Print Friendly, PDF & Email

[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 27 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनI

1. रामप्पा मंदिर: तेलंगाना का पहला ‘यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल’

 

सामान्य अध्ययन-II

1. उत्तर प्रदेश धर्मांतरण रोधी कानून

 

सामान्य अध्ययन-III

1. K-आकार की आर्थिक बहाली एवं इसके निहितार्थ

2. कॉरपोरेट घरानों द्वारा बैंक शुरू किए जाने संबंधी मुद्दे

3. अंतरिक्ष मलबा

4. पासिफए प्रोजेक्ट और इसका महत्व

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय

2. सर छोटू राम

3. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति (NCMC)

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: भारतीय संस्कृति प्राचीन से आधुनिक काल तक कला रूपों, साहित्य और वास्तुकला के प्रमुख पहलुओं को कवर करेगी।

रामप्पा मंदिर: तेलंगाना का पहला ‘यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल’


संदर्भ:

हाल ही में, यूनेस्को का टैग मिलने के बाद से तेलंगाना के ‘रामप्पा मंदिर’ (Ramappa Temple), बड़े पैमाने पर ध्यानाकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है।

‘रामप्पा मंदिर’ के बारे में:

  • तेलंगाना के वारंगल में अवस्थित, ‘रामप्पा मंदिर’ छह फीट ऊंचे एक सितारे के आकार के मंच पर निर्मित किया गया है।
  • इसकी दीवारों, स्तंभों और छतों को सूक्षम और जटिल तक्षणकला / नक्काशी से सुसज्जित किया गया है, जोकि काकतीय मूर्तिकारों के अद्वितीय कौशल का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  • इस मंदिर का नामकरण इसके ‘वास्तुकार रामप्पा’ के नाम पर किया गया है।
  • ‘रामप्पा मंदिर’ का निर्माण 13 वीं शताब्दी में काकतीय राजा गणपतिदेव के सेनापति ‘राचेरला रुद्रय्या’ (Racherla Rudrayya) द्वारा करवाया गया था।
  • इस मंदिर के पीठासीन देवता ‘रामलिंगेश्वर स्वामी’ हैं।

काकतीय राजवंश के बारे में मुख्य तथ्य:

काकतीय राजवंश का उत्कर्ष 12वीं -14वीं शताब्दी के दौरान हुआ था।

  • ये पहले कल्याण के पश्चिमी चालुक्यों के सामंत थे और इनका शासन वारंगल के पास एक छोटे से क्षेत्र पर थे।
  • इस राजवंश ने गणपति देव और रुद्रमादेवी जैसे प्रतापी शासक हुए।
  • प्रतापरुद्र प्रथम (Prataparudra I), जिसे काकतीय रुद्रदेव के नाम से भी जाना जाता है, काकतीय शासक प्रोल द्वितीय का पुत्र था। इसके शासनकाल के दौरान काकतीयों ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इसने 1195 ई. तक राज्य पर शासन किया।
  • प्रतापरुद्र प्रथम के शासनकाल के दौरान शिलालेखों में तेलुगु भाषा का प्रयोग शुरू हुआ।
  • काकतीयों ने अपनी पहली राजधानी हनमकोण्डा (Hanamakonda) बनायी, बाद में इन्होने अपनी राजधानी ओरुगलु / वारंगल में स्थांतरित कर ली।
  • काकतीय राजवंश के शासक के रूप में रुद्रमादेवी के शासनकाल के दौरान महान इतालवी यात्री मार्को पोलो ने काकतीय साम्राज्य का भ्रमण किया और उनकी प्रशासनिक शैली की प्रशंसा करते हुए विस्तृत रूप से वर्णन किया।

कला और वास्तुकला

  • 12वीं शताब्दी में रूद्रमादेवी के पिता द्वारा एक अनुप्रतीकात्मक ‘काकतीय तोरणम’ (Kakatiya Thoranam) का निर्माण करवाया गया था। इस अलंकृत तोरण के बारे में कहा जाता है, कि इसकी कई विशेताएँ ‘सांची स्तूप’ के प्रवेश द्वार से मिलती-जुलती हैं, और यह तेलंगाना का प्रतीक चिंह भी है।
  • वारंगल में एक दर्शनीय पाखल झील (Pakhal lake) का निर्माण, गणपति देव द्वारा करवाया गया था।
  • वारंगल में 1000 स्तंभ मंदिर का निर्माण काकतीय शासनकाल के दौरान करवाया गया था और यह काकतीय वास्तुकला का एक उत्तम उदाहरण है।
  • कोहेनूर हीरा, जो अब ब्रिटिश क्राउन में जड़े हुए रत्नों में से एक है, का खनन काकतीय राजवंश द्वारा कराया गया था और वे इसके पहली स्वामी थे।

काकतीय शासनकाल में समाज:

  • काकतीय शासनकाल के दौरान, जाति व्यवस्था कठोर नहीं थी और वास्तव में, सामाजिक रूप से इसे बहुत महत्व नहीं दिया गया था। कोई भी व्यक्ति किसी भी पेशे को अपना सकता था और लोग जन्म से ही एक ही व्यवसाय अपनाने के लिए बाध्य नहीं थे।
  • 1323 ई. में वारंगल पर दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान ग़यासुद्दीन तुगलक द्वारा विजय प्राप्त करने के पश्चात काकतीय शासन वर्ष समाप्त हो गया।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि अब तक केवल तीन स्थलों को ही, विश्व विरासत सूची से हटाया गया है? इसके बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘विश्व धरोहर स्थल’ के बारे में
  2. चयन मानदंड
  3. ‘विश्व धरोहर समिति’ (WHC) के बारे में
  4. UNESCO के बारे में
  5. ICOMOS के बारे में
  6. रामप्पा मंदिर के बारे में।

मेंस लिंक:

‘विश्व धरोहर स्थलों’ को मान्यता दिए जाने की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

उत्तर प्रदेश धर्मांतरण रोधी कानून


संदर्भ:

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा एक विवादास्पद अध्यादेश के तहत कुल 108 मामले दर्ज किए गए हैं। इस क़ानून के तहत, “बलपूर्वक, अनुचित प्रभाव” (Undue Influence), प्रलोभन (Allurement) अथवा जबरदस्ती (Coercion) से कराए गए धर्म परिवर्तन को अपराध माना जाता है।

‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 (U.P. Unlawful Religious Conversion Prohibition Ordinance, 2020) को लागू किए जाने को एक वर्ष पूरा पूरा हो गया है। इस अध्यादेश को एक अधिनियम में परिवर्तित किया जा चुका है।

यह कानून विवादास्पद क्यों है?

यह कानून उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा “गैरकानूनी धर्मांतरण” से निपटने और “लव जिहाद” संबंधी मामलों  का समाधान करने के लिए पारित किया गया था, और इस प्रकार की घटनाओं को मुस्लिम पुरुषों द्वारा हिंदू महिलाओं को लुभाने और विवाह करने के लिए इस्लाम में धर्मांतरण करने की साजिश बताया गया है।

कानून का अवलोकन:

  1. इसके तहत, विवाह के उद्देश्य से किए गए धर्म-परिवर्तन को गैर-जमानती अपराध बनाया गया है।
  2. ‘धर्म-परिवर्तन का उद्देश्य विवाह के लिए नहीं था’, यह साबित करने का दायित्व ‘अभियुक्त’ (Defendant) का होगा।
  3. धर्म परिवर्तन के लिए जिलाधिकारी से अनुमति लेनी होगी और इसके लिए दो महीने का नोटिस देना होगा।
  4. यदि किसी महिला द्वारा, मात्र विवाह के उद्देश्य से धर्म-परिवर्तन किया जाता है, तो उस विवाह को अमान्य घोषित किया जाएगा।

इस क़ानून के तहत दंड:

  1. कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करने पर 15,000 के जुर्माने और न्यूनतम एक साल की कारावास, जिसे पांच साल तक बढाया जा सकता है, का दंड दिया जाएगा।
  2. यदि किसी नाबालिग महिला अथवा अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति समुदाय की महिला का उक्त गैरकानूनी तरीकों से धर्म परिवर्तन कराया गया तो तीन से दस साल तक की सजा के साथ कम से कम 25,000 ₹ का जुर्माना देना होगा।
  3. इसके अतिरिक्त अध्यादेश में सामूहिक धर्म परिवर्तन कराने वाले संगठनों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने सहित कड़ी कार्रवाई करने संबंधी प्रावधान किए गए हैं।

इस क़ानून से संबंधित विवाद:

हाल ही में, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले (सलामत अंसारी-प्रियंका खरवार मामले) में निर्णय सुनाते हुए कहा कि, किसी साथी को चुनने का अधिकार अथवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, नागरिकों के ‘जीवन और स्वतंत्रता संबंधी मूल अधिकार’ का भाग है। अदालत के इस निर्णय के अगले दिन ही उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा यह अध्यादेश लागू किया गया है।

अदालत ने फैसले में यह भी कहा कि, अदालत द्वारा इससे पहले ‘विवाह हेतु धर्मपरिवर्तन अस्वीकरणीय है’ बताया गया था, जो कि क़ानून के रूप में उचित नहीं था।

क़ानून की आलोचना:

  • इस क़ानून की कई कानूनी विद्वानों द्वारा तीखी आलोचना की गयी है, इनका कहना है कि, लव जिहाद’ की अवधारणा का कोई भी संवैधानिक या कानूनी आधार नहीं है।
  • ये संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहते हैं कि, संविधान में नागरिकों को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का अधिकार दिया गया है।
  • इसके अलावा, अनुच्छेद 25 के तहत, अंतःकरण की स्वतंत्रता, अपनी पसंद के धर्म का पालन तथा इच्छानुसार धर्म परिवर्तन करने और साथ ही किसी भी धर्म को नहीं मानने के अधिकार की गारंटी प्रदान की गयी है।

संबंधित चिंताएं और चुनौतियाँ:

इस तथाकथित नए ‘लव जिहाद’ कानून से संबंधित वास्तविक खतरा इस क़ानून की अस्पष्टता में है।

  • इस कानून में “अनुचित प्रभाव” (Undue Influence), “प्रलोभन” (Allurement) और “बल-पूर्वक” (Coercion) जैसे खुली बनावट वाले वाक्यांशों का उपयोग किया गया है।
  • वास्तव में, ‘क्या धर्म परिवर्तन सच में मात्र विवाह के उद्देश्य के लिए किया गया है?’ यह प्रश्न ही मूल रूप से अस्पष्ट है।
  • व्यक्तिपरक मूल्यांकन और इन सूक्ष्म वाक्यांशों के अभिमूल्यन में है असली संकट निहित है – इसमें मामले को पूरी तरह से न्यायाधीश के विवेक पर छोड़ दिया गया है।

उच्चतम न्यायालय के विचार:

लिली थॉमस और सरला मुद्गल दोनों मामलों में भारत के उच्चतम न्यायालय ने पुष्टि की है कि वास्तविक आस्था के बिना और कुछ कानूनी लाभ उठाने के उद्देश्य से किए गए धर्म परिवर्तन का कोई आधार नहीं है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. अनुच्छेद 21 के बारे में
  2. अनुच्छेद 25
  3. सलामत अंसारी-प्रियंका खरवार मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का निर्णय

मेंस लिंक:

किसी साथी को चुनने का अधिकार अथवा अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का अधिकार, नागरिकों के ‘जीवन और स्वतंत्रता संबंधी मूल अधिकार’ का भाग है। चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

K-आकार की आर्थिक बहाली एवं इसके निहितार्थ


संदर्भ:

कोविड महामारी के बाद से, भारत और समूचे विश्व में ‘K-आकार की आर्थिक बहाली’ (K-shaped recovery) की संभावनाओं में वृद्धि हो रही है।

K-आकार की आर्थिक बहाली’ क्या होती है?

जब अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से भिन्न दरों पर बहाली करते है, तो इसे K-आकार की बहाली’ (K-shaped recovery) कहा जाता है।

  • इसके तहत, पिरामिड के शीर्ष पर स्थित पारिवारों के काफी काफी हद तक सुरक्षित होने और लॉकडाउन के दौरान बचत दरों में वृद्धि होने की संभावना होती है, जिससे भविष्य में उपभोग हेतु इनके ‘ससाधनों’ में बढ़त होती है।
  • जबकि, ’K-आकार की आर्थिक बहाली’ में, इस दौरान पिरामिड के निचले स्तर पर स्थित परिवारों को स्थाई रूप से नौकरी और आय के संकट की संभावना होती है।

K-आकार की बहाली’ के वृहत् निहितार्थ:

  1. दो तिमाहियों तक, उच्च आय वाले परिवारों के लिए उच्च बचतों से लाभ प्राप्त हुआ है।
  2. निचले स्तर के परिवारों को नौकरियों और वेतन कटौती के रूप में आय-संबंधी स्थायी नुकसान हुए है; यदि श्रम बाजार में तेजी से सुधार नहीं होता है, तो इससे मांग पर आवर्ती प्रभाव पड़ेगा।
  3. कोविड के कारण प्रभावी आय का गरीब आबादी से समृद्ध आबादी की ओर हस्तांतरण होने की सीमा तक, ’K-आकार की बहाली’ मांग-बाधित रहेगी, क्योंकि गरीब आबादी में सीमांत उपभोग की उच्च प्रवृत्ति होती है। अर्थात, इनमें अपनी आय का उच्च अनुपात (बचत करने की बजाय) व्यय करने की प्रवृत्ति होती है।
  4. यदि कोविड-19 के कारण प्रतिस्पर्धा में कमी होती है अथवा आय और अवसरों की असमानता में वृद्धि होती है, तो इससे उत्पादकता-हानि और राजनीतिक आर्थिक-सीमाओं के कारण विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में आर्थिक-वृद्धि के रुझानों में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

आगे की राह:

आर्थिक नीतियों का निर्धारण करने से पहले अगली कुछ तिमाहियों से आगे का अवलोकन करने और इस आभासी उत्तेजना के पश्चात् बृहत अर्थव्यवस्था की स्थिति का अंदाजा लगाने की आवश्यकता है।

economic_recovery

 

इंस्टा जिज्ञासु:

आर्थिक बहाली के विभिन्न आकार वक्रों के बारे में जानकारी हेती पढ़िए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।

कॉरपोरेट घरानों द्वारा बैंक शुरू किए जाने संबंधी मुद्दे


संदर्भ:

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा बड़े व्यापारिक समूहों को बैंकिंग लाइसेंस देने संबंधी एक आंतरिक समिति की सिफारिश को टाल दिया गया है, हालाँकि प्रमोटरों के लिए निजी बैंकों में 26% तक का स्वामित्व रखने की अनुमति प्रदान कर दी गयी है।

पृष्ठभूमि:

भारतीय रिजर्व बैंक ने “भारतीय निजी क्षेत्र के बैंकों के स्वामित्व दिशानिर्देश और कॉर्पोरेट संरचना की समीक्षा” हेतु एक आंतरिक कार्य समूह (IWG) का गठन किया था। IWG द्वारा, हाल ही में अपनी रिपोर्ट सौंपी गयी है।

कार्य समूह की एक प्रमुख सिफारिश, बड़े कॉर्पोरेट या औद्योगिक घरानों को बैंकों के प्रवर्तक बनने की अनुमति दिए जाने के संबंध में थी।

big_bank

 

वर्तमान विवाद:

  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने IWG के सुझाव की आलोचना करते हुए इसे ‘चौंकाने वाला’ बताया है।
  • इनका मानना है, कि, सार्वजनिक क्षेत्र / सरकार के स्वामित्व वाले बैंकों के मौजूदा ढाँचे के लचर प्रशासन को औद्योगिक घरानों के स्वामित्व वाले अत्यधिक विवादित ढांचे के साथ प्रत्स्थापित करना, ‘छोटे-छोटे व्यय में किफायत करना और बडी रकम उडाना’ (penny wise pound foolish) होगा।

बड़े कॉर्पोरेट्स को निजी बैंक स्थापित करने की अनुमति देने संबधी सिफारिश की आलोचना का कारण:

ऐतिहासिक रूप से, भारतीय रिजर्व बैंक का विचार रहा है, कि बैंकों के आदर्श स्वामित्व दर्जे को दक्षता, इक्विटी और वित्तीय स्थिरता के मध्य संतुलन को बढ़ावा देना चाहिए।

  • निजी बैंकों की बड़ी भूमिका इसके जोखिमों से मुक्त नहीं होती है। वर्ष 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट इस तथ्य को सही साबित करता है।
  • मुख्य रूप से सरकारी स्वामित्व वाली बैंकिंग प्रणाली वित्तीय रूप से अधिक स्थिर मानी जाती है, क्योंकि संस्था के रूप में सरकार पर विश्वास होता है।
  • विशेष रूप से, इस मामले में, बड़े कॉर्पोरेट्स को निजी बैंक खोलने की अनुमति देने के संबंधमें मुख्य चिंता का विषय ‘हितों का संघर्ष’ है, अथवा तकनीकी तौर पर ‘संबद्ध ऋण’ (Connected Lending) है।

संबद्ध ऋण’ (Connected Lending) क्या होते हैं?

‘संबद्ध ऋण’/ कनेक्टेड लेंडिंग एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमे किसी बैंक का प्रवर्तक, खुद कर्जदार भी होता है। ऐसे में प्रवर्तक द्वारा जमाकर्ताओं के धन को अपने उपक्रमों में उपयोग करने की संभावना रहती है।

  • बैंकिंग प्रणाली में कनेक्टेड लेंडिंग काफी लंबे समय से जारी है और आरबीआई इसे पकड़ पाने में हमेशा पीछे रहा है।
  • आईसीआईसीआई बैंक, यस बैंक, डीएचएफएल आदि के हालिया प्रकरण, कनेक्टेड लेंडिंग के उदाहरण हैं।
  • तथाकथित ऋणों की सदाबहार स्थिति (ever-greening of loans), जिसमे कर्जदार को पुराना ऋण चुकाने के लिए नया ऋण दिया जाता है, कनेक्टेड लेंडिंग का प्रारंभिक बिंदु होता है।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

अंतरिक्षीय कचरा


(Space debris)

संदर्भ:

शोधकर्ताओं के अनुसार, शीघ्र ही पृथ्वी के चारो ओर ‘शनि ग्रह’ की भांति ‘वलय’ / ‘छल्ले’ बन सकते हैं, जोकि पूरी तरह से ‘अंतरिक्षीय कबाड़’ से बने होंगे। हालाँकि, इस कबाड़ को चुम्बकों के माध्यम से साफ किया जा सकता है।

संबंधित प्रकरण:

हर गुजरते हुए दशक के साथ विभिन्न देशों के द्वारा अंतरिक्षीय गतिविधियों में वृद्धि होती जा रही है, और इसके साथ ही अंतरिक्ष में मलबे की समस्या नियंत्रण से बाहर हो रही है। रूस द्वारा उपग्रह-रोधी हथियारों के परीक्षण, जैसी हालिया घटनाएं इस समस्या को और बढ़ा रही हैं।

  • यह मलबा, अब अंतरिक्ष कबाड़ की समस्या को बढ़ा रहा है और अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) और भूस्थिर कक्षा में उपग्रहों के लिए एक बड़ा खतरा पैदा कर रहा है।
  • अंतरिक्षीय मलबा, वर्तमान में अंतरिक्ष में रहने वाले अमेरिकी, रूसी और चीनी अंतरिक्ष यात्रियों के जीवन के लिए एक संभावित खतरा भी बन सकता है।

‘अंतरिक्षीय कचरा’ क्या होता है?

अंतरिक्षीय कचरा अथवा अंतरिक्षीय मलबा (Space debris), संचार, परिवहन, मौसम और जलवायु निगरानी, ​​रिमोट सेंसिंग जैसे महत्वपूर्ण कार्यों के निष्पादन में सहयोग करने वाली, अंतरिक्ष में स्थित प्रौद्योगिकियों के समक्ष, एक वैश्विक खतरा उत्पन्न करता है।

राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से, और भारतीय मूल की सार्वजनिक और निजी संपत्ति की सुरक्षा के लिए भी, इन अंतरिक्षीय-पिण्डों से टकराव की संभावना का अनुमान लगाना काफी महत्वपूर्ण है।

अंतरिक्ष में मलबे की मात्रा:

चूंकि, वर्तमान सेंसर तकनीक छोटे आकार के पिंडों का पता लगाने में सक्षम नहीं है, फिर भी इसके द्वारा प्रदान किये गए आंकड़ों के आधार पर माना जाता है, कि अंतरिक्षीय मलबे में 500,000 से एक मिलियन टुकड़े / खंड शामिल हैं।

ये सभी खंड 17,500 मील प्रति घंटे (28,162 किमी प्रति घंटे) की गति से भ्रमण कर रहे है, तथा कक्षीय मलबे का एक छोटा सा टुकड़ा भी किसी उपग्रह या अंतरिक्ष यान को नुकसान पहुंचाने के लिए पर्याप्त है।

इस परियोजना का महत्व:

इस परियोजना के नतीजों में, एक कार्यात्मक रूप से अनुकूल, मापनीय (scalable), पारदर्शी और स्वदेश निर्मित टक्कर संभावना समाधान तैयार किया जाएगा, जिससे भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र को प्रत्यक्ष $ 7 बिलियन (51,334 करोड़ रुपये) की सहायता मिलेगी।

नेत्र (NETRA):

पिछले दिसंबर में, इसरो द्वारा, अंतरिक्ष मलबे से अपनी अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए, बेंगलुरु में ‘नेत्र’ (NETRA) नामक ‘स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस’ (SSA) नियंत्रण केंद्र स्थापित किया गया था।

  • ‘नेत्र’ का मुख्य उद्देश्य, राष्ट्रीय अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की देखरेख, निगरानी और सुरक्षा करना तथा सभी SSA गतिविधियों के केंद्र के रूप में कार्य करना है।
  • केवल अमेरिका, रूस और यूरोप में पास, अंतरिक्ष पिंडों पर नज़र रखने और टकराव संबंधी चेतावनियों को साझा करने वाली, इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं।

स्रोत: डाउन टू अर्थ।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

पासिफए प्रोजेक्ट और इसका महत्व


(PASIPHAE Project and its importance)

संदर्भ:

‘पोलर-एरियाज़ स्टेलर-इमेजिंग इन पोलेराइज़ेशन हाई-एक्यूरेसी एक्सपेरीमेंट’ (Polar-Areas Stellar-Imaging in Polarisation High-Accuracy Experiment – PASIPHAE) अर्थात ‘पासिफए’ एक अंतर्राष्ट्रीय सहयोगी आकाश सर्वेक्षण परियोजना है।

इस प्रोजेक्ट के तहत, वैज्ञानिकों का लक्ष्य लाखों तारों से निकलने वाले प्रकाश में होने वाले ध्रुवीकरण या ध्रुवण (Polarisation) का अध्ययन करना है।

पृष्ठभूमि:

ध्रुवीकरण, प्रकाश का एक गुण होता है, जो प्रकाश तरंग के दोलन करने की दिशा को दर्शाता है।

current affairs

 

सर्वेक्षण की क्रिया-विधि:

सर्वेक्षण में में उत्तरी और दक्षिणी आसमान को एक साथ देखने के लिए दो हाई-टेक ऑप्टिकल पोलरिमीटर्स (Polarimeters) का उपयोग किया जाएगा।

  • सर्वेक्षण में, काफी धुंधले तारों से निकलने वाले प्रकाश के ध्रुवीकरण पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। ये तारे बहुत अधिक दूरी पर स्थित है और अभी तक इनके ध्रुवीकरण संकेतों का व्यवस्थित रूप से अध्ययन नहीं किया गया है।
  • इन तारों की दूरी GAIA उपग्रह द्वारा की गई माप से ज्ञात की जाएगी।
  • इन आंकड़ों का संयोजन करके, खगोलविद WALOP (वाइड एरिया लीनियर ऑप्टिकल पोलारिमीटर) नामक एक अत्याधुनिक पोलरिमीटर उपकरण के द्वारा विस्तृत आकाश क्षेत्रों के अंतर-तारकीय माध्यम की पहली चुंबकीय क्षेत्र टोमोग्राफी मैपिंग (magnetic field tomography mapping) करेंगे।

परियोजना का महत्व:

सिद्धांत के अनुसार, ब्रह्मांड के तीव्र स्फीतिकारी चरण के दौरान उत्सर्जित CMB विकिरण के एक अल्पांश के चिह्न एक विशिष्ट प्रकार के ध्रुवीकरण पर मिलने चाहिए, इस ध्रुवीकरण को तकनीकी रूप से बी-मोड सिग्नल के रूप में जाना जाता है।

  • इन बी-मोड सिग्नलों की उत्पत्ति, ब्रह्मांड-स्फीति के दौरान देखी जाने वाली शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण तरंगों के परिणामस्वरूप मानी जाती है।
  • हमारी अपनी आकाशगंगा में पाए जाने वाले धूल के विस्तृत बादलों के कारण, इसमें मौजूद भारी मात्रा में ध्रुवीकृत विकिरण और इन संकेतों को अलग करना मुश्किल हो जाता है।
  • संक्षेप में, PASIPHAE प्रोजेक्ट के तहत इन बाधाओं के प्रभाव का पता लगाने का प्रयास किया जाएगा, ताकि अंततः हम ब्रह्मांड की शुरुआत में घटित घटनाओं के बारे में जान सकें।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

प्रकाश के विभिन्न गुणों के बारे में जानने हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ध्रुवीकरण क्या होता है?
  2. PASIPHAE के बारे में
  3. GAIA सैटेलाइट के बारे में

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय

2010 में स्थापित, दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय (South Asian University – SAU) भारत में अवस्थित एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय है।

  • इसे दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (SAARC) के आठ सदस्य देशों द्वारा प्रायोजित किया जाता है।
  • दक्षिण एशियाई विश्वविद्यालय (SAU) द्वारा प्रदान किए गए डिग्री और प्रमाणपत्र, राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों / संस्थानों द्वारा दिए गए संबंधित डिग्री और प्रमाणपत्र के समान दर्जा रखते हैं।

 

सर छोटू राम

1881 में जन्मे, वह ब्रिटिश भारत में पंजाब प्रांत के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ थे।

  • उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के उत्पीड़ित समुदायों के हित के लिए काम किया। इस उपलब्धि के लिए, उन्हें 1937 में नाइट की उपाधि प्रदान की गयी।
  • वे नेशनल यूनियनिस्ट पार्टी के सह-संस्थापक थे।
  • उनके प्रयासों से दो कृषि कानून लागू किये गए थे- 1934 का पंजाब ऋणग्रस्तता राहत अधिनियम तथा 1936 का पंजाब कर्जदार सुरक्षा अधिनियम। इन कानूनों ने किसानों को साहूकारों के चंगुल से मुक्त कराया और जमीन पर जोतदार के अधिकार को बहाल किया।

 

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति (NCMC)

प्राकृतिक आपदाओं के मद्देनजर राहत उपायों के प्रभावी कार्यान्वयन हेतु, भारत सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन समिति (National Crisis Management CommitteeNCMC) का गठन किया गया है।

  • इसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव द्वारा की जाती है।
  • अन्य सदस्य: सभी संबंधित मंत्रालयों / विभागों तथा संगठनों के सचिव इस समिति के सदस्य होते हैं।
  • NCMC, आवश्यक समझे जाने पर, संकट प्रबंधन समूह के लिए दिशा-निर्देश जारी करती है।

Join our Official Telegram Channel HERE for Motivation and Fast Updates

Subscribe to our YouTube Channel HERE to watch Motivational and New analysis videos