बाहर है।

 

केसर का कटोरा परियोजना

(Safforn Bowl Project)

‘केसर का कटोरा’ परियोजना (Safforn Bowl Project) के तहत ‘नॉर्थ ईस्ट सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन एंड रीच’ (NECTAR) द्वारा केसर की खेती के लिए अरुणाचल प्रदेश और मेघालय में कुछ जगहों की पहचान की है।

केसर का उत्पादन, लंबे समय से केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर में एक सीमित भौगोलिक क्षेत्र तक ही सीमित रहा है।

  • कश्मीर का ‘पंपोर क्षेत्र’ (Pampore Region), जिसे आमतौर पर कश्मीर के ‘केसर के कटोरे’ के रूप में जाना जाता है, भारत में केसर के उत्पादन का मुख्य योगदानकर्ता है, इसके बाद बडगाम, श्रीनगर और किश्तवाड़ जिले का स्थान हैं।
  • केसर, पारंपरिक रूप से प्रसिद्ध कश्मीरी व्यंजनों से जुड़ा रहा है।
  • इसके औषधीय मूल्यों को, कश्मीर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा माना जाता है।
  • चूंकि केसर की खेती कश्मीर में बहुत विशिष्ट क्षेत्रों तक ही सीमित थी, इसलिए अब तक इसका उत्पादन सीमित रहा।
  • हालांकि ‘राष्ट्रीय केसर मिशन’ के तहत इसकी खेती में सुधार के लिए कई उपायों पर ध्यान केंद्रित किया, लेकिन ये उपाय अभी भी कश्मीर के निर्दिष्ट क्षेत्रों तक ही सीमित हैं।

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