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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 09 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनI

1. विश्व असमानता रिपोर्ट

 

सामान्य अध्ययन-II

1. भारत का विधि आयोग

2. केन-बेतवा लिंक परियोजना को मंजूरी

3. पोषण अभियान

 

सामान्य अध्ययन-III

1. एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस (UPI)

2. पेप्सिको पेटेंट

3. चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (वेतन एवं सेवा शर्तें) संशोधन विधेयक, 2021

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

विश्व असमानता रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में, ‘विश्व असमानता रिपोर्ट 2022’ (World Inequality Report, 2022) जारी की गई है।

विश्व असमानता रिपोर्ट (WIR) के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य:

  • यह रिपोर्ट ‘पेरिस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स’ के एक शोध केंद्र ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ द्वारा जारी की गई है।
  • ‘विश्व असमानता रिपोर्ट’ में किसी देश (और विश्व) में आय और धन के वितरण के बारे में जानने हेतु विभिन्न प्रकार के वित्तीय डेटा का अध्ययन किया जाता है।

इस रिपोर्ट का महत्व- असमानताओं पर अध्ययन की आवश्यकता:

इस रिपोर्ट में दी जाने वाली जानकारी काफी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि अधिकांश लोकतंत्रों में, धनी व्यक्ति अपनी आर्थिक शक्ति को राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित कर सकते हैं और ऐसा करते भी हैं। और इसलिए, जिस देश में असमानता जितनी अधिक होगी, वहां इस बात की उतनी ही अधिक संभावना होगी कि आर्थिक रूप से संपन्न अल्पसंख्यक, देश के बहुसंख्यकों के भाग्य का निर्धारण कर सकते हैं।

असमानता स्तरों के बारे में सटीक डेटा की उपलब्धता, असमानता कम करने में सक्षम नीतिगत उपायों के पक्ष में जनमत तैयार करने में सहायक हो सकते हैं।

विश्व असमानता रिपोर्ट, 2022 के प्रमुख निष्कर्ष:

  • राष्ट्रीय आय में भागीदारी के संदर्भ में अमीर और गरीब के बीच का अंतर काफी बड़ा है, और सरकारी नीतियों के समृद्ध अभिजात वर्ग के पक्ष में होने के परिणामस्वरूप इस अंतर में तेजी से वृद्धि हो रही है। वैश्विक आबादी के 10 प्रतिशत सबसे अमीर आबादी के पास वैश्विक आय का 52% हिस्सा है, जबकि सबसे गरीब 50% आबादी को इसका मात्र 5% भाग प्राप्त होता है।
  • वैश्विक संपत्ति असमानता, आय असमानता से भी बदतर हैं। सबसे गरीब 50% आबादी के पास वैश्विक संपत्ति का मात्र 2% है, जबकि सबसे अमीर 10% आबादी के पास कुल संपत्ति का 76% भाग है।
  • देशों के बीच असमानता में कमी कम हो रही है, जबकि देशों के भीतर असमानता बढ़ती जा रही है। सबसे अमीर 10% देशों की औसत आय और सबसे गरीब 50% देशों की औसत आय के बीच का अंतर 50 गुणा से घटकर 40 गुणा से भी कम हो गया है। देशों के भीतर शीर्ष 10% व्यक्तियों और निचले 50% व्यक्तियों की औसत आय के बीच का अंतर लगभग दोगुना (5 गुणा से 15 गुणा) हो गया है।
  • देश अमीर होते जा रहे हैं, किंतु सरकारें गरीब होती जा रही हैं: राष्ट्रीय संपत्ति में निजी स्वामित्व वाली संपत्ति का हिस्सा बढ़ रहा है, जबकि सार्वजनिक परिसंपत्तियों (भवन, विश्वविद्यालय, सड़क, अस्पताल आदि) का हिस्सा कम होता जा रहा है।

 

महाद्वीपों के मध्य असमानता:

रिपोर्ट के अनुसार, यूरोप सबसे कम असमानता वाला महाद्वीप है, और यहाँ शीर्ष 10% आबादी का आय में 36% हिस्सा है। ‘मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका’ (Middle East and North Africa – MENA) में सर्वाधिक असमानता देखी गयी है, यहाँ शीर्ष 10% आबादी का आय में 58 प्रतिशत हिस्सा है।

भारत में आय असमानता:

  • भारत विशव के सबसे असमान देशों में से एक है, और यहाँ शीर्ष 1% आबादी का राष्ट्रीय आय में 7% हिस्सा है।
  • शीर्ष 10 प्रतिशत भारतीयों का राष्ट्रीय आय में 57% हिस्सा है, जबकि निचले स्तर की 50% आबादी का मात्र 13% हिस्सा है।
  • निचले स्तर की 50% आबादी की औसत राष्ट्रीय आय ₹53,610 है, जबकि शीर्ष 10% आबादी की आय इससे 20 गुना अधिक, अर्थात ₹11,66,520 है।

भारत में असमानता- 1947 से पहले और बाद में:

भारत में वर्तमान ‘आय असमानता’ ब्रिटिश शासन-काल के मुकाबले बदतर है। अंग्रेजी शासन (1858-1947) के दौरान, भारत में शीर्ष 10% आबादी का राष्ट्रीय आय में लगभग 50% (वर्तमान के 57% से कम) हिस्सा था।

  • भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद के दशकों में, समाजवादी आर्थिक नीतियों ने आय असमानता को कम किया, जिससे शीर्ष 10% आबादी की हिस्सेदारी 35-40% हो गई।
  • रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के दशक से, “विनियमन और उदारीकरण नीतियों की वजह से विश्व में आय और धन असमानता में सबसे अधिक वृद्धि देखी गयी है।”

रिपोर्ट के समग्र निष्कर्ष:

रिपोर्ट में इस तथत को उजागर किया गया है कि असमानता और गरीबी अपरिहार्य या निश्चित नहीं होती है, बल्कि मुख्य रूप से यह नीतिगत निर्णयों का नतीजा होती हैं।

  • रिपोर्ट में, 1980 के दशक के बाद से – पिछले तीन दशकों के विपरीत -विभिन्न देशों में लागू किए गए उदारीकरण कार्यक्रमों के बाद, दुनिया भर में असमानताओं के बढ़ने संबंधी करणों का पता लगाया गया है।
  • विश्व असमानता रिपोर्ट, 2022 में, नीतिगत उपायों के रूप में अत्याधिक धनवान (सुपर-रिच) पर संपत्ति कर लगाने तथा, एक सशक्त पुनर्वितरण व्यवस्था, जो यदि बढ़ती असमानता की मौजूदा प्रवृत्ति को उलट नहीं सके तो कम से कम इसे रोकने में सक्षम हो, तैयार करने की सिफारिश की गयी है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. विश्व असमानता रिपोर्ट (WIR) किसके द्वारा जारी की जाती है?
  2. मानदंड
  3. रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
  4. भारतीय परिदृश्य

मेंस लिंक:

भारत में बढ़ती असमानता से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

भारत का विधि आयोग


संदर्भ:

सरकार ने उच्चतम न्यायालय को सूचित करते हुए बताया है, कि भारत के 22वें विधि आयोग (Law Commission of India) के अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति पर विचार किया जा रहा है।

संबंधित प्रकरण:

22वें विधि आयोग का गठन, सरकार द्वारा 21 फरवरी, 2020 को किया गया था। हालांकि, इसमें की जाने वाली नियुक्तियों को लेकर अब तक कोई प्रगति नहीं हुई है, और विधि मंत्रालय द्वारा अदालत में दायर संक्षिप्त हलफनामे में, इस सबंध में कोई कारण नहीं बताए गए हैं।

शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत’:

सुनवाई के दौरान, सरकार ने ‘शक्तियों के पृथक्करण’ (Doctrine of Separation of Power) का हवाला देते हुए कहा है, कि शासन के एक अंग को दूसरे के कार्यों में अतिक्रमण नहीं करना चाहिए।

‘भारत के विधि आयोग’ के बारे में:

भारत का विधि आयोग (Law Commission of India), भारत सरकार के एक आदेश द्वारा गठित एक कार्यकारी निकाय है।

  • मूल रूप से 1955 में गठित, ‘विधि आयोग’ का हर तीन साल में पुनर्गठन किया जाता है, और यह आयोग सरकार को अब तक 277 रिपोर्टें सौंप चुका है।
  • न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान (सेवानिवृत्त) की अध्यक्षता में पिछले विधि आयोग द्वारा लोकसभा और विधानसभाओं में एक साथ चुनाव और ‘समान नागरिक संहिता’ जैसे प्रमुख मुद्दों पर रिपोर्ट और कार्य-पत्र प्रस्तुत किए गए थे।

विधि आयोग की संरचना:

  • 22 वें विधि आयोग में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष के अतिरिक्त, एक सदस्य-सचिव सहित चार पूर्णकालिक सदस्य होते होंगे।
  • विधि मंत्रालय के ‘कानूनी मामलों के विभाग’ के सचिव एवं ‘विधायी विभाग’ के सचिव पदेन सदस्य के रूप में सम्मिलित होंगे
  • आयोग में अधिकतम पांच अंशकालिक सदस्य शामिल होंगे।
  • सर्वोच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश, विधि आयोग का अध्यक्ष होगा।

भूमिकाएं और कार्य:

  • विधि आयोग, केंद्र सरकार द्वारा सौंपे गए संदर्भों या स्वप्रेरणा से, कानूनों की जांच करेगा तथा नए कानून बनाने, और भारत में मौजूदा कानूनों में सुधार करने हेतु उनकी समीक्षा करेगा।
  • आयोग, प्रक्रियाओं में होने वाली देरी को समाप्त करने, मामलों के त्वरित निपटान, मुकदमेबाजी की लागत में कमी आदि के लिए ‘न्याय वितरण प्रणाली’ में सुधार लाने हेतु अध्ययन और अन्वेषण भी करेगा।

सुधारों की आवश्यकता:

विधि आयोग को एक क़ानून के तहत लाया जाना चाहिए, जिसमे आयोग से संबंधित नियुक्तियों, कार्यों और शक्तियों के बारे में स्पष्ट प्रावधान किए गए हों।

शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत:

‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत, शासन के एक मॉडल को संदर्भित करता है, जिसमे कार्यकारी, विधायी और न्यायिक शक्तियां किसी एक निकाय में केंद्रित नहीं होती हैं, बल्कि विभिन्न शाखाओं में विभाजित होती हैं।

यह भारतीय संविधान की मूल संरचना का एक भाग है, किंतु, इसका संविधान में स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं किया गया है।

संविधान में ‘शक्तियों के पृथक्करण’ को अभिव्यक्त करने संबंधी अनुच्छेद:

  1. अनुच्छेद 50: राज्य, न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक्‌ करने के लिए कदम उठाएगा। इसका उद्देश्य न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करना है।
  2. अनुच्छेद 122 और 212: संसद‌ एवं विधानसभाओं की किसी कार्यवाही की विधिमान्यता को प्रक्रिया की किसी ‍अभिकथित अनियमितता के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा। साथ ही, इन अनुच्छेदों के तहत सांसदों / विधायकों के लिए अभिव्यक्ति के संदर्भ में कुछ विशेषाधिकार प्रदान किये गए है, और सदन के पटल पर कही गई कोई भी बात उनके खिलाफ इस्तेमाल नहीं की जा सकती।
  3. संविधान के अनुच्छेद 121 और 211 के अनुसार; सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के न्यायिक आचरण पर संसद और राज्य विधानमंडल में चर्चा नहीं की जा सकती है।
  4. अनुच्छेद 53 और 154 में प्रावधान है, कि संघ और राज्य की कार्यकारी शक्ति राष्ट्रपति और राज्यपाल में निहित होगी और इनके लिए नागरिक और आपराधिक दायित्व से प्रतिरक्षा प्राप्त होगी।
  5. अनुच्छेद 361: राष्ट्रपति या राज्यपाल अपने पद की शक्तियों और कर्त्तव्यों के निर्वहन और उसके तहत किये जाने वाले किसी भी कार्य के लिये किसी न्यायालय में उत्तरदायी नहीं होंगे।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि आजादी से पहले, प्रथम आयोग का गठन वर्ष 1834 में ब्रिटिश सरकार ने द्वारा  चार्टर एक्ट- 1833 के तहत लॉर्ड मैकाले की अध्यक्षता में किया गया था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘जनहित याचिका’ क्या है?
  2. ‘जनहित याचिका’ किसके द्वारा दाखिल की जा सकती है?
  3. जनहित याचिका के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय की शक्तियां।
  4. संविधान में शक्तियों के पृथक्करण संबंधी अनुच्छेद।

मेंस लिंक:

‘शक्तियों के पृथक्करण’ का सिद्धांत क्या है? क्या है? भारतीय संविधान के अंतर्गत इसका पालन किस प्रकार किया जाता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए मंजूरी


संदर्भ:

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 2020-21 की कीमतों के आधार पर 44,605 ​​करोड़ रुपये की लागत से ‘केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना’ (Ken-Betwa river interlinking project) की परियोजना के वित्तपोषण और कार्यान्वयन को मंजूरी दे दी है।

इस परियोजना के लिये केंद्रीय समर्थन के रूप में 39,317 करोड़ रुपये,  सहायक अनुदान के रूप में 36,290 करोड़ रुपये और ऋण के रूप में 3,027 करोड़ रुपये की धनराशि को मंजूर की गयी है।

परियोजना के बारे में:

  • इस परियोजना के तहत केन का पानी बेतवा नदी में भेजा जायेगा। यह दाऊधाम बांध के निर्माण तथा दोनों नदियों से नहर को जोड़ने, लोअर उर परियोजना (Lower Orr Project), कोठा बैराज और बीना कॉम्प्लेक्स परियोजना (Bina Complex Multipurpose Project) के जरिये पूरा किया जायेगा।
  • परियोजना को उत्कृष्ट प्रौद्योगिकी के साथ आठ वर्षों में क्रियान्वित किए जाने का प्रस्ताव है।

current affairs

परियोजना का महत्व:

परियोजना से 10.62 लाख हेक्टेयर रकबे की वार्षिक सिंचाई हो सकेगी, लगभग 62 लाख की आबादी को पीने का पानी मिलेगा तथा 103 मेगावॉट पन बिजली और 27 मेगावॉट सौर ऊर्जा पैदा होगी।

  • यह परियोजना पानी की कमी से जूझते, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश राज्यों के बुंदेलखंड इलाके के लिये बहुत फायदेमंद है।
  • इस परियोजना से कृषि गतिविधियों के बढ़ने और रोजगार सृजन से बुंदेलखंड के पिछड़े इलाके में सामाजिक-आर्थिक समृद्धि में तेजी आने की संभावना है।
  • इससे क्षेत्र में संकट की वजह से होने वाले विस्थापन को भी रोकने में मदद मिलेगी।

संबंधित चिंताएं:

कई बाधाओं की वजह से यह परियोजना प्रभावित हो सकती है।

  • इस परियोजना से, मध्य प्रदेश में पन्ना टाइगर रिजर्व आंशिक रूप से जलमग्न हो जाएगा, जिससे अन्य जीवों सहित गिद्धों और गीदड़ों के आवासों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
  • कई वर्षों के विरोध के बाद, अंततः 2016 में सर्वोच्च वन्यजीव नियामक, राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड द्वारा इस परियोजना को मंजूरी दी गई।

इंटरलिंकिंग के लाभ:

  1. पानी और खाद्य सुरक्षा में वृद्धि
  2. पानी का उचित उपयोग
  3. कृषि को बढ़ावा
  4. आपदा न्यूनीकरण
  5. परिवहन को बढ़ावा

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • केन और बेतवा नदियाँ मध्यप्रदेश से निकलती हैं, और यमुना की सहायक नदियाँ हैं।
  • केन नदी उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में यमुना और हमीरपुर जिले में बेतवा से मिलती है।
  • बेतवा नदी, पर राजघाट, परीचा और माताटीला बांध निर्मित किए गए हैं।
  • केन नदी, पन्ना टाइगर रिजर्व से होकर गुजरती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘नदियों को आपस में जोड़ने संबंधी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना’ (National Perspective Plan) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. परियोजना के बारे में
  2. केन और बेतवा- सहायक नदियाँ और संबंधित राज्य
  3. पन्ना टाइगर रिजर्व के बारे में
  4. भारत में बायोस्फीयर रिजर्व

मेंस लिंक:

‘केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

पोषण अभियान


संदर्भ:

केंद्र सरकार ने लोकसभा को सूचित करते हुए बताया है, कि राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों ने पिछले तीन वर्षों में ‘पोषण अभियान’ (Poshan Abhiyan) या ‘पोषण मिशन’ के तहत जारी कुल धनराशि का केवल 56% उपयोग किया है।

  • वित्तीय वर्ष 2019 से 2021 के बीच केंद्र द्वारा वितरित कुल ₹5,312 करोड़ की राशि में से ₹2,985 करोड़ की राशि का उपयोग किया गया।
  • देश में “गंभीर रूप से कुपोषित” (Severe Acute Malnourished) बच्चों की संख्या 15 लाख से कम हो गई है।

पोषण अभियान के बारे में:

  • इस कार्यक्रम को बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण परिणामों में सुधार करने हेतु शुरू किया गया है।
  • इस कार्यक्रम को वर्ष 2022 तक पूरे किये जाने वाले विशिष्ट लक्ष्यों सहित वर्ष 2018 में आरंभ किया गया था।

कार्यक्रम का उद्देश्य:

  • बच्चों में नाटेपन और दुर्बलता में प्रतिवर्ष 2% (वर्ष 2022 तक कुल 6%) की कमी करना।
  • बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं में प्रति वर्ष 3% (वर्ष 2022 तक कुल 9%) रक्त-अल्पता को कम करना।

इस मिशन का लक्ष्य वर्ष 2022 तक 0-6 साल आयु वर्ग के बच्चों में नाटेपन को 38.4% से 25% तक कम करना है।

पृष्ठभूमि:

पांच साल के कम आयु के एक तिहाई से अधिक बच्चे नाटेपन और दुर्बलता, तथा एक से चार आयु वर्ग के 40% बच्चे रक्त-अल्पता से ग्रसित हैं। वर्ष 2016 में जारी किये गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 4 के अनुसार, 50% से अधिक गर्भवती और अन्य महिलाओं में रक्त-अल्पता पायी गयी।

नीति आयोग द्वारा दिए गए सुझाव:

  • केंद्र द्वारा वर्ष 2022 तक नाटेपन, दुर्बलता और रक्त-अल्पता को कम करने हेतु निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।
  • एक पोषण प्लस रणनीति के लिए, अभियान में चार प्रमुख स्तम्भों को सशक्त बनाने के साथ ही NHM/ICDS वितरण तंत्र संबंधी की चुनौतियों को दूर करने के अलावा अन्य सामाजिक निर्धारकों पर भी नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
  • स्तनपान के साथ-साथ पूरक आहार प्रदान किये जाने पर भी जोर दिया जाए। इससे भारत में नाटेपन के कुल मामलों में 60% से अधिक कमी की जा सकती है।

मिशन पोषण 2.0:

पोषण 2.0 (POSHAN 2.0), महिला और बाल विकास मंत्रालय की ‘एकीकृत बाल विकास सेवा’ (ICDS) अर्थात आंगनवाड़ी सेवाएं, पोषण अभियान, किशोरियों के लिए योजना, राष्ट्रीय शिशु गृह योजना को कवर करने वाली एक छत्रक (अम्ब्रेला) योजना है।

  • पूरक पोषण कार्यक्रमों और पोषण अभियान का समेकन करते हुए इस मिशन की घोषणा केंद्रीय बजट 2021-22 में की गयी थी।
  • इस मिशन को, देश में स्वास्थ्य के लिए आवश्यक पोषण उपलब्ध कराने और रोग एवं कुपोषण के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने हेतु आवश्यक पोषण करने वाली विकासशील प्रक्रियों पर नए सिरे से ध्यान देने के साथ-साथ पोषण सामग्री, वितरण, आउटरीच और परिणामों को सशक्त करने के लिए शुरू किया गया था।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘पोषण ट्रैकर’ के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पोषण अभियान के तहत लक्ष्य और लक्ष्य।

मेंस लिंक:

‘पोषण ट्रैकर’ योजना के उद्देश्यों और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

एकीकृत भुगतान इंटरफ़ेस


संदर्भ:

शीघ्र ही, फीचर फोन यूजर्स के लिए UPI सुविधा का विस्तार किया जाएगा। फिलहाल, एकीकृत भुगतान इंटरफेस’ या ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ (UPI)  – छोटे मूल्य के भुगतान लेनदेन के संदर्भ मामले में देश में सबसे बड़ा खुदरा भुगतान प्रणाली है और केवल स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध है।

आवश्यकता:

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा, डिजिटल भुगतान को और व्यापक तथा अधिक समावेशी, उपभोक्ताओं के लिए लेनदेन को आसान बनाने, और वित्तीय बाजारों के विभिन्न क्षेत्रों में खुदरा ग्राहकों की अधिक भागीदारी सुविधा उपलब्ध कराने तथा सेवा प्रदाताओं की क्षमता बढ़ाने के लिए यह निर्णय किया गया है।

UPI क्या है?

‘एकीकृत भुगतान इंटरफेस’ या ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ (UPI) एक त्वरित रियल-टाइम भुगतान प्रणाली है। यह प्रणाली, उपयोगकर्त्ताओं को अपने बैंक खाते का विवरण दूसरे पक्ष को बताए बिना कई बैंक खातों में रियल-टाइम आधार पर धन-अंतरण करने की अनुमति देती है।

  • वर्तमान में ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ (UPI), नेशनल ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस (NACH), तत्काल भुगतान सेवा (IMPS), आधार सक्षम भुगतान प्रणाली (AePS), भारत बिल भुगतान प्रणाली (BBPS), रुपे (RuPay) आदि सहित ‘भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम’ (NPCI) द्वारा संचालित सभी प्रणालियों में सबसे बड़ी प्रणाली है।
  • शीर्ष UPI ऐप में, फ़ोनपे (PhonePe), पेटीएम (Paytm), गूगल पे (Google Pay), अमेज़न पे (Amazon Pay) और सरकार द्वारा संचालित भीम (BHIM) एप्लीकेशन शामिल हैं।

भीम (BHIM) क्या है?

भारत इंटरफेस फॉर मनी (BHIM), ‘एकीकृत भुगतान इंटरफेस’ (UPI) के माध्यम से काम करने वाला भारत का एक ‘डिजिटल पेमेंट एप्लिकेशन’ है। ‘यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस’ (UPI) सिस्टम में कई बैंक खातों को एक ही मोबाइल एप्लिकेशन से संचालित किया जा सकता है।

  • BHIM एप्प को ‘भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम’ (National Payments Corporation of India – NPCI) द्वारा विकसित किया गया है।
  • यह रियल-टाइम धन-अंतरण किए जाने की सुविधा प्रदान करता है।
  • इसे दिसंबर, 2016 में लॉन्च किया गया था।

BHIM ऐप में प्रमाणीकरण के तीन स्तर होते हैं:

  1. पहला, यह ऐप किसी डिवाइस की आईडी और मोबाइल नंबर से जुड़ जाती है।
  2. दूसरा, उपयोगकर्ता को लेन-देन करने के लिए बैंक खाते (UPI या गैर- UPI सक्षम) को समकालिक (sync) करना होगा।
  3. तीसरा, किसी उपयोगकर्ता से अपनी डिवाइस में BHIM ऐप शुरू करते समय एक ‘PIN’ बनाने के लिए कहा जाता है, यह ‘PIN’ ऐप में ‘लॉग इन’ करने के लिए आवश्यक होती है। उपयोगकर्ता के लिए कोई लेनदेन करने हेतु अपने बैंक खाते से जुडी ‘UPI PIN’ का उपयोग करना आवश्यक है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम’ (National Payments Corporation of India – NPCI) भारत में खुदरा भुगतान और निपटान प्रणाली के संचालन हेतु एक अम्ब्रेला संस्था है। इसे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारतीय बैंक संघ (IBA) द्वारा भारत में भुगतान एवं निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 (The Payment and Settlement Systems Act, 2007) के प्रावधानों के तहत एक मज़बूत भुगतान और निपटान अवसंरचना के विकास हेतु स्थापित किया गया है। क्या आप इसके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. देश में एटीएम को कौन नियंत्रित करता है?
  2. UPI क्या है?
  3. नेशनल ऑटोमेटेड क्लियरिंग हाउस (NACH) क्या है?
  4. राष्ट्रीय वित्तीय स्विच क्या है?
  5. BHIM ऐप में प्रमाणीकरण के तीन स्तर

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

पेप्सिको पेटेंट विवाद


संदर्भ:

हाल ही में, ‘पादप प्रजाति एवं कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण’ (Protection of Plant Varieties and Farmers Rights Authority – PPV&FRA) द्वारा विभिन्न आधारों पर आलू की किस्म (FL-2027) पर पेप्सिको इंडिया होल्डिंग (PIH) को दिए गए ‘पादप प्रजाति (किस्म) सुरक्षा’ (Plant Variety ProtectionPVP) प्रमाणपत्र को रद्द कर दिया गया है।

इसमें निम्नलिखित आधार शामिल थे:

  • आवेदक द्वारा दी गई गलत सूचना के आधार पर पंजीकरण प्रमाण पत्र प्रदान किया गया था।
  • प्रमाणपत्र एक ऐसे व्यक्ति को दिया गया था जो सुरक्षा के लिए पात्र नहीं था।
  • पंजीकरण प्रमाण पत्र का जारी किया जाना, जनहित में नहीं था।

संबंधित प्रकरण:

वर्ष 2019 में, पेप्सिको ने गुजरात के कुछ भारतीय किसानों पर FC5 आलू की किस्म की खेती किए जाने पर मुकदमा दायर किया था। आलू की इस किस्म में ‘चिप्स’ जैसे स्नैक्स बनाने के लिए नमी की मात्रा कम होती है।

  • उसी साल न्यूयॉर्क स्थित कंपनी ने सभी मुकदमों को वापस ले लिया और कहा कि वह इस मुद्दे को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाना चाहती है।
  • बाद में, एक किसान अधिकार कार्यकर्ता ‘कविता कुरुगंती’ ने पेप्सिको की FC5 आलू किस्म को दी गई ‘बौद्धिक सुरक्षा’ (Intellectual Protection) को रद्द करने के लिए ‘प्रोटेक्शन ऑफ प्लांट वेराइटीज़ एंड फार्मर्स राइट्स’ प्राधिकरण / ‘PPVFR प्राधिकरण’ में याचिका दायर की और कहा कि भारतीय क़ानून के अनुसार, ‘बीज’ की किस्मों पर पेटेंट दिए जाने की अनुमति नहीं हैं।

कृपया ध्यान दें कि ‘पादप प्रजाति एवं कृषक अधिकार संरक्षण’ (PPV&FR) अधिनियम, 2001 की धारा 39  में विशेष रूप से कहा गया है, कि किसी भी किसान को किसी भी किस्म की फसल या यहां तक ​​कि बीज को तब तक उगाने और बेचने की अनुमति है, जब तक कि वे पंजीकृत प्रजाति के ब्रांडेड बीज बेचने का कार्य नहीं करते हैं।

‘पादप प्रजाति एवं कृषक अधिकार संरक्षण’ (PPV&FR) अधिनियम, 2001:

‘पादप प्रजाति एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 (Protection of Plant Varieties and Farmers’ Rights (PPV&FR) Act, 2001), भारत सरकार द्वारा वर्ष 2001 में ‘सुई जेनेरिस प्रणाली’ (sui generis system) को अपनाते हुए अधिनियमित किया गया था।

  • यह अधिनियम, पौधों की नई किस्मों के संरक्षण हेतु अंतर्राष्ट्रीय संघ (International Union for the Protection of New Varieties of PlantsUPOV), 1978 के अनुरूप है।
  • अधिनियम में, पादप प्रजनन गतिविधियों में वाणिज्यिक पादप प्रजनकों और किसानों, दोनों के योगदान को मान्यता प्रदान की गयी है, और साथ ही इसमें सभी हितधारकों के विशिष्ट सामाजिक-आर्थिक हितों का समर्थन करते हुए ‘बौद्धिक संपदा अधिकारों के व्यापार संबंधी पहलुओं’ (Trade Related Aspects of Intellectual Property Rights-TRIPS) को लागू करने का प्रावधान किया गया है।

PPV & FR अधिनियम, 2001 के उद्देश्य:

  • पौधों की किस्मों, किसानों और पौध प्रजनकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक प्रभावी प्रणाली स्थापित करना और पौधों की नई किस्मों के विकास को प्रोत्साहित करना।
  • पौधों की नई किस्मों के विकास के लिये पादप आनुवंशिक संसाधन उपलब्ध कराने तथा किसी भी समय उनके संरक्षण व सुधार में किसानों द्वारा दिए गए योगदान के सन्दर्भ में किसानों के अधिकारों को मान्यता देना व उन्हें सुरक्षा प्रदान करना।
  • देश में कृषि विकास में तेजी लाने के लिए, पादप प्रजनकों के अधिकारों की रक्षा करना; पौधों की नई किस्मों के विकास के लिए सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में अनुसंधान और विकास के लिए निवेश को प्रोत्साहित करना।
  • देश में बीज उद्योग के विकास को सुगम बनाना जिससे किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले बीज और रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित हो सके।

अधिनियम के तहत अधिकार:

पादप-प्रजाति प्रजननकों के अधिकार (BREEDERS’ RIGHTS): पादप-प्रजाति प्रजननकों (ब्रीडर्स) के लिए संरक्षित पादप प्रजाति को पैदा करने, बेचने, बाजार में पहुँचाने, वितरित करने और आयात-निर्यात करने का विशिष्ट अधिकार होगा। यदि इनके अधिकार का हनन होता है तो वे इसके लिए कानून की शरण ले सकते हैं। प्रजनन प्रजाति प्रजनक अपना एजेंट और लाइसेंसधारी भी नियुक्त कर सकते हैं।

अनुसंधानकर्ताओं के अधिकार (RESEARCHERS’ RIGHTS): अधिनियम के अंतर्गत, अनुसंधानकर्ता शोध करने के लिए किसी भी पंजीकृत किस्म का प्रयोग या उपयोग कर सकता है। अनुसंधानकर्ता, कोई नई प्रजाति विकसित करने के उद्देश्य से, किसी प्रजाति को ‘प्रजाति के मूल स्रोत’ के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, किंतु उस प्रजाति का बार-बार प्रयोग करने के लिए ‘पंजीकृत प्रजननक’ से पूर्वानुमति लेना आवश्यक होगा।

किसानों के अधिकार:

  1. किसी नई प्रजाति को विकसित करने वाला किसान, प्रजाति निर्माता कंपनियों की भाँति उस प्रजाति ‘किस्म’ के प्रजनक के रूप में पंजीकरण और संरक्षण का हकदार है;
  2. किसान द्वारा उत्पादित नई प्रजाति को एक वर्तमान प्रजाति (extant variety) के रूप में पंजीकृत किया जा सकता है;
  3. पीपीवी और एफआर अधिनियम, 2001 के तहत, किसान संरक्षित किस्म के बीज सहित अपनी कृषि उपज को उसी तरह से सहेज सकता है, उपयोग कर सकता है, बो सकता है, फिर से बो सकता है, आदान-प्रदान कर सकता है या बेच सकता है, जिस तरह से वह इस क़ानून के लागू होने से पहले हकदार था; परन्तु अधिनियम के अंतर्गत संरक्षित किसी ब्रांडेड बीज की प्रजाति को किसान नहीं बेच सकेगा;
  4. खेतों में उपजाए गये पादपों के आनुवंशिक संसाधनों (Plant Genetic Resources) तथा नकदी फसलों के वन्य प्रकारों के संरक्षण के लिए किसान समुचित सम्मान और पुरस्कार पाने के अधिकारी होंगे;
  5. अधिनियम के अनुभाग 39(2) के अनुसार, यदि किसान द्वारा तैयार की गई नई पादप-प्रजाति ठीक से फलदायी नहीं होती तो उसे इसके लिए क्षतिपूर्ति मिल सकती है;
  6. अधिनियम के तहत प्राधिकरण या रजिस्ट्रार या ट्रिब्यूनल या उच्च न्यायालय के समक्ष किसी भी कार्यवाही के लिए किसान को किसी भी शुल्क का भुगतान नहीं करना पड़ेगा।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न सुरक्षा बल और संस्थाएँ तथा उनके अधिदेश।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ


(Chief of Defence Staff)

संदर्भ:

हाल ही में, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (Chief of Defence Staff) जनरल बिपिन रावत, उनकी पत्नी मधुलिका रावत, एक आर्मी ब्रिगेडियर और 10 अन्य कर्मियों की एक हवाई दुर्घटना में मौत हो गई। ये सभी व्यक्ति भारतीय वायु सेना के एक हेलीकॉप्टर से तमिलनाडु में कार्यक्रम में भाग लेने जा रहे थे। पश्चिमी तमिलनाडु में नीलगिरी में कुन्नूर घाट के एक घने जंगल में इनका हेलीकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

Mi-17V5 हेलीकॉप्टर को एक “विश्वसनीय” विमान माना जाता है, जिसके के दुर्घटनाग्रस्त होने के कारणों की जांच शुरू हो गई है।

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के बारे में:

वर्ष 1999 में गठित कारगिल समीक्षा समिति द्वारा सुझाए गए अनुसार, ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ (CDS), सरकार के एकल-बिंदु सैन्य सलाहकार (single-point military adviser) होंगे।

  • इनके लिए ‘चार सितारा जनरल’ (Four-star General) का दर्जा प्राप्त होगा।
  • CDS, ‘चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी’ के स्थायी अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं। इस कमेटी में तीनो सशत्र- बालों के प्रमुख सदस्य के रूप में शामिल होते हैं।
  • ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ का मुख्य कार्य, भारतीय सेना के तीनो सशत्र-बलो के मध्य अधिक से अधिक परिचालन तालमेल को बढ़ावा देना और अंतर-सेवा संघर्ष को न्यूनतम करना होगा।

आवश्यक शर्तेँ:

  • चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) पद पर नियुक्त व्यक्ति, सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी सरकारी पद को धारण करने का पात्र नहीं होगा।
  • CDS के पद से सेवानिवृत्ति के 5 वर्षों बाद तक बिना पूर्व अनुमोदन के किसी भी निजी रोज़गार की अनुमति भी नहीं होगी।

भूमिकाएं और कार्य:

  • CDS, सरकार को ‘सिंगल-पॉइंट सैन्य सलाह’ प्रदान करेगा तथा सशस्त्र बलों के मध्य योजना बनाने, खरीद करने और रसद के संबंध में तालमेल स्थापित करेगा।
  • यह थिएटर कमांड के गठन के माध्यम से स्थल-वायु-समुद्र कार्यवाहियों का समेकन सुनिश्चित करेगा।
  • CDS, प्रधानमंत्री के नेतृत्व में ‘परमाणु कमान प्राधिकरण’ के सैन्य सलाहकार के रूप में भी कार्य करेगा, साथ ही अंतरिक्ष और साइबर स्पेस जैसे नए युद्ध क्षेत्रों को संभालने के लिए त्रि-सेवा संगठनों की कमान का नेतृत्व भी करेगा।
  • वह, रक्षा मंत्री के प्रधान सैन्य सलाहकार और चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी (Chiefs of Staff Committee – COSC) के स्थायी अध्यक्ष के रूप में भी कार्य करेगा।
  • CDS, ‘रक्षा अधिग्रहण परिषद’ और ‘रक्षा योजना समिति’ के सदस्य भी होगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘थिएटर ऑफ़ वॉर’ और ‘थिएटर ऑफ़ ऑपरेशंस’ के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ के बारे में
  2. भूमिकाएं और कार्य
  3. शक्तियां
  4. थिएटर कमांड क्या हैं?

मेंस लिंक:

थिएटर कमांड्स की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (वेतन एवं सेवा शर्तें) संशोधन विधेयक, 2021

 

हाल ही में, ‘उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश (वेतन एवं सेवा शर्तें) संशोधन विधेयक, 2021’ (High Court and Supreme Court Judges (Salaries and Conditions of Service) Amendment Bill, 2021 लोकसभा में पारित कर दिया गया।

  • विधेयक में, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को बढ़ी हुई पेंशन मिलने की तिथि निर्धारित करने हेतु इनकी आयु की गणना प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है।
  • पेंशन की अतिरिक्त मात्रा के बारे में विधायी मंशा को स्पष्ट करने के लिए विधेयक में केवल एक व्याख्यात्मक नोट सम्मिलित किया गया है।
  • उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को 80, 85, 90, 95 और 100 वर्ष की आयु, जैसी भी स्थिति हो, पूरी करने पर पेंशन की अतिरिक्त राशि स्वीकृत की जाती है, लेकिन इनकी उम्र की गणना की प्रक्रिया के बारे में भ्रम की स्थिति थी।

महत्वपूर्ण तथ्य:

  • सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को देय वेतन पहले संविधान में अनुच्छेद 125(1) और दूसरी अनुसूची में निर्दिष्ट किया गया था।
  • हालांकि, 54वें संविधान-संशोधन के माध्यम से, संसद को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन को कानून द्वारा निर्धारित करने की शक्ति प्रदान की गयी है।
  • संसद के पास इन न्यायाधीशों के विशेषाधिकारों, भत्तों आदि से संबंधित प्रश्नों को निर्धारित करने का भी अधिकार है।
  • तथापि, इनमें से किसी भी विषय को संसद द्वारा न्यायालय में नियुक्ति के बाद न्यायाधीश के नुकसान के लिए परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।
  • इन मामलों को अब सुप्रीम कोर्ट जज (वेतन एवं सेवा शर्तें) अधिनियम, 1958 द्वारा नियंत्रित किया जाता है।

इसी तरह, संसद को कानून द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन का निर्धारण करने का भी अधिकार है।


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