Print Friendly, PDF & Email

[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 08 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनI

1. रायगढ़ किले का महत्व

 

सामान्य अध्ययन-II

1. यूक्रेन मुद्दा

 

सामान्य अध्ययन-III

1. नासा की नवीन संचार प्रणाली

2. पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति

3. असम राइफल्स का दोहरा नियंत्रण विन्यास

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. ACE2 प्रोटीन

2. हॉर्नबिल महोत्सव

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

रायगढ़ किले का महत्व


संदर्भ:

राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने हाल ही में रायगढ़ किले का दौरा किया और छत्रपति शिवाजी महाराज को श्रद्धांजलि दी।

रायगढ़ किले से संबंधित राज्य और राजवंश:

  • रायगढ़ किले को पहले ‘रायरी’ (Rairi) कहा जाता था, और यह 12वीं शताब्दी में मराठाओं के ‘शिर्के’ वंश का गढ़ था।
  • इस किले पर बहमनी शासकों से लेकर निजामशाही तक कई शासकों का अधिकार रहा, बाद में यह आदिलशाही के अधिकार में आ गया।
  • वर्ष 1656 में, छत्रपति शिवाजी ने जावली के राजा चंद्रराव मोरे को पराजित कर इस किले को अपने अधिकार में ले लिया। चंद्रराव मोरे, आदिलशाही सल्तनत के अधीन एक रियासत के शासक थे।
  • वर्ष 1662 में, शिवाजी ने औपचारिक रूप से किले का नाम बदलकर रायगढ़ कर दिया और इसका जीर्णोद्धार तथा किले में नए निर्माण कार्य कराए। वर्ष 1664 तक, यह किला शिवाजी की सरकार का प्रमुख गढ़ बन गया।

इस किले ने शिवाजी को आदिलशाही वंश के प्रभुत्व को चुनौती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और साथ ही, छत्रपति शिवाजी को अपनी शक्ति का विस्तार करने हेतु, कोंकण की ओर मार्ग भी प्रशस्त किया।

किले का महत्त्व:

भारत आने वाले शुरुआती यूरोपीय लोगों द्वारा इस किले को ‘पूर्व का जिब्राल्टर’ (Gibraltar of the East) नाम दिया गया था। किले की मुख्य विशेषता, लगभग डेढ़ मील के क्षेत्र में विस्तारित इसकी सपाट शीर्ष है, जिस पर कई इमारतें बन सकती हैं। अपने उत्कर्ष काल में, इस किले में पत्थरों से निर्मित 300 मकान थे, और इसमें 2,000 सैनिक निवास करते थे।

महाराष्ट्र की राजनीति में रायगढ़ किले का महत्व:

छत्रपति शिवाजी, महाराष्ट्र में सबसे ऊंचे और सबसे प्रतिष्ठित प्रतीक हैं और उनकी विरासत को हथियाने के लिए सभी प्रकार के राजनीतिक दलों द्वारा निरंतर प्रयास किया जाता रहा है। उनके जीवन-काल में ‘रायगढ़’ के महत्व के कारण, कई राजनीतिक नेता किले का दौरा करने के माध्यम से उनके प्रति निष्ठा और सम्मान का प्रदर्शन करते हैं।

‘छत्रपति शिवाजी’ के बारे में- उल्लेखनीय बिंदु:

‘छत्रपति शिवाजी’ का जन्म वर्ष 1639 में एक मराठा सेनापति शाहजी भोंसले के घर हुआ था। शाहजी भोंसले, बीजापुर सल्तनत के अधीन ‘पुणे’ और ‘सुपे’ के जागीरदार थे। ‘शिवाजी’ की माता जीजाबाई, एक धर्मपरायण महिला थी, जिनके धार्मिक गुणों का उन पर गंभीर प्रभाव पड़ा।

उन्होंने वर्ष 1645 में पहली बार अपने सैन्य उत्साह का प्रदर्शन करते हुए अपनी किशोरावस्था में ही बीजापुर के अधीन ‘तोरण दुर्ग’ पर सफलतापूर्वक नियंत्रण प्राप्त कर लिया। उन्होंने ‘कोंडाना किले’ पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। ये दोनों किले ‘बीजापुर सल्तनत’ के आदिल शाह के अधीन आते थे।

उन्होंने छत्रपति, शाककार्ता, क्षत्रिय कुलवंत और हैंदव धर्मोधारक की उपाधि धारण की।

उनसे संबंधित महत्वपूर्ण युद्ध:

  1. प्रतापगढ़ का युद्ध, 1659
  2. पवन खण्ड का युद्ध, 1660
  3. पुरंदर का युद्ध, 1665
  4. सिंहगढ़ का युद्ध, 1670
  5. कल्याण की लड़ाई, 1682-83
  6. संगमनेर का युद्ध, 1679

पुरंदर की संधि:

जून 1665 में शिवाजी और राजा जय सिंह प्रथम (औरंगजेब का प्रतिनिधित्व) के बीच पुरंदर की संधि पर हस्ताक्षर किए गए थे।

इस संधि के अनुसार, शिवाजी ने अब तक जीते कई किले मुगलों को वापस कर दिए और आगरा में शिवाजी तथा औरंगजेब की मुलाकात पर सहमति हुई थी। शिवाजी, अपने पुत्र संभाजी को औरंगजेब के दरबार में भेजने के लिए तैयार हो गए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि 1674 में, शिवाजी को रायगढ़ में गंगभट्ट ने राजमुकुट पहनाया था, और उसी समय उन्होंने छत्रपति की उपाधि धारण की थी?

 

मेंस लिंक:

  1. रायगढ़ किले के बारे में
  2. छत्रपति शिवाजी
  3. औरंगजेब
  4. प्रतापगढ़ की लड़ाई, 1659
  5. पवन खिंड की लड़ाई, 1660
  6. पुरंदर का युद्ध, 1665

मेंस लिंक:

भारत के इतिहास में रायगढ़ किले के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

यूक्रेन संबंधी मामले


संदर्भ:

संयुक्त राज्य अमेरिका, नाटो और यूक्रेन के अधिकारियों द्वारा, यूक्रेन (Ukraine) की सीमा के नजदीक रूस की असामान्य सैन्य गतिविधियों को लेकर लगभग दो सप्ताह से बयान दिए जा रहे हैं।

संबंधित विवाद के बारे में:

  • पूर्ववर्ती सोवियत संघ के भाग रह चुके ‘यूक्रेन’ और ‘रूस’, दोनों देशों के मध्य तनाव की स्थिति, वर्ष 2013 के अंत में ‘यूरोपीय संघ के साथ एक ऐतिहासिक राजनीतिक और व्यापार समझौते’ को लेकर बढ़ गई। ‘यूक्रेन’ के रूस-समर्थक तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच द्वारा समझौता वार्ता स्थगित कर दिए जाने के पश्चात, राजधानी कीव में हफ़्तों तक विरोध प्रदर्शन हुए जो बाद में हिंसा में बदल गए।
  • फिर, मार्च 2014 में, रूस ने अपने हितों और रूसी भाषी नागरिकों की सुरक्षा का बहाना करते हुए, दक्षिणी यूक्रेन में अपने ताकतवर वफादारों की सहायता से, एक स्वायत्त प्रायद्वीप ‘क्रीमिया’ पर कब्जा कर लिया।
  • इसके तुरंत बाद, यूक्रेन के ‘डोनेट्स्क’ और ‘लुहान्स्क’ क्षेत्रों में रूसी समर्थक अलगाववादियों ने ‘कीव’ से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी, जिसके पश्चात महीनों तक भारी लड़ाई जारी रही। वर्ष 2015 में, फ्रांस और जर्मनी की मध्यस्थता में ‘मिंस्क’ में ‘कीव’ और ‘मॉस्को’ के मध्य शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए गए, इसके बावजूद ‘यूक्रेन’ और ‘रूस’ के बीच बार-बार संघर्ष विराम का उल्लंघन होता रहा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान दिए जाने की जरूरत:

देश के पूर्वी भाग में ‘कीव’ और रूस समर्थक विद्रोहियों के बीच जारी लड़ाई में चौदह हजार लोग मारे गए हैं। ‘संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय’ की अक्टूबर 2021 की रिपोर्ट के अनुसार, मारे गए लोगों में 3,393 सामान्य नागरिक थे।

अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया:

यूरोपीय संघ और अमेरिका ने क्रीमिया और पूर्वी यूक्रेन में रूस की कार्रवाइयों के जवाब में कई उपाय किए हैं, जिसके तहत, अन्य उपायों के साथ-साथ व्यक्तियों, संस्थाओं और रूसी अर्थव्यवस्था के विशिष्ट क्षेत्रों को लक्षित करते हुए आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए हैं।

रूस की प्रतिक्रिया

नाटो (NATO) की तरफ यूक्रेन के लिए – हथियारों, प्रशिक्षण और कर्मियों संबंधी- दी जा रही सहायता को मास्को अपनी सुरक्षा के लिए एक खतरे के रूप में देखता है।

  • रूस द्वारा, यूक्रेन पर ‘डोनबास क्षेत्र’ पर फिर से कब्जा करने के प्रयास की तैयारी में, सैनिकों की संख्या बढ़ाने का भी आरोप लगाया गया है, जबकि यूक्रेन इस आरोप से इंकार करता है।
  • रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का कहना है कि, पश्चिमी देश अभी तक अपने पिछले मौखिक आश्वासनों पर खरे नहीं उतरे हैं, इसलिए नाटो के रूसी सीमाओं की ओर विस्तार पर रोक लगाने हेतु ‘विशिष्ट कानूनी समझौतों’ की आवश्यकता है।

मिंस्क समझौता (Minsk Agreements):

पहला मिंस्क समझौता (Minsk I): यूक्रेन और रूसी समर्थित अलगाववादियों ने सितंबर 2014 में बेलारूस की राजधानी मिंस्क में 12-सूत्रीय संघर्ष विराम समझौते पर सहमति व्यक्त की।

  • इसके प्रावधानों में कैदियों का आदान-प्रदान, मानवीय सहायता का वितरण और भारी हथियारों को तैनाती से हटाया जाना शामिल थे।
  • दोनों पक्षों द्वारा उल्लंघन किए जाने से यह समझौता शीघ्र ही टूट गया।

दूसरा मिंस्क समझौता (Minsk II):

  • वर्ष 2015 में, फ्रांस और जर्मनी की मध्यस्थता के तहत,दूसरे मिंस्क शांति समझौते’ पर हस्ताक्षर किए जाने के बाद एक खुला संघर्ष टल गया था।
  • इस समझौते को विद्रोही क्षेत्रों में लड़ाई समाप्त करने और सीमा को यूक्रेन के राष्ट्रीय सैनिकों को सौंपने के लिए तैयार किया गया था।

current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘आज़ोव सागर’ की अवस्थिति के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मिंस्क समझौतों के बारे में
  2. NATO के बारे में
  3. यूरोपीय संघ के बारे में
  4. क्रीमिया का महत्व
  5. यूक्रेन और रूस संघर्ष

मेंस लिंक:

नाटो के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

नासा की नवीन संचार प्रणाली


संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘नासा’ (NASA) ने अपनी नयी संचार प्रणाली ‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (Laser Communications Relay Demonstration – LCRD) लॉन्च की है।

  • यह एजेंसी की पहली ‘लेजर संचार प्रणाली’ (laser communications system) है।
  • LCRD, एजेंसी को अंतरिक्ष में ऑप्टिकल संचार का परीक्षण करने में मदद करेगी।

एलसीआरडी (LCRD) के बारे में:

‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (LCRD), भविष्य के ऑप्टिकल संचार मिशनों का मार्ग प्रशस्त करने वाली ‘प्रौद्योगिकी’ का प्रदर्शन है।

  • LCRD उपकरणों को अमेरिकी रक्षा विभाग के ‘अंतरिक्ष परीक्षण कार्यक्रम सैटेलाइट 6’ (Space Test Program Satellite 6: STPSat-6) पर स्थापित किया गया है।
  • इसके लिए पृथ्वी से 35,000 किमी की ऊंचाई पर ‘भू-समकालिक कक्षा’ में स्थापित किया जाएगा।

ऑप्टिकल संचार प्रणालियों के लाभ:

ऑप्टिकल संचार प्रणालियाँ (Optical Communications Systems) आकार में छोटी तथा भार में कम होती हैं और इनके लिए रेडियो उपकरणों की तुलना में कम उर्जा की आवश्यकता होती है।

  • ‘छोटे आकार’ के होने का अर्थ है विज्ञान के उपकरणों के लिए अधिक जगह।
  • कम भार का मतलब है, लांच में कम व्यय।
  • कम उर्जा का अर्थ है, अंतरिक्ष यान की बैटरियों का कम उपयोग।
  • ‘रेडियो’ तंत्र के पूरक ‘ऑप्टिकल संचार’ के साथ, भविष्य में मिशन अद्वितीय संचार क्षमताओं से युक्त होंगे।

लेजर प्रणाली बनाम रेडियो प्रणाली:

लेजर संचार और रेडियो तरंगें, प्रकाश की विभिन्न तरंग दैर्ध्य का उपयोग करती हैं।

लेजर में ‘अवरक्त प्रकाश’ (Infrared Light) का उपयोग किया जाता है और रेडियो तरंगों की तुलना में इसकी तरंग दैर्ध्य कम होती है। इससे, कम समय में ज्यादा डाटा ट्रांसफर करने में मदद मिलेगी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘ऑप्टिकल संचार’ रेडियो फ़्रीक्वेंसी सिस्टम की तुलना में बैंडविड्थ को 10 से 100 गुना अधिक बढ़ाने में मदद करेगा?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (LCRD) के बारे में
  2. रेडियो फ्रीक्वेंसी
  3. ऑप्टिकल संचार प्रणाली
  4. नासा मिशन

मेंस लिंक:

नासा के ‘लेजर कम्युनिकेशंस रिले डिमॉन्स्ट्रेशन (LCRD) के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 पश्चिमी घाट पर ‘कस्तूरीरंगन समिति’ रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने केंद्र सरकार को, राज्य द्वारा ‘पश्चिमी घाट पर कस्तूरीरंगन समिति की रिपोर्ट’ (Kasturirangan Committee report on Western Ghats) का विरोध किए जाने के बारे में सूचित किया।

  • कर्नाटक के मुख्यमंत्री का कहना है, कि पश्चिमी घाट को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ घोषित किए जाने से इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों की आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
  • हालांकि, विशेषज्ञों ने राज्य के विरोध को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पश्चिमी घाट के लिए विनाशकारी बताया।

‘गाडगिल कमेटी’ की रिपोर्ट:

‘गाडगिल कमेटी’ (Gadgil Committee) ने ‘पारिस्थितिक प्रबंधन उद्देश्यों’ के लिए पश्चिमी घाट की सीमाओं को परिभाषित किया है।

  • इस समिति ने, इस पूरे क्षेत्र को ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र’ (Ecologically Sensitive Area – ESA) घोषित किए जाने की सिफारिश की है।
  • इस क्षेत्र के भीतर, छोटे क्षेत्रों को उनकी मौजूदा स्थिति और खतरे की प्रकृति के आधार पर, ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र I, II या III (ESZ I, ESZ II या ESZ III ) के रूप में चिह्नित किया जाना चाहिए।
  • ‘गाडगिल कमेटी’ ने इस क्षेत्र को लगभग 2,200 ग्रिडों में विभाजित करने का प्रस्ताव किया, जिनमें से 75 प्रतिशत क्षेत्र को ESZ I या ESZ II अथवा पहले से मौजूद संरक्षित क्षेत्रों, जैसे वन्यजीव अभयारण्यों या प्राकृतिक पार्कों के अंतर्गत रखे जाने की सिफारिश की थी।
  • समिति ने इस क्षेत्र में गतिविधियों को विनियमित करने हेतु एक ‘पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण’ गठित किए जाने का प्रस्ताव भी रखा है।

कस्तूरीरंगन समिति का गठन किए जाने का कारण:

‘गाडगिल समिति’ ने अपनी रिपोर्ट अगस्त 2011 में प्रस्तुत की थी, और पश्चिमी घाटों से लगे हुए सभी छह राज्यों में से कोई भी राज्य ‘गाडगिल समिति’ की सिफारिशों से सहमत नहीं था।

  • अगस्त 2012 में, तत्कालीन पर्यावरण मंत्री ने राज्यों, केंद्रीय मंत्रालयों और अन्य संबंधित इकाइयों से प्राप्त प्रतिक्रियाओं के आलोक में “समग्र और बहु-विषयक रीति” में गाडगिल समिति की रिपोर्ट की “जांच” करने के लिए ‘कस्तूरीरंगन’ की अध्यक्षता में पश्चिमी घाट पर एक उच्च-स्तरीय कार्य समूह का गठन किया था।
  • कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में पश्चिमी घाट के सिर्फ 37% क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) क्षेत्रों के अंतर्गत लाने का सुझाव दिया गया है, जोकि ‘गाडगिल रिपोर्ट’ में ESA के तहत 64% क्षेत्र को लाए जाने संबंधी सुझाव से काफी कम है।

कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशें:

  • पश्चिमी घाट क्षेत्र में खनन, उत्खनन और बालू खनन पर प्रतिबंध।
  • कोई नई ताप विद्युत परियोजनाएं नहीं, किंतु पनबिजली परियोजनाओं को प्रतिबंधों के साथ अनुमति दी जा सकती है।
  • नए प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध।
  • 20,000 वर्ग मीटर तक के भवन और निर्माण परियोजनाओं की अनुमति दिए जाने, किंतु ‘टाउनशिप’ परियोजनाओं पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गयी है।
  • अतिरिक्त सुरक्षा उपायों के साथ वन-भूमि के उपयोग में परिवर्तन की अनुमति दी जा सकती है।

current affairs

 

पश्चिमी घाट का महत्व:

  • पश्चिमी घाट (Western Ghats), छह राज्यों में फैला एक विस्तृत क्षेत्र है। यह कई लुप्तप्राय पौधों और जानवरों का वास-स्थल है। साथ ही यह क्षेत्र, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल है।
  • यह विश्व में जैविक विविधता के आठ “सबसे गर्म हॉट-स्पॉट्स” में से एक है।
  • यूनेस्को के अनुसार, पश्चिमी घाट, हिमालय से भी प्राचीन हैं। ये ग्रीष्मकाल के अंतिम समय में दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ‘बारिश से भरी मानसूनी हवाओं’ को रोककर भारतीय मानसून के मौसम-प्रतिरूप को प्रभावित करते हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पूर्वी एवं पश्चिमी घाटों का भौगोलिक विस्तार, महत्वपूर्ण नदियाँ, दर्रे और पर्वत श्रृंखलाएँ, सबसे ऊँची चोटियाँ।
  2. इस क्षेत्र में पाई जाने वाली ‘गंभीर रूप से संकटापन्न’, संकटापन्न और स्थानिक प्रजातियाँ।
  3. ESA बनाम ESZ
  4. दोनों समितियों की सिफारिशों में भिन्नता
  5. विश्व धरोहर स्थल क्या है?
  6. जैविक विविधता के ” सबसे गर्म हॉट-स्पॉट्स ” क्या हैं?

मेंस लिंक:

पश्चिमी घाटों के संरक्षण पर सिफारिशें देने हेतु विभिन्न समितियों का गठन किया जा चुका है, किंतु इस दिशा में अभी तक कुछ महत्वपूर्ण नहीं हुआ है। परीक्षण कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: विभिन्न सुरक्षा बल और संस्थाएँ तथा उनके अधिदेश।

असम राइफल्स का दोहरा नियंत्रण विन्यास


संदर्भ:

नागालैंड में हाल ही में हुई हत्याओं की घटना के बाद ‘असम राइफल्स’ (Assam Rifles) ने एक बयान जारी कर निर्दोष लोगों की जान जाने पर खेद व्यक्त किया है। घटना-स्थल से संबंधित क्षेत्र ‘असम राइफल्स’ के क्षेत्राधिकार में आता है। साथ ही, इस ‘अर्धसैनिक बल, ने भारतीय सेना द्वारा घटना की जांच शुरू किए जाने के विषय में भी जानकारी दी है।

असम राइफल्स के बारे में:

असम राइफल्स गृह मंत्रालय (MHA) के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत ‘छह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों’ (CAPFs) में से एक है। अन्य पांच केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल- केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) हैं।

असम राइफल्स को, पूर्वोत्तर भारत में भारतीय सेना के साथ-साथ कानून और व्यवस्था बनाए रखने का काम सौंपा गया है और यह इस क्षेत्र में भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा भी करती है।

असम राइफल्स की विशिष्टता:

यह देश में दोहरे नियंत्रण विन्यास वाला एकमात्र अर्धसैनिक बल है। असम राइफल्स का प्रशासनिक नियंत्रण गृह मंत्रालय के पास है, जबकि परिचालन नियंत्रण रक्षा मंत्रालय के पास है।

  • इसका अर्थ है कि असम राइफल्स के लिए वेतन और बुनियादी सुविधाएँ गृह मंत्रालय द्वारा प्रदान की जाती है, परन्तु, इसके कर्मियों की तैनाती, पोस्टिंग, स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति का निर्णय भारतीय सेना द्वारा लिया जाता है।
  • इसके सभी वरिष्ठ रैंक के अधिकारी, महानिदेशक (DG) से लेकर आईजी और सेक्टर मुख्यालय में वरिष्ठ पदों पर सेना के अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं। इस बल की कमान भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल के हाथ में होती है।

वर्तमान विवाद:

‘असम राइफल्स’ वास्तविक अर्थों में एकमात्र केंद्रीय अर्धसैनिक बल (CPMF) है क्योंकि इसका परिचालन, कर्तव्य और रेजिमेंट भारतीय सेना की तर्ज पर आधारित हैं।

  • हालांकि, गृह मंत्रालय के अधीन एक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल होने के नाते, इसकी भर्ती, भत्ते, इसके कर्मियों की पदोन्नति और सेवानिवृत्ति नीतियां CAPFs के लिए MHA द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार नियंत्रित होती हैं।
  • असम राइफल्स पर दोहरे नियंत्रण वाली व्यवस्था में, असम राइफल्स के भीतर तथा गृह मंत्रालय व रक्षा मंत्रालय द्वारा, बल पर एकल नियंत्रण हेतु मांगों के दो सेट तैयार किये गए है।

 

असम राइफल्स को रक्षा मंत्रालय के अधीन रखे जाने की मांग का कारण:

इस बल के भीतर एक बड़ा वर्ग रक्षा मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में आना चाहता है। इससे उन्हें गृह मंत्रालय के अधीन आने वाले अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) की तुलना में बेहतर सुविधाएँ तथा सेवानिवृत्ति लाभ प्राप्त हो सकेंगे।

  • सेना के जवान 35 साल की उम्र में जल्दी रिटायर हो जाते हैं, जबकि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPFs) में रिटायरमेंट की उम्र 60 साल है।
  • इसके अलावा, CAPF अधिकारियों को हाल ही में ‘गैर-कार्यात्मक वित्तीय उन्नयन’ (non-functional financial upgradation – NFFU) प्रदान किया गया है, ताकि ‘पदोन्नति’ संबंधी अवसरों की कमी के कारण उनके करियर में आने वाले ठहराव को कम से कम वित्तीय रूप से हल किया जा सके।
  • इसके अलावा, सेना के जवानों को ‘एक रैंक एक पेंशन’ भी मिलती है जोकि सीएपीएफ के लिए उपलब्ध नहीं है।

 

गृह मंत्रालय तथा रक्षा मंत्रालय, दोनों असम राइफल्स पर पूर्ण नियंत्रण क्यों चाहते हैं?

गृह मंत्रालय का तर्क:

गृह मंत्रालय का कहना है कि, सभी सीमा रक्षक बल, इसके परिचालन नियंत्रण में आते हैं और इसलिए ‘असम राइफल्स’ के भी गृह मंत्रालय के नियंत्रण में आने से सीमा सुरक्षा के लिए विस्तृत तथा एकीकृत तंत्र प्राप्त होगा।

गृह मंत्रालय के सूत्रों का यह भी कहना है कि असम राइफल्स, 1960 के दशक के दौरान निर्धारित पैटर्न पर कार्य जारी रखेगा है और मंत्रालय के अधीन अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की तर्ज पर भारत-म्यांमार सीमा की सुरक्षा करता रहेगा।

सेना का तर्क:

  • असम राइफल्स ने भारतीय सेना के समन्वय में अच्छा कार्य किया है तथा इसने सशस्त्र बलों को कई जिम्मेदारियों से मुक्त किया है।
  • इसके अलावा, असम राइफल्स हमेशा एक सैन्य बल रहा है। यह पुलिस बल नहीं है और न ही पुलिस के रूप में इसे गठित किया गया है। इसलिए, इसका नियंत्रण गृह मंत्रालय को देने अथवा इसे किसी अन्य केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) के साथ विलय करने पर असम राइफल्स के लिए भ्रम की स्थिति उत्पन्न करेगा और इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि असम राइफल्स, 1835 में ब्रिटिश भारत में सिर्फ 750 पुरुषों के साथ गठित, देश का सबसे पुराना अर्धसैनिक बल है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. असम राइफल्स- गठन
  2. प्रशासनिक नियंत्रण किसके अधीन है?
  3. परिचालन नियंत्रण किसके पास है?
  4. कार्य

मेंस लिंक:

असम राइफल्स के प्रमुख दायित्वों पर चर्चा कीजिए। बल पर दोहरे नियंत्रण से संबंधित कौन से मुद्दे और चिंताएं हैं?

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


ACE2 प्रोटीन

ACE2, कोशिका झिल्ली के माध्यम से हमारी कोशिकाओं के आंतरिक भाग को बाह्य भाग से संबद्ध करने वाला एक एंजाइम अणु (Enzyme Molecule) होता है।

  • सामान्य शरीर क्रिया विज्ञान में, ‘एंजियोटेंसिन-कंवर्टिंग एंज़ाइम’ (Angiotensin-Converting Enzyme – ACE), एंजियोटेंसिन I (Angiotensin I) नामक एंजाइम को संशोधित कर इसे एंजियोटेंसिन II में परिवर्तित कर देता है, जिससे रक्त वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं। रक्त वाहिकाओं के सिकुड़ जाने से रक्तचाप में वृद्धि होती है।
  • ऐसी अवस्था में, ACE के प्रभावों का प्रतिकार करने के लिए, ACE2 अणु सक्रिय जाते है, और जिससे रक्त वाहिकाएं फैल जाती हैं और रक्तचाप कम हो जाता है।
  • कोरोनावायरस के ‘क्राउन’ में स्थित ‘स्पाइक्स’ हमारी कोशिकाओं में घुसने के लिए ACE2 एंजाइम से जुड़ जाते हैं।

current affairs

 

हॉर्नबिल महोत्सव

(Hornbill Festival)

नागा विरासत और परंपराओं की समृद्धि को पुनर्जीवित करने, संरक्षित करने, बनाए रखने और बढ़ावा देने के लिए नागालैंड के निवासी बड़ी धूमधाम से इस त्योहार को मनाते हैं।

  • हॉर्नबिल महोत्सव नागालैंड की समृद्ध संस्कृति, जीवन शैली और व्यंजन रूचियों को दर्शाता है।
  • यह नागालैंड की स्थानीय योद्धा जनजातियों का सबसे बड़ा महोत्सव है और आमतौर पर हर साल 1 – 10 दिसंबर के बीच 10 दिनों तक मनाया जाता है।
  • इसे “त्योहारों का त्योहार” भी कहा जाता है।
  • इस त्यौहार में सतर्कता और भव्यता के गुणों के लिए नागाओं में सबसे प्रशंसित और श्रद्धेय पक्षी हॉर्नबिल (Hornbill) को श्रद्धांजलि दी जाती है।
  • यह त्यौहार, राज्य पर्यटन और कला और संस्कृति विभागों द्वारा आयोजित किया जाता है और इसके आयोजन में केंद्र सरकार द्वारा भी सहयोग किया जाता है।
  • हॉर्नबिल महोत्सव की शुरुआत 1 दिसंबर 1963 को हुई थी और इसका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एस राधाकृष्णन ने किया था।

चर्चा का कारण:

राज्य सरकार ने सुरक्षा बलों द्वारा 14 नागरिकों की हत्या के विरोध में चल रहे हॉर्नबिल महोत्सव को रद्द करने का फैसला किया है।

current affairs

 


Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos