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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 20 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनI

1. गोवा मुक्ति दिवस

 

सामान्य अध्ययन-II

1. लिंचिंग संबंधी मामलों पर एक विधेयक की आवश्यकता

2. मतदाता पहचान पत्र को आधार कार्ड से जोड़ने हेतु विधेयक

3. पोषण ट्रैकर

4. पार्वो वायरस

5. कर्नाटक का ‘धर्मांतरण रोधी विधेयक’ मसौदा

6. इस्लामी सहयोग का संगठन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. लोकुर आयोग

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: स्वतंत्रता के बाद का सुदृढ़ीकरण।

गोवा मुक्ति दिवस


संदर्भ:

19 दिसंबर, 2021 को गोवा को पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन से मुक्त कराने वाले भारतीय सशस्त्र बलों की स्मृति में 60वां ‘गोवा मुक्ति दिवस’ (Goa Liberation Day) मनाया गया।

इस घटना का भारतीय इतिहास में महत्व:

यद्यपि भारत ने ब्रिटिश शासन से वर्ष 1947 में ही स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी, फिर भी, गोवा – जोकि उस समय एक पुर्तगाली उपनिवेश था – को विदेशी नियंत्रण से मुक्त कराने में 14 सालों का और अधिक समय लग गया। अंततः, 19 दिसंबर 1961 को, भारतीय सशस्त्र बलों ने लगभग 450 वर्षों के औपनिवेशिक शासन का अंत करते हुए, पुर्तगालियों से गोवा पर अपना नियंत्रण वापस हासिल कर लिया।

‘ऑपरेशन विजय’ के बारे में:

पुर्तगाली, भारत में अपना उपनिवेश स्थापित करने वाले सबसे पहले औपनिवेशिक शासक थे और देश छोड़ने वाले अंतिम उपनिवेशी भी यही थे।

पुर्तगालियों ने वर्ष 1510 में गोवा पर आक्रमण किया था।

  • तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारतीय सशस्त्र बलों के लिए ‘गोवा’ पर हमला करने का आदेश दिए जाने के बाद, 17 दिसंबर 1961 को ‘ऑपरेशन विजय’ (Operation Vijay) शुरू किया गया। इस अभियान के तहत, लगभग 30,000 भारतीय सैनिकों ने, बुरी तरह से तैयार 3,000 पुर्तगाली सैनिकों पर आसानी से काबू पा लिया।
  • न्यूनतम रक्तपात के साथ, भारतीय सेना का यह अभियान सफल रहा और पुर्तगाल के नियंत्रण में अन्य भारतीय क्षेत्रों – दमन और दीव को अपने अधिकार में लेने के लिए इस ऑपरेशन को आगे जारी रखा गया।
  • इस बीच 18 दिसंबर को, पुर्तगाली गवर्नर जनरल ‘वासलो डी सिल्वा’ (Vassalo da Silva) ने केंद्र शासित प्रदेश गोवा, दमन और दीव पर अपना नियंत्रण छोड़ दिया।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘गोवा जनमत संग्रह’ (Goa Opinion Poll) के बारे में जानते हैं?

  • 16 जनवरी 1967 को, भारतीय संघ में केंद्र शासित प्रदेश गोवा, दमन और दीव के भविष्य का फैसला करने के लिए ‘गोवा ओपिनियन पोल’ अर्थात ‘जनमत संग्रह’ करवाया गया था।
  • यद्यपि इस आमतौर पर ‘ओपिनियन पोल’ कहा जाता है, किंतु वास्तव में यह एक ‘जनमत संग्रह’ (Referendum) था, क्योंकि ‘पोल’ के परिणाम भारत सरकार के लिए बाध्यकारी थे।
  • ‘जनमत संग्रह’ में गोवा वासियों के लिए ‘केंद्र शासित प्रदेश के रूप में बने रहने’ अथवा ‘महाराष्ट्र’ राज्य में विलय किए जाने के पक्ष में मतदान करने को कहा गया था। स्वतंत्र भारत में होने वाला यह एकमात्र जनमत संग्रह है।
  • गोवा-वासियों ने ‘महाराष्ट्र में विलय किए जाने के खिलाफ’ मतदान किया और गोवा एक केंद्र शासित प्रदेश बना रहा। इसके बाद, 1987 में गोवा, भारतीय संघ के अंतर्गत एक पूर्ण राज्य बन गया।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ऑपरेशन विजय के बारे में
  2. गोवा मुक्ति दिवस
  3. गोवा जनमत संग्रह
  4. भारत का पहला जनमत संग्रह

मेंस लिंक:

गोवा मुक्ति दिवस के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

लिंचिंग संबंधी मामलों पर एक विधेयक की आवश्यकता


संदर्भ:

18 दिसंबर को, सिख संगत (सिख धर्म के भक्तों) द्वारा अमृतसर के श्री हरमंदिर साहिब गुरुद्वारा (स्वर्ण मंदिर) में सिख धर्म की सबसे पवित्र पुस्तक श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का अनादर करने का कथित रूप से प्रयास करने पर एक व्यक्ति की ‘पीट-पीटकर हत्या’ (Lynching) कर दी गई।

रिपोर्टों के अनुसार, हत्या करने वाले समूह का आरोप है, कि वह श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी को अपवित्र करने की कोशिश कर रहा था।

संबंधित प्रकरण:

विशेषकर यह पहली बार नहीं है जब सिख धर्म से संबंधित पवित्र पुस्तक की बेअदबी के आरोप में किसी की हत्या की गई हो। हाल के दिनों में, इस तरह की लिंचिंग की कई घटनाएँ हो चुकी हैं।

फिर भी,  लोगों द्वारा कानून को अपने हाथ में लेने और पवित्र पुस्तक का अनादर करने के आरोप में लिंचिंग करने के बारे में, किसी भी राजनीतिक नेता या पुलिस ने एक शब्द भी नहीं कहा है।

मॉब लिंचिंग की हालिया घटनाएं:

  • पिछले महीने असम में एक 23 वर्षीय छात्र नेता की भीड़ ने कथित तौर पर हत्या कर दी थी।
  • अक्टूबर माह में, एक व्यक्ति की कथित रूप से पीट-पीट कर हत्या कर दी गई, उसके अंगों को काट दिया गया और ‘तीन कृषि कानूनों’ के खिलाफ किसानों के विरोध स्थल, सिंघू बॉर्डर पर उसे मरने के लिए छोड़ दिया गया।
  • अगस्त महीने में, इंदौर में एक चूड़ी विक्रेता को कथित तौर पर अपनी पहचान छिपाने पर भीड़ ने पीटा था। वह व्यक्ति किसी तरह जीवित बच गया और बाद में उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
  • इस साल मई में, गुरुग्राम के एक 25 वर्षीय व्यक्ति दवा खरीदने के लिए बाहर गया था, उसी दौरान कथित तौर पर उसकी पीट-पीट कर हत्या कर दी गई थी।

‘लिंचिंग’ का तात्पर्य:

धर्म, जाति, जाति, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, खान-पान, यौन-अभिरुचि, राजनीतिक संबद्धता, जातीयता अथवा किसी अन्य संबंधित आधार पर भीड़ द्वारा नियोजित अथवा तात्कालिक हिंसा या हिंसा भड़काने वाले कृत्यों आदि को मॉब लिंचिंग (Mob Lynching) कहा जाता है।

इसमें अनियंत्रित भीड़ द्वारा किसी दोषी को उसके किये अपराध के लिये या कभी-कभी मात्र अफवाहों के आधार पर ही बिना अपराध किये भी तत्काल सज़ा दी जाए अथवा उसे पीट-पीट कर मार डाला जाता है।

इस प्रकार के मामलों से किस प्रकार निपटा जाता है?

  • मौजूदा ‘भारतीय दंड-विधान संहिता’ (IPC) के तहत, इस प्रकार घटनाओं के लिए “कोई अलग” परिभाषा नहीं है। लिंचिंग की घटनाओं से ‘आईपीसी’ की धारा 300 और 302 के तहत निपटा जाता है।
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के अनुसार, जो कोई भी किसी व्यक्ति की हत्या करता है, तो उसे मृत्यु दंड या आजीवन कारावास और साथ ही आर्थिक दंड से दंडित किया जाएगा। ‘हत्या करना’ एक गैर-जमानती, संज्ञेय और गैर-शमनीय अपराध है।

इस संबंध में उच्चत्तम न्यायालय के दिशानिर्देश:

  1. लिंचिंग एक ‘पृथक अपराध’ होगा तथा ट्रायल कोर्ट अभियुक्तों को दोषी ठहराए जाने पर अधिकतम सजा का प्रावधान कर मॉब लिंचिंग करने वाली भीड़ के लिए कड़ा उदहारण स्थापित करें।
  2. राज्य सरकारें, प्रत्येक ज़िले में मॉब लिंचिंग और हिंसा को रोकने के उपायों के लिये एक सीनियर पुलिस अधिकारी को प्राधिकृत करें। राज्य सरकारें उन ज़िलों, तहसीलों, गाँवों को चिन्हित करें जहाँ हाल ही में मॉब लिंचिंग की घटनाएँ हुई हैं।
  3. नोडल अधिकारी मॉब लिंचिंग से संबंधित ज़िला स्तर पर समन्वय के मुद्दों को राज्य के DGP के समक्ष प्रस्तुत करेगें।
  4. केंद्र तथा राज्य सरकारों को रेडियो, टेलीविज़न और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह प्रसारित कराना होगा कि किसी भी प्रकार की मॉब लिंचिंग एवं हिंसा की घटना में शामिल होने पर विधि के अनुसार कठोर दंड दिया जा सकता है।
  5. केंद्र और राज्य सरकारें, भीड़-भाड़ और हिंसा के गंभीर परिणामों के बारे में रेडियो, टेलीविजन और अन्य मीडिया प्लेटफार्मों पर प्रसारित करेंगी।
  6. राज्य पुलिस द्वारा किए गए उपायों के बावजूद, मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ होने पर संबंधित पुलिस स्टेशन तुरंत एफआईआर दर्ज करेगा।
  7. राज्य सरकारें मॉब लिंचिंग से प्रभावित व्यक्तियों के लिये क्षतिपूर्ति योजना प्रारंभ करेगी।
  8. यदि कोई पुलिस अधिकारी या जिला प्रशासन का कोई अधिकारी अपने कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहता है, तो यह जानबूझकर की गई लापरवाही माना जाएगा।

समय की मांग:

  • प्रत्येक बार ऑनर किलिंग, घृणा-अपराधों, डायन-हत्या अथवा मॉब लिंचिंग की घटनाओं के होने पर इन अपराधों से निपटने के लिए विशेष कानून की मांग उठायी जाती हैं।
  • लेकिन, तथ्य यह है कि यह अपराध हत्याओं के अलावा और कुछ नहीं हैं तथा IPC और सीआरपीसी (CrPC) के तहत मौजूदा प्रावधान ऐसे अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं।
  • पूनावाला मामले में निर्धारित दिशा-निर्देशों के साथ, हम मॉब लिंचिंग से निपटने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम हैं। इन अपराधों से निपटने के लिए मौजूदा कानूनों और प्रवर्तन एजेंसियों को अधिक जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।

इस सन्दर्भ में विभिन्न राज्यों द्वारा किये गए प्रयास:

  • मणिपुर सरकार द्वारा वर्ष 2018 में इस संदर्भ में कुछ तार्किक और प्रासंगिक उपबंधो को सम्मिलित करते हुए एक विधेयक पारित किया गया।
  • राजस्थान सरकार द्वारा अगस्त 2019 में लिंचिंग के खिलाफ एक विधेयक पारित किया गया।
  • पश्चिम बंगाल सरकार ने भी मॉब लिंचिंग के विरूद्ध कठोर प्रावधानों सहित एक विधेयक पेश किया।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘हेट स्पीच’ पर संयुक्त राष्ट्र द्वारा ‘रणनीति’ और ‘कार्य योजना’ जैसा कोई उपाय किया गया है? इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मॉब लिंचिंग के विरुद्ध किन राज्यों कानून पारित किये हैं?
  2. ’पूनावाला मामला’ क्या है?
  3. आईपीसी के तहत मॉब लिंचिंग के खिलाफ कौन से प्रावधान उपलब्ध हैं?

मेंस लिंक:

मॉब लिंचिंग भारत में एक अक्सर होने वाली घटना बन गई है जो धार्मिक और जातिगत अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए नफरत व हिंसा को बढ़ा रही है। इसके कारक- कारणों को समझाएं तथा  इससे निपटने के तरीके सुझाइए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की मुख्य विशेषताएँ।

मतदाता पहचान पत्र को आधार कार्ड से जोड़ने हेतु विधेयक


संदर्भ:

हाल ही में, ‘मतदाता पहचान पत्र को ऐच्छिक रूप से आधार कार्ड से जोड़ने सहित अन्य प्रमुख सुधार करने हेतु ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ में संशोधन करने के उद्देश्य से संसद में ‘निर्वाचन कानून (संशोधन) विधेयक’, 2021 (Election Laws (Amendment) Bill, 2021) को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी दे दी गयी है।

आधार कार्ड को मतदाता पहचान पत्र से जोड़ने की आवश्यकता:

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा वर्ष 2015 से यह मांग की जा रही है। निर्वाचन आयोग द्वारा आधार संख्या को मतदाता पहचान संख्या से जोड़ने के लिए, ‘राष्ट्रीय निर्वाचन कानून शोधन और प्रमाणीकरण कार्यक्रम’ (National Electoral Law Purification and Authentication Programme) शुरू किया गया था। आयोग के अनुसार, इस संबद्धता (लिंकिंग) से एक व्यक्ति के नाम पर कई नामांकनों को चिह्नित कर उन्हें समाप्त किया जा सकेगा।

  • उस समय, इस कार्यक्रम पर रोक लगा दी गयी थी, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए ‘आधार संख्या’ का उपयोग वैकल्पिक रहेगा।
  • इसके बाद, चुनाव निर्वाचन ने अपने प्रस्ताव में संशोधन करते हुए ‘लिंकिंग’ को वैकल्पिक बना दिया।

विधेयक के अन्य प्रावधान:

विधेयक में, हर वर्ष चार ‘अहर्ता तिथियों’ पर नए मतदाताओं के पंजीकरण का प्रावधान किया गया है, वर्तमान में नए मतदाताओं के पंजीकरण हेतु केवल 1 जनवरी को ‘अहर्ता तिथि’ माना जाता है।

  • वर्तमान में, 1 जनवरी को या उससे पहले 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाला कोई भी व्यक्ति मतदाता के रूप में पंजीकृत होने के लिए पात्र होता है।
  • केवल एक कटऑफ डेट होने के कारण 2 जनवरी को 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले व्यक्ति पंजीकरण नहीं करा पाते थे और उन्हें पंजीकरण कराने के लिये अगले वर्ष का इंतजार करना पड़ता था।
  • विधेयक के अनुसार, प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में, मतदाता पंजीकरण के लिए 1 जनवरी के साथ-साथ तीन अन्य अहर्ता तिथियां – 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर – होंगी।

संशोधन विधेयक में ‘सेवारत मतदाताओं’ (Service Voters) के लिए निर्वाचन को ‘लैंगिक रूप से तटस्थ’ बनाने का प्रावधान किया गया है।

  • संशोधन के तहत, ‘पत्नी’ शब्द के स्थान पर ‘पति/पत्नी’ (Spouse) किया जाएगा, जिससे यह क़ानून ‘लैंगिक रूप से तटस्थ’ (Gender Neutral) बन जाएगा।
  • वर्तमान में सशत्र सेना के एक जवान की ‘पत्नी’ ‘सेवा मतदाता’ के रूप में नामांकित होने की हकदार है, लेकिन ‘महिला अधिकारी’ के पति को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है। ‘पत्नी’ के स्थान पर ‘पति/पत्नी’ शब्द का प्रयोग किए जाने से इसमें परिवर्तन हो जाएगा।

वोटर आईडी-आधार कार्ड युग्मन से संबंधित मुद्दे:

  • संसोधन प्रस्ताव में ‘भारत निर्वाचन आयोग’ (ECI) और UIDAI डेटाबेस को किस सीमा तक साझा किया जाएगा, मतदाता से उसकी सहमति हासिल लेने की क्या प्रक्रिया होगी, और क्या डेटाबेस को जोड़ने के लिए दी गयी सहमति रद्द की जा सकती है, जैसे सवालों को स्पष्ट नहीं किया गया है।
  • एक सशक्त ‘निजी डेटा संरक्षण कानून’ के अभाव में ‘डेटा साझा करने की अनुमति’ देने संबंधी कोई भी कदम समस्यात्मक साबित हो सकता है। यह व्यक्ति की निजता में दखल होगा। ‘निजी डेटा संरक्षण कानून’ के संबंध में एक विधेयक अभी संसद में विचाराधीन है।

इंस्टा जिज्ञासु:

  • क्या आप ‘राष्ट्रीय मतदाता सूची शुद्धिकरण और प्रमाणीकरण कार्यक्रम’ (NERPAP) के बारे में जानते हैं? इसे कब शरू किया गया था?
  • क्या आप सुप्रीम कोर्ट के 2015 के ‘जस्टिस केएस पुट्टस्वामी (सेवानिवृत्त) एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले’ में निजता की सुरक्षा से संबंधित फैसले के बारे में जानते हैं? इस मामले में “आधार योजना और आधार अधिनियम, 2016 की वैधता” को चुनौती दी गयी थी?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. निजता के अधिकार के बारे में
  2. पुट्टस्वामी निर्णय
  3. एनईआरपीएपी
  4. चुनाव सुधार विधेयक

मेंस लिंक:

आधार संख्या को मतदाता पहचान पत्र से जोड़े जाने से संबंधी मुद्दों और चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

पोषण ट्रैकर


भारत सरकार ने लोकसभा में सूचित करते हुए बताया है, कि ‘महिलाओं और बच्चों की निजता’ के हित को ध्यान में रखते हुए ‘पोषण ट्रैकर’ (Poshan Tracker) में दर्ज आंकड़ों को सार्वजनिक नहीं किया गया है।

इसका उद्देश्य, देश में आंगनवाड़ी प्रणालियों के माध्यम से, राज्य सरकारों के सहयोग से भारत सरकार द्वारा प्रदान की जा रही सेवाओं का लाभ उठाने वाली महिलाओं और बच्चों की निजता का सम्मान करना है।

‘पोषण ट्रैकर’ के बारे में:

  • ‘पोषण ट्रैकर’ (Poshan Tracker) को इसके पिछले संस्करण में ‘एकीकृत बाल विकास सेवाएं-सामान्य अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर’ (Integrated Child Development Services-Common Application Software: ICDS-CAS) के रूप में जाना जाता था, जिसे आंगनवाड़ियों के माध्यम से वितरित की जाने विभिन्न सेवाओं को ट्रैक करने और इनमे सुधार करने तथा लाभार्थियों के पोषण प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था।
  • यह रियल टाइम निगरानी प्रणाली, नवंबर 2017 में तीन वर्ष की अवधि के लिए 9,000 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित पोषण अभियान के प्रमुख स्तंभों में से एक है।
  • इस ट्रैकर को विकसित करने के लिए सरकार द्वारा ₹1,053 करोड़ का व्यय किया गया है।

महत्व:

  • ‘पोषण ट्रैकर’, पोषण अभियान के महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक है।
  • यह सरकार को 3 लाख आंगनवाड़ी केंद्रों पर दी जाने वाली सेवाओं की निगरानी करने में सहयोग करता है।
  • यह छह महीने से छह साल तक की उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं एवं स्तनपान कराने वाली माताओं सहित 8 लाख लाभार्थियों के पोषण संकेतक रिकॉर्ड करता है।
  • आंगनवाड़ी केंद्रों में, गर्म पके हुए भोजन के रूप में पूरक पोषण, और घर ले जाने का राशन, टीकाकरण और स्कूल पूर्व शिक्षा सहित छह सेवाएं प्रदान की जाती हैं।

संबंधित विवाद:

  • एक संसदीय समिति द्वारा अपनी रिपोर्ट में ‘पोषण ट्रैकर’ के प्रभावी उपयोग पर कई सवाल उठाए गए हैं।
  • समिति ने मांग की है, कि प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों की लगातार निगरानी की जाए और इनको वेबसाइट पर अपलोड किया जाए और साथ ही एक राज्य-वार प्रगति रिपोर्ट को संधृत किया जाए “ताकि समय पर लाभ से वंचित रह जाने वाले लोगों की, वास्तविक समय के आधार पर, पहचान की जा सके और इसके लिए उपचारात्मक उपाय किए जा सके।”
  • समिति ने मंत्रालय से आंगनवाड़ी लाभार्थियों को भोजन के पैकेट वितरण में कोई अंतराल नहीं होने, को सुनिश्चित करने के लिए एक निगरानी तंत्र स्थापित करने की सिफारिश भी की है।

‘पोषण अभियान’ के बारे में:

पोषण अभियान (Poshan Abhiyaan) कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करना है।

  • वर्ष 2018 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने देशभर में कुपोषण की समस्या को संबोधित करने हेतु पोषण अभियान की शुरुआत की थी।
  • इसके तहत, वर्ष 2022 तक हासिल किए जाने वाले विशिष्ट लक्ष्यों को निर्धारित किया गया था।

उद्देश्य एवं लक्ष्य:

  • 0-6 वर्ष के बच्चों में ठिगनेपन से बचाव एवं इसमें प्रति वर्ष 2% (2022 तक कुल 6%) की दर से कमी लाना।
  • 15 से 49 वर्ष की किशोरियों, गर्भवती एवं धात्री (स्तनपान कराने वाली) माताओं में रक्ताल्पता के प्रसार में प्रति वर्ष 3% की दर से (कुल 9%) कमी लाना।
  • मिशन का लक्ष्य वर्ष 2022 तक 0-6 आयु वर्ग के बच्चों में ठिगनेपन को 4% से घटाकर 25% करना है।

पृष्ठभूमि:

पांच साल से कम उम्र के एक तिहाई से अधिक बच्चे ठिगनेपन (Stunting) और दुर्बलता (Wasting) से ग्रसित हैं और एक से चार वर्ष की आयु के 40% बच्चे रक्ताल्पता (एनीमिक) से पीड़ित हैं। वर्ष 2016 में जारी ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य’ सर्वेक्षण 4 के अनुसार, 50% से अधिक गर्भवती और अन्य महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित पाई गईं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पोषण अभियान के तहत लक्ष्य और लक्ष्य।

मेंस लिंक:

‘पोषण ट्रैकर’ योजना के उद्देश्यों और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

पार्वो वायरस


संदर्भ:

अमरावती शहर में लगभग 2,000 पालतू और आवारा कुत्ते पिछले महीने ‘कुक्कुरीय / कैनाइन पार्वो वायरस’ (canine parvovirus) से प्रभावित हो चुके हैं। पशु चिकित्सकों ने पालतू जानवरों के मालिकों को इस गंभीर प्रकोप के प्रति पहले ही आगाह किया था।

‘पार्वो वायरस’ क्या है?

  • ‘पार्वो वायरस’ (Parvovirus), पिल्लों और कुत्तों को प्रभावित करने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है।
  • इसके संक्रमण से कुत्तों की आंतों पर प्रभाव पड़ता है, और पिल्ले (Puppies) इस रोग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
  • इस बीमारी से संक्रमित होने पर, खूनी दस्त, उल्टी, अत्यधिक वजन घटना, निर्जलीकरण और सुस्ती आदि लक्षण दिखाई देते हैं।
  • इस वायरस से संक्रमित होने पर 90 प्रतिशत मृत्यु दर की सूचना दर्ज की गयी है।

इस वायरस को सबसे पहले वर्ष 1967 में खोजा गया था, और यह तेजी से कुत्तों के स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। इसकी गंभीरता का मुख्य कारण है, कि इस वायरस को मारना काफी मुश्किल है और यह वातावरण में लंबे समय तक जीवित रह सकता है, इसके अलावा संक्रमित कुत्तों द्वारा बड़ी तेजी से फैलता है।

कुत्तों में यह वायरस किस प्रकार फैलता है?

कुत्तों में यह वायरस, किसी संक्रमित कुत्ते के साथ सीधे संपर्क में आने से, या संक्रमित कुत्तों को संभालने वाले लोगों के हाथों और कपड़ों सहित, किसी दूषित वस्तु के साथ अप्रत्यक्ष संपर्क के माध्यम से फैलता है।

संक्रमण मामलों की संख्या में वृद्धि का कारण:

  • पालतू जानवरों में ‘पार्वो वायरस’ के मामलों में हालिया वृद्धि कोविड -19 महामारी के कारण हुई है, जिसकी वजह से पालतू जानवरों के कई मालिक अपने कुत्तों का समय पर टीकाकरण नहीं करा सके।
  • इसके अलावा, पशु जन्म नियंत्रण कार्यक्रम के लागू न होने के कारण, पिछले तीन वर्षों में कुत्तों के टीकाकरण और रेबीज के कारण शहरों में ‘गली के कुत्तों में’ ‘पार्वो वायरस’ के मामले बढ़ गए हैं।

उपचार:

‘पार्वो वायरस’ का वर्तमान में कोई इलाज नहीं है, और पिल्ले या कुत्ते को टीका लगाने से, उन्हें संक्रमण से बचाया जा सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘पार्वो वायरस’ B19 (Parvovirus B19) केवल इंसानों को संक्रमित करता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘पार्वो वायरस’ के बारे में
  2. संचरण
  3. उपचार
  4. लक्षण

मेंस लिंक:

‘पार्वो वायरस’ क्या है? संबंधित चिंताएं क्या हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

कर्नाटक का ‘धर्मांतरण रोधी विधेयक’ मसौदा


संदर्भ:

हाल ही में, कर्नाटक सरकार द्वारा एक ‘धर्मांतरण रोधी विधेयक’ (anti-conversion Bill) तैयार किया गया है। प्रथमदृष्टया यह विधेयक, उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा लागू किए गए इसी तरह के कानून के आधार पर तैयार किया गया प्रतीत होता है।

कर्नाटक ‘धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण विधेयक’, 2021 (Karnataka Protection of Right to Freedom of Religion Bill, 2021) विधेयक के मसौदे से संकेत मिलता है, कि उत्तर प्रदेश में लागू क़ानून की भांति, इस प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य ‘धोखाधड़ी से’ या ‘विवाह’ के माध्यम से दूसरों का धर्म-परिवर्तन करने या प्रयास करने वाले लोगों को दंडित करना है।

कर्नाटक ‘धर्म की स्वतंत्रता के अधिकार का संरक्षण विधेयक’, 2021 के प्रमुख बिंदु:

  1. किसी भी व्यक्ति को अवैध रूप से किसी अन्य व्यक्ति का धर्म-परिवर्तन करने का दोषी पाए जाने पर, उसे न्यूनतम तीन से पांच साल की जेल और 25,000 रुपये के जुर्माने का सामना करना पड़ेगा।
  2. विधेयक में, ‘गैरकानूनी रूप से धर्मांतरित व्यक्ति’ के नाबालिग या महिला होने पर, अथवा अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित होने पर अधिक सजा का प्रावधान किया गया है – इसके तहत दोषी व्यक्ति को न्यूनतम तीन साल और अधिकतम दस साल की कैद, और 50,000 रुपये का जुर्माना का दंड दिया जाएगा।
  3. ‘सामूहिक धर्मांतरण’ के मामलों में, आरोपी व्यक्ति को तीन से दस साल की जेल और 1 लाख रुपये के जुर्माने का सामना करना पड़ सकता है।
  4. एक उपयुक्त अदालत, आरोपी व्यक्ति को “धर्मांतरण के शिकार” व्यक्ति को राशि 5 लाख रुपये तक के मुआवजे का भुगतान करने का आदेश दे सकती है, और आरोपी को कानून के तहत निर्धारित जुर्माने के अलावा, इस मुआवजे का भी भुगतान करना होगा।
  5. विधेयक में स्वेच्छा से धर्मांतरण करने के लिए एक लंबी प्रक्रिया निर्धारित की गयी है, और यह प्रक्रिया अंतर-धार्मिक विवाहों पर भी लागू होगी।

आगे की चुनौतियां:

कर्नाटक सरकार द्वारा अपने धर्मांतरण रोधी कानून के तहत लागू किए जाने वाले कुछ प्रावधानों पर,  भाजपा शासित एक अन्य राज्य- गुजरात में रोक लगा दी गयी थी।

  • वर्ष 2020 में, गुजरात सरकार द्वारा एक संशोधित धर्मांतरण रोधी कानून भी लाया गया था।
  • हालाँकि, गुजरात उच्च न्यायालय ने अगस्त 2021 में इसके कुछ प्रावधानों- जैसेकि ‘साक्ष्य जुटाने का भार’ (burden of proof), अंतर-धार्मिक विवाह करने वालों पर डालने संबंधी प्रावधान- पर रोक लगा दी थी।
  • गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा, कि यह प्रावधान भारत के संविधान के अंतर्गत प्रद्दत ‘व्यक्ति की पसंद और स्वतंत्रता के अधिकार’ का उल्लंघन करते हैं।

चूंकि इसी तरह के प्रावधान, कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयक में भी शामिल हैं, इसका मतलब है कि यह कानून संविधान द्वारा गारंटीकृत अधिकारों का उल्लंघन करता है।

पृष्ठभूमि:

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में पहले ही जबरन धर्मांतरण के खिलाफ सख्त कानून लागू किए चुके हैं। हरियाणा और कर्नाटक द्वारा भी इस तरह के कानून बनाने के इरादे की घोषणा की जा चुकी है।

लेकिन, केंद्रीय कानून बनाने की मांग करने वालों का कहना है, कि देश में हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया कि यह एक अखिल भारतीय रैकेट है, और इसलिए एक केंद्रीय कानून बनाए जाने की आवश्यकता है।

‘धर्मांतरण विरोधी कानूनों के अधिनियमन’ के पीछे तर्क:

  1. जबरन धर्म परिवर्तन की धमकी
  2. उकसावा या प्रलोभन की समस्या
  3. ‘धर्म परिवर्तन’ मौलिक अधिकार नहीं है।

आलोचकों का पक्ष:

कई विधि-वेत्ताओं द्वारा इस प्रकार के कानूनों की कड़ी आलोचना की गई है, इनका तर्क है, कि ‘लव जिहाद’ की अवधारणा का कोई संवैधानिक या कानूनी आधार नहीं है।

  • इन्होने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा है, संविधान, व्यक्तियों को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने के अधिकार की गारंटी देता है।
  • साथ ही, अनुच्छेद 25 के तहत भी सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता का और अपनी पसंद के धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने, प्रचार करने, और किसी भी धर्म का पालन न करने के अधिकार की गारंटी दी गयी है।

विवाह और धर्मांतरण पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले:

  1. भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने कई निर्णयों में यह कहा गया है, कि किसी वयस्क को अपना जीवन साथी चुनने संबंधी मामले में पूर्ण अधिकार होता है, और इस पर राज्य और अदालतों का कोई क्षेत्राधिकार नहीं है।
  2. भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने, लिली थॉमस और सरला मुद्गल, दोनों मामलों में यह पुष्टि की है, कि धार्मिक विश्वास के बिना और कुछ कानूनी लाभ प्राप्त करने के एकमात्र उद्देश्य के लिए किए गए धर्म-परिवर्तन का कोई आधार नहीं है।
  3. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 2020 के ‘सलामत अंसारी-प्रियंका खरवार’ मामले में निर्णय सुनाते हुए कहा कि, किसी साथी को चुनने का अधिकार अथवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, नागरिकों के ‘जीवन और स्वतंत्रता संबंधी मूल अधिकार’ (अनुच्छेद 21) का भाग है।

समय की मांग:

  1. एकरूपता की आवश्यकता: मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा (UDHR) के अनुच्छेद 18 के अनुसार, सभी व्यक्तियों को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसमे उनका धर्म परिवर्तन करने का अधिकार भी शामिल है। चूंकि यह राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार इस विषय पर, अनुबंध खेती पर मॉडल कानून आदि जैसा कोई एक मॉडल कानून बना सकती है।
  2. धर्मांतरण विरोधी कानून बनाते समय राज्यों को, अपनी इच्छा से धर्मांतरण करने वाले व्यक्ति के लिए कोई अस्पष्ट या अनेकार्थी प्रावधान नहीं करना चाहिए।
  3. धर्मांतरण विरोधी कानूनों में, अल्पसंख्यक समुदाय संस्थानों द्वारा धर्मांतरण के लिए कानूनी चरणों का उल्लेख करने संबंधी प्रावधान को भी शामिल करने की आवश्यकता है।
  4. लोगों को जबरदस्ती धर्मांतरण, प्रलोभन या प्रलोभन आदि से संबंधित प्रावधानों और तरीकों के बारे में भी शिक्षित करने की आवश्यकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘विशेष विवाह अधिनियम,’ 1954 (SMA) अलग-अलग धर्मों को मानने वाले जोड़ों के विवाह की सुविधा के लिए बनाया गया था?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 21 के बारे में
  2. अनुच्छेद 25
  3. ‘विशेष विवाह अधिनियम’ (SMA) के बारे में
  4. किन राज्यों द्वारा धर्मांतरण रोधी कानून पारित किए जा चुके हैं।

मेंस लिंक:

जीवन साथी को चुनने का अधिकार अथवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, नागरिकों के ‘जीवन और स्वतंत्रता संबंधी मूल अधिकार’ का भाग है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

इस्लामिक सहयोग संगठन


संदर्भ:

हाल ही में, ‘इस्लामिक सहयोग संगठन’ (Organisation of Islamic Conference – OIC) द्वारा अफगानिस्तान को एक आसन्न आर्थिक पतन से बचाने में मदद करने हेतु इस्लामाबाद में एक बैठक बुलाई गयी थी। अफगानिस्तान की आर्थिक विफलता का “भयानक” वैश्विक प्रभाव होने की संभावना व्यक्त की जा रही है।

इस शिखर सम्मेलन में दर्जनों विदेश मंत्रियों के साथ-साथ चीन, अमेरिका और रूस सहित प्रमुख शक्तियों और अफगानिस्तान के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

परिणाम:

इस बैठक के अंत में ‘इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक’ (IDB) के माध्यम से मानवीय सहायता प्रदान करने के लिए एक कोष स्थापित करने का वादा किया गया। यह कोष, विभिन्न देशों के लिए, अफगानिस्तान के तालिबान शासकों से सीधे संपर्क में आये, अनुदान करने के लिए एक कवर प्रदान करेगा।

संबंधित प्रकरण:

हाल ही में, अमेरिका और अन्य देशों से अफगानिस्तान की अवरुद्ध परिसंपत्तियों में फंसी हुई लगभग 10 बिलियन डॉलर से अधिक की राशि को ‘जारी’ करने की मांग बढ़ती जा रही है।

  • हालांकि, पहले अमेरिका ने कहा था, कि इसमें से कुछ राशि अल-कायदा द्वारा किए गए 9/11 के आतंकवादी हमलों के पीड़ितों और पीड़ितों के परिवारों से जुड़े मुकदमे से बंधी हुई है।
  • कई राष्ट्रों ने अफगानिस्तान को सहायता प्रदान करने के लिए, संयुक्त राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग संस्थानों के साथ मिलकर, देश की बैंकिंग प्रणाली को शीघ्र खोलने की मांग की है।

इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)  के बारे में:

  • OIC, वर्ष 1969 में स्थापित एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है, वर्तमान में इसमें 57 सदस्य देश सम्मिलित हैं।
  • यह संयुक्त राष्ट्र संघ के पश्चात दूसरा सबसे बड़ा अंतर-सरकारी संगठन है।
  • इस संगठन का कहना है कि यह “मुस्लिम विश्व की सामूहिक आवाज” है, और इसका उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय शांति और सद्भाव को बढ़ावा देना और साथ ही दुनिया के मुस्लिम समुदायों के हितों की रक्षा और संरक्षण हेतु कार्य करना है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ और यूरोपीय संघ में OIC के स्थायी प्रतिनिधिमंडल हैं।
  • इसका स्थायी सचिवालय सऊदी अरब के जेद्दाह में है।

भारत के लिए OIC का महत्व:

हाल के दिनों में भारत और OIC के मध्य आर्थिक और ऊर्जा संबंधी परस्पर निर्भरता में वृद्धि विशेष रूप महत्वपूर्ण हो गई है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. OIC- उद्देश्य
  2. कार्य
  3. सदस्य
  4. सहायक संगठन

मेंस लिंक:

इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC)  पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: आंतरिक सुरक्षा के लिये चुनौती उत्पन्न करने वाले शासन विरोधी तत्त्वों की भूमिका।

लोकुर आयोग


संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा इजरायल की साइबर-खुफिया कंपनी NSO ग्रुप द्वारा विकसित सैन्य श्रेणी के ‘पेगासस स्पाइवेयर’ के माध्यम से ‘मोबाइल फ़ोनों’ की कथित निगरानी किए जाने की जाँच करने हेतु गठित ‘न्यायमूर्ति मदन लोकुर आयोग’ (Lokur Commission) के समक्ष जारी सभी कार्यवाहियों पर रोक लगा दी।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा, कि शीर्ष अदालत द्वारा उक्त मामले को अखिल भारतीय बताए जाने के बावजूद, आयोग ने कार्य करना जारी रखा और राज्य द्वारा आयोग के कार्य पर रोक लगाने का वचन दिए जाने के बाद, इसका उल्लंघन किया गया है।

पृष्ठभूमि:

जुलाई 2021 में, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘जांच आयोग अधिनियम’, 1952 (Commissions of Inquiry Act, 1952) के तहत, इजरायल की साइबर-खुफिया कंपनी NSO ग्रुप द्वारा विकसित ‘पेगासस स्पाइवेयर’ के माध्यम से ‘टेलीफोन’ की कथित निगरानी किए जाने की जाँच करने हेतु एक ‘जांच आयोग’ (लोकुर आयोग) का गठन किया गया था।

इस आयोग को विभिन्न व्यक्तियों की निजता के कथित उल्लंघन की जांच का कार्य का सौंपा गया था।

इस प्रकार के आयोग गठित करने की शक्ति:

यद्यपि, केंद्र और राज्य, दोनों सरकारों द्वारा इस प्रकार के ‘जांच आयोगों का गठन किया जा सकता है, किंतु राज्य सरकार केवल उन विषयों पर ‘जांच आयोग’ गठित कर सकती है, जिन पर उसे कानून बनाने का अधिकार होता है।

  • यदि केंद्र सरकार द्वारा किसी विषय पर आयोग का गठन पहले किया जाता है, तो राज्य सरकार, उसी विषय पर, केंद्र सरकार की मंजूरी लिए बिना, अन्य समानांतर जांच आयोग का गठन नहीं कर सकती है।
  • किंतु, यदि राज्य सरकार द्वारा ‘जांच आयोग’ का गठन किया जाता है, और यदि केंद्र सरकार को लगता है, कि इस विषय पर जांच का दायरा दो या अधिक राज्यों तक बढाया जा सकता है, तो वह समान विषय पर दूसरा जांच आयोग गठित कर सकती है।

‘जांच आयोग’ को प्राप्त शक्तियां:

जांच आयोग अधिनियम, 1952 के अंतर्गत सरकार द्वारा गठित आयोग को, ‘सिविल प्रक्रिया संहिता’, 1908 (Code of Civil Procedure, 1908) के तहत किसी मुकदमे की सुनवाई के दौरान एक ‘दीवानी अदालत’ के समान शक्तियां प्राप्त होंगी।

  • इसका अर्थ है, कि आयोग के पास, किसी भी व्यक्ति को, भारत के किसी भी कोने से बुलाने और उसके समक्ष पेश होने, उसकी शपथ पर जांच करने तथा शपथपत्रों पर साक्ष्य प्राप्त करने की शक्तियां होती हैं।
  • जांच आयोग, किसी भी किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी भी लोक-अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि दिए जाने का आदेश दे सकता है।

आयोग द्वारा किन विषयों पर जांच की जा सकती है?

  • केंद्र सरकार द्वारा गठित आयोग, संविधान की सातवीं अनुसूची में सूची-I (संघ सूची) अथवा सूची-II (राज्य सूची) या सूची-III (समवर्ती सूची) में शामिल किसी भी प्रविष्टि से संबंधित, किसी भी मामले की जांच कर सकता है।
  • जबकि, राज्य सरकारों द्वारा गठित आयोग ‘सातवीं अनुसूची’ की सूची-II या सूची-III में शामिल प्रविष्टियों से संबंधित मामलों की जांच कर सकते हैं।

पेगासस ‘जांच आयोग’ का मामला किस सूची से संबंधित है:

  • ‘जांच आयोग’ का गठन करने हेतु, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘लोक व्यवस्था’ और ‘पुलिस’ प्रविष्टियों का हवाला दिया गया है। हालांकि, ये विषय सांतवी अनुसूची की ‘राज्य सूची’ के अंतर्गत आते है, फिर भी एक तर्क यह भी दिया जा सकता है कि उक्त मामले में ‘जांच’ की विषय-वस्तु, मुख्यतः केंद्रीय सूची के अंतर्गत आती है।
  • इसके अलावा, डाक और टेलीग्राफ, टेलीफोन, वायरलेस, प्रसारण और संचार के अन्य माध्यम संघ सूची की प्रविष्टि 31 से संबंधित हैं।

इस प्रकार के जाँच आयोग की रिपोर्ट का महत्व:

  • इस तरह के आयोगों के निष्कर्षों को, आम तौर पर विधानसभा या संसद में पेश किया जाता है, जो इस पर निर्भर करता है कि, आयोग का गठन किसके द्वारा किया गया है।
  • सरकार, आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं होती है। और हालांकि, आयोग के निष्कर्ष कार्यपालिका के लिए बाध्यकारी नहीं होते हैं, किंतु अदालतों द्वारा, साक्ष्य के रूप में इन निष्कर्षो पर विश्वास किया जा सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘सूचना सुरक्षा’ के संदर्भ में ‘सोशल इंजीनियरिंग’ (Social Engineering) क्या है? सोशल इंजीनियरिंग हमलों के प्रकार के बारे में कुछ शब्दांशों को जानिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. संविधान की 7वीं अनुसूची के बारे में
  2. लोकुर आयोग के बारे में
  3. जांच आयोग अधिनियम, 1952
  4. अधिनियम के तहत केंद्र और राज्यों की शक्तियां

मेंस लिंक:

जांच आयोग अधिनियम, 1952 से संबंधित मुद्दों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


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