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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 8 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. चुनाव व्यय सीमा

2. आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना

3. ‘एक जिला एक उत्पाद’ योजना

 

सामान्य अध्ययन-III

1. हरित ऊर्जा गलियारा

2. चीता पुनर्वास परियोजना

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारत का पहला ओपन रॉक म्यूजियम

2. अनुच्छेद 348 (1)

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।

चुनावव्यय सीमा


संदर्भ:

हाल ही में, ‘भारत निर्वाचन आयोग’ (Election Commission of India) द्वारा चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए चुनाव-व्यय की सीमा (Election Expenditure Limit) में बढ़ोत्तरी की गयी है।

हालिया परिवर्तन:

  • लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों के उम्मीदवारों के लिए चुनाव-व्यय की सीमा 54 लाख रुपये-70 लाख रुपये (राज्यों के अनुसार) से बढ़ाकर 70 लाख-95 लाख रुपये कर दी गई है।
  • विधानसभा क्षेत्रों के लिए चुनाव-व्यय की सीमा 20 लाख रुपये-28 लाख रुपये से, बढ़ाकर 28 लाख रुपये- 40 लाख रुपये (राज्यों के अनुसार) कर दी गई है।
  • उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब के लिए चुनाव-व्यय में 40 लाख रुपये की, तथा गोवा और मणिपुर के लिए 28 लाख रुपये की बढोत्तरी की गयी है।

चुनाव व्यय सीमा

(Election Expenditure Limit)

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (Representation of the People ActRPA), 1951 की धारा 77 के तहत, प्रत्येक उम्मीदवार को अपने नामांकन दाखिल करने की तारीख से लेकर चुनाव परिणाम की घोषणा होने की तारीख तक के बीच किए जाने वाले सभी व्ययों का एक अलग और सही हिसाब रखना आवश्यक है।

  • चुनाव के पूरा होने के 30 दिनों के भीतर, सभी उम्मीदवारों के लिए अपने चुनाव-व्यय का विवरण ‘भारत निर्वाचन आयोग’ (ECI) के समक्ष प्रस्तुत करना आवश्यक है।
  • उम्मीदवार द्वारा गलत विविरण देने या अधिकतम सीमा से अधिक व्यय करने पर, उसे निर्वाचन आयोग द्वारा ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ (RPA), 1951 की धारा 10A के तहत तीन साल तक के लिए ‘चुनाव लड़ने के अयोग्य’ घोषित किया जा सकता है।

पृष्ठभूमि:

उम्मीदवारों के लिए चुनाव-व्यय सीमा में पिछली बार वृद्धि वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले की गयी थी, जिसे वर्ष 2020 में 10 फीसदी और बढ़ा दिया गया था।

उसी वर्ष, निर्वाचन आयोग द्वारा, चुनावों में लागत कारकों और अन्य संबंधित मुद्दों का अध्ययन करने तथा उपयुक्त सिफारिश देने हेतु एक समिति का गठन भी किया गया।

चुनाव-व्यय पर सीमा निर्धारण की आवश्यकता:

  • चुनाव अभियान खर्च पर सीमा निर्धारित करने का उद्देश्य चुनाव लड़ने वाले सभी उम्मेदवारों के लिए एक सामान अवसर प्रदान करना है। चुनाव-व्यय पर सीमा यह सुनिश्चित करती है कि एक उम्मीदवार, चुनाव में केवल धनवान होने के कारण नहीं जीत सकता।
  • चुनावी सुधारों पर विधि आयोग की 255 वीं रिपोर्ट के अनुसार- अनियमित अथवा कम-नियमित चुनावी वित्तपोषण के कारण ‘लॉबिंग तथा कैप्चरिंग’ जैसी घटनाएँ हो सकती हैं, जिसमे राजनीतिक दलों और बड़े दानदाताओं के मध्य ‘अनुचित लाभों की अदलाबदली’ जैसे समझौते भी शामिल हो सकते हैं।

अन्य सुधार:

राजनीतिक दलों के व्यय पर सीमा निर्धारण:

निर्वाचन आयोग द्वारा सरकार से लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों द्वारा चुनाव अभियान खर्च पर सीमा निर्धारण करने हेतु निर्वाचन संचालन नियम, 1961 के नियम 90 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करने के लिए कहा गया है।

  • यह चुनाव लड़ने वाले दल के उम्मीदवारों की संख्या तथा उम्मीदवारों के लिए निर्धारित की गयी व्यय सीमा के गुणन की आधी अथवा उससे कम होनी चाहिए।
  • यह सीमा सभी राजनीतिक दलों के लिए चुनाव में समान अवसर सुनिश्चित करेगी तथा चुनावों में बेहिसाब धन प्रयोग के संभावित खतरों को कम करेगी।
  • यह राजनीतिक दलों और उनके सहयोगियों द्वारा उपयोग की जाने वाली धन-शक्ति को भी नियंत्रित करेगा।

इस संदर्भ में उच्चत्तम न्यायालय की टिप्पणी:

  • भारत के उच्चत्तम न्यायालय ने कंवर लाल गुप्ता बनाम अमरनाथ चावला मामले में कहा है, कि चुनाव अभियान के सफल आयोजन में धन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • उम्मीदवार और राजनीतिक की अधिक दृश्यता से मतदाता प्रभावित हो जाते हैं और इस तरह भारी चुनावी खर्च मतदाता की पसंद को प्रभावित करते हैं।

इस संबंध में विभिन्न समितियाँ और आयोग:

  1. वर्ष 1999 में ‘भारत के विधि आयोग की ‘चुनावी कानूनों में सुधार’ पर 170 वीं रिपोर्ट।
  2. भारत निर्वाचन आयोग द्वारा वर्ष 2004 में ‘प्रस्तावित चुनावी सुधारों’ पर रिपोर्ट।
  3. वर्ष 1990 में चुनावी सुधारों पर गोस्वामी समिति।
  4. वर्ष 1993 में वोहरा समिति की रिपोर्ट।
  5. इंद्रजीत गुप्ता कमेटी ऑन स्टेट फंडिंग ऑफ इलेक्शन 1998।
  6. वर्ष 2001 में संविधान के कामकाज की समीक्षा हेतु राष्ट्रीय आयोग।
  7. वर्ष 2008 में दूसरा प्रशासनिक सुधार आयोग।

हाल ही में, विधि आयोग द्वारा अपनी 255 वीं रिपोर्ट में तीन श्रेणियों के अंतर्गत चुनावी सुधारों पर कई सिफारिशें की हैं:

  1. राजनीतिक अंशदान और पार्टी उम्मीदवार खर्च पर सीमा।
  2. प्रकटीकरण मानदंड और अनिवार्यताएं।
  3. चुनावों हेतु राज्य द्वारा वित्तपोषण।

विधि आयोग की उपरोक्त सिफारिशें सरकार के समक्ष विचाराधीन हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि किसी राजनीतिक दल के लिए ‘व्यय’ की कोई सीमा निर्धारित नहीं है? हालांकि, सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों को चुनाव पूरा होने के 90 दिनों के भीतर अपने चुनावी खर्च का विवरण निर्वाचन आयोग के समक्ष जमा करना होता है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. निर्वाचन संचालन नियम, 1961 का अवलोकन
  2. संशोधित चुनाव खर्च सीमा
  3. चुनाव आयोग के बारे में
  4. चुनाव खर्च से जुड़े मुद्दों पर निर्णय कौन करता है?
  5. क्या पार्टी के खर्च की कोई सीमा है?
  6. इस संबंध में विभिन्न समितियाँ और आयोग

मेंस लिंक:

चुनाव अभियान के सफल आयोजन में धन एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना


संदर्भ:

आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (Emergency Credit Line Guarantee Scheme – ECLGS) पर स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (SBI) द्वारा किए गए शोध अध्ययन की रिपोर्ट के मुताबिक:

  • सरकार की इस योजना ने 5 लाख फर्मों को दिवालिया होने से बचाया है और जिसके परिणामस्वरूप 1.5 करोड़ नौकरियां बची हैं।
  • कुल मिलाकर, 1.8 लाख करोड़ रुपये के MSME ऋण खातों को बचाया गया है।
  • इस प्रकार के लगभग 7 प्रतिशत खाते ‘सूक्ष्म एवं लघु’ श्रेणी के हैं।
  • राज्यों में, गुजरात इस योजना का सबसे बड़ा लाभार्थी रहा है, इसके बाद महाराष्ट्र, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश का स्थान है।

योजना के बारे में:

आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) को मई 2020 में आत्मनिर्भर भारत अभियान पैकेज के एक भाग के रूप में शुरू किया गया था। इसका उद्देश्य कोरोनोवायरस के कारण लगाए गए लॉकडाउन से उत्पन्न संकट को कम करने के लिए, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को क्रेडिट प्रदान करना था।

  • इसके अंतर्गत, राष्ट्रीय ऋण गारंटी ट्रस्टी कंपनी लिमिटेड (NCGTC) द्वारा 100% गारंटी कवरेज प्रदान की जाती है, जबकि बैंक और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) द्वारा ऋण उपलब्ध कराया जाता है।
  • यह ऋण, एक ‘गारंटी युक्त आपातकालीन क्रेडिट लाइन’ (Guaranteed Emergency Credit Line- GECL) सुविधा के रूप में प्रदान किया जाएगा।
  • योजना के तहत भागीदार ऋण प्रदाता संस्थानों (Member Lending Institutions- MLI) से NCGTC द्वारा कोई गारंटी शुल्क नहीं लिया जाएगा।
  • इस योजना के अंतर्गत बैंकों और वित्तीय संस्थानों (financial Institutions) के लिए 25% ब्याज दर तथा गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) के लिए 14% ब्याज दर की सीमा निर्धारित की गई है।

पात्रता:

  • 29 फरवरी, 2020 तक 50 करोड़ रुपए के बकाया ऋण वाले तथा 250 करोड़ रुपए तक का वार्षिक कारोबार करने वाले ऋणकर्ता इस योजना का लाभ उठाने हेतु पात्र होंगे।
  • 1 अगस्त 2020 को सरकार द्वारा 3 लाख-करोड़ रुपए की आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना (ECLGS) का दायरा विस्तृत कर दिया गया। इसके तहत बकाया ऋण की सीमा को दोगुना कर दिया गया तथा व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए डॉक्टरों, वकीलों और चार्टर्ड एकाउंटेंट जैसे पेशेवरों को एक निश्चित ऋण ऋण प्रदान करना शामिल किया गया है।

योजना के लाभ:

  • इस योजना के माध्यम से इन क्षेत्रों को कम लागत पर ऋण प्रदान किया जाएगा, जिससे MSME अपने परिचालन दायित्वों को पूरा करने और अपने व्यवसायों को फिर से शुरू करने में सक्षम होंगे।
  • वर्तमान अभूतपूर्व स्थिति के दौरान अपना कार्य जारी रखने के लिए MSMEs को सहयोग प्रदान करने से, इस योजना का अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने और इसके पुनरुद्धार में सहायता मिलने की भी उम्मीद है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

पहली बार ‘अंतर्राष्ट्रीय SME सम्मेलन’ वर्ष 2018 में नई दिल्ली में आयोजित किया गया था। इसके उद्देश्य क्या थे?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. MSMEs का वर्गीकरण- पुराना बनाम नया।
  2. MSMEs का जीडीपी में योगदान।
  3. NBFCs क्या हैं?
  4. GECL सुविधा क्या है?
  5. NCGTC क्या है?

मेंस लिंक:

आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

‘एक ज़िला-एक उत्पाद’ योजना


संदर्भ:

हाल ही में, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय द्वारा  ‘प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिककरण’ (Pradhan Mantri Formalisation of Micro food processing Enterprises – PMFME) योजना के ब्रांडिंग और विपणन घटक के अंतर्गत चयनित ‘एक जिला एक उत्पाद’ (One District One Product – ODOP) के 10 ब्रांड विकसित करने के लिए नेफेड (NAFED) के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

इनमें से अमृत फल, कोरी गोल्ड, कश्मीरी मंत्र, मधु मंत्र, सोमदाना और दिल्ली बेक्स के होल व्हीट कुकीज नाम के छह ब्रांड का हाल ही में शुभारंभ किया गया है।

  • आंवला जूस के लिए अमृत फल ब्रांड को विशेष रूप से हरियाणा के गुरुग्राम के लिए ओडीओपी अवधारणा के अंतर्गत विकसित किया गया है।
  • कोरी गोल्ड ब्रांड को धनिया पाउडर के लिए विकसित किया गया है जो राजस्थान के कोटा के लिए तैयार किया गया ओडीओपी उत्पाद है।
  • कश्मीरी मंत्र ब्रांड जम्मू-कश्मीर में कुलगाम के मसालों का सार है।
  • उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के शहद के लिए ओडीओपी अवधारणा के अंतर्गत ब्रांड मधु मंत्र विकसित किया गया है।
  • सोमदाना ब्रांड को महाराष्ट्र में ठाणे के मिलेट की ओडीओपी अवधारणा के अंतर्गत विकसित किया गया है।
  • होल व्हीट कुकीज, दिल्ली बेक्स ब्रांड के तहत विकसित किया गया एक अन्य उत्पाद है। ब्रांड और उत्पाद को दिल्ली के लिए बेकरी ओडीओपी अवधारणा के तहत विकसित किया गया है।

ये सभी उत्पाद नैफेड बाजार, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और पूरे भारत के प्रमुख रिटेल स्टोर पर उपलब्ध होंगे।

‘प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिककरण (PMFME) योजना’ के बारे में:

  • 2020 में शुरू की गई ‘PMFME योजना को 2020-21 से 2024-25 तक पांच वर्षों की अवधि तक लागू किया जाएगा।
  • यह अखिल भारतीय आधार पर असंगठित क्षेत्र के लिए शुरू की गयी है।

PMFME योजना के उद्देश्य:

  1. सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण इकाईयों के द्वारा वित्त अधिगम्यता में वृद्धि
  2. लक्ष्य उद्यमों के राजस्व में वृद्धि
  3. खाद्य गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का अनुपालन
  4. समर्थन प्रणालियों की क्षमता को सुदृढ़ बनाना
  5. असंगठित क्षेत्र से औपचारिक क्षेत्र में पारगमन
  6. महिला उद्यमियों और आकांक्षापूर्ण जिलों पर विशेष ध्यान
  7. अपशिष्ट से धन अर्जन गतिविधियों को प्रोत्साहन
  8. जनजातीय जिलों में लघु वनोपजों पर ध्यान देना।

मुख्य विशेषताऐं:

  1. केन्द्र प्रायोजित योजना। व्यय को 60:40 के अनुपात में भारत सरकार और राज्यों के द्वारा साझा किया जाएगा।
  2. 2,00,000 सूक्ष्म-उद्यमों को ऋण से जुड़ी सब्सिडी के माध्यम से सहायता प्रदान की जाएगी।
  3. योजना को 2020-21 से 2024-25 तक के लिए 5 वर्ष की अवधि हेतु कार्यान्वित किया जाएगा।
  4. समूह दृष्टिकोण
  5. खराब होने वाली वस्तुओं पर विशेष ध्यान

प्रशासनिक एवं कार्यान्वयन तंत्र:

  • इस योजना की निगरानी खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री की अध्यक्षता में एक अंतर-मंत्रिस्तरीय अधिकार प्राप्त समिति (IMEC) के द्वारा केन्द के स्तर पर की जाएगी।
  • मुख्य सचिव की अध्यक्षता में राज्य/संघ शासित प्रदेशों की एक समिति एसएचजी/ एफपीओ/क़ोओपरेटिव के द्वारा नई इकाईयों की स्थापना और सूक्ष्म इकाईयों के विस्तार के लिए प्रस्तावों की निगरानी और अनुमति/अनुमोदन करेगी।
  • राज्य/संघ शासित प्रदेश इस योजना के कार्यान्वयन के लिए विभिन्न गतिविधियों को शामिल करते हुए वार्षिक कार्ययोजना तैयार करेंगे।
  • इस कार्यक्रम में तीसरे पक्ष का एक मूल्याँकन और मध्यावधि समीक्षा तंत्र भी बनाया जाएगा।

योजना के लाभ:

  1. करीब आठ लाख सूक्ष्म-उद्यम सूचना, बेहतर विवरण और औपचारिक पहुँच के माध्यम से लाभान्वित होंगे।
  2. विस्तार और उन्नयन के लिए 2,00,000 सूक्ष्म उद्यमों तक ऋण से जुड़ी सब्सिडी और हैंडहोल्डिंग सहायता को बढ़ाया जाएगा।
  3. यह उन्हें गठित, विकसित और प्रतिस्पर्धी बनने में समर्थ बनाएगा।
  4. इस परियोजना से नौ लाख कुशल और अल्प-कुशल रोजगारों के सृजन की संभावना है।
  5. इस योजना में आकांक्षापूर्ण जिलों में मौजूदा सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमियों, महिला उद्यमियों और उद्यमियों को ऋण तक पहुँच बढ़ाया जाना शामिल है।
  6. संगठित बाजार के साथ बेहतर समेकन।
  7. सोर्टिग, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, भंडारण आदि जैसी समान सेवाओं को पहुँच में वृद्धि।

योजना की आवश्यकता:

  • इस क्षेत्र के 98 प्रतिशत, लगभग 25 लाख अपंजीकृत खाद्य प्रसंस्करण उद्यम, असंगठित और अनियमित हैं। इन इकाईयों का करीब 68 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित है और इनमें से 80 प्रतिशत परिवार आधारित उद्यम हैं।
  • यह क्षेत्र बहुत सी चुनौतियों, जैसे ऋण तक पहुँच न होना, संस्थागत ऋणों की ऊँची लागत, अत्याधुनिक तकनीक की कमी, खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के साथ जुड़ने की असक्षमता और स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों के साथ अनुपालन, आदि का सामना करता है।
  • इस क्षेत्र को मजबूत करने से, नुकसान में कमी, खेती के अतिरिक्त रोजगार सृजन अवसर और किसानों की आय को दुगना करने के सरकार के लक्ष्य तक पहुँचने में महत्वपूर्ण रूप से मदद मिलेगी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. केंद्र प्रायोजित तथा केंद्रीय क्षेत्रक योजना के मध्य अंतर
  2. इस योजना में राज्यों की भूमिका
  3. राज्य स्तर पर इस योजना की निगरानी कौन करता है?
  4. योजना का उद्देश्य

मेंस लिंक:

सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों को औपचारिक रूप देने की योजना (FME) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

हरित ऊर्जा गलियारा


संदर्भ:

आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति द्वारा, हाल ही में, ‘अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणाली (Intra-State Transmission System – InSTS) के लिये ‘हरित ऊर्जा कॉरिडोर’ (Green Energy Corridor- GEC) चरण-II की योजना को मंजूरी प्रदान कर दी गयी है।

‘अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणाली’ (InSTS) हेतु ‘हरित ऊर्जा गलियारा परियोजना’:

  • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर / हरित ऊर्जा गलियारा (GEC) परियोजना का उद्देश्य, ग्रिड में सौर एवं पवन जैसे अक्षय स्रोतों से उत्पादित बिजली को ‘पारंपरिक विद्युत् स्टेशनों’ के साथ सिंक्रनाइज़ करना है।
  • जीईसी-इंट्रा स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) परियोजना को, 2015-16 में पारेषण लाइनों को तैयार करने और सबस्टेशनों की ‘विद्युत् रूपांतरण क्षमता’ (Transformation Capacity) में वृद्धि के माध्यम से ‘अक्षय ऊर्जा क्षमता’ के संचरण और एकीकरण करने हेतु मंजूरी दी गई थी।

परियोजना का पहला चरण:

परियोजना के पहले चरण में, अंतर्राज्यीय ट्रांसमिशन प्रणाली, आठ नवीकरणीय ऊर्जा समृद्ध राज्यों (तमिलनाडु, राजस्थान, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र,गुजरात, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश) द्वारा लागू की जा रही है।

  • इस चरण के तहत, वर्ष 2022 तक 9700 सर्किट किमी ट्रांसमिशन लाइन और 22,600 मेगावोल्ट-एम्पीयर (एमवीए) ‘विद्युत् रूपांतरण क्षमता’ के सबस्टेशन स्थापित करने का लक्ष्य है।
  • इस चरण में योजना का वित्त पोषण, 40% भारत सरकार अनुदान, 20% राज्य इक्विटी और केएफडब्ल्यू बैंक, जर्मनी से 40% ऋण के माध्यम से किया जाएगा।

परियोजना का द्वितीय चरण:

  • दूसरे चरण में परियोजना को सात राज्यों गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, केरल, राजस्थान, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में लागू किया जा रहा है।
  • इस चरण के तहत, 2025-26 तक 10,750 सर्किट किमी ट्रांसमिशन लाइन और 27,500 मेगावोल्ट-एम्पीयर (एमवीए) ‘विद्युत् रूपांतरण क्षमता’ के सबस्टेशनों को स्थापित करने का लक्ष्य है।
  • इस चरण में परियोजना की लागत के 33 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाएगा।

भारत में ‘हरित ऊर्जा गलियारा’ की आवश्यकता:

प्रधान मंत्री द्वारा इस दशक के अंत तक देश की ‘गैर-जीवाश्म ईंधन बिजली उत्पादन क्षमता’ को 500GW तक बढ़ाने और 50% ऊर्जा आवश्यकताओं को अक्षय स्रोतों से पूरा करने का संकल्प लिया गया है। अतः, विभिन्न स्रोतों से उत्पादित उर्जा के एकीकरण की जरूरत है।

  • यह योजना वर्ष 2030 तक 450 GW स्थापित ‘नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद करेगी।
  • ‘हरित ऊर्जा गलियारे’ (GEC) देश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा में भी योगदान करेंगे और कार्बन फुटप्रिंट को कम करके पारिस्थितिक रूप से सतत विकास को बढ़ावा देंगे।
  • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर, बिजली और अन्य संबंधित क्षेत्रों में कुशल और अकुशल कर्मियों दोनों के लिए बड़े प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा करेगा।
  • GEC अंतर-राज्यीय पारेषण शुल्कों की भरपाई करने और बिजली की लागत को कम रखने में मदद करेगा। अंततः अंतिम उपयोगकर्ताओं को लाभान्वित करेगा।
  • यह परियोजना, भारत को 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली की हिस्सेदारी को 40% तक बढ़ाने में सहयोग करेगी।
  • इस परियोजना से भारत को ग्लासगो में COP-26 शिखर सम्मेलन में की गई जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

चीता पुनर्वास परियोजना


(Cheetah reintroduction project)

संदर्भ:

कोविड -19 की वर्तमान तीसरी लहर से जुड़ी स्थिति सामान्य होने के बाद, भारत सरकार द्वारा दक्षिण अफ्रीका और नामीबिया से आठ चीतों के पहले बैच को मध्य प्रदेश के ‘कुनो नेशनल पार्क’ (Kuno National Park) में स्थानांतरित करने की तैयारी की जा रही है। सरकार द्वारा पांच साल की अवधि में कुल 50 चीतों को देश के विभिन्न पार्कों में लाए जाने की योजना बनायी गयी है।

आगे का कार्यक्रम:

  • इस संबंध में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री द्वारा ‘भारत में चीता पुनर्वासन कार्य योजना’ का आरंभ किया गया है जिसके तहत अगले पांच वर्षों में 50 बड़ी बिल्लियों को देश में लाया जाएगा।
  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की 19वीं बैठक में इस कार्य योजना का शुभारंभ किया गया।

 

‘पुनर्वासन’ क्या है और चीतों को दोबारा देश में लाने की आवश्यकता:

  • किसी प्रजाति के ‘पुनर्वासन’ (Reintroduction) का अर्थ है, कि किसी प्रजाति को उस क्षेत्र में छोड़ना जहां वह जीवित रहने में सक्षम है।
  • ‘बड़ी मांसाहारी प्रजातियों के पुनर्वासन’ को संकटापन्न प्रजातियों के संरक्षण और पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करने की रणनीति के रूप में मान्यता दी गई है।
  • चीता (Cheetah), एकमात्र बड़ा मांसाहारी है, जो मुख्यतः ऐतिहासिक काल से भारत में अत्यधिक शिकार की वजह से विलुप्त हो चुका है।
  • भारत, वर्तमान में नैतिक और पारिस्थितिक कारणों से अपनी खोई हुई प्राकृतिक विरासत को बहाल करने पर विचार करने हेतु आर्थिक रूप से सक्षम हो चुका है।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • चीता (एसिनोनिक्स जुबेटस – Acinonyx Jubatus), बड़े आकार की बिल्ली प्रजातियों में सबसे पुरानी प्रजातियों में से एक है। इसके पूर्वजों का पता पांच मिलियन साल पहले के ‘मिओसीन युग’ में लगाया जा सकता है।
  • चीता दुनिया का सबसे तेज स्थलीय स्तनपायी जीव भी है।
  • यह IUCN की रेड लिस्टेड प्रजातियों में ‘संवेदनशील’ के रूप में सूचीबद्ध है।
  • देश में बची ‘आखिरी चित्तीदार बिल्ली’ की मृत्यु 1947 में छत्तीसगढ़ में हुई थी। बाद में, चीता को वर्ष 1952 में भारत में विलुप्त घोषित कर दिया गया।
  • एशियाई चीता को IUCN रेड लिस्ट द्वारा “गंभीर रूप से लुप्तप्राय” प्रजाति के रूप में वर्गीकृत किया गया है, और माना जाता है कि यह केवल ईरान में ही शेष बचे हैं।

भारत में चीता पुनर्वासन कार्यक्रम:

देहरादून में भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा सात साल पहले 260 करोड़ रुपये के परिव्यय सहित ‘चीता पुनर्वासन परियोजना’ तैयार की गयी थी।

  • भारत द्वारा मध्य प्रदेश के ग्वालियर-चंबल क्षेत्र के ‘श्योपुर’ और ‘मुरैना’ जिलों में विस्तारित ‘कुनो राष्ट्रीय उद्यान’ में चीतों को फिर से बसाए जाने की योजना बनाई गयी है।
  • यह संभवतः दुनिया की पहली ‘अंतरमहाद्वीपीय चीता स्थानान्तरण परियोजना’ है।

विलुप्त होने के कारण:

  • विलुप्त होने के सभी कारणों का स्रोत मानव हस्तक्षेप में खोजा जा सकता है। मानव-वन्यजीव संघर्ष, आवासों का नष्ट होना और भोजन के रूप में शिकार करने हेतु जीवों की कमी, और अवैध तस्करी जैसी समस्याओं की वजह से ने चीतों की संख्या समाप्त चुकी है।
  • जलवायु परिवर्तन और बढ़ती मानव आबादी ने इन समस्याओं को और भी बदतर बना दिया है।
  • वन्यजीवों के लिए उपलब्ध भूमि में कमी होने से, जिन प्रजातियों को चीतों की भांति अधिक क्षेत्रीय सीमा की आवश्यकता होती है, उन्हें अन्य जानवरों और मनुष्यों के साथ प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है और जगह को लेकर आपस में संघर्ष होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण’ (NTCA) के बारे में जानते हैं?

  • राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है।
  • यह बाघ संरक्षण को मजबूत करने के लिए 2006 में संशोधित वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के प्रावधानों को सक्षम करने के तहत गठित किया गया था।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भारत का पहला ओपन रॉक म्यूजियम

विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा भारत के पहले ‘ओपन रॉक म्यूजियम’ (open rock museum) का उद्घाटन किया है।

  • इसमें भारत के विभिन्न भागों से इकठ्ठा की गई 35 अलग-अलग प्रकार की चट्टानों को प्रदर्शित किया गया है जिनका समय काल 3 बिलियन वर्ष से लेकर 55 मिलियन वर्ष पूर्व का है।
  • यह चट्टानें धरती की सतह से लेकर 175 किलोमीटर तक की गहराई तक अलग-अलग स्तरों से ली गईं हैं।

 

अनुच्छेद 348 (1)

भारत के संविधान के अनुच्छेद 348 (1) में प्रावधान है, कि जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक, सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय में सभी कार्यवाही अंग्रेजी भाषा में होगी।

अनुच्छेद 348 (2) के तहत, राज्य के राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्च न्यायालय की कार्यवाही में राज्य के किसी भी आधिकारिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल की जाने वाली हिंदी भाषा या किसी अन्य भाषा के उपयोग को अधिकृत कर सकते हैं। परन्तु इस खंड की कोई बात ऐसे उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या आदेश को लागू नहीं होगी।

चर्चा का कारण:

गुजरात उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने, हाल ही में, अदालत की अवमानना ​​का सामना कर रहे एक पत्रकार को केवल अंग्रेजी में बोलने के लिए कहा, क्योंकि उच्च न्यायपालिका में इसी भाषा का प्रयोग किया जा रहा है।


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