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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 December 2021

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-I

1. रानी लक्ष्मीबाई

 

सामान्य अध्ययन-II

1. मानहानि का मामला

2. PESA अधिनियम

3. केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना

 

सामान्य अध्ययन-III

1. जीएमओ फसलों पर FSSAI का विनियमन मसौदा

2. इलेक्ट्रिक वाहनों के अपनाने को बढ़ावा देने हेतु सरकारी नीतियां

3. डिजिटल ऋण एवं संबंधित मुद्दे

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. नीलगाय

2. दारा शिकोह (1615-59)

 


सामान्य अध्ययन-I


 

विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।

 रानी लक्ष्मी बाई


संदर्भ:

उत्तर प्रदेश के ‘झांसी रेलवे स्टेशन’ को अब ‘वीरांगना लक्ष्मीबाई रेलवे स्टेशन’ के नाम से जाना जाएगा।

रेलवे स्टेशन का नाम बदलने की प्रक्रिया:

  • उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा पहले इस स्टेशन का नाम बदलने का प्रस्ताव केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजा गया था।
  • केंद्रीय रेल मंत्रालय, भारतीय सर्वेक्षण विभाग और डाक विभाग से अनापत्ति प्राप्त करने के बाद, ‘गृह मंत्रालय’ द्वारा किसी भी स्टेशन या स्थान के नाम परिवर्तन के लिए सहमति दी जाती है।
  • उपरोक्त संगठन इस बात की पुष्टि करते हैं, कि उनके रिकॉर्ड में प्रस्तावित नाम के समान नाम वाला कोई अन्य कस्बा या गांव नहीं है।
  • नाम परिवर्तन को मंजूरी मिलने के बाद, एक कार्यकारी आदेश जारी किया जाता है, जिसके उपरांत ‘रेल मंत्रालय’ द्वारा तदनुसार स्टेशन कोड बदल दिया जाता है।

Current Affairs

 

‘रानी लक्ष्मीबाई’ के बारे में:

  • ‘रानी लक्ष्मीबाई’ का जन्म 19 नवंबर, 1828 को वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था, इनका बचपन का नाम ‘मणिकर्णिका तांबे’ था।
  • वर्ष 1842 में ‘लक्ष्मीबाई’ का विवाह झांसी के राजा ‘गंगाधर नेवालकर’ से हुआ।

अंग्रेजों और रानी लक्ष्मीबाई के बीच युद्ध:

रानी लक्ष्मीबाई के एक पुत्र हुआ जिसका नाम ‘दामोदर राव’ रखा गया, किंतु जन्म के चार महीने के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गयी। शिशु की मृत्यु के बाद, लक्ष्मीबाई के पति ने अपने एक चचेरे भाई के बच्चे ‘आनंद राव’ को गोद लिया, और महाराजा की मृत्यु से एक दिन पहले उसका नाम ‘दामोदर राव’ रखा गया था।

  • लॉर्ड डलहौजी ने बच्चे को राज्य का उत्तराधिकारी स्वीकार करने से इनकार कर दिया और ‘व्यपगत का सिद्धांत’ या ‘हड़प नीति’ (Doctrine of Lapse) के माध्यम से राज्य पर कब्जा कर लिया। किंतु, रानी ने लॉर्ड डलहौजी के इस फैसले को मानने से इनकार कर दिया।
  • इसी बात को लेकर दोनों के बीच युद्ध शुरू हो गया। अंग्रेजों ने शहर के चारो ओर घेराबंदी कर दी, ‘झांसी की रानी’ ने इस दौरान दो सप्ताह तक अंग्रेजों को कड़ी टक्कर दी।
  • उसने अंग्रेजों के खिलाफ बहादुरी से लड़ाई लड़ी और अपने राज्य को बचाने के लिए अंग्रेजी सेना के कप्तान सर ‘ह्यू रोज’ का कड़ा मुकबला किया।
  • 17 जून, 1858 को युद्ध के मैदान में लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हो गई।

‘व्यपगत का सिद्धांत’ या ‘हड़प नीति’:

‘व्यपगत का सिद्धांत’ या ‘हड़प नीति’ (डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स) छोटे राज्यों और देशी रियासतों को अंग्रेजी साम्राज्य में विलय करने की एक नीति थी।  जिसे, वर्ष 1848 से 1856 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहने के दौरान लॉर्ड डलहौजी द्वारा व्यापक रूप से लागू किया गया था।

  • इस नीति के अनुसार, ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष (एक जागीरदार के रूप में) नियंत्रण के तहत किसी भी रियासत पर, जहां शासक का कोई कानूनी पुरुष उत्तराधिकारी नहीं था, कंपनी द्वारा कब्जा कर लिया जाएगा।
  • इसके अनुसार, भारतीय शासक के किसी दत्तक पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी घोषित नहीं किया जा सकता था। इस नीति ने, भारतीय शासक के अपनी पसंद के उत्तराधिकारी को नियुक्त करने के लंबे समय से चले आ रहे अधिकार को चुनौती दी थी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि, जब 1943 में ‘आजाद हिन्द फौज’ या ‘इण्डियन नेशनल आर्मी’ (Indian National Army) ने अपनी पहली महिला इकाई का गठन किया था, तो इसका नाम झांसी की वीर रानी के नाम पर रखा गया।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

मानहानि का मामला


संदर्भ:

हाल ही में, पंजाब कांग्रेस प्रमुख नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ एक ‘मानहानि’ (Defamation) का मामला दर्ज किया गया है। सिद्धू ने एक भाषण के दौरान अपनी पार्टी के दो सदस्यों की प्रशंसा करते हुए उन्हें “पुलिसकर्मियों की पैंट गीली करने में सक्षम” बताया था।

हालांकि, विवाद के बाद सिद्धू ने कहा कि उनकी इस टिप्पणी को शाब्दिक रूप से नहीं लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, कि यह कहने का एक तरीका है कि कांग्रेस के पास “अधिकार” है।

मानहानि’ क्या होती है?

‘मानहानि’ (Defamation), किसी व्यक्ति, व्यवसाय, उत्पाद, समूह, सरकार, धर्म अथवा राष्ट्र की प्रतिष्ठा को हानि पहुचाने वाले गलत व्यक्तव्यों का संप्रेषण होती है।

  • भारत में, मानहानि सिविल और क्रिमिनल दोनों प्रकार की होती है। मानहानि के दोनों प्रकारों में अंतर उनके उद्देश्यों में निहित होता है।
  • सिविल प्रकार की मानहानि में अपराधी को निवारण के रूप में क्षतिपूर्ति देनी पड़ती है तथा क्रिमिनल / आपराधिक प्रकार की मानहानि के सन्दर्भ में अपराधी को दण्डित किया जाता है, और इस प्रकार दूसरों को इस तरह का कार्य न करने का संदेश दिया जाता है।

विधिक प्रावधान:

आपराधिक मानहानि को, विशेष रूप से, भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code – IPC) की धारा 499 के तहत अपराध के रूप में परिभाषित किया गया है।

सिविल मानहानि, अपकृत्य क़ानून (Tort law) पर आधारित है। अपकृत्य क़ानून:, कानून का वह क्षेत्र है, जो किसी गलती को परिभाषित करने के लिए किसी विधान अथवा क़ानून पर निर्भर नहीं होता है, परन्तु, ‘क्या करना गलत हो सकता है?’ इसकी व्याख्या करने के लिए विभिन्न कानूनों का उपयोग करता है।

  • IPC की धारा 499 के अनुसार, मानहानि, बोले गए अथवा पढ़े जाने योग्य शब्दों के माध्यम से, संकेतों के माध्यम से तथा दृश्यमान अभिव्यक्ति के माध्यम से भी हो सकती है।
  • धारा 499 में अपवादों का भी हवाला दिया गया है। इनमें ‘लोक हित’ में आवश्यक ‘सत्य बात का लांछन’ लगाया जाना या प्रकाशित किया जाना मानहानि के अंतर्गत नहीं आता है।
  • मानहानि के लिए सजा के संबंध में आईपीसी की धारा 500, के अनुसार, किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की मानहानि करने पर, दो वर्ष तक का साधारण कारावास या जुर्माना अथवा दोनों से दण्डित किया जा सकता है।

मानहानि कानून का दुरुपयोग तथा संबंधित चिंताएँ:

  • इसके अंतर्गत, आपराधिक प्रावधानों को प्रायः विशुद्ध रूप से उत्पीड़न के माध्यम में रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
  • भारतीय विधिक प्रक्रियाओं की बोझिल प्रकृति को देखते हुए, मामले की गंभीरता पर ध्यान दिए बिना ही, प्रक्रिया ही सजा के समान हो जाती है।
  • आलोचकों का तर्क है कि मानहानि कानून वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों से टकराते हैं।
  • आपराधिक मानहानि का समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है: उदाहरण के लिए, राज्य इसे, मीडिया और राजनीतिक विरोधियों को आलोचना करने से रोकने तथा अनुचित संयम अपनाने के लिए विवश करता है।

उच्चत्तम न्यायालय द्वारा की गयी टिप्पणियाँ:

  • सुब्रमण्यम स्वामी बनाम भारत संघ मामले 2014 में, न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 (आपराधिक मानहानि) की संवैधानिक वैधता की अभिपुष्टि की गयी तथा यह कहा गया कि, किसी व्यक्ति के ‘गरिमा तथा सम्मान के साथ जीने के अधिकार’ को किसी अन्य व्यक्ति द्वारा मात्र इसलिए भंग नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसको स्वतंत्रता प्राप्त है।
  • अगस्त 2016 में, न्यायालय ने तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता पर ‘लोकतंत्र का दम घोटने’ के लिए आपराधिक मानहानि कानून का दुरुपयोग करने के लिए सख्त आलोचना करते हुए कहा कि ‘सार्वजनिक हस्तियों’ को आलोचनाओं का सामना करना चाहिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आपराधिक और सिविल मानहानि के मध्य अंतर
  2. आईपीसी की धारा 499 और 500 किससे संबंधित हैं?
  3. अपकृत्य क़ानून (Tort law) क्या है?
  4. इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय
  5. धारा 499 के तहत अपवाद

मेंस लिंक:

क्या आपको लगता है कि भारत में मानहानि को गैर-अपराध घोषित किया जाना चाहिए? क्या मानहानि तथा अवमानना कानून पुराने समय के क़ानून हो चुके है? उपयुक्त उदाहरणों सहित उचित साबित कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

PESA अधिनियम


संदर्भ:

हाल ही में, केंदू पत्ता तोड़ने वाले और इन्हें बांधने वाले तथा सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने ओडिशा के संबलपुर में ‘केंदू के पत्तों’ (Kendu Leaf) पर लगाई गयी जीएसटी को खत्म करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया।

संबंधित प्रकरण:

वर्तमान में, केंदू के पत्तों पर 18 प्रतिशत ‘वस्तु एवं सेवा कर’ अर्थात ‘जीएसटी’ (GST) लगाया जाता है, जोकि ‘वन अधिकार अधिनियम’, 2006 (Forest Rights Act 2006) और 25वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996’ (Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996) अर्थात ‘पेसा अधिनियम’ के खिलाफ है।

इसके अलावा, सरकार द्वारा ‘बीड़ी’ पर 28 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया है, जोकि ‘केंदू के पत्ते’ से निर्मित एक तैयार ‘उत्पाद’ है। इस दोहरे कराधान की वजह से ‘केंदू पत्ता संगठन’ के मुनाफे को काफी नुकसान पंहुचा है और लगभग 12 लाख श्रमिकों की आजीविका प्रभावित हुई है। केंदू पत्ता उद्योग में लगे श्रमिकों के मुनाफे में भारी कमी आने के अलावा वे अब कई सामाजिक सुरक्षा लाभों से भी वंचित हो गए हैं।

केंदु के पत्तों’ के बारे में:

  • ‘केंदु के पत्ते’ (Kendu leaf) को ‘उड़ीसा का हरा सोना’ कहा जाता है। यह बांस और साल के बीजों की तरह एक ‘राष्ट्रीयकृत उत्पाद’ (Nationalised Product) है। यह ओडिशा के सबसे महत्वपूर्ण ‘गैर-काष्ठ वनोत्पादों’ (Non-Wood Forest Products) में से एक है।
  • इसकी पत्तियों को लपेट कर ‘बीड़ी’ बनाई जाती है, जो स्थानीय लोगों के बीच लोकप्रिय धूम्रपान के रूप में काम आती है।
  • ओडिशा के तेंदु (केंडू) पत्ते को विशिष्टता इसके ‘संसाधित रूप’ (Processed Form) में उपयोग किया जाताहै, जबकि भारत के बाकी राज्यों में इसका फल के रूप में उत्पादन होता है।
  • पारंपरिक चिकित्सक, केंदु के इन छोटे फलों का उपयोग मलेरिया, दस्त और पेचिश के इलाज के लिए करते हैं।
  • चूंकि, केंदु के पत्ते’ राज्य का सबसे प्रमुख ‘लघु वनोपज’ है, अतः यह आदिवासी गांवों के लिए आय का प्रमुख स्रोत है।
  • मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के बाद, ओडिशा केंदू के पत्ते का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक राज्य है।

‘पेसा अधिनियम, 1996 के बारे में:

‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996’ या ‘पेसा अधिनियम’ भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिए, पारंपरिक ग्राम सभाओं के माध्यम से, स्वशासन सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार द्वारा अधिनियमित एक कानून है।

  • यह क़ानून 1996 में संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था और 24 दिसंबर 1996 को लागू हुआ था।
  • ‘पेसा अधिनियम’ को भारत में आदिवासी कानून की रीढ़ माना जाता है।
  • इस क़ानून के तहत, निर्णय लेने की प्रक्रिया की पारंपरिक प्रणाली को मान्यता दी गयी है और और लोगों की स्वशासन की भागीदारी सुनिश्चित की गयी है।

पृष्ठभूमि:

ग्रामीण भारत में स्थानीय स्वशासन को बढ़ावा देने हेतु, वर्ष 1992 में 73वां संविधान संशोधन किया गया। इस संशोधन के माध्यम से त्रिस्तरीय पंचायती राज संस्था को एक कानून बनाया गया।

  • हालांकि, अनुच्छेद 243 (M) के तहत अनुसूचित और आदिवासी क्षेत्रों में इस कानून को लागू करना प्रतिबंधित था।
  • वर्ष 1995 में ‘भूरिया समिति’ की सिफारिशों के बाद, भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाली आबादी के लिये स्व-शासन सुनिश्चित करने हेतु ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम,1996 लागू किया गया।
  • 1995 में भूरिया समिति की सिफारिशों के बाद, भारत के अनुसूचित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए आदिवासी स्व-शासन सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत विस्तार (पेसा) अधिनियम 1996 अस्तित्व में आया।
  • PESA क़ानून के तहत, ग्राम सभा को पूर्ण शक्तियाँ प्रदान की गयी है, जबकि राज्य विधायिका को पंचायतों और ग्राम सभाओं के समुचित कार्य को सुनिश्चित करने के लिए एक सलाहकार की भूमिका दी गई है।
  • ग्राम सभा को प्रत्यायोजित शक्तियों में, किसी उच्च स्तर की संस्था के द्वारा कटौती नहीं की जा सकती है, और इन्हें अपने निर्धारित कार्य करने की पूरी स्वतंत्रता रहेगी।

current affairs

 

ग्राम सभाओं को दी गई शक्तियाँ और कार्य:

  1. भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और विस्थापित व्यक्तियों के पुनर्वास में अनिवार्य परामर्श का अधिकार
  2. पारंपरिक आस्था और आदिवासी समुदायों की संस्कृति का संरक्षण
  3. लघु वन उत्पादों पर स्वामित्व
  4. स्थानीय विवादों का समाधान
  5. भूमि अलगाव की रोकथाम
  6. ग्रामीण बाजारों का प्रबंधन
  7. शराब के उत्पादन, आसवन और निषेध को नियंत्रित करने का अधिकार
  8. साहूकारों पर नियंत्रण का अधिकार
  9. अनुसूचित जनजातियों से संबंधित अन्य अधिकार

PESA क़ानून से संबंधित मुद्दे:

राज्य सरकारों से अपेक्षा की जाती है, कि वे ‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, एक राष्ट्रीय कानून, के अनुरूप अपने अनुसूचित क्षेत्रों के लिये राज्य स्तर पर कानून बनाएँ। इसके परिणामस्वरूप राज्यों में PESA क़ानून का आंशिक रूप से कार्यान्वयन हुआ है।

  • इस आंशिक कार्यान्वयन की वजह से आदिवासी क्षेत्रों में, जैसे- झारखंड में, स्वशासन व्यवस्था खराब हुई है।
  • कई विशेषज्ञों का दावा है, कि ‘स्पष्टता की कमी, कानूनी दुर्बलता, नौकरशाही की उदासीनता, राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, सत्ता के पदानुक्रम में परिवर्तन के प्रतिरोध आदि के कारण, PESA क़ानून सफल नहीं हो सका है।
  • राज्य भर में किये गए सोशल ऑडिट से पता चला है, कि विभिन्न विकास योजनाओं को ग्राम सभा द्वारा केवल कागज़ पर अनुमोदित किया जा रहा था और वास्तव में चर्चा और निर्णय लेने के लिये कोई बैठक नहीं हुई थी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. PESA क़ानून के बारे में
  2. मुख्य विशेषताएं
  3. अधिनियम के तहत अधिकार
  4. ग्राम सभाओं की भूमिका
  5. सोशल ऑडिट

मेंस लिंक:

‘पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (पेसा अधिनियम) के महत्व की विवेचना कीजिए।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

केन-बेतवा लिंक परियोजना


संदर्भ:

एक नए अध्ययन के अनुसार, केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना (Ken-Betwa river interlinking project) की वजह से मध्य प्रदेश में ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ के मुख्य क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा जलमग्न हो जाएगा, जिससे बाघ और इसकी प्रमुख शिकार प्रजातियों जैसे चीतल और सांभर की बड़ी क्षति होगी।

वर्तमान चिंताएं:

  • इस परियोजना से ‘पन्ना बाघ अभ्यारण्य’ में ‘महत्वपूर्ण बाघ आवास क्षेत्र’ (Critical Tiger Habitat) का 03 वर्ग किलोमीटर (10.07 प्रतिशत) क्षेत्र नष्ट हो सकता है।
  • अध्ययन के अनुसार, आवास क्षेत्र के विखंडित होने और ‘जलमग्न होने की वजह से सम्बद्धता (कनेक्टिविटी) भंग होने के कारण लगभग 23 वर्ग किमी ‘महत्वपूर्ण बाघ आवास क्षेत्र’ अप्रत्यक्ष रूप से नष्ट हो जाएगा।
  • परियोजना से कुल 50 वर्ग किमी क्षेत्रफल जलमग्न हो जाएगा, जिसमें से 57.21 वर्ग किमी क्षेत्र ‘पन्ना टाइगर रिजर्व’ के भीतर आता है। जोकि कुल जलमग्न क्षेत्र का 65.50 प्रतिशत हिस्सा होगा।
  • केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना (Ken-Betwa river interlinking project – KBRIL) के कारण जो क्षेत्र जलमग्न होगा, उसमें फूलों की सघनता और विविधता प्रचुर मात्रा में है। इस क्षेत्र में सांभर, चीतल, नीला सांड और जंगली सूअर जैसे जीव काफी अधिक संख्या में पाए जाते हैं।

वित्त पोषण:

  • केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2020-21 के लागत स्तर पर 44,605 ​​करोड़ रुपये की लागत से ‘केन-बेतवा नदी’ को जोड़ने की परियोजना के वित्तपोषण और कार्यान्वयन को मंजूरी दे दी है।
  • केंद्र सरकार द्वारा इस परियोजना के लिए ₹39,317 करोड़ दिए जाएंगे, जिसमे से ₹36,290 करोड़ अनुदान के रूप में और ₹3,027 करोड़ ऋण के रूप में होंगे।

केन-बेतवा परियोजना के बारे में:

इस परियोजना के तहत, दौधन बांध (Dhaudhan Dam) के निर्माण और दो नदियों को जोड़ने वाली नहर, निचले ऑर्र बाँध (Lower Orr Dam), कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स बहुउद्देशीय परियोजना के माध्यम से, केन नदी से बेतवा नदी में पानी का स्थानान्तरण किया जाएगा।

Current Affairs

 

परियोजना का महत्व:

  • इस परियोजना से सालाना 62 लाख हेक्टेयर सिंचाई, 62 लाख लोगों को पेयजल आपूर्ति और 103 मेगावाट जलविद्युत और 27 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पन्न करने की उम्मीद है।
  • यह परियोजना, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में विस्तृत पानी की कमी वाले ‘बुंदेलखंड क्षेत्र’ के लिए अत्यधिक लाभकारी होगी।
  • इस परियोजना से कृषि गतिविधियों में वृद्धि और रोजगार सृजन के कारण पिछड़े बुंदेलखंड क्षेत्र में सामाजिक-आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
  • परियोजना, क्षेत्र से संकटपूर्ण प्रवास को रोकने में भी मदद करेगी।

इंटरलिंकिंग के लाभ:

  • जल और खाद्य सुरक्षा में वृद्धि
  • जल का समुचित उपयोग
  • कृषि को बढ़ावा
  • आपदा न्यूनीकरण
  • परिवहन को बढ़ावा देना

महत्वपूर्ण तथ्य:

  1. केन और बेतवा नदियों का उद्गम मध्यप्रदेश में होता है और ये यमुना की सहायक नदियाँ हैं।
  2. केन नदी, उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले में और बेतवा नदी हमीरपुर जिले में यमुना नदी में मिल जाती हैं।
  3. राजघाट, परीछा और माताटीला बांध, बेतवा नदी पर स्थित हैं।
  4. केन नदी, पन्ना बाघ अभ्यारण्य से होकर गुजरती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘नदियों को आपस में जोड़ने की राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना’ (National Perspective Plan) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. परियोजना के बारे में
  2. केन और बेतवा- सहायक नदियाँ और संबंधित राज्य
  3. पन्ना टाइगर रिजर्व के बारे में
  4. भारत में बायोस्फीयर रिजर्व

मेंस लिंक:

‘केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

जीएमओ फसलों पर FSSAI का विनियमन मसौदा


संदर्भ:

किसानों के बीच काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता, ‘भारतीय खाद्य संरक्षा एवं सुरक्षा मानक प्राधिकरण’ (Food Safety and Standards Authority of India – FSSAI) के आनुवंशिक रूप से संवर्धित (Genetically Modified – GM) खाद्य पदार्थों पर मसौदा नियमों का विरोध कर रहे हैं, और इन नियमों को “अस्वीकार्य” करार दिया है।

इनकी मांग:

इन कार्यकर्ताओं का कहना है, कि FSSAI स्पष्ट रूप से कहे कि ‘जीएम खाद्य पदार्थों’ को उत्पादन या आयात के माध्यम से भारत में अनुमति नहीं दी जाएगी।

इनके अनुसार, भारत में किसी भी प्रकार के ‘आनुवंशिक रूप से संवर्धित’ खाद्य पदार्थ, हमारे लोगों के स्वास्थ्य, हमारे पर्यावरण और भारत की विविध खाद्य संस्कृतियों के लिए खतरा है।

पृष्ठभूमि:

भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने GM खाद्य पदार्थों के लिए मसौदा नियम जारी किए हैं।

संबंधित प्रकरण:

FSSAI द्वारा जारी विनियमन मसौदा में प्रस्तावित किया गया है, कि 1% या उससे अधिक ‘आनुवंशिक रूप से संवर्धित सामग्री वाले सभी खाद्य उत्पादों को “जीएमओ सामग्री सहित/ जीएमओ से ली गयी सामग्री” के रूप में लेबल किया जाएगा। कार्यकर्ताओं का कहना है, कि यह ‘जीएम खाद्य पदार्थों’ प्रतिबंधित करने के बजाय, इनके आयात के लिए एक मौन स्वीकृति की तरह है।

मसौदे का अवलोकन:

  1. बगैर पूर्वानुमोदन के कोई भी ‘आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों’ (GMOs) से प्राप्त किसी भी खाद्य उत्पाद या खाद्य सामग्री का निर्माण या बिक्री नहीं कर सकता है।
  2. मसौदे में कुछ विशेष मानदंडों को निर्दिष्ट किया गया है, जिनका ‘प्रयोगशालाओं’ के लिए ‘जीएम खाद्य पदार्थों’ के परीक्षण हेतु, पालन करना अनिवार्य होगा।
  3. प्रस्तावित नियम “भोजन के रूप में अथवा प्रसंस्करण हेतु सीधे उपयोग के लिए अभिप्रेत, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) या आनुवंशिक रूप से तैयार किए गए जीवों (GEOs) या ‘जीवित संशोधित जीवों’ (LMOs) पर लागू होंगे।”
  4. विनियमों के दायरे में, GMO से प्राप्त खाद्य सामग्री या प्रसंस्करण का उपयोग करके तैयार किए गए सभी खाद्य उत्पाद शामिल होंगे, भले ही अंतिम उत्पाद में कोई भी जीएम सामग्री मौजूद न हो।
  5. शिशु खाद्य उत्पादों में, आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) या आनुवंशिक रूप से तैयार किए गए जीवों (GEOs) का “एक घटक के रूप में उपयोग नहीं किया जाएगा”।
  6. मसौदे में, जीएमओ सामग्री की एक प्रतिशत या इससे अधिक मात्रा रखने वाले खाद्य उत्पादों के लिए ‘लेबलिंग मानदंडों’ (labelling norms) का भी प्रावधान किया गया है।

भारत में GMO विनियमन:

  • आयातित उपभोग्य सामग्रियों में GMO के स्तर को विनियमित करने का कार्य शुरू में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत आनुवंशिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (Genetic Engineering Appraisal Committee- GEAC) द्वारा किया जाता था।
  • खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के लागू होने के बाद इसकी भूमिका को कम कर दिया गया तथा इसके स्थान पर FSSAI को आयातित सामग्रियों को मंज़ूरी प्रदान करने के लिये कहा गया।

‘आनुवंशिक रूप से संशोधित जीव’ (ट्रांसजेनिक जीव) क्या हैं?

आनुवंशिक रूप से संशोधित जीवों (GMOs) में, जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीकों का उपयोग करके आनुवंशिक सामग्री (DNA) को परवर्तित किया जाता है या कृत्रिम रूप से किसी अन्य जीवाणु को प्रविष्ट कराया जाता है।

  • आनुवंशिक संशोधन प्रकिया में जीनों का उत्परिवर्तन, अंतर्वेशन या विलोपन शामिल होते है।
  • अंतर्वेशित किए जाने वाले जीन, आमतौर पर किसी अन्य जीवाणु से लिए जाते हैं (जैसे बीटी कपास (Bt Cotton) में, बेसिलस थुरिंगिनेसिस (Bacillus thuringiensis- Bt) जीवाणु से जीन को अंतर्वेशित किया जाता है)।
  • किसी प्रजाति में आनुवंशिक संशोधन, प्रजाति में प्राकृतिक रूप से अनुपस्थित, एक वांछनीय नई विशेषता को उत्प्रेरित करने के लिए किया जाता है।

जीएम तकनीकों का उपयोग:

  1. जैविक एवं चिकित्सीय अनुसंधान,
  2. फार्मास्यूटिकल दवाओं का उत्पादन,
  3. प्रायोगिक चिकित्सा (जैसे जीन थेरेपी),
  4. कृषि (जैसे स्वर्ण चावल, बीटी कपास आदि),
  5. आनुवंशिक रूप से संशोधित बैक्टीरिया से प्रोटीन इंसुलिन का उत्पादन करने हेतु,
  6. जीएम बैक्टीरिया आदि से जैव ईंधन का उत्पादन करने हेतु।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. GM फसलें क्या हैं?
  2. GMOs क्या हैं?
  3. GEAC के बारे में।
  4. जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल के बारे में।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स।

 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

इलेक्ट्रिक वाहनों के अपनाने को बढ़ावा देने हेतु सरकारी नीतियां


संदर्भ:

नए युग की प्रौद्योगिकियों को प्रोत्साहित करने और वर्ष 2070 तक अपने कार्बन उत्सर्जन को नेट-जीरो करने के लिए, COP26 में लिए गए वचन को पूरा करने की दिशा में, भारत आक्रामक रूप से इलेक्ट्रिक वाहनों (Electric Vehicles – EVs) को अपनाने को बढ़ावा दे रहा है।

लक्ष्य:

भारत का लक्ष्य, वर्ष 2030 तक 30 प्रतिशत निजी कारों, 70 प्रतिशत वाणिज्यिक वाहनों और 80 प्रतिशत दोपहिया और तिपहिया वाहनों को इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) में परिवर्तित करने का है।

इसके लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारें खरीदारों और निर्माताओं को तरह-तरह के प्रोत्साहन दे रही हैं।

इस हेतु किए गए विभिन्न उपायों में शामिल हैं:

  1. ऑटो सेक्टर के लिए पीएलआई योजना: इस साल सितंबर में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारत में इलेक्ट्रिक और ईंधन सेल वाहनों और ड्रोन के घरेलू निर्माण में तेजी लाने के लिए 26,058 करोड़ रुपये की उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना को मंजूरी दी।
  2. FAME II संशोधन: FAME-II (फास्टर एडॉप्शन एंड मैन्युफैक्चरिंग ऑफ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स-II) योजना के तहत, सरकार ने इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों के लिए सब्सिडी दर में वृद्धि करके पेट्रोल से चलने वाले दोपहिया और इलेक्ट्रिक के बीच कीमतों के अंतर को काफी कम कर दिया है।
  3. कबाड़ नीति / स्क्रैपेज पॉलिसी: इस साल अगस्त में, सरकार ने ‘गुजरात इन्वेस्टर समिट’ में वर्चुअल रूप से ‘व्हीकल स्क्रैपेज पॉलिसी’ लॉन्च की थी। नीति का उद्देश्य पर्यावरण के अनुकूल तरीके से अनुपयुक्त और प्रदूषणकारी वाहनों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करना है।

केंद्र के साथ, राज्य सरकारें भी भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाने को बढ़ावा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। बैटरी चालित इलेक्ट्रिक वाहनों (BEVs) की पहुंच बढ़ाने और अपनाने के लिए, दिल्ली, गुजरात, गोवा, महाराष्ट्र और राजस्थान सहित भारत में लगभग 20 राज्यों की सरकारें पहले ही राज्य स्तरीय, मसौदा या अंतिम ‘इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां’ जारी कर चुकी हैं।

आगे की चुनौतियां:

  1. वर्तमान में, भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बाजार की आम लोगों में पहुँच शेष विश्व की तुलना में काफी कम है।
  2. पूंजीगत लागत काफी अधिक है और इस पर लाभ और अदायगी अनिश्चित है।
  3. हाल के महीनों में रुपये का नाटकीय मूल्यह्रास होने के कारण भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
  4. इलेक्ट्रिक वाहनों में स्थानीय निवेश, कुल निवेश का मात्र लगभग 35% है।
  5. निवेश के संदर्भ में इलेक्ट्रिक वाहनों का उत्पादन बुरी तरह प्रभावित होगा।
  6. भारत में हाइब्रिड और इलेक्ट्रिक वाहनों को तेजी से अपनाना और विनिर्माण’ (फेम इंडिया) योजना को बार-बार आगे बढ़ाया गया है।
  7. ‘अनिश्चित नीतिगत माहौल’ और ‘सहायक बुनियादी ढांचे की कमी’ इलेक्ट्रिक वाहनों के उत्पादन में प्रमुख बाधाएं हैं।
  8. भारत के पास लिथियम और कोबाल्ट का कोई ज्ञात भंडार नहीं है, जिसकी वजह से भारतीय इलेक्ट्रिक वाहन (EV) बाजार, जापान और चीन से लिथियम-आयन बैटरी के आयात पर निर्भर है।

समय की मांग:

  1. इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रभावी ढंग से शुरू करने के लिए, हमें एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए सहगामी प्रयास करने की आवश्यकता है।
  2. वाहनों को सब्सिडी देने की बजाय बैटरियों को सब्सिडी देने पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है क्योंकि बैटरी की कीमत, इलेक्ट्रिक वाहन की कुल कीमत का लगभग आधी होती है।
  3. इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर्स को बढ़ावा देने पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि देश में कुल वाहनों में टू-व्हीलर्स की हिस्सेदारी 76 फीसदी है और ये ईंधन की ज्यादा खपत करते है।
  4. निवेश आकर्षित करने के लिए चार्जिंग स्टेशनों का एक विस्तृत नेटवर्क स्थापित किया जाना आवश्यक है।
  5. टेक पार्क, सार्वजनिक बस डिपो और मल्टीप्लेक्स में कार्यस्थल, चार्जिंग पॉइंट स्थापित करने हेतु उपयुक्त स्थान हैं। बैंगलोर में, कुछ मॉल में पार्किंग स्थल में चार्जिंग पॉइंट स्थापित किए गए हैं।
  6. बड़े व्यापारी ‘कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी कंप्लायंस’ के रूप में चार्जिंग स्टेशनों में निवेश कर सकते हैं।
  7. भारत को इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए बैटरी बनाने के लिए कच्चे माल की जरूरत है, अतः बोलीविया, ऑस्ट्रेलिया और चिली में ‘लिथियम फ़ील्ड’ हासिल करना, तेल क्षेत्रों को खरीदने जितना महत्वपूर्ण हो सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत के किन राज्यों में ‘इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां’ (Electric Vehicle Policies) अपनाई जा चुकी हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत में इलेक्ट्रिक वाहन नीति
  2. राज्यों द्वारा समान इलेक्ट्रिक वाहन नीतियां
  3. FAME योजना
  4. FAME योजना चरण 1 बनाम चरण 2

मेंस लिंक:

भारत में इलेक्ट्रिक वाहन नीतियों से जुड़ी चुनौतियों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

‘डिजिटल ऋण’ को विनियमित करने हेतु कानून बनाने पर विचार


संदर्भ:

भारत में, ‘भौतिक प्रणाली’ के सापेक्ष ‘डिजिटल प्रणाली’ के माध्यम से ऋण प्रदान करना अभी भी, बैंकों के मामले में (डिजिटल मोड के माध्यम से 1.12 लाख करोड़ रुपये भौतिक मोड के माध्यम से 53.08 लाख करोड़ रुपये का ऋण) प्रारंभिक चरण में है।

  • हालांकि, प्रतिदर्श इकाईयों के लिए डिजिटल मोड के माध्यम से ऋण संवितरण की कुल मात्रा में 2017 और 2020 के बीच बारह गुना (11,671 करोड़ रुपये से 41 लाख करोड़ रुपये) से अधिक की वृद्धि हुई है।
  • उद्योग जगत के अग्रणियों का कहना है कि ‘डिजिटल ऋण’ (Digital Lending) क्षेत्र में मजबूत वृद्धि भारत में विशाल अप्रयुक्त ऋण क्षमता को इंगित करती है, जिसे प्रौद्योगिकी के उपयोग के माध्यम से कुशलता से पाटा जा सकता है।

इसलिए, विशेषज्ञों का सुझाव है, कि ‘डिजिटल ऋणदाताओं’ को आरबीआई विनियमन के तहत लाने से, चूंकि अव्यवस्था फ़ैलाने वालों के लिए अनुपालन लागत काफी अधिक हो सकती है, अतः गलत उद्देश्यों से कारोबार करने वालों को बाहर निकालने में मदद मिलेगी और यह सुनिश्चित होगा कि इसमें केवल गंभीर प्रतिभागी ही सक्रिय रहें।

उद्योग को प्रभावित करने वाले मुख्य मुद्दे:

डिजिटल ऋण-प्रदाता कंपनियों का सामान्य तौर-तरीका, 5,000 रुपये तक के छोटे ऋणों द्वारा ग्राहकों को लुभाना है, जिसे आमतौर पर प्रति माह 500 रुपये की किश्त के माध्यम से कुछ हफ्तों में कुछ ब्याज के साथ चुकाया जा सकता है।

  • किंतु, यदि उधारकर्ता इस राशि का भुगतान करने में विफल रहता है, तो यह 120% प्रति वर्ष (10% प्रति माह) की दर से बढ़ता जाता है, जिससे उधारकर्ता के लिए यह राशि चुकाना मुश्किल हो जाता है।
  • इस तरह का ऋण, कभी-कभी “अभी खरीदो, बाद में भुगतान करो’ (Buy Now, Pay Later BNPL) जैसी सेवाओं के रूप ऑफर किया जाता है। इस तरह की योजनाओं में खरीदारों को किसी वस्तु को तत्काल खरीदने तथा बाद में तीन या अधिक किश्तों में एक निर्धारित ब्याज मुक्त अवधि के भीतर भुगतान करने की सुविधा दी जाती है। इस प्रकार के ऋण ज्यादातर युवाओं, ऋण लेने वाले नए लोगों, कम नकदी रखने वाली नयी पीढी को लक्षित करते हैं।

current Affairs

 

आरबीआई का कार्यकारी समूह:

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के माध्यम से ऋण देने सहित ‘डिजिटल ऋण’ के विनियमन हेतु गठित भारतीय रिजर्व बैंक के कार्यकारी समूह (Reserve Bank of India Working Group (WG) on digital lending) द्वारा अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की गयी हैं।

ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और मोबाइल ऐप के माध्यम से ऋण देने सहित डिजिटल ऋण पर भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के कार्यकारी समूह (डब्ल्यूजी) ने इस साल नवंबर में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत कीं।

प्रमुख सिफारिशें:

  1. इस प्रकार के ऋणों की निगरानी के लिए एक अलग कानून बनाया जाना चाहिए।
  2. डिजिटल ऋण प्रदान करने वाली एप्लीकेशंस (Digital Lending Apps) जांच के लिए एक नोडल एजेंसी की जाए।
  3. डिजिटल ऋण पारितंत्र में में प्रतिभागियों के लिए एक ‘स्व-नियामक संगठन’ स्थापित किया जाना चाहिए।
  4. कुछ आधारभूत प्रौद्योगिकी मानकों का विकास, एवं डिजिटल ऋण समाधान को प्रस्तुत करने के लिए पूर्व शर्त के रूप में उन मानकों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
  5. ऋणों का संवितरण सीधे उधारकर्ताओं के बैंक खातों में किया जाना चाहिए और ऋणों का संवितरण एवं सर्विसिंग केवल डिजिटल ऋणदाताओं के बैंक खातों के माध्यम से की जानी चाहिए।
  6. सत्यापन योग्य ऑडिट ट्रेल्स के साथ उधारकर्ताओं की पूर्व और स्पष्ट सहमति के साथ डेटा संग्रह किया जाए और सभी डेटा भारत में स्थित सर्वरों में संग्रहीत किया जाना चाहिए।

डिजिटल ऋण के लाभ:

  • डिजिटल उधार में, वित्तीय उत्पादों और सेवाओं तक अधिक निष्पक्ष, कुशल और समावेशी पहुँच बनाने की क्षमता है।
  • फिनटेक के नेतृत्व में यह नवाचार, कुछ साल पहले गौण सहायक भूमिका से आगे बढ़कर, अब वित्तीय उत्पादों और सेवाओं के डिजाइन, मूल्य निर्धारण और वितरण के लिए मूल भूमिका निभा रहा है।

समय की मांग:

नियामक संस्थाओं द्वारा, डेटा सुरक्षा, गोपनीयता, गोपनीयता और उपभोक्ता सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए, इस नवाचार का समर्थन करने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण का पालन करने की आवश्यकता है।

डिजिटल ऋण देने वाले ऐप्स से संबंधित मुद्दे

  1. ये ऋणकर्ताओं को शीघ्र और परेशानी मुक्त तरीके से ऋण देने का वादा करते हैं।
  2. लेकिन, बाद में ऋणकर्ताओं से ब्याज की अत्याधिक दरों और छिपे हुए अतिरिक्त शुल्क की मांग की जाती है।
  3. इस तरह के प्लेटफॉर्म ऋणों की बसूली के लिए अमान्य और कठोर विधियाँ अपनाते हैं।
  4. ये ऋणकर्ताओं के मोबाइल फोन डेटा का उपयोग करने संबंधी समझौतों का दुरुपयोग करते हैं।

Current Affairs

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. डिजिटल ऋण
  2. डिजिटल ऋण से संबंधित विनियम।
  3. आरबीआई द्वारा नियुक्त समिति
  4. इसकी सिफारिशें

मेंस लिंक:

देश में डिजिटल ऋण से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इकोनॉमिक टाइम्स।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


नीलगाय

हाल ही में, बिहार सरकार ने ‘ब्लू बुल’ (Blue Bull), जिसे स्थानीय रूप से ‘नीलगाय’ (Nilgais) या घुरपारा के नाम से जाना जाता है, की हत्या करने पर रोक लगाने की घोषणा की है। इसके बजाय, राज्य में ‘नीलगाय’ की बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए इनकी नसबंदी की जाएगी।

  • ‘नीलगाय’ सबसे बड़ा एशियाई मृग है और उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग हर जगह पाया जाता है।
  • ‘नीलगाय’ बोसेलफस (Boselaphus) जीनस का एकमात्र सदस्य है और ‘बोविडे’ (Bovidae) परिवार में रखा गया है।
  • इस प्रजाति में विशिष्ट ‘लैंगिक द्विरूपता’ होती है; नर नीलगाय आकार में मादा से बड़े और रंग में भिन्न होते हैं।
  • ‘नीलगाय’ भारत, नेपाल और पाकिस्तान में पायी जाती है। हिमालय की तलहटी में तराई के निचले इलाकों में इनकी संख्या काफी अधिक है।
  • यह भारतीय उपमहाद्वीप के लिए स्थानिक प्रजाति है।
  • IUCN स्थिति: संकटमुक्त (Least Concern)

Current Affairs

 

दारा शिकोह (1615-59)

  • दारा शिकोह (Dara Shikoh), मुग़ल बादशाह शाहजहाँ का सबसे बड़ा पुत्र था।
  • अपने भाई औरंगजेब के खिलाफ उत्तराधिकार की लड़ाई हारने के बाद उसकी हत्या कर दी गयी थी।
  • दारा शिकोह को हिंदू और इस्लामी परंपराओं के बीच समानता खोजने की कोशिश करने वाले एक “उदार मुस्लिम” के रूप में वर्णित किया जाता है।
  • उसने भगवद गीता और 52 उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया।
  • शाहजहाँनामा के अनुसार, दारा शिकोह को पराजित करने के बाद औरंगजेब उसे जंजीरों में जकड़ कर दिल्ली ले आया। और उसका सिर काटकर आगरा के किले में भेज दिया गया, जबकि उसके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफना दिया गया।

उसकी विरासत:

दारा शिकोह को “तत्कालीन सबसे महान स्वतंत्र विचारकों में से एक” के रूप में वर्णित किया जाता है।

  • उसने उपनिषदों की महानता को पहचाना और उनका फारसी में अनुवाद किया। इससे पहले उपनिषदों के महत्व से केवल कुछ उच्च जाति के हिंदु ही परिचित थे। उपनिषदों के उस फ़ारसी अनुवाद के अन्य भाषाओँ में अनुवादों ने आज के बहुत से स्वतंत्र विचारकों को, यहाँ तक कि संयुक्त राज्य के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को भी, प्रेरित किया है।
  • कुछ इतिहासकारों का तर्क है, कि यदि औरंगजेब की जगह, दारा शिकोह मुगल सिंहासन पर बैठा होता, तो वह धार्मिक संघर्षों में मारे गए हजारों लोगों की जान बचा सकता था। वह एक तरह से औरंगजेब के पूर्ण विरोधी स्वरूप था। वह गंभीर समन्वयवादी, सौहार्दपूर्ण और उदार था – लेकिन साथ ही, एक निष्पक्ष प्रशासक और युद्ध के क्षेत्र में प्रभावहीन व्यक्ति भी थे।

चर्चा का कारण:

मुगल राजकुमार दारा शिकोह की छवि बनाने के अपने प्रयासों को जारी रखते हुए, केंद्र सरकार उसके जीवन और आध्यात्मिक विरासत पर नाटकों की एक श्रृंखला आयोजित करने की योजना बना रही है।

Current Affairs


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