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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 04 December 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. चक्रवात जवाद

2. उत्तर-पूर्वी मानसून

 

सामान्य अध्ययन-II

1. संविधान की उद्देशिका में संशोधन हेतु विधेयक

2. निजी सदस्य विधेयक

3. स्मारकों के लिए CSR निधि

4. पोषण ट्रैकर

 

सामान्य अध्ययन-III

1. नकारात्मक प्रतिफल बांड

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. चॉकलेट-बॉर्डर फ्लिटर

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान आदि।

चक्रवात जवाद


संदर्भ:

हाल ही में, बंगाल की खाड़ी में निर्मित ‘निम्न दबाव’ (Deep Depression) की स्थिति एक गहन चक्रवाती तूफान जवाद (Cyclonic Jawad) में परिवर्तित हो गयी, और इस तूफ़ान के ओडिशा और आंध्र प्रदेश के समीप पहुंचने की संभावना है।

इस चक्रवाती तूफान का नामकरण:

इस चक्रवाती तूफान का नामकरण ‘सऊदी अरब’ द्वारा किया गया है, और इसका नाम ‘जवाद’  (Jawad) रखा है। अरबी भाषा में ‘जवाद’ का अर्थ उदार या दयालु होता है। चूंकि, यह तूफ़ान पिछले अन्य चक्रवाती तूफानों की तरह प्रबल और खतरनाक नहीं होगा, इसलिए इसका ‘जवाद’ नाम रखा गया है।

‘चक्रवातों की उत्पत्ति:

चक्रवातों का निर्माण, उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में समुद्रीय जल के ऊपर होता है।

इन क्षेत्रों में सौर-प्रकाश की मात्रा सर्वाधिक होती है, जिसके परिणामस्वरूप स्थलीय और जलीय भागों की ऊपरी सतह गर्म हो जाती हैं। सतह के गर्म होने के कारण, समुद्र के ऊपर स्थित उष्ण-आर्द्र वायु ऊपर की ओर उठने लगती है, जिसके बाद इस रिक्त स्थान को भरने के लिए तेजी से झपट्टा मारकर आगे बढ़ती है, फिर ये भी गर्म होकर ऊपर की उठ जाती है, और यह चक्र जारी रहता है।

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वायु-चक्रण (Spin) निर्मित होने का कारण:

वायु, सदैव उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब वाले क्षेत्रों की ओर प्रवाहित होती है। उच्च दाब क्षेत्रों का निर्माण ठंडे क्षेत्र में होता है, जबकि निम्न दाब की स्थिति उष्ण या गर्म क्षेत्रों में बनती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में सौर-प्रकाश की मात्रा उष्ण-कटिबंधीय क्षेत्रों की तुलना में काफी कम होती है, अतः ये सामान्यतः उच्च दाब के क्षेत्र होते हैं। और इसीलिए वायु का संचरण प्रायः ध्रुवीय क्षेत्रों से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की ओर होता है।

  • इसके बाद, पृथ्वी की गति अपनी भूमिका अदा करती है, जोकि पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। पृथ्वी के अपनी धुरी पर परिक्रमा करने की वजह से, दोनों धुर्वों की ओर से बहने वाली हवा का उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में विक्षेपण होता है, क्योंकि गोलाकार होने के कारण पृथ्वी के घूर्णन की गति ध्रुवों की तुलना में उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अधिक होती है। आर्कटिक क्षेत्र से आने वाली हवा, दायीं ओर विक्षेपित हो जाती है तथा अंटार्कटिकक्षेत्र से चलने वाली हवा बायीं ओर विक्षेपित हो जाती है।
  • इस प्रकार, पहले से ही निश्चित दिशाओं में प्रवाहित हो रही वायु, जब किसी गर्म स्थान पर पहुँचने के पश्चात् ऊपर उठती है, तो रिक्त स्थान को भरने के लिए ठंडी हवा, केंद्र की ओर आकर्षित होने लगती है। केंद्र की ओर बढ़ते समय, ठंडी हवा विक्षेपित होती रहती है जिसके परिणामस्वरूप वायु-संचरण में परिवलन होने लगता है, और प्रक्रिया, चक्रवात के स्थल से टकराने तक जारी रहती है।

चक्रवात के स्थल से टकराने के पश्चात:

चक्रवात, स्थलीय क्षेत्रों पर पहुचने के बाद बिखर कर समाप्त हो जाता है, क्योंकि उष्ण जल के संपर्क में आने के कारण वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और ठंडी वायु के लिए रिक्त स्थान बनाती है, किंतु स्थल पर इसका अभाव होता है। इसके अलावा, ऊपर उठने वाली आर्द्र हवा से बादलों का निर्माण का निर्माण होता है, जिससे चक्रवातों के दौरान तेज हवाओं के साथ तीव्र बारिश होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

‘विश्व मौसम विज्ञान संगठन’ (World Meteorological Organisation- WMO) द्वारा चक्रवातों के नामों की क्रमिक सूची की देखरेख की जाती है। चक्रवातों का नामकरण किस प्रकार किया जाता?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. चक्रवातों के निर्माण के लिए उत्तरदायी कारक
  2. विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में चक्रवातों का नामकरण
  3. भारत के पूर्वी तट पर अधिक चक्रवात आने का कारण
  4. कोरिओलिस बल क्या है?
  5. संघनन की गुप्त ऊष्मा क्या है?

मेंस लिंक:

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों के निर्माण के लिए उत्तरदायी कारकों की विवेचना कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भूकंप, सुनामी, ज्वालामुखीय हलचल, चक्रवात आदि जैसी महत्त्वपूर्ण भू-भौतिकीय घटनाएँ, भौगोलिक विशेषताएँ और उनके स्थान आदि।

इस वर्ष उत्तर-पूर्वी मानसून के कमजोर रहने का कारण


संदर्भ:

वर्ष 2018 के बाद से लगातार चौथे साल बाढ़ और भूस्खलन का सामना कर रहे उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों में, उत्तर-पूर्वी मानसून (Northeast Monsoon) की मात्र दो माह की अवधि में, जीवन, संपत्ति और फसलों को भारी क्षति पहुँची है।

अकेले अक्टूबर और नवंबर में हुई भारी बर्ष से कुल 11,916.3 करोड़ रुपये की क्षति होने का अनुमान लगाया जा रहा है, जबकि ‘राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष’ / ‘राज्‍य आपदा मोचन निधि’ (SDRF) के मानकों के अनुसार कुल 1,281.92 करोड़ रुपये की यह क्षति आंकी गई है।

‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ / ‘पूर्वोत्तर मानसून’ के बारे में:

  • ‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ (Northeast Monsoon) की उत्त्पत्ति अक्टूबर से दिसंबर के मध्य होती है, और दक्षिण-पश्चिम मानसून की तुलना में इसकी अवधि कम होती है।
  • यह मानसून प्रायः दक्षिणी प्रायद्वीप तक ही सीमित रहता है।
  • ‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ से होने वाली वर्षा, तमिलनाडु, पुदुचेरी, कराईकल, यनम, तटीय आंध्र प्रदेश, केरल, उत्तर आंतरिक कर्नाटक, माहे और लक्षद्वीप के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है।
  • इस मानसून के कारण, कुछ दक्षिण एशियाई देशों, जैसे कि मालदीव, श्रीलंका और म्यांमार में भी अक्टूबर से दिसंबर के मध्य वर्षा होती है।

ला-नीना का ‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ से संबंध

ला-नीना की स्थिति से दक्षिण-पश्चिम मानसून से होने वाली वर्षा में वृद्धि होती है, जबकि इससे ‘उत्तर-पूर्वी मानसून’ के दौरान होने वाली वर्षा पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

  • ला-नीना (La Niña) के वर्षों के दौरान, बंगाल की खाड़ी में निर्मित संयुक्त प्रणाली (Synoptic Systems)- निम्नदाब अथवा चक्रवात- की स्थिति, सामान्य से काफी उत्तर की ओर हो जाती है।
  • इसके अलावा, ये प्रणाली पश्चिम की ओर बढ़ने की बजाय, पीछे की ओर मुड़ जाती है। चूंकि, इस प्रणाली की स्थिति सामान्य से उत्तर की ओर होती है, जिसके परिणामस्वरूप दक्षिणी क्षेत्रों, जैसे तमिलनाडु, में अधिक वर्षा नहीं होती है।

current affairs

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अल-नीनो क्या है?
  2. ला-नीना क्या है?
  3. ENSO क्या है?
  4. ये परिघटनाएँ कब होती हैं?
  5. एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया पर ENSO का प्रभाव।

मेंस लिंक:

ला-नीना मौसमी परिघटना के भारत पर प्रभाव संबंधी चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: भारतीय संविधान- ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना।

 संविधान की उद्देशिका में संशोधन हेतु विधेयक


संदर्भ:

संसद के वर्तमान सत्र में, ‘संविधान की उद्देशिका’ (Preamble) में संशोधन करने हेतु एक ‘निजी सदस्य विधेयक’ (Private Member’s Bill) को पेश करने की अनुमति देने के संबंध में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

‘संविधान (संशोधन) विधेयक, 2021 के बारे में:

संविधान (संशोधन) विधेयक 2021 (उद्देशिका में संशोधन), केरल से राज्यसभा में भाजपा सदस्य के जे अल्फोंस (K J Alphons) द्वारा पेश किया गया है।

  • प्रस्तुत किए गए निजी विधेयक में संविधान की उद्देशिका / प्रस्तावना में शामिल ‘प्रतिष्ठा और अवसर की समानता’ (EQUALITY of status and of opportunity) शब्दों को संशोधित कर ‘प्रतिष्ठा और जन्म लेने, पोषित किए जाने, शिक्षित होने, नौकरी पाने और सम्मान के साथ व्यवहार किए जाने के अवसर की समानता’ (EQUALITY of status and of opportunity to be born, to be fed, to be educated, to get a job and to be treated with dignity) में परिवर्तित करने का प्रस्ताव किया गया है।
  • विधेयक में ‘समाजवादी’ (Socialist) शब्द को संशोधित कर ‘समतामूलक’ (Equitable) करने का प्रस्ताव भी किया गया है।
  • प्रस्तावित विधेयक में, प्रस्तावना में उद्देश्यों के रूप में “सूचना प्रौद्योगिकी तक पहुंच” और “खुशी” को जोड़ने का भी प्रस्ताव किया गया है।

 

उद्देशिका / प्रस्तावना के उपरोक्त पाठ से चार महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में जानकारी मिलती है:

  1. संविधान की शक्ति का स्रोत: संविधान, भारत के लोगों से अपनी शक्ति प्राप्त करता है।
  2. भारतीय राज्य की प्रकृति: संविधान, भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, पंथ-निरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित करता है।
  3. संविधान के उद्देश्य: संविधान में, उद्देश्यों के रूप में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को निर्दिष्ट किया गया है।
  4. अंगीकृत एवं अधिनियमित करने की तिथि: 26 नवंबर, 1949।

संविधान के भाग के रूप में उद्देशिका:

बेरुबारी यूनियन केस (1960) में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘उद्देशिका’ को संविधान का हिस्सा नहीं है।

वर्ष 1973 के ‘केशवानंद भारती मामले’ में उच्चतम न्यायालय ने अपने पहले विचार को उलटते हुए, ‘उद्देशिका’ को संविधान का हिस्सा बताया। इस मत को ‘भारतीय जीवन बीमा निगम मामले’ (1995) में सुप्रीम कोर्ट द्वारा और स्पष्ट किया गया था।

यद्यपि, ‘उद्देशिका’ संविधान का हिस्सा है; फिर भी,

  • यह न तो विधायिका के लिए शक्ति का स्रोत है और न ही विधायिका की शक्तियों पर प्रतिबंध लगती है।
  • यह ‘वादयोग्यनहीं’ (non-justiciable) है, अर्थात इसके प्रावधान किसी भी न्यायालय के माध्यम से प्रवर्तनीय नही किया जा सकता हैं।

उद्देशिका’ और इसकी संशोधनीयता

केशवानंद भारती मामले में, शीर्ष अदालत ने माना कि ‘उद्देशिका’ में अंतर्निहित संविधान के मूल तत्वों या मौलिक विशेषताओं को ‘अनुच्छेद 368’ के तहत किसी संशोधन के द्वारा परिवर्तित नहीं किया जा सकता है।

‘उद्देशिका’ में अब तक केवल एक बार संशोधन किया गया है। 42वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से ‘उद्देशिका’ में ‘समाजवादी’, ‘पंथ-निरपेक्ष’ और ‘अखंडता’ तीन नए शब्द जोड़े गए थे।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. प्रस्तावना
  2. मुख्य बिंदु
  3. 42वां संविधान संशोधन अधिनियम
  4. प्रासंगिक विधिक मामले
  5. प्रस्तावना की संशोधनीयता

मेंस लिंक:

‘उद्देशिका’ को व्यापक रूप से भारतीय संविधान के प्रतीक या आत्मा और आत्मा के रूप में स्वीकार किया जाता है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संघ एवं राज्यों के कार्य तथा उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित विषय एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर पर शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण और उसकी चुनौतियाँ।

निजी सदस्य विधेयक


संदर्भ:

जारी संसद सत्र में शुक्रवार को लोकसभा में 153 निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) पेश किए गए, जिनमें से एक विधेयक में ‘लिंचिंग’ से सुरक्षा हेतु प्रावधान बनाए जाने का प्रस्ताव किया गया है, और एक अन्य विधेयक में देश के सभी ‘शिक्षण संस्थानों में भगवद गीता का अनिवार्य शिक्षण’ संबंधी प्रस्ताव किया गया है।

‘प्राइवेट मेंबर’ या ‘निजी सदस्य’ कौन होते हैं?

सरकार में शामिल ‘मंत्रियों’ के अलावा अन्य संसद सदस्यों को ‘निजी सदस्य’ या ‘प्राइवेट मेंबर’ (Private Member) के रूप में संदर्भित किया जाता है।

निजी सदस्य विधेयक (Private Member’s Bill) का उद्देश्य सरकार का ध्यान उस ओर आकर्षित करना है, जो कि सांसद (मंत्रियों के अतिरिक्त) के मुताबिक, एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है और जिस पर विधायी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।

निजी सदस्य विधेयक की स्वीकार्यता:

  • किसी ‘प्राइवेट मेंबर बिल’ को विचार करने हेतु स्वीकार किया जाए अथवा नहीं, इसका निर्णय राज्य सभा के सभापति अथवा लोकसभा अध्यक्ष द्वारा किया जाता है।
  • सदन द्वारा ‘निजी सदस्य विधेयक’ के खारिज किए जाने अथवा इसकी अस्वीकृति का ‘सरकार में संसदीय विश्वास’ अथवा उसके इस्तीफे पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

निजी सदस्य विधेयक संबंधी प्रक्रिया दोनों सदनों में लगभग एक समान होती है:

  • विधेयक को पुरःस्थापित करने के लिए, सूचीबद्ध किए जाने से पहले सदस्य को कम से कम एक महीने का नोटिस देना होता है।
  • सदन के सचिवालय द्वारा, इस प्रकार के विधेयक को सूचीबद्ध करने से पहले, संवैधानिक प्रावधानों और कानून पर नियमों के अनुपालन संबंधी परीक्षण किया जाता है।

अपवाद:

सरकारी विधेयकों को किसी भी दिन पेश किया जा सकता है और उन पर चर्चा की जा सकती है, परन्तु निजी सदस्य विधेयक / गैर-सरकारी विधेयकों को केवल शुक्रवार को ही पेश किया जा सकता है और उसी दिन उन पर चर्चा हो सकती है।

क्या अभी तक कोई ‘प्राइवेट मेंबर बिल’ कभी कानून बन सका है?

‘पीआरएस लेजिस्लेटिव’ के अनुसार, 1970 के बाद से संसद द्वारा कोई भी ‘निजी सदस्य विधेयक’ पारित नहीं किया गया है।

आज तक, संसद द्वारा 14 ‘निजी सदस्य विधेयकों’ को पारित किया जा चुका है, जिनमें से छह विधेयक 1956 में पारित किए गए थे। 14वीं लोकसभा में, 300 से अधिक निजी सदस्य विधेयक पेश किए गए, जिनमें से लगभग ‘चार प्रतिशत’ पर चर्चा हुई, शेष 96 प्रतिशत बगैर किसी विमर्श के व्यपगत हो गए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विकास प्रक्रिया तथा विकास उद्योग- गैर-सरकारी संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, विभिन्न समूहों और संघों, दानकर्ताओं, लोकोपकारी संस्थाओं, संस्थागत एवं अन्य पक्षों की भूमिका।

स्मारकों के लिए CSR निधि

संदर्भ:

हाल ही में, संसद में पेश किए गए एक निजी सदस्य विधेयक में, सभी ‘कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’ (Corporate Social Responsibility  CSR) फंड का 25% प्राचीन स्मारकों और पुरातात्विक स्थलों के जीर्णोद्धार, प्रबंधन और रखरखाव के लिए इस्तेमाल किए जाने का प्रस्ताव किया गया है।

इस पर, कुछ सदस्यों ने ‘कंपनी (संशोधन) विधेयक’, 2019 का समर्थन किया, तथा कुछ सदस्यों ने विधेयक के अन्य अनिवार्य प्रावधानों से असहमत व्यक्त की।

अधिक संसाधनों की आवश्यकता:

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (NMA) और स्मारकों की देखभाल करने वाली अन्य एजेंसियों के पास पुरातात्विक एवं महत्वपूर्ण स्थलों के रखरखाव के लिए आवश्यक संसाधनों की कमी है।

विधेयक का विरोध:

‘नैगमिक सामाजिक उत्तरदायित्व’ / ‘कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’ निधि (CSR fund) का उद्देश्य स्थानीय समुदायों को लाभ पहुंचाना है। इसलिए फंड का किसी अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग नहीं किया जाना चाहिए।

‘कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व’ (CSR) क्या है?

कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) को एक प्रबंधन अवधारणा है, जिसके तहत कंपनियाँ अपने व्यवसाय मॉडल और पद्धति में सामाजिक और पर्यावरण संबंधी लाभकारी कार्यक्रमों और प्रथाओं को उनके हितधारकों के साथ एकीकृत करती हैं।

current affairs

 

भारत में CSR का विनियमन:

वर्ष 2014 में कंपनी अधिनियम, 2013 (कंपनी अधिनियम) में संशोधन किए जाने के पश्चात्, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) गतिविधियों की पहचान करके एक रूपरेखा तैयार करने और कंपनियों के लिए CSR को अनिवार्य करने वाला भारत, दुनिया के पहले देशों में से एक है।

‘कंपनी अधिनियम’ के तहत, कारोबारियों द्वारा अपने अर्जित लाभ को स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छता, शिक्षा सहित कौशल विकास, पर्यावरणीय स्थिरता, आदि के संदर्भ में ग्रामीण विकास को बढ़ावा देने जैसे क्षेत्रों में निवेश किया जा सकता है।

कंपनी अधिनियम की धारा 135(1) में CSR समिति गठित करने हेतु कंपनियों को चिह्नित करने के लिए सीमा-रेखा निर्धारित की गयी है; जिसके अनुसार-

  1. जिन कंपनियों की ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष में, सकल परिसंपत्ति 500 करोड़ रुपये या उससे अधिक है; या
  2. जिन कंपनियों ने 1000 करोड़ रुपये या अधिक का कारोबार किया है; या
  3. 5 करोड़ रुपये या उससे अधिक का शुद्ध लाभ अर्जित किया है, उनके लिए CSR समिति का गठन करना आवश्यक होगा।

कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2019 के अनुसार, ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी’, कंपनियों के तीन वित्तीय वर्ष के पूरे होने पर लागू होता है।

व्यय की जाने वाली राशि:

कंपनियों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में, तत्काल पूर्ववर्ती तीन वित्तीय वर्षों के दौरान अर्जित अपने औसत शुद्ध लाभ का कम से कम 2% ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी’ के रूप में व्यय करना अनिवार्य है।

जिन कंपनियों ने 3 वित्तीय वर्ष पूरे नहीं किए हैं, उनके लिए पिछले वित्तीय वर्षों में अर्जित औसत शुद्ध लाभ पर CSR की गणना की जाएगी।

अव्ययित राशियों का निरूपण:

  • CSR गतिविधि के लिए उपयोग की जाने वाली अव्ययित राशि (Unspent Amounts) को संबंधित वित्तीय वर्ष की समाप्ति के 30 दिनों के भीतर प्रावधान के तहत निर्धारित विशेष खाते में जमा किया जाना चाहिए।
  • अव्ययित राशि का उपयोग कंपनी द्वारा इस तरह के अंतरण की तारीख से 3 वित्तीय वर्षों की अवधि के भीतर विशेष CSR गतिविधि के लिए किया जाना चाहिए। जिसमें विफल होने पर, इसे कंपनी अधिनियम की अनुसूची VII के तहत प्रावधान के अनुसार किसी भी फंड में, जैसेकि स्वच्छ गंगा कोष, स्वच्छ भारत कोष, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष आदि में अंतरित किया जाना चाहिए।
  • कोई भी अव्ययित राशि, जो जारी CSR गतिविधि से संबंधित नहीं है, संबंधित वित्तीय वर्ष के अंत के 6 महीने की अवधि के भीतर अनुसूची VII के तहत निर्धारित निधियों में अंतरित की जानी चाहिए।

सामाजिक उत्तरदायित्व का सामरिक महत्व:

सामाजिक उत्तरदायित्व का दो कारणों से सामरिक महत्व है:

  • एक स्वस्थ व्यवसाय केवल स्वस्थ समाज में ही सफल हो सकता है। अतः समाज के स्वास्थ्य को मजबूत करने वाली वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करना, कंपनी के सर्वोत्तम हित में होता है।
  • यदि कोई कंपनी दीर्घावधि के लिए सफल होना चाहती है, तो उसे कंपनी के परिचालन से प्रभावित होने वाले सामाजिक कर्ताओं से स्वीकृति, या परिचालन के लिए लाइसेंस की आवश्यकता होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप इंजेती श्रीनिवास समिति (Injeti Srinivas’s Committee) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) के बारे में
  2. पात्रता
  3. लाभ
  4. कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) क्षेत्र

मेंस लिंक:

क्या आप सहमत हैं कि ‘कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी’ कंपनियों को अधिक लाभदायक और टिकाऊ बनाती है? विश्लेषण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

पोषण ट्रैकर


संदर्भ:

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा ‘पोषण ट्रैकर’ (Poshan or Nutrition Tracker) पर 1,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए हैं। यह ‘पोषण ट्रैकर’ प्रत्येक आंगनवाड़ी में कुपोषित और ‘गंभीर तीव्र कुपोषित’ बच्चों पर रीयल-टाइम डेटा रिकॉर्ड करता है, किंतु इसके लॉन्च होने के चार साल बाद भी सरकार ने इसके डेटा को सार्वजनिक नहीं किया है।

संबंधित चिंताएं:

सरकारी अधिकारियों ने डेटा को ताले-चाबी के भीतर रखने के कारण के रूप में गोपनीयता संबंधी चिंताओं का हवाला दिया है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है, कि इन आंकड़ों को आसानी से ‘बिना किसी नाम के’ जारी किया जा सकता है, जैसा कि कई अन्य सरकारी योजनाओं के डेटा के मामले में किया जाता है।

‘पोषण ट्रैकर’ के बारे में:

‘पोषण ट्रैकर’ (Poshan Tracker) को इसके पूर्व संस्करण में ‘एकीकृत बाल विकास सेवाएं-सामान्य अनुप्रयोग सॉफ्टवेयर’ (Integrated Child Development Services-Common Application Software: ICDS-CAS) के रूप में जाना जाता था, जिसे आंगनवाड़ियों के माध्यम से वितरित की जाने विभिन्न सेवाओं को ट्रैक करने और इनमे सुधार करने तथा लाभार्थियों के पोषण प्रबंधन को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से तैयार किया गया था।

यह रियल टाइम निगरानी प्रणाली, नवंबर 2017 में तीन वर्ष की अवधि के लिए 9,000 करोड़ रुपये के वित्तीय परिव्यय के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा अनुमोदित पोषण अभियान के प्रमुख स्तंभों में से एक है।

पोषण अभियान के बारे में:

पोषण अभियान (Poshan Abhiyaan) कार्यक्रम का उद्देश्य बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण संबंधी परिणामों में सुधार करना है।

वर्ष 2018 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने देशभर में कुपोषण की समस्या को संबोधित करने हेतु पोषण अभियान की शुरुआत की थी। इसके तहत, वर्ष 2022 तक हासिल किए जाने वाले विशिष्ट लक्ष्यों को निर्धारित किया गया था।

उद्देश्य एवं लक्ष्य:

  • 0-6 वर्ष के बच्चों में ठिगनेपन से बचाव एवं इसमें प्रति वर्ष 2% (2022 तक कुल 6%) की दर से कमी लाना।
  • 15 से 49 वर्ष की किशोरियों, गर्भवती एवं धात्री (स्तनपान कराने वाली) माताओं में रक्ताल्पता के प्रसार में प्रति वर्ष 3% की दर से (कुल 9%) कमी लाना।

मिशन का लक्ष्य वर्ष 2022 तक 0-6 आयु वर्ग के बच्चों में ठिगनेपन को 38.4% से घटाकर 25% करना है।

पृष्ठभूमि:

पांच साल से कम उम्र के एक तिहाई से अधिक बच्चे ठिगनेपन (Stunting) और दुर्बलता (Wasting) से ग्रसित हैं और एक से चार वर्ष की आयु के 40% बच्चे रक्ताल्पता (एनीमिक) से पीड़ित हैं। वर्ष 2016 में जारी ‘राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य’ सर्वेक्षण 4 के अनुसार, 50% से अधिक गर्भवती और अन्य महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित पाई गईं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पोषण अभियान के तहत लक्ष्य और लक्ष्य।

मेंस लिंक:

‘पोषण ट्रैकर’ योजना के उद्देश्यों और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

नेगेटिव यील्ड बॉण्ड


(Negative Yield Bonds)

संदर्भ:

‘ऋणात्मक ऋण प्रतिफल’ / निगेटिव-यील्ड ऋण (Negative Yield Debt) वाले बांड्स की मात्रा यूरोप में यूरोप में विलुप्त होती दिख रही है।

पिछले कुछ समय से, निगेटिव-यील्ड ऋण बांड्स पर लाभ वैश्विक स्तर पर कम रहा है, और वर्ष 2020 में फ़ैली महामारी के दैरान निवेशकों द्वारा बांड सुरक्षा में अत्यधिक निवेश करने के बाद से, इसके लाभ में गिरावट आना तेज हुई है।

‘नेगेटिव यील्ड बॉण्ड’ क्या है?

‘नेगेटिव यील्ड बॉण्ड’ ऐसे ऋण प्रपत्र (Debt Instruments) होते हैं, जिनके द्वारा निवेशक को बॉण्ड की परिपक्वता अवधि पर बॉण्ड के क्रय मूल्य से कम राशि प्राप्त होती है।

  • ये केंद्रीय बैंकों अथवा सरकारों द्वारा जारी किए जा सकते है।
  • इसमें निवेशकों द्वारा ऋण-कर्ताओं को, अपनी राशि उनके पास रखने के लिए, ब्याज का भुगतान किया जाता है।

निवेशकों द्वारा ‘नेगेटिव यील्ड बॉण्ड’ खरीदने का कारण:

  • इस प्रकार के प्रलेखों की प्रायः तनाव और अनिश्चितता की स्थिति में अधिक मांग होती है। ये निवेशकों की पूंजी में होने वाली गिरावट से सुरक्षा प्रदान करते हैं।
  • मुद्रा के उतार-चढ़ाव से लेकर मुद्रा अपस्फीति जैसी स्थितियों से ‘नेगेटिव यील्ड बॉण्ड’ में निवेश करने वाले सुरक्षित निकल सकते है।

बॉण्ड कीमत और प्राप्ति (यील्ड) के मध्य संबंध:

इसमें, बॉण्ड की कीमत और बॉण्ड यील्ड अथवा ब्याज के मध्य नकारात्मक संबंध होता है; अर्थात जब बॉण्ड की कीमत बढ़ती है तो बॉण्ड यील्ड घटता है।

चूंकि, नेगेटिव यील्ड बॉण्ड एक ‘फिक्स्ड रेट इन्वेस्टमेंट’ होते हैं, और यही आंशिक रूप से बॉण्ड मूल्य और बॉण्ड यील्ड के बीच व्युत्क्रम संबंधों का कारण होता है।

  • भविष्य में ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना होने पर निवेशक अपने बॉण्ड को बेच सकते हैं और बाद में ऊँची दर वाले बॉण्ड को पुनः खरीद सकते है।
  • इसके विपरीत, बॉण्ड निवेशक भविष्य में ब्याज दरों में कमी होने की संभावना होने पर बॉण्ड खरीद सकते है।

वर्तमान में नेगेटिव यील्ड बॉण्ड की मांग के प्रमुख कारक:

  • महामारी फैलने के बाद से वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में नकदी प्रवाहित की गयी है, जिससे, इक्विटी, ऋण और वस्तुओं सहित विभिन्न परिसंपत्तियों की कीमतों में वृद्धि हुई है।
  • कई निवेशक, इक्विटी में अपने जोखिम पोर्टफोलियो का बचाव करने हेतु नकारात्मक प्राप्ति देने वाले सरकारी ऋण में अस्थायी रूप से अपनी पूंजी लगा सकते हैं।
  • यदि कोविड-19 महामारी की ताजा लहर से अर्थव्यवस्थाओं में और अधिक मंदी आती है, तो ब्याज दरों पर नकारात्मक दबाव पड़ सकता है, जिससे यील्ड में और भी कमी आ सकती है और इससे वर्तमान में जिन निवेशकों ने नेगेटिव यील्ड बॉण्ड में निवेश किया है, उन्हें लाभ हो सकता है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नेगेटिव यील्ड बॉण्ड क्या हैं?
  2. बॉण्ड मूल्य और बॉण्ड यील्ड के बीच संबंध

मेंस लिंक:

‘नेगेटिव यील्ड बॉण्ड’ की लोकप्रियता में वृद्धि के क्या कारण रहे हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


चॉकलेट-बॉर्डर फ्लिटर

  • चॉकलेट-बॉर्डर फ्लिटर (Chocolate- bordered flitter),सिक्किम में खोजी गई तितली की एक नई प्रजाति है।
  • इस प्रजाति के सबसे करीबी संबंधी हांगकांग के करीब दक्षिण-पूर्वी चीन में पाए जाते हैं।
  • इसकी खोज उत्तरी सिक्किम के ‘ज़ोंगु’ में की गई है, जिसके नाम पार इसका वैज्ञानिक नाम ज़ोग्राफेटस डोज़ोंगुएन्सिस रखा गया।

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