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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. सांसदों का निलंबन

2. राष्ट्रीय अपील न्यायालय

3. कृष्णा नदी जल विवाद

 

सामान्य अध्ययन-III

1. LEO उपग्रहों के माध्यम से इंटरनेट

2. नासा का पर्सवेरेंस रोवर

3. अफगानिस्तान में मादक पदार्थों की तस्करी

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. अफगानिस्तान के हजारा

2. तिवा जनजाति और वांचुवा त्योहार

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

सांसदों का निलंबन


(Suspension of MPs)

संदर्भ:

संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी द्वारा 12 राज्यसभा सांसदों को वर्तमान संसद सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित किए जाने हेतु सदन की स्वीकृति की मांग की गयी है।

इन सांसदों को संसद के मानसून सत्र के अंतिम दिन ‘दुर्व्यवहार, अवमानना, उपद्रवी और हिंसक व्यवहार तथा सुरक्षा कर्मियों पर जानबूझकर किए गए हमले’ जैसे अभूतपूर्व कार्य करने की वजह से निलंबित किया जा रहा है।

पीठासीन अधिकारी द्वारा ‘निलंबन’ की प्रक्रिया का आरंभ:

राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक सामान्य ‘नियम 255’ (Rule 255) के अंतर्गत, पीठासीन अधिकारी द्वारा ‘निलंबन’ की प्रक्रिया का आरंभ कर सकता है।

  • राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक नियमों के ‘नियम 255’ (सदस्य का चले जाना) के अनुसार- “सभापति किसी भी सदस्य को जिसका आचरण, उसकी राय में पूरी तरह से अव्यव्स्थापूर्ण हो, तत्काल राज्यसभा से चले जाने का निदेश दे सकेगा, और जिस सदस्य को इस तरह चले जाने का आदेश दिया जाए वह तुरंत चला जाएगा और और उस दिन की बैठक के अवशिष्ट समय तक अनुपस्थिति रहेगा।“

‘नियम 255’ के तहत निलंबन एवं ‘नियम 256’ के तहत निलंबन में अंतर:

  • राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक सामान्य ‘नियम 256’ में ‘सदस्य के निलंबन’ का प्रावधान है; जबकि ‘नियम 255’ में लघुतर सजा का प्रावधान है।
  • नियम 256 के अंतर्गत, ” यदि सभापति आवश्यक समझे तो वह किसी सदस्य को मौजूदा चालू सत्र की शेष अवधि के लिए सदन से निलंबित कर सकता है।

संसदीय शिष्टाचार के नियम:

सांसदों को संसदीय शिष्टाचार के कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक होता है।

  • उदाहरण के लिए, लोकसभा की नियम पुस्तिका यह निर्दिष्ट करती है कि सांसदों के लिए दूसरों द्वारा दिए जा रहे भाषण को बाधित नहीं किया जाना चाहिए, शांति बनाए रखनी चाहिए तथा बहस के दौरान टिप्पणी करते हुए कार्यवाही में बाधा नहीं डालनी चाहिए।

विरोध के नए-नए स्वरूपों के कारण वर्ष 1989 में इन नियमों को अद्यतन किया गया था।

  • नए नियमों के अनुसार, सदस्यों को नारे लगाने, तख्तियां दिखाने, विरोध में दस्तावेजों को फाड़ने तथा सदन में कैसेट या टेप रिकॉर्डर बजाने की अनुमति नहीं है।

राज्यसभा में भी इसी प्रकार के नियम लागू होते हैं। कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए, नियम पुस्तिका में दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों को कुछ समान शक्तियां भी प्रदान की गयी हैं।

लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति की शक्तियों में अंतर:

  • लोकसभा अध्यक्ष की भांति, राज्यसभा के सभापति को राज्य सभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन विषयक नियम पुस्तिका के नियम संख्या 255 के तहत “किसी भी सदस्य को जिसका आचरण, उसकी राय में पूरी तरह से अव्यव्स्थापूर्ण हो, तत्काल राज्यसभा से चले जाने का निदेश” की शक्ति प्राप्त है।
  • हालांकि, राज्यसभा के सभापति के पास, लोकसभा अध्यक्ष के विपरीत, किसी सदस्य को निलंबित करने की शक्ति नहीं होती है।

राज्यसभा सांसद के निलंबन हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

  1. सभापति, सभापीठ के अधिकार की उपेक्षा करने या बार-बार और जानबूझकर बाधा डालकर राज्यसभा के कार्य में बाधा डालकर राज्यसभा के नियमों का दुरुपयोग करने वाले सदस्य का नाम ले सकता है।
  2. यदि सभापति द्वारा किसी सदस्य का इस तरह से नाम लिया जाए, तो वह प्रस्ताव पेश किया जाने पर तत्काल बिना किसी संशोधन, स्थगन या वाद-विवाद के, उस सदस्य को राज्यसभा की सेवा से मौजूदा सत्र की अवशिष्ट अवधि तक के लिए निलंबित करने का निदेश दे सकता है।
  3. परन्तु, राज्यसभा किसी भी समय, प्रस्ताव किए जाने पर निलंबन को समाप्त कर सकती है।

सदन में व्यवस्था बनाए रखने हेतु प्रयास:

राज्यसभा के सभापति के रूप में, उपराष्ट्रपति अंसारी ने सदन में व्यवस्था लाने के लिए कई कदम उठाने का प्रयास किया था। वर्ष 2013 में, उन्होंने सदन में मर्यादा बनाए रखने हेतु कई क्रांतिकारी समाधान प्रस्तुत किए।

इसमें शामिल हैं:

  • राज्यसभा के नियमों का उल्लंघन करने वाले सांसदों का नाम राज्यसभा बुलेटिन में प्रकशित करना व उन्हें शर्मिंदा करना।
  • सभापति द्वारा सभापीठ के सामने आकर प्रदर्शन करने या ‘अत्यंत ख़राब’ आचरण करने वाले सासदों का नाम लिया जा सकता है।
  • सदन में अव्यवस्था के दृश्यों को सार्वजनिक करने से रोकने हेतु ‘सदन की कार्यवाही’ का प्रसारण स्थगित किया जा सकता है।

सांसदों के निलंबन को किस प्रकार उचित ठहराया जा सकता है? क्या यह अनियंत्रित व्यवहार को रोकने हेतु उठाया गया एक चरम कदम नहीं है?

सांसदों के अनियंत्रित व्यवहार का समाधान, दीर्घकालिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए।

  • इसमें कोई संदेह नहीं है, कि कार्यवाही के सुचारू रूप से संचालन हेतु पीठासीन अधिकारी के सर्वोच्च अधिकार का प्रवर्तन किया जाना आवश्यक है।
  • तथापि, एक संतुलन बना रहना चाहिए। यह याद रखना चाहिए कि पीठासीन अधिकारी का कार्य सदन का संचालन करना है, न कि उस पर शासन करना।

व्यवधान पहुचाने की वजह से कितनी बार सांसदों का निलंबन किया जा चुका है?

  • इस प्रकार की पहली घटना वर्ष 1963 में हुई थी। कुछ लोकसभा सांसदों ने दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करते समय, पहले, राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के भाषण को बाधित किया और फिर बाद में वाकआउट कर दिया।
  • तत्कालीन लोकसभा की समाप्ति इन सांसदों को फटकार लगाते हुए हुई। वर्ष 1989 में ठाकर आयोग की रिपोर्ट की चर्चा के पश्चात् 63 सांसदों को लोकसभा से निलंबित कर दिया गया था।
  • हाल ही में, वर्ष 2010 में, मंत्री से ‘महिला आरक्षण विधेयक’ छीनने पर 7 सांसदों को राज्यसभा से निलंबित कर दिया गया था।

इसके बाद से, सांसदों द्वारा विरोध प्रदर्शन करने के लिए सदन में नारेबाजी, पेपर स्प्रे का इस्तेमाल किया जाता है और तख्तियां दिखाईं जाती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

यद्यपि, राज्यसभा और लोकसभा में सांसदों के निलंबन के संबंध में समान नियम निर्धारित किए गए हैं, किंतु, फिर भी इनमे कुछ अंतर है। लोकसभा में, नियम 374A के तहत, किसी उपद्रवी सदस्य के लिए “स्वतः निलंबन” का प्रावधान है। यह प्रावधान किस स्थिति में लागू किया जा सकता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सांसदों को निलंबित करने व निलंबन रद्द करने संबंधी शक्तियां।
  2. इस संबंध में लोकसभा और राज्यसभा की प्रक्रियाओं में अंतर।
  3. सांसदों के निर्वाचन के संबंध में अपील।
  4. इस संबंध में नियम।

मेंस लिंक:

सांसदों के अनियंत्रित व्यवहार का समाधान दीर्घकालिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

राष्ट्रीय अपील न्यायालय


संदर्भ:

भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमण ने सरकार से चार ‘राष्ट्रीय अपील न्यायालयों’  (National Court of Appeal) का समावेशन करने हेतु न्यायपालिका के पुनर्गठन किए जाने संबंधी ‘अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल’ के सुझाव पर गंभीरता से विचार करने का आग्रह किया है।

उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा है, कि न्यायिक ढांचा स्वतंत्रता के बाद से अब तक लगभग एक जैसा रहा है, और चार अपीलीय अदालतों के होने पर, अदालतों के समक्ष लंबित मामलों में उल्लेखनीय कमी आएगी।

‘राष्ट्रीय अपील न्यायालय’ के बारे में:

चेन्नई, मुंबई और कोलकाता में क्षेत्रीय पीठों सहित ‘राष्ट्रीय अपील न्यायालय’ (National Court Appeal -NCA) का उद्देश्य, दीवानी, आपराधिक, श्रम और राजस्व संबंधी मामलों में अपने क्षेत्राधिकार के भीतर, उच्च न्यायालयों और न्यायाधिकरणों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों से निपटने हेतु न्याय की ‘अंतिम अदालत’ के रूप में कार्य करना है।

इस तरह के परिदृश्य में, दिल्ली स्थित भारत के सर्वोच्च न्यायालय पर कार्य-भार में कमी आयेगी और वह केवल संवैधानिक कानून और सार्वजनिक कानून संबंधी मामलों की सुनवाई करेगा।

राष्ट्रीय अपील न्यायालय’ के पक्ष में तर्क:

  1. मौजूदा समय में, सर्वोच्च न्यायालय सभी प्रकार के मामलों का बोझ उठा रहा है, ऐसे में ‘राष्ट्रीय अपील न्यायालय’ (NCA) का विचार उचित प्रतीत होता है।
  2. अपीलों पर सुनवाई हेतु भौगोलिक अवस्थिति के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रीय पीठों का गठन किया जाना उचित होगा। अभी तक, सभी अपीलों की सुनवाई नई दिल्ली में की जाती है, जिससे देश के अन्य हिस्सों में पैदा होने वाले मामलों के लिए असुविधा होती है।
  3. अपीलीय अदालतें, मामलों को सुलझाने के लिए एक उत्कृष्ट तंत्र के रूप में काम कर सकती है। जब कभी ऐसे असुलझे कानूनी मामले सामने आते है जिनमे स्पष्टीकरण की जरूरत होती हैं, तब ऐसी स्थिति में अपीलीय अदालत (Court of Appeal) इन मामलों को एक साथ संबद्ध कर सर्वोच्च न्यायालय के लिए भेज सकती है। जिससे न केवल भिन्न-भिन्न मामलों का निपटारा किया जा सकता है, बल्कि कानून संबंधी क्षेत्रों को भी सुलझाया जा सकता है और एक स्पष्ट उदहारण तैयार किए जा सकते हैं।
  4. जब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष केवल महत्वपूर्ण मामले ही आयेंगे, तो न्यायिक प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित हो जाएगी तथा वादियों और अदालतों, दोनों के समय और व्यय की बचत होगी।

राष्ट्रीय अपील न्यायालय’ के विपक्ष में तर्क:

  1. ‘राष्ट्रीय अपील न्यायालयों’ की स्थापना से मुकदमों की संख्या में कमी नहीं आयेगी। इसके अलावा, लंबित मामलों की सर्वाधिक संख्या अधीनस्थ अदालतों में है, जबकि शीर्ष अदालतों के समक्ष इस तरह की समस्या नहीं है।
  2. इससे केवल न्यायनिर्णयन के संबंध में एक परत और जुड़ जाएगी।
  3. यह संवैधानिक रूप से असंभव है, क्योंकि ‘अपीलों की सुनवाई’ संविधान के बुनियादी ढांचे में शामिल है, जोकि ‘राष्ट्रीय अपील न्यायालयों’ की स्थापना से प्रभावित होगा।
  4. ‘राष्ट्रीय अपील न्यायालयों’ की स्थापना, केवल अधिवक्ताओं के लिए वरदान होगी।
  5. इस सुझाव पर कार्यान्वित करने हेतु ‘संविधान के अनुच्छेद 130’ में संशोधन किए जाने की आवश्यकता होगी, जो कि अनुज्ञेय (Impermissible) है क्योंकि इससे सर्वोच्च न्यायालय की संरचना पूरी तरह से बदल जाएगी।

सरकार का विचार:

‘राष्ट्रीय अपील न्यायालयों’ की स्थापना से न्यायनिर्णयन के संबंध में एक परत और जुड़ जाएगी और इससे मुकदमों की संख्या में कमी नहीं आयेगी। यह केवल अधिवक्ताओं के लिए वरदान साबित होगा। वादी व्यक्तियों को इससे अधिक कठिनाई होगी।

अन्य उपाय:

  • अधीनस्थ न्यायपालिका (उच्च न्यायालयों) को मजबूत करने के प्रयास किए जाने चाहिए, ताकि उचित न्याय दिया जा सके।
  • सर्वोच्च न्यायालय को, उच्च न्यायालयों का उपयोग, न्यायिक पदानुक्रम के शीर्ष की दिशा में मात्र एक ‘सीढ़ी के पत्थर’ की तरह किए जाने को, हतोत्साहित करना चाहिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकार की नीतियां और हस्तक्षेप और उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे।

कृष्णा नदी जल विवाद


संदर्भ:

तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित करते हुए कहा है, पिछले 14 सालों से कर्नाटक से  इस बात की कोई जानकारी नहीं दी गयी है कि, कर्नाटक द्वारा कृष्णा नदी के कितने पानी को मोड़ा गया है।

इसके जबाव में, कर्नाटक ने तर्क दिया है, कि कृष्णा नदी का बहुत सारा पानी समुद्र में बहकर बर्बाद हो रहा है, और सिंचाई और शुष्क क्षेत्रों के पुनर्भरण हेतु इसका उपयोग करने की जरूरत है।

कर्नाटक की मांग:

कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 16 नवंबर, 2011 को पारित आदेश से मुक्ति की मांग की है। इस आदेश में अदालत ने, केंद्र सरकार को दिसंबर 2010 में ‘कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण II’ (KWDT) द्वारा कर्नाटक, तत्कालीन आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र को कृष्णा नदी के पानी का आवंटन करने संबंधी जारी अंतिम आदेश को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित करने से रोक दिया था।

KWDT द्वारा 29 नवंबर, 2013 को कर्नाटक, महाराष्ट्र और तत्कालीन आंध्र प्रदेश राज्य को पहले से किए गए 2130 TMC जल आवंटन को संरक्षित रखते हुए, अधिशेष पानी आवंटित करने संबंधी अपने अंतिम आदेश और रिपोर्ट को संशोधित कर दिया गया।

संबंधित प्रकरण:

अधिकरण के आदेश का प्रकाशन, इसके कार्यान्वयन के लिए एक आवश्यक पूर्व-शर्त है। हालाँकि, आंध्र प्रदेश के विभाजन के बाद, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने KWDT द्वारा किए गए जल आवंटन को चुनौती देते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था।

आवश्यकता:

कर्नाटक ने तर्क दिया है कि, ‘अंतर्राज्यीय जल विवाद अधिनियम 1956’ की धारा 6 के तहत ‘कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण II’ के अंतिम आदेश को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित करने पर रोक लगाने संबंधी सुप्रीम कोर्ट के 2011 के आदेश की वजह से, राज्य के सूखे उत्तरी क्षेत्रों में पानी उपलब्ध कराने की हजारों करोड़ रुपये की बांध और सिंचाई परियोजनाएं रुकी हुई हैं।

कर्नाटक का तर्क है, कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना द्वारा उठाया गया विवाद उनके बीच का है और इससे कर्नाटक का कोई सरोकार नहीं है।

कर्नाटक के समक्ष चुनौतियां:

KWDT का निर्णय वर्ष 2050 तक लागू किया जाना था, इस अवधि के बाद इस निर्णय की समीक्षा या संशोधन किए जाने का प्रावधान है। वर्ष 2010 से अब तक दस साल की अवधि पहले ही मुकदमेबाजी में बीत चुकी है। कर्नाटक के लिए अपनी विभिन्न सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने के लिए कम से कम 10 साल का समय लगेगा। इन परियोजनाओं की लागत 2014-15 में 60,000 करोड़ रुपये आंकी गई थी।

इस अवधि में इन परियोजनाओं की लागत सालाना 10% से 15% की दर से बढ़ जाएगी। अगर सिंचाई परियोजनाएं 10 साल में पूरी हो भी जाती हैं, तब भी इनको केंद्रीय जल आयोग की मंजूरी मिलने में समय लगेगा।

संबंधित विवाद:

कृष्णा नदी जल विवाद की शुरुआत पूर्ववर्ती हैदराबाद और मैसूर रियासतों के बीच हुई थी, जोकि बाद में गठित महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना राज्यों बीच जारी है।

अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत वर्ष 1969 में  कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (Krishna Water Disputes TribunalKWDT) का गठन किया गया था, जिसके द्वारा वर्ष 1973 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी।

कृष्णा नदी जल विवाद न्यायाधिकरण की वर्ष 1976 में प्रकाशित रिपोर्ट में कृष्णा नदी जल के 2060 TMC (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) को 75 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर तीन भागों में पर विभाजित किया गया था:

  1. महाराष्ट्र के लिए 560 TMC
  2. कर्नाटक के लिए 700 TMC
  3. आंध्र प्रदेश के लिए 800 TMC

संशोधित आदेश:

  • राज्यों के मध्य असंतोष व्यक्त किये जाने पर वर्ष 2004 में दूसरे कृष्णा जल विवाद न्यायाधिकरण (KWDT) का गठन किया गया।
  • दूसरे KWDT द्वारा वर्ष 2010 में अपनी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी। इस रिपोर्ट में 65 प्रतिशत निर्भरता के आधार पर कृष्णा नदी के अधिशेष जल का 81 TMC महाराष्ट्र को, 177 TMC कर्नाटक को तथा 190 TMC आंध्र प्रदेश के लिये आवंटित किया गया था।

वर्ष 2014 में तेलंगाना को एक अलग राज्य के रूप में गठित किये जाने के पश्चात, आंध्र प्रदेश द्वारा तेलंगाना को KWDT में एक अलग पक्षकार के रूप में शामिल करने और कृष्णा नदी-जल को तीन के बजाय चार राज्यों में आवंटित किये जाने की मांग की जा रही है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘सीमा-पार बहने वाले जल-निकायों और अंतर्राष्ट्रीय झीलों के संरक्षण और उपयोग पर अभिसमय’ (Convention on the Protection and Use of Transboundary Watercourses and International Lakes) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कृष्णा की सहायक नदियाँ
  2. गोदावरी की सहायक नदियाँ
  3. भारत में पूर्व तथा पश्चिम की बहने वाली नदियाँ
  4. अंतरराज्यीय नदी जल विवाद- प्रमुख प्रावधान
  5. कृष्णा एवं गोदावरी नदी प्रबंधन बोर्ड- गठन, कार्य और अधिदेश

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

LEO उपग्रहों के माध्यम से इंटरनेट


संदर्भ:

पिछले वर्ष एक सॉफ्टवेयर संबंधी समस्या आ जाने से विफल होने के बाद ‘वनवेब’ (OneWeb) द्वारा अपने ब्रॉडबैंड उपग्रहों में से एक को पृथ्वी की निचली कक्षा से हटाने के विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।

अब तक, वनवेब द्वारा 11 प्रक्षेपणों के माध्यम से 1,200 किलोमीटर की दूरी पर 358 उपग्रहों को तैनात किया जा चुका है।

पृष्ठभूमि:

‘वनवेब’ ने इस साल की शुरुआत में ‘यूरोपियन स्पेस एजेंसी’ (ESA) के ‘सनराइज प्रोग्राम’ के तहत, मलबे को हटाने वाले ‘एस्ट्रोस्केल’ (Astroscale) नामक स्टार्टअप के साथ साझेदारी की है।

‘वनवेब के LEO इंटरनेट कार्यक्रम’ के बारे में:

‘वनवेब’ पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit – LEO) में स्थित ‘संचार उपग्रह’ का संचालन करने वाली एक निजी कंपनी है।

  • वनवेब का उद्देश्य, एलईओ उपग्रहों के माध्यम से यूनाइटेड किंगडम, अलास्का, उत्तरी यूरोप, ग्रीनलैंड, आर्कटिक समुद्र और कनाडा में इंटरनेट कनेक्टिविटी का विकल्प उपलब्ध कराना है।
  • कंपनी ने इस साल के अंत से पहले इंटरनेट सेवा चालू किए जाने की संभावना व्यक्त की है।

वनवेब ने इस कार्यक्रम को ‘फाइव टू 50’  सर्विस का नाम दिया है, इसके तहत 50 डिग्री अक्षांश के उत्तर में स्थित सभी क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी सेवाएं प्रदान की जाएंगी।

LEO उपग्रह आधारित इंटरनेट के लाभ:

  • LEO उपग्रह, पृथ्वी से लगभग 36,000 किमी की दूरी पर स्थित भू-स्थैतिक कक्षा उपग्रहों की तुलना में, लगभग 500 किमी से 2000 किमी की दूरी पर स्थित होते हैं।
  • LEO उपग्रह पृथ्वी का नजदीक से परिक्रमण करते हैं अतः ये, पारंपरिक स्थिर-उपग्रह प्रणालियों की तुलना में सशक्त सिग्नल और तेज गति प्रदान करने में सक्षम होते हैं।
  • चूंकि, सिग्नल, फाइबर-ऑप्टिक केबल प्रणाली की तुलना में, अंतरिक्ष के माध्यम से अधिक तेजी से गति करते हैं, इसलिए भले ही ये मौजूदा जमीन-आधारित नेटवर्क से आगे न निकल सकें, फिर भी इसका मुकबला करने में सक्षम होंगे।

चुनौतियां:

LEO उपग्रह 27,000 किमी प्रति घंटा की गति से यात्रा करते हैं और 90-120 मिनट में पृथ्वी का एक पूर्ण परिपथ पूरा कर लेते हैं। नतीजतन, एक उपग्रह, पृथ्वी पर स्थापित ट्रांसमीटर के साथ बहुत कम ले लिए संपर्क स्थापित कर पाता है, अतः इस प्रणाली को सफलतापूर्वक कार्य करने हेतु LEO उपग्रहों के एक विशाल बेड़े की आवश्यकता होती है और इसके लिए बड़े पूंजी निवेश की जरूरत होती है।

LEO उपग्रहों की आलोचनाएँ:

  1. चूंकि, इन परियोजनाओं को अधिकांशतः निजी कंपनियों द्वारा संचालित किया जा रहा है, अतः शक्ति संतुलन, देशों से हटकर कंपनियों में स्थानांतरित हो गया है। इन निजी परियोजनाओं में कई राष्ट्रों की भागेदारी भी होती है, इसे देखते हुए इन कंपनियों को नियंत्रित करने से संबंधित सवाल उत्पन्न हो रहे हैं।
  2. जटिल नियामक ढांचा: इन कंपनियों में विभिन्न देशों के हितधारक शामिल होते हैं। इस प्रकार प्रत्येक देश में इन सेवाओं के संचालन हेतु अपेक्षित लाइसेंस प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
  3. प्राकृतिक उपग्रहों को कभी-कभी रात के समय आसमान में देखा जा सकता है, इन कृत्रिम उपग्रहों की वजह से खगोलविदों के लिए मुश्किलें हो सकती हैं।
  4. निचली कक्षा में भ्रमण करने वाले उपग्रह, अपने ऊपर परिक्रमा करने वाले उपग्रहों की आवृत्तियों को बाधित कर सकते हैं।
  5. बोलचाल की भाषा में ‘स्पेस जंक’ कहे जाने वाले पिंडों से अंतरिक्ष यानो को क्षति पहुंचने या अन्य उपग्रहों से टकराने की संभावना रहती है।

संभावनाएं:

जिन स्थानों पर फाइबर और स्पेक्ट्रम सेवाओं की पहुँच नहीं होती है, वहां LEO सैटेलाइट ब्रॉडबैंड बेहतर कार्य करने में सक्षम हो सकते हैं। अतः इसके लिए लक्षित बाजार, ग्रामीण आबादी और शहरी क्षेत्रों से दूर तैनात सैन्य इकाइयाँ होंगी।

इस प्रकार की अन्य परियोजनाएं:

‘वनवेब’ की मुख्य प्रतियोगी स्टारलिंक (Starlink) कंपनी है, जो एलोन मस्क की स्पेसएक्स कंपनी के नेतृत्व वाला एक उद्यम है। स्टारलिंक के पास वर्तमान में 1,385 उपग्रह हैं जो पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित हैं। स्टारलिंक द्वारा पहले से ही उत्तरी अमेरिका में बीटा परीक्षण शुरू किया जा चुका है, और इसने भारत जैसे देशों में प्री-ऑर्डर भी शुरू कर दिया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

आप कितने प्रकार की अंतरिक्षीय कक्षाओं (Space Orbits) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. LEO के बारे में।
  2. स्टारलिंक परियोजना
  3. LEO उपग्रह आधारित इंटरनेट के लाभ

मेंस लिंक:

उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाओं से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

 नासा का परसिवरेंस रोवर


संदर्भ:

नासा के ‘परसिवरेंस मार्स रोवर’ (Perseverance Mars Rover) द्वारा एजेंसी द्वारा भेजे गए इंजेन्युटी (Ingenuity)’ मार्स हेलीकॉप्टर की 13वीं उड़ान का वीडियो निर्मित किया गया है।

परसिवरेंस रोवर’ के बारे में:

परसिवरेंस रोवर (Perseverance rover) को, जुलाई 2020 में ‘यूनाइटेड लॉन्च अलायंस एटलस V’ (Atlas V) से लॉन्च किया गया था।

मिशन का महत्व:

  • परसिवरेंस रोवर में MOXIE अथवा मार्स ऑक्सीजन ISRU एक्सपेरिमेंट नामक एक विशेष उपकरण लगा है, जो मंगल ग्रह पर कार्बन-डाइऑक्साइड-समृद्ध वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड का उपयोग करके पहली बार आणविक ऑक्सीजन का निर्माण करेगा। (ISRU- In Situ Resource Utilization, अर्थात स्व-स्थानिक संशाधनो का उपयोग)
  • इस मिशन पर एक, ‘इंजेन्युटी’ (Ingenuity) नामक एक हेलीकॉप्टर भी भेजा गया है, यह मंगल ग्रह पर उड़ान भरने वाला पहला हेलीकॉप्टर होगा।
  • यह मिशन, पृथ्वी पर परिष्कृत प्रयोगशालाओं में विश्लेषण करने हेतु, मंगल ग्रह से चट्टान के नमूनों को लाने का पहला नियोजित प्रयास है। इसका उद्देश्य मंगल ग्रह पर प्राचीन सूक्ष्मजीवीय जीवन के खगोलीय साक्ष्यों की खोज तथा वर्तमान या अतीत में जीवन-संकेतों की खोज करना है।

 

मिशन के कुछ प्रमुख उद्देश्य:

  1. प्राचीन सूक्ष्मजीवीय जीवन के खगोलीय साक्ष्यों की खोज करना।
  2. वापसी में पृथ्वी पर लाने के लिए चट्टानों तथा रेगोलिथ (Reglolith) के नमूने एकत्र करना है।
  3. मंगल ग्रह पर एक प्रयोगात्मक हेलीकाप्टर उतारना।
  4. मंगल ग्रह की जलवायु और भूविज्ञान का अध्ययन करना।
  5. भविष्य के मंगल मिशनों के लिए प्रौद्योगिकी का प्रदर्शन करना।

मंगल ग्रह के बारे में हालिया रुचि का कारण:

  1. मंगल ग्रह, पृथ्वी के काफी नजदीक (लगभग 200 मिलियन किमी दूर) पर स्थित है।
  2. यह एक ऐसा ग्रह है, जिस पर मनुष्य, भ्रमण करने या अधिक समय तक रहने की इच्छा कर सकता है।
  3. मंगल ग्रह पर अतीत में बहता हुए पानी और वातावरण होने के साक्ष्य मिले हैं; और संभवतः इस ग्रह पर कभी जीवन के लिए उपयुक्त स्थितियां भी मौजूद थी।
  4. यह ग्रह, व्यावसायिक यात्रा के लिए भी उपयुक्त हो सकता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप मंगल ग्रह के वायुमंडल की संरचना, इतिहास, वातावरण, गुरुत्वाकर्षण के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मंगल मिशन
  2. पर्सविरन्स रोवर – उद्देश्य
  3. पर्सविरन्स रोवर पर उपकरण
  4. UAE के ‘होप’ मिशन तथा चीन के तियानवेन -1 अंतरिक्ष यान के बारे में
  5. पाथफाइंडर मिशन

मेंस लिंक:

‘परसिवरेंस रोवर’ मिशन के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा चुनौतियां और उनका प्रबंधन; संगठित अपराध का आतंकवाद से संबंध।

अफगानिस्तान में मादक पदार्थों की तस्करी


संदर्भ:

मादक पदार्थ (Drugs), तालिबान के लिए राजस्व का एक प्रमुख स्रोत रहे हैं। अफगानिस्तान की अर्थव्यवस्था का पतन होने से, तालिबान अपने कर्मिकों पर नियंत्रण बनाए रखने के लिए नशीली दवाओं से अर्जित राशि पर अत्याधिक निर्भर हो जाएगा।

‘ड्रग्स एंड क्राइम’ पर संयुक्त राष्ट्र कार्यालय की नवीनतम ‘वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट’ के अनुसार:

  • अफगानिस्तान में वर्ष 2020 के दौरान, पिछले वर्ष की तुलना में ‘अफीम पोस्त’ की अवैध खेती के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि में 37% की वृद्धि दर्ज की गयी।
  • पिछले वर्ष अफीम के वैश्विक उत्पादन में अफगानिस्तान का योगदान 85% था।
  • पिछले कुछ वर्षों में अफ़ग़ानिस्तान की विशिष्ट सुरक्षा इकाईयों की बेहतर क्षमताओं के बावजूद, नशीली दवाओं की बरामदगी और गिरफ्तारी का अफीम-पोस्ते की खेती पर न्यूनतम प्रभाव पड़ा है।
  • अफगानिस्तान, मेथेम्फेटामाइन (Methamphetamine) का एक प्रमुख स्रोत बनता जा रहा है।

‘वर्ल्ड ड्रग रिपोर्ट’ 2021

(World Drug Report)

  1. पिछले वर्ष, वैश्विक स्तर पर लगभग 275 मिलियन लोगों द्वारा नशीली दवाओं इस्तेमाल किया गया, और 36 मिलियन से अधिक लोग, नशीली दवाओं के उपयोग संबंधी विकारों से पीड़ित थे।
  2. अधिकांश देशों में महामारी के दौरान ‘भांग’ के उपयोग में वृद्धि देखी गई है।
  3. इसी अवधि में फार्मास्युटिकल दवाओं के गैर-चिकित्सा उपयोग में भी वृद्धि हुई है।
  4. नवीनतम वैश्विक अनुमानों के अनुसार, 15 से 64 वर्ष आयु वर्ग की लगभग 5.5 प्रतिशत आबादी द्वारा पिछले वर्ष के दौरान, कम से कम एक बार नशीली दवाओं का उपयोग किया गया है।
  5. अनुमान है, कि वैश्विक स्तर पर 11 मिलियन से अधिक लोग दवाओं का इंजेक्शन लगाते हैं – इनमे से आधे लोग ‘हेपेटाइटिस सी’ से पीड़ित हैं।
  6. नशीली दवाओं के उपयोग के कारण होने वाली बिमारियों के लिये ‘ओपिओइड’ (Opioids) पदार्थ सर्वाधिक जिम्मेदार बने हुए है।

मादक पदार्थों की तस्करी की समस्या से निपटने हेतु भारत सरकार की नीतियाँ और पहलें:

  1. विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर, देश के 272 जिलों में नशा मुक्त भारत अभियान या ड्रग्स-मुक्त भारत अभियान को 15 अगस्त 2020 को हरी झंडी दिखाई गई।
  2. सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा वर्ष 2018-2025 की अवधि के लिए ‘नशीली दवाओं की मांग में कमी लाने हेतु राष्ट्रीय कार्ययोजना’ (National Action Plan for Drug Demand Reduction- NAPDDR) का कार्यान्वयन शुरू किया गया है।
  3. सरकार द्वारा नवंबर, 2016 में नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) का गठन किया गया है।
  4. सरकार द्वारा नारकोटिक ड्रग्स संबंधी अवैध व्यापार, व्यसनी / नशेड़ियों के पुनर्वास, और नशीली दवाओं के दुरुपयोग के खिलाफ जनता को शिक्षित करने आदि में होने वाले व्यय को पूरा करने हेतु “नशीली दवाओं के दुरुपयोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष” (National Fund for Control of Drug Abuse) नामक एक कोष का गठन किया गया है ।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि 7 दिसंबर 1987 को को ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ द्वारा ‘26 जून’ ‘नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ (International Day against Drug Abuse and Illicit Trafficking) के रूप में चुना गया था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNODC के बारे में
  2. “नारकोटिक्स नियंत्रण हेतु राज्यों को वित्तीय सहायता” की योजना का अवलोकन
  3. नार्को-समन्वय केंद्र (NCORD) की संरचना
  4. नशीली दवाओं के दुरुपयोग नियंत्रण हेतु राष्ट्रीय कोष
  5. नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के बारे में
  6. नशीली दवाओं के दुरुपयोग और अवैध तस्करी के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय दिवस और इस वर्ष की थीम

मेंस लिंक:

भारत, मादक पदार्थों की तस्करी की चपेट में है। इसके कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। नशीली दवाओं की समस्या से निपटने में सरकार की भूमिका पर भी टिप्पणी करिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


अफगानिस्तान के हजारा

‘हजारा’ (Hazara) अफगानिस्तान का एक जातीय समूह है।

  • ये मंगोल साम्राज्य के संस्थापक चंगेज खान के वंशज माने जाते है थे, चंगेज खान और उसकी सेना ने 13 वीं शताब्दी के दौरान पूरे क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था।
  • उनकी विशिष्ट एशियाई शारीरिक लक्षण और हजारगी नामक फ़ारसी बोली का उपयोग भी उन्हें देश के बाकी हिस्सों से अलग करता है।

तिवा जनजाति और वांचुवा त्योहार

वांचुवा त्योहार (Wanchuwa festival), तिवा आदिवासियों (Tiwa tribe) द्वारा अच्छी फसल होने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है।

  • इस त्योहार पर समुदाय के लोग अपना पारम्परिक परिधान धारण करते है और नृत्य, गान और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है।
  • तिवा जनजाति के लोग भरपूर फसल के लिए प्रकृति की महान शक्ति की कृपा मानते हैं। ये लोग सूअरों की खोपड़ी और हड्डियों को देवी- देवताओं के रूप में स्थापित करते हैं और मानते हैं कि ये कई पीढ़ियों तक इनकी सुरक्षा करेंगे।
  • तिवा जनजाति को ‘लालुंग’ के नाम से भी जाना जाता है, और यह असम तथा मेघालय राज्यों में रहने वाला स्वदेशी समुदाय है। इसकी कुछ आबादी अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर के कुछ हिस्सों में भी पाई जाती है।

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