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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 18 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. टोंगा ज्वालामुखी विस्फोट

 

सामान्य अध्ययन-II

1. अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956

2. विश्व आर्थिक मंच का दावोस एजेंडा ’22

3. इस्लामी सहयोग संगठन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. अंतरिक्ष स्टेशन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. हर गोबिंद खुराना

 


सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान- अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं (जल-स्रोत और हिमावरण सहित) और वनस्पति एवं प्राणिजगत में परिवर्तन और इस प्रकार के परिवर्तनों के प्रभाव।

टोंगा में ज्वालामुखी विस्फोट


संदर्भ:

हाल ही में, दक्षिणी प्रशांत महासागर में स्थित ‘टोंगा’ (Tonga) के एक द्वीप पर एक ज्वालामुखी विस्फोट हुआ है, जिसकी वजह से प्रशांत महासागर में ‘सुनामी लहरें’ उठी रही हैं।

  • यह, हुंगा-हापाई (Hunga-Ha’apai) और हुंगा-टोंगा (Hunga-Tonga) नामक दो छोटे निर्जन द्वीपों से मिलकर बना एक ‘समुद्र के भीतर होने वाला ज्वालामुखी विस्फोट’ (Undersea Volcanic Eruption) है।
  • टोंगा द्वीप समूह, ‘रिंग ऑफ फायर’ में अवस्थित है। यह ज्वालावृत्त प्रशांत महासागर के बेसिन के चारो ओर विस्तारित उच्च जवालामुखीय एवं भूकंपीय गतिविधियों की परिधि है।

Current Affairs

 

‘रिंग ऑफ फायर’ क्या है?

‘ज्वालावृत्त’ या ‘रिंग ऑफ फायर’ (Ring of Fire) में 450 से अधिक ज्वालामुखी शामिल हैं; जिसमे विश्व के चार सर्वाधिक सक्रिय ज्वालामुखियों में से तीन – संयुक्त राज्य अमेरिका में माउंट सेंट हेलेंस, जापान में माउंट फ़ूजी और फिलीपींस में माउंट पिनातुबो- शामिल हैं। इसे प्रायः ‘परि-प्रशांत मेखला’ (Circum-Pacific Belt) भी कहा जाता है।

विश्व के लगभग 90% भूकंप, और 80% सबसे बड़े भूकंप ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र में आते हैं।

अवस्थिति:

‘रिंग ऑफ फायर’ या ‘ज्वालावृत्त’, प्रशांत महासागर की तटीय रेखा के साथ फैला हुआ है। इस तटीय क्षेत्र में प्रशांत प्लेट, भू-पर्पटी की अन्य छोटी टेक्टोनिक प्लेटों जैसे, फिलीपीन सागर प्लेट तथा प्रशांत महासागर के किनारे पर स्थित कोकोस और नाज़का प्लेटों के साथ घर्षण करती है।

घोड़े की नाल के आकार का 40,000 किलोमीटर लंबा ‘रिंग ऑफ फायर’ न्यूजीलैंड से लेकर, एशिया और अमेरिका के तटों से होकर गुजरता हुआ ‘चिली’ तक फैला हुआ है।

Current Affairs

जोखिम:

अमेरिका के पश्चिमी तट, चिली, जापान और सोलोमन द्वीप सहित द्वीप राष्ट्रों की आबादी को ‘रिंग ऑफ फायर’ में होने वाली गतिविधियों से सर्वाधिक खतरा होता है। ये क्षेत्र अधःनिक्षेपण मंडल (subduction zones) में स्थित होने की वजह से सबसे अधिक जोखिम वाले क्षेत्र हैं। अधःनिक्षेपण मंडल, पृथ्वी को दो विवर्तनिक प्लेटों के बीच टकराव का क्षेत्र होता है।

‘रिंग ऑफ फायर’ का निर्माण:

सागरीय विवर्तनिक प्लेटों के, कम घनत्व वाली अर्थात हल्की महाद्वीपीय प्लेटों के नीचे अधःक्षेपित (subduction) होने पर ‘रिंग ऑफ फायर’ का निर्माण होता है। जिस क्षेत्र में ये टेक्टोनिक प्लेट्स मिलती हैं, उसे अधःनिक्षेपण मंडल (subduction zones) कहा जाता है।

‘रिंग ऑफ फायर’ में भूकंप आने का कारण:

  • दुनिया के सबसे गहरे भूकंप ‘अधःनिक्षेपण मंडल’ क्षेत्रों में आते हैं, क्योंकि इसी क्षेत्र में टेक्टोनिक प्लेट्स एक-दूसरे से टकराती हैं। विश्व के सर्वाधिक ‘अधःनिक्षेपण मंडल’ रिंग ऑफ़ फायर में पाए जाते है।
  • पृथ्वी के पिघले हुए कोर से निसृत ऊर्जा की वजह से टेक्टोनिक प्लेटों में संचरण होता है, और वे एक-दूसरे से टकराती हैं, जिससे घर्षण होता है। इस घर्षण के परिणामस्वरूप और अधिक ऊर्जा उत्पन्न होती है, और अंततः जब यह ऊर्जा सतह की ओर निकलती है तो यह भूकंप का कारण बनती है। समुद्र में ऐसी स्थिति होने पर, यह विनाशकारी सुनामी का कारण बन सकती है।
  • टेक्टोनिक प्लेट्स आमतौर पर प्रतिवर्ष औसतन कुछ सेंटीमीटर ही स्थानांतरित होते हैं, लेकिन भूकंप आने के दौरान, ये बड़े पैमाने पर गति करते हैं और कई मीटर प्रति सेकंड की गति से आगे बढ़ सकते हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पैसिफिक रिंग ऑफ फायर
  2. दुनिया में सक्रिय ज्वालामुखी
  3. बैरन द्वीप
  4. भूकंप तरंगे

मेंस लिंक:

‘पैसिफिक रिंग ऑफ फायर’ क्या है? इंडोनेशिया में हाल ही में हुए ज्वालामुखी विस्फोट के मामले में इसकी प्रासंगिकता की व्याख्या करें?

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956


संदर्भ:

हाल ही में कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने टिप्पणी करते हुए कहा है, कि ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम’ (Inter-State River Water Disputes Act) पर फिर से विचार करने का समय आ गया है, क्योंकि यह क़ानून संबंधित मुद्दों को हल करने की तुलना में अधिक विवाद पैदा करता है।

मुख्यमंत्री का बयान ऐसे समय में आया है, जब कर्नाटक का कावेरी, महादयी और कृष्णा नदियों से संबंधित अंतर्राज्यीय जल विवादों को लेकर पड़ोसी राज्यों तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गोवा और आंध्र प्रदेश के साथ संघर्ष लगातार जारी है।

समय की मांग:

  • अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान हेतु निर्धारित कई स्तरों को हटाकर, एक ही चरण में इनका समाधान किया जाना चाहिए।
  • ये समाधान सभी राजनीतिक हितों को अलग रखते हुए, नदी बेसिन क्षमता की अधिकतम उपयोगिता तथा प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के आधार पर होने चाहिए।

अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद:

संविधान के अनुच्छेद 262 में अंतर्राज्यीय जल विवादों (Inter-state water dispute) के न्यायनिर्णयन का प्रावधान किया गया है।

  1. इसके तहत, संसद, कानून द्वारा, किसी भी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के उपयोग, वितरण या नियंत्रण के संबंध में किसी भी विवाद या शिकायत को स्थगित करने का प्रावधान कर सकती है।
  2. संसद, विधि द्वारा यह प्रावधान भी कर सकती है कि उच्चतम न्यायालय या कोई अन्य न्यायालय ऐसे किसी विवाद या परिवाद के संबंध में अधिकारिता का प्रयोग नहीं करेगा।

जल विवादों का निपटारा करने हेतु संसद द्वारा दो कानून बनाए गए हैं:

  1. नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 (River Boards Act, 1956):
  • इसमें अंतर-राज्यीय नदी और नदी घाटियों के नियमन और विकास के लिए केंद्र सरकार द्वारा नदी बोर्डों के गठन का प्रावधान किया गया है।
  • इसके तहत, संबंधित राज्य सरकारों के अनुरोध पर उन्हें सलाह देने के लिए एक नदी बोर्ड का गठन किया जाता है।
  1. अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 (Inter-State Water Disputes Act, 1956):

यह अधिनियम, किसी अंतर-राज्यीय नदी या नदी घाटी के जल के संबंध में दो या दो से अधिक राज्यों के मध्य विवाद के निर्णय हेतु केंद्र सरकार को एक ‘तदर्थ न्यायाधिकरण’ (ad hoc tribunal) स्थापित करने का अधिकार देता है।

  • इस न्यायाधिकरण का निर्णय अंतिम होता है और विवाद से संबंधित पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है।
  • इस अधिनियम के तहत, जल विवाद के संबंध में कोई मामला ऐसे न्यायाधिकरण में भेजे जाने के बाद, उस मामले पर सर्वोच्च न्यायालय और किसी अन्य न्यायालय का अधिकार क्षेत्र नहीं रह जाता है।

अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 से संबंधित मुद्दे:

  • अंतर्राज्यीय जल विवादों को हल करने के लिए विधिक ढांचे का प्रावधान करने वाले ‘अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956’ में कई खामियां पायी गयी हैं, क्योंकि इसमें नदी जल विवादों को हल करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है।
  • अधिकरण द्वारा निर्णय किए जाने की कोई समय सीमा निर्धारित नहीं होने, अध्यक्ष या सदस्यों के लिए कोई ऊपरी आयु सीमा नहीं होने, किसी ‘रिक्ति’ होने पर काम रुकने तथा ‘ट्रिब्यूनल’ की रिपोर्ट को प्रकाशित करने की कोई समय सीमा तय नहीं होने के कारण, जल-विवादों के समाधान में देरी होती है।
  • जल संसाधन विकास पर अंतर-राज्यीय सहयोग की सुविधा प्रदान करने हेतु अधिनियमित किया गया ‘नदी बोर्ड अधिनियम 1956’, अपने अधिनियमन के बाद से एक ‘निष्क्रिय-अक्षर’ बना हुआ है।
  • देश में सतही जल को ‘केंद्रीय जल आयोग’ (CWC) द्वारा तथा ‘भूजल’ को ‘केंद्रीय भूजल बोर्ड ऑफ इंडिया’ (CGWB) द्वारा नियंत्रित किया जाता है। ये दोनों निकाय स्वतंत्र रूप से काम करते हैं, और जल प्रबंधन पर राज्य सरकारों के साथ आम चर्चा के लिए कोई साझा मंच उपलब्ध नहीं है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप अंतर्राज्यीय नदी जल विवादों से संबंधित प्रावधानों के बारे में जानते हैं?

  • राज्य सूची की प्रविष्टि 17, पानी से संबंधित विषयों अर्थात, जल-आपूर्ति, सिंचाई, नहर, जल निकासी, तटबंधों, जल भंडारण और जल शक्ति से संबंधित है।
  • संघ सूची की प्रविष्टि 56, केंद्र सरकार को, लोकहित में इष्टानुकूल संसद द्वारा निर्धारित सीमा तक, अंतर-राज्यीय नदियों के विनियमन और विकास का अधिकार प्रदान करती हैं।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

विश्व आर्थिक मंच का दावोस एजेंडा’ 22


(World Economic Forum’s Davos Agenda ’22)

संदर्भ:

‘विश्व आर्थिक मंच’ (World Economic Forum – WEF) द्वारा ‘दावोस’ (Davos) में अपनी वार्षिक बैठक आयोजित की जा रही है।

‘विश्व आर्थिक मंच’ (WEF) का महत्त्व:

‘विश्व आर्थिक मंच’ के शिखर सम्मेलन में विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष, नीति निर्माता, शीर्ष अधिकारी, उद्योगपति, मीडिया हस्तियां और तकनीकी विशेषज्ञों सहित राजनीतिक और कॉर्पोरेट जगत के महत्वपूर्ण व्यक्ति भाग लेते हैं।

  • WEF में होने वाला विचार-विमर्श, सार्वजनिक क्षेत्र और कॉर्पोरेट जगत द्वारा, विशेष रूप से गरीबी, सामाजिक चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक आर्थिक सुधार जैसे वैश्विक महत्व के मुद्दों पर लिए जाने वाले निर्णयों को प्रभावित करता है।
  • आर्थिक, कॉर्पोरेट और राजनीतिक क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्तित्वों की स्विट्ज़रलैंड के ‘स्की रिसॉर्ट’ में होने वाले यह बैठक समय-समय पर उभरने वाली वैश्विक चुनौतियों का समाधान खोजने का सही अवसर प्रदान करती है।

‘विश्व आर्थिक मंच’ की प्रमुख पहलें:

  • ‘एजेंडा 2022’ के तहत ‘प्रकृति-सकारात्मक समाधानों के आर्थिक अवसरों’ से संबंधित ‘विश्व आर्थिक मंच’ (WEF) की अन्य पहलों तथा नेट-जीरो उत्सर्जन में तेजी लाने हेतु ‘साइबर तन्यकता’ पर एक मिशन (Mission on Cyber ​​Resilience) का शुभारंभ किया जाएगा।
  • दावोस बैठक के अगले कुछ दिनों में होने वाली चर्चा के विषयों में, वैक्सीन-अंतराल को पाटना, वैश्विक कीमत श्रृंखलाओं के लचीलेपन को मजबूत करना, मानव निवेश के माध्यम से नाजुक बाजारों में अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण करना आदि शामिल होंगे।
  • अगली महामारी से निपटने की तैयारी करने हेतु ‘डेटा सॉल्यूशंस’ के उपयोग करने संबंधी तरीकों को भी चर्चा में शामिल किया जाएगा।

‘विश्व आर्थिक मंच’ के प्रति शेष विश्व का दृष्टिकोण:

  • यद्यपि, ‘विश्व आर्थिक मंच’ (WEF) की सालाना बैठक में उद्योग, व्यापार जगत के शीर्ष नेताओं, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े प्रमुख व्यक्ति बड़े पैमाने पर भाग लेते हैं, किंतु वैश्विक मुद्दों का प्रभावी समाधान खोजने हेतु ‘ज्ञान तथा जानकारी की एक नीहारिका’ अथवा ‘एक फोरम’ होने से ज्यादा ‘एक नेटवर्किंग हब’ होने के लिए इसकी आलोचना की जाती है।
  • नागरिक समाज के विभिन्न वर्गों से प्रतिनिधित्व की कमी और प्रभावी समाधान पेश नहीं कर पाने को लेकर, वार्ता एवं संवाद के माध्यम से सहयोग के अवसर प्रदान करने वाले इस फोरम की आलोचना की जाती है।

‘विश्व आर्थिक मंच’ के बारे में:

यह स्विट्जरलैंड के जिनेवा में स्थित 1971 में स्थापित एक ‘गैर-लाभकारी’ संगठन है।

संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष: क्लाउस श्वाब।

WEF द्वारा प्रकाशित प्रमुख रिपोर्ट्स:

  1. ऊर्जा संक्रमण सूचकांक (Energy Transition Index)।
  2. वैश्विक प्रतिस्पर्द्धात्मकता सूचकांक (Global Competitiveness Report)।
  3. वैश्विक सूचना प्रौद्योगिकी रिपोर्ट (Global IT Report)।
  4. वैश्विक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट (Global Gender Gap Report)।
  5. वैश्विक जोखिम रिपोर्ट (Global Risk Report)।
  6. यात्रा और पर्यटन प्रतिस्पर्द्धात्मकता रिपोर्ट (Global Travel and Tourism Report)।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘ग्रेट रिसेट’ (Great Reset) के बारे में जानते हैं?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘विश्व आर्थिक मंच’ – संरचना, उद्देश्य और रिपोर्ट
  2. ‘ऊर्जा संक्रमण सूचकांक’ – शीर्ष प्रदर्शन करने वाले और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देश
  3. भारत की प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत
  4. भारत में ऊर्जा उत्पादन- स्रोत
  5. भारत में नवीकरणीय बनाम गैर-नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

इस्लामिक सहयोग संगठन


संदर्भ:

ईरान के राजनयिक ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (Organization of Islamic Cooperation) में पद संभालने हेतु कई वर्षों बाद, सऊदी अरब आ रहे हैं।

‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ में ईरानी प्रतिनिधिमंडल का आगमन, वर्ष 2016 में तेहरान और रियाद के मध्य संबंधों में खटास आने के बाद, इस तरह का पहला राजनयिक कदम है।

पृष्ठभूमि:

वर्ष 2016 में, सऊदी अरब द्वारा शिया धर्मगुरु निमिर अल-निमिर को फांसी दिए जाने के बाद, ईरान में प्रदर्शनकारियों द्वारा ‘सऊदी राजनयिक मिशनों’ पर हमले किए गए थे।

इसके प्रत्युत्तर में ‘रियाद’ ने ‘तेहरान’ के साथ अपने संबंध समाप्त कर दिए थे, हालाँकि ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (OIC) के विदेश मंत्रियों ने इस हिंसा की निंदा की थी।

इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)  के बारे में:

  • OIC, वर्ष 1969 में स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, वर्तमान में इसमें 57 सदस्य देश सम्मिलित हैं।
  • यह संयुक्त राष्ट्र संघ के पश्चात दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है।
  • इस संगठन का कहना है कि यह “मुस्लिम विश्व की सामूहिक आवाज” है, और इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना और साथ ही दुनिया के मुस्लिम समुदायों के हितों की रक्षा और संरक्षण हेतु कार्य करना है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ और यूरोपीय संघ में OIC के स्थायी प्रतिनिधिमंडल हैं।
  • इसका स्थायी सचिवालय सऊदी अरब के जेद्दाह में है।

भारत के लिए OIC का महत्व:

हाल के दिनों में भारत और OIC के मध्य आर्थिक और ऊर्जा संबंधी परस्पर निर्भरता में वृद्धि विशेष रूप महत्वपूर्ण हो गई है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. OIC- उद्देश्य
  2. कार्य
  3. सदस्य
  4. सहायक संगठन

मेंस लिंक:

इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)  पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अंतरिक्ष स्टेशन


संदर्भ:

चीन, वर्ष 2024 या अधिकतम वर्ष 2030 तक, एक अपना निजी ‘अंतरिक्ष स्टेशन’ (Space Station) रखने वाला देश और संभवतः इकलौता देश बनने के लिए तैयार है। इसे देखते हुए, भारत द्वारा भी आगामी कुछ वर्षों में अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है।

हाल ही में, केंद्रीय अंतरिक्ष मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में, वर्ष 2030 तक भारत का पहला अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित किए जाने की घोषणा की थी।

पृष्ठभूमि:

यद्यपि, वर्तमान में ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (International Space Station- ISS) का कार्यकाल वर्ष 2024 में समाप्त होना निर्धारित है, किंतु नासा (NASA) और इस परियोजना के अन्य अंतरराष्ट्रीय भागीदारों ने ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (ISS) के परिचालन जीवन को वर्ष 2030 तक बढाए जाने के संकेत दिए हैं।

‘चीनी अंतरिक्ष स्टेशन’ के बारे में:

  • चीन का नया मल्टी-मॉड्यूल ‘तिआनगोंग’ (Tiangong) अंतरिक्ष स्टेशन कम से कम 10 वर्षों तक कार्य करने के तैयार हो चुका है।
  • यह अंतरिक्ष स्टेशन पृथ्वी की सतह से 340-450 किमी की ऊंचाई पर पृथ्वी की निचली कक्षा में कार्य करेगा।

चीनी अंतरिक्ष स्टेशन का महत्व:

  1. पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थित चीनी अंतरिक्ष स्टेशन, चीन की आकशीय दृष्टि की भांति कार्य करेगा, और यह चीन के अंतरिक्ष यात्रियों के लिए, विश्व के बाकी हिस्सों का चौबीसों घंटे विहंगम दृश्य प्रदान करेगा।
  2. यह अंतरिक्ष स्टेशन, चीन को वर्ष 2030 तक एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति बनने के लक्ष्य को हासिल करने में मदद करेगा।

संबंधित चिंताएं:

  • चीन का अंतरिक्ष स्टेशन रोबोटिक-आर्म से लैस होगा जिस पर अमेरिका द्वारा इसके संभावित सैन्य अनुप्रयोगों में उपयोग किए जाने पर चिंता जताई है।
  • चिंता की बात यह है कि इस तकनीक का “भविष्य में अन्य उपग्रहों से साथ मॉल-युद्ध करने में इस्तेमाल किया जा सकता है”।

भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन:

भारत द्वारा वर्ष 2030 तक अपना ‘स्पेस स्टेशन’ लॉन्च करने की योजना बनाई जा रही है।

  • भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Indian space station), अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन की तुलना में बहुत छोटा (20 टन द्रव्यमान) होगा और इसका उपयोग सूक्ष्म गुरुत्वाकर्षण प्रयोगों (अंतरिक्ष पर्यटन के लिए नहीं) करने के लिए किया जाएगा।
  • अंतरिक्ष स्टेशन के लिए प्रारंभिक योजना के तहत, अंतरिक्ष यात्रियों को 20 दिनों तक अंतरिक्ष में ठहराया जाएगा। यह परियोजना ‘गगनयान मिशन’ का एक विस्तार होगी।
  • यह अंतरिक्ष स्टेशन लगभग 400 किमी की ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करेगा।
  • भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा एक अंतरिक्ष डॉकिंग प्रयोग (space docking experiment – Spadex) पर कार्य किया जा रहा है। यह अंतरिक्ष स्टेशन को कार्यात्मक बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण तकनीक है।

अन्य अंतरिक्ष स्टेशन:

  • वर्तमान में, अंतरिक्षीय कक्षा में एकमात्र अंतरिक्ष स्टेशन, ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (ISS) कार्यरत है। आईएसएस, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, यूरोप, जापान और कनाडा का अंतर्राष्ट्रीय सहयोग प्रोजेक्ट है।
  • चीन द्वारा अब तक ‘तिआनगोंग-1’ और ‘तिआनगोंग-2’ नामक दो परीक्षण अंतरिक्ष स्टेशनों को अंतरिक्षीय कक्षा में भेजा जा चुका है।

महत्व:

  • ‘अंतरिक्ष स्टेशन’, विशेष रूप से जैविक प्रयोगों के लिए सार्थक वैज्ञानिक डेटा एकत्र करने हेतु आवश्यक होते हैं।
  • ‘अंतरिक्ष स्टेशन’, अन्य अंतरिक्ष वाहनों पर उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों की तुलना में अधिक संख्या में और लंबे समय तक वैज्ञानिक अध्ययन के लिए प्लेटफ़ॉर्म प्रदान करते हैं।
  • चालक दल का प्रत्येक सदस्य, अंतरिक्ष स्टेशन पर हफ्तों या महीनों तक रहता है, लेकिन उसके अंतरिक्ष में निवास की अवधि प्रायः एक वर्ष से अधिक नहीं होती है।
  • अंतरिक्ष स्टेशनों का उपयोग, मानव शरीर पर लंबी अवधि की अंतरिक्ष उड़ान के प्रभावों का अध्ययन करने के लिए भी किया जाता है।

Current Affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

मोलनिया कक्षा (Molniya orbit) क्या है?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन’ (ISS) के बारे में
  2. आईएसएस में शामिल देश
  3. उद्देश्य
  4. पिछले अंतरिक्ष स्टेशन

मेंस लिंक:

अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन (ISS) पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


हर गोबिंद खुराना

हाल ही में, प्रख्यात बायोकेमिस्ट और केमिकल बायोलॉजिस्ट ‘हर गोबिंद खुराना’ (Har Gobind Khorana) की 100वीं जयंती मनाई गई।

हर गोबिंद खुराना’ के बारे में:

जन्म: 9 जनवरी, 1922, रायपुर, भारत (अब रायपुर, पाकिस्तान)।

अनुसंधान और योगदान:

  • उन्होंने सर अलेक्जेंडर टॉड के तहत कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (1951) में एक फेलोशिप के दौरान न्यूक्लिक एसिड पर शोध शुरू किया।
  • उन्होंने 1970 में अपनी टीम की सहायता से ‘खमीर के जीन’ (yeast gene) की पहली कृत्रिम प्रतिलिपि को संश्लेषित करने में सफलता हासिल कर आनुवंशिकी विज्ञान में एक अन्य योगदान दिया।
  • बाद के शोध में उन्होंने ‘कशेरुकी जीवों’ में दृष्टि के ‘कोशिका संकेत मार्ग’ में अंतर्निहित आणविक तंत्र का पता लगाया।
  • उनका अध्ययन मुख्य रूप से ‘रोडोप्सिन’ (Rhodopsin) नामक प्रोटीन की संरचना और कार्य से संबंधित था। यह प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन, कशेरुकी जीवों की आंख के रेटिना में पाया जाता है।
  • उन्होंने ‘रोडोप्सिन’ में उत्परिवर्तन की भी जांच की। यह उत्परिवर्तन, रतौंधी के कारक ‘रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा’ से संबंधित होता है।

पुरस्कार एवं सम्मान:

  • डाक्टर खुराना की महत्वपूर्ण खोज के लिए उन्हें अन्य दो अमरीकी वैज्ञानिकों – मार्शल डब्ल्यू निरेनबर्ग और रॉबर्ट डब्ल्यू होली- के साथ, फिजियोलॉजी अथवा चिकित्सा क्षेत्र में सन् 1968 का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें जेनेटिक कोड और प्रोटीन संश्लेषण में इसकी भूमिका की व्याख्या के लिए दिया गया
  • नोबेल पुरस्कार के अलावा, डाक्टर खुराना को ‘अल्बर्ट लास्कर बेसिक मेडिकल रिसर्च अवार्ड’ (1968) और ‘नेशनल मेडल ऑफ साइंस’ (1987) भी प्रदान किए गए।
  • भारत सरकार ने 1969 में डाक्टर खुराना को पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

Current Affairs

 


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