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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 5 January 2022

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-II

1. जीएसटी क्षतिपूर्ति

2. लद्दाख में पैंगोंग त्सो झील पर चीन द्वारा पुल का निर्माण

3. परमाणु अस्त्र अप्रसार संधि

4. यूक्रेन में रूस बनाम नाटो

 

सामान्य अध्ययन-III

1. विश्व में कंप्यूटर चिप्स की कमी और इसका निहितार्थ

2. 5जी रोलआउट

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. गणितीय विज्ञान संस्थान

2. आरबीआई द्वारा लघु, ऑफलाइन ई-भुगतान को मंजूरी

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

जीएसटी क्षतिपूर्ति


(GST compensation)

संदर्भ:

कई राज्यों के वित्त मंत्रियों द्वारा ‘वस्तु एवं सेवा कर’ क्षतिपूर्ति अर्थात जीएसटी क्षतिपूर्ति (GST compensation) योजना को जून 2022 से आगे तक बढाए जाने की मांग की जा रही है।

संबंधित प्रकरण:

राज्यों द्वारा स्थानीय स्तर पर अप्रत्यक्ष कर लगाए जाने संबंधी लगभग सभी शक्तियों को समाप्त करके तथा प्रचलित सभी करों को ‘जीएसटी’ में समाहित करने पर राज्यों की सहमति के पश्चात् देश में ‘वस्तु एवं सेवा कर’ (Goods and Services TaxGST) अर्थात जीएसटी लागू किया गया था।

जीएसटी लागू करते समय इस शर्त पर सहमति हुई थी, कि नई ‘अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था’ अपनाए जाने से राज्यों को होने वाली ‘राजस्व क्षति’ को, क़ानून लागू होने से पांच साल की अवधि तक अर्थात जून 2022 तक एक समेकित ‘जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष’ से पूरा किया जाएगा।

समयावधि विस्तार की आवश्यकता:

समग्र अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से राज्यों के राजस्व पर कोविड-19 महामारी के प्रभाव का हवाला देते हुए, तमिलनाडु, केरल, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और छत्तीसगढ़ सहित राज्यों ने जोर देकर कहा है, कि जीएसटी लागू किए जाने से उनके राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, तथा महामारी की मार ने ‘राजस्व’ में किसी भी संभावित वृद्धि को पीछे धकेल दिया है। विशेष रूप से इस दौरान, राज्यों को सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी आपातकाल और अपने राज्य-वासियों पर महामारी के सामाजिक-आर्थिक प्रभावों से निपटने हेतु उनके लिए अधिक व्यय करने पर मजबूर होना पड़ा है।

‘जीएसटी क्षतिपूर्ति’ क्या है?

संविधान (101वां संशोधन) अधिनियम, 2016 (Constitution (One Hundred and First Amendment) Act, 2016) के अंतर्गत ‘एक समान राष्ट्रव्यापी ‘वस्तु एवं सेवा कर’ (जीएसटी) लागू करने हेतु एक तंत्र का निर्माण किया गया था।

इसके तहत, राज्यों को ‘जीएसटी का SGST घटक अर्थात ‘राज्य जीएसटी’ और IGST अर्थात एकीकृत जीएसटी (Integrated GST) का एक भाग दिया जाना निर्धारित किया गया, इसके अतिरिक्त नई ‘अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था’ अपनाए जाने से राज्यों को होने वाली ‘राजस्व क्षति’ को, पांच साल की अवधि के लिए, एक समेकित ‘जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष’ से पूरा किए जाने पर सहमति हुई थी। यह अवधि जून 2022 में समाप्त हो जाएगी।

‘जीएसटी क्षतिपूर्ति कोष’ का वित्त पोषण:

  • इस कोष को एक ‘क्षतिपूर्ति उपकर’ (Compensation Cess) के माध्यम से वित्त पोषित किया जाता है। यह उपकर तथाकथित ‘अवगुण’ समझी जाने वाली वस्तुओं (Demerit Goods) पर लगाया जाता है।
  • इन वस्तुओं में पान मसाला, सिगरेट और तम्बाकू उत्पाद, वायवीय पानी, कैफीनयुक्त पेय पदार्थ, कोयला और कुछ यात्री मोटर वाहन शामिल हैं।

राजस्व क्षतिपूर्ति की गणना:

राजस्व क्षतिपूर्ति की गणना, आधार वर्ष (2015-2016) के सकल राजस्व में प्रतिवर्ष 14% चक्रवृद्धि दर के हिसाब से वृद्धि के आधार पर ‘अनुमानित राजस्व’, तथा गणना वर्ष के आंकलित आंकड़े और वास्तविक जीएसटी संग्रह के मध्य अंतर की गणना करके प्रतिवर्ष की जाती है।

समयसीमा में वृद्धि:

जीएसटी क्षतिपूर्ति की समय सीमा, मूल-कानून में निर्धारित की गई थी, और इसलिए इसमें वृद्धि करने हेतु, ‘जीएसटी परिषद’ को पहले इस संदर्भ में केंद्र सरकार के लिए सिफारिश करनी होगी। इसके बाद केंद्र सरकार द्वारा जीएसटी क्षतिपूर्ति योजना की समाप्ति तारीख, जून 2022 को आगे बढाए जाने हेतु जीएसटी कानून में एक संशोधन प्रस्ताव पारित किया जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि अब भी क्षतिपूर्ति उपकर, चालू वित्त वर्ष के बाद भी लागू रहेगा, क्योंकि क्षतिपूर्ति कोष में कमी की भरपाई हेतु लिए गए ऋण को चुकाने हेतु इसकी आवश्यकता रहेगी?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जीएसटी क्या है?
  2. SGST और IGST क्या हैं?
  3. संबंधित संवैधानिक प्रावधान।
  4. GST के दायरे से बाहर वस्तुएं।
  5. उपकर क्या होता है?
  6. अधिभार (Surcharge) क्या होता है?
  7. क्षतिपूर्ति उपकर निधि क्या होती है?

मेंस लिंक:

जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

लद्दाख में पैंगोंग त्सो झील पर चीन द्वारा पुल का निर्माण


संदर्भ:

चीन द्वारा पूर्वी लद्दाख में ‘पैंगोंग त्सो’ (Pangong Tso) झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों को जोड़ने हेतु एक पुल का निर्माण किया जा रहा है।

पुल के बारे में:

‘पैंगोंग त्सो झील’ के उत्तरी तट पर, ‘कुर्नाक किले’ (Kurnak fort) में और ‘झील’ के दक्षिणी तट पर मोल्दो (Moldo) नामक जगहों पर ‘पीपल्स लिबरेशन आर्मी’ (PLA) के सैन्य गढ़ हैं, और इन दोनों के मध्य लगभग 200 किमी का फासला है।

  1. ‘पैंगोंग त्सो झील के दो किनारों पर ‘निकटतम बिंदुओं’ के बीच की दूरी लगभग 500 मीटर है, और इसी स्थान पर पुल का निर्माण किया जा रहा है। इस पुल के बनने के बाद, दोनों सैन्य ठिकानों के बीच आवाजाही में लगने वाला, लगभग 12 घंटे का समय घटकर मात्र तीन या चार घंटे का हो जाएगा।
  2. इससे, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के लिए, दोनों क्षेत्रों के बीच सैनिकों और उपकरणों को स्थानांतरित करने में लगने वाले समय में काफी बचत होगी।
  3. यह पुल ‘वास्तविक नियंत्रण रेखा’ (LAC) से लगभग 25 किमी आगे स्थित है।

Current Afffairs

 

पैंगोंग त्सो के बारे में

पैंगोंग त्सो (Pangong Tso) का शाब्दिक अर्थ “संगोष्ठी झील” (Conclave Lake) है। लद्दाखी भाषा में पैंगोंग का अर्थ है, समीपता और तिब्बती भाषा में त्सो का अर्थ झील होता है।

  • पैंगोंग त्सो, लद्दाख में 14,000 फुट से अधिक की ऊँचाई पर स्थित एक लंबी संकरी, गहरी, स्थलरुद्ध झील है, इसकी लंबाई लगभग 135 किमी है।
  • इसका निर्माण टेथीज भू-सन्नति से हुआ है।
  • यह एक खारे पानी की झील है।
  • काराकोरम पर्वत श्रेणी, जिसमे K2 विश्व दूसरी सबसे ऊंची चोटी सहित 6,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली अनेक पहाड़ियां है तथा यह ताजिकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, चीन और भारत से होती हुई पैंगोंग त्सो के उत्तरी किनारे पर समाप्त होती है।
  • इसके दक्षिणी तट पर भी स्पंगुर झील (Spangur Lake) की ओर ढलान युक्त ऊंचे विखंडित पर्वत हैं।
  • इस झील का पानी हालाँकि, एकदम शीशे की तरह स्वच्छ है, किंतु ‘खारा’ होने की वजह से पीने योग्य नहीं है।

इस स्थान पर विवाद का कारण:

वास्तविक नियंत्रण रेखा (Line of Actual ControlLAC) – सामान्यतः यह रेखा पैंगोंग त्सो की चौड़ाई को छोड़कर स्थल से होकर गुजरती है तथा वर्ष 1962 से भारतीय और चीनी सैनिकों को विभाजित करती है। पैंगोंग त्सो क्षेत्र में यह रेखा पानी से होकर गुजरती है।

  • दोनों पक्षों ने अपने क्षेत्रों को चिह्नित करते हुए अपने- अपने क्षेत्रों को घोषित किया हुआ है।
  • भारत का पैंगोंग त्सो क्षेत्र में 45 किमी की दूरी तक नियंत्रण है, तथा झील के शेष भाग को चीन के द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

फिंगर्स क्या हैं?

पैंगोंग त्सो झील में, ‘चांग चेन्मो रेंज’ (Chang Chenmo range) की पहाड़ियां आगे की ओर निकली हुई (अग्रनत) हैं, जिन्हें ‘फिंगर्स’ (Fingers) कहा जाता है।

इनमे से 8 फिंगर्स विवादित है। इस क्षेत्र में भारत और चीन के बीच LAC को लेकर मतभेद है।

  • भारत का दावा है कि LAC फिंगर 8 से होकर गुजरती है, और यही पर चीन की अंतिम सेना चौकी है।
  • भारत इस क्षेत्र में, फिंगर 8 तक, इस क्षेत्र की संरचना के कारण पैदल ही गश्त करता है। लेकिन भारतीय सेना का नियंत्रण फिंगर 4 तक ही है।
  • दूसरी ओर, चीन का कहना है कि LAC फिंगर 2 से होकर गुजरती है। चीनी सेना हल्के वाहनों से फिंगर 4 तक तथा कई बार फिंगर 2 तक गश्त करती रहती है।

पैंगोंग त्सो क्षेत्र में चीनी अतिक्रमण का कारण:

पैंगोंग त्सो झील रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण चुशूल घाटी (Chushul Valley) के नजदीक है। वर्ष 1962 के युद्ध के दौरान चीन द्वारा मुख्य हमला चुशूल घाटी से शुरू किया गया था।

  • चुशूल घाटी का रास्ता पैंगोंग त्सो झील से होकर जाता है, यह एक मुख्य मार्ग है, चीन, इसका उपयोग, भारतीय-अधिकृत क्षेत्र पर कब्जा करने के लिए कर सकता है।
  • चीन यह भी नहीं चाहता है, कि भारत LAC के आस पास कहीं भी अपने बुनियादी ढांचे को विस्तारित करे। चीन को डर है, कि इससे अक्साई चिन और ल्हासा-काशगर (Lhasa-Kashgar) राजमार्ग पर उसके अधिकार के लिए संकट पैदा हो सकता है।
  • इस राजमार्ग के लिए कोई खतरा, लद्दाख और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में चीनी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के लिए बाधा पहुचा सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने लद्दाख के ‘बर्फ के स्तूपों’ (Ice Stupas of Ladhak) के बारे में सुना है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. दोनों सेनाओं के बीच विवादित सभी क्षेत्रों की भौगोलिक स्थिति
  2. इन क्षेत्रों की महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताएं, जैसे: नदियाँ, पर्वत घाटियाँ आदि।

मेंस लिंक:

2020 में हुए सीमा तनाव को कम करने के लिए चीन और भारत द्वारा उठाए गए कदमों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

परमाणु अस्त्र अप्रसार संधि


संदर्भ:

स्थायी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों – चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका – द्वारा ‘परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने तथा परमाणु संघर्ष को टालने हेतु एक संकल्प लिया गया है।

इस संदर्भ में यह बयान, ‘परमाणु अस्त्र अप्रसार संधि’ (Treaty on the Non-Proliferation of Nuclear Weapons – NPT) की नवीनतम समीक्षा के बाद जारी किया गया। NPT की समीक्षा के लिए पिछले वर्ष 4 जनवरी की तिथि निर्धारित थी, जिसे कोविड-​​​-19 महामारी के कारण आगामी वर्ष तक के लिए स्थगित कर दिया गया था।

Current Affairs

 

नवीनतम मुद्दे:

  • मास्को द्वारा यूक्रेन की सीमा के नजदीक सेना को तैनात किए जाने से, रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव की स्थित, शीत युद्ध के बाद से अब तक की सबसे ऊँची सीमा तक पहुँच चुकी है।
  • इससे क्रेमलिन द्वारा पश्चिमी देशों समर्थक अपने पड़ोसी देश ‘यूक्रेन’ पर हमला किए जाने हेतु योजना बनाए जाने की आशंका बढ़ गई है।
  • इस बीच, चीन के उदय से यह चिंता भी बढ़ती जा रही है, कि बीजिंग और वाशिंगटन के मध्य तनाव बढ़ने – विशेष रूप से ताइवान द्वीप को लेकर नया संघर्ष शुरू हो सकता है।
  • बीजिंग, ताइवान को अपने राज्य-क्षेत्र का हिस्सा मानता है और चीन ने इस पर, आवश्यकता पड़ने पर बलपूर्वक, अपना अधिकार ज़माने का प्रण किया हुआ है।

परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) के बारे में:

परमाणु अप्रसार संधि (Non-Proliferation Treaty – NPT) एक बहुपक्षीय अंतर्राष्ट्रीय संधि है जिसका उद्देश्य परमाणु अस्त्रों के प्रसार को सीमित करना तथा तीन सिद्धांतों (1) परमाणु अस्त्र एवं अस्त्र प्रौद्योगिकी का अप्रसार, (2) निरस्त्रीकरण, और (3) परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग, को बढ़ावा देना है। ये तीनों सिद्धांत, परमाणु हथियार संपन्न पांच देशों तथा गैर-परमाणु अस्त्र वाले देशों के मध्य एक “मुख्य समझौते” का आधार हैं।

‘परमाणु अप्रसार संधि’ पर वर्ष 1968 में हस्ताक्षर किए गए थे और इसे वर्ष 1970 में लागू किया गया था।

निहितार्थ:

  • जिन देशों के पास ‘परमाणु अस्त्र’ नहीं है, वे इन हथियारों को हासिल नहीं करेंगे।
  • परमाणु अस्त्र संपन्न देश, निरस्त्रीकरण का अनुसरण करेंगे।
  • सभी देशों को, सुरक्षा उपायों के सहित शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी का उपयोग करने का अधिकार है।

Current Affairs

 

‘परमाणु अप्रसार संधि’ के प्रमुख प्रावधान:

  • ‘परमाणु अप्रसार संधि’ के तहत, 1 जनवरी 1967 से पहले ‘परमाणु विस्फोटक उपकरण’ का निर्माण करने और विस्फोट करने वाले देश को ‘परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र’ (Nuclear Weapon States – NWS) के रूप में परिभाषित किया गया है। अतः, अन्य सभी देशों को गैर-परमाणु अस्त्र राष्ट्र (Non-Nuclear Weapon States – NNWS) माना जाता है।
  • परमाणु अस्त्र संपन्न पांच देश- चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका हैं।
  • यह संधि, पक्षकार राष्ट्रों के शांतिपूर्ण उद्देश्यों हेतु परमाणु ऊर्जा के विकास, उत्पादन और उपयोग करने संबंधी अधिकारों को प्रभावित नहीं करती है।

राष्ट्रों की भूमिका:

  • परमाणु हथियार संपन्न देश, किसी भी प्राप्तकर्ता को परमाणु हथियार को स्थानांतरित नहीं करेंगे तथा किसी भी ‘गैर-परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र’ (NNWS) को परमाणु हथियार का निर्माण करने, किसी अन्य तरीके से हासिल करने हेतु सहायता, प्रोत्साहित या प्रेरित नहीं करेंगे।
  • ‘गैर-परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र’ किसी भी हस्तांतरणकर्ता से परमाणु हथियार प्राप्त नहीं करेंगे तथा परमाणु अस्त्रों का न तो निर्माण करेंगे और न ही इनका अधिग्रहण करेंगे।
  • ‘गैर-परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र’ अपने क्षेत्रों में अथवा अपने नियंत्रण में सभी परमाणु सामग्रियों पर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) द्वारा जारी ‘सुरक्षा उपायों’ का अनुपालन करेंगे।

 

 ‘परमाणु अप्रसार संधि’ से संबंधित विवाद:

  • निरस्त्रीकरण प्रक्रिया की विफलता: ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) को मोटे तौर पर शीतयुद्ध कालीन उपकरण के रूप में देखा जाता है, जोकि विश्वसनीय निरस्त्रीकरण प्रक्रिया की दिशा में मार्ग बनाने के उद्देश्य को पूरा करने में विफल रहा है।
  • परमाणु अस्त्र ‘संपन्न तथा ‘गैर- परमाणु अस्त्र धारक’ प्रणाली (System of Nuclear ‘Haves’ and ‘Have-Nots’): ‘गैर-परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र’ (NNWS), इस संधि के भेदभावपूर्ण होने की आलोचना करते है क्योंकि, यह संधि परमाणु अस्त्रों के केवल क्षैतिज प्रसार को रोकने पर केंद्रित है जबकि इसमें परमाणु अस्त्रों के ऊर्ध्वाधर प्रसार की कोई सीमा नहीं निर्धारित नहीं ई गयी है।
  • ‘गैर-परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्रों’ का यह भी मानना है, कि संधि के तहत ‘शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट’ (Peaceful Nuclear Explosion PNE) तकनीक पर लगाए गए प्रतिबंध एकतरफा हैं।

‘परमाणु अप्रसार संधि’ पर भारत का दृष्टिकोण:

  • भारत, ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं करने अथवा हस्ताक्षर करने के बाद संधि से अलग हो जाने वाले पांच देशों – पाकिस्तान, इज़राइल, उत्तर कोरिया और दक्षिण सूडान- की सूची में शामिल है।
  • भारत, NPT को भेदभावपूर्ण मानता है और इस पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर चुका है।
  • भारत द्वारा ‘परमाणु अप्रसार’ के उद्देश्य से लागू की जाने वाली अंतर्राष्ट्रीय संधियों का विरोध किया जाता है, क्योंकि इस प्रकार की संधियाँ, चुनिंदा रूप से गैर-परमाणु शक्तियों पर लागू होती हैं, और परमाणु अस्त्र संपन्न पांच ताकतों के एकाधिकार को वैध बनाती हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘परमाणु-हथियार-मुक्त क्षेत्रों’ (Nuclear-Weapon-Free Zones – NWFZ) की स्थापना, वैश्विक परमाणु अप्रसार और निरस्त्रीकरण मानदंडों को मजबूत करने और शांति एवं सुरक्षा की दिशा में अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों को मजबूत करने हेतु एक क्षेत्रीय दृष्टिकोण है। क्या आप ‘परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र’ (NWFZ) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) के बारे में
  2. परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र
  3. गैर-परमाणु अस्त्र संपन्न राष्ट्र
  4. ‘परमाणु हथियार मुक्त क्षेत्र’ (NWFZ)
  5. अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA)

मेंस लिंक:

‘परमाणु अप्रसार संधि’ (NPT) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

यूक्रेन में रूस बनाम NATO


संदर्भ:

रूस द्वारा उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ (North Atlantic Treaty Organization – NATO) की सदस्यता के आकांक्षी यूक्रेन के साथ लगी अपनी सीमा पर 1,00,000 से अधिक सैनिकों को तैनात कर दिया गया है।

संबंधित प्रकरण एवं रूस की मांगें:

  • रूस का कहना है, यदि NATO द्वारा मई 1997 के बाद गठबंधन में शामिल हुए यूरोप के सभी देशों से अपनी सेना वापस बुला ली जाती है, तो वह भी सैन्य-वृद्धि को कम कर देगा।
  • इसका प्रभावी अर्थ यह होगा कि, NATO, रूस की सीमा से लगे किसी भी बाल्टिक देश (लातविया, एस्टोनिया, लिथुआनिया), पोलैंड, हंगरी और चेक गणराज्य जैसे मध्य यूरोपीय देशों, और क्रोएशिया और स्लोवेनिया जैसे बाल्कन देशों में अपनी कार्रवाई नहीं कर सकता है।
  • रूस यह भी चाहता है, कि NATO अपने गठबंधन में किसी और ‘विस्तार’ की योजना का विचार त्याग दे, अर्थात यूक्रेन और जॉर्जिया को अपने सदस्य के रूप में शामिल नहीं करे। रूस की एक अन्य मांग यह है, कि NATO द्वारा रूस की पूर्व स्वीकृति के बिना पूर्वी यूरोप, यूक्रेन और जॉर्जिया में युद्धाभ्यास नहीं किए जाएँ।

पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया:

  • अमेरिका और NATO के अधिकारियों ने स्पष्ट शब्दों में रूस के प्रस्तावों को अवास्तविक बताया है। इनका जोर देते हुए कहना है कि यूक्रेन तथा अन्य प्रत्येक देश को अपनी विदेश नीति निर्धारित करने का अधिकार है।
  • संप्रभुता के सिद्धांत का हवाला देते हुए, ये इस बात पर जोर देते हैं, कि यूक्रेन और पूर्वी यूरोप के हर देश को बाहरी हस्तक्षेप के बिना अपनी विदेश नीति निर्धारित करने तथा अपनी इच्छानुसार किसी भी गठबंधन में शामिल होने का अधिकार है।
  • इन अधिकारियों ने रूस के इस विचार को खारिज कर दिया है, कि किसी देश द्वारा NATO की सदस्यता हासिल करने के संबंध में रूस को निर्णय लेने की वीटो पॉवर है। साथ ही, इन अधिकारियों ने कहा है, कि संबंधित देशों को शामिल किए बगैर NATO द्वारा पूर्वी यूरोप को प्रभावित करने वाले कोई निर्णय नहीं लिए जाएंगे।

यूक्रेन संबंधी विवाद के बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए।

‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ (NATO):

(North Atlantic Treaty Organization)

  • यह एक ‘अंतर-सरकारी सैन्य गठबंधन’ है।
  • ‘वाशिंगटन संधि’ द्वारा स्थापित किया गया था।
  • इस संधि पर 4 अप्रैल 1949 को हस्ताक्षर किए गए थे।
  • मुख्यालय – ब्रुसेल्स, बेल्जियम।
  • एलाइड कमांड ऑपरेशंस मुख्यालय’ – मॉन्स (Mons), बेल्जियम।

संरचना:

  • NATO की स्थापना के बाद से, गठबंधन में नए सदस्य देश शामिल होते रहें है। शुरुआत में, नाटो गठबंधन में 12 राष्ट्र शामिल थे, बाद में इसके सदस्यों की संख्या बढ़कर 30 हो चुकी है। नाटो गठबंधन में शामिल होने वाला सबसे अंतिम देश ‘उत्तरी मकदूनिया’ था, उसे 27 मार्च 2020 को शामिल किया गया था।
  • नाटो (NATO) की सदस्यता, ‘इस संधि के सिद्धांतों को आगे बढ़ाने और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र की सुरक्षा में योगदान करने में योगदान करने में सक्षम किसी भी ‘यूरोपीय राष्ट्र’ के लिए खुली है’।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

जर्मनी ने रूस को चेतावनी दी है, कि अगर यूक्रेन पर आक्रमण किया गया तो नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन (Nord Stream pipeline) को रोक दिया जाएगा। नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन कहाँ है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नाटो- स्थापना एवं मुख्यालय
  2. नाटो ‘एलाइड कमांड ऑपरेशन’ क्या है?
  3. ‘नाटो’ का सदस्य बनने हेतु शर्ते?
  4. वाशिंगटन संधि का अवलोकन।
  5. ‘उत्तरी अटलांटिक महासागर’ के आसपास के देश।
  6. नाटो में शामिल होने वाला अंतिम सदस्य।

मेंस लिंक:

नाटो के उद्देश्यों और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

विश्व में कंप्यूटर चिप्स की कमी और इसका निहितार्थ


संदर्भ:

वर्तमान में, पूरे विश्व में ‘कंप्यूटर चिप्स’ की भारी कमी देखने को मिल रही है, और इस समस्या का शीघ्र समाप्त होने का कोई संकेत नहीं हैं। इस वैश्विक कमी के पीछे संभावित कारकों में से एक कारक की स्थिति बेहतर होने के बजाय और भी खराब हो रही हैं।

उद्योग विशेषज्ञों का कहना है, इस क्षेत्र में अहर्ताप्राप्त निपुण कर्मचारियों की कमी एक बढ़ती हुई समस्या है। विशेष रूप से, नए चिप्स डिजाइन करने और विनिर्माण संबंधी समस्याओं को हल करने हेतु उच्च अहर्ताप्राप्त इंजीनियरों की आवश्यकता है।

इस कमी के कारण:

स्टे-एट-होम शिफ्ट (Stay-at-Home Shift): इस व्यवस्था की वजह से, चिप्स (CHIPS) की मांग में, महामारी से पहले के अनुमानित स्तर कहीं अधिक वृद्धि हुई है। लॉकडाउन के दौरान लैपटॉप की बिक्री में ‘एक दशक में सर्वाधिक’ वृद्धि हुई है।

अस्थिर पूर्वानुमान (Fluctuating forecasts): महामारी की शुरुआत में कार-निर्माण में कटौती करने वाले वाहन निर्माताओं ने, कारों की बिक्री में उछाल आने संबंधी समय का गलत आंकलन किया। वर्ष 2020 के अंत में वाहन निर्माताओं द्वारा ‘चिप्स’ के लिए फिर से ऑर्डर देने की होड़ मच गयी, किंतु इनके ऑर्डर्स को स्वीकार नहीं किया गया, क्योंकि उस समय ‘चिप निर्माताओं’ द्वारा कंप्यूटिंग और ऐप्पल इंक जैसे स्मार्टफोन दिग्गजों की आपूर्ति की जा रही थी।

माल अधिसंचयन (Stockpiling): निजी कंप्यूटर निर्माताओं (PC makers) द्वारा वर्ष 2020 की शुरुआत में चिप्स की कम आपूर्ति के बारे में चेतावनी देना शुरू कर दिया गया था। फिर उस वर्ष के मध्य के आसपास, ‘हुआवेई टेक्नोलॉजी कंपनी’ ने, अमेरिकी प्रतिबंधों से बचाव हेतु अपना ‘स्टॉक’ (Inventory) बनाना शुरू कर दिया था। अमेरिका द्वारा हुआवेई को इस प्राथमिक आपूर्तिकर्ताओं से संबद्ध-विच्छेद करने हेतु प्रतिबंध लगाने की चेतावनी दी गयी थी। अन्य कंपनियों ने भी ‘हुआवेई’ का अनुसरण किया, और अपना भाग सुनिश्चित करने के लिए ‘माल अधिसंचयन’ करना शुरू कर दिया।

आपदाएँ: फरवरी माह में, टेक्सास में ‘भयंकर शीत लहर’ के कारण बिजली गुल हो गई, जिससे ऑस्टिन के आसपास स्थित सभी ‘अर्धचालक संयंत्र’ (Semiconductor Plants) बंद हो गए। मार्च में, जापान में एक संयंत्र आग से क्षतिग्रस्त हो गया, जिससे महीनों तक ‘चिप्स’ का उत्पादन बाधित रहा।

 

इस कमी के प्रभाव और संबंधित चिंताएँ:

  1. सेमीकंडक्टर चिप्स की वैश्विक मांग में, आपूर्ति से अधिक वृद्धि होने से अनगिनत उद्योग प्रभावित हुए हैं।
  2. चिप्स की कमी से, 7 मिलियन वाहनों का उत्पादन नहीं हो सकेगा, जिससे इस साल कार निर्माताओं को 210 बिलियन अमरीकी डालर के बराबर की बिक्री नुकसान होने की संभवना है।
  3. सेमीकंडक्टर की कमी से, आपूर्ति श्रृंखला गंभीर रूप से बाधित होगी और कई प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन भी बाधित होंगे।
  4. चिप्स की कमी का उपभोक्ताओं का सीधे तौर से प्रभाव पड़ा है, क्योंकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान होने के कारण- टीवी से लेकर स्मार्टफोन तक -रोजमर्रा के उपकरणों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों की कीमतों में वृद्धि हुई है।

सेमीकंडक्टर्स के निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु भारत द्वारा किए गए प्रयास:

  • भारत, अपनी ‘मेक इन इंडिया’ पहल के एक हिस्से के रूप में ‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ (Semiconductor Chips) के बड़े पैमाने पर निर्माण संबंधी योजना को अंतिम रूप दे रहा है।
  • देश में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने वाली प्रत्येक सेमीकंडक्टर कंपनी को, भारत द्वारा 1 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक नकद राशि की पेशकश की जा रही है।
  • स्थानीय रूप से निर्मित ‘चिप्स’ को “विश्वसनीय स्रोत” के रूप में नामित किया जाएगा, और सीसीटीवी कैमरों से लेकर 5G उपकरण तक के उत्पादों में इनका उपयोग किया जा सकता है।
  • दिसंबर 2021 में, भारत ने देश में विनिर्माण इकाइयां स्थापित करने या ऐसी विनिर्माण इकाइयों के अधिग्रहण के लिए चिप निर्माताओं को “रुचि अभिव्यक्ति” (Expression of Interest) हेतु आमंत्रित किया था।

‘सेमीकंडक्टर चिप्स’ के बारे में:

अर्धचालक अर्थात सेमीकंडक्टर्स (Semiconductors) – जिन्हें एकीकृत सर्किट (आईसी), या माइक्रोचिप्स के रूप में भी जाना जाता है – प्रायः सिलिकॉन या जर्मेनियम या गैलियम आर्सेनाइड जैसे यौगिक से निर्मित होते हैं।

  • इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को स्मार्ट और तेज बनाने में ‘सेभूमिका निभाते हैं।
  • आमतौर पर सिलिकॉन से निर्मित चिप कई प्रकार के कार्य करती है। सिलिकॉन (Silicon), विद्युत् ‘अर्ध-चालक’ होता है।
  • डेटा स्टोर करने वाली ‘मेमोरी चिप्स’ (Memory chips) अपेक्षाकृत साधारण होती हैं और इनका वस्तुओं की तरह कारोबार किया जाता है।
  • प्रोग्राम का संचालन करने वाली ‘लॉजिक चिप्स’ (Logic chips), डिवाइस के दिमाग के रूप में कार्य करती हैं तथा अधिक जटिल और महंगी होती हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन’ के बारे में
  2. सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण में भारत की स्थिति?
  3. ‘राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स नीति’ के तहत प्रमुख प्रस्ताव।
  4. उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजना- इसकी घोषणा कब की गई थी?
  5. इस योजना का कार्यान्वयन

मेंस लिंक:

सेमीकंडक्टर्स या चिप्स/इंटीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuits – ICs) का बढ़ता महत्व और इसके निर्माण एवं डिजाइन में चीन का अनुभव, भारत में चिप डिजाइन पर ध्यान केंद्रित किए जाने के संबंध में एक मजबूत आधार प्रदान करता है। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

5G शुरुआत की वर्तमान स्थिति


संदर्भ:

दूरसंचार विभाग (DoT) के अनुसार, वर्ष 2022 में 5G सेवाएं सबसे पहले, गुरुग्राम, बेंगलुरु, कोलकाता, मुंबई, चंडीगढ़, दिल्ली, जामनगर, अहमदाबाद, चेन्नई, हैदराबाद, लखनऊ, पुणे और गांधी नगर, शहरों में शुरू की जायेंगी।

5G तकनीक के परीक्षण और शुरुआत संबंधी मामले में भारत:

  • सरकार के अनुसार, 5जी स्पेक्ट्रम की नीलामी मार्च या अप्रैल 2022 में की जाएगी। कुछ विशेषज्ञों का कहना है, कि इसमें कम से कम तीन महीने की और देरी हो सकती है क्योंकि दूरसंचार सेवा प्रदाताओं ने अभी तक इस तकनीक और संबंधित विभिन्न पहलुओं का परीक्षण पूरा नहीं किया है।
  • भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) द्वारा किया जा रहा ‘हितधारक परामर्श’ अंतिम चरण में है, और यह वर्ष 2022 की शुरुआत में दूरसंचार विभाग को अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कर सकता है।
  • इस बीच, निजी दूरसंचार कंपनियों ने 5G के रोलआउट के संबंध में विभिन्न स्तरों – जैसेकि परीक्षण करना, परीक्षण गति और स्वदेशी 5G नेटवर्क बनाना- पर काफी प्रगति की है।

5G क्या है?

5G तकनीक, मोबाइल ब्रॉडबैंड की अगली पीढ़ी है। यह तकनीक अंततः 4G LTE कनेक्शन को प्रतिस्थापित करेगी या इसमें महत्वपूर्ण वृद्धि करेगी।

5G तकनीक की विशेषताएं और लाभ:

  1. यह तकनीक, ‘मिलीमीटर वेव स्पेक्ट्रम’ (30-300 गीगाहर्ट्ज़) पर कार्य करती है, जिसके द्वारा काफी बड़ी मात्रा में डेटा को बहुत तेज गति से भेजा जा सकता है।
  2. 5G तकनीक, तीन बैंड्स अर्थात् निम्न, मध्य और उच्च आवृत्ति स्पेक्ट्रम में काम करती है।
  3. मल्टी-जीबीपीएस ट्रान्सफर रेट तथा अत्याधिक कम विलंबता (ultra-low latency), 5G तकनीक, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ताकत का उपयोग करने वाली एप्लीकेशंस का समर्थन करेगी।
  4. 5G नेटवर्क की बढ़ी हुई क्षमता, लोड स्पाइक्स के प्रभाव को कम कर सकती है, जैसे कि खेल आयोजनों और समाचार कार्यक्रमों के दौरान होती है।

Current Affairs

प्रौद्योगिकी का महत्व:

भारत की राष्ट्रीय डिजिटल संचार नीति 2018 में 5G के महत्व पर प्रकाश डाला गया है, जिसमें कहा गया है कि एक वृद्धिशील स्टार्ट-अप समुदाय सहित 5G, क्लाउड, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) और डेटा एनालिटिक्स, अवसरों के एक नए क्षितिज को खोलने तथा डिजिटल जुड़ाव को तीव्र एवं गहन करने का वादा करता है।

5G से होने वाले संभावित स्वास्थ्य जोखिम:

  • आज तक, और बहुत सारे शोध किए जाने के बाद, वायरलेस तकनीकों के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर कोई प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के बारे में पता नहीं लगा है।
  • ‘ऊतक तापन’ (Tissue heating), रेडियोफ्रीक्वेंसी क्षेत्रों और मानव शरीर के बीच अंतःक्रिया का मुख्य तंत्र होता है। वर्तमान प्रौद्योगिकियों से रेडियोफ्रीक्वेंसी स्तर के संपर्क में आने से मानव शरीर के तापमान में नगण्य वृद्धि होती है।
  • जैसे-जैसे रेडियो आवृत्ति बढ़ती है, शरीर के ऊतकों में इसका प्रवेश कम होता जाता है और ऊर्जा का अवशोषण शरीर की सतह (त्वचा और आंख) तक सीमित हो जाता है।
  • यदि, समग्र रेडियोफ्रीक्वेंसी स्तर का संपर्क अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों से नीचे रहता है, तो, सार्वजनिक स्वास्थ्य पर कोई असर पड़ने की संभावना नहीं है।

‘अंतर्राष्ट्रीय एक्सपोजर दिशानिर्देश’ क्या हैं?

विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों हेतु एक्सपोजर दिशानिर्देश, दो अंतरराष्ट्रीय निकायों द्वारा तैयार किये जाते हैं। वर्तमान में इनके द्वारा सुझाए गए दिशानिर्देशों का कई देश पालन करते हैं:

  1. अंतर्राष्ट्रीय गैर-आयनीकरण विकिरण संरक्षण आयोग (International Commission on Non-Ionizing Radiation Protection)
  2. अंतर्राष्ट्रीय विद्युत चुम्बकीय सुरक्षा समिति के माध्यम से ‘विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर्स संस्थान’ (Institute of Electrical and Electronics Engineers)
  3. These guidelines are not technology-specific. They cover radiofrequencies up to 300 GHz, including the frequencies under discussion for 5G.

ये दिशानिर्देश, प्रौद्योगिकी-विशिष्ट नहीं होते हैं। इनके द्वारा 300 GHz तक की रेडियोफ्रीक्वेंसी को कवर किया जाता है, जिसमे 5G तकनीक संबंधी आवृत्तियां भी शामिल होती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय प्रयास– ‘अंतर्राष्ट्रीय विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र (EMF) परियोजना’:

WHO द्वारा वर्ष 1996 में एक ‘अंतर्राष्ट्रीय विद्युतचुंबकीय क्षेत्र’ (International Electromagnetic Fields -EMF) परियोजना की स्थापना की गई थी। यह परियोजना 0-300 गीगाहर्ट्ज़ आवृत्ति रेंज में बिजली और चुंबकीय क्षेत्रों के संपर्क में आने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव की जांच करती है और EMF विकिरण संरक्षण पर राष्ट्रीय अधिकारियों को सलाह देती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या भारत 5G सेवाओं को शुरू करने (रोल-आउट) के लिए तैयार है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. 5G क्या है?
  2. 3G, 4G और 5G के बीच अंतर।
  3. अनुप्रयोग
  4. ‘स्पेक्ट्रम’ क्या होता है?
  5. EMF परियोजना के बारे में।

मेंस लिंक:

5G तकनीक के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


गणितीय विज्ञान संस्थान

चेन्नई स्थित ‘गणितीय विज्ञान संस्थान’ (Institute of Mathematical Sciences – IMSc) ने इस साल 3 जनवरी को अपनी स्थापना के 60 वें वर्ष में प्रवेश किया है।

  • ‘गणितीय विज्ञान संस्थान’ (Matscience) की स्थापना 3 जनवरी, 1962 को चेन्नई में अल्लादी कृष्णास्वामी द्वारा की गई थी।
  • नोबेल पुरस्कार विजेता सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर ने इसका उद्घाटन व्याख्यान दिया, जिसने इसकी यात्रा को गति दी।
  • वर्ष 1984 में, परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) ने इस संस्थान का कार्यभार संभाल लिया।

Current affairs

आरबीआई द्वारा लघु, ऑफलाइन ई-भुगतान को मंजूरी

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ऑफलाइन मोड में ‘छोटे मूल्य के डिजिटल भुगतान’ को सुविधाजनक बनाने हेतु एक फ्रेमवर्क  लागू किया गया है। आरबीआई के इस कदम से अर्ध-शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा मिलेगा।

‘ऑफलाइन ई-पेमेंट’ क्या हैं?

  • ‘ऑफलाइन डिजिटल भुगतान’ के लिए इंटरनेट या दूरसंचार कनेक्टिविटी की आवश्यकता नहीं होती है।
  • इस तरह के भुगतान किसी भी चैनल या साधन जैसे कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों का उपयोग करके ‘आमने-सामने’ (निकटता मोड) किए जा सकते हैं।
  • इस तरह के लेनदेन के लिए प्रमाणीकरण संबंधी अतिरिक्त कारकों की आवश्यकता नहीं होगी।
  • चूंकि लेन-देन ऑफ़लाइन होता है, अतः इस संबंध में ग्राहक को अलर्ट (एसएमएस और/या ई-मेल के माध्यम से) एक समय अंतराल के बाद प्राप्त होगा।
  • इस व्यवस्था में एक बार में अधिकतम ₹200 का लेन-देन हो सकता है, और खाते में शेष राशि की भरपाई होने तक लेन-देन की अधिकतम कुल सीमा ₹2,000 है।

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