विषयसूची
सामान्य अध्ययन-II
1. दलबदल-रोधी कानून
2. हूती विद्रोही और यमन में युद्ध
3. इंडोनेशिया की नई राजधानी ‘नुसंतारा’
4. इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद
सामान्य अध्ययन–III
1. दवाओं के प्रति जीवाणु प्रतिरोध
2. चीन का कृत्रिम चंद्रमा
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
1. पूर्वी बारहसिंगा या ईस्टर्न स्वैम्प डियर
सामान्य अध्ययन-II
विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।
दलबदल–रोधी कानून
(Anti-defection law)
संदर्भ:
हाल ही में, राजनेताओं द्वारा उत्तर प्रदेश में अगले महीने से शुरू होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले दल बदलने पर, ‘बहुजन समाज पार्टी’ (BSP) प्रमुख मायावती ने एक अधिक सख्त दलबदल-रोधी कानून बनाए जाने की मांग की है।
संबंधित प्रकरण:
राजनेताओं द्वारा चुनाव से ठीक पहले दल-बदलने का चलन कोई असामान्य घटना नहीं है। और जब भी दल बदलने की घटनाएँ होती है, दल-परिवर्तन को रोकने हेतु विधि-निर्माताओं को व्यक्तिगत रूप से दंडित करते हेतु बनाया गया ‘दलबदल-रोधी कानून’ (anti-defection law) चर्चा के केंद्र में आ जाता है।
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची: प्रासंगिकता
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची, ‘दल-बदल रोधी कानून’ के रूप में लोकप्रिय है।
- इसमें उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट किया गया है, जिनके तहत सांसदों / विधायकों द्वारा राजनीतिक दलों को बदलने पर कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
- इस अनुसूची को 52वें संशोधन अधिनियम द्वारा संविधान में जोड़ा गया था।
- इसमें निर्दलीय विधायकों के चुनाव के बाद किसी पार्टी में शामिल हो जाने संबंधी स्थितियों के बारे में भी प्रावधान किए गए हैं।
इस क़ानून में किसी सांसद या विधायक द्वारा राजनीतिक दल बदलने के संबंध में निम्नलिखित तीन परिदृश्यों को निर्दिष्ट किया गया है:
- जब किसी राजनीतिक दल से संबंधित सदन का सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता त्याग देता है, अथवा यदि वह सदन में अपने राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत मत देता है अथवा मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा अपने राजनीतिक दल से उसने पंद्रह दिनों के भीतर क्षमादान न पाया हो।
- जब कोई विधायक, जो निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी सीट जीत चुका है, चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है। [उपरोक्त दो मामलों में, सांसद / विधायक, दल परिवर्तन करने (या शामिल होने) पर विधायिका में अपनी सीट खो देता है।]
- मनोनीत सदस्यों से संबंधित: मनोनीत सदस्यों (Nominated Member) के मामले में, कानून उन्हें मनोनीत किए जाने के बाद, किसी राजनीतिक दल में शामिल होने के लिए छह महीने का समय देता है। यदि वे इस समयावधि के बाद किसी पार्टी में शामिल होते हैं, तो वे सदन में अपनी सीट खो देते हैं।
निर्हरता से संबंधित मामले:
- दल-बदल विरोधी कानून के तहत, किसी सांसद या विधायक की निर्हरता / अयोग्यता के विषय में फैसला करने की शक्ति विधायिका के पीठासीन अधिकारी के पास होती है।
- कानून में इस विषय पर निर्णय लेने हेतु कोई समय सीमा निर्दिष्ट नहीं की गयी है।
- पिछले वर्ष, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, कि विधायिका के पीठासीन अधिकारी द्वारा दलबदल रोधी मामलों का फैसला तीन महीने की समयावधि में किया जाना चाहिए।
कानून के तहत अपवाद:
सदन के सदस्य कुछ परिस्थितियों में निरर्हता के जोखिम के बिना अपनी पार्टी बदल सकते सकते हैं।
- इस विधान में किसी दल के द्वारा किसी अन्य दल में विलय करने करने की अनुमति दी गयी है बशर्ते कि उसके कम से कम दो-तिहाई विधायक विलय के पक्ष में हों।
- ऐसे परिदृश्य में, अन्य दल में विलय का निर्णय लेने वाले सदस्यों तथा मूल दल में रहने वाले सदस्यों को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता है।
कानून में खामियां:
इस क़ानून का विरोध करने वालों का कहना है, कि मतदाताओं द्वारा चुनाव में व्यक्तियों को चुना जाता है, न कि पार्टियों को और इसलिए दलबदल रोधी कानून निष्फल है।
इस विषय में अदालत द्वारा हस्तक्षेप:
कुछ मामलों में न्यायालयों ने विधायिका के कामकाज में हस्तक्षेप किया है।
- 1992 में, सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने कहा था, कि अध्यक्ष के समक्ष ‘दलबदल-रोधी कानून’ से संबंधित कार्यवाही एक ‘अधिकरण’ के समान है और इस प्रकार, इसे न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत रखा जा सकता है।
- जनवरी 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने संसद से विधान सभा अध्यक्षों को प्राप्त ‘दलबदल-रोधी कानून के तहत विधायकों को अयोग्य घोषित करने अथवा नहीं करने’ का निर्धारण करने संबंधी विशेष शक्ति से वंचित करने हेतु संविधान में संशोधन करने के लिए कहा था।
- मार्च 2020 में, सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के मंत्री थौनाओजम श्यामकुमार सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी थी और उनके लिए “अगले आदेश तक विधानसभा में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया। इनके खिलाफ निर्हरता याचिकाएं 2017 से स्पीकर के समक्ष लंबित थीं।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप जानते हैं कि दलबदल रोधी कानून (1969, 1973) बनाने के शुरुआती प्रयासों में राजनीतिक दलों में शामिल होने वाले निर्दलीय विधायकों को शामिल नहीं किया गया था? फिर, उन्हें कानून के तहत कब शामिल किया गया? इसके बारे में जानकारी हेतु संक्षिप्त अवलोकन कीजिए।
प्रीलिम्स लिंक:
- दल-बदल कानून संबधित विभिन्न समितियों और आयोगों के नाम
- समिति तथा आयोग में अंतर
- पीठासीन अधिकारी तथा न्यायिक समीक्षा का निर्णय
- राजनीतिक दलों के विलय तथा विभाजन में अंतर
- क्या पीठासीन अधिकारी पर दलबदल विरोधी कानून लागू होता है?
- संबंधित मामलों में उच्चत्तम न्यायालय के निर्णय
मेंस लिंक:
दलबदल रोधी कानून के प्रावधानों का परीक्षण कीजिए। क्या यह कानून अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रहा है? चर्चा कीजिए।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।
हूती विद्रोही और यमन में युद्ध
संदर्भ:
हाल ही में, अबू धाबी में हुए एक संदिग्ध ड्रोन हमले में दो भारतीयों सहित तीन लोग मारे गए थे। यमन के हूती विद्रोहियों (Houthi rebels) ने इस ड्रोन हमले की जिम्मेदारी ली है।
संबंधित प्रकरण:
अरब जगत के सबसे गरीब देशों में से एक, ‘यमन’ लगभग सात साल से जारी गृह युद्ध से तबाह हो चुका है। राजधानी साना’ (Sana’a)’ पर ‘हूती विद्रोहियों’ द्वारा कब्ज़ा करने के बाद, देश में ईरानी प्रभाव को समाप्त करने तथा पूर्व सरकार को बहाल करने के उद्देश्य से सऊदी अरब के नेतृत्व में सेना ने विद्रोहियों के खिलाफ जंग छेड़ दी।
वर्ष 2015 में यूनाइटेड अरब अमीरात भी इस सऊदी अभियान में शामिल हो गया और वर्ष 2019 और 2020 में अपनी सेना की औपचारिक वापसी की घोषणा के बावजूद, इस संघर्ष में गंभीरतापूर्वक शामिल रहा है।
‘हूती’ कौन हैं?
- हूती (Houthi), 1990 के दशक में यमन के बहुसंख्यक शिया समुदाय के सदस्य हुसैन बदरेद्दीन अल- हूती (Badreddin al-Houthi) द्वारा स्थापित एक सशस्त्र विद्रोही संगठन है।
- यह ‘जैदी शिया संप्रदाय’ (Zaidi Shia sect) से संबंधित एक समूह हैं, जिसने लगभग 1,000 सालों तक इस क्षेत्र के एक राज्य पर शासन किया था।
यमन में युद्ध: पृष्ठभूमि
- यमन में जारी संघर्ष की जड़ें वर्ष 2011 में हुए अरब स्प्रिंग या अरब विद्रोह में खोजी जा सकती हैं। इस दौरान हुए एक विद्रोह ने काफी लंबे समय से देश में शासन कर रहे सत्तावादी राष्ट्रपति, अली अब्दुल्ला सालेह को अपने डिप्टी अब्दरब्बू मंसूर हादी को सत्ता सौंपने के लिए विवश कर दिया था।
- मध्य पूर्व के सबसे गरीब देशों में से एक यमन में स्थिरता लाने के उद्देश्य से यह राजनीतिक परिवर्तन किया गया था, लेकिन राष्ट्रपति हादी को आतंकवादी हमलों, भ्रष्टाचार, खाद्य असुरक्षा, और कई सैन्य अधिकारियों की पूर्व राष्ट्रपति सालेह के प्रति वफादारी सहित विभिन्न समस्याओं से निपटने के लिए संघर्ष करना पड़ा।
- यमन में वर्तमान संघर्ष की शुरुआत वर्ष 2014 में, हूती शिया मुस्लिम विद्रोह आंदोलन द्वारा नए राष्ट्रपति की कमजोरी का फायदा उठाते हुए उत्तरी साद प्रांत (Saada province) और इसके पड़ोसी क्षेत्रों का नियंत्रण जब्त करने के साथ हुई।
यमन में सऊदी अरब के हस्तक्षेप का कारण:
सऊदी अरब ने, यमन के राजधानी शहर ‘साना’ पर शिया ‘हूती विद्रोहियों’ द्वारा कब्जा करने तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त राष्ट्रपति हादी की सरकार देश के दक्षिणी भाग तक सीमित हो जाने के पश्चात यमन में हस्तक्षेप किया था।
- यमन में ‘हूती विद्रोहियों’ के तेजी से उदय ने सऊदी अरब में खतरे की घंटी बजा दी, जिसे इसने ईरान के प्रॉक्सी के रूप में देखा।
- सऊदी अरब ने मार्च 2015 में एक सैन्य अभियान शुरू करने की घोषणा की। इस अभियान से ‘हूती विद्रोहियों’ के खिलाफ त्वरित जीत की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन सऊदी अरब के हवाई हमले के बावजूद ‘हूतीयों’ ने हार मानने से इनकार कर दिया।
- जमीन पर कोई प्रभावी सहयोगी नहीं होने और कोई रास्ता निकालने की योजना नहीं होने के कारण, सऊदी के नेतृत्व वाला अभियान बिना किसी ठोस परिणाम के समाप्त हो गया। पिछले छह वर्षों में, ‘हूती विद्रोहियों’ ने सऊदी हवाई हमलों के जवाब में उत्तरी यमन के सऊदी शहरों पर कई हमले किए हैं।
यमन में ‘मानवीय स्थिति’ कितनी खराब है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, वर्ष 2015 में सऊदी हस्तक्षेप के बाद से यमन में कम से कम 10,000 लोग मारे गए हैं। गठबंधन सेनाओं के हवाई हमलों से देश के बुनियादी ढांचे को व्यापक नुक्सान पहुंचा है, और जगह-जगह पर नाकाबंदी से भोजन और दवाओं की आपूर्ति में कमी आयी है, जिससे यमन में मानव-आबादी तबाही की गर्त में पहुँच रही है। यदि जल्दी ही इन तक कोई सहायता नहीं पंहुची तो लगभग 12 मिलियन लोग भुखमरी की कगार पर पहुँच जाएंगे। देश को व्यापक स्तर पर हैजे का प्रकोप भी झेलना पड़ा है। यूनिसेफ के अनुसार, यमन में हर 10 मिनट में एक बच्चे की मौत हो जाती है।
प्रीलिम्स लिंक:
- हूती (Houthi) कौन हैं?
- वर्तमान संकट क्या है?
- यमन की अवस्थिति।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।
इंडोनेशिया की नई राजधानी ‘नुसंतारा’
संदर्भ:
इंडोनेशिया द्वारा अपनी राजधानी को ‘जकार्ता’ (Jakarta) से हटाकर ‘पूर्वी कालीमंतन’ (East Kalimantan) में में स्थानांतरित किया जा रहा है, और इसे ‘नुसंतारा’ (Nusantara) नाम से जाना जाएगा। ‘नुसंतारा’ बोर्नियो द्वीप के पूर्व में स्थित है।
राजधानी परिवर्तन का कारण:
- जकार्ता पर्यावरण और वित्तीय मुद्दों का सामना कर रहा है।
- वित्तीय असमानता
- जकार्ता में बढ़ती जनसंख्या
- जकार्ता के जलमग्न होने की संभावना बढ़ती जा रही है, और कहा जा रहा है कि इस संदर्भ में यदि कुछ नहीं किया गया, तो शहर के कई हिस्से वर्ष 2050 तक जलमग्न हो जाएंगे।
- जकार्ता कई नदियों से घिरा हुआ है। इन नदियों में बार-बार बाढ़ आने का खतरा रहता है।
पूर्वी कालीमंतन की अवस्थित:
पूर्वी कालीमंतन, जकार्ता से 2,300 किलोमीटर दूर बोर्नियो द्वीप के पूर्वी हिस्से में अवस्थित है। ‘बोर्नियो द्वीप (Borneo island) विश्व का तीसरा सबसे बड़ा और एशिया का सबसे बड़ा द्वीप है। भौगोलिक रूप से यह इंडोनेशिया, मलेशिया एवं ब्रुनेई देशों में बंटा हुआ है। बोर्नियो का लगभग 73% क्षेत्रफल इंडोनेशिया में आता है।
पूर्वी कालीमंतन विशाल जल संसाधनों और रहने योग्य भूभाग वाला क्षेत्र है। इण्डोनेशिया की नयी राजधानी ‘नुसंतारा’, उत्तरी पेनाजम पासेर (Penajam Paser) और कुताई कार्तनेगारा (Kutai Kartanegara) क्षेत्रों में स्थित होगी।
चिंताएं:
पूर्वी कालीमंतन, वनस्पतियों और जीव-प्रजातियों से समृद्ध क्षेत्र है। इसलिए, कई पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि राजधानी को पूर्वी कालीमंतन में स्थानांतरित किए जाने से बड़े पैमाने पर वनों की कटाई होगी, जिसके परिणामस्वरूप यहाँ रहने वाले जीवों के आवास तथा वृक्षों के लिए संकट उत्पन्न हो जाएगा और पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंचेगी।
राजधानी परिवर्तित करने वाले अन्य देश:
इंडोनेशिया अपनी परिवर्तित करने वाला पहला देश नहीं है। विभिन्न कारणों से अपनी राजधानियाँ परिवर्तित करने वाले देशों की एक लंबी सूची है।
- ब्राजील ने 1960 में अपनी राजधानी को ‘रियो डी जेनेरियो’ से हटाकर देश के लगभग केंद्र में बसे शहर ‘ब्रासीलिया’ में स्थानांतरित कर दी थी।
- 1991 में नाइजीरिया ने देश की राजधानी को ‘लागोस’ से हटाकर ‘अबुजा’ में पहुंचा दिया।
- कज़ाख़िस्तान ने 1997 में अपनी राजधानी को ‘अल्माटी’ से हटाकर ‘नूर-सुल्तान’ में स्थानांतरित कर दिया। जबकि ‘अल्माटी’ अभी भी कज़ाख़िस्तान का प्रमुख वाणिज्यिक केंद्र है।
- म्यांमार ने 2005 में अपनी राजधानी को ‘रंगून’ से हटाकर ‘नाएप्यीडॉ (Naypyidaw) कर दिया।
(नोट: उपरोक्त देशों की राजधानियों को याद रखें और उन्हें विश्व मानचित्र पर ढूंढने का प्रयास करें। इससे आपको प्रीलिम्स में मानचित्र संबंधी प्रश्नों को हल करने में मदद मिलेगी)।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।
इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद
संदर्भ:
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मध्य पूर्व पर खुली बहस में, भारत ने फिलिस्तीन मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के लिए अपनी दृढ़ और अटूट प्रतिबद्धता दोहराई है और एक ‘दो-राष्ट्र समाधान’ (Two-State Solution) पर बातचीत का समर्थन किया है।
इस बैठक में ‘दो-राष्ट्र समाधान’ को नष्ट होने से रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की दृढ़ प्रतिबद्धता की पुष्टि करने के लिए सुरक्षा परिषद द्वारा संकल्प 2334 को पारित किया गया।
इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
- जॉर्डन नदी और भूमध्य सागर के बीच भूमि के एक टुकड़े को लेकर यहूदियों और अरबों के बीच 100 वर्षों से भी अधिक समय से संघर्ष जारी है।
- साल 1882 से 1948 के बीच दुनिया भर के यहूदी फिलिस्तीन में एकत्र हुए थे। इतिहास में, इस घटना को अलियाह (Aliyahs) के नाम से जाना जाता है।
- फिर वर्ष 1917 में, प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्क साम्राज्य का पतन हो गया और फिलिस्तीन पर ब्रिटेन ने नियंत्रण कर लिया।
- इस क्षेत्र में अल्पसंख्यक यहूदी और बहुसंख्यक अरब निवास करते थे।
- इस क्षेत्र पर ब्रिटेन का कब्ज़ा होने के बाद, फिलीस्तीन में यहूदियों को बसाने के उद्देश्य से बालफोर घोषणा (Balfour Declaration) जारी की गई। जबकि, उस समय फिलिस्तीन में बहुसंख्यक आबादी अरबों की थी।
- यहूदियों ने इस ‘बालफोर घोषणा’ का समर्थन किया जबकि फिलिस्तीनियों ने इसे मानने से अस्वीकार कर दिया। कुछ समय पहले यूरोप में हुए होलोकॉस्ट (Holocaust) में लगभग 6 मिलियन यहूदी मारे जा चुके थे, और इस कारण से एक पृथक यहूदी राज्य की मांग तेजी पर चल रही थी।
- यहूदियों ने फिलिस्तीन को अपना प्राकृतिक घर बताते हुए इस पर अपना दावा किया, और दूसरी और अरबों ने भी अपनी जमीन को नहीं छोड़ा और अपना दावा कायम रखा।
- अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने यहूदियों का समर्थन किया।
- 1947 में, संयुक्त राष्ट्र द्वारा फिलिस्तीन को एक पृथक यहूदी देश और अरब देश में विभाजित करने के पक्ष में मतदान किया गया, जिसमें यरूशलेम एक अंतरराष्ट्रीय शहर बना दिया गया।
- विभाजन की इस योजना को यहूदी नेताओं ने स्वीकार कर लिया किंतु अरब पक्ष ने इसे खारिज कर दिया और कभी मान्यता नहीं दी।
इज़राइल का निर्माण और ‘विनाश’:
- वर्ष 1948 में ब्रिटेन ने इस क्षेत्र से अपना नियंत्रण वापस ले लिया और यहूदियों ने इज़राइल के निर्माण की घोषणा कर दी। हालांकि, फिलीस्तीनियों ने इसका विरोध किया, किंतु यहूदी पीछे नहीं हटे और इसके परिणामस्वरूप दोनों के मध्य सशस्त्र संघर्ष शुरू हो गया।
- इसी दौरान पड़ोसी अरब देशों ने भी इस क्षेत्र पर हमले किए, किंतु इजरायली सैनिकों ने इन्हें पराजित कर दिया। इस लड़ाई के बाद हजारों फिलिस्तीनियों को अपने घरों से पलायन करना पड़ा। इस घटना के लिए ‘अल-नकबा’ (Al-Nakba), या “विनाश” कहा जाता है।
- लड़ाई के समाप्त होने के बाद इस क्षेत्र के अधिकाँश भू-भाग को इज़राइल ने अपने नियंत्रण में ले लिया।
- फिर, जॉर्डन का इज़राइल के साथ युद्ध हुआ जिसमे ‘वेस्ट बैंक’ कहे जाने वाले क्षेत्र पर जॉर्डन ने अपना कब्ज़ा कर लिया तथा गाजा पर मिस्र ने अपना अधिकार जमा लिया।
- यरुशलम शहर, दो हिस्सों में विभाजित हो गया, इसके पूर्व भाग पर जॉर्डन का अधिकार है, जबकि पश्चिमी भाग पर इज़राइल का नियंत्रण है। अभी तक, किसी भी औपचारिक शांति समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए गए है और इस क्षेत्र में होने वाले तनाव के लिए प्रत्येक पक्ष एक-दूसरे को दोषी ठहराता रहता है, और इस क्षेत्र में लड़ाई होती रहती है।
- वर्ष 1967 में, इजरायली सेना ने पूर्वी यरुशलम और वेस्ट बैंक, सीरिया की ‘गोलन हाइट्स’, गाजा और मिस्र के सिनाई प्रायद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था।
वर्तमान परिदृश्य:
- इज़राइल का अभी भी वेस्ट बैंक पर कब्जा है, हालांकि इसने गाजा पर अपना अधिकार छोड़ दिया है किंतु, संयुक्त राष्ट्र अभी भी भूमि के इस भाग को अधिकृत क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
- इज़राइल, पूरे यरुशलम को अपनी राजधानी होने का दावा करता है, जबकि फिलिस्तीनी, पूर्वी यरुशलम को भविष्य के फिलिस्तीनी राष्ट्र की राजधानी होने का दावा करते हैं। अमेरिका, पूरे यरुशलम शहर पर इज़राइल के दावे को मान्यता देने वाले गिने-चुने देशों में से एक है।
- पूर्वी यरुशलम में अल-अस्का मस्जिद के संबंध में इज़राइल की कार्रवाइयों को लेकर हाल के महीने में तनाव बढ़ गया है।
‘वेस्ट बैंक’ (West Bank) की अवस्थिति:
यह पश्चिमी एशिया के भूमध्यसागरीय तट के पास एक स्थल-रुद्ध क्षेत्र है। पूर्व में इसकी सीमा जॉर्डन से मिलती है तथा यह दक्षिण, पश्चिम और उत्तर में ‘ग्रीन-लाइन’ द्वारा इज़राइल से पृथक होता है। वेस्ट बैंक के अंतर्गत पश्चिमी मृत सागर तट का काफी हिस्सा भी आता है।
इस क्षेत्र की बस्तियाँ और विवाद:
- वर्ष 1948 के अरब-इजरायल युद्ध के पश्चात् वेस्ट बैंक पर जॉर्डन द्वारा कब्जा कर लिया गया था।
- इजरायल ने वर्ष 1967 के छह दिवसीय युद्ध के पश्चात इसे वापस छीन लिया, और तब से वेस्ट बैंक पर इसका अधिकार है। इस लड़ाई में इजराइल ने मिस्र, सीरिया और जॉर्डन की संयुक्त सेनाओं को हराया था ।
- इजराइल ने वेस्ट बैंक में लगभग 130 औपचारिक बस्तियों का निर्माण किया है, तथा पिछले 20-25 वर्षों के दौरान इस क्षेत्र में इसी तरह की कई छोटी, अनौपचारिक बस्तियां विकसित हो चुकी हैं।
- इस क्षेत्र में 4 लाख से अधिक इजरायल उपनिवेशी निवास करते है, उनमें से कई यहूदी धार्मिक लोग, इस भूमि पर बाइबिल के अनुसार अपने पैदाइशी हक़ का दावा करते हैं।
- इनके अतिरिक्त्त, इस क्षेत्र में 26 लाख फिलिस्तीनियों इस क्षेत्र में निवास करते है।
- जब 1967 में इज़राइल द्वारा इस भूमि पर कब्ज़ा किया गया था, तब इसने यहूदी लोगों को इस स्थान पर बसने की अनुमति दी। लेकिन फिलिस्तीनियों द्वारा ‘वेस्ट बैंक’ फ़िलिस्तीनी भूमि पर अवैध कब्जा माना जाता है।
इन बस्तियों की वैधानिक स्थिति:
- संयुक्त राष्ट्र महासभा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के अनुसार- वेस्ट बैंक में स्थित इजराइली बस्तियां, चतुर्थ जेनेवा अभिसमय (Fourth Geneva Convention) का उल्लंघन करती हैं।
- चौथे जिनेवा अभिसमय (1949) के अनुसार- किसी क्षेत्र पर कब्ज़ा करने वाली शक्ति, अपनी नागरिक आबादी के किसी भी हिस्से को अधिकृत क्षेत्र में निर्वासित या स्थानांतरित नहीं करेगी ।
- 1998 में अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय की स्थापना करने वाले रोम अधिनियम (Rome Statute) के अनुसार- कब्ज़ा करने वाली शक्ति द्वारा इस तरह का कोई भी स्थानांतरण ‘युद्ध अपराध’ के समान होगा, जिसमे सैन्य बलों द्वारा अवैध और निर्दयतापूर्वक संपतियों का नुकसान व उन पर कब्ज़ा किया जाता है।
प्रीलिम्स लिंक:
- इजरायल-फिलिस्तीन विवाद क्या है?
- दोनों के बीच विवादित सीमाएं
- वेस्ट बैंक बस्ती विवाद
- इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र, इज़राइल, फिलिस्तीन द्वारा लिया गया स्टैंड
- इस मुद्दे से उत्पन्न चुनौतियाँ
- भारत का रुख
मेंस लिंक:
मध्य एशिया क्षेत्र पर इज़राइल-फिलिस्तीन विवाद के प्रभाव तथा भारत के हितों पर इसके प्रभाव के बारे में चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
सामान्य अध्ययन-III
विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।
दवाओं के प्रति जीवाणु प्रतिरोध
(Bacterial resistance to drugs)
संदर्भ:
हाल ही में, ‘द लैंसेट’ नामक शोध पत्रिका में ‘रोगाणुरोधी प्रतिरोध’ (Antimicrobial Resistance – AMR) के वैश्विक प्रभाव का एक व्यापक अनुमान प्रकाशित किया गया है। इस रिपोर्ट में ‘204 देशों और क्षेत्रों को कवर किया गया है।
रिपोर्ट का शीर्षक है- ‘ग्लोबल रिसर्च ऑन एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस’ (GRAM) रिपोर्ट।
प्रमुख बिंदु:
- ‘रोगाणुरोधी प्रतिरोध’ (AMR) के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में, वर्ष 2019 के दौरान 27 मिलियन लोगों की मृत्यु हुई।
- AMR अब दुनिया भर में मौत का एक प्रमुख कारण बन चुका है। इससे होने वाली मौतों की संख्या, एचआईवी/एड्स या मलेरिया से मरने वालों की संख्या से अधिक हो चुकी है।
- इसके अलावा, अन्य 5 लाख मौतें अप्रत्यक्ष रूप से AMR के कारण हुईं है। (जिसके लिए एक दवा प्रतिरोधी संक्रमण को जिम्मेदार माना जा रहा था, लेकिन ‘दवा प्रतिरोध’ खुद से मृत्यु का प्रत्यक्ष कारण हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता है)।
विश्लेषित किए गए ‘रोगजनक’ (Pathogens):
- अध्ययन किए गए 23 रोगजनकों में से छह रोगजनक (ई कोलाई, एस ऑरियस, के न्यूमोनिया, एस न्यूमोनिया, ए बाउमनी, और पी एरुगिनोसा) में पाया गया ‘दवा प्रतिरोध’, 29 लाख मौतों का प्रत्यक्ष बना और यह ‘प्रतिरोध’ अन्य 3.57 मिलियन मौतों से भी अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित था।
- मेथिसिलिन प्रतिरोधी एस ऑरियस (Methicillin-Resistant S Aureus), या MRSA – एक रोगजनक-दवा संयोजन (pathogen-drug combination), सीधे तौर पर 1 लाख से अधिक मौतों का कारण बना।
- एंटीबायोटिक्स के दो वर्गों – फ्लोरोक्विनोलोन और बीटा-लैक्टम एंटीबायोटिक्स – को प्रायः गंभीर संक्रमणों के खिलाफ रक्षा की पहली पंक्ति माना जाता है। AMR के कारण होने वाली 70% से अधिक मौतों के लिए ‘इन दवाओं के प्रति प्रतिरोध’ जिम्मेदार हैं।
‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ क्या है?
‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ (Antibiotic resistance), सूक्ष्मजीवों (जैसे बैक्टीरिया, वायरस और कुछ परजीवियों) द्वारा विकसित की गयी दवा प्रतिरोधी क्षमता होती है, जिसके द्वारा ये सूक्ष्मजीव अपने खिलाफ काम करने वाले रोगाणुरोधियों (जैसे एंटीबायोटिक, एंटीवायरल और एंटी-मलेरिया) आदि को अप्रभावी कर देते है। परिणामस्वरूप, मानक उपचार अप्रभावी हो जाते हैं तथा संक्रमण जारी रहता है।
सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोधक क्षमता (Antimicrobial Resistance- AMR) भविष्य के लिए एक मूक खतरा:
- ‘एंटीबायोटिक्स’ दवाओं से अब तक लाखों लोगों की जान बचाई जा चुकी है। किंतु दुर्भाग्य से, अब ये दवाईयां अप्रभावी हो रही हैं क्योंकि कई संक्रामक रोगों ने एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया दिखाना बंद कर दिया है।
- यद्यपि सूक्ष्मजीवीरोधी प्रतिरोध (AMR), एक प्राकृतिक प्रक्रिया होती है, किंतु मनुष्यों और जानवरों में एंटीबायोटिक दवाओं का दुरुपयोग इस प्रक्रिया को तेज करता जा रहा है।
- जिसकी वजह से, तपेदिक, निमोनिया और सूजाक जैसे बड़ी संख्या में संक्रमणों का इलाज करना बहुत मुश्किल होता जा रहा है क्योंकि उनके इलाज के लिए इस्तेमाल की जाने वाली एंटीबायोटिक्स कम प्रभावी होती जा रही हैं।
- विश्व स्तर पर, जानवरों में एंटीबायोटिक दवाओं के उपयोग में 2030 तक वर्ष 2010 के स्तर से 67 प्रतिशत की वृद्धि होने का अनुमान है। रोगाणुओं में ‘एंटीबायोटिक प्रतिरोध’ एक मानव निर्मित आपदा है।
- मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य, मत्स्य पालन और कृषि में एंटीबायोटिक दवाओं का गैर-जिम्मेदाराना तरीके से बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
- अंग प्रत्यारोपण और कार्डियक बाईपास जैसी जटिल सर्जरी करना मुश्किल हो सकता है, क्योंकि सर्जरी के बाद ऐसी संक्रामक जटिलतायें हो सकती है, जिनका उपचार करना कठिन हो जाएगा।
प्रीलिम्स लिंक:
- एंटीबायोटिक प्रतिरोध क्या है?
- एंटीबॉडी क्या हैं?
- भारत में दुग्ध उत्पादन और खपत
- गंभीर रूप से महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक्स (CIA) क्या हैं?
मेंस लिंक:
एंटीबायोटिक प्रतिरोध 21 वीं सदी की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक है। परीक्षण कीजिए।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव।
चीन का कृत्रिम चंद्रमा
(China’s artificial moon)
संदर्भ:
हाल ही में, चीन ने एक ‘कृत्रिम चंद्रमा अनुसंधान सुविधा’ (artificial moon research facility) का निर्माण किया है। यह सुविधा, चुंबकत्व का उपयोग करके गुरुत्वाकर्षण स्तर को कम करने में सक्षम है।
- इस अनुसंधान केंद्र को संभवतः इस साल के अंत में आधिकारिक तौर लॉन्च किया जाएगा।
- इस शोध केंद्र को दुनिया में अपनी तरह का पहला केंद्र भी बताया जा रहा है।
इस परियोजना का उद्देश्य:
इस परियोजना का उद्देश्य, शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करके, एक 60 सेमी के निर्वात कक्ष के भीतर, गुरुत्वाकर्षण को “समाप्त” करना है।
‘मिनी मून’ के बारे में:
- इस कृत्रिम चंद्रमा या ‘मिनी मून’ (Mini Moon) का व्यास लगभग दो फीट है। इसकी कृत्रिम सतह वैसी चट्टानों और धूल से बनाई गई है।
- यह शोध केंद्र चीन के जियांग्सू प्रांत (Jiangsu province) के पूर्वी शहर ज़ुझाउ (Xuzhou) में स्थित है।
इस अनुसंधान केंद्र का उपयोग, अनुप्रयोग और लाभ:
- चीन द्वारा इस अनुसंधान केंद्र का उपयोग, चंद्रमा के समान कम गुरुत्वाकर्षण वाले वातावरण में उपकरणों और प्रौद्योगिकी का परीक्षण करने तथा अपने प्रयोगों के चंद्रमा की सतह पर सफल होने की संभावना जांचने के लिए किए जाने की योजना बनाई जा रही है।
- इस अनुसंधान केंद्र से चंद्रमा पर मानव के बसने की संभावना का निर्धारण करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।
चुंबकीय उत्तोलन:
कृत्रिम चंद्रमा केंद्र विकसित करने संबंधी विचार की जड़ें, रूस में जन्मे भौतिक विज्ञानी आंद्रे गीम (Andre Geim) द्वारा किए गए प्रयोगों में निहित हैं। अपने प्रयोगों में ‘आंद्रे गीम’ ने चुंबक के सहारे एक मेंढक को ऊपर उठाने का प्रयास किया था। इस भौतिकविद को बाद में इस अभूतपूर्व प्रयोग के लिए नोबेल पुरुस्कार भी दिया गया था।
चुंबकीय उत्तोलन (Magnetic levitation), निश्चित रूप से ‘एंटीग्रैविटी’ के समान नहीं है, लेकिन ऐसी कई स्थितियां हैं, जहां चुंबकीय क्षेत्रों द्वारा माइक्रोग्रैविटी की नकल करना अंतरिक्ष अनुसंधान में ‘कुछ अप्रत्याशित होने की संभावना’ के लिए अमूल्य हो सकता है।
चुंबकीय उत्तोलन के पीछे सिद्धांत:
- कोई भी परमाणु, परमाणु नाभिक और छोटे-छोटे वृत्ताकार धाराओं में इनके चारो ओर परिक्रमा करने वाले छोटे इलेक्ट्रॉनों से निर्मित होता हैं; ये गतिमान धाराएँ, छोटे चुंबकीय क्षेत्रों को प्रेरित करती हैं।
- आमतौर पर, किसी वस्तु में सभी परमाणुओं के यादृच्छिक रूप से उन्मुख चुंबकीय क्षेत्र, चाहे वे पानी की एक बूंद से संबंधित हों या मेंढक से जुड़े हों, परस्पर एक दूसरे को निरस्त कर देते हैं, और कोई भौतिक रूप से कोई चुंबकत्व दिखाई नहीं देता है।
- इन परमाणुओं पर एक बाहरी चुंबकीय क्षेत्र का प्रयोग करने पर सब कुछ बदल जाता है: इलेक्ट्रॉन अपनी गति को संशोधित कर देते है, तथा इस प्रयुक्त चुंबकीय क्षेत्र का विरोध करने के लिए अपने स्वयं के चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण करते हैं।
- यदि बाहरी चुंबक पर्याप्त रूप से ताकतवर है, तो इसके और परमाणुओं के क्षेत्र के मध्य उत्पन्न प्रतिकर्षण का चुंबकीय बल, गुरुत्वाकर्षण को समाप्त करने और ‘पिंड’ – चाहे वह चंद्र-प्रद्योगिकी का एक उन्नत टुकड़ा हो या कोई उभयचर- को हवा में ऊपर उठाने के लिए सक्षम होगा।
इंस्टा जिज्ञासु:
चीन ने ‘कृत्रिम चंद्रमा’ का निर्माण करने के अलावा ‘कृत्रिम सूर्य’ (Artificial Sun) बनाने में सफलता हासिल कर ली है। यह ‘कृत्रिम सूर्य’ एक परमाणु संलयन रिएक्टर है, जिसे 17 मिनट से अधिक समय तक सूर्य से पांच गुना अधिक गर्म किया जा सकता है। यह कृत्रिम सूर्य, शहरों को लगभग असीमित स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत प्रदान करने में मदद करेगा।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
पूर्वी बारहसिंगा या ईस्टर्न स्वैम्प डियर
(Eastern Swamp deer)
- दक्षिण एशिया में हर जगह विलुप्त हो चुके, संवेदनशील श्रेणी में दर्ज पूर्वी बारहसिंगा या ईस्टर्न स्वैम्प डियर (Eastern Swamp deer) की आबादी ‘काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान’ और ‘टाइगर रिजर्व’ में काफी कम हो गयी है।
- इन जीवों की संख्या वर्ष 2018 में 907 थी, जोकि 10 जनवरी और 11 जनवरी को आयोजित गणना के अनुसार 868 रह गयी है। ‘पूर्वी बारहसिंगा’ की आबादी में आई इस कमी के लिए अधिकारियों ने वर्ष 2019 और 2020 में आने वाले दो भयंकर बाढो के लिए जिम्मेदार ठहराया है।
बारहसिंगा के बारे में:
- बारहसिंगा को ‘दलदली हिरण’ या स्वैम्प डियर भी कहा जाता है। ये जीव ‘काजीरंगा’ के लिए स्थानिक है।
- पूर्वी दलदली हिरण (पूर्वी बारहसिंगा), एक समय काजीरंगा के ‘मध्य कोहोरा’ और ‘बागोरी पर्वतमाला’ में सर्वाधिक संख्या में पाए जाते थे।
- IUCN स्थिति: संवेदनशील (Vulnerable)।
- यह मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का ‘राजकीय पशु’ भी है।
- विस्तार: मध्य भारत से लेकर उत्तरी भारत और दक्षिणी नेपाल।
- भारत: असम, जमना नदी, गंगा नदी, ब्रह्मपुत्र नदी, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश।
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