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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 11 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. कृष्णा नदी जल विवाद

2. निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्नों पर निर्णय

3. विश्व व्यापार संगठन में चीन का ‘विकासशील देश’ का दर्जा

 

सामान्य अध्ययन-III

1. पीएम जन धन योजना

2. सेमीकंडक्टर चिप्स की वैश्विक स्तर पर कमी

3. नासा-इसरो का निसार मिशन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारत में सार्वभौमिक अभिगम्यता

2. भुंगलोटी

3. विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व

4. जगन्नाथ मंदिर

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप और उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

कृष्णा नदी जल विवाद


संदर्भ:

‘कृष्णा नदी जल विवाद’ (Krishna River water dispute) मामले की सुनवाई हेतु उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एएस बोपन्ना एक खंडपीठ गठित की गयी थी। हाल ही में, इन दोनों न्यायाधीशों ने, एक तरह का उदहारण बनाते हुए अपने आप को उक्त मामले की सुनवाई से अलग कर लिया क्योंकि दोनों न्यायाधीश मूलतः महाराष्ट्र और कर्नाटक के निवासी है। ‘कृष्णा नदी जल विवाद’ में महाराष्ट्र, कर्नाटक तेलंगाना और आंध्रप्रदेश राज्य शामिल हैं।

आवश्यकता:

यद्यपि, न्यायाधीशों द्वारा बिना किसी “भय अथवा पक्षपात” के न्याय करने की शपथ ली जाती है, किंतु इन दोनों न्यायाधीशों ने ‘अपमानजनक’ अथवा ‘निंदात्मक’ आलोचना की आशंका की वजह से ‘कृष्णा जल विवाद’ मामले से अलग होने का निर्णय लिया है।

अदालत में विवाद:

कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 नवंबर, 2011 को पारित आदेश से मुक्ति दिए जाने की मांग की गयी है। इस आदेश में अदालत ने, केंद्र सरकार को दिसंबर 2010 में ‘कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण II’ (KWDT) द्वारा कर्नाटक, तत्कालीन आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र को कृष्णा नदी के पानी का आवंटन करने संबंधी जारी अंतिम आदेश को, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 6(1) के तहत, आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित करने से रोक दिया था।

अधिकरण के आदेश का प्रकाशन, इसके कार्यान्वयन के लिए एक आवश्यक पूर्व-शर्त है।

कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) का निर्णय:

कृष्णा नदी जल विवाद की शुरुआत पूर्ववर्ती हैदराबाद और मैसूर रियासतों के बीच हुई थी, जोकि बाद में गठित महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों बीच जारी है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत वर्ष 1969 में  कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (Krishna Water Disputes TribunalKWDT) का गठन किया गया था, जिसके द्वारा वर्ष 1973 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी।

कृष्णा नदी जल विवाद न्यायाधिकरण की वर्ष 1976 में प्रकाशित रिपोर्ट में कृष्णा नदी जल के 2060 TMC (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) को 75 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर तीन भागों में पर विभाजित किया गया था:

  1. महाराष्ट्र के लिए 560 TMC
  2. कर्नाटक के लिए 700 TMC
  3. आंध्र प्रदेश के लिए 800 TMC

संशोधित आदेश:

राज्यों के मध्य असंतोष व्यक्त किये जाने पर वर्ष 2004 में दूसरे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) का गठन किया गया।

  • दूसरे KWDT द्वारा वर्ष 2010 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। इस रिपोर्ट में 65 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर कृष्णा नदी के अधिशेष जल का 81 TMC महाराष्ट्र को, 177 TMC कर्नाटक को तथा 190 TMC आंध्र प्रदेश के लिये आवंटित किया गया था।

आदेश अभी तक प्रकाशित क्यों नहीं किया गया?

वर्ष 2014 में तेलंगाना को एक अलग राज्य के रूप में गठित किये जाने के पश्चात, आंध्र प्रदेश द्वारा तेलंगाना को KWDT में एक अलग पक्षकार के रूप में शामिल करने और कृष्णा नदी-जल को तीन के बजाय चार राज्यों में आवंटित किये जाने की मांग की जा रही है।

 

‘न्यायिक निरर्हता’ अथवा ‘सुनवाई से इंकार’ का तात्पर्य:

किसी पीठासीन न्यायायिक अधिकारी अथवा प्रशासनिक अधिकारी द्वारा हितों के टकराव के कारण किसी न्यायिक सुनवाई अथवा आधिकारिक कार्रवाई में भागीदारी से इंकार करने को न्यायिक निरर्हता (Judicial disqualification), ‘सुनवाई से इंकार’ करना अथवा ‘रिक्युजल’ (Recusal) कहा जाता है।

‘सुनवाई से इंकार’ करने हेतु सामान्य आधार:

  1. किसी तर्कशील निष्पक्ष पर्यवेक्षक को लगता है कि, न्यायाधीश किसी एक पक्षकार के प्रति सद्भाव रखता है, अथवा अन्य पक्षकार के प्रति द्वेषपूर्ण है, अथवा न्यायाधीश किसी के प्रति पक्षपाती हो सकता है।
  2. न्यायाधीश का मामले में व्यक्तिगत हित है अथवा वह मामले में व्यक्तिगत हित रखने वाले किसी व्यक्ति से संबंध रखता है।
  3. न्यायाधीश की पृष्ठभूमि अथवा अनुभव, जैसे कि न्यायाधीश के वकील के रूप में किये गए पूर्व कार्य।
  4. मामले से संबंधित तथ्यों अथवा पक्षकारों से व्यक्तिगत तौर पर परिचय।
  5. वकीलों या गैर-वकीलों के साथ एक पक्षीय संवाद।
  6. न्यायाधीशों के अधिनिर्णय, टिप्पणियां अथवा आचरण।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘सीमापारीय जल-धाराओं और अंतर्राष्ट्रीय झीलों के संरक्षण एवं उपयोग पर अभिसमय’ (Convention on the Protection and Use of Transboundary Watercourses and International Lakes) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कृष्णा की सहायक नदियाँ
  2. गोदावरी की सहायक नदियाँ
  3. भारत में पूर्व तथा पश्चिम की बहने वाली नदियाँ
  4. अंतरराज्यीय नदी जल विवाद- प्रमुख प्रावधान
  5. कृष्णा एवं गोदावरी नदी प्रबंधन बोर्ड- गठन, कार्य और अधिदेश

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

निर्वाचन आयोग द्वारा राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्नों पर निर्णय


संदर्भ:

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह की नवगठित पार्टी ‘पंजाब लोक कांग्रेस’ को निर्वाचन आयोग द्वारा ‘हॉकी स्टिक और बॉल’ पार्टी चिन्ह दिया गया है।

current Affairs

राजनीतिक दलों को प्रतीक चिन्हों का आवंटन:

निर्वाचन आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार- किसी राजनीतिक दल को चुनाव चिह्न का आवंटन करने हेतु निम्नलिखित प्रक्रिया अपनाई जाती है:

  • नामांकन पत्र दाखिल करने के समय राजनीतिक दल / उम्मीदवार को निर्वाचन आयोग की प्रतीक चिह्नों की सूची में से तीन प्रतीक चिह्न प्रदान किये जाते हैं।
  • उनमें से, राजनीतिक दल / उम्मीदवार को ‘पहले आओ-पहले पाओ’ आधार पर एक चुनाव चिह्न आवंटित किया जाता है।
  • किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विभाजित होने पर, पार्टी को आवंटित प्रतीक/चुनाव चिह्न पर निर्वाचन आयोग द्वारा निर्णय लिया जाता है।

निर्वाचन आयोग की शक्तियाँ:

चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968 के अंतर्गत निर्वाचन आयोग को राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने और प्रतीक चिह्न आवंटित करने का अधिकार दिया गया है।

  • आदेश के अनुच्छेद 15 के तहत, निर्वाचन आयोग, प्रतिद्वंद्वी समूहों अथवा किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के गुटों द्वारा पार्टी के नाम तथा प्रतीक चिह्न संबंधी दावों के मामलों पर निर्णय ले सकता है।
  • निर्वाचन आयोग, राजनीतिक दलों के किसी विवाद अथवा विलय पर निर्णय लेने हेतु एकमात्र प्राधिकरण भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने सादिक अली तथा अन्य बनाम भारत निर्वाचन आयोग (ECI) मामले (1971) में इसकी वैधता को बरकरार रखा।

चुनाव चिह्नों के प्रकार:

‘निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण और आबंटन) (संशोधन) आदेश, 2017 (Election Symbols (Reservation and Allotment) (Amendment) Order, 2017) के अनुसार, राजनीतिक दलों के प्रतीक चिह्न निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं:

  1. आरक्षित (Reserved): देश भर में आठ राष्ट्रीय दलों और 64 राज्य दलों को ‘आरक्षित’ प्रतीक चिह्न प्रदान किये गए हैं।
  2. स्वतंत्र (Free): निर्वाचन आयोग के पास लगभग 200 ‘स्वतंत्र’ प्रतीक चिह्नों का एक कोष है, जिन्हें चुनावों से पहले अचानक नजर आने वाले हजारों गैर-मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दलों को आवंटित किया जाता है।

पार्टी का विभाजन होने पर ‘चुनाव चिन्ह’ संबंधी विवाद में निर्वाचन आयोग की शक्तियां:

विधायिका के बाहर किसी राजनीतिक दल का विभाजन होने पर, ‘निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण और आबंटन) आदेश’, 1968 के पैरा 15 में कहा गया है:

“निर्वाचन आयोग जब इस बात इस संतुष्ट हो जाता है, कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल में दो या अधिक प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह हो गए हैं और प्रत्येक प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह, उस ‘राजनीतिक दल’ पर दावा करता है, तो ऐसी स्थिति में, निर्वाचन आयोग को, इनमे से किसी एक प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह को ‘राजनीतिक दल’ के रूप में मान्यता देने, अथवा इनमे से किसी को भी मान्यता नहीं देने संबंधी निर्णय लेने की शक्ति होगी, और आयोग का निर्णय इन सभी प्रतिद्वंद्वी वर्गों या समूहों के लिए बाध्यकारी होगा”।

  • यह प्रावधान ‘मान्यता प्राप्त’ सभी राष्ट्रीय और राज्यीय दलों (इस मामले में लोजपा की तरह) में होने वाले विवादों पर लागू होता है।
  • पंजीकृत, लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों में विभाजन होने पर, निर्वाचन आयोग आमतौर पर, संघर्षरत गुटों को अपने मतभेदों को आंतरिक रूप से हल करने या अदालत जाने की सलाह देता है।

कृपया ध्यान दें, कि वर्ष 1968 से पहले निर्वाचन आयोग द्वारा ‘चुनाव आचरण नियम’, 1961 के तहत अधिसूचना और कार्यकारी आदेश जारी किए जाते थे।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप एक मान्यता प्राप्त ‘राष्ट्रीय राजनीतिक दल’ और एक ‘राज्य राजनीतिक दल’ के बीच अंतर जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राजनीतिक दलों को मान्यता प्रदान करने हेतु प्रक्रिया।
  2. राज्य दल और राष्ट्रीय दल क्या हैं?
  3. मान्यता प्राप्त दलों को प्राप्त लाभ।
  4. पार्टी प्रतीक चिह्न किसे कहते हैं? प्रकार क्या हैं?
  5. राजनीतिक दलों के विलय से जुड़े मुद्दों पर निर्णय कौन करता है?
  6. अनुच्छेद 226 किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

राजनीतिक दलों को प्रतीक चिन्हों का आवंटन किस प्रकार किया जाता हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

 विश्व व्यापार संगठन में चीन का ‘विकासशील देश’ का दर्जा


संदर्भ:

‘विश्व व्यापार संगठन’ (World Trade OrganizationWTO) में चीन का एक ‘विकासशील देश’ (Developing Country) के रूप में ‘दर्जा’ एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है। कई देशों ने WTO मानदंडों के तहत ‘विकासशील देशों के लिए आरक्षित लाभ’ प्राप्त करने वाले इस ‘उच्च मध्यम आय वाले राष्ट्र – चीन’ के ‘विकासशील देश’ दर्जे पर पर चिंताएं व्यक्त की हैं।

इसके अलावा, ‘अल्पतम विकसित देश’ (Least Developed Country – LDC) दर्जे पर भी चिंता व्यक्त की गई है। विदित हो कि, जीडीपी के मामले में भारत को पीछे छोड़ने के बाद बांग्लादेश को मिला LDC का दर्जा  संभवतः छिन जाएगा।

विश्व व्यापार संगठन में ‘विकासशील देश’ का दर्जा:

‘विश्व व्यापार संगठन’ (WTO) में अभी तक “विकसित” (Developed) और “विकासशील” (Developing) देशों की कोई स्पष्ट परिभाषा निर्धारित नहीं है।

  • सदस्य देशों द्वारा स्वयं ही अपने को “विकसित” या “विकासशील” देश घोषित किया जाता है।
  • हालांकि, WTO के अन्य सदस्य देश, ‘विकासशील देशों के लिए उपलब्ध प्रावधानों का उपयोग करने’ को लेकर ‘सदस्य देश’ की घोषणा को चुनौती दे सकते हैं।

विकासशील देश” दर्जे के लाभ:

‘विश्व व्यापार संगठन’ में ‘विकासशील देश’ का दर्जा प्राप्त देशों के लिए कुछ विशेष अधिकार मिलते हैं। ‘विकासशील देश का दर्जा’ राष्ट्रों के लिए ‘विशेष और विभेदक व्यवहार’ (Special and Differential Treatment – S&DT) अथवा अन्य विशिष्ट प्रावधान सुनिश्चित करता है, जिसके तहत उन्हें समझौतों और प्रतिबद्धताओं को लागू करने हेतु अधिक समय मिल जाता है। इन प्रावधानों के तहत, ‘विकासशील देशों’ के लिए व्यापार के अवसरों को बढ़ाने संबंधी उपाय, उनके व्यापार हितों की रक्षा, और विवादों का समाधान करने और तकनीकी मानकों को लागू करने हेतु क्षमता निर्माण में सहयोग आदि प्रदान किया जाता है।

विकसित, विकासशील और अल्पतम विकसित देशों की मान्यता हेतु WTO के मानदंड:

‘विश्व व्यापार संगठन प्रणाली’ के तहत, आम तौर पर, देशों को विकसित (Developed), विकासशील (Developing) और ‘अल्प विकसित देशों’ (LDC) के रूप में नामित किया जाता है।

  • ‘विश्व व्यापार संगठन’ में विकसित और विकासशील देशों के बीच विकास का असमान स्तर एक सर्वविदित तथ्य है।
  • ‘प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौते’ (General Agreement on Tariffs and Trade – GATT)  के अनुच्छेद XVIII में यह स्वीकार किया गया है, कि इस समझौते के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए, केवल निम्न स्तर के विकास कर पाने में सक्षम तथा विकास के प्रारंभिक चरण से गुजर रहे देशों के प्रगतिशील विकास में सहायता करना आवश्यक होगा।
  • तदनुसार, ‘विश्व व्यापार संगठन समझौतों’ में GATT के अनुच्छेद XVIII और अन्य ‘विशेष एवं विभेदक उपचार (S&DT) प्रावधान’ जैसे प्रावधानों का लाभ उठाने के लिए देश खुद को ‘विकासशील देश’ के रूप में घोषित कर देते हैं।
  • इन प्रावधानों का उद्देश्य, विकासशील देशों के लिए व्यापार के अवसरों को बढ़ाना, विश्व व्यापार संगठन के दायित्वों का पालन करने के लिए लंबी संक्रमणकालीन अवधि सुनिश्चित करना और अन्य बातों के अलावा देशों को तकनीकी सहायता प्रदान करना है।

विशेष एवं विभेदक उपचार” प्रावधान क्या हैं?

  • समझौतों और प्रतिबद्धताओं को लागू करने करने हेतु अधिक समय दिए जाने का प्रावधान।
  • विकासशील देशों के लिए व्यापारिक अवसरों में वृद्धि किए जाने संबंधी उपाय।
  • ‘विश्व व्यापार संगठन’ के सभी सदस्यों द्वारा विकासशील देशों के व्यापार हितों की रक्षा हेतु किए जाने वाले प्रावधान।
  • विकासशील देशों को WTO द्वारा निर्धारित कार्य करने, विवादों का समाधान करने और तकनीकी मानकों को लागू करने संबंधी क्षमता निर्माण करने में सहयोग करने हेतु प्रावधान।
  • WTO के अल्प विकसित सदस्य देशों (LDC) से संबंधित प्रावधान।
  • विकासशील देशों के लिए ‘गैर-पारस्परिक अधिमान्य उपचार’ (non-reciprocal preferential treatment) की अवधारणा का कार्यान्वयन- जिसके तहत विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को व्यापार रियायतें देते समय बदले में समान रियायतों की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए।

विकसित देशों की मांगें:

  • कुछ समय से विकसित देशों, मुख्य रूप से अमेरिका, द्वारा ‘विश्व व्यापार संगठन’ से विकासशील देशों को दिए जा रहे लाभों को समाप्त करने के लिए दबाव दिया जा रहा है।
  • वर्तमान में, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के लगभग दो-तिहाई सदस्य स्वयं को ‘विकासशील देशों’ के रूप में घोषित करके WTO के ढांचे के तहत ‘विशेष उपचारों’ का लाभ उठाने और आसान प्रतिबद्धताओं को स्वीकार करने में सक्षम हैं।

Current Affairs

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।

जन धन योजना


संदर्भ:

वित्त मंत्रालय के प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, ‘प्रधानमंत्री जन-धन योजना’ (PMJDY) के तहत खोले गए बैंक खातों में जमा राशि 1.5 लाख करोड़ रुपये को पार कर गई है।

योजना का प्रदर्शन (2021 तक):

  • कुल ‘प्रधानमंत्री जन-धन योजना’ (PMJDY) खातों की संख्या 44 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
  • 54 करोड़ जन-धन खाते ग्रामीण और अर्ध-शहरी बैंक शाखाओं में खोले गए हैं।
  • 29 दिसंबर, 2021 तक योजना के तहत महिला खाताधारकों की संख्या लगभग 61 करोड़ थी।

जमा की जाने वाली राशि के अलावा, छात्रवृत्ति, सब्सिडी, पेंशन और कोविड राहत कोष जैसे लाभ ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ (Direct Benefit Transfer – DBT) के माध्यम से ‘जन धन बैंक खातों’ में जमा किए जाते हैं।

PMJDY के बारे में:

15 अगस्त 2014 को घोषित ‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ (PMJDY) एक ‘राष्ट्रीय वित्तीय समावेशन मिशन’ (National Mission for Financial Inclusion) है, जो वहनीय तरीके से वित्तीय सेवाओं, बैंकिंग/बचत तथा जमा खाते, विप्रेषण, ऋण, बीमा, पेंशन तक पहुंच सुनिश्चित करता है।

उद्देश्य:

  • किफायती लागत पर वित्तीय उत्पादों और सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना।
  • कम लागत तथा व्यापक पहुंच के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग।

योजना के मूल तत्व:

  1. सभी के लिए बैंकिंग सुविधाएं (Banking the unbanked)- न्यूनतम कागजी कार्रवाई के साथ मूल बचत बैंक जमा (Basic Savings Bank Deposit- BSBD) खाता, आसान KYC, e-KYC, शिविर लगाकर खाता खोलना, जीरो बैलेंस और जीरो शुल्क पर खाता खोलना।
  2. सभी के लिए सुरक्षा (Securing the unsecured)- 2 लाख रुपये के मुफ्त दुर्घटना बीमा कवरेज सहित व्यापारिक स्थलों पर नकद निकासी एवं भुगतान के लिए स्वदेशी डेबिट कार्ड जारी करना।
  3. सभी के लिए वित्तीय सहायता (Funding the unfunded)- अन्य वित्तीय उत्पादों जैसे माइक्रो-इंश्योरेंस, उपभोग के लिए ओवरड्राफ्ट, माइक्रो-पेंशन और माइक्रो-क्रेडिट।

यह योजना निम्नलिखित 6 स्तंभों पर आधारित है:

  1. बैंकिंग सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच – शाखा और बैंकिंग सुविधादाता/सुविधाप्रदाता, प्रतिनिधि।
  2. प्रत्येक परिवार के लिए 10,000/- रु. की ओवरड्राफ्ट सुविधा (OD) सहित मूल बचत बैंक खाता।
  3. वित्तीय साक्षरता कार्यक्रम- बचत को बढ़ावा देना, एटीएम का उपयोग, ऋण प्राप्त करने हेतु जानकारी, बीमा और पेंशन लाभ, बैंकिंग के लिए मोबाइल फोन का उपयोग करना।
  4. क्रेडिट गारंटी फंड की स्थापना – भुगतान में चूक होने पर बैंकों के लिए गारंटी प्रदान करना।
  5. बीमा – 15 अगस्त 2014 से 31 जनवरी 2015 के बीच खोले गए खातों पर 1 लाख रूपये तक का दुर्घटना बीमा तथा प्रधानमंत्री जन धन योजना के अंतर्गत 30,000 रुपये का जीवन बीमा लाभार्थी को उसकी मृत्यु पर सामान्य शर्तों की प्रतिपूर्ति पर देय होगा।
  6. असंगठित क्षेत्र के लिए पेंशन योजना।

‘प्रधानमंत्री जन धन योजना’ में नई सुविधाएं तथा विस्तार:

  1. योजना के तहत, मुख्य ध्यान प्रत्येक घर में बैंक खाता के बजाय प्रत्येक गैर-खाताधारक व्यस्क व्यक्ति पर किया जायेगा।
  2. RuPay कार्ड बीमा- 28 अगस्त 2018 के बाद खोले गए PMJDY खातों के लिए RuPay कार्ड पर मुफ्त आकस्मिक बीमा कवर को 1 लाख रु से 2 लाख रु किया जायेगा।
  3. ओवरड्राफ्ट सुविधाओं में वृद्धि – ओवरड्राफ्ट सुविधाओं की सीमा में 5,000 रुपये से बढ़ाकर 10,000 रुपये की दो गुनी वृद्धि; 2,000 रुपये तक ओवरड्राफ्ट की बिना शर्त सुविधा। ओवरड्राफ्ट सुविधाओं के लिए ऊपरी आयु सीमा में 60 से 65 वर्ष तक की वृद्धि।

Current Affairs

 प्रीलिम्स लिंक:

  1. जन धन योजना कब शुरू की गई थी?
  2. पात्रता
  3. योजना के तहत ओवरड्राफ्ट सुविधा
  4. योजना के तहत दुर्घटना बीमा कवर
  5. योजना के विभिन्न घटक

मेंस लिंक:

प्रधान मंत्री जन धन योजना के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

सेमीकंडक्टर चिप्स की वैश्विक स्तर पर कमी


संदर्भ:

विशेषज्ञों द्वारा दी गयी चेतावनी के अनुसार, दुनिया भर में कोविड-19 के ओमिक्रोन (Omicron) वैरिएंट के तेजी से फैलने के बाद, विश्व स्तर पर सेमीकंडक्टर चिप्स (Semiconductor Chips) की कमी जारी रहेगी। हालाँकि, ओमिक्रोन वैरिएंट के उभार का चिप आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव संभवतः हल्का रहेगा, अतः वर्ष 2022 में ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ आपूर्ति में व्यवधान नहीं होगा।

इसके आगे:

अच्छी खबर यह है, कि कंपनियों ने सीखना शुरू कर दिया है, कि ‘बफर इन्वेंटरी’ बनाकर और स्थिति से निपटने हेतु ‘वैकल्पिक स्रोतों की खोज’ करके ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ की बढ़ती हुई आम कमी से कैसे निपटा जाए।

‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ के बारे में:

अर्धचालक अर्थात सेमीकंडक्टर्स (Semiconductors) – जिन्हें एकीकृत सर्किट (आईसी), या माइक्रोचिप्स के रूप में भी जाना जाता है – प्रायः सिलिकॉन या जर्मेनियम या गैलियम आर्सेनाइड जैसे यौगिक से निर्मित होते हैं।

सेमीकंडक्टर चिप्स का महत्व:

  • ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’, सभी आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स और ‘सूचना और संचार प्रौद्योगिकी’ उपकरणों के ‘दिल और दिमाग’ के रूप में कार्य करने वाले बुनियादी ‘बिल्डिंग ब्लॉक्स’ होते हैं।
  • ये चिप्स अब समकालीन ऑटोमोबाइल, घरेलू गैजेट्स और ईसीजी मशीनों जैसे आवश्यक चिकित्सा उपकरणों का एक अभिन्न अंग बन चुके हैं।

इनकी मांग में हालिया वृद्धि:

  • कोविड -19 महामारी की वजह से, दिन-प्रतिदिन की आर्थिक और आवश्यक गतिविधियों के बड़े हिस्से को ऑनलाइन रूप से किए जाने या इन्हें डिजिटल रूप से सक्षम बनाए जाने के दबाव ने, लोगों के जीवन में चिप-संचालित कंप्यूटर और स्मार्टफोन की ‘केंद्रीयता’ को उजागर कर दिया है।
  • दुनिया भर में फ़ैली महामारी और उसके बाद लगाए गए लॉकडाउन की वजह से जापान, दक्षिण कोरिया, चीन और अमेरिका सहित देशों में ‘महत्वपूर्ण चिप बनाने वाली सुविधाओं’ को भी बंद कर दिया गया।
  • ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ की कमी का व्यापक अनुवर्ती असर पड़ता है। पहले ‘चिप्स’ का अधिक मात्रा में भंडारण किए जाने से इसकी मांग में वृद्धि होती है, जो बाद में आपूर्ति में कमी का कारण बन जाती है।

भारत की सेमीकंडक्टर मांग और संबंधित पहलें:

  • भारत में, वर्तमान में सभी प्रकार की चिप्स का आयात किया जाता है, और वर्ष 2025 तक इस बाजार के 24 अरब डॉलर से 100 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
  • केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा, हाल ही में, एक ‘अर्धचालक और प्रदर्शन विनिर्माण पारितंत्र’ (Semiconductors and Display Manufacturing Ecosystem) के विकास में सहयोग करने के लिए ₹76,000 करोड़ की राशि आवंटित की गयी है।
  • भारत ने ‘इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स एंड सेमीकंडक्टर्स’ के निर्माण को बढ़ावा देने हेतु योजना (Scheme for Promotion of Manufacturing of Electronic Components and Semiconductors) भी शुरू की है, जिसके तहत इलेक्ट्रॉनिक्स घटकों और अर्धचालकों के निर्माण के लिए आठ साल की अवधि में 3,285 करोड़ रुपये का बजट परिव्यय मंजूर किया गया है।

आगे की चुनौतियां:

  1. उच्च निवेश की आवश्यकता
  2. सरकार की ओर से न्यूनतम वित्तीय सहायता
  3. संरचना क्षमताओं (Fab Capacities) की कमी
  4. PLI योजना के तहत अपर्याप्त अनुदान
  5. संसाधन अक्षम क्षेत्र

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के बारे में
  2. सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण में भारत की स्थिति?
  3. ‘राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति’ के तहत प्रमुख प्रस्ताव।
  4. उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना- इसकी घोषणा कब की गई थी?
  5. इस योजना का कार्यान्वयन

मेंस लिंक:

सेमीकंडक्टर्स या चिप्स/इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuits – ICs) का बढ़ता महत्व और इसके निर्माण एवं डिजाइन में चीन का अनुभव, भारत में चिप डिजाइन पर ध्यान केंद्रित किए जाने के संबंध में एक मजबूत आधार प्रदान करता है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा-इसरो का निसार मिशन


संदर्भ:

नासा और इसरो द्वारा ‘नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार उपग्रह’ (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar satellite)  अर्थात ‘निसार’ (NISAR) मिशन को वर्ष 2023 में लॉन्च किया जाएगा।

इसरो, पहले ही नासा को ‘निसार मिशन’ [NASA-ISRO SAR] के लिए एस-बैंड SAR पेलोड वितरित कर चुका है।

NISAR के बारे में:

  • ‘निसार उपग्रह’, खतरों और वैश्विक पर्यावरण परिवर्तन के अध्ययन के लिए अनुकूलित है और प्राकृतिक संसाधनों को बेहतर ढंग से प्रबंधित करने में मदद कर सकता है। इसके अलावा, यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और इसकी गति को बेहतर ढंग से समझने के लिए वैज्ञानिकों को जानकारी प्रदान कर सकता है।
  • यह उपग्रह अपने तीन-वर्षीय मिशन के दौरान प्रत्येक 12 दिनों में पूरे ग्लोब की बारीकी से जांच (scan) करेगा। यह उपग्रह अपने मिशन के दौरान पृथ्वी पर भूमि, बर्फ की चादर और समुद्री बर्फ की चित्रण कर ग्रह की एक ‘अभूतपूर्व’ दृश्य प्रदान करेगा।
  • यह सॅटॅलाइट, टेनिस कोर्ट के आधे आकार के किसी भी क्षेत्र में ग्रह की सतह से 4 इंच की ऊंचाई पर किसी भी गतिविधि का पता लगाने में सक्षम होगा।
  • नासा द्वारा इस उपग्रह के लिए रडार, विज्ञान आंकड़ो हेतु हाई-रेट कम्युनिकेशन सब-सिस्टम, जीपीएस रिसीवर और एक पेलोड डेटा सबसिस्टम प्रदान किये जाएंगे।
  • इसरों (ISRO) द्वारा स्पेसक्राफ्ट बस, दूसरे प्रकार के राडार (S- बैंड रडार), प्रक्षेपण यान और प्रक्षेपण संबंधी सेवाएं प्रदान की जाएंगी।
  • निसार (NISAR) उपग्रह में नासा द्वारा अब तक लॉन्च किया गया सबसे बड़ा रिफ्लेक्टर एंटीना लगाया जाएगा, और इसका मुख्य उद्देश्य, पृथ्वी की सतह पर होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों पर नज़र रखना, ज्वालामुखी विस्फोट होने बारे में चेतावनी संकेत भेजना, भूजल आपूर्ति निगरानी में मदद करना और बर्फ की चादरों को पिघलने वाली दर का पता लगाना है।

‘सिंथेटिक एपर्चर रडार’:

  • निसार (NISAR), ‘नासा-इसरो सिंथेटिक एपर्चर रडार [NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar satellite (SAR)] का संक्षिप्त रूप है। नासा द्वारा ‘सिंथेटिक एपर्चर रडार’ का उपयोग पृथ्वी की सतह में होने वाले परिवर्तन को मापने हेतु किया जाएगा।
  • सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR), मुख्यतः उच्च विभेदन छवियां (High-Resolution Images) खीचने की तकनीक को संदर्भित करता है। उच्च सटीकता के कारण, यह रडार, बादलों और अंधेरे को भी भेद सकता है, अर्थात यह किसी भी मौसम में चौबीसो घंटे आंकड़े एकत्र करने में सक्षम है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) के बारे में
  2. निसार (NISAR) के बारे में
  3. उद्देश्य

मेंस लिंक:

निसार मिशन पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भारत में सार्वभौमिक अभिगम्यता

(Universal Accessibility in India)

केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) द्वारा “भारत में सार्वभौमिक अभिगम्यता के लिए सामंजस्यपूर्ण दिशानिर्देश और मानक” जारी किए गए हैं।

प्रमुख बिंदु:

  • नए दिशानिर्देशों में डिजाइन योजना से लेकर इसके कार्यान्वयन तक परितंत्र बनाने संबंधी कई पहलुओं को शामिल किया गया है।
  • नए दिशानिर्देशों के अनुसार, सुगम गतिशीलता विकल्प प्रदान करने के लिए ‘रैंप’ (Ramp) महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इसके लिए दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।
  • इसके तहत, विकलांग व्यक्तियों (PwD) के साथ-साथ, सरकारी भवनों के निर्माण से लेकर मास्टर-प्लानिंग शहरों तक की सभी परियोजनाओं में शामिल लोगों के लिए दिशानिर्देश प्रदान किए गए हैं।
  • भारत में सार्वभौमिक अभिगम्यता (Universal Accessibility in India) के तहत, अन्य उपयोगकर्ता समूहों के प्रतीकों में विकलांग व्यक्तियों, परिवार के अनुकूल सुविधाओं और ट्रांसजेंडर के लिए अभिगम्यता प्रतीकों को शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।

 

भुंगलोटी

भुंगलोटी (Bhungloti) एक लता है, जिसे कटहल के पेड़ की जड़ों के साथ मिलाने पर ‘केसरिया रंग’ प्राप्त होता है।

  • मुख्य रूप से इसका उपयोग असम में बौद्ध भिक्षुओं द्वारा किया जाता है।
  • पूर्वी असम के चराईदेव जिले (Charaideo district) के एक ‘बौद्ध गांव’ द्वारा इसको संरक्षित करने के लिए निकट-अवस्थित एक वन – ‘चाला संरक्षित वन’ (Chala Reserve Forest) को गोद लिया गया है।

 

 

विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व

हाल ही में, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ‘अपशिष्ट टायरों के प्रबंधन’ हेतु ‘विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व’ (Extended Producer Responsibility – EPR) को लागू करने के लिए एक मसौदा अधिसूचना जारी की गई है।

EPR के इस विस्तार के अंतर्गत, उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किए जाने के बाद, टायरों के निर्माताओं और आयातकों को इनके निपटान को संभालना भी आवश्यक होगा।

आवश्यकता:

भारत, प्राकृतिक रबर का विश्व का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक और चौथा सबसे बड़ा उपभोक्ता देश है। देश के भीतर, ऑटोमोबाइल उद्योग, प्राकृतिक रबर सबसे बड़ा उपभोक्ता उद्योग है।

  • ऑटोमोबाइल उद्योग में वृद्धि होने के साथ, प्राकृतिक रबर की खपत बढ़ना तय है। वर्ष 2017 में ‘चिंतन’ नामक एक “पर्यावरण अनुसंधान और कार्य समूह” द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार, वर्ष 2035 तक, सड़कों पर लगभग 1 मिलियन यात्री वाहन (कार और उपयोगिता वाहन) और 236.4 मिलियन दोपहिया वाहन दौड़ रहे होंगे।
  • इन सभी स्रोतों से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण, एक बड़ी चिंता का विषय है।

EPR क्या है?

विस्तारित निर्माता उत्तरदायित्व / एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) एक नीतिगत उपागम है, जिसके तहत उत्पादकों को – उपयोग हो चुके उत्पादों के वित्तीय / भौतिक रूप से उपचार या निपटान करने की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाती है।

  • EPR सर्कुलर इकोनॉमी को आगे बढ़ाने में मदद करता है तथा किसी उत्पाद और उसकी पैकेजिंग से पर्यावरणीय प्रभाव को कम करता है, और साथ ही उत्पाद के पूरे जीवनचक्र के लिए निर्माता को जवाबदेह ठहराकर “प्रदूषक भुगतान” के सिद्धांत को बढ़ावा देता है।
  • भारत में, पहली बार प्लास्टिक अपशिष्ट (प्रबंधन और हैंडलिंग) नियम, 2011 और ई-अपशिष्ट प्रबंधन और हैंडलिंग नियम, 2011 के तहत वर्ष 2011 में एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) की शुरुआत की गयी थी।

 

जगन्नाथ मंदिर

हाल ही में, ओडिशा राज्य मंत्रिमंडल द्वारा ‘श्री जगन्नाथ मंदिर अधिनियम’, 1954 (Sri Jagannath Temple Act of 1954) में संशोधन को मंजूरी दे दी है।

  • जगन्नाथ मंदिर के स्वामित्व वाली भूमि से संबंधित मुद्दों को सरल बनाने के लिए ओडिशा सरकार द्वारा यह ऐतिहासिक कदम उठाया गया है।
  • इस संशोधन में, मंदिर प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को अब राज्य सरकार की मंजूरी के बिना मंदिर की जमीन को बेचने या पट्टे पर देने की शक्ति प्रदान की गयी है।

‘जगन्नाथ मंदिर’ के बारे में:

निर्माण:

  • माना जाता है कि इसका निर्माण 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंगा राजवंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा किया गया था।
  • जगन्नाथ पुरी मंदिर को ‘यमनिका तीर्थ’ (Yamanika Tirtha) भी कहा जाता है, जहां हिंदू मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की उपस्थिति के कारण ‘पुरी’ में मृत्यु के देवता ‘यम’ की शक्ति समाप्त हो जाती है।
  • यह मंदिर, चार धाम (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम) तीर्थों का एक भाग है। प्रत्येक हिंदू से अपने जीवनकाल में एक बार इन चारो धाम की यात्रा करने की अपेक्षा की जाती है।

वास्तुशिल्प:

  • इस मंदिर को “श्वेत शिवालय” / “सफेद पैगोडा” (White Pagoda) भी कहा जाता है और यह ‘चार धाम तीर्थ’ (बद्रीनाथ, द्वारका, पुरी, रामेश्वरम) का एक भाग है।
  • इस मंदिर के चार द्वार हैं- पूर्वी ‘सिंहद्वार’ जोकि मुख्य द्वार है, इस पर झुके हुए सिंह उत्कीर्ण हैं, दक्षिणी द्वार को ‘अश्वद्वार’, पश्चिमी द्वार को ‘व्याघ्र द्वार’ और उत्तरी द्वार को ‘हस्तीद्वार’ कहा जाता है।
  • मंदिर के शीर्ष पर स्थित ‘नीलचक्र; – या ‘नीला पहिया’ आठ धातुओं या अष्टधातु से निर्मित है।
  • प्रवेश द्वार के सामने अरुण स्तम्भ (सूर्य स्तंभ) स्थित है। यह स्तम्भ मूल रूप से कोणार्क के सूर्य मंदिर में स्थित था।

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