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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 12 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग

2. एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट

3. क्वाड-संबंधित मुद्दे

 

सामान्य अध्ययन-III

1. OSIRIS-REx और क्षुद्रग्रह बेन्नू

2. राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन

3. दीर्घस्‍थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर स्टॉकहोम अभिसमय

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. नरक का प्रवेश द्वार

2. सिख तख्त

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: वैधानिक, नियामक और विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग


संदर्भ:

हाल ही में, ‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ (National Commission for Protection of Child Rights – NCPCR) ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव से सभी ‘बाल देखभाल संस्थानों’ (Children Care Institutions – CCIs) को ‘किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम’, 2015 (Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act), 2015 के तहत पंजीकृत कराने को कहा है।

‘राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग’ (National Commission for Protection of Child Rights – NCPCR) ने ‘बाल देखभाल संस्थानों’ (CCIs) को ‘जेजे एक्ट’ (JJ Act) का पालन करना अनिवार्य बताया है, और राज्य से 10 दिनों के भीतर कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी है।

NCPCR के बारे में:

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (National Commission for Protection of Child Rights- NCPCR) का गठन ‘बाल अधिकार संरक्षण अधिनियम’, 2005 के अंतर्गत मार्च 2007 में किया गया था।

  • यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है।
  • ‘बालक’ की परिभाषा: आयोग द्वारा ‘0 से 18 वर्ष आयु वर्ग’ के व्यक्ति को ‘बालक’ अथवा ‘बच्चे’ (Child) के रूप में परिभाषित किया गया है।
  • आयोग का कार्य, देश में बनायी गयी, समस्त विधियाँ, नीतियां, कार्यक्रम तथा प्रशासनिक तंत्र, भारत के संविधान तथा साथ ही संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन में प्रतिपाादित बाल अधिकारों के संदर्श के अनुरूप होंने को सुनिश्चित करना है।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ 2009 के संदर्भ में NCPCR की शक्तियाँ:

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR):

  1. कानून के उल्लंघन के संबंध में शिकायतों की जांच कर सकता है।
  2. किसी व्यक्ति को पूछतांछ करने हेतु बुलाना तथा साक्ष्यों की मांग कर सकता है।
  3. न्यायायिक जांच का आदेश दे सकता है।
  4. हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर कर सकता है।
  5. अपराधी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार से संपर्क कर सकता है।
  6. प्रभावित लोगों को अंतरिम राहत देने की सिफारिश कर सकता है।

आयोग का गठन:

इस आयोग में एक अध्यक्ष और छह सदस्य होते हैं जिनमें से कम से कम दो महिलाएँ होना आवश्यक है।

  1. सभी सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, तथा इनका कार्यकाल तीन वर्ष का होता है।
  2. आयोग के अध्यक्ष की अधिकतम आयु 65 वर्ष तथा सदस्यों की अधिकतम आयु 60 वर्ष होती है।

‘बाल कल्याण समितियों’ के बारे में:

(Child Welfare Committee- CWC)

किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (जेजे अधिनियम) की धारा 27(1) के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक जिले के लिए आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ‘बाल कल्याण समितियों’ (Child Welfare Committees – CWC) का गठन किया जाएगा।

देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के संबंध में इन समितियों का कार्य ‘जेजे अधिनियम’, 2015 (JJ Act, 2015) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा।

Current Affairs

 

समितियों की संरचना: ‘बाल कल्याण समिति’ में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होंगे, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा उपयुक्त व्यक्तियों को नियुक्त किया जाएगा। इन सदस्यों में न्यूनतम एक महिला और और एक बच्चों से संबंधित मामलों का विशेषज्ञ होगा।

पात्रता शर्तें: जेजे अधिनियम, 2015 के तहत बनाए गए किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) मॉडल नियम, 2016 के नियम के अनुसार, अध्यक्ष और सदस्यों की आयु पैंतीस वर्ष से अधिक होनी चाहिए। इसके अलावा, इनके पास शिक्षा, स्वास्थ्य, या कल्याण गतिविधियों के क्षेत्र में बच्चों के साथ काम करने का न्यूनतम सात वर्ष का अनुभव होना चाहिए, अथवा सदस्यों के लिए बाल मनोविज्ञान या मनोचिकित्सा या सामाजिक कार्य या समाजशास्त्र या मानव विकास या कानून के क्षेत्र में एक डिग्री युक्त पेशेवर, अथवा एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी होना चाहिए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘बाल देखभाल संस्थान’ को ‘किशोर न्याय अधिनियम’, 2015 के तहत परिभाषित किया गया है? इस बारे अधिक जानकारी हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. NCPCR – संरचना और कार्य
  2. ‘शिक्षा का अधिकार’ (RTE) अधिनियम के तहत NCPCR की शक्तियां
  3. आरटीई अधिनियम की मुख्य विशेषताएं
  4. आरटीई के दायरे में आने वाले बच्चे
  5. ‘बाल कल्याण समिति (CWC)- गठन और संरचना

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC)


(Academic Bank of Credit)

संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा आईआईटी, आईआईएम और ‘राष्ट्रीय महत्व के अन्य संस्थानों’ (Institutions of National ImportanceINIs) को ‘अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ (Academic Bank of Credit) ढांचे के अंतर्गत शामिल किया गया है। इस व्यवस्था के तहत, छात्र अपना 50 प्रतिशत तक पाठ्यक्रम – जिस संस्थान में नामांकित हैं, उसके अलावा किसी अन्य संस्थान से भी पूरा कर सकते हैं।

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’, 2020 (National Education Policy – NEP), 2020  के तहत प्रस्तावित किया गया था।

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) क्या है?

  • ‘एकेडमिक बैंक ऑफ क्रेडिट’ को ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ (UGC) द्वारा स्थापित किया जाएगा।
  • इसके तहत, छात्रों के लिए किसी पाठ्यक्रम में प्रवेश करने और उसे पूरा करने के कई विकल्प दिए जाएंगे।
  • ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ के तहत, छात्रों के लिए किसी डिग्री या पाठ्यक्रम को छोड़ने और संबंधित प्रमाण पत्र प्राप्त करने का विकल्प दिया जाएगा। एक निश्चित समय के पश्चात, छात्र, अपनी अधूरी छोड़ी हुई पढाई को उसी स्तर से पुनः शुरू कर सकते हैं।
  • इसके द्वारा छात्रों को किसी डिग्री को पूरा करते समय या किसी पाठ्यक्रम को छोड़ने के दौरान संस्थान बदलने की सुविधा भी प्रदान की जाएगी।

कार्यविधि:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ एक वर्चुअल स्टोर-हाउस है, जो एक छात्र के ‘एकेडमिक क्रेडिट’ का रिकॉर्ड रखेगा। यह, सीधे छात्रों से किसी भी पाठ्यक्रम के कोई क्रेडिट कोर्स दस्तावेज़ स्वीकार नहीं करेगा, बल्कि केवल उच्च शिक्षा संस्थानों से, छात्रों के खातों में जमा ‘क्रेडिट कोर्स’ दस्तावेज़ों को स्वीकार करेगा।

लाभ:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ क्रेडिट सत्यापन, क्रेडिट संचय, क्रेडिट ट्रांसफर, छात्रों के विमोचन और छात्रों के प्रमोशन में मदद करेगा।

Current Affairs

 

‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ के बारे में अधिक जानने हेतु पढ़ें

Current Affairs

 

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ को ‘नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी – एक वर्चुअल स्टोरहाउस’ की तर्ज पर तैयार किया गया है। ‘नेशनल एकेडमिक डिपॉजिटरी’ क्या है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति’ (NEP) के बारे में
  2. ‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) क्या है?
  3. विशेषताएं

मेंस लिंक:

‘अकादमिक क्रेडिट बैंक’ (ABC) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

क्वाड से संबंधित मुद्दे


संदर्भ:

जापान और ऑस्ट्रेलिया के मध्य हाल ही में संपन्न हुए रक्षा समझौते का नई दिल्ली द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन साथ में इससे जुड़ी कुछ चिंताओं पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है।

भारत के लिए चिंता का विषय:

  • इस तरह के समझौते ‘नई दिल्ली’ के लिए एक चेतावनी भी हो सकते हैं, कि अन्य देशों द्वारा परस्पर औपचारिक एवं संस्थागत सुरक्षा सहयोग हेतु समझौते किए जा रहे हैं जिनमे भारत को शामिल नहीं किया जा रहा है।
  • कुछ ही महीनों के अंतराल में इस क्षेत्र में दो नए सुरक्षा-समझौते – AUKUS तथा जापान-ऑस्ट्रेलिया रक्षा समझौता- किए गए हैं, तथा अन्य समझौतों पर विभिन्न देशों के मध्य वार्ता जारी है। नई दिल्ली को इस बात पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है, कि अन्य देशों के साथ घनिष्ठ सुरक्षा सहयोग स्थापित करने के प्रति निरंतर संदेहात्मक रवैया किस तरह से भारत के सर्वोत्तम हित में है।
  • इसके अलावा अधिक समस्यात्मक यह है, कि भारत का यह रवैया इस बात का एक और संकेत करता है कि, देश अपनी घरेलू क्षमताओं की सीमाएं स्पष्ट रूप से जाहिर होने के बाद भी, ‘बाहरी सुरक्षा भागीदारी’ के प्रति अपने पारंपरिक विरोध से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सका है।

भारत का चीन के प्रति बदलता नजरिया:

  • चीन के प्रति साझा चिंताओं को लेकर निकटवर्ती देशों का एकीकरण, भारत के लिए संतोषजनक होना चाहिए।
  • इस क्षेत्र में कई अन्य देशों की भांति, भारत द्वारा अतीत में चीन को लेकर चिंता व्यक्त की जा चुकी है, लेकिन चीन की भारत के प्रति सामान्य शत्रुता और सीमा पर आक्रामकता स्पष्ट होने के बाद पिछले कई वर्षों में इसकी स्थिति में काफी बदलाव आया है।
  • फिर भी, नई दिल्ली द्वारा अभी तक धीमी गति से प्रतिक्रिया दी जा रही है और पकड़म-पकड़ाई खेल (playing catch-up) रही है। भारत द्वारा मुख्य रूप से कोई पहल किए जाने की बजाय महज चीन के कदमों का जवाब दिया जा रहा है।

आवश्यकता:

  • एक निश्चित भविष्य और इस सब-की भरपाई करने का एक तरीका, चीन की ताकत के साथ संतुलन बनाने के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय प्रतितोलक समूह’ (Counterweights) का निर्माण करने संबंधी प्रयासों को मजबूत करने की आवश्यकता है।
  • भारत को हिमालयी क्षेत्र में भागीदारों से प्रत्यक्ष सहायता की आवश्यकता भले ही नहीं हो, लेकिन उसे समुद्री मोर्चे पर इस प्रकार की सहायता की आवश्यकता है।
  • लेकिन, यह मदद तभी संभव होगी जब भारत इस क्षेत्र में अपने सहयोगियों के साथ मजबूत और गहन सुरक्षा सहयोग हेतु अपनी महत्वाकांक्षा पर काबू पा लेगा। इस प्रकार के सुरक्षा-सहयोग केवल सैन्य-अभ्यास करने से नहीं बन सकते हैं।

‘क्वाड ग्रुपिंग’ (Quad grouping) क्या है?

यह, जापान, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया देशों का एक चतुष्पक्षीय सुरक्षा वार्ता संगठन है।

  • इस समूह के सभी सदस्य राष्ट्र लोकतांत्रिक राष्ट्र होने साथ-साथ गैर-बाधित समुद्री व्यापार तथा सुरक्षा संबंधी हित साझा करते हैं।
  • इस विचार को पहली बार वर्ष 2007 में जापानी प्रधान मंत्री शिंजो आबे द्वारा प्रस्तावित किया गया था। हालाँकि, ऑस्ट्रेलिया के समूह में सम्मिलित नहीं होने के कारण यह विचार आगे नहीं बढ़ सका है।

इस संगठन का महत्व:

  1. क्वाड (Quad), समान विचारधारा वाले देशों के लिए परस्पर सूचनाएं साझा करने तथा पारस्परिक हितों संबंधी परियोजनाओं पर सहयोग करने हेतु एक अवसर है।
  2. इसके सदस्य राष्ट्र एक खुले और मुक्त इंडो-पैसिफिक दृष्टिकोण को साझा करते हैं, जिसमे सभी विकास और आर्थिक परियोजनाओं के साथ-साथ, समुद्री डोमेन जागरूकता और समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा देना भी शामिल है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्वाड (Quad)- संरचना और सदस्य
  2. मालाबार युद्धाभ्यास – संरचना और प्रतिभागी
  3. एशिया प्रशांत क्षेत्र तथा भारत-प्रशांत क्षेत्र: भौगोलिक भूगोल
  4. दक्षिण चीन सागर में महत्वपूर्ण द्वीप
  5. हिंद महासागर क्षेत्र में द्वीप तथा विभिन्न चैनल

 

मेंस लिंक:

शांति और सुरक्षा बनाए रखने और संयुक्त राष्ट्र के समुद्रीय कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए क्वाड की औपचारिक बहाली और पुन: प्रवर्तन की आवश्यकता है। परीक्षण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

OSIRIS-REx और क्षुद्रग्रह बेन्नू


संदर्भ:

नासा का ओसीरिस-रेक्स (OSIRIS-REx) अंतरिक्ष यान, एक क्षुद्रग्रह के नमूने को लेकर पृथ्वी की ओर वापस लौट रहा है। यह अंतरिक्ष यान नमूनों से भरा एक कैप्सूल लेकर 2023 में पृथ्वी पर पहुंचेगा। क्षुद्रग्रह के नमूने उत्सुक वैज्ञानिकों को पृथ्वी पर जल और जीवन की उत्पत्ति को समझने में मदद कर सकते हैं।

क्षुद्रग्रह का सपर्श करने वाले नासा के अंतरिक्ष यान द्वारा एकत्रित किए गया मलबा हमारे सौर मंडल की उत्पत्ति के बारे में जानने में हमारी मदद कर सकता है।

Current Affairs

 

पृष्ठभूमि:

20 अक्टूबर, 2021 को, नासा के ओसीरिस-रेक्स (OSIRIS-REx) अंतरिक्ष यान ने ‘क्षुद्रग्रह बेन्नू’ (asteroid Bennu) की सतह पर कुछ समय के लिए उतरा था और वहां से धूल और कंकड़ के कुछ नमूने एकत्र किए थे। इन नमूनों को साथ लेकर OSIRIS-REx वापस पृथ्वी पर 2023 में पहुचेगा।

  • ओसीरिस-रेक्स का पूरा नाम, ओरिजिन, स्पेक्ट्रल इंटरप्रिटेशन, रिसोर्स आइडेंटिफिकेशन, सिक्योरिटी-रेगोलिथ एक्सप्लोरर (Origins, Spectral Interpretation, Resource Identification, Security-Regolith Explorer- OSIRIS-Rex) है।

OSIRIS-REx मिशन के बारे में:

  • यह किसी प्राचीन क्षुद्रग्रह से नमूना एकत्र करने तथा इन्हें पृथ्वी पर वापस लाने के उद्देश्य से अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा का पहला मिशन है।
  • अक्टूबर 2020 में OSIRIS-REx अंतरिक्ष यान ने क्षुद्रग्रह बेन्नू (asteroid Bennu) की सतह का स्पर्श किया था, और इसका उद्देश्य ऐस्टरॉइड की सतह से धूल और कंकड़ों के नमूने एकत्र करना था।
  • यह मिशन वर्ष 2016 में शुरू लांच किया गया था।

क्षुद्रग्रह बेन्नू (Asteroid Bennu)

ऐस्टरॉइड बेन्नू को एक प्राचीन क्षुद्रग्रह माना जाता है, जिसमे अरबों वर्षों बीत जाने दौरान भी, इसकी संरचना में बहुत परिवर्तन नहीं हुए हैं। अर्थात, इसकी सतह के नीचे स्थित चट्टानें और पाए जाने वाले रासायनिक पदार्थ, सौर प्रणाली की उत्पत्ति के समय के है।

  • इसलिए, वैज्ञानिक और शोधकर्ताओं की रुचि इस क्षुद्रग्रह का अध्ययन करने हैं, क्योंकि इससे उन्हें सौर मंडल, सूर्य, पृथ्वी और अन्य ग्रहों की उत्पत्ति के बारे में कोई सुराग मिल सकता है।
  • अब तक, ज्ञात जानकारी के अनुसार, बेन्नू एक ‘बी-प्रकार’ का क्षुद्रग्रह है, जिसका अर्थ है कि इस पर महत्वपूर्ण मात्रा में कार्बन और अन्य विभिन्न खनिज मौजूद हैं।
  • यह क्षुद्रग्रह, कार्बन की उच्च मात्रा के कारण, यह अपनी ओर आने वाले प्रकाश का मात्र चार प्रतिशत परावर्तित करता है। परावर्तित प्रकाश की यह मात्रा शुक्र जैसे ग्रह की तुलना में काफी कम है, शुक्र ग्रह अपनी ओर आने वाले लगभग 65 प्रतिशत प्रकाश को परावर्तित करता है। पृथ्वी लगभग 30 प्रतिशत प्रकाश परावर्तित करती है।
  • इसे ‘नियर अर्थ ऑब्जेक्ट’ (NEO) के रूप में वर्गीकृत किया गया है, यह अगली शताब्दी में वर्ष 2175 और 2199 के बीच पृथ्वी से टकरा सकता है।

Current Affairs

 

नमूना संग्रहण हेतु साइट:

नासा ने नमूना संग्रहण हेतु बेन्नू क्षुद्रग्रह के उत्तरी गोलार्ध में अवस्थित “नाइटिंगेल” नामक एक क्रेटर में एक साइट का चयन किया था।

क्षुद्रग्रहों के अध्ययन का कारण:

  • ग्रहों और सूर्य के निर्माण और इतिहास के बारे में जानकारी के लिए वैज्ञानिकों द्वारा क्षुद्रग्रहों के अध्ययन पर जोर दिया जा रहा है, क्योंकि क्षुद्रग्रहों का निर्माण तथा सौर मंडल में अन्य पिंडों का निर्माण एक ही समय के दौरान हुआ था।
  • इस प्रकार के अध्ययनों का एक अन्य कारण, ऐसे क्षुद्रग्रहों की तलाश करना भी है, जो पृथ्वी के लिए संभावित रूप से खतरनाक हो सकते हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. OSIRIS- REx का उद्देश्य
  2. पृथ्वी के निकटवर्ती क्षुद्रग्रह
  3. क्षुद्रग्रह बेन्नू के बारे में।

मेंस लिंक:

OSIRIS- REx के उद्देश्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नेशनल सुपरकंप्यूटिंग मिशन


(National Supercomputing Mission)

संदर्भ:

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी की गयी वार्षिक वर्षांत समीक्षा के अनुसार:

  • राष्ट्रीय सुपर-कंप्यूटर मिशन (National Super-Computer Mission – NSM) के तहत, जुलाई 2021 से IIT-हैदराबाद, NABI- मोहाली, CDAC-बेंगलुरु और IIT कानपुर में चार नए सुपर कंप्यूटर स्थापित किए गए हैं।
  • NSM, लगभग 75 संस्थानों और ‘नेशन नॉलेज नेटवर्क’ (NKN) के माध्यम से काम कर रहे हजारों से अधिक सक्रिय शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों को हाई परफॉरमेंस कंप्यूटिंग (HPC) सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करता है।

राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन  क्या है?

  • राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (National Supercomputing Mission NSM) इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय (MeitY) और विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (DST) द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया जा रहा है।
  • इसे उन्नत कम्प्यूटिंग विकास केंद्र (Centre for Development of Advanced Computing: C-DAC), पुणे और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु द्वारा कार्यान्वित किया गया है।

मिशन का लक्ष्य:

  • राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन का उद्देश्य 70 से अधिक उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग सुविधाओं से लैस एक विशाल सुपरकंप्यूटिंग ग्रिड की स्थापना करना तथा देश के राष्ट्रीय शैक्षणिक और R&D संस्थानों को सशक्त बनाना है।
  • इन सुपर कंप्यूटरों को राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क (National Knowledge – NKN) पर राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग ग्रिड से जोड़ा जाएगा।
  • इस मिशन में इन अनुप्रयोगों के विकास संबंधी चुनौतियों का सामना करने के लिए उच्च पेशेवर उच्च प्रदर्शन कम्प्यूटिंग (High Performance Computing- HPC) की जानकारी रखने वाले कार्यबल का विकास सम्मिलित किया गया है।

‘राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन’  की उपलब्धियां:

  • स्‍वदेशी तौर पर असेंबल किए गए पहले सुपर कंप्‍यूटर ‘परम शिवाय’ को आईआईटी (बीएचयू) में स्थापित किया गया है।
  • उसके बाद ‘परम शक्ति’ को आईआईटी खड़गपुर में और ‘परम ब्रह्म’ को आईआईएसईआर पुणे में स्थापित किया गया था। ये सुपर कंप्‍यूटर, वेदर एंड क्लाइमेट, कम्प्यूटेशनल फ्लूड डायनामिक्स, बायोइनफॉरमैटिक्स और मटेरियल साइंस जैसे डोमेन से एप्लिकेशन से लैस हैं।

प्रीलिम्स के लिए तथ्य:

भारत ने एक स्वदेशी सर्वर ‘रुद्र’ (RUDRA) विकसित किया है जो सरकार और सार्वजनिक उपक्रमों की उच्च प्रदर्शन कम्प्यूटिंग (HPC)  संबंधी सभी आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है। यह पहला अवसर है जब C-DAC द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर स्टैक के साथ देश में कोई सर्वर सिस्‍टम बनाया गया है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत और विश्व में सुपर कंप्यूटर
  2. ये तीव्रता से किस प्रकार गणना करते हैं?
  3. राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क (NKN) के बारे में
  4. राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) के तहत लक्ष्य

मेंस लिंक:

राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (NSM) पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

दीर्घस्‍थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर स्टॉकहोम अभिसमय


(Stockholm Convention on POPs)

संदर्भ:

यूरोपीय आयोग ने पुनर्नवीनीकरण उत्पादों, स्वास्थ्य और पर्यावरण में संदूषण की समस्या से निपटने के लिए ‘दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषकों’ (Persistent Organic Pollutants – POPs) के लिए एक सख्त सीमा निर्धारित करने का प्रस्ताव दिया है।

‘स्थायी कार्बनिक प्रदूषक’ (POPs) क्या हैं?

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा ‘दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषकों’ (POPs) को “पर्यावरण में दीर्घकाल तक मौजूद रहने वाले, खाद्य श्रंखला के माध्यम से जैव-संचित होने वाले, तथा मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पैदा करने का जोखिम पैदा करने वाले रासायनिक पदार्थों” के रूप में परिभाषित किया गया है।

वर्ष 1995 में, UNEP की गवर्निंग काउंसिल द्वारा ‘दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषकों’ (Persistent Organic Pollutants – POPs) पर वैश्विक कार्रवाई करने का आह्वान किया गया था।

POPs की विशिष्टता:

दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषक’ (POPs) वसारागी / ‘लिपोफिलिक’ (Lipophilic) होते हैं, अर्थात ये जीवित जानवरों और मनुष्यों के वसायुक्त ऊतकों में जमा होते हैं।

  • वसायुक्त ऊतकों (fatty tissue) में, इनकी सांद्रता पृष्ठभूमि स्तरों की तुलना में 70,000 गुना अधिक तक बढ़ सकती है।
  • जैसे-जैसे आप खाद्य श्रृंखला में आगे बढ़ते हैं, पीओपी (POPs) की सांद्रता बढ़ती जाती है, इसी कारणवश खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर रहने वाले जानवर जैसे मछली, शिकारी पक्षी, स्तनधारी और मनुष्य इन रसायनों की सर्वाधिक सांद्रता पायी जाती हैं।

‘दीर्घस्‍थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर स्टॉकहोम कन्वेंशन’ के बारे में:

‘स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर स्टॉकहोम कन्वेंशन’ (Stockholm Convention on POPs), मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण को POPs से बचाने के लिये एक वैश्विक संधि है।

  • इस अभिसमय पर वर्ष 2001 में हस्ताक्षर किए गए थे तथा यह न्यूनतम 50 हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों द्वारा अनुसमर्थन के नब्बे दिन बाद मई 2004 से प्रभावी हुआ था।
  • इसका लक्ष्य, स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (पीओपी) के उत्पादन और उपयोग को खत्म करना या प्रतिबंधित करना है।

स्टॉकहोम कन्वेंशन के तहत घोषित शुरुआती 12 POPs:

अभिसमय के तहत शुरुआत में, बारह ‘दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषकों’ (POPs) को मनुष्यों और पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के रूप में चिह्नित किया गया था और इन्हें 3 श्रेणियों में रखा जा सकता है:

  1. कीटनाशक (Pesticides): एल्ड्रिन, क्लोर्डेन, डीडीटी, डाइलड्रिन, एंड्रिन, हेप्टाक्लोर, हेक्साक्लोरोबेंजीन, मायरेक्स, टोक्साफीन;
  2. औद्योगिक रसायन (Industrial Chemicals): हेक्साक्लोरोबेंजीन, पॉलीक्लोराइनेटेड बाइफिनाइल (पीसीबी); तथा
  3. उपोत्पाद (By-products): हेक्साक्लोरोबेंजीन; पॉलीक्लोराइनेटेड डिबेंजो-पी-डाइऑक्सिन और पॉलीक्लोराइनेटेड डिबेंजोफुरन्स (PCDD/PCDF), और पीसीबी।

इसके बाद, कार्सिनोजेनिक पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs) और कुछ ब्रोमिनेटेड फ्लेम-रिटार्डेंट्स, तथा ऑर्गोमेटेलिक यौगिकों जैसे कि ट्रिब्यूटिल्टिन (TBT) आदि अतिरिक्त पदार्थों को ‘पर्सिस्टेंट ऑर्गेनिक पॉल्युटेंट्स’ (दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषकों) की सूची में जोड़ा गया है।

POPs के स्रोत:

  1. कृषि रसायनों और औद्योगिक रसायनों का अनुचित उपयोग और/या निपटान।
  2. उच्च तापमान और दहन प्रक्रियाएं।
  3. औद्योगिक प्रक्रियाओं या दहन के अवांछित उपोत्पाद।

क्या कन्वेंशन कानूनी रूप से बाध्यकारी है?

हां। स्टॉकहोम कन्वेंशन के अनुच्छेद 16 के तहत, अभिसमय द्वारा अपनाए गए उपायों की प्रभावशीलता का नियमित अंतराल पर मूल्यांकन किया जाना अनिवार्य किया गया है।

पीओपी से संबंधित अन्य अभिसमय:

लंबी दूरी के सीमा-पारीय वायु प्रदूषकों पर कन्वेंशन (Convention on Long-Range Transboundary Air Pollutants – LRTAP) तथा दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) पर प्रोटोकॉल, पीओपी से संबंधित अन्य अभिसमय हैं।

हालिया परिवर्तन:

केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा दीर्घस्‍थायी कार्बनिक प्रदूषकों (POPs) पर स्टॉकहोम अभिसमय में सूचीबद्ध सात रसायनों के सत्‍यापन की मंजूरी दे दी है।

य़े सात रसायन निम्नलिखित हैं:

  1. क्लोरडेकोन (Chlordecone)
  2. हेक्साब्रोमो बाईफिनाइल (Hexabromobiphenyl)
  3. हेक्साब्रोमो डाईफिनाइल ईथर एवं हेप्टाब्रोमो डाईफिनाइल ईथर (Hexabromo diphenyl ether and Heptabromo diphenyl ether)
  4. टेट्राब्रोमो डाईफिनाइल ईथर एवं पेंटाब्रोमो डाईफिनाइल ईथर (Tetrabromo diphenyl ether and Pentabromo diphenyl ether)
  5. पेंटाक्लोरो बेंज़ीन (Penta chlorobenzene)
  6. हेक्साब्रोमो साइक्लोडोडेकेन (Hexabromocyclododecane)
  7. हेक्साक्लोरो ब्यूटाडाइन (Hexachlorobutadiene)

भारत के लिए लाभ:

सत्‍यापन प्रक्रिया भारत को राष्ट्रीय कार्यान्वयन योजना (NIP) को आधुनिक बनाने में वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) वित्तीय संसाधनों तक पहुंचने में सक्षम बनाएगी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दीर्घस्थायी कार्बनिक प्रदूषक’ (POPs) क्या हैं?
  2. स्टॉकहोम कन्वेंशन किससे संबंधित है?
  3. कन्वेंशन के उद्देश्य?
  4. क्या यह कानूनी रूप से बाध्यकारी है?
  5. पीओपी के रूप में चिह्नित रसायन।
  6. ‘वैश्विक पर्यावरण सुविधा’ क्या है?

मेंस लिंक:

‘दीर्घस्‍थायी कार्बनिक प्रदूषकों पर स्टॉकहोम अभिसमय’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


नरक का प्रवेश द्वार

तुर्कमेनिस्तान के राष्ट्रपति गुरबांगुली बर्डीमुखामेदोव ने हाल ही में, अधिकारियों को देश में स्थित ‘नरक के प्रवेश द्वार’ / ‘गेटवे टू हेल’ (Gateway to Hell) को बुझाने का कोई तरीका खोजने का आदेश दिया है।

  • तुर्कमेनिस्तान को ‘गेटवे टू हेल’ को दरवाज़ा क्रेटर (Darvaza Crater) भी कहा जाता है। यह आकार में 225 फीट चौड़ा और 99 फीट गहरा है। 5 वर्ग मीटर के क्षेत्र विस्तारित ‘गेटवे टू हेल’ का व्यास 70 मीटर है।
  • यह तुर्कमेनिस्तान में ‘दरवाजा’ के निकट स्थित एक गुफा में धंसा हुआ एक ‘प्राकृतिक गैस क्षेत्र’ है।
  • इस विशाल प्राकृतिक गैस कुंड में, पांच दशकों से जलती हुई भीषण लपटें निकल रही हैं।

इस नर्क-द्वार की उत्पत्ति:

ऐसा माना जाता है कि,  वर्ष 1971 में, सोवियत वैज्ञानिकों द्वारा एक साधारण गलत गणना किए जाने के कारण इस क्रेटर का निर्माण हुआ था।

  • सोवियत वैज्ञानिकों ने जमीन के नीचे संचित ईंधन की मात्रा को कम करके आंका था। इनकी बोरिंग करने वाली मशीनों ने इस भूमिगत गुफा में ड्रिल किया था, जिसके परिणामस्वरूप एक गहरा गड्ढा निर्मित हो गया था।
  • गैस ड्रिलर के गड्ढे में गिरने के बाद, वैज्ञानिकों को गड्ढे से हानिकारक गैसों के निकालने की आशंका थी, और वातावरण में जहरीली मिथेन गैस का पहले से ही रिसाव शुरू हो चुका था।
  • इस प्रकार, मीथेन गैस को पड़ोसी क्षेत्रों तक पहुंचने से रोकने और पर्यावरण और जीवों को नुकसान पहुंचाने से रोकने के लिए, वैज्ञानिकों ने इस क्रेटर में आग लगाने का फैसला किया।

Current Affairs

 

सिख तख्त

हाल ही में, दिल्ली विधानसभा ने “दिल्ली सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1971” में संशोधन करने हेतु एक विधेयक पारित किया है, जिसमे “तख्त दमदमा साहिब” (Takht Damdama Sahib) को सिखों के पांचवें तख्त (fifth Takht of Sikhs) के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है।

  • तख्त (सिंहासन) सिखों के लिए लौकिक सत्ता की ‘पीठ’ (गद्दी) होते हैं। वर्तमान में पांच सिख तख्त हैं। इनमें से तीन पंजाब में, एक महाराष्ट्र में और एक बिहार में है।
  • सिख समुदाय से संबंधित मुद्दों पर ‘सिख तख्त’ (Sikh Takhts) समय-समय पर हुकुमनामा जारी करते हैं। इनमे से ‘अकाल तख्त’ को सर्वोच्च माना जाता है, और इसलिए पूरे समुदाय से संबंधित कोई भी आदेश ‘अकाल तख्त’ की ओर से जारी किया जाता है।

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