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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 23 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. निजी डेटा विधेयक में शामिल ‘छूट’ संबंधी अनुच्छेद बरकरार

2. तानाशाही में वृद्धि होती जा रही है: रिपोर्ट

3. घरेलू कामगारों के बारे में पहला अखिल भारतीय सर्वेक्षण

4. आंध्र प्रदेश में तीन राजधानियों संबंधी कानून को फिर से लागू करने हेतु कार्रवाई

5. आसियान सम्मलेन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नीति

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. स्वेज़ नहर

2. पिग्मी हॉग

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

निजी डेटा विधेयक में शामिल ‘छूट’ संबंधी अनुच्छेद बरकरार


संदर्भ:

हाल ही में, ‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ 2019 (Personal Data Protection (PDP) Bill, 2019) पर गठित ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (Joint Parliamentary Committee – JPC) द्वारा अपनी रिपोर्ट सौंप दी गयी है।

‘संयुक्त संसदीय समिति’ ने विधेयक के ‘छूट’ संबंधी विवादास्पद अनुच्छेद को बरकरार रखा है, जिसके तहत कुछ मामूली परिवर्तनों के साथ, सरकार के लिए अपनी किसी भी एजेंसी को ‘निजी डेटा संरक्षण विधेयक’ के के दायरे से बाहर रखने की शक्ति दी गयी है।

प्रमुख सिफारिशें:

  1. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए कड़े नियम: ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) ने, जो सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘मध्यस्थ’ के रूप में काम नहीं करते हैं, उन सभी के लिए ‘प्रकाशक’ के रूप में समझे जाने तथा उनके प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकशित सामग्री के लिए उत्तरदायी ठहराए जाने की सिफारिश की है। साथ ही ‘समिति’ ने इनके प्लेटफार्मों पर असत्यापित खातों से प्रकशित की जाने वाली सामग्री के लिए भी जिम्मेदार ठहराए जाने का सुझाव दिया है।
  2. ‘संयुक्त संसदीय समिति’ के अनुसार, किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को भारत में संचालन के लिए तब तक अनुमति नहीं दी जानी चाहिए, जब तक प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण रखने वाली मूल कंपनी भारत में एक कार्यालय स्थापित नहीं करती है और अपने प्लेटफ़ॉर्म पर प्रकाशित सामग्री, चाहे उसका स्रोत कहीं भी हो, के नियमन हेतु ‘भारतीय प्रेस परिषद’ की तर्ज पर एक ‘वैधानिक मीडिया नियामक प्राधिकरण’ स्थापित नहीं करती है।
  3. ‘संयुक्त संसदीय समिति’ द्वारा की गयी कुछ अन्य सिफारिशों में ‘रिपल’ (यू.एस.) और INSTEX (यूरोपीय संघ) की तर्ज पर, सीमा पार से होने वाले भुगतान के लिए एक वैकल्पिक स्वदेशी वित्तीय प्रणाली का विकास किए जाने संबंधी अनुशंसाएं शामिल है।

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अनुच्छेद 35 विधेयक में शामिल एक विवादास्पद प्रावधान:

अनुच्छेद 35 में “भारत की संप्रभुता और अखंडता,” “सार्वजनिक व्यवस्था”, “विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध” और “राज्य की सुरक्षा” संबंधी मामले का हवाला देकर, केंद्र सरकार को सरकारी एजेंसियों के लिए इस अधिनियम के सभी या किसी भी प्रावधान को निलंबित करने की शक्ति प्रदान की गयी है।

‘अनुच्छेद 35’, ‘संयुक्त संसदीय समिति’ (JPC) की बैठकों में व्यापक रूप से बहस किए जाने वाले अनुच्छेदों में शामिल रहा।

इस संदर्भ में दिए गए विभिन्न सुझाव:

  • ‘संयुक्त संसदीय समिति’ के सदस्यों ने ‘छूट’ के आधार के रूप में “सार्वजनिक व्यवस्था” को हटाए जाने के पक्ष में तर्क दिए।
  • सदस्यों द्वारा इस प्रकार की ‘छूट’ दिए जाने हेतु “न्यायिक या संसदीय निगरानी” के प्रावधान को शामिल करने के लिए भी दबाव डाला गया था।
  • सदस्यों ने यह भी सुझाव दिया, कि “विधेयक के दायरे से किसी एक एजेंसी को छूट देने हेतु कारणों सहित एक लिखित आदेश” होने का प्रावधान होना चाहिए”।
  • कुछ सदस्यों के अनुसार, किसी एजेंसी को जरूरत पड़ने पर केवल आंशिक छूट दी जानी चाहिए।

हालाँकि, इनमें से किसी भी सुझाव को स्वीकार नहीं किया गया है।

इस अनुच्छेद को बरकरार रहे जाने के पीछे तर्क:

  • एक सुरक्षित राष्ट्र, अकेले ऐसा वातावरण प्रदान करता है, जिसमे किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता सुनिश्चित रहती है, जबकि ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जहां व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के बगैर, राष्ट्रीय सुरक्षा स्वयं ही एक निरंकुश शासन को जन्म देती है।
  • रिपोर्ट में कहा गया है, कि यह अनुच्छेद “कुछ वैध उद्देश्यों” के लिए शामिल किया गया है और इसके लिए, संविधान के अनुच्छेद 19 और पुट्टस्वामी फैसले के तहत प्रद्दत गारंटी के अनुसार ‘किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता पर उचित प्रतिबंध लगाए जाने संबंधी प्रावधानों’ के रूप में एक पूर्व-उदाहरण भी मौजूद है।

कुछ प्रावधानों के प्रति व्यक्त की गई चिंताएं:

विधेयक में निजता के अधिकार की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय प्रदान नहीं किए गए हैं और सरकार को ऊपर से छूट प्रदान की गयी है। अनुच्छेद 35 के तहत सरकार को बिनाशर्त और अनधिकृत शक्तियां प्रदान की गयी है, जिससे इसके दुरुपयोग की पूरी संभवना है।

निजी डेटा संरक्षण (PDP) विधेयक 2019:

  • इस विधेयक की उत्पत्ति का स्रोत, न्यायमूर्ति बी.एन. श्री कृष्णा की अध्यक्षता में गठित एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में देखा जा सकता है।
  • ‘निजता के अधिकार’ संबंधी मामले (जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ) में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान, सरकार द्वारा इस समिति का गठन किया गया था।

निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 में डेटा विनियमन:

विधेयक में तीन प्रकार की निजी जानकारी को शामिल किया गया हैं:

  1. गंभीर
  2. संवेदनशील
  3. सामान्य

विधेयक के अन्य प्रमुख प्रावधान:

  • डेटा स्वामी: विधेयक के अनुसार, डेटा स्वामी (Data principal) वह व्यक्ति है जिसका डेटा संग्रहीत और संसाधित किया जा रहा है।
  • सोशल मीडिया कंपनियां: जिन सोशल मीडिया कंपनियों को डेटा की मात्रा और संवेदनशीलता के साथ-साथ उनके कारोबार जैसे कारकों के आधार पर महत्वपूर्ण डेटा न्यासी माना जाता है, उन्हें अपना स्वयं का उपयोगकर्ता सत्यापन तंत्र विकसित करना होगा।
  • एक स्वतंत्र नियामक ‘डेटा प्रोटेक्शन एजेंसी’ (DPA) द्वारा आकलन और ऑडिट की देखरेख की जाएगी।
  • प्रत्येक कंपनी में एक डेटा संरक्षण अधिकारी (DPO) होगा, जो लेखा परीक्षा, शिकायत निवारण, रिकॉर्डिंग रखरखाव और अधिक के लिए DPA के साथ संपर्क करेगा।
  • विधेयक के अंतर्गत, व्यक्तियों को डेटा पोर्टेबिलिटी का अधिकार, और अपने स्वयं के डेटा तक पहुंचने और स्थानांतरित करने की अधिकार भी प्रदान किया गया है।
  • भुलाए जाने का अधिकार: इस अधिकार के तहत, किसी व्यक्ति को डेटा संग्रह और इसके प्रकाशित करने के संबंध में सहमति को हटाने की अनुमति दी गयी है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. डेटा संरक्षण विधेयक
  2. प्रमुख प्रावधान
  3. संसदीय समिति
  4. पुट्टस्वामी फैसला
  5. निजता का अधिकार

मेंस लिंक:

निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 के विवादास्पद प्रावधानों पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: लोकतंत्र में सिविल सेवाओं की भूमिका।

तानाशाही में वृद्धि होती जा रही है: रिपोर्ट


संदर्भ:

हाल ही में, इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस (International Institute for Democracy and Electoral Assistance) द्वारा ‘ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी रिपोर्ट, 2021’ (Global State of Democracy Report, 2021) जारी की गयी है।

  • रिपोर्ट में शासन के तीन मुख्य प्रकारों का उल्लेख किया गया है: लोकतंत्र शासन (Democracies), मिश्रित शासन (Hybrid) और सत्तावादी शासन (Authoritarian)।
  • जिसमे, मिश्रित शासन और सत्तावादी शासन, दोनों को गैर-लोकतांत्रिक शासन-पद्धति के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

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रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  • वर्ष 2020 में, सत्तावाद की ओर अग्रशील होने वाले देशों की संख्या, लोकतंत्र की ओर दूसरी दिशा में बढ़ने वाले देशों की तुलना में अधिक थी। 20 देश, सत्तावाद की दिशा में अग्रशील हुए, जबकि मात्र सात देश लोकतंत्र की ओर आगे बढ़े।
  • महामारी ने इस मौजूदा नकारात्मक प्रवृत्ति को पांच साल तक की अवधि के लिए बढ़ा दिया है। यह 1970 के दशक में लोकतंत्रीकरण की तीसरी लहर की शुरुआत के बाद से, नकारात्मक दिशा में बढ़त की सबसे लंबी अवधि है।
  • स्थापित लोकतंत्रों सहित, कई देशों में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकारें, तेजी से सत्तावादी रणनीति अपना रही हैं।

विभिन्न अध्ययनों के तहत किया गया प्रदर्शन विश्लेषण:

  • रिपोर्ट में ‘ब्राजील’ और ‘भारत’ के मामले को ‘पीछे जाने के सबसे चिंताजनक उदाहरणों में शामिल मामलों के रूप में बताया गया है। हालाँकि, भारत को एक ‘मध्य-स्तरीय प्रदर्शन करने वाले लोकतंत्र’ की श्रेणी में बनाए रखा गया है। विदित हो कि भारत वर्ष 2000 से, ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी रिपोर्ट में ‘मध्य-स्तरीय प्रदर्शन करने वाले लोकतंत्र’ में बना हुआ है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के तीन सदस्य देशों (हंगरी, पोलैंड और स्लोवेनिया) में भी चिंताजनक लोकतांत्रिक पतन की प्रवृत्ति देखी गयी है।

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रिपोर्ट के बारे में:

‘लोकतंत्र की वैश्विक स्थिति’ रिपोर्ट, 2021 / ग्लोबल स्टेट ऑफ़ डेमोक्रेसी (Global State of Democracy) रिपोर्ट, 2021 में वर्ष 2015 के बाद से जारी लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों को प्रासंगिक संदर्भ के रूप में उपयोग करते हुए, वर्ष 2020 और 2021 के दौरान दुनिया भर में लोकतंत्र की स्थिति की समीक्षा की गयी है।

  • यह रिपोर्ट, महामारी की शुरुआत के बाद से वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक शासन व्यवस्थाओं को प्रभावित करने वाली घटनाओं के विश्लेषण पर आधारित है। इस रिपोर्ट को, ‘इंटरनेशनल आईडिया’ (International IDEA’s) के ‘लोकतंत्र एवं मानवाधिकारों पर कोविड -19 प्रभाव की वैश्विक निगरानी (Global Monitor of Covid-19’s Impact on Democracy and Human Rights) तथा ‘इंटरनेशनल आईडिया’ के ‘ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी’ (GSoD) सूची सहित विभिन्न डेटा स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।
  • ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी’ (GSoD) सूची में लोकतंत्र के 28 पहलुओं के आधार पर, वर्ष 2020 के अंत तक, समान देशों के लिए लोकतांत्रिक गुणवत्ता पर मात्रात्मक आंकड़े प्रदान किए जाते हैं।

‘लोकतंत्र’ क्या होता है?

रिपोर्ट में ‘लोकतंत्र’ (Democracy) को पांच निम्नलिखित प्रमुख विशेषताओं के आधार पर परिभाषित किया गया है:

  1. प्रतिनिधि सरकार,
  2. मौलिक अधिकार,
  3. सरकार पर नियंत्रण,
  4. निष्पक्ष प्रशासन और
  5. भागीदारी।

ये पाँच विशेषताएँ ही इस रिपोर्ट की आधारिक संरचना बनाती हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘वार्षिक लोकतंत्र रिपोर्ट’ (Annual democracy report) के बारे में सुना है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
  2. भारत और अन्य देशों का प्रदर्शन

मेंस लिंक:

नवीनतम लोकतंत्र सूचकांक में भारत के प्रदर्शन पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

घरेलू कामगारों के बारे में पहला अखिल भारतीय सर्वेक्षण


संदर्भ:

हाल ही में, घरेलू कामगारों पर किए जा रहे पहले ‘अखिल भारतीय सर्वेक्षण’ की केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री द्वारा शुरुआत की गयी।

सर्वेक्षण के बारे में:

घरेलू कामगारों पर पहला ‘अखिल भारतीय सर्वेक्षण’ श्रम ब्यूरो द्वारा किया जा रहा है।

  • इसका उद्देश्य, राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर घरेलू कामगारों, अनौपचारिक रोजगार में संलग्न व्यक्तियो तथा प्रवासी और गैर-प्रवासी कामगारों की संख्या; नियोक्ता के घरों में रहने वाले तथा बाहर रहने वाले घरेलू कामगारों का अनुपात; इन कामगारों का वेतन; और अन्य सामाजिक-आर्थिक कारकों के बारे में अनुमान लगाना है।
  • यह सर्वेक्षण लिव-इन/लिव-आउट घरेलू कामगारों के घरेलू अनुमान और विभिन्न प्रकार के घरों में काम करने वाले घरेलू कामगारों की औसत संख्या का विवरण भी उपलब्ध कराएगा।

घरेलू कामगारों पर राष्ट्रीय नीति का मसौदा:

घरेलू कामगारों पर राष्ट्रीय नीति का मसौदा (A draft National Policy on domestic workers) वर्तमान में केंद्र सरकार के पास विचाराधीन है। इस नीति को अंतिम रूप दिए जाने के पश्चात, देश के 50 लाख घरेलू कामगारों को लाभ होगा, जिनमें नौकरानियों और ड्राइवरों सहित अन्य कामगार भी शामिल होंगे।

नीति की प्रमुख विशेषताएं:

  • मौजूदा कानूनों में घरेलू कामगारों का समावेशन करना।
  • घरेलू कामगारों को ‘श्रमिक’ के रूप में पंजीकरण कराने का अधिकार होगा। इस तरह के पंजीकरण से, घरेलू कामगारों को श्रमिकों के रूप में उन्हें प्राप्त होने वाले अधिकारों और लाभों की हासिल करने की सुविधा मिल सकेगी।
  • इनके लिए, अपने स्वयं के संगठन और ‘ट्रेड यूनियन’ बनाने का अधिकार प्राप्त होगा।
  • नीति में, घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी पाने का अधिकार, सामाजिक सुरक्षा तक पहुंच, दुर्व्यवहार, उत्पीड़न, हिंसा से सुरक्षा से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।
  • अपने ‘पेशेवर कौशल को बढ़ाने का अधिकार’ मिलेगा।
  • घरेलू कामगारों को दुर्व्यवहार और शोषण से सुरक्षा संबंधी प्रावधान।
  • घरेलू कामगारों की अदालतों, न्यायाधिकरणों आदि तक पहुंच सुनिश्चित की गयी है।
  • संबंधित नियोजन एजेंसियों के विनियमन के लिए एक तंत्र का गठन किया जाएगा।

पहले से किए जा रहे उपाय:

  • केंद्र सरकार द्वारा घरेलू कामगारों सहित सभी असंगठित कामगारों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए ‘असंगठित कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम’, 2008 अधिनियमित किया गया है।
  • राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (ग्रामीण विकास मंत्रालय); राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (ग्रामीण विकास मंत्रालय); जननी सुरक्षा योजना (स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय), आयुष्मान भारत (स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय) जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाएं चलायी जा रही हैं।
  • प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (PMJJBY) और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (PMSBY) के साथ आम आदमी बीमा योजना (AABY), के तहत असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को, उनकी पात्रता के आधार पर 18 से 50 वर्ष के आयु वर्ग के लिए जीवन और विकलांगता सुरक्षा प्रदान की गयी है।
  • घरेलू कामगारों को पेशेवर बनाने तथा उनके करियर को आगे बढाने हेतु, कौशल विकास मंत्रालय के तहत, ‘घरेलू कामगार क्षेत्र कौशल परिषद’ का गठन किया गया है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. घरेलू कामगारों पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण के बारे में
  2. उनके कल्याण से संबंधित योजनाएं
  3. घरेलू कामगारों पर नीति के मसौदे के बारे में

मेंस लिंक:

घरेलू कामगारों पर नीति की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

आंध्र प्रदेश में तीन राजधानियों संबंधी कानून को फिर से लागू करने हेतु कार्रवाई


संदर्भ:

आंध्र प्रदेश विधानसभा द्वारा ‘आंध्र प्रदेश विकेंद्रीकरण एवं सभी क्षेत्रों का समावेशी विकास अधिनियम (A.P. Decentralisation and Inclusive Development of All Regions Act), 2020 (तीन राजधानियों की स्थापना के उद्देश्य से), तथा ‘आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण (निरसन) अधिनियम, 2020’ (Capital Region Development Authority (CRDA) Repeal Act of 2020) को निरसित करने के लिए एक विधेयक पारित किया गया है।

सरकार द्वारा ‘अमरावती में भूमि देने वालों की गलत धारणाओं को दूर करने और उच्च न्यायालय में याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए वैधताओं पर स्थिति स्पष्ट करते हुए एक अधिक व्यापक कानून लाने की योजना बनाई जा रही है।

आवश्यकता:

पहले पारित किए जा चुके इन अधिनियमों को निरसित करने का उद्देश्य, विकेंद्रीकरण की नीति को और अधिक स्पष्टता प्रदान करना और लोगों के सभी वर्गों को एक विस्तृत विवरण प्रदान करना है।

तीन राजधानियाँ:

31 जुलाई को राज्य सरकार द्वारा ‘आंध्र प्रदेश विकेंद्रीकरण एवं सभी क्षेत्रों का समावेशी विकास अधिनियम, 2020 तथा आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण (निरसन) अधिनियम, 2020 को अधिसूचित किए गए थे।

यह अधिनियम आंध्रप्रदेश राज्य के लिए तीन राजधानियों का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

  1. अमरावती- विधायी राजधानी।
  2. विशाखापत्तनम- कार्यकारी राजधानी।
  3. कुर्नूल – न्यायिक राजधानी।

तीन राजधानियों की आवश्यकता:

  • राज्य सरकार का कहना है कि वह राज्य के अन्य हिस्सों की उपेक्षा करते हुए एक विशाल राजधानी शहर बनाने के विरुद्ध है। प्रदेश की तीन राजधानियाँ होने से राज्य के विभिन्न क्षेत्रों का समान रूप से विकास सुनिश्चित होगा।
  • आंध्र प्रदेश की राजधानी के लिए उपयुक्त स्थान का सुझाव देने के लिए गठित सभी प्रमुख समितियों की सिफारिशों में ‘विकेंद्रीकरण’ केंद्रीय विषय रहा है। इन समितियों में जस्टिस बी एन श्रीकृष्ण समिति, के शिवरामकृष्णन समिति, तथा जी एन राव समिति आदि सम्मिलित हैं।

इस विचार को लागू करने में समस्या:

  • समन्वय और क्रियान्वयन संबधी आशंका: अलग-अलग शहरों में स्थित विधायिका तथा कार्यपालिका का मध्य समन्वय स्थापित करना, कहने के लिए आसान परन्तु करने के लिए काफी मुश्किल साबित होगा, तथा, इसके अतिरिक्त सरकार द्वारा इस संदर्भ में किसी योजना का विवरण नहीं दिया गया है, इससे अधिकारी तथा आम नागरिक सभी, इसके कार्यान्वयन को लेकर आशंकित हैं।
  • परिवहन लागत और समय: कार्यकारी राजधानी विशाखापत्तनम, न्यायिक राजधानी कुर्नूल से 700 किमी तथा विधायी राजधानी अमरावती से 400 किमी की दूरी पर स्थित है। अमरावती तथा कुर्नूल के मध्य 370 किमी की दूरी है। तीन राजधानियां होने से यात्रा में लगने वाला समय तथा लागत काफी महंगी साबित होगी।

एक से अधिक राजधानी वाले भारतीय राज्य:

  1. महाराष्ट्र: की दो राजधानियाँ हैं- मुंबई तथा नागपुर (राज्य विधानसभा का शीतकालीन सत्र)।
  2. हिमाचल प्रदेश: की शिमला और धर्मशाला (शीतकालीन) दो राजधानियाँ हैं।
  3. पूर्व राज्य जम्मू और कश्मीर की श्रीनगर तथा जम्मू (शीतकालीन) दो राजधानियाँ थी।

current affairs

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जनहित याचिका याचिका क्या है?
  2. किन भारतीय राज्यों में एक से अधिक राजधानियाँ हैं?
  3. आंध्र प्रदेश की प्रस्तावित राजधानियाँ
  4. भारतीय संविधान के तहत विभिन्न याचिकाएं

मेंस लिंक:

राज्य में कई राजधानियों की उपयुक्तता पर चर्चा कीजिए। यह किस प्रकार राज्य के शासन को प्रभावित कर सकती है? उपयुक्त उदाहरण सहित बताइए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।

आसियान सम्मलेन


संदर्भ:

समृद्ध संसाधन युक्त इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका के बढ़ते वर्चस्व को देखते हुए, बीच चीन द्वारा दस देशों के संगठन ‘आसियान’ के साथ सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए व्यापक रणनीतिक साझेदारी हेतु संबंधों को बढ़ाने, और साथ में ‘दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संघ’ अर्थात आसियान (ASEAN) के लिए 1.5 बिलियन अमरीकी डालर की विकास सहायता देने की घोषणा की गयी है।

  • चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘आसियान-चीन वार्ता संबंधों’ की 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में ‘आसियान-चीन विशेष शिखर सम्मेलन’ में यह घोषणा की।
  • उन्होंने यह भी कहा, कि चीन कभी भी आधिपत्य ज़माने का प्रयास नहीं करेगा और न ही छोटे देशों को दबाने के लिए अपने बड़े आकार का लाभ उठाएगा। इसके अलावा चीन “व्यवधानों” को खत्म करने के लिए आसियान के साथ मिलकर कार्य करेगा।

आसियान (ASEAN) के बारे में:

दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों का संघ (Association of Southeast Asian Nations- ASEAN) अर्थात ‘आसियान’ एक क्षेत्रीय संगठन है। इसकी स्थापना एशिया-प्रशांत क्षेत्र के उत्तर-औपनिवेशिक देशों के मध्य बढ़ते हुए तनाव के बीच राजनीतिक और सामाजिक स्थिरता को बढ़ावा देने हेतु की गई थी।

  • आसियान का आदर्श वाक्य “एक दृष्टि, एक पहचान, एक समुदाय” (One Vision, One Identity, One Community) है।
  • आसियान का सचिवालय –जकार्ता, इंडोनेशिया में है।

उत्पत्ति (Genesis):

आसियान का गठन वर्ष 1967 में इसके संस्थापक सदस्यों द्वारा आसियान घोषणा (बैंकॉक घोषणा) पर हस्ताक्षर करने के साथ हुआ था।

  • आसियान के संस्थापक सदस्य: इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, सिंगापुर और थाईलैंड।
  • आसियान के दस सदस्य: ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम।

भारत के लिए आसियान का महत्व:

लद्दाख गतिरोध सहित चीन के आक्रामक रवैए की पृष्ठभूमि में, भारत द्वारा ‘आसियान’ को ‘भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी (India’s Act East policy) के केंद्र में रखा गया है। भारत का मानना है, कि इस क्षेत्र में सभी की सुरक्षा और विकास हेतु एक संसक्त एवं उत्तरदायी ‘आसियान’ का होना आवश्यक है।

  • क्षेत्र में सभी की सुरक्षा और विकास’ (Security And Growth for All in the Region– SAGAR) अर्थात ‘सागर’ विजन की सफलता के लिए आसियान की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है।
  • कोविड-19 महामारी का अंत होने के बाद, आर्थिक सुधार हेतु आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण और लचीलेपन के लिए यह क्षेत्र काफी महत्वपूर्ण है।
  • आसियान, भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार है, तथा इसके साथ लगभग 86.9 बिलियन अमरीकी डालर का व्यापार होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

भारत वर्ष 1992 में आसियान का ‘क्षेत्रीय भागीदार’ (Sectoral Partner) बना था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. आसियान देशों की भौगोलिक अवस्थिति
  2. आसियान देशों की कुल जनसंख्या
  3. आसियान की अध्यक्षता
  4. आसियान शिखर सम्मेलन कब और कहाँ आयोजित किए जाते हैं?
  5. मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) क्या हैं?

मेंस लिंक:

भारत की आर्थिक, भू-रणनीतिक और सुरक्षा अनिवार्यताओं के लिए आसियान के महत्व का परीक्षण कीजिए?

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर नीति


संदर्भ:

किसानों द्वारा गारंटीकृत ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (Minimum Support Price MSP) हेतु एक कानून बनाए जाने की मांग की जा रही है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्या होता है?

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (Minimum Support Prices -MSPs), किसी भी फसल का वह ‘न्यूनतम मूल्य’ होता है, जिस पर सरकार किसानों से फसल खरीदती है। वर्तमान में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडल समिति, खरीफ और रबी, दोनों मौसमों में उगाई जाने वाली 23 फसलों के लिए ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ निर्धारित करती है।

MSP की गणना किस प्रकार की जाती है?

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) की गणना, किसानों की उत्पादन लागत के कम से कम डेढ़ गुना कीमत के आधार पर की जाती है।

  • 2018-19 के केंद्रीय बजट में की गई घोषणा के अनुसार, MSP को उत्पादन लागत के डेढ़ गुना के बराबर रखा जाएगा।
  • ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) का निर्धारण ‘कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ (Commission for Agricultural Costs and PricesCACP) की संस्तुति पर, एक वर्ष में दो बार किया जाता है।
  • कृषि लागत एवं मूल्य आयोग’ (CACP) एक वैधानिक निकाय है, जो खरीफ और रबी मौसम के लिए कीमतों की सिफारिश करने वाली अलग-अलग रिपोर्ट तैयार करता है।

MSP निर्धारित करने में शामिल की जाने वाली उत्पादन लागतें: 

‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) का निर्धारण करते समय, कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (CACP), ‘A2+FL’ तथा ‘C2’ लागत, दोनों को ध्यान में रखता है।

  1. A2’ लागत में कि‍सान द्वारा सीधे नकद रूप में और बीज, खाद, कीटनाशक, मजदूरों की मजदूरी, ईंधन, सिंचाई आदि पर किये गए सभी तरह के भुगतान को शामिल किया जाता है।
  2. A2+FL’ में ‘A2’ सहित अतिरिक्त अवैतनिक पारिवारिक श्रम का एक अनुमानित मूल्य शामिल किया जाता है।
  3. C2 लागत में, कुल नगद लागत और किसान के पारिवारिक पारिश्रामिक (A2+FL) के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाला ब्याज भी शामिल किया जाता है।

MSP की सीमाएं:

  1. ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (MSP) के साथ प्रमुख समस्या गेहूं और चावल को छोड़कर अन्य सभी फसलों की खरीद के लिए सरकारी मशीनरी की कमी है। गेहूं और चावल की खरीद ‘भारतीय खाद्य निगम’ (FCI) के द्वारा ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ (PDS) के तहत नियमित रूप से की जाती है।
  2. चूंकि राज्य सरकारों द्वारा अंतिम रूप से अनाज की खरीद की जाती है और जिन राज्यों में अनाज की खरीद पूरी तरह से सरकार द्वारा की जाती हैं, वहां के किसानो को अधिक लाभ होता है। जबकि कम खरीद करने वाले राज्यों के किसान अक्सर नुकसान में रहते हैं।
  3. MSP-आधारित खरीद प्रणाली बिचौलियों, कमीशन एजेंटों और APMC अधिकारियों पर भी निर्भर होती है, और छोटे किसानों के लिए इन तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

कृषि-वानिकी / ‘एग्रोफोरेस्ट्री’ क्या होती है? भारत को इसे बढ़ावा देने की आवश्यकता क्यों है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CCEA की संरचना।
  2. CACP क्या है?
  3. MSP योजना में कितनी फसलें शामिल हैं?
  4. MSP की घोषणा कौन करता है?
  5. खरीफ और रबी फसलों के बीच अंतर

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


स्वेज़ नहर

स्वेज़ नहर (Suez Canal), मिस्र में अवस्थित कृत्रिम समुद्र-स्तरीय जल मार्ग है। यह नहर, स्वेज के स्थलडमरूमध्य (Isthmus) से होकर उत्तर-दक्षिण दिशा में प्रवाहित होती है।

  • यह अफ्रीका और एशिया को विभाजित करते हुए भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ती है।
  • यह यूरोप, हिंद महासागर और पश्चिमी प्रशांत महासागर के आसपास के देशों के बीच सबसे छोटा समुद्री मार्ग है।
  • यह विश्व का सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाने वाले जहाज-मार्गों में से एक है, और विश्व व्यापार का 12% से अधिक भाग इस मार्ग से होता है।

current affairs

 

पिग्मी हॉग

(Pygmy Hogs)

  • ये विश्व के सबसे दुर्लभ और सबसे छोटे जंगली सूअर हैं।
  • पिग्मी हॉग, हिमालय की दक्षिणी तलहटी में घने जलोढ़ घास के मैदानों के मूल निवासी है।
  • ये भारत के लिए स्थानिक हैं और उत्तर-पश्चिमी असम में मानस राष्ट्रीय उद्यान के आसपास बहुत कम स्थानों तक ही सीमित हैं।
  • जंगलों में इनकी आबादी मात्र लगभग 250 के आसपास बची है और यह विश्व के सबसे संकटग्रस्त स्तनधारियों में से एक है।
  • वर्तमान में यह प्रजाति IUCN लाल सूची में ‘गंभीर रूप से संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) के रूप में सूचीबद्ध है।
  • भारत में वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत पिग्मी हॉग को अनुसूची-I प्रजाति के रूप में शामिल किया गया है।

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