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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल

2. जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग

3. एनडीपीएस बिल

4. श्रम संहिताएं

5. भारत और ताइवान संबंध

 

सामान्य अध्ययन-III

1. ग्रीन हाइड्रोजन

2. जैविक विविधता अधिनियम, 2002 में परिवर्तन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. खुला क्षेत्रफल लाइसेंसिंग नीति

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर सवाल


संदर्भ:

हाल ही में, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) सुशील चंद्रा और अन्य निर्वाचन आयुक्त (Election Commissioners) राजीव कुमार और अनूप चंद्र पांडे द्वारा ‘प्रधान मंत्री कार्यालय’ (PMO) द्वारा बुलाई गयी एक ऑनलाइन वार्ता में भाग लेने पर, विपक्ष ने पांच राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों की निष्पक्षता पर सवाल उठाया है।

आलोचकों का कहना है, कि ‘निर्वाचन आयोग’ एक स्वतंत्र निकाय है और PMO द्वारा ‘निर्वाचन आयोग’ को इस तरह की वार्ता के लिए नहीं बुलाया जा सकता।

केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया:

‘निर्वाचन आयोग’ प्रशासनिक रूप से ‘विधि मंत्रालय’ के अंतर्गत आता है। ‘विधि मंत्रालय’ द्वारा जारी एक आधिकारिक संप्रेषण में उक्त प्रकरण के बारे में स्पष्टीकरण देते हुए कहा है, कि यह बैठक चुनावी सुधारों पर चर्चा के लिए बैठक बुलाई गई थी। साथ ही, मंत्रालय ने जोर देकर कहा है, कि यह बैठक मात्र एक “अनौपचारिक वार्ता” थी।

संबंधित मुद्दे:

  • ‘प्रधान मंत्री कार्यालय’ (PMO) द्वारा जारी “निर्देश’, निर्वाचन आयोग के स्वतंत्र कामकाज के बारे में चिंता उत्पन्न करते है। आनुक्रमिक ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्तों’ द्वारा ‘निर्वाचन आयोग’ की स्वायत्तता की रक्षा करने का जोशपूर्ण तरह से प्रयास किया जाता है।
  • खासकर, जब महत्वपूर्ण राज्यों में चुनाव नजदीक आ रहे है, ऐसे में इस “अनौपचारिक वार्ता” से आयोग की निष्पक्षता के बारे में भी सवाल उठते हैं।

संविधान में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारियां और शक्तियां:

निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक प्राधिकरण है, संविधान के अनुच्छेद 324 में निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारियां और शक्तियां निर्धारित की गयी हैं।

  • निर्वाचन आयोग, कार्यकारी हस्तक्षेप से मुक्त रहता है।
  • निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव आयोजित करने – चाहे आम चुनाव हों या उपचुनाव- हेतु चुनाव कार्यक्रम निर्धारित किए जाते हैं।
  • निर्वाचन आयोग ही, मतदान केंद्रों के स्थान, मतदाताओं के लिए मतदान केंद्रों का नियतन, मतगणना केंद्रों के स्थान, मतदान केंद्रों और मतगणना केंद्रों और इनके आसपास की जाने वाली व्यवस्थाओं और सभी संबद्ध मामलों पर निर्णय लेता है।
  • निर्वाचन आयोग के निर्णयों को उपयुक्त याचिकाओं के माध्यम से उच्च न्यायालयों और भारत के सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • लंबे समय से चली आ रही परंपरा और कई न्यायिक निर्णयों के अनुसार, एक बार चुनाव की वास्तविक प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद, न्यायपालिका चुनावों के वास्तविक संचालन में हस्तक्षेप नहीं करती है।

निर्वाचन आयोग और सरकार के बीच संप्रेषण:

  • निर्वाचन आयोग, चुनाव संबंधी मामलों पर सरकार (या तो अपने प्रशासनिक मंत्रालय अर्थात ‘विधि मंत्रालय’ या ‘गृह मंत्रालय’) के साथ, चुनाव के दौरान सुरक्षा बलों की तैनाती के लिए नौकरशाही के माध्यम से संप्रेषण (Communication) करता है।
  • ऐसे मामलों में, प्रायः गृह सचिव को ‘पूर्ण आयोग’ के समक्ष आमंत्रित किया जाता है, जिसमे तीनों निर्वाचन आयुक्त मौजूद रहते हैं।
  • विधि मंत्रालय द्वारा देश के कानून की बारीकियां सपष्ट की जाती है, और मंत्रालय से यह अपेक्षा की जाती है कि उसके द्वारा निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करने हेतु प्रद्दत संवैधानिक सुरक्षा का उल्लंघन नहीं किया जाएगा।

हाल ही में हुई इस प्रकार की घटनाएं:

  • वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान, मुख्य निर्वाचन आयुक्त सुनील अरोड़ा के नेतृत्व में निर्वाचन आयोग ने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को एक मामले में क्लीन चिट दी। जिसमे प्रधान मंत्री ने, लातूर में एक चुनावी रैली में सशस्त्र बलों की ओर से एक अपील के साथ अपने अभियान का संदर्भ दिया था।
  • 2019 के लोकसभा चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के कई उल्लंघन भी हुए हैं।
  • इस वर्ष, एक भयंकर महामारी के बीच चुनाव अभियानों पर प्रतिबंध लगाने में आयोग के विलंबित निर्णय पर भी सवाल उठे थे।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘विश्व निर्वाचन निकाय संगठन’ / ‘एसोसिएशन ऑफ वर्ल्ड इलेक्शन बॉडीज’ (Association of World Election Bodies – A-WEB) के बारे में सुना है? क्या भारत इसका सदस्य है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 243 तथा अनुच्छेद 324 में अंतर
  2. राज्य निर्वाचन आयोगों तथा भारत निर्वाचन आयोग की शक्तियों में समानताएं और अंतर
  3. निर्वाचन आयोगों के फैसलों के खिलाफ अपील
  4. संसद और राज्य विधानसभाओं के चुनाव तथा स्थानीय निकाय चुनाव में भिन्नता

मेंस लिंक:

क्या भारत में राज्य निर्वाचन आयोग, भारत निर्वाचन आयोग की भांति स्वतंत्र हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

जम्मू और कश्मीर परिसीमन आयोग


संदर्भ:

हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में, ‘जम्मू और कश्मीर परिसीमन आयोग’ (Jammu and Kashmir Delimitation Commission) द्वारा निम्नलिखित सिफारिशें की गयी हैं:

  1. जम्मू संभाग के लिए छह सीटें और कश्मीर संभाग के लिए एक सीट बढ़ायी जायें।
  1. अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों के लिए 16 सीटें आरक्षित की जायें।

निहितार्थ:

जम्मू-कश्मीर की विधानसभा में अब सदस्यों की संख्या 90 होगी। जबकि केंद्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर की विशेष संवैधानिक स्थिति समाप्त किए जाने से पहले राज्य की विधानसभा में 87 सदस्य होते थे।

इन सिफारिशों का आधार:

‘जम्मू एवं कश्मीर परिसीमन आयोग’ के अनुसार, इसकी अंतिम रिपोर्ट वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर तैयार की जाएगी, और रिपोर्ट में भौगोलिक स्थिति, दुर्गम इलाकों तथा वर्तमान में जारी ‘परिसीमन प्रक्रिया’ (Delimitation Exercise) हेतु संचार के साधनों और उपलब्ध सुविधाओं को भी ध्यान में रखा जाएगा।

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन प्रक्रिया- घटनाक्रम:

  1. जम्मू-कश्मीर में पहली परिसीमन प्रक्रिया वर्ष 1951 में एक परिसीमन समिति द्वारा निष्पादित की गई थी, और इसके तहत, तत्कालीन राज्य को 25 विधानसभा क्षेत्रों में विभक्त किया गया था।
  2. इसके पश्चात, वर्ष 1981 में पहली बार एक पूर्ण परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन किया गया था और इस आयोग द्वारा वर्ष 1981 की जनगणना के आधार पर वर्ष 1995 में अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की गेन थी। इसके बाद से, राज्य में कोई अब तक कोई परिसीमन नहीं हुआ है।
  3. वर्ष 2020 में जम्मू-कश्मीर के लिए, वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करने के लिए, एक ‘परिसीमन आयोग’ का गठन किया गया। इस आयोग को संघ-शासित प्रदेश में सात अन्य सीटों को जोड़ने तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति समुदायों को आरक्षण देने का आदेश दिया गया।
  4. नए परिसीमन के पश्चात, जम्मू-कश्मीर में सीटों की कुल संख्या 83 से बढ़ाकर 90 कर दी जाएगी। ये सीटें ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ (PoK) के लिए आरक्षित 24 सीटों के अतिरिक्त होंगी और इन सीटों को विधानसभा में खाली रखा जाएगा।

 

परिसीमन’ क्या होता है?

‘परिसीमन’ (Delimitation) का शाब्दिक अर्थ, ‘विधायी निकाय वाले किसी राज्य में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा निर्धारण प्रक्रिया’ होता है।

जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की आवश्यकता:

‘जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम’, 2019 (Jammu and Kashmir Reorganisation Act, 2019) के प्रावधानों के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा पिछले साल 6 मार्च को, केंद्रशासित प्रदेश के लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों को फिर से निर्धारित करने के लिए जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग का गठन किया गया था। विदित हो कि, इस अधिनियम के तहत राज्य को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख, केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया था।

परिसीमन प्रक्रिया’ का निष्पादन:

  • परिसीमन प्रक्रिया, एक उच्च अधिकार प्राप्त आयोग द्वारा संपन्न की जाती है। इस आयोग को औपचारिक रूप से परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) या सीमा आयोग (Boundary Commission) कहा जाता है।
  • परिसीमन आयोग के आदेशों को ‘क़ानून के समान’ शक्तियां प्राप्त होती है, और इन्हें किसी भी अदालत के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती है।

आयोग की संरचना:

‘परिसीमन आयोग अधिनियम’, 2002 के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त परिसीमन आयोग में तीन सदस्य होते हैं: जिनमे अध्यक्ष के रूप में उच्चतम न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश, तथा पदेन सदस्य के रूप में मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा इनके द्वारा नामित निर्वाचन आयुक्त एवं राज्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते है।

संवैधानिक प्रावधान:

  1. संविधान के अनुच्छेद 82 के अंतर्गत, प्रत्येक जनगणना के पश्चात् भारत की संसद द्वारा एक ‘परिसीमन अधिनियम’ क़ानून बनाया जाता है।
  2. अनुच्छेद 170 के तहत, प्रत्येक जनगणना के बाद, परिसीमन अधिनियम के अनुसार राज्यों को भी क्षेत्रीय निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजित किया जाता है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पूर्ववर्ती परिसीमन आयोग- शक्तियाँ और कार्य
  2. आयोग की संरचना
  3. आयोग का गठन किसके द्वारा किया जाता है?
  4. आयोग के अंतिम आदेशों में परिवर्तन की अनुमति?
  5. परिसीमन आयोग से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

मेंस लिंक:

निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किस प्रकार और क्यों किया जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

एनडीपीएस विधेयक, 2021


संदर्भ:

‘स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (संशोधन) विधेयक’ 2021 (Narcotic Drugs and Psychotropic Substances (Amendment) Bill, 2021) अर्थात ‘NDPS विधेयक’ हाल ही में, संसद द्वारा पारित कर दिया गया है।

यह संशोधन विधेयक, इसी वर्ष 30 सितंबर को प्रख्यापित एक अध्यादेश को प्रतिस्थापित करेगा।

विधेयक का उद्देश्य:

सरकार द्वारा यह विधेयक, ‘स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम’ (एनडीपीएस) की धारा 27 के एक प्रावधान में पाई गयी त्रुटि को सुधारने के लिए पेश किया गया है। इस त्रुटि की वजह से अधिनियम की धारा 27 के – अवैध तस्करी के लिए वित्तपोषण करने वालों को दंडित करने संबंधी प्रावधान अप्रभावी हो जाता था।

  • वर्ष 2014 में चिकित्सा संबंधी जरूरतों के लिए ’स्वापक औषधियों’ / ‘मादक दवाओं’ के उपयोग को आसान बनाने के लिए ‘अधिनियम’ में संशोधन किया गया था, किंतु दंड प्रावधान में तदनुसार संशोधन नहीं किए जाने से यह ‘त्रुटि’ उत्पन्न हो गयी थी।
  • जून 2021 में, त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने कानून का निरीक्षण करने पर इस त्रुटि को चिह्नित किया और केंद्रीय गृह मंत्रालय को अधिनियम की धारा 27 के प्रावधानों में संशोधन करने का निर्देश दिया।

इस संशोधन की आवश्यकता:

अधिनयम के प्रारूप में इस त्रुटि का पता तब चला, जब एक आरोपी ने त्रिपुरा में एक विशेष अदालत में अपील दायर करते हुए कहा कि, उस पर अपराध का आरोप नहीं लगाया जा सकता क्योंकि ‘धारा 27 A’ एक ‘खाली सूची  से संबंधित है। त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने, बाद में केंद्र सरकार को कानून में संशोधन करने का निर्देश दिया।

Current Affairs

 

एनडीपीएस अधिनियम की धारा 27 में त्रुटि:

’स्वापक औषधियों’ (Narcotic Drugs) तक बेहतर चिकित्सा पहुंच की अनुमति दिए जाने के लिए वर्ष 2014 में ‘स्वापक औषधि एवं मन:प्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम’ में एक संशोधन किया गया, जिसके तहत “आवश्यक स्वापक औषधियों” के परिवहन और लाइसेंस में राज्य द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को हटाया गया था। इसी संसोधन के मसौदे में एक विसंगति भी तैयार हो गयी थी।

  • 2014 के संशोधन से पहले, अधिनियम की धारा 2 के खंड (viiia) में उप-खंड (i) से (v) शामिल थे, जिसमें ‘अवैध यातायात’ शब्द को परिभाषित किया गया था।
  • इस खंड को ‘नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस (संशोधन) अधिनियम’, 2014 द्वारा खंड (viiib) के रूप में प्रतिस्थापित कर दिया गया था, क्योंकि “आवश्यक स्वापक औषधियों” को परिभाषित करते हुए अधिनियम की धारा 2 में एक नया खंड (viiiia) जोड़ा गया था। हालांकि, अनजाने में इस परिणामी परिवर्तन के अनुरूप ‘एनडीपीएस अधिनियम’ की धारा 27A को संसोधित नहीं किया गया था।

विधेयक से संबंधित आलोचनाएं:

  • कुछ विशेषज्ञों का कहना है, कि विधेयक में, संबंधित प्रावधान वर्ष 2014 से होने वाले अपराधों पर ‘पूर्वव्यापी प्रभाव’ से लागू किए जाने का प्रस्ताव किया गया है, अतः यह नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
  • यह क़ानून, अनुच्छेद 21 में प्रद्दत मौलिक अधिकारों का भी उल्लंघन करता है, क्योंकि किसी व्यक्ति को केवल उसी अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है, जिसके लिए अपराध किए जाने के समय कानून मौजूद है।

Current Affairs

‘स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम’ / एनडीपीएस अधिनियम:

‘एनडीपीएस अधिनियम’ (NDPS Act) के तहत, किसी व्यक्ति को, किसी भी ‘स्वापक औषधि’ (narcotic Drug) या ‘मनःप्रभावी पदार्थ’ (Psychotropic Substance) के उत्पादन, रखने, बेचने, खरीदने, परिवहन करने, भंडारण करने और/या उपभोग करने से प्रतिबंधित किया गया है।

  • NDPS एक्ट, 1985 में अब तक तीन बार- वर्ष 1988, 2001 और 2014 में संशोधन किए जा चुके हैं।
  • यह अधिनियम पूरे भारत में लागू है, और यह भारत के बाहर के सभी भारतीय नागरिकों तथा भारत में पंजीकृत जहाजों और विमानों पर सवार सभी व्यक्तियों पर भी लागू होता है।

मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या से निपटने हेतु भारत सरकार की नीतियाँ और पहलें:

  1. विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर, देश के 272 जिलों में नशा मुक्त भारत अभियान या ड्रग्स-मुक्त भारत अभियान को 15 अगस्त 2020 को हरी झंडी दिखाई गई।
  2. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018-2025 की अवधि के लिए ‘नशीली दवाओं की मांग में कमी लाने हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना’ (National Action Plan for Drug Demand Reduction- NAPDDR) का कार्यान्वयन शुरू किया गया है।
  3. सरकार द्वारा नवंबर, 2016 में नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) का गठन किया गया है।
  4. सरकार द्वारा नारकोटिक ड्रग्स संबंधी अवैध व्यापार, व्यसनी / नशेड़ियों के पुनर्वास, और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ जनता को शिक्षित करने आदि में होने वाले व्यय को पूरा करने हेतु “नशीली दवाओं के दुरुपयोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष” (National Fund for Control of Drug Abuse) नामक एक कोष का गठन किया गया है ।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

7 दिसंबर, 1987 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 26 जून के लिए नशीली दवाओं के सेवन और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में चुना गया था। इसे क्यों चुना गया? इसके उद्देश्य क्या थे?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNODC के बारे में
  2. “नारकोटिक्स नियंत्रण के लिए राज्यों को वित्तीय सहायता” की योजना का अवलोकन
  3. नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) की संरचना
  4. नशीली दवाओं के दुरुपयोग के नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष
  5. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के बारे में
  6. नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस और इस वर्ष की थीम

मेंस लिंक:

भारत, मादक पदार्थों की तस्करी की चपेट में है। इसके कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। नशीली दवाओं की समस्या से निपटने में सरकार की भूमिका पर भी टिप्पणी करिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

श्रम संहिता संबंधी प्रकरण:


संदर्भ:

भारत में, वर्ष 2022 से शुरू होने वाले आगामी वित्तीय वर्ष तक ‘मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, व्यावसायिक सुरक्षा और औद्योगिक संबंधों’ पर “चार श्रम संहिताओं” (labour codes on wages, social security, occupational safety and industrial relations) को लागू किए जाने की संभावना है।

इन नई संहिताओं के अंतर्गत, सामान्य रूप से, रोजगार और कार्य संस्कृति से संबंधित कई पहलूओं- जैसे कि कर्मचारियों के हाथ में आने वाला वेतन, काम के घंटे और सप्ताह में कार्य-दिवसों की संख्या आदि – में बदलाव हो सकता है।

विरोध:

हालांकि, तीन कृषि कानूनों को निरस्त करने संबंधी सरकार के फैसले के मद्देनजर, ट्रेड यूनियनों ने इन श्रम संहिताओं के खिलाफ अपने आंदोलन को तेज करने की योजना बनाई है।

ट्रेड यूनियनों की मांगें:

  • ट्रेड यूनियनों का कहना है कि, मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा पर बनाए गई सहिंताओं (Codes) को हम स्वीकार करते है, और इन्हें तत्काल लागू किया जाए।
  • ट्रेड यूनियनों द्वारा ‘औद्योगिक संबंध’ (Industrial Relations) और ‘व्यावसायिक सुरक्षा’ (Occupational Safety) पर बनाए गई सहिंताओं पर आपत्ति वयक्त करते हुए इनकी समीक्षा किए जाने की मांग की जा रही है।

‘श्रम संहिताओं’ (labour codes) के बारे में:

  • कानूनों के इस नवीन सेट में 44 श्रम कानूनों को ‘चार संहिताओं’ में समेकित किया गया है: मजदूरी संहिता (Wage Code), सामाजिक सुरक्षा संहिता (Social Security Code), ‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएं संहिता’ (Occupational Safety, Health & Working Conditions Code) और औद्योगिक संबंध संहिता (Industrial Relations Code)।
  • संसद द्वारा पहले ही इन चारों संहिताओं को पारित किया जा चुका है और, इनके लिए राष्ट्रपति की सहमति भी मिल चुकी है।

ये चार संहिताएँ हैं:

  1. मजदूरी संहिता, 2019 (The Code on Wages, 2019): यह संहिता संगठित और असंगठित क्षेत्र के सभी कर्मचारियों पर लागू होती है। इसका उद्देश्य सभी रोजगारों में ‘वेतन’ / ‘मजदूरी’ और बोनस भुगतान को विनियमित करना है, तथा हर उद्योग, पेशे, व्यवसाय या विनिर्माण में समान प्रकृति के काम करने वाले कर्मचारियों को समान पारिश्रमिक प्रदान करना है।
  2. ‘व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएं संहिता’ 2020 (Occupational Safety, Health & Working Conditions Code, 2020): इसका उद्देश्य 10 या अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों और सभी खदानों और बंदरगाहों / गोदी (Docks) में कम करने वाले श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा की स्थिति को विनियमित करना है।
  3. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Social Security Code, 2020): इसके अंतर्गत सामाजिक सुरक्षा और मातृत्व लाभ से संबंधित नौ कानूनों को समेकित किया गया है।
  4. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code, 2020): इसके तहत, तीन श्रम कानूनों अर्थात; ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926, औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अ‎धिनियम, 1946 और औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 को समेकित किया गया है। इसका उद्देश्य, उद्योगों पर श्रम कानूनों के अनुपालन बोझ को काफी हद तक कम करके, देश में कारोबारी माहौल में सुधार करना है।

इन संहिताओं के साथ समस्याएं:

  • नियमित कामगारों के लिए कार्य-घंटा प्रावधानों में ‘दिन में आठ घंटे से अधिक काम के घंटे तय करने संबंधी’ कोई प्रावधान नहीं किया गया है।
  • इन संहिताओं में अंशकालिक कर्मचारियों के लिए समान प्रावधान निर्धारित नहीं किए गए हैं।
  • कर्मचारियों के वेतन को प्रभावित करने वाले प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
  • श्रम संहिताओं में, प्रावधानों का पालन न करने और दूसरी बार अपराध करने पर, व्यवसायों पर जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान किया गया है। वर्तमान महामारी की स्थिति में, अधिकांश छोटे व्यवसाय, श्रम संहिताओं में किए गए परिवर्तनों को अपनाने और लागू करने की स्थिति में नहीं हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. श्रम संहिता के बारे में
  2. प्रमुख प्रावधान
  3. समवर्ती सूची के एक विषय के रूप में श्रम।

मेंस लिंक:

चारो श्रम संहिताओं से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

भारत-ताइवान संबंध


(India-Taiwan relations)

भारत और ताइवान द्वारा हाल ही में, एक ‘मुक्त व्यापार समझौते’ तथा एक ताइवानी फर्म द्वारा भारत में ‘सेमीकंडक्टर निर्माण सुविधा’ की स्थापना किए जाने पर ‘वार्ता’ शुरू की गयी है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है और दोनों देशों के, समग्र द्विपक्षीय आर्थिक जुड़ाव को व्यापक आधार देने संबंधी संकल्प को दर्शाता है।

यदि ‘सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्र’ स्थापित करने संबंधी उठाया गया कदम सफल हो जाता है, तो यह किसी ताइवानी कंपनी द्वारा किसी अन्य देश में स्थापित किया जाने वाला ऐसा दूसरी सुविधा होगी। इससे पहले ताइवान की एक कंपनी ने ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ में इसी तरह का एक निर्माण-केंद्र स्थापित किया गया है।

ताइवान के संबंध में भारत का दृष्टिकोण:

  • ताइवान के संबंध में भारत की नीति स्पष्ट और सुसंगत है, और यह व्यापार, निवेश और पर्यटन के क्षेत्रों में वार्ता को बढ़ावा देने पर केंद्रित है।
  • सरकार व्यापार, निवेश, पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा और इस तरह के अन्य क्षेत्रों में, लोगों के परस्पर संपर्क एवं वार्ताओं को बढ़ावा देती है है।

भारत-ताइवान संबंध:

(Indo- Taiwan relations)

यद्यपि भारत-ताइवान के मध्य औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं, फिर भी ताइवान और भारत विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर सहयोग कर रहे हैं।

भारत ने वर्ष 2010 से चीन की ‘वन चाइना’ नीति का समर्थन करने से इनकार कर दिया है।

ताइवान के लिए भारत का महत्व:

ताइवान, विभिन्न देशों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने का प्रयास कर रहा है।

  • इसके अलावा, चीन द्वारा ताइवान पर सैन्य दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा है, जिसके तहत चीन, इस लोकतांत्रिक ताइवान के समीप चीनी युद्धक विमानों के अभियान चला रहा है। बीजिंग, ताइवान अपना दावा करता है और इस पर बलपूर्वक कब्ज़ा करने से इसे कोई गुरेज नहीं है।

आगे की राह:

भारत और ताइवान, अपनी साझेदारी के 25 साल पूरे होने का जश्न मना रहे हैं।

दिल्ली और ताइपे के बीच, सामूहिक एवं पारस्परिक प्रयासों के तहत, कृषि, निवेश, सीमा शुल्क सहयोग, नागरिक उड्डयन, औद्योगिक सहयोग और अन्य क्षेत्रों सहित कई द्विपक्षीय समझौते किए गए हैं। दोनों देशों के मध्य बढ़ते हुए संबंधों से इस बात का संकेत मिलता है, कि भारत-ताइवान संबंधों को फिर से नया स्वरूप देने का समय आ गया है।

आवश्यकता:

  • दोनों पक्षों द्वारा एक निश्चित समय सीमा के भीतर, एक रोड मैप तैयार करने के लिए ‘अधिकार प्राप्त व्यक्तियों’ या ‘टास्क फोर्स’ का गठन किया जा सकता है।
  • यह दोनों देशों के मध्य ‘स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र’ में सहयोग बढ़ाने का उचित समय है।
  • ताइवान अपनी जैव-अनुकूल प्रौद्योगिकियों के माध्यम से, इस चुनौती से निपटने में एक मूल्यवान भागीदार हो सकता है।

चीन- ताइवान संबंध: पृष्ठभूमि

चीन, अपनी ‘वन चाइना’ (One China) नीति के जरिए ताइवान पर अपना दावा करता है। सन् 1949 में चीन में दो दशक तक चले गृहयुद्ध के अंत में जब ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ के संस्थापक माओत्से तुंग ने पूरे चीन पर अपना अधिकार जमा लिया तो विरोधी राष्ट्रवादी पार्टी के नेता और समर्थक ताइवान द्वीप पर भाग गए। इसके बाद से ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ ने ताइवान को बीजिंग के अधीन लाने, जरूरत पड़ने पर बल-प्रयोग करने का भी प्रण लिया हुआ है।

  • हालांकि, ताइवान एक स्वशासित देश है और वास्तविक रूप से स्वतंत्र है, लेकिन इसने कभी भी औपचारिक रूप से चीन से स्वतंत्रता की घोषणा नहीं की है।
  • एक देश, दो प्रणाली” (one country, two systems) सूत्र के तहत, ताइवान, अपने मामलों को खुद संचालित करता है; हांगकांग में इसी प्रकार की समान व्यवस्था का उपयोग किया जाता है।
  • वर्तमान में, चीन, ताइवान पर अपना दावा करता है, और इसे एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देने वाले देशों के साथ राजनयिक संबंध नहीं रखने की बात करता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि चीन की आपत्तियों के कारण ताइवान आज तक WHO का सदस्य नहीं बन सका है? इस विषय के बारे में और जानने हेतु पढ़ें

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ताइवान की अवस्थिति और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
  2. वन चाइना नीति के तहत चीन द्वारा प्रशासित क्षेत्र।
  3. क्या ताइवान का WHO और संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व किया गया है?
  4. दक्षिण चीन सागर में स्थित देश।
  5. कुइंग राजवंश (Qing dynasty)।

 

मेंस लिंक:

भारत- ताइवान द्विपक्षीय संबंधों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

ग्रीन हाइड्रोजन


संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा, सौर ऊर्जा के प्रयोग करके अपशिष्ट जल से ‘हरित हाइड्रोजन ईंधन’ (Green Hydrogen Fuel) का उपयोग करने की योजना बनाई जा रही है। ‘इलेक्ट्रोलाइजर्स’ (Electrolysers) का उपयोग करके इसे संभव किया जा सकता है।

क्रिया-विधि:

‘रूफटॉप सोलर’ का इस्तेमाल करके ‘ठोस अपशिष्ट प्रबंधन’ को अलग करके, हम इलेक्ट्रोलाइज़र की मदद से ‘हरित हाइड्रोजन’ बना सकते हैं। इसके उत्पादन में बिजली और पानी की लागत नगण्य होगी। हम इस ईंधन का उपयोग कोयले के स्थान पर रेलवे इंजनों, सीमेंट और केमिकल कंपनियों में भी कर सकते हैं।

चुनौतियां:

देश में ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ के उपयोग की राह अभी साफ नहीं है और फिलहाल ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ का उत्पादन ‘ग्रे हाइड्रोजन’ (Grey Hydrogen) से थोड़ा महंगा भी है।

देश में ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ के लिए मार्ग अभी साफ नहीं है और फिलहाल ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ का उत्पादन ‘ग्रे- हाइड्रोजन’ (Grey Hydrogen) की तुलना में थोड़ा महंगा है।

हरित हाइड्रोजन / ग्रीन हाइड्रोजन क्या है?

नवीकरणीय / अक्षय ऊर्जा का उपयोग करके ‘विद्युत अपघटन’ (Electrolysis) द्वारा उत्पादित हाइड्रोजन को ‘हरित हाइड्रोजन’ (Green Hydrogen) के रूप में जाना जाता है। इसमें कार्बन का कोई अंश नहीं होता है।

ग्रीन हाइड्रोजन का महत्व:

भारत के लिए अपने ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (Nationally Determined Contribution- INDC) लक्ष्यों को पूरा करने तथा क्षेत्रीय और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा, पहुंच और उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ ऊर्जा काफी महत्वपूर्ण है।

  • ग्रीन हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण विकल्प के रूप में कार्य कर सकता है, जो भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा के अंतराल को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण होगा।
  • परिवहन के संदर्भ में, शहरों के भीतर या राज्यों के मध्य लंबी दूरी की यात्रा या माल ढुलाई के लिए, रेलवे, बड़े जहाजों, बसों या ट्रकों आदि में ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग किया जा सकता है।

ग्रीन हाइड्रोजन के अनुप्रयोग:

  1. अमोनिया और मेथनॉल जैसे हरित रसायनों का उपयोग सीधे ही उर्वरक, परिवहन, बिजली, रसायन, शिपिंग आदि, जैसी मौजूदा ज़रूरतों में किया जा सकता है।
  2. व्यापक स्तर पर अपनाए जाने के लिए CGD नेटवर्क में 10 प्रतिशत तक ग्रीन हाइड्रोजन मिश्रण को लागू जा सकता है।

लाभ:

  • ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा भंडारण के लिए खनिजों और दुर्लभ-पृथ्वी तत्व-आधारित बैटरी पर निर्भरता को कम करने में मदद करेगा।
  • जिस अक्षय ऊर्जा को ग्रिड द्वारा संग्रहीत या उपयोग नहीं किया जा सकता है, उसका हाइड्रोजन-उत्पादन करने के लिए उपयोग किया जा सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

हाइड्रोजन एक अदृश्य गैस है। लेकिन, फिर इसे हरा, गुलाबी आदि नाम किस प्रकार दिए जाते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ग्रीन हाइड्रोजन के बारे में
  2. इसका उत्पादन किस प्रकार किया जाता है?
  3. अनुप्रयोग
  4. लाभ
  5. हाइड्रोजन ऊर्जा मिशन के बारे में

मेंस लिंक:

ग्रीन हाइड्रोजन के लाभों की विवेचना कीजिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

जैविक विविधता विधेयक, 2021 में परिवर्तन


संदर्भ:

सरकार ने हाल ही में लोकसभा में ‘जैविक विविधता (संशोधन) विधेयक, 2021 (Biological Diversity (Amendment) Bill, 2021) पेश किया गया है।

विधेयक के प्रमुख बिंदु:

  • विधेयक में औषधीय पौधों की खेती को प्रोत्साहित करके ‘जंगली औषधीय पौधों’ पर दबाव को कम करने का प्रयास किया गया है।
  • विधेयक में ‘आयुष चिकित्सकों’ को जैविक संसाधनों या ज्ञान का उपयोग करने के लिए ‘जैव विविधता बोर्डों’ को सूचित करने से छूट देने का प्रस्ताव किया गया है।
  • विधेयक में, अनुसंधान में तेजी लाने, पेटेंट आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाने, कुछ गतिविधियों को गैर-अपराध घोषित करने की सुविधा का प्रावधान किया गया है।
  • इसमें राष्ट्रीय हितों से समझौता किये बिना जैव संसाधनों, अनुसंधान, पेटेंट और वाणिज्यिक उपयोग की श्रृंखला में अधिक निवेश लाने पर जोर दिया गया है।
  • विधेयक में इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जैविक संसाधनों और ज्ञान का उपयोग कौन कर सकता है तथा उपयोग पर निगरानी किस प्रकार की जाएगी।
  • विधेयक में ‘राज्य जैव विविधता बोर्डों’ की भूमिका को भी स्पष्ट और सशक्त किया गया है।

जैव विविधता अधिनियम 2002 में संशोधन का कारण:

  • आयुष चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े व्यक्तियों द्वारा सरकार से सहयोगात्मक अनुसंधान और निवेश हेतु एक अनुकूल वातावरण बनाने के लिए ‘अनुपालन-प्रक्रिया भार’ को सरल, सुव्यवस्थित और कम करने का आग्रह किया जा रहा था।
  • इनके द्वारा पेटेंट आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाने, पहुंच के दायरे को विस्तृत करने तथा स्थानीय समुदायों के साथ लाभ-साझाकरण की भी मांग की गयी थी।

संबंधित चिंताएं:

  • विधेयक का मुख्य फोकस, स्थानीय समुदायों के संरक्षण, जैव विविधता के संरक्षण और ज्ञान पर होने के बजाय ‘जैव विविधता में व्यापार’ को सुविधाजनक बनाना है।
  • यह विधेयक ‘पूर्व विधायी परामर्शक नीति’ (Pre-Legislative Consultative Policy) के तहत अनिवार्य, जनता की राय मांगे बगैर, पेश किया गया है।
  • ‘प्रस्तावित संशोधन’ में ‘जैव विविधता के संवहनीय उपयोग और संरक्षण’ में स्थानीय समुदायों की हिस्सेदारी की रक्षा, संरक्षण या वृद्धि करने के संदर्भ में प्रावधान अस्पष्ट हैं।
  • कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह संशोधन केवल ‘आयुष मंत्रालय’ को “लाभ” पहुचाने के लिए किए गए हैं।
  • विधेयक में, ‘जैव-उपयोग’ (Bio-utilization) शब्द को बाहर कर दिया है, जोकि अधिनियम का एक महत्वपूर्ण तत्व है। ‘जैव उपयोग’ शब्द का प्रयोग नहीं किए जाने से, वाणिज्यिक उद्देश्य से महत्वपूर्ण- वर्गीकरण, प्रोत्साहन और जैव-परख जैसी गतिविधियां छूट जाएगी।
  • विधेयक में, कृषित औषधीय पौधों को भी अधिनियम के दायरे से बाहर रखा गया है, लेकिन यह पता लगाना व्यावहारिक रूप से असंभव है कि कौन से पौधे उगाए जाते हैं और कौन से जंगली पौधे हैं।

जैविक विविधता अधिनियम, 2002:

‘जैव विविधता अधिनियम’ 2002 (Biological Diversity Act, 2002) को जैव विविधता के संरक्षण, इसके अवयवों के सतत उपयोग और जैव संसाधनों के निहित लाभों में उचित एवं साम्य बंटवारा करने तथा उससे संबंधित विषयों का उपबंध करने के लिये अधिनियमित किया गया था।

  • इस कानून का मुख्य उद्देश्य, भारत की समृद्ध जैव विविधता और संबंधित ज्ञान को विदेशी व्यक्तियों द्वारा इसका उपयोग किए जाने से बचाना है।
  • इसमें, केंद्रीय और राज्य बोर्डों और स्थानीय समितियों की त्रिस्तरीय संरचना के माध्यम से जैव-चोरी की जांच, जैविक विविधता और स्थानीय उत्पादकों की रक्षा करने का प्रावधान किए गए हैं।
  • अधिनियम में ‘स्थानीय निकायों’ में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (National Biodiversity Authority), राज्य जैव विविधता बोर्ड (State Biodiversity Boards) और जैव विविधता प्रबंधन समितियों (Biodiversity Management Committees) की स्थापना किए जाने का प्रावधान किया गया है।
  • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) को दीवानी न्यायालय के समान शक्ति प्रदान की गयी है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने नागोया प्रोटोकॉल (Nagoya Protocol) के बारे में सुना है?

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


खुला क्षेत्रफल लाइसेंसिंग नीति

सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धी निविदाओं के लिए ‘खुला क्षेत्रफल लाइसेंसिंग नीति’ (Open Acreage Licensing Policy – OALP) के अंतर्गत सातवें निविदा चक्र में तेल और गैस के आठ ब्लॉक की पेशकश की है।

इसका उद्देश्य, घरेलू उत्पादन में वृद्धि करने तथा आयात में कमी करने हेतु ‘अन्वेषण’ के अंतर्गत और अधिक क्षेत्र को लाना है।

‘खुला क्षेत्रफल लाइसेंसिंग नीति’ (OALP) के बारे में:

‘खुला क्षेत्रफल लाइसेंसिंग नीति’ को वर्ष 2017 में ‘हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पॉलिसी’ (HELP) के तहत लॉन्च किया गया था।

  • OALP के तहत, कंपनियों के लिए, जिन क्षेत्रों में वे तेल और गैस का अन्वेषण करना चाहती हैं, उन क्षेत्रो को चिह्नित एवं निर्धारित करने की अनुमति दी जाती है।
  • कंपनियां, साल भर में तीन बार किसी भी क्षेत्र के लिए ‘अभिरुचि की अभिव्यक्ति’ (expression of interest – EOI) का आवेदन कर सकती हैं। इसके बाद ‘मांगे गए क्षेत्रो’ को निविदा के लिए बोली लगाने हेतु रखा जाता है।
  • इस नीति के तहत, सभी प्रकार के हाइड्रोकार्बन की खोज और उत्पादन के लिए एक समान लाइसेंस का प्रावधान किया गया है, जिससे ठेकेदारों को पारंपरिक और अपरंपरागत तेल और गैस संसाधनों का पता लगाने में मदद मिलती है।
  • एक ‘राजस्व-साझाकरण मॉडल’ के तहत इन क्षेत्रों की पेशकश की जाती है और उत्पादित कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के लिए विपणन और मूल्य निर्धारण हेतु स्वतंत्रता प्रदान की जाती है।

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