[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 1 February 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. अफ़्रीकी संघ द्वारा बुर्किना फ़ासो का समूह से निलंबन

2. संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग

 

सामान्य अध्ययनIII

1. मनरेगा

2. संवर्धित चावल

3. वैकल्पिक ईंधन के रूप में इथेनॉल

4. सेमीकंडक्टर चिप की कमी

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. वन क्षेत्र विस्तार में भारत की वैश्विक स्थिति

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

अफ़्रीकी संघ द्वारा बुर्किना फ़ासो का समूह से निलंबन


संदर्भ:

हाल ही में, ‘अफ्रीकी संघ’ (African Union AU) द्वारा ‘बुर्किना फासो’ (Burkina Faso) को संगठन से निलंबित कर दिया गया है। ‘अफ्रीकी संघ’ ने कहा है, जब तक ‘बुर्किना फासो’ में सैन्य विद्रोह के बाद संवैधानिक व्यवस्था बहाल नहीं होती है, तब तक वह संगठन की किसी भी कार्रवाई में भाग नहीं ले सकेगा।

संबंधित प्रकरण:

बुर्किना फासो, अपने पड़ोसी देशों माली तथा नाइजर की भांति, वर्ष 2015 से हिंसा के एक सर्पिल चक्र में फंस चुका है, जिसका श्रेय अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट समूह से जुड़े जिहादी आंदोलनों को दिया जाता है। इन जिहादी आंदोलनों में कम से कम 2,000 लोग मारे जा चुके है और 1.4 मिलियन आबादी को विस्थापित होना पड़ा है।

  • ‘अफ्रीकी संघ’ का हालिया निर्णय, बुर्किना फासो में 24 जनवरी को हुए तख्तापलट के प्रत्युत्तर में आया है। इस सैन्य तख्तापलट में राष्ट्रपति रोच मार्क क्रिश्चियन काबोरे को अपदस्थ कर दिया गया।
  • तख्तापलट के बाद, बुर्किना फासो का एक सप्ताह में यह दूसरा निलंबन है। इससे पहले, ‘पश्चिमी अफ्रीकी देशों के आर्थिक समूह’ (ECOWAS) द्वारा बुर्किना फासो को निलंबित कर दिया गया था।

‘अफ्रीकन यूनियन’ के बारे में:

‘अफ्रीकन यूनियन’ / अफ्रीकी संघ (African Union AU) एक महाद्वीपीय संघ है, जिसमें अफ्रीका में स्थित यूरोपीय अधिकार वाले विभिन्न क्षेत्रों को छोड़कर, अफ्रीका महाद्वीप के 55 देश शामिल हैं।

  • इस समूह की स्थापना 26 मई 2001 को इथियोपिया की राजधानी ‘अदीस अबाबा’ में हुई थी और 9 जुलाई 2002 को दक्षिण अफ्रीका में इसे लांच किया गया था।
  • ‘अफ्रीकन यूनियन’ (AU) का लक्ष्य, 25 मई 1963 को अदीस अबाबा में 32 हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों द्वारा स्थापित ‘अफ़्रीकी एकता संगठन’ (Organisation of African Unity – OAU) को प्रतिस्थापित करना है।
  • ‘अफ्रीकन यूनियन’ का सचिवालय, अफ्रीकी संघ आयोग, अदीस अबाबा में स्थित है।

ECOWAS के बारे में:

‘पश्चिमी अफ्रीकी देशों के आर्थिक समूह’ (Economic Community of West African States – ECOWAS), जैसा कि नाम से पता चलता है, पश्चिम अफ्रीका में स्थित पंद्रह देशों का एक क्षेत्रीय राजनीतिक और आर्थिक संघ है।

  • इसकी स्थपाना वर्ष 1975 में लागोस की संधि (Treaty of Lagos) पर हस्ताक्षर करने के साथ हुई थी।
  • ECOWAS का लक्ष्य, एक पूर्ण आर्थिक एवं व्यापारिक संघ का निर्माण कर, एक विस्तृत व्यापार ब्लॉक बनाना तथा अपने सदस्य देशो के लिए “सामूहिक आत्मनिर्भरता” (collective self-sufficiency) प्राप्त करना है।
  • यह, इस क्षेत्र में ‘शांति-सेना’ (Peacekeeping Force) के रूप में भी कार्य करता है।
  • यह संपूर्ण महाद्वीप को शामिल करने वाले ‘अफ्रीकी आर्थिक समूह’ (African Economic CommunityAEC) के मुख्य क्षेत्रीय समूहों में से एक माना जाता है।

ECOWAS में दो उप-क्षेत्रीय ब्लॉक शामिल हैं:

  1. पश्चिम अफ्रीकी आर्थिक और मौद्रिक संघ’ (West African Economic and Monetary Union): यह मुख्य रूप से, आठ फ्रेंच भाषी देशों का एक संगठन है।
  2. 2000 में स्थापित ‘पश्चिम अफ्रीकी मौद्रिक क्षेत्र’ (West African Monetary Zone- WAMZ): इसमें मुख्यतः अंग्रेजी बोलने वाले छह देश शामिल हैं।

Current Affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘अफ्रीकी परमाणु-हथियार-मुक्त क्षेत्र संधि’ (African Nuclear-Weapons-Free Zone Treaty) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ECOWAS के बारे में
  2. लक्ष्य और उद्देश्य
  3. सदस्य
  4. इसके तहत उप-क्षेत्रीय ब्लॉक

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग


(United Nations Commission on International Trade Law – UNCITRAL)

संदर्भ:

आर्थिक सर्वेक्षण 2021-22 में एक “सीमा-पारीय दिवालियापन हेतु एक मानकीकृत ढांचे” (Standardised Framework for Cross-Border Insolvency) की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। यह फ्रेमवर्क कर्ज में डूबी कंपनियों को ऋण प्रदान करने वालों के लिए, कंपनियों की विदेश स्थित परिसंपत्तियों और देनदारियों पर भी दावा करने और अपनी वसूली करने में सहायक होगा।

आवश्यक कार्रवाई:

सर्वेक्षण में ‘दिवाला कानून समिति’ (Insolvency Law Committee) की रिपोर्ट का उल्लेख किया गया है, जिसमें विदेशी परिसंपत्तियों को ‘दिवाला प्रक्रिया’ के अंतर्गत लाने के लिए कुछ संशोधनों के साथ “संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग’ (United Nations Commission on International Trade Law – UNCITRAL) को स्वीकार करने की सिफारिश की गयी थी।

आवश्यकता:

‘दिवाला और दिवालियापन संहिता’ (Insolvency and Bankruptcy Code – IBC) के अतर्गत, वर्तमान में अन्य देशों में किसी भी दिवाला कार्यवाही को स्वतः मान्यता दिए जाने की अनुमति नहीं दी गयी है” और इसके वर्तमान प्रावधान “लेनदारों, देनदारों और अन्य हितधारकों के लिए अपने दावों के परिणामों के बारे में अनिश्चितता की ओर भी ले जाते है”।

UNCITRAL के बारे में:

‘संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग’ (UNCITRAL) सीमापार ऋणशोधन या दिवालियापन से जुड़े मुद्दों से निपटने के लिये एक विधायी ढांचा प्रदान करता है।

  • इस फ्रेमवर्क / ढांचे को ‘अधिनियमित क्षेत्राधिकार के घरेलू संदर्भ के अनुरूप संशोधनों के साथ’ विभिन्न देशों द्वारा अपनाया जा सकता है।
  • UNCITRAL फ्रेमवर्क को सिंगापुर, ब्रिटेन, अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका सहित 49 देशों में लागू किया जा चुका है।
  • यह फ्रेमवर्क, विदेशी पेशेवरों और लेनदारों को घरेलू अदालतों तक सीधी पहुंच का अवसर प्रदान करता है और उन्हें ‘घरेलू दिवाला कार्यवाही’ में भाग लेने और कार्रवाई शुरू करने में सक्षम बनाता है।
  • इसके तहत, ‘विदेशी कार्यवाही’ (foreign proceedings) की मान्यता की अनुमति प्रदान की गयी है और साथ ही, UNCITRAL फ्रेमवर्क अदालतों को तदनुसार निर्णय करने एवं राहत निर्धारित करने में सक्षम बनाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘संयुक्त राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार कानून आयोग’ (UNCITRAL), संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) की एक सहायक संस्था है तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और निवेश को सुविधाजनक बनाने में मदद करने हेतु जिम्मेदार है? इसकी स्थापना UNGA द्वारा 1966 में की गई थी।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

मनरेगा


(MGNREGA)

संदर्भ:

नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार:

संबंधित प्रकरण:

ग्रामीण श्रमिकों के समर्थनकारियों का कहना है, मनरेगा योजना के तहत काम की मांग में गिरावट का प्रमुख कारण धन की कमी है, और इन्होने केंद्रीय बजट में योजना के लिए आवंटित राशि में वृद्धि किए जाने का आग्रह किया है।

  • केंद्र सरकार द्वारा पहले लॉकडाउन की शुरुआत में ही योजना के लिए ₹40,000 करोड़ की अतिरिक्त राशि का आवंटन किया गया था।
  • हालांकि, कई राज्यों के पास पहले से ही धन की कमी होने के कारण, वर्ष के अंत तक योजना के तहत कोई अतिरिक्त राशि नहीं बची, जिससे यथार्थ में, काम की मांग को कृत्रिम रूपं से कम करना पड़ा।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (MGNREGA) के बारे में:

  • मनरेगा (MGNREGA) को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में एक सामाजिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके अंतर्गत ‘काम करने के अधिकार’ (Right to Work) की गारंटी प्रदान की जाती है।
  • इस सामाजिक उपाय और श्रम कानून का मुख्य सिद्धांत यह है, कि स्थानीय सरकार को ग्रामीण भारत में न्यूनतम 100 दिनों का वैतनिक रोजगार प्रदान करना होगा ताकि ग्रामीण श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि की जा सके।

Currrent Affairs

प्रमुख उद्देश्य:

  1. मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रत्येक परिवार के अकुशल श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिये न्यूनतम 100 दिन का वैतनिक रोजगार।
  2. ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को सशक्त करके सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना।
  3. कुओं, तालाबों, सड़कों और नहरों जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण करना।
  4. ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले शहरी प्रवासन को कम करना।
  5. अप्रयुक्त ग्रामीण श्रम का उपयोग करके ग्रामीण अवसंरचना का निर्माण करना।

मनरेगा योजना के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु पात्रता मानदंड:

  1. मनरेगा योजना का लाभ लेने के लिए भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. कार्य हेतु आवेदन करने के लिए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष अथवा इससे अधिक होनी चाहिए।
  3. आवेदक के लिए किसी स्थानीय परिवार का हिस्सा होना चाहिए (अर्थात, आवेदन स्थानीय ग्राम पंचायत के माध्यम से किया जाना चाहिए)।
  4. आवेदक को स्वेच्छा से अकुशल श्रम के लिए तैयार होना चाहिए।

योजना का कार्यान्वयन:

  1. आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग होती है, उस दिन से आवेदक को वैतनिक रोजगार प्रदान किया जाएगा।
  2. रोजगार उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, आवेदन जमा करने के पंद्रह दिनों के भीतर या काम की मांग करने की तिथि से बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार होगा।
  3. मनरेगा के कार्यों का सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit) अनिवार्य है, जिससे कार्यक्रम में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
  4. मजदूरी की मांग करने हेतु अपनी आवाज उठाने और शिकायतें दर्ज कराने के लिए ‘ग्राम सभा’ इसका प्रमुख मंच है।
  5. मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों को मंजूरी देने और उनकी प्राथमिकता तय करने का दायित्व ‘ग्राम सभा’ और ‘ग्राम पंचायत’ का होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि भारतीय संविधान में ‘काम करने के अधिकार’ को स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गयी है? फिर, संविधान के अंतर्गत इस संदर्भ में क्या प्रावधान किए गए हैं? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मनरेगा के तहत ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, राज्यों, राज्य खाद्य आयोग, केंद्र की भूमिकाएँ क्या हैं?
  2. जॉब कार्ड क्या हैं, इन्हें कौन जारी करता है?
  3. ‘राज्य रोजगार गारंटी कोष’ की स्थापना कौन करता है?
  4. वैतनिक रोजगार क्या होता है?
  5. सामाजिक लेखा परीक्षण (सोशल ऑडिट) किसके द्वारा किया जाता है?

मेंस लिंक:

मनरेगा की प्रमुख विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग- कार्यक्षेत्र एवं महत्त्व, स्थान, ऊपरी और नीचे की अपेक्षाएँ, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।

संवर्धित चावल


(Fortified rice)

संदर्भ:

आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा आंगनवाड़ियों और सरकारी स्कूलों में मध्याह्न भोजन के माध्यम से दिसंबर 2021 तक 3.38 लाख मीट्रिक टन ‘संवर्धित चावल’ (Fortified rice) वितरित किए गए हैं।

इस संबंध में सरकार के प्रयास:

  • वर्ष 2019 में, केंद्र सरकार द्वारा 2019-2020 से लेकर आगामी तीन साल की अवधि के लिए चावल के फोर्टिफिकेशन के लिए केंद्र प्रायोजित पायलट योजना को मंजूरी दी गयी थी। यह योजना विभिन्न राज्यों के 15 जिलों में लागू की जा रही है।
  • पिछले साल, स्वतंत्रता दिवस के भाषण के दौरान, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कुपोषण की समस्या से निपटने के लिए वर्ष 2024 तक हर सरकारी कार्यक्रम के तहत उपलब्ध कराए गए चावल को ‘संवर्धित’ किए जाने की घोषणा की थी।
  • सरकार द्वारा पिछले साल ‘एकीकृत बाल विकास योजना’ (अब सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 0) के तहत आंगनवाड़ियों में, तथा स्कूलों में लागू ‘मध्याह्न भोजन योजना’ (पीएम पोषण) के तहत ‘संवर्धित चावल’ के वितरण में तेजी लाई गयी।

चिंताएं:

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने हालांकि कुपोषण से लड़ने के लिए एक प्रभावी उपकरण के रूप में चावल-संवर्धन पर चिंता जताई है और कहा है, कि इसकी अपेक्षा आहार का विविधीकरण किया जाना अधिक महत्वपूर्ण होगा।
  • कई विशेषज्ञों का यह भी तर्क है, कि लौह तत्व से संवर्धित चावल तथा आयरन की खुराक प्रदान करने वाली अन्य सरकारी योजनाओं के अंतर्गत दी जाने वाली आयरन पोषक तत्व की अत्यधिक मात्रा से मधुमेह, उच्च रक्तचाप और उच्च कोलेस्ट्रॉल का खतरा हो सकता है।

चावल संवर्धन’ (Rice fortification) की आवश्यकता:

  1. चूंकि, देश में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण का स्तर काफी अधिक है, इसे देखते हुए यह घोषणा काफी महत्वपूर्ण है।
  2. खाद्य मंत्रालय के अनुसार, देश में हर दूसरी महिला रक्ताल्पता से पीड़ित (anaemic) है और हर तीसरा बच्चा अविकसित या नाटेपन का शिकार है।
  3. ग्लोबल हंगर इंडेक्स (GHI), भारत, 107 देशों की सूची में 94वें स्थान पर है और इसे भुखमरी से संबंधित ‘गंभीर श्रेणी’ में रखा गया है।
  4. गरीब महिलाओं और गरीब बच्चों में कुपोषण और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी, उनके विकास में बड़ी बाधा है।

खाद्य-संवर्धन’ / ‘फूड फोर्टिफिकेशन’ क्या है?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, ‘फूड फोर्टिफिकेशन’ के द्वारा, किसी खाद्यान्न को पोषणयुक्त बनाने हेतु उसमे सावधानी से आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों अर्थात् विटामिन और खनिज तत्वों की मात्रा में वृद्धि की जाती है।

देश में खाद्य पदार्थों के लिए मानकों का निर्धारण करने वाली संस्था ‘भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण’ (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI) के अनुसार, ‘खाद्य-संवर्धन’ (Food Fortification), ‘किसी खाद्यान्न को पोषणयुक्त बनाने के लिए उसमे सावधानी से आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों अर्थात् विटामिन और खनिज तत्वों, की मात्रा में वृद्धि करने की प्रकिया होती है।

  • इसका उद्देश्य आपूर्ति किए जाने वाले खाद्यान्न की पोषण गुणवत्ता में सुधार करना तथा न्यूनतम जोखिम के साथ उपभोक्ताओं को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करना है।
  • यह आहार में सुधार और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी का निवारण करने हेतु एक सिद्ध, सुरक्षित और लागत प्रभावी रणनीति है।

संवर्धित चावल (Fortified rice):

खाद्य मंत्रालय के अनुसार, आहार में विटामिन और खनिज सामग्री को बढ़ाने के लिए चावल का संवर्धन (fortification) किया जाना एक लागत प्रभावी और पूरक रणनीति है।

  • FSSAI द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार, 1 किलो संवर्धित चावल में आयरन (28 mg-42.5 mg), फोलिक एसिड (75-125 माइक्रोग्राम) और विटामिन B-12 (0.75-1.25 माइक्रोग्राम) होगा।
  • इसके अलावा, चावल को सूक्ष्म पोषक तत्वों के साथ, एकल या संयोजन में, जस्ता (10 मिलीग्राम -15 मिलीग्राम), विटामिन A (500-750 माइक्रोग्राम आरई), विटामिन बी-1 (1 मिलीग्राम-5 मिलीग्राम), विटामिन बी-2 (1.25 mg-1.75 mg), विटामिन B3 (12.5 mg-20 mg) और विटामिन B6 (1.5 mg-2.5 mg) प्रति किग्रा के साथ भी संवर्धित किया जाएगा।

फूड फोर्टिफिकेशन’ के लाभ:

चूंकि, ‘फूड फोर्टिफिकेशन’ के तहत व्यापक रूप से सेवन किए जाने वाले मुख्य खाद्य पदार्थों में पोषक तत्वों की वृद्धि की जाती है, अतः आबादी के एक बड़े भाग के स्वास्थ्य में सुधार करने हेतु यह एक उत्कृष्ट तरीका है।

  • ‘फोर्टिफिकेशन’ व्यक्तियों के पोषण में सुधार करने का एक सुरक्षित तरीका है और भोजन में सूक्ष्म पोषक तत्वों को मिलाए जाने से लोगों के स्वास्थ्य के लिए कोई खतरा नहीं होता है।
  • इस पद्धति में लोगों की खान-पान की आदतों और पैटर्न में किसी तरह के बदलाव की जरूरत नहीं है, और यह लोगों तक पोषक तत्व पहुंचाने का सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य तरीका है।
  • ‘फूड फोर्टिफिकेशन’ से भोजन की विशेषताओं-स्वाद, अनुभव, स्वरूप में कोई बदलाव नहीं होता है।
  • इसे जल्दी से लागू किया जा सकता है और साथ ही अपेक्षाकृत कम समय में स्वास्थ्य में सुधार के परिणाम भी दिखा सकते हैं।
  • यदि मौजूदा तकनीक और वितरण प्लेटफॉर्म का लाभ उठाया जाता है तो यह काफी लागत प्रभावी विधि साबित हो सकती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

जैव संवर्धन (Biofortification) क्या होता है? यह ‘फोर्टिफिकेशन’ से किस प्रकार भिन्न होता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जैव फोर्टिफिकेशन बनाम आनुवंशिक परिवर्तन
  2. सूक्ष्म पोषक बनाम वृहद पोषक तत्व
  3. भारत में जैव उर्वरक और जीएम फसलों के लिए स्वीकृति
  4. भारत में अनुमति प्राप्त जीएम फसलें

मेंस लिंक:

किसी खाद्यान्न को पोषणयुक्त बनाने से आप क्या समझते हैं? इसके फायदों के बारे में चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

वैकल्पिक ईंधन के रूप में इथेनॉल


(Ethanol as an alternate fuel)

संदर्भ:

यद्यपि देश में ऑटो-ईंधन में इथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने में लगातार प्रगति हुई है। वाहन-ईंधन में इथेनॉल की हिस्सेदारी एक साल पहले 5% थी, जोकि ‘इथेनॉल आपूर्ति वर्ष’ (Ethanol Supply Year – ESY) 2020-21 (दिसंबर-नवंबर) में बढ़कर 8.1% हो गयी है। यदि वर्ष 2025 तक 20% इथेनॉल सम्मिश्रण का लक्ष्य प्राप्त करना है, तो इसके लिए कई मुद्दों पर ध्यान की आवश्यकता होगी।

इथेनॉल सम्मिश्रण का महत्व:

  • चूंकि, पेट्रोलियम उत्पादों का अधिकांश उपयोग परिवहन क्षेत्र में किया जाता है, ऐसे में ‘20% इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल’ (E20) प्रयोग किए जाने का सफल कार्यक्रम, संभावित रूप से देश के लिए प्रति वर्ष $4 बिलियन की बचत कर सकता है।
  • E20 का प्रयोग किए जाने से, मूल रूप से नियमित पेट्रोल के लिए डिज़ाइन किए गए चार पहिया वाहनों की ईंधन दक्षता में 6-7% की अनुमानित कमी होती है।

पृष्ठभूमि:

  • सरकार द्वारा इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol- EBP) कार्यक्रम के तहत ‘राष्ट्रीय जैव ईधन नीति’ -2018 (National Policy on Biofuels-2018 : NBP-2018) के अनुरूप पेट्रोल जैसे मुख्य मोटर वाहन ईंधनों के साथ इथेनॉल के मिश्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • इस नीति में वर्ष 2030 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल के मिश्रण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

इथेनॉल सम्मिश्रण की सीमा को निर्धारित करने वाले कारक:

देश भर में पर्याप्त गुणवत्ता वाले फीडस्टॉक (feedstock) की कमी और इथेनॉल की यत्र-तत्र (sporadic) उपलब्धता इथेनॉल सम्मिश्रण की सीमा को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि वर्तमान में फीडस्टॉक की आपूर्ति, मुख्य रूप से चीनी उत्पादक राज्यों में ही केंद्रित है।

इस संबंध में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास:

  1. सरकार ने गन्ना और खाद्यान्न आधारित कच्चे माल से इथेनॉल के उत्पादन की अनुमति दे दी है।
  2. सरकार द्वारा गन्ना आधारित कच्चे माल से निर्मित इथेनॉल के लिए ‘मिल से बाहर’ की कीमत निर्धारित कर दी गयी है।
  3. विभिन्न फीडस्टॉक से उत्पादित इथेनॉल के लिए पारिश्रमिक मूल्य तय किए गए हैं।
  4. शीरा और अनाज आधारित नई भट्टियों / आसवनी (Distilleries) की स्थापना तथा मौजूदा भट्टियों के विस्तार के लिए ब्याज में छूट संबंधी योजनाओं को अधिसूचित किया गया है।

इथेनॉल (Ethanol)

  1. इथेनॉल का उत्पादन स्टार्च की उच्च मात्रा वाली फसलों, जैसे कि गन्ना, मक्का, गेहूँ आदि से किया जा सकता है।
  2. भारत में, इथेनॉल का उत्पादन मुख्यतः गन्ना के शीरे से किण्वन प्रक्रिया द्वारा किया जाता है।
  3. इथेनॉल को विभिन्न सम्मिश्रणों को बनाने के लिए गैसोलीन के साथ मिश्रित किया जा सकता है।
  4. चूंकि इथेनॉल के अणुओं में ऑक्सीजन पाया जाता है, जिसकी वजह से इंजन, ईंधन को पूर्णतयः दहन करने में सक्षम होता है, परिणामस्वरूप उत्सर्जन और पर्यावरण प्रदूषण कम होता है।
  5. इथेनॉल का उत्पादन सूर्य की उर्जा प्राप्त करने वाले पादपों से किया जाता है, इसलिए इथेनॉल को नवीकरणीय ईंधन भी माना जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (Ethanol Blended Petrol- EBP) कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए, सरकार द्वारा इथेनॉल खरीद के लिए एक प्रशासित मूल्य तंत्र को फिर से शुरू किया गया है। जिसके तहत भारी शीरा, गन्ने का रस, चीनी, चीनी सिरप, सड़े हुए खाद्यान्न, भारतीय खाद्य निगम के पास जमा मक्का और अधिशेष चावल के स्टॉक जैसे कई फीडस्टॉक से इथेनॉल उत्पादन किया जाएगा।

चीनी मिलें और डिस्टिलरी भी, वैधानिक मंजूरी प्राप्त करने के बाद इथेनॉल संयंत्र स्थापित करने के लिए स्वतंत्र हैं और सरकार द्वारा कंपनियों की सहायता के लिए एक ब्याज-माफी योजना की घोषणा भी की गयी है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. इथेनॉल क्या है? इसका उत्पादन किस प्रकार किया जाता है?
  2. इथेनॉल और शीरे के बीच अंतर?
  3. ’इथेनॉल सम्मिश्रण कार्यक्रम’ क्या है?
  4. ‘इथेनॉल सम्मिश्रण’ के लाभ?

मेंस लिंक:

वर्ष 2013 के इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

सेमीकंडक्टर चिप्स की कमी


संदर्भ:

2021-22 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, कि ‘सेमीकंडक्टर्स / अर्धचालकों की कमी’ (Shortage of Semiconductors) के कारण विविध उद्योगों की कई फर्मों द्वारा उत्पादन या तो बंद कर दिया गया है, या इसमें कमी आई है।

इस कमी को दूर करने हेतु सरकार द्वारा किए गए उपाय:

  • सरकार द्वारा सेमीकंडक्टर्स और डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग सेगमेंट के लिए 76,000 करोड़ रुपये निर्धारित किए हैं।
  • सेमीकंडक्टर्स को बढ़ावा देने के लिए पीएलआई (PLI schemes) और अन्य योजनाएं शुरू की गयी हैं जो न केवल घरेलू कंपनियों को कोविड -19 द्वारा उत्पन्न चुनौतियों से उबरने में मदद करेंगी, बल्कि उन्हें विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनने – खासकर चिप निर्माण- में भी मदद करेंगी ।
  • सरकार ने हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र के लिए एक विजन दस्तावेज जारी किया है, जिसमें 2026 तक घरेलू इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन के लगभग 22 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की परिकल्पना की गयी है।

‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ के बारे में:

अर्धचालक अर्थात सेमीकंडक्टर्स (Semiconductors) – जिन्हें एकीकृत सर्किट (आईसी), या माइक्रोचिप्स के रूप में भी जाना जाता है – प्रायः सिलिकॉन या जर्मेनियम या गैलियम आर्सेनाइड जैसे यौगिक से निर्मित होते हैं।

सेमीकंडक्टर चिप्स का महत्व:

  • ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’, सभी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और ‘सूचना और संचार प्रौद्योगिकी’ उपकरणों के ‘दिल और दिमाग’ के रूप में कार्य करने वाले बुनियादी ‘बिल्डिंग ब्लॉक्स’ होते हैं।
  • ये चिप्स अब समकालीन ऑटोमोबाइल, घरेलू गैजेट्स और ईसीजी मशीनों जैसे आवश्यक चिकित्सा उपकरणों का एक अभिन्न अंग बन चुके हैं।

इनकी मांग में हालिया वृद्धि:

  • कोविड -19 महामारी की वजह से, दिन-प्रतिदिन की आर्थिक और आवश्यक गतिविधियों के बड़े हिस्से को ऑनलाइन रूप से किए जाने या इन्हें डिजिटल रूप से सक्षम बनाए जाने के दबाव ने, लोगों के जीवन में चिप-संचालित कंप्यूटर और स्मार्टफोन की ‘केंद्रीयता’ को उजागर कर दिया है।
  • दुनिया भर में फ़ैली महामारी और उसके बाद लगाए गए लॉकडाउन की वजह से जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और अमेरिका सहित देशों में ‘महत्वपूर्ण चिप बनाने वाली सुविधाओं’ को भी बंद कर दिया गया।
  • ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ की कमी का व्यापक अनुवर्ती असर पड़ता है। पहले ‘चिप्स’ का अधिक मात्रा में भंडारण किए जाने से इसकी मांग में वृद्धि होती है, जो बाद में आपूर्ति में कमी का कारण बन जाती है।

भारत की सेमीकंडक्टर मांग और संबंधित पहलें:

  • भारत में, वर्तमान में सभी प्रकार की चिप्स का आयात किया जाता है, और वर्ष 2025 तक इस बाजार के 24 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा, हाल ही में, एक ‘अर्धचालक और प्रदर्शन विनिर्माण पारितंत्र’ (Semiconductors and Display Manufacturing Ecosystem) के विकास में सहयोग करने के लिए ₹76,000 करोड़ की राशि आवंटित की गयी है।
  • भारत ने ‘इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स एंड सेमीकंडक्टर्स’ के निर्माण को बढ़ावा देने हेतु योजना (Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors) भी शुरू की है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों और अर्धचालकों के निर्माण के लिए आठ साल की अवधि में 3,285 करोड़ रुपये का बजट परिव्यय मंजूर किया गया है।

आगे की चुनौतियां:

  1. उच्च निवेश की आवश्यकता
  2. सरकार की ओर से न्यूनतम वित्तीय सहायता
  3. संरचना क्षमताओं (Fab Capacities) की कमी
  4. PLI योजना के तहत अपर्याप्त अनुदान
  5. संसाधन अक्षम क्षेत्र

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के बारे में
  2. सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण में भारत की स्थिति?
  3. ‘राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति’ के तहत प्रमुख प्रस्ताव।
  4. उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना- इसकी घोषणा कब की गई थी?
  5. इस योजना का कार्यान्वयन

मेंस लिंक:

सेमीकंडक्टर्स या चिप्स/इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuits – ICs) का बढ़ता महत्व और इसके निर्माण एवं डिजाइन में चीन का अनुभव, भारत में चिप डिजाइन पर ध्यान केंद्रित किए जाने के संबंध में एक मजबूत आधार प्रदान करता है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


वन क्षेत्र विस्तार में भारत की वैश्विक स्थिति

नवीनतम आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार:

  • भारत में पिछले एक दशक के दौरान वन क्षेत्र में वृद्धि हुई है, और भारत, 2010-2020 के दौरान वन क्षेत्र में औसत वार्षिक शुद्ध वृद्धि में विश्व स्तर पर तीसरे स्थान पर है।
  • भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 24% वनों के अंतर्गत है, जोकि वर्ष 2020 में दुनिया के कुल वन क्षेत्र का 2% है।
  • विश्व के कुल वन क्षेत्र का 66% हिस्सा, विश्व में सर्वाधिक वनावरण वाले शीर्ष 10 देशों में पाया जाता है। जिसमे से, ब्राजील (59%), पेरू (57%), कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (56%) और रूस (50%) में उनके कुल भौगोलिक क्षेत्र का आधा या अधिक भाग वनों के अधीन है।
  • भारतीय राज्यों में, भारत के कुल वन क्षेत्र का 11% मध्य प्रदेश में है, जोकि 2021 में वनों के अंतर्गत सबसे बड़ा क्षेत्र था। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश (9%), छत्तीसगढ़ (8%), ओडिशा (7%) और महाराष्ट्र (7%) का स्थान है।
  • 2021 में भौगोलिक क्षेत्र के उच्चतम वनावरण अनुपात के मामले में, शीर्ष पांच राज्य मिजोरम (85%), अरुणाचल प्रदेश (79%), मेघालय (76%), मणिपुर (74%) और नागालैंड (74%) हैं।

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