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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 24 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता

2. भारत द्वारा म्यांमार में लोकतंत्र को शीघ्र बहाल किए जाने की मांग

3. चीन-हांगकांग द्विपक्षीय संबंध

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ‘मीनदम मंजअप्पाई’ योजना

2. राष्ट्रीय जांच एजेंसी

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. तब्लीगी जमात

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता


संदर्भ:

भारत और ऑस्ट्रेलिया के मध्य द्विपक्षीय ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते’ (Comprehensive Economic Cooperation Agreement – CECA) के संबंध में वार्ता तीव्र गति से जारी है।

Current Affairs

 

भारत-ऑस्ट्रेलिया द्विपक्षीय व्यापार:

  1. वित्त वर्ष 2011 में भारत द्वारा ऑस्ट्रेलिया के लिए $4.04 बिलियन कीमत का निर्यात किया गया था, जबकि ऑस्ट्रेलिया से $8.24 बिलियन का आयात किया गया।
  2. ऑस्ट्रेलिया को निर्यात किए जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में पेट्रोलियम उत्पाद, दवाएं, पॉलिश किए गए हीरे, सोने के आभूषण, परिधान आदि शामिल थे, जबकि ऑस्ट्रेलिया मुख्यतः कोयला, तरल नाइट्रोजन गैस (LNG), एल्यूमिना और गैर-मौद्रिक सोना, आदि का आयात किया गया।
  3. सेवा क्षेत्र में, भारत द्वारा किए गए निर्यात में यात्रा, दूरसंचार और कंप्यूटर, सरकारी और वित्तीय सेवाएं आदि शामिल थी, जबकि ऑस्ट्रेलिया से होने वाले सेवा क्षेत्रक आयात में मुख्यतः शिक्षा और निजी यात्राएँ शामिल थी।
  4. वर्ष 2020 में भारत, मुख्यतः कोयला और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा के व्यापार की वजह से, ऑस्ट्रेलिया का सातवां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार तथा छठा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य देश था।

इंस्टा जिज्ञासु:

CECA और CEPA के मध्य अंतर:

  1. CECA का तात्पर्य ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता’ (Comprehensive Economic Cooperation Agreement) होता है, जबकि
  2. CEPA का तात्पर्य ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता’ (Comprehensive Economic Partnership Agreement) से है।

CECA और CEPA के बीच प्रमुख “तकनीकी” अंतर यह है, कि ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते’ (CECA) में ‘नकारात्मक सूची’ और टैरिफ दर कोटा (TRQ) में शामिल मदों को छोड़कर, सूचीबद्ध/सभी वस्तुओं पर चरणबद्ध तरीके से केवल “टैरिफ में कमी/उन्मूलन” को शामिल किया जाता है।

  • ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता’ (CEPA) के अंतर्गत, सेवाओं, निवेश तथा ‘आर्थिक साझेदारी के अन्य क्षेत्रों’ में व्यापार को भी शामिल किया जाता है।
  • अतः CEPA, ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते’ (CECA) की तुलना में अधिक व्यापक होता है, और इसका विस्तार अधिक होता है।
  • आमतौर पर, किसी देश के साथ पहले ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौते’ (CECA) पर हस्ताक्षर किए जाते हैं और उसके बाद ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता’ (CEPA) के लिए बातचीत शुरू की जाती है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता’ (CECA) के बारे में
  2. ‘व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता’ (CEPA) के बारे में
  3. अन्य देशों के साथ भारत के ‘मुक्त व्यापार समझौते’ (FTAs)।

मेंस लिंक:

भारत-ऑस्ट्रेलिया ‘व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता’ (CECA) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

भारत द्वारा म्यांमार में लोकतंत्र को शीघ्र बहाल किए जाने की मांग


संदर्भ:

हाल ही में, भारत ने म्यांमार के सैन्य शासकों इस बात से अवगत करा दिया है, कि वह म्यांमार में लोकतंत्र की शीघ्र वापसी चाहता है।

संबंधित प्रकरण:

विरोध करने वाले नागरिकों पर हिंसक कार्रवाई किए जाने के कारण, म्यांमार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ गया है।

भारत की मांगें:

  1. म्यांमार में लोकतंत्र की शीघ्रातिशीघ्र वापसी;
  2. हिरासत में लिए गए व्यक्तियों और बंदियों की रिहाई;
  3. वार्ता के जरिए मुद्दों का समाधान;
  4. सभी प्रकार की हिंसा की पूर्ण समाप्ति।

भारत के इस कदम का महत्व:

2 फरवरी से ही, भारत द्वारा म्यांमार में लोकतांत्रिक तत्वों के खिलाफ जारी सैन्य अभियान पर चिंता व्यक्त की जा रही है। लेकिन, इस हालिया बयान का अतिरिक्त महत्व है, क्योंकि पहली बार सरकार ने संकेत दिया है, कि भारत इस संकट को समाप्त करने के लिए विभिन्न पक्षों के बीच मध्यस्थता करने के लिए तैयार है।

म्यांमार में हो रही हालिया घटनाएँ:

इसी वर्ष 1 फरवरी को, म्यांमार की सेना ने नोबेल पुरस्कार विजेता ‘आंग सान सू की’ की लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार के खिलाफ तख्तापलट कर दिया था। सेना ने पिछले साल नवंबर में हुए चुनावों में ‘आंग सान सू की’ की सत्ताधारी पार्टी पर धोखाधड़ी का आरोप लगाया था।

हालांकि, सेना द्वारा लगाए गए इस आरोप को देश के पिछले चुनाव आयोग और अंतरराष्ट्रीय निगरानीकर्ताओं ने खारिज कर दिया है।

‘संयुक्त राष्ट्र’ में म्यांमार पर भारत का दृष्टिकोण:

भारत ने ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ (UNGA) में म्यांमार के खिलाफ शस्त्र प्रतिबंध लगाए जाने संबंधी प्रस्ताव पर होने वाले मतदान में भाग नहीं लिया।

इस प्रस्ताव के पक्ष में 119 देशों ने मतदान किया जबकि म्‍यांमार के पड़ोसी देश भारत, बांग्लादेश, भूटान, चीन, नेपाल, थाईलैंड और लाओस समेत 36 देशों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। बेलारूस एकमात्र ऐसा देश था जिसने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया।

भारत द्वारा मतदान में भाग नहीं लेने का कारण:

  1. भारत का कहना है, कि ‘महासभा’ द्वारा पारित किए जाने से पहले ‘मसौदा प्रस्ताव’ में हमारे विचार प्रतिबिंबित होते प्रतीत नहीं हो रहे थे।
  2. भारत का मानना है, कि इस प्रस्ताव को इस समय स्वीकृत करना ‘म्‍यांमार में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने की दिशा में हमारे संयुक्त प्रयासों के लिए अनुकूल नहीं है’।

संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव (UN Resolution) के बारे में:

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने म्‍यांमार की सैन्य सरकार के खिलाफ व्यापक वैश्विक विरोध प्रकट करते हुए एक प्रस्ताव पारित कर देश में सैन्य तख्तापलट की निंदा की है।

  • साथ ही प्रस्ताव में, म्‍यांमार के खिलाफ शस्त्र प्रतिबंध का आह्वान किया है और लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को बहाल करने की मांग की है।
  • प्रस्ताव में, म्यांमार के सशस्त्र बलों से 8 नवंबर, 2020 को हुए आम चुनाव के परिणामों द्वारा स्वतंत्र रूप से व्यक्त की गई लोगों की इच्छा का सम्मान करने की मांग की गई है।

भारत द्वारा म्यांमार के संदर्भ में ‘आसियान’ द्वारा की जा रही एक पहल तथा पांच सूत्रीय सहमति’ का समर्थन किया जा रहा है:

इसमें शामिल है:

  1. हिंसा पर तत्काल रोक
  2. शांतिपूर्ण समाधान हेतु म्यांमार में सभी हितधारकों के बीच संवाद
  3. मध्यस्थता हेतु एक विशेष आसियान प्रतिनिधि की नियुक्ति
  4. म्यांमार के लिए सहायता प्रदान करना
  5. आसियान प्रतिनिधि द्वारा म्यांमार का दौरा

म्यांमार के हालातों पर भारत को क्यों चिंतित होना चाहिए?

  • भारत के लिए, म्यांमार की स्थिति के संदर्भ में काफी कुछ दांव पर लगा हुआ है, क्योंकि म्यांमार के भीतर अस्थिरता का माहौल बने रहने से पूर्वोत्तर क्षेत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
  • म्यांमार में गुरिल्ला समूहों / छापामार संगठनों द्वारा अपनी गतिविधियों को फिर से शुरू करने के संबंध में खबरें मिल रही हैं, और देश में कानून और व्यवस्था के भंग होने से पूर्वोत्तर भारत में आतंकवादी समूहों को मौके का लाभ उठाने का अवसर मिल जाएगा।

भारत की अगली प्रतिक्रिया:

भारत की प्रतिक्रिया इस बार अलग होने की संभावना है। भारत म्यांमार में लोकतंत्र की परवाह करता है और इसका महत्व जानते हुए भी वह सैन्य तख्तापलट का विरोध करने का जोखिम नहीं उठा सकता है। क्योंकि:

  • म्यांमार की सेना के साथ भारत के सुरक्षा संबंध काफी प्रगाढ़ हो चुके हैं, और भारत के लिए, उत्तर पूर्वी सीमाओं को विद्रोही समूहों से सुरक्षित करने में म्यांमार सेना की सहायता की जरूरत को देखते हुए ‘संबंधों के पुल’ को जलाना मुश्किल होगा।
  • ‘आंग सान सू की’ की छवि में बदलाव: लोकतंत्र की प्रतीक और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता के रूप में सुश्री ‘सू की’ की छवि उनके कार्यकाल के दौरान काफी धूमिल हो चुकी है। वर्ष 2015 में अपने कार्यकाल में सुश्री ‘सू की’ सेना रखाइन राज्य में रोहिंग्या समुदाय पर नृशंसता करने से रोकने में विफल रहीं और उन्होंने इस मामले से सेना का बचाव भी किया था।
  • चीन के लिए लाभ: अमेरिका की तरह भारत की कठोर प्रतिक्रिया से मुख्यतः चीन को लाभ होगा। अमेरिका ने, सेना द्वारा किये गए कब्जे को समाप्त नहीं करने पर, “तख्तापलट” के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की धमकी दी है।
  • रणनीतिक चिंताओं के अलावा, भारत ने म्यांमार में कई अवसंरचना एवं विकास परियोजनाओं में निवेश किया है। भारत इन परियोजनाओं के लिए ‘आसियान देशों तथा पूर्व के प्रवेश द्वार’ के रूप में देखता है (उदाहरणार्थ: भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग और कलादान बहु-मोडल पारगमन परिवहन नेटवर्क, सीटवे डीप वाटर पोर्ट (Sittwe deep-water port) पर एक विशेष आर्थिक क्षेत्र परियोजना)।
  • इसके अलावा, भारत के लिए अभी भी बांग्लादेश में पलायन करने वाले रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे को सुलझाने में मदद करने की उम्मीद है, और इस विषय पर म्यांमार सरकार से वार्ता जारी रखना चाहेगा। भारत में भी कुछ रोहिंग्या शरणार्थियों ने पलायन किया है।

म्यांमार का सैन्य संविधान:

म्यांमार में सेना द्वारा वर्ष 2008 में एक संविधान का मसौदा तैयार किया गया था, और इसी वर्ष अप्रैल में इस पर संदेहास्पद जनमत संग्रह कराया गया था।

  • यह संविधान, सेना द्वारा तैयार किया गया ‘लोकतंत्र का रोडमैप’ था, जिसे सेना ने पश्चिमी देशों के दबाव के कारण निर्मित किया था।
  • इसके अलावा, सैन्य शासन के लिए यह अहसास भी हो चुका था कि म्यांमार को बाहरी दुनिया के लिए खोलना अब एक विकल्प नहीं बल्कि एक गंभीर जरूरत भी है।
  • लेकिन सेना ने संविधान में अपनी भूमिका और राष्ट्रीय मामलों में वर्चस्व को सुनिश्चित कर लिया था।
  • संविधान के प्रावधानों के तहत, संसद के दोनों सदनों में 25 प्रतिशत सीटें सेना के लिए आरक्षित की गयी है, जिन पर सैन्य अधिकारियों को नामित किया जाता है।

साथ ही, एक प्रतिनिधि राजनीतिक दल का गठन किया गया जो सेना की ओर से चुनावों में भाग लेता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र में कोई भी निर्णय किस प्रकार लिए जाते हैं? इस बारे में जानकारी के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. म्यांमार के बारे में
  2. इसका संविधान
  3. भारतीय संविधान से तुलना
  4. UNGA के बारे में
  5. संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न संगठन

मेंस लिंक:

पड़ोसी देशों के प्रति भारत की नीति पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

 चीन-हांगकांग संबंध


संदर्भ:

हाल ही में, ‘तियानमेन चौक नरसंहार’ के शिकार व्यक्तियों की याद में बनाए गए एक स्मारक ‘पिलर ऑफ शेम’ (Pillar of Shame) को चीन ने ध्वस्त कर दिया है।

Current Affairs

 

पिलर ऑफ शेम:

‘पिलर ऑफ शेम’ (Pillar of Shame), तियानमेन नरसंहार की याद दिलाने वाली एक आठ मीटर ऊँची पत्थर की मूर्ति है, जिसपर खोखली आंखों और खुले मुंह सहित परस्पर गुंथे हुए कई मानव शरीर – पीड़ित मानवता- उत्कीर्ण किए गए हैं। इस कलाकृति को, जून 1989 को तियानमेन स्क्वायर पर चीन की कार्रवाई के शिकार व्यक्तियों को एक श्रद्धांजलि के रूप में डेनिश कलाकार जेन्स गैल्सचियोट द्वारा बनाया गया था।

संबंधित प्रकरण:

  • यह प्रतिमा 1997 से हांगकांग विश्वविद्यालय (HKU) में अवस्थित थी, जिसे विक्टोरिया पार्क में हांगकांग में वार्षिक रूप से होने वाले ‘जून विजिल्स’ (June vigils) नामक एक कार्यक्रम के तुरंत बाद स्थापित किया गया था। इस पार्क में हर साल हजारों लोग, ‘तियानमेन नरसंहार’ को याद करने के लिए एकत्र होते हैं।
  • यह विजिल अपने आप में ही “एक देश, दो प्रणाली” (One Country, Two Systems) मॉडल के तहत हांगकांग की विशेष स्थिति का प्रतीक है। विदित हो कि, चीन की मुख्य भूमि पर ‘4 जून’ की घटना की याद में कार्यक्रम आयोजित करना प्रतिबंधित है। जबकि ‘वन कंट्री टू सिस्टम’ मॉडल के तहत हांगकांग में इस तरह के कार्यक्रम आयोजित करने की छूट है।
  • इस साल जून में पुलिस ने पार्क की घेराबंदी कर दी, और पहली बार ‘जून विजिल’ नहीं हुई थी।

यदि ‘विजिल’ पर लगायी गयी रोक को ‘हांगकांग की विशिष्ट स्वतंत्रताओं’ में से एक को समाप्त किए जाने के प्रतीक के रूप में देखा जाए, तो इस प्रतिमा को हटाने को अब इस सूची में जोड़ा जा सकता है।

हांगकांग में हुए हालिया बदलाव:

  • बीजिंग द्वारा जून 2020 में एक नया राष्ट्रीय सुरक्षा कानून पारित किए जाने के बाद, हाल ही के महीनों में, हांगकांग में समाचार पत्रों को बंद करने और स्कूलों और कॉलेजों में पाठ्यक्रम में समग्र परिवर्तन, आदि जैसे बदलाव बड़ी सख्ती और तेजी से किए जा रहे हैं। नए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में, विद्रोह करने या तोड़फोड़ करने पर कठोर दंड का प्रावधान किया गया है।
  • इस कानून के पारित होने के बाद, हांगकांग में वर्ष 2019 में लोकतंत्र समर्थक विरोध प्रदर्शन हुए, जिसमें ‘मुख्य कार्यकारी’ के शीर्ष पद के लिए प्रत्यक्ष चुनाव करवाए जाने की मांग की गयी थी। वर्तमान में इस पद पर ‘मुख्य कार्यकारी’ को नामित किया जाता है।
  • बीजिंग ने चुनावी प्रणाली में भी पूरी तरह से बदलाव कर दिया है। जिसके तहत, हांगकांग की विधान परिषद (Legislative Council – LegCo) में प्रत्यक्ष निर्वाचित प्रतिनिधियों की हिस्सेदारी को 50% से घटाकर 22% कर दी गयी है। नए नियमों के तहत, एक ‘समीक्षा समिति’ का गठन किया गया है, जो किसी पद पर निर्वाचित होने के लिए केवल “देशभक्त” उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने को सुनिश्चित करेगी।

हांगकांग का प्रशासन किस प्रकार से होता है?

हांगकांग, ‘एक देश दो प्रणाली’ (One Country Two Systems) पद्धति से प्रशासित होता है। ‘हांगकांग’ और ‘मकाऊ’ विशेष प्रशासनिक क्षेत्र हैं और दोनों पूर्व उपनिवेश रह चुके हैं।

नीति के अनुसार,  ‘हांगकांग’ और ‘मकाऊ’, चीनी जनवादी गणराज्य का हिस्सा होने के बावजूद, चीन की मुख्य भूमि की नीतियों से भिन्न आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था अपना सकते हैं।

  • हांगकांग, 1 जुलाई, 1997 से वापस चीन के नियंत्रण में आ गया था, और 20 दिसंबर, 1999 को ‘मकाऊ’ की संप्रभुता चीन को स्थानांतरित कर दी गई थी।
  • इन क्षेत्रों की अपनी मुद्राएं, आर्थिक और कानूनी प्रणालियां हैं, किंतु रक्षा और कूटनीति बीजिंग द्वारा तय की जाती है।
  • उनके लघु-संविधान 50 वर्षों तक – अर्थात हांगकांग के लिए 2047 तक और मकाऊ के लिए 2049 तक वैध है। इस अवधि के बाद की व्यवस्था अभी स्पष्ट नहीं है।

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विदेशी प्रतिबंधों का प्रत्युत्तर देने हेतु हांगकांग में चीनी कानून:

इस कानून को, बीजिंग की विधायिका के बजाय हांगकांग की विधायिका के माध्यम से पेश किए जाने का प्रस्ताव किया गया है। इस क़ानून को हांगकांग के ‘लघु-संविधान’ (mini-constitution) की परिशिष्ट में जोड़ा जाएगा। हांगकांग के ‘मिनी-कान्स्टिटूशन’ को ‘बेसिक लॉ’ के रूप में भी जाना जाता है।

‘प्रस्तावित कानून’ क्या है?

  1. बीजिंग द्वारा जून माह में एक कानून पारित किया गया था, जिसके तहत चीनी नागरिकों या संस्थाओं के खिलाफ भेदभाव करने या विभेदकारी तरीके लागू करने वाले व्यक्तियों या इकाईयों को चीनी सरकार की ‘प्रतिबंध-रोधी सूची’ (anti-sanctions list) में रखा जा सकता है।
  2. चीन के कानून के तहत, इस सूची में शामिल व्यक्तियों को चीन में प्रवेश से वंचित किया जा सकता है या देश से निष्कासित किया जा सकता है।
  3. क़ानून के तहत, चीन में ऐसे व्यक्तियों की संपत्ति को जब्त या निष्क्रय किया जा सकता है। इनके लिए चीन की संस्थाओं या नागरिकों के साथ कारोबार करने से भी प्रतिबंधित किया जा सकता है।

इस क़ानून को लागू करने की आवश्यकता:

संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ द्वारा, चीन पर व्यापार, हांगकांग और झिंजियांग के सुदूर पश्चिमी क्षेत्र को लेकर दबाव डालने की वजह से इस क़ानून को लाया गया है।

इस कानून से जुड़ी चिंताएं और मुद्दे:

आलोचकों ने चेतावनी देते हुए कहा है, कि हांगकांग द्वारा इस कानून को लागू करने से ‘वैश्विक वित्तीय केंद्र’ के रूप में इसकी प्रतिष्ठा कम हो सकती है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. हांगकांग के बारे में
  2. यह कब स्वतंत्र हुआ?
  3. ‘एक देश दो प्रणाली’ पद्धति के बारे में
  4. प्रस्तावित कानून की मुख्य विशेषताएं

मेंस लिंक:

प्रस्तावित कानून के निहितार्थों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मीनदम मंजअप्पाई’ योजना


संदर्भ:

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ बैग के बजाय कपड़े की थैलियों के उपयोग के बारे में जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से ‘मीनदम मंजअप्पाई’ (Meendum Manjappai) अभियान शुरू किया है।

तमिलनाडु सरकार पहले ही 14 तरह की प्लास्टिक सामग्री पर प्रतिबंध लगा चुकी है।

आवश्यकता:

प्लास्टिक सामग्री पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के प्रभावी होने के लिए प्रवर्तन होना महत्वपूर्ण है।

  • सरकार के लिए प्लास्टिक विकल्पों के उपयोग को विनियमित करने, पुनर्चक्रण में सुधार करने और बेहतर अपशिष्ट पृथक्करण प्रबंधन जैसी नीतियों, जैसे महत्वपूर्ण संरचनात्मक मुद्दों का समाधान करने की भी जरूरत है।
  • पुनर्चक्रण में सुधार के अलावा, इस समस्या से निपटने हेतु अन्य विकल्पों के लिए अनुसंधान और विकास में निवेश किया जाना भी प्राथमिकता में शामिल होना चाहिए।

सिंगल-यूज़ प्लास्टिक’ क्या है?

‘एकल उपयोग प्लास्टिक’ / ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ (Single-Use Plastic), निपटान-योग्य (Disposable) प्लास्टिक का एक रूप होती है, जिसे केवल एक बार इस्तेमाल करके फेंक दिया जाता है, और जिसे किराने की थैलियों, खाद्य पैकेजिंग, बोतलों और स्ट्रॉ आदि की तरह पुनर्चक्रित किया जा सकता है।

प्लास्टिक निर्मित सामग्री पर प्रतिबंध लगाए जाने के कारण:

चूंकि प्लास्टिक सस्ती, हल्की, और उत्पादन में आसान होती है, जिसकी वजह से पिछली शताब्दी के दौरान इसका उत्पादन में काफी तेज हुआ है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, आने वाले दशकों में यह प्रवृत्ति जारी रहने की संभवना है।

  • किंतु, अब लगभग सभी देश अपने द्वारा उत्पन्न प्लास्टिक कचरे की मात्रा के प्रबंधन हेतु संघर्ष कर रहे हैं।
  • पूरे भारत में, प्रतिदिन केवल लगभग 60% प्लास्टिक कचरा ही एकत्र किया जाता है- इसका मतलब है कि शेष 40% या 10,376 टन कचरे का एकत्रण नहीं किया जाता है।

पृष्ठभूमि:

2019 में, केंद्र सरकार ने वर्ष 2022 तक भारत को ‘एकल-उपयोग वाले प्लास्टिक’ से मुक्त करने के लिए, देश भर में ‘सिंगल-यूज प्लास्टिक’ के उपयोग को हतोत्साहित करने के लिए एक बहु-मंत्रालयी योजना तैयार की थी।

रणनीति:

एक सरकारी समिति द्वारा ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ (SUP) निर्मित वस्तुओं को, उनकी उपयोगिता और पर्यावरणीय प्रभाव सूचकांक के आधार पर, प्रतिबंधित करने के लिए चिह्नित किया गया है। समिति ने इसके लिए तीन चरणों में प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव पेश किया है:

  1. चरणबद्ध तरीके से हटाये जाने हेतु प्रस्तावित ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ निर्मित वस्तुओं की पहली श्रेणी में, गुब्बारे, झंडे, कैंडी, आइसक्रीम और ‘इअर बड्स’ (ear buds) में प्रयुक्त प्लास्टिक की डंडियां तथा सजावट में प्रयुक्त होने वाले थर्मोकोल को शामिल किया गया है।
  2. दूसरी श्रेणी में, प्लेट, कप, गिलास और छुरी-काँटा, चम्मच, स्ट्रॉ और ट्रे जैसी कटलरी; मिठाई के डिब्बों की पैकिंग में प्रयुक्त झिल्लियों (films); निमंत्रण पत्र; सिगरेट के पैकेट और 100 माइक्रोन से कम मोटाई वाले प्लास्टिक बैनर शामिल होंगे। इस श्रेणी की वस्तुओं को 1 जुलाई, 2022 से प्रतिबंधित करने का प्रस्ताव किया गया है।
  3. प्रतिबंधित ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ की तीसरी श्रेणी में, 240 माइक्रोन से कम मोटाई के गैर-बुनाई दार थैलियों को शामिल किया गया है। इसे अगले साल सितंबर से शुरू करने का प्रस्ताव है।

आने वाली चुनौतियां:

  • संपूर्ण भारत में प्रति दिन लगभग 26,000 टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसमे से 10,000 टन से अधिक कचरे को एकत्र नहीं किया जाता है; इसे देखते हुए ‘सिंगल यूज़ प्लास्टिक’ को प्रतिबंधित करना, कोई आसान काम नहीं होगा।
  • काफी बड़ी मात्रा में प्लास्टिक को नदियों, महासागरों और अपशिष्ट भरावक्षेत्र में फेंक दिया जाता है।

आवश्यकता:

  1. सरकार के लिए इससे निपटने हेतु, पहले आर्थिक और पर्यावरणीय लागत-लाभ का संपूर्ण विश्लेषण करना चाहिए।
  2. इस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंध की सफलता के लिए योजना को सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को ध्यान में रखना चाहिए।
  3. चूंकि, हमारे पास संसाधनों कमी है, अतः हमें बेहतर पुनर्चक्रण नीतियों की आवश्यकता है और इसके अलावा, एक व्यापक रणनीति बनाने की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘प्लास्टिक खाने वाले बैक्टीरिया’ के बारे में जानते हैं? क्या इससे प्लास्टिक प्रदूषण की बढ़ती समस्या का समाधान हो सकता है? इस संदर्भ में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ क्या होती है?
  2. उपयोग
  3. भारत का लक्ष्य
  4. ‘सिंगल यूज प्लास्टिक’ के उपयोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की योजना बना रहे अन्य देश

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न सुरक्षा बल और संस्थाएँ तथा उनके अधिदेश।

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण


संदर्भ:

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (National Investigation Agency- NIA), द्वारा इस साल जून महीने में जम्मू-कश्मीर के भटिंडी में एक ‘इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस’ (improvised explosive device – IED) की बरामदगी के संबंध में तीन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गयी है।

पृष्ठभूमि:

जांच के दौरान यह पाया गया, कि तीनों आरोपी व्यक्ति व्हाट्सएप के माध्यम से पाकिस्तान स्थित अपने आकाओं से निर्देश प्राप्त कर रहे थे। जांच में भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने के लिए सुरक्षा कर्मियों और सार्वजनिक स्थानों को निशाना बनाने के लिए, कश्मीर में बड़ी संख्या में कट्टरपंथी युवाओं को सक्रिय करने और भर्ती करने की योजना संबंधी एक बड़ी साजिश का पता चला है।

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (NIA):

राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण (National Investigation Agency- NIA) को आमतौर पर ‘राष्ट्रीय जाँच एजेंसी’ (NIA) के नाम से जाना जाता है।

यह निम्नलिखित मामलों में अपराधों की जाँच करने तथा अभियोग चलाने हेतु एक केंद्रीय एजेंसी है:

  1. भारत की संप्रभुता, सुरक्षा एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध को प्रभावित करने वाले अपराध।
  2. परमाणु और परमाणु प्रतिष्ठानों के विरुद्ध अपराध।
  3. उच्च गुणवत्तायुक्त नकली भारतीय मुद्रा की तस्करी।

इसके अतिरिक्त NIA ‘केंद्रीय आतंकवाद विरोधी कानून प्रवर्तन एजेंसी’ (Central Counter Terrorism Law Enforcement Agency) के रूप में भी कार्य करती है।

  • इसे राज्यों की विशेष अनुमति के बगैर, राज्यों में आतंकवाद संबंधित अपराधों से निपटने हेतु शक्ति प्राप्त है।
  • NIA की स्थापना राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम 2008 के तहत की गयी है।
  • यह गृह मंत्रालय के अधीन कार्य करती है।

अधिकार-क्षेत्र:

  • राज्य सरकार, किसी मामले की जांच को NIA के लिए सौंपने हेतु केंद्र सरकार से आग्रह कर सकती है, बशर्ते ‘मामला’ NIA अधिनियम की अनुसूची में निहित अपराधों के अंर्तगत आता हो।
  • केंद्र सरकार, NIA के लिए भारत में कहीं भी और किसी भी अधिसूचित अपराध की जांच करने का आदेश भी दे सकती है।

संरचना: राष्ट्रीय जाँच एजेंसी’ (NIA) के अधिकारियों को भारतीय पुलिस सेवा और भारतीय राजस्व सेवा से लिया जाता है।

NIA विशेष न्यायालय (Special Courts)

केंद्र सरकार NIA अधिनियम के तहत कई विशेष न्यायालयों को अधिसूचित किया गया है।

  • किसी विशेष न्यायालय के अधिकार क्षेत्र पर किसी भी प्रश्न की स्थिति में इसे केंद्र सरकार द्वारा निर्णय किया जाता है।
  • विशेष न्यायालय की अध्यक्षता एक न्यायाधीश द्वारा की जाती है जिसकी नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा संबंधित क्षेत्र के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर की जाती है।
  • भारत के उच्चत्तम न्यायालय को किसी विशेष न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले को, उस राज्य के अथवा किसी अन्य राज्य के, विशेष न्यायालय को स्थांतरित करने की शक्ति प्राप्त है।

NIA विशेष न्यायालयों की शक्तियां:

NIA के विशेष न्यायालयों को किसी भी अपराध की सुनवाई के लिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत सत्र न्यायालयों की शक्तियां व अधिकार प्राप्त हैं।

अपील:

विशेष न्यायालय के, किसी भी निर्णय, सजा या आदेश, के विरुद्ध तथ्यों और कानून पर आधारित अपील उच्च न्यायालय में की जा सकती है। राज्य सरकारों को भी अपने राज्यों में एक या एक से अधिक विशेष अदालतों को नियुक्त करने का अधिकार दिया गया है।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


तब्लीगी जमात

  • वस्तुतः ‘तब्‍लीगी जमात’ (Tablighi Jamaat) अर्थ, धर्म का प्रसार करने वाला समाज होता है। यह एक रूढ़िवादी मुस्लिम संगठन है।
  • यह एक सुन्नी इस्लाम धर्म-प्रचारक आंदोलन है। इसका उद्देश्य आम मुसलमानों तक पहुंचना और विशेष रूप से अनुष्ठान, पोशाक और व्यक्तिगत व्यवहार के मामलों में उनके विश्वास को पुनर्जीवित करना है।
  • बांग्लादेश, पाकिस्तान, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर सहित विभिन्न देशों में इसका महत्वपूर्ण आधार है।

आंदोलन का आरंभ:

  • ‘तब्‍लीगी जमात’ की शुरुआत, वर्ष 1926 में मेवात (हरियाणा) में प्रमुख इस्लामी विद्वान मौलाना मुहम्मद इलियास खंडलाव द्वारा की गयी थी।
  • इसकी जड़ें, धर्मशास्त्र के हनफ़ी संप्रदाय के देवबंदी संस्करण में निहित हैं।
  • मौलाना इलियाज ने देवबंद और सहारनपुर के कई युवकों को प्रशिक्षित कर मेवात भेज दिया, जहां तब्लीगी जमात द्वारा मदरसों और मस्जिदों का एक नेटवर्क स्थापित किया गया है।

तब्लीगी जमात, निम्नलिखित छह सिद्धांतों पर आधारित है:

  1. कलीमा (Kalimah), अर्थात एक धार्मिक लेख, जिसमें तब्लीग स्वीकार करता है कि अल्लाह के अलावा कोई ईश्वर नहीं है और पैगंबर मुहम्मद उसके दूत हैं।
  2. सलात (Salaat), या रोज़ाना पाँच बार नमाज़।
  3. इल्म (ILM) और धिक्र (DHIKR), अल्लाह को याद करना और उसके बारे में ज्ञान सभाएं करना, यह इस प्रकार समुदाय और पहचान की भावना को बढ़ावा देता है।
  4. इकराम-ए-मुस्लिम (Ikram-i-Muslim), अर्थात साथी मुसलमानों के साथ सम्मान से पेश आना।
  5. इखलास-ए-नियत (Ikhlas-i-niyat), या ईमानदार इरादे।
  6. दावत-ओ-तबलीग (Dawat-o-tabligh), या धर्मांतरण।

इसके कामकाज की आलोचना का कारण:

यद्यपि, इस संगठन का दायरा ‘मुस्लिम आस्था’ के प्रसार तक सीमित प्रतीत होता है, फिर भी इस समूह पर कई बार कट्टरपंथी संगठनों से संबंध रखने का आरोप लगाया जाता रहा है। कुछ पर्यवेक्षकों के अनुसार, कट्टरपंथी संगठन इसके खुले संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठा सकते हैं। इसके अलावा, यह संगठन अपनी गतिविधियों के दायरे, सदस्यता या अपने वित्त के स्रोत के बारे में कोई जानकारी प्रकाशित नहीं करते हैं। हालांकि, ऐसा माना जाता है कि ‘तब्लीगी जमात’ दान पर यकीन नहीं करता है, और काफी हद तक, संगठन के वरिष्ठ सदस्य इसका वित्तपोषण करते हैं।

चर्चा का कारण:

मार्च 2020 में, दिल्ली में ‘तब्लीगी जमात’ के मुख्यालय में आयोजित एक धार्मिक सभा में शामिल होने वाले दर्जनों व्यक्तियों के कोविड-19 से संक्रमित होने के ‘सकारात्मक परीक्षण’ आने के बाद, यह संगठन  भारत में एक विवाद के केंद्र में रहा। हाल ही में, सऊदी अरब ने इस इस्लामिक मिशनरी संगठन को अपने देश में प्रतिबंधित कर दिया गया, जिससे यह एक बार फिर से चर्चा का विषय बन गया।


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