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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 29 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. संसद में व्यवधान

2. 12 विधायकों का अनिश्चितकालीन निलंबन रद्द

3. पदोन्नति में आरक्षण

4. सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम

 

सामान्य अध्ययनIII

1. गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. धार्मिक तीर्थ स्थलों की यात्रा प्रोटोकॉल 1974

2. राष्ट्रीय कैडेट कोर

3. भारत और फिलीपींस के मध्य ब्रह्मोस मिसाइलों का सौदा

4. नियो कोव वायरस

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

संसद में व्यवधान


(Disruptions in Parliament)

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने एक फैसला देते हुए कहा है कि:

  • एक “वैश्विक नेता” बनने की इच्छा रखने वाले राष्ट्र को अपने नागरिकों के कल्याण पर बहस करनी चाहिए, न कि संसद को एक दूसरे पर उपहास करने और व्यक्तिगत हमले करने का मंच बनाना चाहिए।
  • स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने और ‘विश्व नेता’ (World Leader) बनने की महत्वाकांक्षा रखने के बाद, निर्वाचित सदस्यों को कम से कम यह पता होना चाहिए कि उनसे सदन में ‘अस्थिरता’ (Brinkmanship) की नहीं बल्कि राज-नीति (Statesmanship) का प्रदर्शन करने की उम्मीद की जाती है।
  • ‘विधायिका’ वह पहली जगह होती है, जहां लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से आम आदमी को न्याय मिलता है।

पृष्ठभूमि:

उच्चतम न्यायालय का यह आदेश, महाराष्ट्र विधानसभा के 12 भाजपा विधायकों को उपद्रवी एवं नियम-विरुद्ध आचरण करने के लिए साल भर के निलंबन से संबंधित है।

संसद में होने वाले व्यवधान की आवृत्ति:

हमारे विधायी कामकाज की नींव के रूप में स्थापित ‘चर्चा’ एवं ‘विमर्श’ की जगह अब ‘व्यवधान’ (Disruption) लेता जा रहा है।

  • पीआरएस (PRS Legislative Research) की एक रिपोर्ट के अनुसार, 15वीं लोकसभा (2009-14) के दौरान संसदीय कार्यवाही में बार-बार व्यवधान होने के कारण, लोकसभा और राज्यसभा में निर्धारित समय का कुल क्रमशः 61 फीसदी और 66 फीसदी काम हुआ था।
  • पीआरएस की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, 16वीं लोकसभा (2014-19) के दौरान निर्धारित समय का 16% समय व्यवधानों के कारण ख़राब हो गया। हालाँकि यह 15वीं लोकसभा (37%) से बेहतर, किंतु 14वीं लोकसभा (13%) से भी बदतर स्थति रही।
  • 16वीं लोकसभा के दौरान, राज्य सभा में अपने निर्धारित समय का 36 प्रतिशत व्यवधानों के कारण ख़राब हुआ। 15वीं और 14वीं लोकसभा के दौरान, राज्य सभा में निर्धारित समय का क्रमश: 32% और 14% नष्ट हुआ था।

व्यवधानों के कारण:

  1. विवादित विषयों और सार्वजनिक महत्व के मामलों पर चर्चा।
  2. व्यवधान, सत्ता पक्ष के लिए जिम्मेदारी से बचने में सहायक साबित हो सकते हैं।
  3. गैर-सूचीबद्ध चर्चा के लिए समर्पित समय का अभाव।
  4. अनुशासनात्मक शक्तियों का दुर्लभ प्रयोग।
  5. दलगत राजनीति।

आवश्यकता:

  • संसद में अव्यवस्था को रोकने हेतु, सांसदों और विधायकों के लिए ‘आचार संहिता’ को सख्ती से लागू किए जाने की आवश्यकता है।
  • आचार संहिताओं का पालन न करने वाले और सदनों के कामकाज में बाधा डालने वाले सांसदों को, पीठासीन अधिकारी द्वारा निलंबित कर देना चाहिए।
  • वर्तमान सरकार के लिए, और अधिक लोकतांत्रिक होने और विपक्ष को अपने विचारों को स्वतंत्र रूप से रखने का अवसर देने की जरूरत है।
  • व्यवधानों और स्थगन पर बर्बाद हुए घंटों की संख्या को ध्यान में रखने तथा संसद के दोनों सदनों के दिन-प्रतिदिन के कामकाज की उत्पादकता की निगरानी करने हेतु एक “उत्पादकता मापक” (Productivity Meter) तैयार किया जाना चाहिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संसद के सत्र
  2. संसद सत्र को आहूत करने की शक्ति किसे प्राप्त है?
  3. संसदीय सत्र के दौरान लोकसभा अध्यक्ष की भूमिकाएं और शक्तियां
  4. संयुक्त बैठक
  5. संविधान के अनुच्छेद 74 और 75

 

मेंस लिंक:

संसद के बार-बार बाधित होने से संबंधित मुद्दों पर प्रकाश डालिए। संसद के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करने के उपायों का सुझाव दीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

12 विधायकों का अनिश्चितकालीन निलंबन रद्द


(SC quashes indefinite suspension of 12 BJP MLAs)

संदर्भ:

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के 12 विधायकों को 5 जुलाई, 2021 से लेकर एक साल की अवधि तक के लिए निलंबित करने संबंधी महाराष्ट्र विधानसभा के फैसले को रद्द कर दिया है।

उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियां:

  • विधायकों को विधानसभा के चालू सत्र की शेष अवधि से अधिक समय के लिए निलंबन करना ‘कानून के अनुरूप नहीं’ है, और यह फैसला काफी असंवैधानिक और तर्कहीन था।
  • इसलिए, विधानसभा का यह फैसला ‘गैर-कानूनी’ है और “विधानसभा की शक्तियों से बाहर” है।

अदालत द्वारा व्यक्त की गयी चिंताएं:

  • चालू सत्र की शेष अवधि के बाद सांसदों / विधयाकों का निलंबन ‘एक अत्यंत तर्कहीन उपाय’ है, और इसके परिणामस्वरूप इन नेताओं के निर्वाचन क्षेत्र विधानसभा में प्रतिनिधित्व से वंचित हो जाएंगे।
  • यह अलोकतांत्रिक तरीके से, कमजोर बहुमत वाली सरकार (गठबंधन सरकार) को सदन में विपक्षी दल की संख्या में चालाकी से हेरफेर करके, लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित करने का अवसर दे सकता है।
  • इस तरह का कदम “पूरे लोकतंत्र के लिए फायदेमंद नहीं होगा” क्योंकि इसकी वजह से, विपक्ष अपने सदस्यों को लंबी अवधि के लिए निलंबित किए जाने के डर के कारण, सदन में होने वाली चर्चा / बहस में प्रभावी रूप से भाग नहीं ले पाएगा।

आगे की कार्रवाई:

जिन विधायकों को महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा पिछले साल जुलाई में सत्र के दौरान निलंबित कर दिया गया था, उन्हें उस सत्र की समाप्ति के बाद, विधायकों को मिलने वाले लाभ एवं अधिकार प्राप्त होंगे।

संबधित प्रकरण:

महाराष्ट्र के 12 बीजेपी विधायकों को, पीठासीन अधिकारी के साथ कथित रूप से दुर्व्यवहार करने के आरोप में विधानसभा से एक साल के लिए निलंबित कर दिया गया था।

विधायकों के निलंबन हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

महाराष्ट्र विधान सभा नियमावली के नियम 53 के तहत, विधान सभा सदस्यों को निलंबित करने की शक्ति का प्रयोग केवल विधानसभा अध्यक्ष द्वारा ही किया जा सकता है, और अध्यक्ष के इस निर्णय को मतदान के लिए नहीं रखा जा सकता है।

  • नियम 53 के अनुसार, “किसी सदस्य द्वारा विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय का अनुपालन करने से इंकार किए जाने पर, अथवा अध्यक्ष की राय में किसी सदस्य द्वारा पूर्णतयः नियम-विरुद्ध व्यवहार किए जाने पर, अध्यक्ष उस विधायक को तत्काल विधानसभा से बाहर निकल जाने का निर्देश दे सकता है।
  • उक्त विधानसभा सदस्य “उस दिन के सत्र की शेष अवधि के दौरान बैठक में भाग नहीं लेगा”।
  • यदि किसी सदस्य को एक ही सत्र में दूसरी बार सदन से बाहर निकलने का आदेश दिया जाता है, तो विधानसभा अध्यक्ष, उस सदस्य को “चालू सत्र की शेष अवधि के लिए सदन से अनुपस्थित रहने का निर्देश दे सकता है” इस प्रकार का निर्देश चालू सत्र की अवधि तक ही लागू रहेगा।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सांसदों को निलंबित करने व निलंबन रद्द करने संबंधी शक्तियां।
  2. इस संबंध में लोकसभा और राज्यसभा की प्रक्रियाओं में अंतर।
  3. सांसदों के निर्वाचन के संबंध में अपील।
  4. इस संबंध में नियम।

मेंस लिंक:

सांसदों के अनियंत्रित व्यवहार का समाधान दीर्घकालिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

पदोन्नति में आरक्षण


संदर्भ:

हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘पदोन्नति में आरक्षण’ (Reservation in Promotion) लागू करते समय, अनुसूचित जाति (SCs) और अनुसूचित जनजाति (STs) के लोगों के प्रतिनिधित्व का निर्धारण करने हेतु केंद्र और राज्यों द्वारा मात्रात्मक डेटा एकत्र करने की आवश्यकता को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा दायर की गयी याचिका को खारिज कर दिया है।

संबंधित प्रकरण:

  • शीर्ष अदालत में 11 उच्च न्यायालयों द्वारा पिछले 10 वर्षों में विभिन्न प्रासंगिक आरक्षण नीतियों पर सुनाए गए निर्णयों के खिलाफ दायर की गयी याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई की जा रही थी।
  • जिन राज्यों में इससे संबंधित निर्णय दिए गए थे, उनमें महाराष्ट्र, बिहार, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, त्रिपुरा, मध्य प्रदेश और पंजाब शामिल हैं।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई टिप्पणियां:

  • एम नागराज (2006) और जरनैल सिंह (2018) में अदालत के फैसले के अनुसार, राज्य ‘मात्रात्मक डेटा’ (Quantifiable Data) एकत्र करने के लिए बाध्य है।
  • सभी सेवाओं की प्रत्येक श्रेणी के पदों हेतु आंकड़ों का संग्रह किया जाना चाहिए।
  • अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की पदों पर नियुक्ति के प्रतिशत के बारे में जानकारी जुटाने के पश्चात्, केंद्र सरकार को आरक्षण नीति पर फिर से विचार करने के लिए एक समय अवधि निर्धारित करनी चाहिए।
  • प्रोन्नति पदों में आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधित्व की कमी का आकलन करने का दायित्व राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए।

बी के पवित्र बनाम भारत संघ मामला:

  • शीर्ष अदालत ने मात्रात्मक डेटा के संग्रह हेतु इकाई के रूप में ‘कैडर’ / ‘संवर्ग’ को मान्यता देते हुए, ‘बी. के. पवित्र बनाम भारत संघ मामले में सुनाए गए अपने पूर्व फैसले को खारिज कर दिया।
  • बी के पवित्र-द्वितीय (B K Pavithra –II) मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2019 के फैसले में ‘आरक्षण अधिनियम, 2018’ की वैधता को बरकरार रखा गया था। इस अधिनियम के द्वारा कर्नाटक की लोक सेवाओं से संबंधित नौकरियों में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के लिए ‘परिणामी वरिष्ठता’ (Consequential Seniority) दिए जाने की शुरुआत की गई थी।
  • शीर्ष अदालत ने माना कि, नागराज मामले में ‘कैडर में संख्या’ के आधार पर ‘परिणामी वरिष्ठता’ के संबंध में राज्य की नीति की पुष्टि करने वाले संविधान पीठ के फैसले का उल्लंघन किए जाने पर ‘पवित्र-द्वितीय’ (Pavithra –II) मामले का फैसला किया गया था।

कैडर अथवा संवर्ग (Cadre) क्या होता है?

प्रोन्नत पदों के संबंध में मात्रात्मक डेटा एकत्र करने के उद्देश्य से ‘कैडर’ को इकाई बनाए जाने के उद्देश्य को समझाते हुए अदालत ने कहा कि, यदि अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व से संबंधित डेटा की गणना पूरी सेवा के संदर्भ में जाती है, तो पदोन्नति में आरक्षण की पूरी कवायद निरर्थक हो जाएगी।

  • ‘कैडर’ शब्द का अर्थ, किसी सेवा में ‘कर्मियों की संख्या’ अथवा किसी स्वीकृत सेवा की एक पृथक इकाई होता है। संवर्गों का गठन करना राज्य की इच्छा पर निर्भर करता है।
  • एक पद से किसी दूसरे ग्रेड के उच्च पद पर प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए, पूरी सेवा को एक संवर्ग या कैडर नहीं माना जा सकता है।
  • पदोन्नति, एक ग्रेड से अगले उच्च ग्रेड में की जाती है, जिसके संबंध में संवर्ग का गठन किया जाता है।

एम नागराज मामला:

  • 2006 में, एम नागराज मामले (M Nagaraj case) में एक संविधान पीठ के फैसले द्वारा, राज्य को समग्र प्रशासनिक दक्षता बनाए रखने तथा साथ ही लोक रोजगार में लोगों के एक वर्ग के प्रतिनिधित्व की कमी दिखाने हेतु मात्रात्मक डेटा एकत्र करना अनिवार्य कर दिया गया था।
  • मात्रात्मक डेटा संबंधी पहलू को ‘जरनैल सिंह मामले’ में एक अन्य संविधान पीठ ने वर्ष 2018 में सुनाए गए अपने फैसले में बरक़रार रखा था। इस फैसले में अदालत ने, पदोन्नति में आरक्षण प्रदान करने से पहले “क्रीमी लेयर” को बाहर करना भी अनिवार्य कर दिया था।

केंद्र सरकार का तर्क:

केंद्र सरकार ने ‘आर के सभरवाल मामले’ में शीर्ष अदालत के 1995 के फैसले के अनुसार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की आबादी के अनुपात में पदोन्नति में आरक्षण दिए जाने के लिए जोर दिया जा रहा है। इस फैसले में कहा गया था, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए प्रोन्नति संबधी मामलों को तय करने का दायित्व केंद्र और राज्यों पर छोड़ देना चाहिए।

वर्तमान परिदृश्य:

वर्तमान में, सरकारी विभागों के प्रत्येक संवर्ग में अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति द्वारा भरे जाने वाले आवश्यक पदों का पता लगाने के लिए एक रोस्टर प्रणाली लागू है।

  • यह रोस्टर प्रणाली, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति की आनुपातिक संख्या पर आधारित है।
  • किसी भी आरक्षित समूह की रोस्टर में स्थिति, उसके लिए निर्धारित कोटे के प्रतिशत से 100 को विभाजित करके ज्ञात की जाती है।

आरक्षण का संवैधानिक आधार- अनुच्छेद 335:

अनुच्छेद 335 के अनुसार, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के दावों पर विचार करने के लिए विशेष उपायों को अपनाने की आवश्यकता है ताकि उन्हें समान अवसर मिल सके।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

  • संविधान के अनुच्छेद 16 (4) और 16 (4-A) में व्यक्तियों को पदोन्नति में आरक्षण का दावा करने का मौलिक अधिकार प्रदान नहीं किया गया है।
  • यह अनुच्छेद राज्य को केवल अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के पक्ष में नियुक्ति और पदोन्नति के मामलों में आरक्षण करने का अधिकार प्रदान करते है, बशर्ते यदि राज्य की राय में राज्य की सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद
  2. अनुच्छेद 16(4)
  3. समानता का अधिकार
  4. एम नागराज मामला

मेंस लिंक:

पदोन्नति में आरक्षण की आवश्यकता की विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिका।

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम


संदर्भ:

‘केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय’ (Micro, Small and Medium Enterprises) के विकास आयुक्त कार्यालय द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार:

  • महाराष्ट्र में अनुसूचित जातियों के उद्यमियों के स्वामित्व वाले ‘सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों’ (MSME) की संख्या (96,805 उद्यम) देश में सबसे अधिक है।
  • इस सूची में, 42,997 उद्यमों के साथ तमिलनाडु और 38,517 इकाइयों के साथ राजस्थान क्रमशः दूसरे और तीसरे स्थान पर है।
  • इस सूची में चौथा, पांचवां और छठा स्थान क्रमशः उत्तर प्रदेश (36,913 इकाइयां), कर्नाटक (28,803 उद्यम) और पंजाब (24,503 इकाइयां) का है।
  • कुल: 23 जनवरी, 2022 तक, अखिल भारतीय स्तर पर अनुसूचित जाति के स्वामित्व वाले उद्यमों की संख्या 4,53,972 थी, जिनमें से सूक्ष्म उद्यमों की संख्या 4,50,835, लघु उद्यम – 3,004 और मध्यम उद्यमों की संख्या- 133 थी।
  • राष्ट्रीय स्तर पर: आम तौर पर, MSMEs की कुल राष्ट्रीय संख्या में अनुसूचित जाति के उद्यमियों के स्वामित्व वाले उद्यमों का अनुपात 6% है।

भारत में MSME का पंजीकरण:

उदयम पंजीकरण प्रक्रिया (Udyam system of registration) 1 जुलाई, 2020 को लागू हुई थी। किसी भी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम’ (MSME) के लिए- चाहे वह किसी भी स्वामित्व की सामाजिक श्रेणी का हो- केंद्र और राज्य सरकारों से रियायतों या लाभों का लाभ उठाने के लिए ‘उदयम पंजीकरण प्रक्रिया’ के तहत पंजीकरण करवाना एक पूर्व-शर्त है।

  • इसके लिए पंजीकरण, स्व-घोषणा (self-declaration) के आधार पर ऑनलाइन दाखिल किया जा सकता है। इस प्रणाली के लागू होने के पश्चात्, प्रमाण के रूप में दस्तावेज, कागजात या प्रमाण पत्र अपलोड करना आवश्यक नहीं होगा।
  • संयंत्र, मशीनरी और उपकरण और कारोबार में निवेश, MSME वर्गीकरण के लिए बुनियादी मानदंड होंगे।
  • किसी भी उद्यम के पिछले वर्ष के आईटी रिटर्न से संबंधित निवेश की गणना करते समय तथा कारोबार की गणना करते समय, माल या सेवाओं अथवा दोनों के निर्यात को शामिल नहीं किया जाएगा।
  • उद्यमियों को पंजीकरण और उसके बाद की सुविधा प्रदान करने हेतु देश भर में ‘चैंपियंस कंट्रोल रूम’ को कानूनी रूप से जिम्मेदार बनाया गया है।

इन उपायों का महत्व और प्रभाव:

सरकार द्वारा शुरू किए गए ये उपाय MSMEs के काम करने के तरीके को पूरी तरह से बदल देंगे तथा इनको विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम करेंगे, और इसके परिणामस्वरूप नए उद्यमों की शुरुआत को प्रोत्साहन मिलेगा।

प्रोत्साहन दिए जाने के पश्चात, ये उद्यम महामारी को नियंत्रण में लाने के लिए तेजी से अर्थव्यवस्था की ‘वी-आकार’ की वहाली (V-shaped recovery) का नेतृत्व करने की स्थिति में होंगे।

MSMEs का महत्व:

देश के भौगोलिक विस्तार में MSMEs की लगभग 63.4 मिलियन इकाईयां कार्यरत हैं, तथा ये उद्योग देश के विनिर्माण सकल घरेलू उत्पाद (manufacturing GDP) में लगभग 6.11% और सेवा गतिविधि सकल घरेलू उत्पाद में  24.63% और साथ ही भारत के विनिर्माण उत्पादन में 33.4% का योगदान करते हैं।

  • MSMEs लगभग 120 मिलियन लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं और भारत से होने वाले कुल निर्यात में लगभग 45% का योगदान करते हैं।
  • लगभग 20% MSMEs ग्रामीण क्षेत्रों से बाहर स्थित हैं, जोकि इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण ग्रामीण कार्यबल के नियोजन को इंगित करता है।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च


(Gain of Function Research)

संदर्भ:

हाल ही में, कोविड -19 महामारी की उत्पत्ति के बारे में जारी बहस के दौरान ‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’ (Gain of Function Research) शब्द सामने आया है।

‘गेन-ऑफ-फंक्शन रिसर्च’ क्या है?

‘गेन ऑफ फंक्शन’, वायरस में उत्परिवर्तन का कारण बनने वाली परिस्थितियों में, सूक्ष्मजीवों के वृद्धिमान प्रजनन पर केंद्रित अनुसंधान का एक क्षेत्र है।

  • इन प्रयोगों को ‘गेन ऑफ फंक्शन’ इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनमें रोगाणुओं (Pathogens) के साथ इस तरह से हेरफेर किया जाता है, कि इनके लिए किसी कार्य (function), जैसेकि प्रसार में वृद्धि, में अथवा इसके माध्यम से लाभ प्राप्त होता है।
  • इस तरह के प्रयोग, वैज्ञानिकों को उभरती संक्रामक बीमारियों की बेहतर भविष्यवाणी करने और टीके और चिकित्सीय उपचार विकसित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

क्रिया-पद्धति:

  1. इन प्रयोगों में, जानबूझकर किसी जीव का प्रयोगशाला में परिवर्तन, जीन-परिवर्तन, या किसी रोगाणु की प्रसरण क्षमता (transmissibility), प्रचंडता और प्रतिरक्षाजनत्व / इम्युनोजेनेसिटी (Immunogenicity) का अध्ययन करने हेतु इसमें उत्परिवर्तन (mutation) कराना शामिल होता है।
  2. इन प्रक्रियाओं को, वायरस की जेनेटिक इंजीनियरिंग करके और इनके लिए विभिन्न माध्यमों में वृद्धि करने का अवसर देकर पूरा किया जाता है। इस तकनीक को सीरियल पैसेज (serial passage) कहा जाता है।

इस प्रकार के अनुसंधानों से संबंधित मुद्दे:

  • ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ अनुसंधान में ‘हेरफेर’ (manipulation) का उपयोग किया जाता है, जिसके माध्यम से कुछ रोगाणु सूक्ष्मजीव अधिक घातक या अधिक संक्रामक बन जाते हैं।
  • इसके अलावा एक ‘लॉस-ऑफ-फंक्शन’ (loss-of-function) अनुसंधान भी होता है, जो ‘निष्क्रिय उत्परिवर्तन’ (inactivating mutations) से संबंधित है। इस प्रकार के प्रयोगों के परिणामस्वरूप रोगाणु, ‘निष्क्रिय’ (no function) हो जाते हैं अथवा अपना मुख्य कार्य करना कम कर देते हैं।
  • गेन-ऑफ-फंक्शन अनुसंधान में, कथित तौर पर जैव सुरक्षा संबंधी जोखिम अंतर्निहित होते हैं और इसी वजह से, इसके लिए ‘चिंताजनक दोहरा उपयोग अनुसंधान’ (dual-use research of concern- DURC) भी कहा जाता है।

सीरियल पैसेजिंग (Serial passaging) में, विभिन्न परिस्थितियों में रोगाणुओं को वृद्दि करने का अवसर देकर, उनमे होने वाले परिवर्तनों का अवलोकन किया जाता है।

कोविड -19 महामारी के संदर्भ में प्रासंगिकता:

  • हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दिए गए तर्क के अनुसार, कोविड -19 महामारी के वायरस को ‘वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी’ में गलती से लीक होने की संभावना को पूरी तरह से खारिज नहीं किया जा सकता है। इस रिपोर्ट के बाद ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ अनुसंधान चर्चा के केंद्र में आ गया है।
  • हालांकि, वैज्ञानिकों ने पहले वायरस के ‘जेनेटिकली इंजीनियर’ होने की संभावना से इनकार किया था, किंतु, हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, चीनी शहर में जारी ‘गेन-ऑफ-फंक्शन’ रिसर्च के दौरान ‘सीरियल पैसेजिंग’ से इस वायरस का विकास होने की संभवना हो सकती है।

भारत में इसे किस प्रकार विनियमित किया जाता है?

जेनेटिकली इंजीनियर्ड जीवों या कोशिकाओं, खतरनाक सूक्ष्मजीवों और उत्पादों से संबंधित सभी गतिविधियों को “खतरनाक सूक्ष्मजीवों / आनुवंशिक रूप से संशाधित जीवों या कोशिकाओं के निर्माण, उपयोग, आयात, निर्यात और भंडारण नियम, 1989” के अनुसार विनियमित किया जाता है।

  • वर्ष 2020 में, जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा जैव सुरक्षा प्रयोगशाला’ नामक रोकथाम सुविधाओं की स्थापना हेतु दिशानिर्देश जारी किए गए।
  • इस अधिसूचना में जैव खतरों और जैव सुरक्षा के स्तर पर परिचालन दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, जिनका सूक्ष्मजीवों से संबंधित अनुसंधान, विकास और प्रबंधन में संलग्न सभी संस्थानों को पालन करना अनिवार्य किया गया है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘फॉरवर्ड जेनेटिक्स’ और ‘रिवर्स जेनेटिक्स’ के बीच अंतर जानते हैं?

स्रोत: द हिंदू।

 

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


धार्मिक तीर्थ स्थलों की यात्रा प्रोटोकॉल 1974

धार्मिक तीर्थ स्थलों की यात्रा पर प्रोटोकॉल 1974 (Protocol on Visits to Religious Shrines 1974) भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय समझौता है, इसके तहत भारतीय और पाकिस्तानी नागरिकों को दोनों देशों में कुछ धार्मिक तीर्थ स्थलों की यात्रा करने की सुविधा प्रदान करता है।

नवंबर 2018 तक, इस प्रोटोकॉल के तहत पाकिस्तान में पंद्रह और भारत में पांच स्थान शामिल हैं।

प्रोटोकॉल में शामिल भारत के धार्मिक स्थल:

  1. सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती को समर्पित राजस्थान के अजमेर स्थित ‘अजमेर शरीफ दरगाह’
  2. सूफी संत निजामुद्दीन औलिया को समर्पित निजामुद्दीन दरगाह, दिल्ली
  3. दिल्ली में स्थित सूफी संगीतकार अमीर खुसरो को समर्पित दरगाह
  4. मुजद्दिद अल्फ सानी सरहिंद को समर्पित भारत के पंजाब में स्थित ‘सरहिंद शरीफ’
  5. हरिद्वार के पास सूफी संत अलाउद्दीन अली अहमद साबिर को समर्पित ‘कलियार शरीफ’

चर्चा का कारण:

हाल ही में, भारत ने कहा है कि, धार्मिक स्थलों की यात्रा के लिए 1974 के प्रोटोकॉल के तहत सहमत तीर्थस्थलों और यात्रा के तरीके की सूची का विस्तार करने के लिए भारतीय और पाकिस्तानी दोनों पक्षों में रुचि है और इस संबंध में उसका ‘सकारात्मक दृष्टिकोण’ है और वह इस पर इस्लामाबाद के साथ बातचीत करने को तैयार है।

 

राष्ट्रीय कैडेट कोर

‘राष्ट्रीय कैडेट कोर’ (National Cadet Corps – NCC) एक युवा विकास आंदोलन है। इसका गठन 1948 के राष्ट्रीय कैडेट कोर अधिनियम XXXI के तहत किया गया था।

  • यह देश के युवाओं को अनुशासित और देशभक्त नागरिक बनाने में संलग्न एक त्रि-सेवा संगठन है, जिसमें थल सेना, नौसेना और वायु सेना शामिल है।
  • NCC देश के युवाओं को उनके सर्वांगीण विकास के लिए कर्तव्य, प्रतिबद्धता, समर्पण, अनुशासन और नैतिक मूल्यों की भावना के साथ अवसर प्रदान करता है ताकि वे सक्षम नेता और उपयोगी नागरिक बन सकें।
  • एनसीसी में स्वैच्छिक आधार पर स्कूलों और कॉलेजों के सभी नियमित छात्रों शामिल हो सकते हैं। छात्रों को सक्रिय सैन्य सेवा देने संबंधी कोई दायित्व नहीं है।

 

भारत और फिलीपींस के मध्य ब्रह्मोस मिसाइलों का सौदा

हाल ही में, ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड (बीएपीएल) ने फिलीपींस को तट आधारित एंटी-शिप मिसाइल प्रणाली की आपूर्ति को लेकर फिलीपींस गणराज्य के राष्ट्रीय रक्षा विभाग के साथ $374.96-मिलियन के सौदे पर हस्ताक्षर किए हैं।

  • यह भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम ‘ब्रह्मोस मिसाइल’ के निर्यात का पहला ऑर्डर है।
  • ब्रह्मोस, भारत के रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और रूस के NPO Mashinostroyeniya का एक संयुक्त उद्यम है।
  • इसका नामकरण ब्रह्मपुत्र और मोस्कवा नदियों के नाम पर किया गया है।
  • यह मिसाइल जमीन, समुद्र, और हवा से सतह और समुद्र-स्थित लक्ष्यों के खिलाफ हमला करने में सक्षम है। और काफी लंबे समय से भारतीय सशस्त्र बलों के शस्त्रागार में शामिल है।
  • ‘मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था’ के दायित्वों के अनुसार, मिसाइल की मारक क्षमता मूल रूप से 290 किमी तक सीमित थी। जून 2016 में क्लब में भारत के शामिल होने के बाद, इस सीमा को 450 किमी और बाद में 600 किमी तक बढ़ाने पर विचार किया जा रहा है।

 

नियो कोव वायरस

संदर्भ:

चीन के शोधकर्ताओं ने एक और नए वायरस ‘नियोकोव’ (NeoCov) का पता लगाया है। कहा जा रहा है कि ये कोरोना से भी ज्यादा खतरनाक है।

  • ये नया वायरस दक्षिण अफ्रीका में मिला है और यह काफी तेजी से फैलता है।
  • वुहान यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह वायरस इंसान की कोशिकाओं में कोरोना वायरस की तरह ही दाखिल होता है।

इसके बारे में:

‘नियोकोव’ (NeoCov) एक चमगादड़ से फैलने वाला कोरोनावायरस (bat coronavirus) है, इस वायरस को पहली बार 2011 में पहचाना गया था।

  • इसकी पहचान चमगादड़ों की एक प्रजाति में की गई, जिसे ‘नियोरोमिसिया’ (Neoromicia) के नाम से जाना जाता है, इसी वजह से इसे ‘नियोकोव’ (NeoCoV) नाम दिया गया।
  • आमतौर पर ‘ऐला चमगादड़’ (Aloe Bats) के रूप में जाना जाता है, यह प्रजाति एफ्रो-मालागासी क्षेत्र में पायी जाती है। NeoCoV वायरस जीनोम अनुक्रम में MERS-CoV से 85% समान है।

 


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