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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. प्रतिनियुक्ति संबंधी वर्तमान नियम

2. गुजरात उच्च न्यायालय की डिजिटल पहल

 

सामान्य अध्ययनIII

1. हाई-थ्रस्ट विकास इंजन का परीक्षण

2. अंतरिक्ष मलबा

3. नासा का आर्टेमिस मिशन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: लोकतंत्र में सिविल सेवाओं की भूमिका।

प्रतिनियुक्ति संबंधी वर्तमान नियम


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा आईएएस अधिकारियों की ‘केंद्रीय प्रतिनियुक्ति’ (Central Deputation) पर अधिक नियंत्रण रखने के लिए ‘आईएएस (कैडर) नियमों’ (IAS (Cadre) Rules) में संशोधन का प्रस्ताव किया गया है।

केंद्रीय प्रतिनियुक्ति संबंधी मामले प्रायः केंद्र और राज्यों के बीच खींचतान की वजह से चर्चा के केंद्र में रहते है।

प्रतिनियुक्ति संबंधी वर्तमान नियम:

भारतीय प्रशासनिक सेवा में ‘केंद्रीय प्रतिनियुक्ति’ संबंधी विषय ‘भारतीय प्रशासनिक सेवा (संवर्ग) नियम’, 1954 का नियम 6(I), (Rule 6(I) of the Indian Administrative Service (cadre) Rules, 1954) के अंतर्गत नियंत्रित किए जाते हैं। इन नियमों को मई 1969 में शामिल किया गया था।

इस नियम के अनुसार:

‘भारतीय प्रशासनिक सेवा (संवर्ग) नियम’, 1954 के नियम 6(I) में कहा गया है, कि “किसी संवर्ग अधिकारी को, संबंधित राज्य सरकारों और केंद्र सरकार की सहमति से, केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार या किसी निगमित अथवा गैर-निगमित कंपनी, संघ या व्यक्तिक निकाय, जिसका पूर्ण या पर्याप्त स्वामित्व या नियंत्रण केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य सरकार के पास हो, के अधीन सेवा में प्रतिनियुक्त किया जा सकता है।“

असहमति के मामले में क्या होता है?

नियम 6(I) में कहा गया है कि, ‘किसी भी असहमति के मामले में, प्रकरण को केंद्र सरकार द्वारा तय किया जाएगा और राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार के निर्णय को लागू किया जाएगा।”

हालांकि, मौजूदा नियमों में इस तरह की असहमति पर निर्णय लेने के लिए किसी समय सीमा का उल्लेख नहीं किया गया है।

प्रस्तावित संशोधन:

  • ‘आईएएस (कैडर) नियमों’ में संशोधन का प्रस्ताव पारित होने के बाद केंद्र सरकार को ‘केंद्रीय प्रतिनियुक्ति’ संबंधी मामलों में अधिक अधिकार प्राप्त होंगे।
  • यह संशोधन, केंद्र सरकार को राज्य सरकार की सहमति के बिना भी किसी राज्य में तैनात भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS), भारतीय पुलिस सेवा (IPS) और भारतीय वन सेवा (IFoS) अधिकारी को अपनी सेवा में बुलाने की शक्ति प्रदान करता है।
  • यदि राज्य सरकार द्वारा केंद्र सरकार के निर्णय को निर्धारित समय के भीतर लागू नहीं किया जाता है, तो केंद्र सरकार उस अधिकारी को उसके संवर्ग (कैडर) से मुक्त कर सकती है।
  • किसी भी तरह की असहमति की स्थिति में, मामले का निर्णय केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा और संबंधित राज्य सरकार या राज्य सरकारें केंद्र सरकार के निर्णय को “एक निर्दिष्ट समय के भीतर” लागू करेंगी।
  • किसी महत्वपूर्ण समयबद्ध प्रमुख (फ्लैगशिप) कार्यक्रम या परियोजना के लिए विशिष्ट क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले आईएएस अधिकारी की सेवाओं की आवश्यकता होने पर उसे नियोजित किया जा सकता है।

संशोधन की आवश्यकता:

केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व के हिस्से के रूप में विभिन्न राज्य/संयुक्त संवर्ग केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए पर्याप्त संख्या में अधिकारियों को प्रायोजित नहीं कर रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए उपलब्ध अधिकारियों की संख्या, केंद्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

वर्तमान में कितने अधिकारी ‘प्रतिनियुक्ति’ के अंतर्गत कार्यरत हैं?

वर्ष 2021 में केवल 10% मध्य-स्तर के आईएएस अधिकारी केंद्र सरकार की सेवा में तैनात थे, जोकि वर्ष 2014 में ‘प्रतिनियुक्ति’ पर तैनात अधिकारियों की संख्या से 19% कम है।

  • केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात किए जाने वाले आईएएस अधिकारियों की निर्धारित संख्या वर्ष 2014 में 621 थी, जिसे वर्ष 2021 में लगभग 80% बढाकर 1130 कर दिया गया था, इस वजह से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर आईएएस अधिकारियों की कमी और भी अधिक हो जाती है।
  • कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पास उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, आईएएस अधिकारियों के ‘केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व’ की संख्या 2011 में 309 से घटकर 2021 में 223 रह गयी है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि किसी भी संवर्ग की कुल संख्या की गणना ‘केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व’ (CDR) को शामिल करके की जाती है, जोकि स्वीकृत पदों का लगभग 40% होती है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित नियम
  2. IAS, IPS और IFS के संवर्गों के प्रबंधन की जिम्मेदारी
  3. सिविल सेवा बोर्ड
  4. राज्य सरकार के अधीन तैनात सिविल सेवा अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की शक्तियां किसके पास हैं?
  5. भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारियों के लिए गृह मंत्रालय की प्रतिनियुक्ति नीति

मेंस लिंक:

आईपीएस कैडर नियम, 1954 के आपातकालीन प्रावधानों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

गुजरात उच्च न्यायालय की डिजिटल पहल


संदर्भ:

हाल ही में, गुजरात उच्च न्यायालय के लिए दो डिजिटल सेवाओं – ‘जस्टिस क्लॉक’ और ‘अदालत शुल्क हेतु इलेक्ट्रॉनिक भुगतान’ प्रणाली का उद्घाटन किया गया।

जस्टिस क्लॉक:

  • जस्टिस क्लॉक (Justice Clock), जमीन से 17 फीट की ऊंचाई पर स्थापित किया गया 7 फीट लंबा और 10 फीट चौड़ा एक एलईडी डिस्प्ले (LED display) है।
  • इसे ‘उच्च न्यायालय’ के परिसर में स्थापित किया गया है।
  • यह ‘जस्टिस क्लॉक’ राज्य की न्यायपालिका द्वारा किए गए कार्यों की “अधिकतम पहुंच और दृश्यता” सुनिश्चित करने हेतु, गुजरात में ‘न्याय वितरण प्रणाली’ के महत्वपूर्ण आंकड़ों को प्रदर्शित करेगी।

‘ई-कोर्ट शुल्क’ भुगतान प्रणाली:

ऑनलाइन ई-कोर्ट शुल्क प्रणाली (e-Courts fee system) अधिवक्ता और पक्षकारों को इलेक्ट्रॉनिक भुगतान के माध्यम से और ‘पीडीएफ रसीद’ जमा करने पर ‘न्यायिक टिकटों’ को ऑनलाइन खरीदने की सुविधा प्रदान करेगी।

इन पहलों का महत्व:

  • ये दोनी डिजिटल पहलें, गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा कोविड-19 से बचाव हेतु अपनाए गए अन्य डिजिटल उपायों का एक भाग हैं।
  • डिजिटल परिवर्तन से अदालती कार्यवाही में पारदर्शिता और खुलापन आता है, और यह जनता को न्यायाधीशों की कार्य-पद्धति की एक झलक भी प्रदान करता है।

‘डिजिटलीकरण’ की आवश्यकता:

भारतीय अदालतों के बारे में यह धारणा प्रचलित है, कि अदालतें न्याय देने में काफी लंबा समय लगाती हैं और जिससे आम वादियों के लिए मुश्किल होती हैं। यह उम्मीद की जाती है, कि प्रौद्योगिकी से ‘न्याय वितरण’ में क्रांति आयेगी।

महामारी के दौरान न्यायपालिका द्वारा किए गए प्रयास:

  1. महामारी के मद्देनजर, अदालतों ने गंभीरतापूर्वक ‘ई-फाइलिंग’ जैसी सुविधाओं का उपयोग करना शुरू कर दिया।
  2. मई 2020 में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘ई-फाइलिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता-सक्षम संदर्भ की एक नई प्रणाली’ संबंधी एक अन्य नवाचार की भी शुरुआत की गयी थी।
  3. ई-कोर्ट परियोजना के तीसरे चरण के लिए ‘नवीनतम विजन दस्तावेज़’ में न्यायपालिका के डिजिटल क्षमता में कमी को दूर करने का प्रयास करता है। इसमें न्यायिक प्रणाली के लिए एक ऐसे बुनियादी ढांचे की परिकल्पना करता है जो ‘मूल रूप से डिजिटल’ है और भारत की ‘न्यायिक समयरेखा और सोच’ पर महामारी के प्रभाव को दर्शाता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

हाई-थ्रस्ट विकास इंजन का परीक्षण


संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा तमिलनाडु के महेंद्रगिरि में स्थित ‘इसरो प्रोपल्शन कॉम्प्लेक्स’ (IPRC) में अपने ‘उच्च प्रणोद विकास इंजन’ / ‘हाई थ्रस्ट विकास इंजन’ (High Thrust VIKAS Engine) का सफल अहर्ता परीक्षण किया गया।

‘विकास इंजन’ भारत के महत्वाकांक्षी ‘गगनयान मिशन’ को अंतरिक्ष में शक्ति प्रदान करेगा।

‘विकास इंजन’ के बारे में:

  • यह तरल ईंधन वाले रॉकेट इंजनों का वर्ग का इंजन है।
  • इसका उपयोग, ‘ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान’ (PSLV) और ‘भूतुल्यकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यानों’ (GSLV) की श्रृंखला में किया जाता है।
  • इस इंजन में ईधन के रूप में असीमित डायमिथाइल हाइड्रोजन व ऑक्सीकारक के रूप में नाइट्रोजन टेट्रोआक्साइड का प्रयोग होता है।

गगनयान कार्यक्रम के बारे में:

गगनयान कार्यक्रम (Gaganyaan programme) की औपचारिक घोषणा, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त, 2018 को अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन के दौरान की थी।

  • इसरो का लक्ष्य, भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ से पहले, 15 अगस्त, 2022 तक अपने पहले मानव-सहित अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ को प्रक्षेपित करना है।
  • इस प्रक्षेपण के साथ, भारत संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और चीन के बाद मानव अंतरिक्ष उड़ान मिशन शुरू करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा।

उद्देश्य:

गगनयान कार्यक्रम का उद्देश्य, भारतीय प्रक्षेपण यान पर मानव को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजने और उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी पर वापस लाने की क्षमता प्रदर्शित करना है।

तैयारियां और प्रक्षेपण:

  1. गगनयान कार्यक्रम के एक भाग के रूप में चार भारतीय अंतरिक्ष यात्री-उम्मीदवार पहले ही रूस में सामान्य अंतरिक्ष उड़ान प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं।
  2. इस मिशन के लिए, इसरो के हैवी-लिफ्ट लॉन्चर ‘जी.एस.एल.वी. मार्क III’ (GSLV Mk III) को चिह्नित किया गया है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. गगनयान के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. जीएसएलवी के बारे में

मेंस लिंक:

गगनयान मिशन भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अंतरिक्षीय कचरा


(Space debris)

संदर्भ:

रूस ने नवंबर में एक मिसाइल परीक्षण में अपने पुराने उपग्रहों में से एक को नष्ट कर दिया था, जिसकी वजह से पृथ्वी की कक्षा के चारों ओर बिखरने वाले ‘अंतरिक्ष मलबे’ (Space debris) से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोष फ़ैल गया है।

हाल ही में, ‘सिंघुआ साइंस सैटेलाइट’ (Tsinghua Science Satellite) नामक एक चीनी उपग्रह, इस रूसी एंटी-सैटेलाइट मिसाइल परीक्षण के परिणामस्वरूप बिखरे हुए मलबे के एक टुकड़ों के साथ टकरा गया था।

संबंधित प्रकरण:

हर गुजरते हुए दशक के साथ विभिन्न देशों के द्वारा अंतरिक्षीय गतिविधियों में वृद्धि होती जा रही है, और इसके साथ ही अंतरिक्ष में मलबे की समस्या नियंत्रण से बाहर हो रही है। रूस द्वारा उपग्रह-रोधी हथियारों के परीक्षण, जैसी हालिया घटनाएं इस समस्या को और बढ़ा रही हैं।

  • यह मलबा, अब अंतरिक्ष कबाड़ की समस्या को बढ़ा रहा है और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और भूस्थिर कक्षा में उपग्रहों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।
  • अंतरिक्षीय मलबा, वर्तमान में अंतरिक्ष में रहने वाले अमेरिकी, रूसी और चीनी अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन के लिए एक संभावित खतरा भी बन सकता है।

 

‘अंतरिक्षीय कचरा’ क्या होता है?

अंतरिक्षीय कचरा अथवा अंतरिक्षीय मलबा (Space debris), संचार, परिवहन, मौसम और जलवायु निगरानी, ​​रिमोट सेंसिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के निष्पादन में सहयोग करने वाली, अंतरिक्ष में स्थित प्रौद्योगिकियों के समक्ष, एक वैश्विक खतरा उत्पन्न करता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से, और भारतीय मूल की सार्वजनिक और निजी संपत्ति की सुरक्षा के लिए भी, इन अंतरिक्षीय-पिण्डों से टकराव की संभावना का अनुमान लगाना काफी महत्वपूर्ण है।

अंतरिक्ष में मलबे की मात्रा:

चूंकि, वर्तमान सेंसर तकनीक छोटे आकार के पिंडों का पता लगाने में सक्षम नहीं है, फिर भी इसके द्वारा प्रदान किये गए आंकड़ों के आधार पर माना जाता है, कि अंतरिक्षीय मलबे में 500,000 से एक मिलियन टुकड़े / खंड शामिल हैं।

ये सभी खंड 17,500 मील प्रति घंटे (28,162 किमी प्रति घंटे) की गति से भ्रमण कर रहे है, तथा कक्षीय मलबे का एक छोटा सा टुकड़ा भी किसी उपग्रह या अंतरिक्ष यान को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।

इस परियोजना का महत्व:

इस परियोजना के नतीजों में, एक कार्यात्मक रूप से अनुकूल, मापनीय (scalable), पारदर्शी और स्वदेश निर्मित टक्कर संभावना समाधान तैयार किया जाएगा, जिससे भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र को प्रत्यक्ष $ 7 बिलियन (51,334 करोड़ रुपये) की सहायता मिलेगी।

इस समस्या से निपटने हेतु प्रौद्योगिकियां:

किसी पिंड की कक्षा में परिवर्तन करके उसे मार्ग से हटाना, एक संभावित दुर्घटना को टालने का एक तरीका है, किंतु, इसके लिए अंतरिक्ष में मलबे की भारी मात्रा होने की वजह से इसका निरंतर अवलोकन और अनुमानित मार्ग निर्धारित करना आवश्यक होता है।

  • अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर लगा हुआ नासा का ‘अंतरिक्षीय मलबा संवेदक’ (Space Debris Sensor), पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है। यह सेंसर, दिसंबर 2017 में अंतरिक्ष स्टेशन के यूरोपीय कोलंबस मॉड्यूल पर बाहर से जोड़ा गया था। यह न्यूमतम दो वर्षों तक ‘मलबे’ के मिलीमीटर आकार के टुकड़ों का पता लगाएगा तथा इन टुकड़ों के आकार, घनत्व, वेग, कक्षा और किसी भी संभावित टकराव से संबंधित जानकारी प्रदान करेगा। इसके अलावा, यह सेंसर यह भी निर्धारित करेगा, कि टकराने वाला पिंड अंतरिक्ष में गतिमान कोई पिंड है या मानव निर्मित अंतरिक्ष मलबे का कोई टुकड़ा है।
  • रिमूव डेब्रिस (REMOVEdebris), इस उपग्रह के माध्यम से, दो क्यूबसैट द्वारा अंतरिक्ष में कृत्रिम मलबे को छोड़ा जाएगा और इस मलबे को पुनर्प्राप्त करने के कई तरीकों का प्रदर्शन किया जाएगा।
  • डीऑर्बिट मिशन (Deorbit mission): नासा द्वारा दो उभरती हुई प्रौद्योगिकियां विकसित की जा रही हैं, जिन्हें ‘डीऑर्बिट मिशन’ के रूप में जाना जाता है। इन तकनीकों का उपयोग अंतरिक्ष कबाड़ को मार्ग से हटाने अथवा इसे पकड़ने के लिए किया जाएगा।
  • ‘अंतरिक्षीय मलबे’ की समस्या से निपटने हेतु अन्य तकनीकों में, एक शक्तिशाली लेजर बीम के माध्यम से मलबे के टुकड़ों को हटाना शामिल हैं।
  • इस समस्या से निपटाना अति महत्वपूर्ण है, क्योंकि वैज्ञानिक अनुमानों का अनुमान है कि सक्रिय मलबे को नहीं हटाने पर, आने वाले दशकों में अंतरिक्ष में कुछ ऑर्बिटस (कक्षाएं) अनुपयोगी हो जाएंगी।

नेत्र (NETRA):

पिछले दिसंबर में, इसरो द्वारा, अंतरिक्ष मलबे से अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए, बेंगलुरु में ‘नेत्र’ (NETRA) नामक ‘स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस’ (SSA) नियंत्रण केंद्र स्थापित किया गया था।

  • ‘नेत्र’ का मुख्य उद्देश्य, राष्ट्रीय अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की देखरेख, निगरानी और सुरक्षा करना तथा सभी SSA गतिविधियों के केंद्र के रूप में कार्य करना है।
  • केवल अमेरिका, रूस और यूरोप में पास, अंतरिक्ष पिंडों पर नज़र रखने और टकराव संबंधी चेतावनियों को साझा करने वाली, इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

भारत की एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइल:

‘मिशन शक्ति’, रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का एक संयुक्त कार्यक्रम है।

  • इस मिशन के अंतर्गत, कुछ समय पूर्व भारत ने एक एंटी-सैटेलाइट (ए-सैट) हथियार (anti-satellite (A-SAT) weapon) लॉन्च किया था। इस एंटी-सैटेलाइट मिसाइल ने एक भारतीय उपग्रह को लक्षित करते हुए उसे निष्क्रिय कर दिया था।
  • ‘मिशन शक्ति’ को ओडिशा के बालासोर में DRDO की टेस्टिंग रेंज से अंजाम दिया गया।

महत्व:

ऐसी विशिष्ट और आधुनिक क्षमता हासिल करने वाला भारत पूरे विश्व में केवल चौथा देश है, और भारत का पूर्णतयः स्वदेशी प्रयास है। अभी तक केवल अमेरिका, रूस और चीन के पास ही अंतरिक्ष में किसी कार्यरत लक्ष्य को भेदने की क्षमता थी।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘एंटी-सैटेलाइट हथियार’ एक हाई-टेक मिसाइल होते हैं जोकि मात्र कुछ देशों के पास हैं? वर्तमान में यह तकनीकी क्षमता किन देशों के पास हैं?

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

आर्टेमिस कार्यक्रम


संदर्भ:

नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम (Artemis Program) के तहत चंद्रमा पर भेजे जाने वाले पहले रॉकेट और अंतरिक्ष यान की फरवरी माह में लॉन्च पैड पर “वेट ड्रेस रिहर्सल” (wet dress rehearsal) किए जाने की संभावना है।

आर्टेमिस क्या है?

आर्टेमिस (ARTEMIS) का पूरा नाम “ऐक्सेलरैशन, रीकनेक्शन, टर्ब्युलन्स एंड इलेक्ट्रोडायनामिक्स ऑफ़ मून’स इंटरएक्शन विद द सन” (Acceleration, Reconnection, Turbulence and Electrodynamics of Moon’s Interaction with the Sun) अर्थात चंद्रमा का सूर्य के साथ अंतःक्रिया का गतिवर्धन, पुन:संयोजन, विक्षोभ तथा विद्युत्-गतिकी है।

यह नासा द्वारा चंद्रमा पर भेजा जाने वाला अगला मिशन है।

उद्देश्य:

इसका उद्देश्य, चंद्रमा की चट्टानी सतह, जहाँ इसकी रक्षा के लिए कोई चुंबकीय क्षेत्र नहीं होता है- पर सूर्य का विकिरण के टकराने के प्रभाव को मापना है।

ग्रीक पौराणिक कथाओं में, ‘आर्टेमिस’ अपोलो की जुड़वां बहन और चंद्रमा की देवी थी।

मिशन का महत्व:

आर्टेमिस कार्यक्रम के तहत, नासा द्वारा वर्ष 2024 तक चंद्रमा की सतह पर पहली बार किसी महिला को तथा अगले पुरुष को उतारा जाएगा।

मिशन विवरण:

  • स्पेस लॉन्च सिस्टम (SLS) नामक नासा के शक्तिशाली नए रॉकेट से ‘ओरियन अंतरिक्ष यान’ में सवार अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी से लगभग सवा लाख मील की दूरी पर चंद्रमा की कक्षा में भेजा जाएगा।
  • अंतरिक्ष यात्री ‘ओरियन यान’ को गेटवे (Gateway ) पर डॉक करेंगे और चंद्रमा की सतह पर अभियान हेतु मानव लैंडिंग सिस्टम में पहुंचेंगे।
  • अभियान की समाप्ति पर अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी पर सुरक्षित लौटने हेतु फिर से ओरियन पर सवार होने लिए ‘कक्षीय चौकी’ (orbital outpost) पर लौट आएंगे।

नासा का ‘गेटवे लूनर ऑर्बिट आउटपोस्ट’ क्या है?

गेटवे (Gateway) एक छोटा सा अंतरिक्ष यान है जो चंद्रमा की परिक्रमा करेगा। यह अंतरिक्ष यात्रियों के लिए चंद्रमा पर ले जाएगा तथा बाद में इसको मंगल अभियानों के लिए प्रयोग किया जायेगा।

  • यह पृथ्वी से लगभग 250,000 मील की दूरी पर स्थित अंतरिक्ष यात्रियों के लिए एक अस्थायी कार्यालय तथा निवास-स्थान के रूप में कार्य करेगा।
  • इस अंतरिक्ष यान में अंतरिक्ष यात्रियों के लिए क्वार्टर, विज्ञान और अनुसंधान के लिए प्रयोगशालाएं तथा आने वाले अंतरिक्ष यानों के लिए डॉकिंग पोर्ट (docking ports) होंगे।
  • अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (International Space Station- ISS) की तुलना में, गेटवे बहुत छोटा है।

पृष्ठभूमि- आर्टेमिस 1 एवं आर्टेमिस 2:

नासा द्वारा अपनी गहन अंतरिक्ष अन्वेषण प्रणालियों का परीक्षण करने हेतु चंद्रमा के चारों ओर दो मिशन भेजे जाएंगे।

  1. आर्टेमिस 1 (Artemis 1) का लक्ष्य, एक बार उड़ान भरने वाले ओरियन अंतरिक्ष यान के साथ, अभी तक एक बार भी उडान नहीं भरने वाले ‘स्पेस लॉन्च सिस्टम रॉकेट’ के संयोजन का उपयोग करके चंद्रमा के चारों ओर एक मानव रहित अंतरिक्ष यान भेजना है।
  2. आर्टेमिस 2 (Artemis 2): वर्ष 2024 में चंद्रमा की परिक्रमा करने वाले आर्टेमिस 2 मिशन को लांच करने के साथ, नासा द्वारा आर्टेमिस कार्यक्रम का विस्तार करने की योजना है। इसके बाद वर्ष 2020 के दशक में भेजे जाने वाले अन्य चालक दल सहित मिशनों से पहले वर्ष 2025 में आर्टेमिस 3 मिशन भेजा जाएगा।

वैज्ञानिक उद्देश्य:

  • दीर्घावधि तक अन्वेषण करने के दौरान आवश्यक पानी और अन्य महत्वपूर्ण संसाधनों का पता लगाना और उनका उपयोग करना।
  • चंद्रमा के रहस्यों की जांच करना और पृथ्वी तथा ब्रह्मांड के बारे में अधिक जानकारी जुटाना।
  • अंतरिक्ष यात्री द्वारा मात्र तीन दिन दूर स्थित किसी अन्य खगोलीय पिंड की सतह पर रहने और कार्य करने के बारे में जानकारी जुटाना।
  • मंगल मिशन पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने से पहले हमें जिन तकनीकों की आवश्यकता है, उन्हें प्रमाणित करना। मंगल मिशन में तीन साल तक का समय लग सकता है।

Current Affairs 

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आर्टेमिस स्पेस मिशन के बारे में
  2. उद्देश्य
  3. स्टारशिप के बारे में
  4. महत्वपूर्ण इंटरप्लेनेटरी स्पेस मिशन

मेंस लिंक:

नासा के आर्टेमिस कार्यक्रम पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

डार्क एनर्जी


संदर्भ:

हाल ही में लॉन्च किए गए ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ (JWST) के लिए प्राथमिकता वाले लक्ष्यों की सूची में, वर्तमान में खगोल विज्ञान और ब्रह्मांड विज्ञान के सामने दो सबसे गूढ़ पहेलियों- डार्क मैटर और डार्क एनर्जी- की प्रकृति को बेहतर ढंग से समझना शामिल किया गया है।

current affairs

 

‘डार्क एनर्जी’ क्या है?

अब तक जितना कुछ ज्ञात है उससे कही अधिक अज्ञात है। हम जानते हैं कि अंतरिक्ष में कितनी डार्क एनर्जी मौजूद है, क्योंकि हम जानते हैं कि यह ब्रह्मांड के विस्तार को किस प्रकार प्रभावित करती है। इसके अलावा, ‘डार्क एनर्जी’ (Dark Energy) एक पूर्ण रहस्य है। किंतु यह एक अति महत्वपूर्ण रहस्य है, क्योंकि ब्रह्मांड का लगभग 68% हिस्सा ‘डार्क एनर्जी’ से ही बना हुआ है।

  • ‘डार्क एनर्जी’ ऊर्जा का एक काल्पनिक रूप है, जो गुरुत्वाकर्षण के विपरीत व्यवहार करते हुए एक नकारात्मक, प्रतिकारक दबाव को दर्शाती है।
  • यह, हमारे ब्रह्मांड के विस्तार की दर को धीमा करने के बजाय समय के साथ तेज कर रही है, जोकि बिग बैंग से उत्पन्न हुए ब्रह्मांड से जो अपेक्षा की जा सकती है, उसके ठीक विपरीत है।

‘डार्क एनर्जी’, डार्क मैटर से किस प्रकार भिन्न है?

हम जो कुछ भी देखते हैं – ग्रह, चंद्रमा, विशाल आकाशगंगाएँ – यह ब्रह्मांड का 5% से भी कम हिस्सा हैं। पूरे ब्रह्मांड में, लगभग 27% डार्क मैटर है और 68% डार्क एनर्जी है।

  • ‘डार्क मैटर’ (Dark Matter), आकाशगंगाओं को परस्पर आकर्षित करता है और एक साथ जोड़कर रखता है, और ‘डार्क एनर्जी’ हमारे ब्रह्मांड के विस्तार का कारण बनती है।
  • डार्क मैटर के अस्तित्व का संकेत 1920 के दशक में मिल गया था, जबकि ‘डार्क एनर्जी’ की खोज वर्ष 1998 तक नहीं हुई थी।

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XENON1T प्रयोग के बारे में:

यह विश्व का सबसे संवेदनशील ‘डार्क मैटर’ प्रयोग है, और इसे इटली की ‘INFN लेबोरेटोरी नाज़ियोनाली डेल ग्रान सासो’ (INFN Laboratori Nazionali del Gran Sasso) में भूमिगत रूप से काफी गहराई में संचालित किया जा रहा है।

इस प्रयोग में, दोहरे चरण (तरल/गैस) वाली ज़ीनान (XENON) तकनीक का उपयोग किया गया है।

सामान्य सापेक्षता का सिद्धांत:

भौतिकी के प्रमुख सिद्धांतों में ‘डार्क एनर्जी’ को अंतरिक्ष का एक विशिष्ट गुण माना जाता है। ‘अल्बर्ट आइंस्टीन’ यह समझने वाले पहले व्यक्ति थे कि अंतरिक्ष मात्र खाली जगह नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि, अंतरिक्ष का विस्तार होना भी जारी रह सकता है। अन्य वैज्ञानिकों के विचार में ब्रह्माण्ड स्थिर था, इसे देखते हुए, आइंस्टीन ने अपने ‘सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत’ (Theory of General Relativity) में, ‘ब्रह्माण्ड संबंधी स्थिरांक’ को शामिल किया था।

  • हबल दूरबीन से ब्रह्मांड के विस्तारित होने की जानकारी मिलने के बाद, आइंस्टीन ने अपने ‘स्थिरांक’ को अपनी “सबसे बड़ी भूल” कहा।
  • लेकिन, आइंस्टीन की यह भूल ‘डार्क एनर्जी’ को समझने के लिए सबसे उपयुक्त हो सकती है। यह अनुमान लगाते हुए कि ‘रिक्त स्थान’ की भी अपनी ऊर्जा हो सकती है, आइंस्टीन के ‘स्थिरांक’ इंगित करता है कि जैसे-जैसे अंतरिक्ष का निर्माण होता जाता है, ब्रह्मांड में अधिक ऊर्जा जुड़ती जाएगी, और इसका विस्तार होता जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप LUX-Zeplin और PandaX-xT प्रयोगों के बारे में जानते हैं? इनके बारे में जानने के लिए पढ़िए

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA)

हाल ही में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति ने आज भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास संस्था लिमिटेड (IREDA) में नकदी देकर इक्विटी शेयर खरीदने के जरिये 1,500 करोड़ रुपये का निवेश करने को मंजूरी दे दी है।

IREDA के बारे में:

भारतीय अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी लिमिटेड (IREDA) एक मिनी रत्न (श्रेणी-1) कंपनी है, जो नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के नियंत्रण के अधीन है।

  • वर्ष 1987 में स्थापित IREDA एक गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान के रूप में एक सार्वजनिक लिमिटेड सरकारी कंपनी है।
  • यह ऊर्जा के नवीन और नवीकरणीय स्रोतों से संबंधित परियोजनाओं की स्थापना के लिए और ऊर्जा दक्षता / ऊर्जा संरक्षण को बढ़ावा देने, विकसित करने और वित्तीय सहायता प्रदान करने में लगी हुई है।
  • इसकी आदर्श उक्ति है: “शाश्वत ऊर्जा” (ENERGY FOR EVER)।

इरेडा (IREDA) के मुख्य उद्देश्य हैं:

  1. नवीन और नवीकरणीय स्रोतों के माध्यम से विद्युत और / या ऊर्जा उत्पादन करने के लिए और ऊर्जा दक्षता के माध्यम से ऊर्जा संरक्षण के लिए विशिष्ट परियोजनाओं और स्कीमों को वित्तीय सहायता प्रदान करना ।
  2. .नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता / संरक्षण परियोजनाओं के लिए दक्ष और प्रभावी वित्तपोषण प्रदान करने के लिए एक अग्रणी संस्था के रूप में अपनी स्थिति को बनाए रखना ।
  3. अभिनव वित्तपोषण के माध्यम से अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में इरेडा की हिस्सेदारी को बढ़ाना ।
  4. सिस्टम, प्रक्रियाओं और संसाधनों के निरंतर सुधार के माध्यम से ग्राहकों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं की दक्षता में सुधार।
  5. ग्राहकों की संतुष्टि के माध्यम से प्रतिस्पर्धी संस्थान के रूप में बने रहने का प्रयास करना।

 


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