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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 18 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनI

1. महिलाओं के लिए विवाह की विधिक आयु में वृद्धि

 

सामान्य अध्ययन-II

1. भारत का डेटा संरक्षण विधेयक

2. तमिलनाडु में ‘राज्य गीत’ बजते समय खड़ा होना अनिवार्य

3. पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960

 

सामान्य अध्ययन-III

1. अमेज़न- फ्यूचर ग्रुप सौदा

2. पेगासस जासूसी प्रकरण

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. कार्ड टोकनाइजेशन

2. प्रधानमंत्री मोदी को भूटान का शीर्ष नागरिक पुरस्कार

3. कालीबाड़ी मंदिर

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

महिलाओं के लिए विवाह की विधिक आयु में वृद्धि


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा महिलाओं के लिए विवाह हेतु कानूनी उम्र 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने का फैसला किया गया है।

यह फैसला ‘जया जेटली’ की अध्यक्षता में गठित समिति की सिफारिश पर आधारित है।

कार्यबल (Task force):

पिछले वर्ष, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा अपने बजट भाषण में मातृ मृत्यु दर कम करने और पोषण स्तर में सुधार के लिए ‘मातृत्व धारण करने के लिए लड़की की आयु’ निर्धारण हेतु एक समिति गठित किए जाने का प्रस्ताव किया गया था।

लेकिन, जब टास्क फोर्स नियुक्त करने के निर्णय की घोषणा की गई, तो इसके विचारणार्थ विषयों (Terms of referenceToR) में ‘माताओं और शिशुओं के स्वास्थ्य एवं पोषण स्थिति, तथा ‘विवाह एवं मातृत्व की उम्र के परस्पर संबंध’ की जांच करना’ भी शामिल कर दिया गया था।

महत्वपूर्ण अनुशंसाएं:

  • विवाह के लिए निर्धारित न्यूनतम आयु को बढ़ाकर 21 वर्ष किया जाना चाहिए।
  • सरकार को लड़कियों की स्कूलों और कॉलेजों तक पहुंच बढ़ाने पर, तथा दूर-दराज के क्षेत्रों से शिक्षा संस्थानों तक आने-जाने हेतु लड़कियों के परिवहन पर ध्यान देना चाहिए।
  • स्कूलों में कौशल और व्यावसायिक प्रशिक्षण, तथा यौन शिक्षा को शामिल किए जाने की भी सिफारिश की गई है।
  • इन सिफारिशों को प्राथमिकता में रखा जाना चाहिए, क्योंकि जब तक इन्हें लागू नहीं किया जाएगा और महिलाओं को सशक्त नहीं किया जाता है, तब तक विवाह-आयु संबंधी कानून अपेक्षित रूप से प्रभावी नहीं होगा।

समिति द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों के पक्ष में तर्क:

समिति के अनुसार, कि उपर्युक्त अनुशंसाएं ‘जनसंख्या नियंत्रण’ (भारत की ‘कुल प्रजनन दर’ में पहले से ही कमी आ रही है) के तर्क की अपेक्षा ‘महिला सशक्तिकरण एवं लैंगिक समानता’ पर अधिक आधारित है। समिति का कहना है, कि कानून के प्रभावी रूप से लागू होने के लिए, शिक्षा और आजीविका तक पहुंच में एक साथ वृद्धि की जानी चाहिए।

आलोचना:

  • महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस सुझाव का विरोध किया है और कई प्रमाणों का उद्धरण देते हुए यह साबित किया है, कि इस तरह की कार्यवाही का इस्तेमाल, माता-पिता की सहमति के बिना विवाह करने वाले युवा वयस्कों को ‘कैद करने’ के लिए किया जा सकता है।
  • साथ ही, इस कदम से कानून के लागू होने के बाद, होने वाले बड़ी संख्या में विवाहों का ‘अपराधीकरण’ हो जाएगा, अर्थात बड़ी संख्या में होने बाले विवाह ‘अपराध’ माने जाएंगे।

इस संदर्भ में वैधानिक प्रावधान:

वर्तमान में, कानून के अनुसार, पुरुष तथा महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु क्रमशः 21 और 18 वर्ष निर्धारित है।

विवाह हेतु निर्धारित न्यूनतम आयु, व्यस्क होने की आयु से भिन्न होती है। वयस्कता, लैंगिक रूप से तटस्थ होती है।

  1. भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 के अनुसार, कोई व्यक्ति 18 वर्ष की आयु पूरी करने पर ‘व्यस्क’ हो जाता है।
  2. हिंदुओं के लिए, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5 (iii), में वधू न्यूनतम आयु 18 वर्ष तथा वर के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित की गई है। बाल विवाह गैरकानूनी नहीं है किंतु विवाह में किसी नाबालिग (वर अथवा वधू) के अनुरोध पर विवाह को शून्य घोषित किया जा सकता है।
  3. इस्लाम में, नाबालिग के यौवन प्राप्त कर लेने के पश्चात विवाह को मुस्लिम पर्सनल लॉ, के तहत वैध माना जाता है।
  4. विशेष विवाह अधिनियम, 1954 और बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के अंतर्गत क्रमशः महिलाओं और पुरुषों के लिए विवाह के लिए सहमति की न्यूनतम आयु के रूप में 18 और 21 वर्ष निर्धारित की गयी है।

इस कानून पर पुनर्विचार की आवश्यकता:

महिलाओं में प्रारंभिक गर्भावस्था के जोखिमों को कम करने तथा ‘लैंगिक-तटस्थता’ लाने हेतु महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने के पक्ष में कई तर्क दिए जाते रहे हैं।

  • प्रारंभिक गर्भावस्था का संबंध बाल मृत्यु दर में वृद्धि से होता है तथा यह माँ के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
  • विवाह के लिए न्यूनतम आयु की अनिवार्यता तथा नाबालिग के साथ यौन संबंध बनाने को अपराध घोषित किये जाने के बाद भी, देश में बाल विवाह का काफी प्रचलन है।
  • इसके अलावा, एक अध्ययन के अनुसार, किशोर माताओं (10-19 वर्ष) से जन्म लेने वाले बच्चों में युवा-वयस्क माताओं (20-24 वर्ष) से पैदा होने वाले बच्चों की तुलना में 5 प्रतिशत तक कद में बौने रह जाने की संभावना होती है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जया जेटली समिति का गठन किस उद्देश्य के लिए किया गया था?
  2. भारत में पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु से संबंधित कानूनी प्रावधान
  3. विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के प्रमुख प्रावधान
  4. बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 का अवलोकन

मेंस लिंक:

क्या आपको लगता है कि पुरुषों और महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु सीमा में वृद्धि की जानी चाहिए? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

भारत का ‘डेटा संरक्षण विधेयक’


संदर्भ:

‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ 2019 (Personal Data Protection (PDP) Bill, 2019) पर, 11 दिसंबर 2019 को भाजपा सांसद पी.पी. चौधरी की अध्यक्षता में गठित ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (Joint Parliamentary Committee – JPC) द्वारा, अपने गठन के लगभग दो साल बाद, 16 दिसंबर को संसद के दोनों सदनों में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी है।

‘संयुक्त संसदीय समिति’ की प्रमुख अनुशंसाएं:

  1. ‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ के मौजूदा शीर्षक से ‘निजी’(Personal) शब्द को हटाया जाए। इसका उद्देश्य यह दर्शाना है, कि निजता को बेहतर ढंग से सुनिश्चित करने हेतु इस विधेयक में, अनामक किए जा चुके (anonymised) ‘निजी डेटा’ जैसे, ‘गैर-निजी डेटा’ से भी संबंधित प्रावधान किए गए है।
  2. भारत के बाहर ‘निजी डेटा के हस्तांतरण’ को प्रतिबंधित करने वाले अनुभाग में संशोधन किया जाए और इसमें यह जोड़ा जाए कि “संवेदनशील निजी डेटा को, केंद्र सरकार के अनुमोदन के बगैर, किसी भी विदेशी सरकार या एजेंसी के साथ साझा नहीं किया जाएगा।
  3. भारत में किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को, उसकी मूल कंपनी (जो इसकी सेवाओं के लिए प्रौद्योगिकी को नियंत्रित करती है) द्वारा देश में अपना कार्यालय स्थापित नहीं करने तक, संचालन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  4. ‘संयुक्त संसदीय समिति’ ने मीडिया को विनियमित करने के लिए एक अलग नियामक निकाय की स्थापना का प्रस्ताव किया है।
  5. किसी व्यक्ति द्वारा ‘अज्ञात’ (de-identified) किए जा चुके डेटा को फिर से ‘अभिज्ञात’ (Identified) किए जाने पर, उसे तीन साल तक का कारावास, अथवा 2 लाख रुपये का जुर्माना या दोनों, की सजा हो सकती है।
  6. विधेयक के नाम से ‘निजी’ शब्द हटा दिया जाना चाहिए।
  7. केंद्र सरकार, किसी भी सरकारी एजेंसी को विशेष परिस्थितियों में ही कानून से छूट दे सकती है।

इन सिफारिशों एवं यूरोपीय संघ के विनियमों की तुलना:

‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ पर ‘संयुक्त संसदीय समिति’ की सिफारिशें कुछ पहलुओं पर ‘यूरोपीय संघ के सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन’ (European Union’s General Data Protection Regulation GDPR) जैसे वैश्विक मानकों के समान हैं।

समानताएं:

  • सहमति: उपयोगकर्ताओं को उनके डेटा को संसाधित करने के तरीके के बारे में भलीभांति जानकारी देना चाहिए ताकि वे संबंधित मामलों में ‘सहमति’ देने अथवा बाहर निकलने पर निर्णय ले सकें।
  • सुरक्षा उल्लंघन: डेटा-लीक होने के 72 घंटों के भीतर अधिकारियों को ‘सुरक्षा उल्लंघन’ के बारे में सूचित किया जाना चाहिए।
  • परिवर्तन अवधि (Transition period): ‘सामान्य डेटा संरक्षण विनियमन’ (GDPR) के प्रावधानों को लागू करने के लिए दो साल की ‘परिवर्तन अवधि’ का निर्धारण।
  • डेटा न्यासी (Data fiduciary): यूरोपीय संघ के कानून के तहत, डेटा प्रोसेसिंग के उद्देश्य और पद्धति निर्धारित करने हेतु, कोई भी प्राकृतिक या कानूनी व्यक्ति, सार्वजनिक प्राधिकरण, एजेंसी या निकाय ‘डेटा न्यासी’ हो सकता है। भारत में ‘डेटा न्यासी’ के रूप में ‘गैर-सरकारी संस्थाएं’ (NGOs) को भी शामिल किया गया है।

डेटा संरक्षण प्राधिकरण:

संयुक्त संसदीय समिति ने ‘डेटा संरक्षण प्राधिकरण’ (Data Protection Authority – DPA) का गठन किए जाने की सिफारिश की है:

  • डेटा प्रोटेक्शन अथॉरिटी (DPA), निजता एवं निजी डेटा के साथ-साथ गैर-निजी डेटा से भी संबंधित मामलों का समाधान करेगी।
  • संरचना: ‘डेटा संरक्षण प्राधिकरण’ के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति, कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक चयन समिति की सिफारिश के आधार पर केंद्र सरकार द्वारा की जाएगी।
  • समिति के अन्य सदस्यों में ‘भारत के महान्यायवादी, सूचना एवं प्रोद्योगिकी मंत्रालय के सचिव तथा और विधि मंत्रालय के सचिव’ शामिल होंगे।
  • नामित सदस्य: केंद्र द्वारा एक स्वतंत्र विशेषज्ञ और आईआईटी तथा आईआईएम से एक-एक निदेशक नामित किया जाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि इस ‘विधेयक का स्रोत’ न्यायमूर्ति बी.एन. श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में गठित एक विशेषज्ञ समिति द्वारा तैयार की गयी रिपोर्ट में मिलता है। इस बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. डेटा संरक्षण विधेयक
  2. प्रमुख प्रावधान
  3. संसदीय समिति
  4. पुट्टस्वामी फैसला
  5. निजता का अधिकार

मेंस लिंक:

निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 के विवादास्पद प्रावधानों पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

तमिलनाडु में ‘राज्य गीत’ बजते समय खड़ा होना अनिवार्य


संदर्भ:

तमिलनाडु सरकार द्वारा ‘तमिल मातृभूमि’ की स्तुति में गाए जाने वाले एक प्रार्थना गीत ‘तमिल थाई वज़्थु’ (Tamil Thai Vaazhthu) को राजकीय गीत घोषित किया गया है।

एक सरकारी आदेश के माध्यम से, गीत के गायन के दौरान मौजूद सभी लोगों, दिव्यांग व्यक्तियों को छोड़कर, को खड़े रहने का निर्देश दिया गया है।

संबंधित विवाद:

तमिलनाडु सरकार का यह निर्णय मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के ‘कैन. इलांगो बनाम राज्य’ मामले (Kan. Ilango v. State case) में हाल के फैसले के बाद आया है।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था, कि ‘तमिल थाई वजथु’ केवल एक प्रार्थना गीत है, और अभी ऐसा कोई वैधानिक या कार्यकारी आदेश नहीं बना है, जिसमें उपस्थित लोगों को ‘तमिल थाई वज़थु’ गाए जाने पर खड़ा रहना अनिवार्य किया गया हो।“

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में दिए गए निर्णय:

  • उच्च न्यायालय ने वर्ष 1986 के ‘बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य’ मामले (Bijoe Emmanuel vs. State of Kerala case, 1986) का उल्लेख किया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने ‘यहोवा के साक्षी’ (Jehovah’s Witnesses) संप्रदाय के तीन बच्चों के स्कूल में पुनः प्रवेश का आदेश दिया था। इन बच्चों को राष्ट्रगान गाने से इनकार करने के कारण स्कूल से निष्कासित कर दिया गया था। उस समय सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था, कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसी को राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य करता है।
  • फिर, सुप्रीम कोर्ट ने ‘श्याम नारायण चौकसे बनाम भारत संघ’ (2017) मामले में निर्देश दिया था, कि फिल्म शुरू होने से पहले सभी सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान बजाया जाए और इस दौरान वहां उपस्थित सभी लोगों को खड़े रहना अनिवार्य होगा। बाद में अदालत ने अपने इस मूल निर्देश को संशोधित करते हुए, राष्ट्रगान प्रसारण के दौरान खड़ा होना “वैकल्पिक और गैर-अनिवार्य” बना दिया।

हाईकोर्ट द्वारा उठाए गए सवाल:

उच्च न्यायालय ने कहा, कि यद्यपि “यह सच है कि “तमिल थाई वज़्थु’ के गायन के दौरान श्रोतागण पारंपरिक रूप से खड़े हो जाते हैं, सवाल यह है कि क्या यही सम्मान प्रदर्शित करने का एकमात्र तरीका है”।

  • जब हम बहुलवाद और विविधता को मामने के बारे में गर्व व्यक्त करते हैं, तो इस बात पर जोर देना कि सम्मान प्रदर्शित करने का केवल एक ही तरीका हो सकता है, केवल पाखण्ड है।
  • साथ ही, यदि लोग केवल उनके लिए बनाए गए किसी कानून की वजह से, किसी का सम्मान करते हैं तथा यह “झूठा सम्मान” होगा।

संबंधित चिंताएं:

  • देशभक्ति की निगरानी करने वाले (Vigilantes), राज्य-गीत के गायन के दौरान किसी के खड़े न होने पर उसके साथ अभद्रता या मर-पीट कर सकते हैं।
  • राष्ट्र-गौरव अपमान-निवारण अधिनियम, 1971 (Prevention of Insults to National Honour Act, 1971) के तहत इस तरह के प्रतिबंध लगाने संबंधी कोई प्रावधान नहीं किया गया है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960


संदर्भ:

सुप्रीम कोर्ट द्वारा महाराष्ट्र को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ के समक्ष मामला लंबित रहने तक, राज्य में बैलगाड़ी दौड़ आयोजित करने की अनुमति दी गयी है। राज्य में बैलगाड़ी दौड़ (Bullock Cart Race) की लगभग 400 साल पुरानी परंपरा है।

संबंधित प्रकरण:

  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2014 में बैलगाड़ी दौड़ को ‘केंद्रीय अधिनियम’ के प्रावधानों का उल्लंघन घोषित किए जाने के बाद महाराष्ट्र में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  • तमिलनाडु सरकार द्वारा जल्लीकट्टू (बैल को वश में करना) को विनियमित करने हेतु एक कानून बनाए जाने के बाद, महाराष्ट्र में बैल-दौड़ को फिर से शुरू करने की मांग की जाने लगी।
  • अप्रैल 2017 में, महाराष्ट्र विधानसभा ने राज्य में बैलगाड़ी दौड़ को फिर से शुरू करने के लिए एक कानून पारित किया था।
  • अगस्त 2017 में, बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित किया, जिसमें महाराष्ट्र सरकार को ‘राज्य में कहीं भी बैलगाड़ी दौड़ की अनुमति देने’ से रोक दिया गया था।
  • इसके बाद राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

महाराष्ट्र की मांग:

हाल ही में, महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, तमिलनाडु और कर्नाटक राज्यों की भांति महाराष्ट्र राज्य में भी बैलगाड़ी दौड़ पर से प्रतिबंध हटा लिए जाने चाहिए।

इसके आगे:

सुप्रीमकोर्ट ने महाराष्ट्र में बैलगाड़ी दौड़ को फिर से शुरू करने की अनुमति देते हुए कहा है, कि संबंधित मामले को ‘संवैधानिक पीठ’ के पास भेज दिया गया है, और पीठ के समक्ष इसके लंबित रहने तक, ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) के संशोधित प्रावधानों की वैधता और राज्य में बैलगाड़ी दौड़ के लिए महाराष्ट्र द्वारा बनाए गए नियम लागू रहेंगे।

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के बारे में:

  • इस अधिनियम का उद्देश्य ‘अनावश्यक पीड़ा या जानवरों के उत्पीड़न की प्रवृत्ति’ को रोकना है।
  • इस अधिनियम की धारा 4 के तहत, वर्ष 1962 में ‘भारतीय पशु कल्याण बोर्ड’ (Animal Welfare Board of India- AWBI) की स्थापना की गई थी।
  • इस अधिनियम में अनावश्यक क्रूरता और जानवरों का उत्पीड़न करने पर सज़ा का प्रावधान है। यह अधिनियम ‘जानवरों’ और ‘जानवरों के विभिन्न प्रकारों’ को परिभाषित करता है।
  • इसके तहत, वैज्ञानिक उद्देश्यों हेतु जानवरों पर प्रयोग किए जाने से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं।

‘पशु क्रूरता निवारण (पशु संपत्ति की देखभाल और रखरखाव) नियम’, 2017 के बारे में:

(Prevention of Cruelty to Animals (Care and Maintenance of Case Property Animals) Rules, 2017)

  • इस क़ानून को ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ (Prevention of Cruelty to Animals Act), 1960 के अंतर्गत बनाया गया था।
  • 2017 के नियमों के अनुसार, मजिस्ट्रेट को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम के तहत मुकदमे में अभियुक्त व्यक्ति के मवेशियों को जब्त करने का अधिकार प्राप्त है।
  • जब्त किये गए जानवरों को फिर ‘चिकित्सालयों’, ‘गौशालाओं,’ पिंजरापोल’ (Pinjrapole), आदि में भेज दिया जाता है।
  • इसके बाद में संबंधित अधिकारी इन जानवरों को ‘पालने के लिए’ किसी को दे सकते हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ (PCA) के बारे में।
  2. ‘पशु क्रूरता निवारण (पशु संपत्ति की देखभाल और रखरखाव) नियम’
  3. प्रमुख प्रावधान
  4. जल्लीकट्टू

मेंस लिंक:

महाराष्ट्र में आयोजित की जाने वाली बैलगाड़ी दौड़ से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, औद्योगिक नीति में परिवर्तन तथा औद्योगिक विकास पर इनका प्रभाव।

अमेज़न- फ्यूचर ग्रुप सौदा


संदर्भ:

हाल ही में, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने फ्यूचर ग्रुप की इकाई में ‘अमेज़ॅन’ को निवेश करने हेतु नवंबर 2019 में दी गई अपनी मंजूरी पर रोक लगा दी है। यह रोक, अमेरिकी ई-कॉमर्स कंपनी ‘अमेज़ॅन’ द्वारा नियामक से अनुमोदन की मांग करते समय, इसके द्वारा किए जाने वाले निवेश के दायरे और पूर्ण विवरण को उजागर नहीं करने के आधार पर लगायी गयी है। इसके अलावा, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग ने ‘अमेज़ॅन’ पर कई जुर्माने भी लगा दिए हैं।

निहितार्थ:

अमेज़ॅन द्वारा ‘फ्यूचर ग्रुप’ के रिलायंस इंडस्ट्रीज को अपनी खुदरा संपत्ति बेचने संबंधी वर्ष 2020 के फैसले पर रोक लगाने की मांग की जा रही है, ‘भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग’ के हालिया निर्णय से इस सौदे से संबंधित कानूनी परिदृश्य और पेचीदा हो जाएगा।

Current Affairs

 

संबंधित प्रकरण:

(नोट: मामले का केवल संक्षिप्त अवलोकन करें। परीक्षा के दृष्टिकोण से इस मामले के बारे में कोई विवरण आवश्यक नहीं है।)

फ्यूचर ग्रुप और रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के मध्य अगस्त 2020 में 24,713 करोड़ रुपये का सौदा हुआ था, जिसके तहत ‘फ्यूचर रिटेल’ की रिटेल, होलसेल, लॉजिस्टिक्स और वेयरहाउसिंग इकाइयों को ‘रिलायंस रिटेल’ और ‘फैशनस्टाइल’ के लिए बेचा जाना था।

  • अमेज़न, ‘फ्यूचर ग्रुप’ का भारतीय साझेदार है।
  • अमेज़ॅन का कहना है, कि फ्यूचर ग्रुप ने अपनी परिसंपत्तियों को प्रतिद्वंद्वी के लिए बेच कर साझेदारी अनुबंध का उल्लंघन किया है, और यह अमेज़ॅन को तबाह करना चाहता है। जबकि, ऋणों के बोझ से दबे ‘फ्यूचर ग्रुप’ का कहना है, कि यदि यह सौदा नहीं हुआ तो वह बरबाद हो जाएगा।

 

अमेज़न द्वारा SIAC में मामला क्यों ले जाया गया?

आमतौर पर, किसी सौदे में पक्षकारों द्वारा एक ‘अनुबंध समझौते’ पर हस्ताक्षर किए जाते हैं, जिसमे निम्नलिखित विषयों के बारे में स्पष्ट किया जाता है:

  1. मध्यस्थता करने वाली मध्यस्थ संस्था
  2. लागू होने वाले नियम
  3. मध्यस्थता की जगह

इस मामले में अमेज़ॅन और फ्यूचर ग्रुप ने अपने समझौते के तहत, अपने विवादों को ‘सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र’ (SIAC) में निपटाने पर सहमति व्यक्त की थी। अतः अनुबंध के अनुसार, मामले को निपटाने हेतु सिंगापुर संभवतः उचित जगह थी।

SIAC के तहत प्रक्रिया:

सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (SIAC) में किसी विवाद को फैसले के लिए जाने के पश्चात, मध्यस्थ न्यायाधिकरण (arbitral tribunal) की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया शुरू होती है।

मध्यस्थ न्यायाधिकरण का गठन: प्रायः, तीन सदस्यीय न्यायाधिकरण होने पर, दोनों पक्षों द्वारा न्यायाधिकरण में एक-एक सदस्य की नियुक्ति की जाती हैं, तथा तीसरे सदस्य को दोनों पक्षों की सहमति से नियुक्त किया जाता है। सहमति नहीं होने पर, तीसरे सदस्य की नियुक्ति SIAC द्वारा की जाती है।

आपातकालीन मध्यस्थ की नियुक्ति:

  • आमतौर पर मध्यस्थ न्यायाधिकरण की नियुक्ति में समय लगता है।
  • अतः, SIAC के नियमों के तहत, पक्षकारों द्वारा ‘सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र’ से अंतरिम राहत पाने हेतु आपातकालीन मध्यस्थ (Emergency Arbitrator) नियुक्त करने को कहा जा सकता है। इसके साथ ही मुख्य मध्यस्थ न्यायाधिकरण की नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया जारी रहती है।

पक्षकारों द्वारा फैसला मानने से इंकार करने पर:

वर्तमान में भारतीय कानून के तहत, आपातकालीन मध्यस्थ (Emergency Arbitrator) के आदेशों के प्रवर्तन के लिए कोई अभिव्यक्‍त तंत्र नहीं है।

  • हालांकि, पक्षकारों द्वारा आपातकालीन मध्यस्थ (इमरजेंसी आर्बिट्रेटर) के आदेशों का स्वेच्छा से अनुपालन किया जाता है।
  • यदि, पक्षकारों द्वारा आदेशों का स्वेच्छा से अनुपालन नहीं किया जाता है, तो जिस पक्ष के हक़ में निर्णय दिया गया होता है, इस मामले में अमेज़ॅन, वह मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम (Arbitration & Conciliation Act), 1996 की धारा 9 के तहत, भारत में उच्च न्यायालय से सामान राहत पाने के लिए अपील कर सकता है।

सिंगापुर के ‘अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता’ केंद्र बनने का कारण:

  • भारत में निवेश करने वाले विदेशी निवेशक आमतौर पर भारतीय अदालतों की नीरस और निरर्थक प्रक्रिया से बचना चाहते हैं।
  • विदेशी निवेशकों को लगता है, कि विवादों के समाधान में सिंगापुर तटस्थ रहने वाला देश है।
  • समय के साथ सिंगापुर ने अंतरराष्ट्रीय मानकों और उच्च सत्यनिष्ठा सहित विधि के शासन द्वारा शासित क्षेत्राधिकार के रूप में एक उत्कृष्ट प्रतिष्ठा अर्जित कर ली है। इससे निवेशकों को विश्वास होता है कि मध्यस्थता प्रक्रिया त्वरित, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण होगी।

SIAC की 2019 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत, मध्यस्थता केंद्र का शीर्ष उपयोगकर्ता था। भारत से वर्ष 2019 में 485 मामले निर्णय करवाने हेतु SIAC में भेजे गए। इसके पश्चात, फिलीपींस (122 मामले), चीन (76 मामले) और संयुक्त राज्य अमेरिका (65 मामले) का स्थान रहा।

भारत का निजी अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र:

मुंबई में अब भारत का अपना अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र है।

सिंगापुर अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता केंद्र (SIAC) के बारे में:

यह सिंगापुर में स्थित एक गैर-लाभकारी अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता संगठन है। यह मध्यस्थता संबंधी अपने नियमों और UNCITRAL मध्यस्थता नियमों के तहत मध्यस्थता प्रबंधन करता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘अंतर्राष्ट्रीय समाधान समझौतों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय’ (United Nations Convention on International Settlement Agreements-UNCISA) के बारे में जानते हैं?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मध्यस्थता न्यायाधिकरण क्या है?
  2. SIAC के बारे में
  3. मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 का अवलोकन
  4. UNCITRAL के बारे में

मेंस लिंक:

सिंगापुर, अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का केंद्र क्यों बन गया है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

पेगासस जासूसी प्रकरण


(Pegasus snooping case)

संदर्भ:

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पेगासस (Pegasus) सॉफ्टवेयर के माध्यम से जासूसी किए जाने संबंधी आरोपों की जांच करने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा नियुक्त ‘जांच आयोग’ की आगे की कार्यवाही पर रोक लगा दी है।

Current Affairs

 

संबंधित प्रकरण:

कुछ समय पूर्व जारी रिपोर्ट्स में ‘पेगासस स्पाइवेयर’ (Pegasus spyware) का लगातार उपयोग किए जाने की पुष्टि की गई थी। इस ‘स्पाइवेयर’ को एक इजरायली कंपनी द्वारा, विश्व में कई देशों की सरकारों को बेचा जाता है। जिन फोनों को इस ‘पेगासस स्पाइवेयर’ के द्वारा लक्षित किया जाता है, उनकी तरह ही इस ‘स्पाइवेयर’ को भी अपडेट किया गया है और अब नई जासूसी क्षमताओं से युक्त है।

‘पेगासस’ क्या है?

यह ‘एनएसओ ग्रुप’ (NSO Group) नामक एक इजरायली फर्म द्वारा विकसित एक ‘स्पाइवेयर टूल’ अर्थात जासूसी उपकरण है।

  • यह स्पाइवेयर, लोगों के फोन के माध्यम से उनकी जासूसी करता है।
  • पेगासस, किसी उपयोगकर्ता के फ़ोन पर एक ‘एक्सप्लॉइट लिंक’ (exploit link) भेजता है, और यदि वह लक्षित उपयोगकर्ता, उस लिंक पर क्लिक करता है, तो उसके फोन पर ‘मैलवेयर’ (malware) या ‘जासूसी करने में सक्षम’ कोड इंस्टॉल हो जाता है।
  • एक बार ‘पेगासस’ इंस्टॉल हो जाने पर, हमलावर के पास ‘लक्षित’ उपयोगकर्ता के फोन पर नियंत्रण और पहुँच हो जाती है।

‘पेगासस’ की क्षमताएं:

  • पेगासस, “लोकप्रिय मोबाइल मैसेजिंग ऐप से, लक्षित व्यक्ति का निजी डेटा, उसके पासवर्ड, संपर्क सूची, कैलेंडर ईवेंट, टेक्स्ट संदेश, लाइव वॉयस कॉल आदि को हमलावर के पास पहुंचा सकता है”।
  • यह, जासूसी के के दायरे का विस्तार करते हुए, फ़ोन के आस-पास की सभी गतिविधियों को कैप्चर करने के लिए लक्षित व्यक्ति के फ़ोन कैमरा और माइक्रोफ़ोन को चालू कर सकता है।

‘जीरो-क्लिक’ अटैक क्या है?

‘जीरो-क्लिक अटैक’ (zero-click attack), पेगासस जैसे स्पाइवेयर को बिना किसी मानवीय संपर्क या मानवीय त्रुटि के, लक्षित डिवाइस पर नियंत्रण हासिल करने में मदद करता है।

  • तो, जब लक्षित डिवाइस ही ‘सिस्टम’ बन जाता है, तो ‘फ़िशिंग हमले से कैसे बचा जाए, या कौन से लिंक पर क्लिक नहीं करना है, इस बारे में सभी तरह की जागरूकता व्यर्थ साबित हो जाती है।
  • इनमें से अधिकतर ‘जीरो-क्लिक अटैक’ किसी भी उपयोगकर्ता द्वारा डिवाइस पर प्राप्त हुए डेटा की विश्वसनीयता निर्धारित करने से पहले ही, सॉफ़्टवेयर का इस्तेमाल कर लेते हैं।

मैलवेयर, ट्रोजन, वायरस और वर्म में अंतर:

मैलवेयर (Malware), कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से अवांछित अवैध कार्य करने के लिए डिज़ाइन किया गया सॉफ़्टवेयर होता है। इसे दुर्भावनापूर्ण इरादे वाले सॉफ़्टवेयर के रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है।

मैलवेयर को उनके निष्पादन, प्रसार और कार्यों के आधार पर वर्गीकृत किया जा सकता है। इसके कुछ प्रकारों की चर्चा नीचे की गई है।

  1. वायरस (Virus): यह एक प्रोग्राम होता है, जो कंप्यूटर के अन्य प्रोग्रामों को, उनमे अपनी ही एक संभावित विकसित प्रतिलिपि शामिल करके, संशोधित और संक्रमित कर सकता है।
  2. वर्म्स (Worms): यह कंप्यूटर नेटवर्क के माध्यम से प्रसारित होते हैं। यह, कंप्यूटर वर्म्स, वायरस के विपरीत, वैध फाइलों में घुसपैठ करने के बजाय एक सिस्टम से दूसरे सिस्टम में खुद को कॉपी करते हैं।
  3. ट्रोजन (Trojans): ट्रोजन या ट्रोजन हॉर्स एक ऐसा प्रोग्राम होते है, जो आमतौर पर किसी सिस्टम की सुरक्षा को बाधित करते है। ट्रोजन का उपयोग, सुरक्षित नेटवर्क से संबंधित कंप्यूटरों पर बैक-डोर बनाने के लिए किया जाता है ताकि हैकर सुरक्षित नेटवर्क तक अपनी पहुंच बना सके।
  4. होक्स (Hoax): यह एक ई-मेल के रूप में होता है, और उपयोगकर्ता को, उसके कंप्यूटर को नुकसान पहुचाने वाले किसी सिस्टम के बारे में चेतावनी देता है। इसके बाद, यह ई-मेल संदेश, उपयोगकर्ता को नुकसान पहुंचाने वाली सिस्टम को ठीक करने के लिए एक ‘प्रोग्राम’ (अक्सर डाउनलोड करने के लिए) चालू करने का निर्देश देता है। जैसे ही यह प्रोग्राम चालू या ‘रन’ किया जाता है, यह सिस्टम पर हमला कर देता है और महत्वपूर्ण फाइलों को मिटा देता है।
  5. स्पाइवेयर (Spyware): यह कंप्यूटर पर हमला करने वाले प्रोग्राम होते हैं, और, जैसा कि इसके नाम का तात्पर्य है, ये बिना सहमति के उपयोगकर्ता की गतिविधियों पर नज़र रखते है। ‘स्पाइवेयर’ आमतौर पर वास्तविक ई-मेल आईडी, गैर-संदेहास्पद ई-मेल के माध्यम से अग्रेषित किए जाते हैं। स्पाइवेयर, दुनिया भर में लाखों कंप्यूटरों को संक्रमित करते रहते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा, केंद्र सरकार पर नागरिकों की जासूसी करने के लिए इजरायली सॉफ्टवेयर पेगासस का इस्तेमाल करने संबंधी लगने वाले आरोपों की जांच करने हेती सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश आर.वी. रवींद्रन की निगरानी में एक विशेषज्ञ तकनीकी समिति की नियुक्ति की गयी है?

क्या आपने ‘गूगल  प्रोजेक्ट ज़ीरो’ के बारे में सुना है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. स्पाइवेयर के बारे में
  2. पेगासस के बारे में
  3. स्पाइवेयर, मैलवेयर और ट्रोजन के बीच अंतर

मेंस लिंक:

‘जीरो-क्लिक अटैक’ क्या है? इसके बारे में चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


कार्ड टोकनाइजेशन

‘टोकनाइजेशन’ (Tokenisation) का तात्पर्य, एक वास्तविक कार्ड के संवेदनशील विवरण को एक यूनिक कोड वाले टोकन (token) में परिवर्तित करना है। यह एक कार्ड, टोकन अनुरोधकर्ता (अर्थात वह इकाई जो कार्ड को टोकन में परिवर्तित करने हेतु ग्राहक से अनुरोध स्वीकार करती है और इसे टोकन जारी करने के लिए संबंधित कार्ड नेटवर्क को अग्रेषित कर देती है) और डिवाइस का अनोखा संयोजन होता है।

कार्ड के विवरण के बजाय, यह टोकन ‘बिक्री बिंदु’ (Point of Sale – POS) टर्मिनलों और ‘त्वरित प्रतिक्रिया’ (Quick Response – QR) कोड भुगतान प्रणाली पर, कार्ड के रूप में कार्य करेगा। इस प्रक्रिया का लक्ष्य भुगतान की सुरक्षा और सुरक्षा में सुधार करना है।

संदर्भ:

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा ‘कार्ड टोकनाइजेशन’ की ओर बढ़ने की योजना से, प्रमुख ई-कॉमर्स फर्मों और खाद्य वितरण फर्मों से लेकर ऋणदाताओं तक की कंपनियों की एक विस्तृत श्रृंखला प्रभावित होने की संभावना है, जबकि नकदी का उपयोग बढ़ता जा रहा है।

  • आरबीआई ने डेटा सुरक्षा को बढ़ावा देने के लिए मार्च 2020 में दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा था, कि व्यापारियों को अपनी वेबसाइटों पर कार्ड से संबंधित विवरण सहेजने की अनुमति नहीं होगी।
  • केंद्रीय बैंक द्वारा सितंबर 2021 में नए दिशा-निर्देश जारी किए गए, जिनमें कंपनियों को साल के अंत तक नियमों का पालन करने और उन्हें ‘टोकनाइजेशन’ करने का विकल्प दिया गया है।

Current Affairs

 

प्रधानमंत्री मोदी को भूटान का शीर्ष नागरिक पुरस्कार

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी को भूटान के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार, ‘ऑर्डर ऑफ द ड्रक ग्यालपो’ से सम्मानित किया गया है।

  • यह पुरस्कार भूटान के राजा ‘जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक’ द्वारा भारत-भूटान संबंधों में मोदी के योगदान तथा भूटान और उसके लोगों के प्रति उनकी सेवाओं के सम्मान में प्रदान किया गया था।
  • प्रधान मंत्री मोदी यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले, किसी अन्य देश की सरकार के पहले प्रमुख हैं।

 

कालीबाड़ी मंदिर

यह हिंदू मंदिर, बांग्लादेश में स्थित है।

  • हाल ही में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस मंदिर का उद्घाटन किया था। इसे पाकिस्तानी सेना ने 1971 में नष्ट कर दिया था।
  • इस मंदिर को मूल रूप से ‘रमना कालीबाड़ी’ कहा जाता था, जिसे मध्ययुगीन काल में निर्मित किया गया था और अपनी लंबी एवं ऊँची आकृति के लिए प्रसिद्ध था।
  • 1929 में, मंदिर परिसर में प्रसिद्ध संत आनंदमयी के भक्तों के लिए एक अतिरिक्त भवन का निर्माण करवाया गया। आनंदमयी, बाद में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के आध्यात्मिक सलाहकार बनी।

current affairs

 


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