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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 29 December 2021

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययन-I

1. सदन के अध्यक्ष का निर्वाचन

2. कार्यपालिका द्वारा अदालत के आदेशों का अनादर करने की प्रवृत्ति

3. वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना

4. बिहार में अवैध शराब निर्माण की निगरानी हेतु उपाय

 

सामान्य अध्ययन-III

1. रिज़र्व बैंक द्वारा क्रिप्टोकरेंसी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने का विचार

2. जीआई टैग

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. भारत में नए टीकों को मंजूरी

2. केंद्र सरकार द्वारा ‘सोया खाद्य’ आवश्यक वस्तु सूची में शामिल

3. जम्मू-कश्मीर रियल एस्टेट क्षेत्र

 


सामान्य अध्ययन-II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

सदन के अध्यक्ष का निर्वाचन


संदर्भ:

महाराष्ट्र में विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी और ‘महा विकास अघाड़ी’ (MVA) सरकार के बीच खींचतान जारी है।

संबंधित प्रकरण:

वर्ष 2019 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के नाना पटोले को सदन का अध्यक्ष चुना गया था। लेकिन पटोले द्वारा पद से इस्तीफा देने, और बाद में राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किए जाने के बाद फरवरी 2021 में यह पद खाली हो गया।

  • इसके बाद, राकांपा (NCP) से सदन के ‘उपाध्यक्ष’ नरहरि जिरवाल सीताराम ने विधान सभा में कार्यवाही का संचालन किया। हालांकि, गठबंधन सरकार में पार्टियों के बीच आंतरिक मतभेदों के कारण यह पद भी रिक्त हो गया।
  • अब राज्य सरकार, नवीनतम संशोधनों के अनुसार, गुप्त मतदान के बजाय ‘ध्वनि मत’ से सदन के अध्यक्ष का चुनाव कराना चाहती है। लेकिन, राज्यपाल ने सरकार के इस फैसले की संवैधानिकता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।

नियमों में किए गए हालिया संशोधन:

पिछले हफ्ते, सरकार ने विधानसभा में एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें नियम 6 (विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव) और नियम 7 (उपसभा अध्यक्ष का चुनाव) में गुप्त मतदान के बजाय ध्वनि मत से कराए जाने हेतु संशोधन करने की मांग की गई। यह संशोधन, विधायिका की नियम समिति द्वारा प्रस्तावित किए गए थे।

  • संशोधनों में “चुनाव कराने” शब्दों को शामिल नहीं किया गया, तथा ‘महाराष्ट्र विधान सभा नियमावली’ के नियम 6 में “मुख्यमंत्री की सिफारिश पर अध्यक्ष का चुनाव करने के लिए” शब्द शामिल किए गए।
  • संशोधनों में ‘अध्यक्ष’ के चुनाव के प्रावधान को “गुप्त मतदान” (Secret Ballot) को “ध्वनि मत” (Voice Vote) से परिवर्तित किया गया है।

आलोचना:

विपक्ष ने इn संशोधनों का विरोध करते हुए तर्क दिया है कि, विधानसभा अध्यक्ष की अनुपस्थिति में ‘नियमवली’ में संशोधन नहीं किया जा सकता है।

सरकार का पक्ष:

सरकार का तर्क है, कि यह संशोधन, लोकसभा, राज्य विधानमंडल के उच्च सदन और कई अन्य राज्यों की विधानसभाओं में प्रचलित नियमों के अनुरूप हैं।

  • इन संशोधनों से, विधयाकों की खरीद-फरोख्त पर विराम लग जाएगा।
  • सरकार ने कहा कि नियमों में संशोधन करना, विधायिका के अधिकार में आता है।

विधानसभा अध्यक्ष के निर्वाचन हेतु राज्यपाल की मंजूरी की आवश्यकता:

विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव की तारीख, राज्यपाल द्वारा अधिसूचित की जाती है।

  • महाराष्ट्र विधान सभा नियमावली के नियम 6 के अनुसार, “विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव कराने हेतु, राज्यपाल एक तारीख तय करेगा और विधानसभा सचिव द्वारा हर सदस्य को इस तरह की तय तारीख की सूचना भेजी जाएगी।”
  • इसलिए, विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव, राज्यपाल द्वारा इसकी तारीख तय करने के बाद ही हो सकता है।

आगे की राह:

स्थिति बड़ी विचित्र है। महाराष्ट्र विधान सभा नियमावली के नियम 6 में कहा गया है, कि राज्यपाल को विधानसभा अध्यक्ष चुनाव की तारीख तय करनी चाहिए, जबकि संशोधन के अनुसार, राज्यपाल को मुख्यमंत्री की सलाह पर चुनाव की तारीख तय करनी चाहिए। यह दो संवैधानिक संस्थाओं के बीच का संघर्ष है।

  • सूत्रों के अनुसार, सरकार यह देखने के लिए कानूनी विकल्प तलाशेगी, कि क्या राज्यपाल की सहमति के बिना अध्यक्ष का चुनाव हो सकता है।
  • लेकिन सदन के पूर्व सचिव के अनुसार, बिना राज्यपाल की सहमति के चुनाव कराना मुश्किल होगा।

सदन के अध्यक्ष की भूमिकाओं और कार्यों के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि, संविधान में इन चुनावों को कराने की प्रक्रिया को निर्दिष्ट नहीं की गयी है? और इसे राज्य विधानसभाओं पर छोड़ दिया गया है। संविधान में, सदन के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव कराने हेतु कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है, मात्र यह कहा गया है कि चुनाव “जितनी जल्दी हो सके” होने चाहिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सदन अध्यक्ष का चुनाव
  2. कार्य
  3. शक्तियां
  4. पद-त्याग
  5. पद-मुक्ति के लिए आधार
  6. अध्यक्ष और संबंधित समितियां

मेंस लिंक:

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका एवं कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

कार्यपालिका द्वारा अदालत के आदेशों का अनादर करने की प्रवृत्ति


संदर्भ:

भारत के मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमण ने हाल ही में कहा है, कि कार्यपालिका (Executive) द्वारा न्यायालय के आदेशों की अवहेलना और यहां तक ​​कि अनादर करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जबकि कार्यपालिका को देश में ‘विधि का शासन’ बनाए रखने के लिए सहायता और सहयोग करना चाहिए।

न्यायपालिका के समक्ष चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि, वर्तमान में ‘असहयोगी कार्यपालिका’ अदालत के सामने मौजूद चिंताओं में से एक है।

समय की मांग:

राष्ट्र में ‘विधि के शासन’ को जारी रखने के लिए कार्यपालिका को सहायता और सहयोग करने की आवश्यकता है। जब तक कार्यपालिका और कानून, न्यायिक रिक्तियों को भरने, अभियोजकों की नियुक्ति, बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, स्पष्ट दूरदर्शिता और हितधारकों के विश्लेषण सहित कानून बनाने के लिए ईमानदार प्रयास नहीं करते, तब तक ‘विधि के शासन’ के लिए न्यायपालिका को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है।

राष्ट्र निर्माण में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका :

  • केशवानंद भारती मामले में, शीर्ष न्यायालय ने पहली बार ‘संविधान संशोधनों’ की समीक्षा करने की अपनी शक्ति को प्रतिपादित किया था।
  • इस तरह की व्याख्या के माध्यम से ही ‘इंदिरा गांधी बनाम राज नारायण मामले’ में 39वें संशोधन अधिनियम को रद्द कर दिया गया था।

‘न्यायिक समीक्षा’ की शक्ति:

‘न्यायिक समीक्षा’ (Judicial Review) की शक्ति को अक्सर ‘न्यायिक अतिरेक’ (Judicial Overreach) के रूप में ब्रांडेड करने का प्रयास किया जाता है। इस तरह के ‘सामान्यीकरण’ प्रायः गुमराह करने वाले होते हैं। संविधान में तीन एक-समान अंगों का निर्माण किया गया है, और इस संदर्भ में ‘न्यायपालिका’ को अन्य दो ‘अंगों’ द्वारा उठाए गए कदमों की वैधता की समीक्षा करने की भूमिका दी गई है। यदि न्यायपालिका के पास ‘न्यायिक समीक्षा’ की शक्ति नहीं होगी, तो इस देश में लोकतंत्र का कार्य करना अकल्पनीय हो जाएगा।

वर्तमान चिंताएं:

  • आमतौर पर, कोई भी कानून पारित करने से पहले, उसका प्रभाव मूल्यांकन या संवैधानिकता की बुनियादी जांच नहीं की जाती है। कानूनों का मसौदा तैयार करते समय कम-से-कम यह अपेक्षा की जाती है, कि ये क़ानून स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करते हों। विधि-निर्माताओं को कानून से उत्पन्न होने वाले मुद्दों के लिए ‘प्रभावी उपचार’ प्रदान करने के बारे में भी सोचना चाहिए। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान में इन सिद्धांतों की अनदेखी की जा रही है। और, इसका सीधा असर अदालतों पर पड़ता है।
  • कई बार, पक्षकारों को अपने अनुकूल आदेश न मिलने पर, प्रिंट और सोशल मीडिया में भी जजों के खिलाफ अभियान चलाए जाते हैं।
  • मीडिया-सुनवाई की बढ़ती संख्या: नए मीडिया उपकरणों में किसी मामले को व्यापक स्तर पर विस्तार देने की क्षमता होती है, लेकिन वे सही और गलत, अच्छे और बुरे और वास्तविक और नकली के बीच अंतर करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं।

समय की मांग:

  • न्यायपालिका में ज्ञान-क्षेत्र विशेषज्ञता की आवश्यकता है। हमें विभिन्न क्षेत्रों में विकास की समझ रखने वाले न्यायाधीशों और वकीलों की जरूरत है।
  • तकनीकी विशेषज्ञों से लगातार ‘न्यायिक प्रशिक्षण’ प्राप्त करना भी आवश्यक है। कानूनी शिक्षा को समय के साथ तालमेल बिठाने और अपने पाठ्यक्रम को लगातार अद्यतन (अपडेट) करने की जरूरत है।
  • ‘आभासी सुनवाई’ (Virtual Hearings) जैसी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए न्यायपालिका को एक अनुकूल मंच की आवश्यकता है।

न्यायिक समीक्षा’ क्या है?

न्यायिक समीक्षा (Judicial review), न्यायपालिका को प्राप्त एक शक्ति है, जिसके अंतर्गत वह सरकार के विधायी तथा कार्यकारी अंगों द्वारा पारित किसी अधिनियम या आदेश से किसी प्रभावित व्यक्ति के चुनौती दिए जाने पर इन कानूनों/ आदेश की समीक्षा तथा इनकी संवैधानिकता पर निर्णय करती है।

भारत में ‘न्यायिक समीक्षा’ की स्थिति:

भारत में न्यायिक समीक्षा की शक्ति का स्रोत भारतीय संविधान है (संविधान के अनुच्छेद 13, 32, 136, 142 और 147)।

  1. न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग संविधान के भाग-तीन में प्रदत्त मूल अधिकारों की रक्षा करने और इन्हें प्रवर्तित करने के लिए किया जाता है।
  2. संविधान के अनुच्छेद 13 में संसद और राज्य विधानसभाओं को देश के नागरिकों को प्राप्त मूल-अधिकारों को समाप्त करने अथवा इनका हनन करने वाले क़ानून बनाना निषेध किया गया है ।
  3. अनुच्छेद 13 के तहत मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करने के प्रावधान किए गए हैं तथा इसके तहत किसी भी कानून को ‘मूल-अधिकारों के असंगत अथवा अल्पीकरण’ करने की सीमा तक अमान्य माना गया है।

judicial

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘न्यायिक समीक्षा’ क्या है?
  2. न्यायिक समीक्षा का विकास
  3. अनुच्छेद 13, 21 और 32

मेंस लिंक:

भारतीय संदर्भ में न्यायिक समीक्षा के बारे चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना


संदर्भ:

हाल ही में, वस्त्र मंत्रालय द्वारा इस साल सितंबर में घोषित ‘वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना (Production Linked Scheme for Textiles) के लिए एक जनवरी से आवेदन स्वीकार किए जाने की जानकारी दी गयी है।

योजना के बारे में:

सरकार द्वारा वस्त्र उद्योग के लिए 10,683 करोड़ रुपये के बजटीय परिव्यय के साथ ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना (Production Linked Incentive Scheme – PLI Scheme) का आरंभ किया गया है।

यह PLI योजना केंद्रीय बजट 2021-22 में 13 क्षेत्रों के लिए पहले घोषित की गई 1.97 लाख करोड़ के कुल बजटीय परिव्यय वाली ‘पीएलआई योजनाओं’ का हिस्सा है।

विशेष फोकस क्षेत्र:

‘वस्‍त्र उद्योग के लिए ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना का उद्देश्य ‘उच्च कीमतों के मानव निर्मित फाइबर (Man-Made FibreMMF) से निर्मित कपड़े, परिधान और तकनीकी वस्त्रों के उत्पादन को बढ़ावा देना है।

अहर्ता प्रक्रिया:

  1. कोई भी व्यक्ति (जिसमें फर्म/कंपनी शामिल है), जो निर्धारित खंडों (एमएमएफ फैब्रिक्स, गारमेंट) के उत्‍पादों और तकनीकी वस्‍त्र के उत्पादों के उत्पादन के लिए संयंत्र, मशीनरी, उपकरण और निर्माण कार्यों (भूमि और प्रशासनिक भवन की लागत को छोड़कर) में न्यूनतम 300 करोड़ रुपये निवेश करने को तैयार है, वह इस योजना के पहले भाग में भागीदारी के लिए आवेदन करने का पात्र होगा।
  2. दूसरे भाग में, कोई भी व्यक्ति (जिसमें फर्म/कंपनी शामिल है), जो न्यूनतम 100 करोड़ रुपये निवेश करने का इच्छुक है, वह योजना के इस भाग में भागीदारी के लिए आवेदन करने का पात्र होगा।

प्रोत्साहन:

  1. PLI योजना के तहत, केंद्र सरकार द्वारा वृद्धिशील उत्पादन पर प्रोत्साहन देकर पात्र निर्माताओं को सब्सिडी प्रदान की जाएगी।
  2. संयंत्र, मशीनरी, उपकरण और सिविल कार्यों में 300 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश करने वाली कंपनियों को अपने टर्नओवर का 15 प्रतिशत प्रोत्साहन मिलेगा। इस टर्नओवर को निवेश करने तीसरे वर्ष में 600 करोड़ रुपये होना चाहिए।
  3. 100 करोड़ रुपये से 300 करोड़ रुपये के बीच निवेश करने वाली कंपनियां भी शुल्क वापसी और प्रोत्साहन (उनके कारोबार के 15 प्रतिशत से कम) प्राप्त करने की पात्र होंगी।
  4. इस योजना से सरकार को “19,000 करोड़ रुपए से अधिक का नया निवेश और 3 लाख करोड़ रुपए से अधिक का संचयी कारोबार” प्राप्त करने की उम्मीद है।

महत्व:

पीएलआई योजना, घरेलू विनिर्माण को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ावा देगी, और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की भावना के अनुरूप वैश्विक बाजारों में एक बड़ा प्रभाव डालने के लिए वस्त्र उद्योग को तैयार करेगी। यह योजना इस क्षेत्र में अधिक निवेश आकर्षित करने में भी मदद करेगी।

आवश्यकता:

वस्त्रों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का दो-तिहाई, मानव निर्मित और तकनीकी वस्त्रों का है। भारत को मानव निर्मित फाइबर (MMF) से बने वस्त्रों और वस्त्र उद्योग के पारिस्थितिकी तंत्र में भी योगदान करने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से इस योजना को मंजूरी दी गई है।

current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि वर्ष 2020 में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा एक 1,480 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय से ‘राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन’ की स्थापना को मंजूरी दी गई थी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. तकनीकी वस्त्र क्या होते हैं?
  2. विशेषताएं
  3. प्रकार
  4. लाभ
  5. ‘उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई)’ योजना के बारे में
  6. योजना के तहत प्रोत्साहन
  7. किस तरह के निवेश पर विचार किया जाएगा?
  8. योजना की अवधि
  9. कार्यान्वयन

मेंस लिंक:

तकनीकी वस्त्रों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

बिहार में अवैध शराब निर्माण की निगरानी हेतु उपाय


संदर्भ:

बिहार सरकार द्वारा राज्य में अवैध शराब निर्माण पर निगरानी के लिए कई उपाय किए जा रहे हैं। इनमें से कुछ उपाय निम्नलिखित हैं:

  • ड्रोन (Drones) का उपयोग।
  • शराबबंदी कानूनों के उल्लंघन से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए राज्य की 74 विशेष अदालतों में पीठासीन अधिकारियों के रूप में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति।
  • निषेध और पंजीकरण विभाग द्वारा अप्रैल 2016 से अब तक 5 लाख से अधिक लोगों को कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है। सैकड़ों पुलिसकर्मियों और अन्य अधिकारियों को भी, या तो निलंबित कर दिया गया है या विभागीय जांच का सामना करना पड़ रहा है।

शराबबंदी के खिलाफ दिए जाने वाले मुख्य तर्काधार:

  • ‘शराबबंदी’ (Prohibition of Liquor), ‘निजता के अधिकार’ का उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में पुट्टस्वामी फैसले में ‘निजता के अधिकार’ की व्याख्या करते हुए इसे मान्यता दी थी। यह अधिकार नागरिकों के अपनी पसंद के अनुसार खाने-पीने के अधिकार से जुड़ा है।
  • प्रत्यक्ष मनमानी का आधार: ‘शराबबंदी कानून’ के तहत, राज्य के बाहर से आने वाले पर्यटकों को स्वास्थ्य परमिट और अस्थायी परमिट प्रदान किया जाता है। याचिका में कहा गया है, कि इस प्रकार राज्य द्वारा निर्मित अलग-अलग ‘वर्गों’ में, शराब पीने वालों और नहीं पीने वालों, में कोई स्पष्ट अंतर नहीं है, तथा यह संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन है।

इस तरह का प्रतिबंध को समय की आवश्यकता बताने वाले तर्क:

  1. संविधान में सभी राज्य सरकारों पर “मद्यपान को रोकने, अथवा कम-से-कम इस पर नियंत्रण करने की जिम्मेदारी” सौंपी गयी है (अनुच्छेद 47)।
  2. शराब के नियमित और अत्यधिक सेवन को हतोत्साहित करने के लिए राज्य में सख्त क़ानून होना अनिवार्य है।
  3. शराब की वजह से ‘पारिवारिक संसाधन और जमा-पूंजी’ नष्ट हो जाती है, और इसका परिणाम सर्वाधिक महिलाओं और बच्चों को भुगतना पड़ता है। जहां तक ​​परिवारिक इकाई का संबंध है, शराब के सेवन से कम से कम एक सामाजिक कलंक अभी भी जुड़ा हुआ है।
  4. कमजोर व्यक्ति, कभी कच्ची उम्र के कारण या नशे की ओर झुकाव या साथियों के दबाव की वजह से अक्सर, इस प्रलोभन के शिकार होते हैं।

मद्यनिषेध क़ानून लागू करने वाले अन्य राज्य:

वर्तमान में, गुजरात, मिजोरम, नागालैंड और केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में शराबबंदी लागू है।

संबंधित संवैधानिक प्रावधान:

  1. राज्य सूची का विषय: मद्य अथवा शराब, भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत ‘राज्य सूची’ का विषय है।
  2. अनुच्छेद 47: भारत के संविधान में नीति-निदेशक सिद्धांत में कहा गया है कि “राज्य, विशिष्टतया, मादक पेयों और स्वास्नय के लिए हानिकर ओषधियों के, औषधीय प्रयोजनों से भिन्न, उपभोग का प्रतिषेध करने का प्रयास करेगा।”

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपको ‘उचित वर्गीकरण का सिद्धांत’ (Doctrine of Reasonable Classification) के बारे में जानकारी है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. प्रमुख प्रावधान
  2. अपवाद
  3. दंड
  4. शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने वाले अन्य राज्य।

मेंस लिंक:

गुजरात निषेध अधिनियम, 1949 से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन-III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

रिज़र्व बैंक द्वारा क्रिप्टोकरेंसी पर पूर्ण प्रतिबंध लगाए जाने का विचार


संदर्भ:

वर्ष 2013 में क्रिसमस की पूर्व संध्या पर, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भारतीयों को क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) के वित्तीय, कानूनी और सुरक्षा जोखिमों के बारे में चेतावनी देते हुए एक नोट जारी किया गया था। आरबीआई की यह चेतावनी, दुनिया की पहली क्रिप्टोकरेंसी ‘बिटकॉइन’ के लॉन्च होने के चार साल बाद जारी की गयी थी। आठ साल बाद, क्रिप्टोकरेंसी को लेकर ‘केंद्रीय बैंक’ का विरोध और मजबूत हो गया है।

इस महीने की शुरुआत में, आरबीआई ने अपने बोर्ड को बताया कि क्रिप्टोकरेंसी पर ‘पूर्ण प्रतिबंध’ लगाए जाने की आवश्यकता है, क्योंकि अब आंशिक प्रतिबंध काम नहीं करेगा।

पृष्ठभूमि:

बिटकॉइन (Bitcoin) जैसी निजी क्रिप्टोकरेंसी, अभी तक किसी क़ानून के अंतर्गत नियमित नहीं हैं। एक जटिल प्रक्रिया के माध्यम से इसका खनन किया जाता है और इसकी कीमत अत्यधिक अस्थिर होती है। भारत में एक परिसंपत्ति वर्ग के रूप में प्रसार के बावजूद इस पर केंद्रीय नियामक की कड़ी नजर है।

भारत में क्रिप्टोकरेंसी की वर्तमान स्थिति:

क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) संबंधी मामलों पर गठित एक अंतर-मंत्रालयी समिति द्वारा, भारत में राज्य द्वारा जारी किसी भी आभासी मुद्राओं को छोड़कर, सभी निजी क्रिप्टोकरेंसी को प्रतिबंधित करने की सिफारिश की गयी है।

  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने भी बाजार में क्रिप्टोकरेंसी कारोबार पर चिंता जताई है और इसे केंद्र को अवगत कराया है।
  • मार्च 2020 में पुनः, सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों को, आरबीआई द्वारा वर्ष 2018 के सर्कुलर को अलग करते हुए, क्रिप्टोकरेंसी से संबंधित सेवाओं को बहाल करने की अनुमति दी थी। आरबीआई ने क्रिप्टोकरेंसी संबंधित सेवाओं को (“अनुरूपता” के आधार पर) प्रतिबंधित कर दिया था।

‘क्रिप्टोकरेंसी’ क्या होती हैं?

क्रिप्टोकरेंसी (Cryptocurrency) एक प्रक्रार की डिजिटल करेंसी होती है, जिसमे मुद्रा इकाइयों के उत्पादन को विनियमित करने तथा निधियों के अंतरण को सत्यापित करने के लिए कूटलेखन (Encryption) तकनीकों का उपयोग किया जाता है, और यह बगैर किसी केंद्रीय बैंक के अधीन, स्वतन्त्र रूप से संचालित होती हैं।

यह ब्लॉकचेन तकनीक पर कार्य करती हैं। उदाहरण: बिटकॉइन, एथेरियम आदि।

current affairs

 

आरबीआई, क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध क्यों लगाना चाहती है?

  1. संप्रभु प्रत्याभूत (Sovereign guarantee): क्रिप्टोकरेंसी उपभोक्ताओं के लिए जोखिम उत्पन्न करती है। इनके पास कोई सॉवरेन गारंटी / संप्रभु प्रत्याभूत नहीं होता है और इसलिए ये वैध मुद्रा नहीं होती हैं।
  2. बाजार में उतार-चढ़ाव (Market volatility): इनकी प्रत्याशित प्रकृति भी इन्हें अत्यधिक अस्थिर बनाती है। उदाहरण के लिए, बिटकॉइन का मूल्य दिसंबर 2017 में 20,000 अमेरिकी डॉलर से गिरकर नवंबर 2018 में 3,800 अमेरिकी डॉलर हो गया।
  3. सुरक्षा जोखिम: यदि किसी प्रकार से उपयोगकर्ता की अपनी निजी कुंजी खो जाती है (पारंपरिक डिजिटल बैंकिंग खातों के विपरीत, इसे पासवर्ड रीसेट नहीं किया जा सकता है) तो उपयोगकर्ता अपनी क्रिप्टोकरेंसी तक पहुंच खो देता है।
  4. मैलवेयर संबंधी धमकी: कुछ मामलों में, इन निजी कुंजियों को तकनीकी सेवा प्रदाताओं (क्रिप्टोकरेंसी एक्सचेंज या वॉलेट) द्वारा संग्रहीत किया जाता है, जो मैलवेयर या हैकिंग के प्रति संवेदनशील होते हैं।
  5. मनी लॉन्ड्रिंग।

एस सी गर्ग समिति की सिफारिशें (2019)

  1. किसी भी रूप में क्रिप्टोकरेंसी का खनन, स्वामित्व, लेन-देन या सौदा करने को प्रतिबंधित किया जाए।
  2. समिति के द्वारा, डिजिटल मुद्रा में विनिमय या व्यापार करने पर एक से 10 साल तक के कारावास का दंड की सिफारिश की गयी थी।
  3. समिति ने, सरकारी खजाने को हुए नुकसान या क्रिप्टोकरेंसी उपयोगकर्ता द्वारा अर्जित किए गए लाभ, जो भी अधिक हो, के तीन गुना तक मौद्रिक दंड का प्रस्ताव किया गया था।
  4. हालांकि, समिति ने सरकार से ‘भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा क्रिप्टोकरेंसी जारी करने की संभवना’ पर अपना दिमाग खुला रखने की सलाह भी दी गयी थी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘IOTA उलझन’ (IOTA Tangle) के बारे में सुना है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ब्लॉकचेन क्या है?
  2. क्रिप्टोकरेंसी क्या हैं?
  3. किन देशों द्वारा क्रिप्टोकरेंसी जारी की गई है?
  4. बिटकॉइन क्या है?

मेंस लिंक:

सेंट्रल बैंक डिजिटल करेंसी (CBDC) के लाभ और हानियों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

जीआई टैग


संदर्भ:

हाल ही में एक फर्म, ‘जीत ज़ीरो प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड’ द्वारा ‘अरुणाचल प्रदेश अपतानी वस्त्र उत्पादों’ उत्पाद के लिये ‘भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग’ (Geographical Indication – GI tag) दिए जाने हेतु आवेदन किया गया है।

अपतानी बुनाई:

  • ‘अपतानी बुनाई’ (Apatani weave) का कार्य अरुणाचल प्रदेश के लोअर सुबनसिरी ज़िले के मुख्यालय ज़ीरो वैली में निवास करने वाली ‘अपतानी जनजाति’ (Apatani Tribe) द्वारा किया जाता है।
  • इस जनजाति के लोगों द्वारा बुना गया कपड़ा अपने ज्यामितीय और ज़िगज़ैग पैटर्न तथा कोणीय डिज़ाइनों के लिए भी जाना जाता है।
  • यह जनजाति मुख्य रूप से जिग ज़ीरो और जिलान या जैकेट के रूप में जानी जाने वाली शॉल बुनती है जिसे सुपुंतरी (Supuntari) कहा जाता है।
  • यहाँ के लोग अपने पारंपरिक तरीकों से कपास के धागों को जैविक रूप से रंगने के लिए विभिन्न पत्तियों और पौधों जैसे संसाधनों का उपयोग करते हैं। केवल महिलाएँ ही इस पारंपरिक बुनाई कार्य में लगी हुई हैं।

 

जीआई टैग’ के बारे में:

  • भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication – GI), मुख्यतः, किसी एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र में उत्पादित, कृषि, प्राकृतिक अथवा निर्मित उत्पाद (हस्तशिल्प और औद्योगिक वस्तुएं) होते हैं।
  • आमतौर पर, इन उत्पादों का नाम गुणवत्ता और विशिष्टता का आश्वासन देता है, जोकि वास्तव में इनकी उत्पत्ति-स्थान विशेषता को अभिव्यक्त करता है।

 

जीआई टैग’ के लाभ:

एक बार जीआई सुरक्षा प्रदान किये जाने के बाद, किसी अन्य निर्माता द्वारा इससे मिलते-जुलते उत्पादों को बाजार में लाने के लिए, इनके नाम का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता है। यह संकेतक, ग्राहकों के लिए उत्पाद की गुणवत्ता और प्रामाणिकता सुनिश्चित करते हैं।

भौगोलिक संकेतक (GI) का पंजीकृत मालिक कौन होता है?

  • व्यक्तियों या उत्पादकों का कोई संघ, कानून के अंतर्गत अथवा इसके द्वारा निर्धारित संस्था अथवा प्राधिकरण, कोई भी भौगोलिक संकेतक (GI) का पंजीकृत मालिक हो सकता है।
  • भौगोलिक संकेतक रजिस्टर में इनका नाम, भौगोलिक संकेतक के लिए आवेदन किए जाने वाले उत्पाद के वास्तविक स्वामी के रूप में दर्ज किया जाता है।

भौगोलिक संकेतक पंजीकरण की वैधता अवधि:

  • किसी भौगोलिक संकेतक का पंजीकरण 10 साल की अवधि तक के लिए वैध होता है।
  • इसे समय-समय पर आगामी 10 वर्षों की अवधि के लिए नवीनीकृत किया जा सकता है।

भौगोलिक संकेतक संबंधी समझौते एवं विनियमन:

  1. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर: औद्योगिक परिसंपत्ति संरक्षण हेतु ‘पेरिस अभिसमय’ तहत भौगोलिक संकेतक बौद्धिक संपदा अधिकार (Intellectual Property Rights- IPR) के एक घटक के रूप में शामिल हैं। जीआई, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं’ (Trade Related Aspects of Intellectual Property Rights-TRIPS) समझौते द्वारा भी प्रशासित होते हैं।
  2. भारत में, भौगोलिक संकेतक पंजीकरण को वस्तुओं का भौगोलिक संकेतक (पंजीकरण और संरक्षण) अधिनियम, 1999 (Geographical Indications of Goods (Registration and Protection) Act, 1999) द्वारा प्रशासित होता है। यह अधिनियम सितंबर 2003 को लागू किया गया था। भारत में सबसे पहला जीआई टैग, वर्ष 2004-05 में, ‘दार्जिलिंग चाय’ को दिया गया था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भौगोलिक संकेतक (GI) टैग क्या होता है?
  2. जीआई टैग किसके द्वारा प्रदान किया जाता है?
  3. भारत में जीआई उत्पाद और उनके भौगोलिक स्थान
  4. अन्य बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR)

मेंस लिंक:

भौगोलिक संकेतक (GI) टैग क्या होता है? इसके महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


भारत में नए टीकों को मंजूरी

हाल ही में, भारत में कोविड महामारी के लिए दो टीकों और एक गोली (टेबलेट) को मंजूरी दी गयी है।

कॉर्बेवैक्स (CORBEVAX) और कोवोवैक्स (COVOVAX) नामक इन नवीनतम दोनों टीकों को ‘दवा नियामक सीडीएससीओ (CDSCO) द्वारा अनुमोदित किया गया है।

  • कॉर्बेवैक्स वैक्सीन, भारत का पहला स्वदेशी रूप से विकसित, कोविड-19 के खिलाफ RBD प्रोटीन सब-यूनिट वैक्सीन है। इसे हैदराबाद स्थित फर्म बायोलॉजिकल-ई द्वारा बनाया गया है।
  • नैनोपार्टिकल वैक्सीन, कोवोवैक्स को पुणे स्थित फर्म ‘सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया’ द्वारा निर्मित किया जाएगा।

अनुमोदित की गयी ‘एंटी-वायरल दवा’ का नाम ‘मोल्नुपिरावीर’ (MOLNUPIRAVIR) है।

इस अनुमोदन के साथ, देश में ‘आपातकालीन उपयोग अधिकार’ प्राप्त करने वाले कोविड टीकों की संख्या बढ़कर आठ हो गई है।

अब तक छह कोविड-19 टीके – सीरम इंस्टीट्यूट के कोविशील्ड, भारत बायोटेक के ‘कोवैक्सिन’, Zydus Cadila के ZyCoV-D, रूस के स्पुतनिक V और यूएस-निर्मित मॉडर्न और जॉनसन एंड जॉनसन – को ‘भारतीय दवा नियामक’ से आपातकालीन उपयोग अधिकार प्रदान किया जा चुका है।

केंद्र सरकार द्वारा ‘सोया खाद्य आवश्यक वस्तु सूची में शामिल

‘सोया खाद्य पदार्थों’ की घरेलू कीमतों को कम करने के लिए, सरकार ने ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955’ के तहत ‘सोया खाद्य’ को आवश्यक वस्तु घोषित करते हुए एक अधिसूचना जारी की है।

  • सरकार के इस निर्णय से बाजार में सोया निर्मित खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की संभावना वाली किसी भी अनुचित गतिविधि (जैसे जमाखोरी, कालाबाजारी आदि) पर लगाम लगने की उम्मीद है।
  • सोयाबीन, भोजन में सबसे महत्वपूर्ण प्रोटीन स्रोत है, इसका उपयोग कृषि-कार्यों में काम आने वाले जानवरों को खिलाने के लिए किया जाता है। कुछ देशों में इसका उपयोग मानव उपभोग के लिए भी किया जाता है। सोयाबीन खाद्य, सोयाबीन तेल के निष्कर्षण का उप-उत्पाद से निर्मित होता है।

जम्मू-कश्मीर रियल एस्टेट क्षेत्र

केंद्र सरकार और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर की सरकार ने, हाल ही में, जम्मू में आयोजित पहले ‘जम्मू और कश्मीर रियल एस्टेट सम्मेलन’ में रियल एस्टेट के दिग्गजों से निवेश आकर्षित करने के लिए एक बड़ा कदम उठाते हुए, देश के सभी नागरिकों के लिए “दूसरा घर तथा गर्मियों के लिए घर बनाने” हेतु स्थानीय अचल संपत्ति (real estate) को खोलने का फैसला किया है।

  • हाल ही में लागू किए गए ‘जम्मू और कश्मीर विकास अधिनियम’ के तहत, एक मानदंड के रूप में ‘राज्य के स्थायी निवासी’ शब्द को हटा दिया गया है, जिससे जम्मू और कश्मीर के बाहर के निवेशकों के लिए केंद्र शासित प्रदेश में निवेश करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है।
  • परिणामस्वरूप, भारत का कोई भी नागरिक जम्मू और कश्मीर में गैर-कृषि भूमि खरीद सकता है।

 


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