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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 17 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा मंदिरों के दैनिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप करना संभव नहीं

2. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक

3. सीबीआई की स्वायत्तता

4. राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर

5. विश्व बैंक की STARS परियोजना

6. विशिष्ट भू-खंड पहचान संख्या (ULPIN) योजना

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. अड्डू प्रवालद्वीप

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा मंदिरों के दैनिक अनुष्ठानों में हस्तक्षेप करना संभव नहीं


संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की गयी, जिसमे कहा गया है कि प्रसिद्ध तिरुमाला तिरुपति मंदिर में परंपरा के अनुसार अनुष्ठान नहीं किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां:

  • संवैधानिक अदालतें “जनहित” याचिकाओं के आधार पर, मंदिरों में किए जाने वाले दिन-प्रतिदिन के अनुष्ठानों और सेवाओं में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है।
  • मंदिर में अनुष्ठान रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार किए जा रहे हैं अथवा नहीं, धार्मिक विद्वान और पुजारी इस सवाल की बेहतर जांच कर सकते हैं।
  • इस प्रकार के मामलों में, अनुच्छेद 226 और 32 के तहत ‘संवैधानिक न्यायालयों’ का रिट अधिकार क्षेत्र सीमित है।

‘अनुच्छेद 32 के बारे में:

संविधान का अनुच्छेद 32 (Article 32) ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार’ से संबंधित है, तथा संविधान के भाग तीन में प्रदत्त अधिकारों के प्रवर्तन हेतु उपयुक्त प्रक्रिया द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार प्रदान करता है।

इसमें कहा गया है, कि संविधान के भाग तीन द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय को ऐसे निदेश अथवा आदेश या रिट, जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus), परमादेश (Mandamus), प्रतिषेध (Prohibition), अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) और उत्प्रेषण (Certiorari) रिट शामिल हैं, जो भी समुचित हो, जारी करने की शक्ति होगी।

प्रमुख बिंदु:

  • इस संविधान द्वारा अन्यथा प्रावधान किए जाने के सिवाय, इस अनुच्छेद द्वारा प्रत्याभूत अधिकारों को निलंबित नहीं किया जाएगा।
  • केवल इन मौलिक अधिकारों के उल्लंघन किए जाने पर कोई व्यक्ति अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।

क्या मूल अधिकारों के उल्लंघन संबंधी मामलों में उच्च न्यायालय से संपर्क किया जा सकता है?

सिविल या आपराधिक मामलों में, किसी पीड़ित व्यक्ति के लिए उपलब्ध सबसे पहला उपाय ट्रायल कोर्ट होते हैं, उसके बाद उच्च न्यायालय और फिर उच्चतम न्यायालय में अपील की जाती है।

  • मूल अधिकारों के उल्लंघन संबंधी मामलों में पीड़ित व्यक्ति अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय अथवा अनुच्छेद 32 के तहत सीधे उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकता है।
  • अनुच्छेद 226, हालाँकि, अनुच्छेद 32 की भांति मूल अधिकारों से संबंधित नहीं है।

अनुच्छेद 32 पर उच्चतम न्यायालय द्वारा की गयी हाल ही में की गयी टिप्पणियां:

रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य (1950) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गयी टिप्पणी में कहा गया, कि अनुच्छेद 32 मूल अधिकारों के प्रवर्तन हेतु ‘प्रत्याभूत’ उपाय प्रदान करता है।

  • यह अनुच्छेद, इस अदालत को मूल अधिकारों के रक्षक और प्रत्याभूति प्रदाता के रूप में अधिकार प्रदान करता है, और यह अदालत, सौंपे गए उत्तरदायित्वों सहित, मूल अधिकारों के उल्लंघन किये जाने के विरुद्ध सुरक्षा की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने से लगातार इंकार नहीं कर सकता है।
  • अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट जबलपुर बनाम एस एस शुक्ला (1976) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि आपातकाल के दौरान, नागरिकों को अनुच्छेद 32 के तहत अदालत में अपील करने का अधिकार रद्द हो जाता है।

संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंततः उच्चतम न्यायालय और इसके न्यायाधीश के विवेक पर निर्भर करता है कि, जिस मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय में भी की जा सकती है, उस मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप किया जाये अथवा नहीं।

writ

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रिट के प्रकार
  2. सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के रिट संबंधी क्षेत्राधिकार
  3. अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 32 के बारे में
  4. अनुच्छेद 32 के तहत सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने का अधिकार

मेंस लिंक:

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

 भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक


संदर्भ:

16 नवंबर को सीएजी कार्यालय परिसर में पहला ‘लेखा-परीक्षण दिवस’ (Audit Diwas) मनाया गया।

‘लेखा-परीक्षण दिवस’, ‘भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक’ (Comptroller and Auditor General of India – CAG) संस्था की ऐतिहासिक शुरुआत और पिछले कई वर्षों में शासन, पारदर्शिता तथा जवाबदेही में इसके योगदान को रेखांकित करने के लिए मनाया जा रहा है।

CAG के बारे में:

  • भारत के संविधान के भाग V के अंतर्गत अध्याय V में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के एक स्वतंत्र पद का प्रावधान किया गया है।
  • भारत के संविधान में CAG का उल्लेख अनुच्छेद 148 – 151 के तहत किया गया है।
  • यह भारतीय लेखा परीक्षण तथा लेखा विभाग के प्रमुख होते हैं।
  • यह लोक वित्त के संरक्षक तथा देश की संपूर्ण वित्तीय व्यवस्था के नियंत्रक होते हैं। इसका नियंत्रण राज्य एवं केंद्र दोनों स्तरों पर होता है।
  • इसका कर्तव्य भारत के संविधान एवं संसद की विधियों के तहत वित्तीय प्रशासन को बनाए रखना है।

संवैधानिक पद पर नियुक्ति एवं कार्यकाल:

  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाती है।
  • CAG का कार्यकाल 6 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होता है।

कर्तव्य:

  1. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारत की संचित निधि, प्रत्येक राज्य की संचित निधि तथा प्रत्येक संघ शासित प्रदेश, जहाँ विधान सभा हो, से सभी व्यय संबंधी लेखाओं की लेखा परीक्षा करता है।
  2. वह भारत की संचित निधि और भारत के लोक लेखा सहित प्रत्येक राज्य की आकस्मिक निधि तथा लोक लेखा से सभी व्यय की लेखा परीक्षा करता है।
  3. वह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के किसी भी विभाग द्वारा सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण, लाभ और हानि खातों, बैलेंस शीट और अन्य अनुषंगी लेखाओं की लेखा परीक्षा करता है।
  4. वह केंद्र और प्रत्येक राज्य द्वारा अनुदान प्राप्त सभी निकायों और प्राधिकरणों की प्राप्तियों और व्यय की लेखा परीक्षा करता है, इसके साथ ही संबध नियमों द्वारा आवश्यक होने पर सरकारी कंपनियों,  अन्य निगमों एवं निकायों का भी लेखा परीक्षण करता है।
  5. वह किसी कर अथवा शुल्क की शुद्ध आगमों का निर्धारण एवं प्रमाणन करता है और इन मामलों में उसका प्रमाणपत्र अंतिम होता है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) संसद की ‘लोक लेखा समिति’ (Public Accounts Committee PAC) के मार्गदर्शक, मित्र और दार्शनिक के रूप में कार्य करते हैं।

प्रतिवेदन (रिपोर्ट):

  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, केंद्र और राज्य के खातों से संबंधित अपनी लेखा प्रतिवेदन राष्ट्रपति और राज्यपाल को सौंपते है, जिसे वे क्रमशः संसद और राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं।
  • CAG राष्ट्रपति को तीन लेखा प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है: विनियोग लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट, वित्त लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट तथा सार्वजनिक उपक्रमों पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा हेतु संवैधानिक प्रावधानों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत के संचित निधि तथा आकस्मिक निधि में अंतर।
  2. लोक लेखा समिति के बारे में
  3. CAG द्वारा राष्ट्रपति को सौंपी गई रिपोर्ट
  4. CAG की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
  5. CAG की नियुक्ति तथा पदत्याग

मेंस लिंक:

CAG संसद के प्रति वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में कार्यकारणी की जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समझाइये। CAG की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्द्ध-न्यायिक निकाय।

सीबीआई की स्वायत्तता


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा है, कि ‘केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो’ (Central Bureau of Investigation- CBI) एक “स्वायत्त निकाय” (Autonomous Body) है, और सरकार का जांच एजेंसी पर कोई ‘नियंत्रण’ नहीं है।

संबंधित प्रकरण:

केंद्र सरकार ने यह प्रतिक्रिया, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दायर एक मुकदमे पर आपत्ति जताते हुए व्यक्त की है। इस मामले में पश्चिम बंगाल ने ‘सीबीआई’ की बजाय ‘भारत संघ’ को पक्षकार बनाया है।

पश्चिम बंगाल ने इस मामले में, राज्य में कई मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने और जांच करने के सीबीआई के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी है। विदित हो कि, पश्चिम बंगाल द्वारा वर्ष 2018 में सीबीआई को दी गई अपनी “सामान्य सहमति” वापस ले ली थी।

केंद्र सरकार द्वारा की गई टिप्पणियां:

  • सीबीआई, ‘दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम’ (DSPE) के अंतर्गत कार्य करती है, और इसी कानून के तहत सीबीआई को मामले दर्ज करने का अधिकार प्राप्त है। भारत संघ का इससे कोई लेना-देना नहीं है।
  • ‘केंद्रीय सतर्कता आयोग’ (CVC) को ‘सीबीआई’ के अधीक्षण का कार्य सौंपा गया है, और ‘सीवीसी अधिनियम’ (CVC Act) में यह स्पष्ट किया गया है, कि एजेंसी द्वारा की जाने वाली जांच में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।

सीबीआई की स्वायत्तता से संबंधित चुनौतियाँ:

  • एजेंसी, अपने कार्मिकों की भर्ती के लिए ‘गृह मंत्रालय’ पर निर्भर है, और इसके कई जांचकर्ता ‘भारतीय पुलिस सेवा’ से नियुक्त किए जाते हैं।
  • एजेंसी, वकीलों के लिए कानून मंत्रालय पर निर्भर है और इसमें कुछ हद तक कार्यात्मक स्वायत्तता (functional autonomy) का भी अभाव है।
  • प्रतिनियुक्ति पर तैनात किए गए आईपीएस अधिकारियों द्वारा संचालित सीबीआई, सरकार द्वारा इसके वरिष्ठ अधिकारियों का कुशलतापूर्वक अपने हिसाब से इस्तेमाल किए जाने के प्रति भी संवेदनशील होती है, क्योंकि ये अधिकारी भविष्य में अपनी पोस्टिंग के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर होते हैं।
  • सीबीआई, किसी राज्य में मामलों की जांच हेतु अपने अधिकारों का प्रयोग करने के लिए राज्य सरकार की सहमति पर निर्भर होती है, भले ही जांच केंद्र सरकार के किसी कर्मचारी के खिलाफ की जा रही हो।
  • चूंकि, संविधान के तहत ‘पुलिस’ एक राज्य के अधीन एक विषय है, और सीबीआई ‘आपराधिक प्रक्रिया संहिता’ (CrPC) द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्य करती है, जोकि इसे एक पुलिस एजेंसी का दर्जा देती है। राज्य में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने से पहले, सीबीआई को राज्य सरकार की सहमति लेना आवश्यक होता है। यह एक बोझिल प्रक्रिया है, और इससे कभीकभार कुछ हास्यास्पद स्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।

सीबीआई की स्वायत्तता पर सुप्रीम कोर्ट:

वर्ष 1997 में ‘विनीत नारायण बनाम भारत संघ’ के ऐतिहासिक फैसले में सीबीआई की स्वायत्तता को सुरक्षित करने के लिए कई कदम उठाए गए।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीबीआई को ‘पिंजरे में बंद तोता’ क्यों कहा गया?

  1. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) का राजनीतिकरण वर्षों से प्रगति पर है।
  2. भ्रष्टाचार और राजनीतिक रूप से पक्षपाती: सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी आलोचना में इस बात पर प्रकाश डाला गया था, कि एक ‘पिंजरे में बंद तोता’ (Caged Parrot) अपने मालिक की आवाज में बोलता है।
  3. सीबीआई पर, सत्ताधारी राजनीतिक दल की ‘नौकरानी’ (Handmaiden) बने जाने का आरोप लगाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप एजेंसी ‘हाई प्रोफाइल मामलों’ को गंभीरता से नहीं लेती है।
  4. चूंकि सीबीआई प्रतिनियुक्ति पर तैनात किए गए केंद्रीय पुलिस अधिकारियों द्वारा संचालित होती है, अतः भविष्य में बेहतर पोस्टिंग की उम्मीद में, इन अधिकारियों के सरकार से प्रभावित होने की संभावना रहती है।

किन संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है?

  1. सीबीआई के लिए, समकालीन जांच एजेंसी के लिए तैयार किए गए एक औपचारिक, आधुनिक कानूनी ढांचे के तहत कार्य करना सुनिश्चित किया जाए।
  2. दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग (2007) द्वारा, सीबीआई के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए एक नया कानून बनाए जाने का सुझाव दिया गया था।
  3. संसदीय स्थायी समिति (2007) द्वारा सीबीआई की विश्वसनीयता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु, समय के साथ आवश्यकता के अनुरूप एक अलग अधिनियम लागू किए जाने की सिफारिश की गयी थी।
  4. संसदीय स्थायी समितियों (2007 और 2008) की 19वीं और 24वीं रिपोर्ट में, कानूनी अधिदेश, बुनियादी ढांचे और संसाधनों के मामले में सीबीआई को मजबूत करना, समय की मांग बताया गया था।
  5. सरकार को ‘सीबीआई’ के लिए ‘वित्तीय स्वायत्तता’ भी सुनिश्चित करनी चाहिए।
  6. सीबीआई और अन्य संघीय जांच एजेंसियों को ‘नियंत्रक-महालेखापरीक्षक’ की भांति स्वायत्तता दिए जाने पर भी विचार किया जा सकता है। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, केवल संसद के प्रति जवाबदेह होता है।
  7. सीबीआई की स्वायत्तता सुनिश्चित करने हेतु और साथ ही पर्यवेक्षण की गुणवत्ता में सुधार करते हुए एक नया सीबीआई अधिनियम प्रख्यापित किया जाना चाहिए। नए अधिनियम में सरकारी हस्तक्षेप किए जाने पर ‘आपराधिक अभियोज्यता’ का प्रावधान होना चाहिए।
  8. उच्चतम न्यायालय के समक्ष, और अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम पद्धितियों के अनुरूप, एक मांग यह है कि सीबीआई अधिकारियों का विशेष समर्पित कैडर गठित किया जाए, ताकि अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति और अचानक स्थानांतरण के संदर्भ में परेशान नहीं किया जा सके।
  9. बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए, संघीय आपराधिक और खुफिया एजेंसियों पर एक अधिक कुशल संसदीय निरीक्षण, एक संभावित तरीका हो सकता है, हालांकि इसका राजनीतिक दुरुपयोग किए जाने के प्रति चिंताएं भी हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

अनुच्छेद 131 के तहत कोई भी ‘वाद’- विशेष रूप से राज्यों के बीच या केंद्र और राज्य के बीच विवादों के संबंध में- सर्वोच्च न्यायालय में दायर किए जाते हैं। क्या आप ‘सर्वोच्च न्यायालय’ के मूल अधिकार क्षेत्र के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सीबीआई और इसकी स्थापना
  2. दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के प्रमुख प्रावधान
  3. आम सहमति क्या होती है?
  4. राज्यों द्वारा आम सहमति वापस लेने के प्रभाव

मेंस लिंक:

क्या आम सहमति वापस लेने तात्पर्य यह हो सकता है कि सीबीआई अब किसी मामले की जांच नहीं कर सकती? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर


संदर्भ:

असम के ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (National Register of Citizens – NRC) के अंतिम मसौदे में केवल  करीबन एक हजार संदिग्ध मामलों को आवश्यक कार्रवाई के लिए संबंधित जिला आयुक्तों के पास भेजा गया है।

पृष्ठभूमि:

31 अगस्त, 2019 को प्रकाशित अंतिम मसौदा में, असम राज्य में, 3.29 करोड़ आवेदकों में से 19 लाख से अधिक को ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (NRC) सूची से बाहर रखा गया था। इस सूची को तैयार करने में ₹1,220 करोड़ की राशि व्यय हुई थी।

  • सरकार ने ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ को उसके मौजूदा स्वरूप में खारिज कर दिया था और बांग्लादेश की सीमा से लगे क्षेत्रों में कम से कम 30% और राज्य के बाकी हिस्सों में 10% नामों के पुन: सत्यापन करने को कहा था।
  • सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में, असम राज्य में, वर्ष 1951 के ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ को अद्यतन करने की प्रक्रिया पूरी की गई थी। इसके तहत, कुल 3.30 करोड़ आवेदकों में से 19.06 लाख आवेदक ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ की अद्यतन सूची से बाहर हो गए थे।

‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ क्या है?

  • राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) मुख्यतः अवैध भारतीय नागरिकों का आधिकारिक रिकॉर्ड है। इसमें ‘नागरिकता अधिनियम, 1955 के अनुसार, भारतीय नागरिक के रूप में पात्र व्यक्तियों के बारे में जनांकिक विवरण शामिल किया जाता है।
  • सबसे पहले इस रजिस्टर को वर्ष 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। इसके बाद, कुछ समय पूर्व तक कभी भी अद्यतन / अपडेट नहीं किया गया था।

असम में NRC:

अब तक, केवल असम राज्य के लिए इस तरह के डेटाबेस को तैयार किया गया है।

असम में NRC प्रक्रिया, केंद्र सरकार तथा ‘अखिल असम छात्र संघ’ (AASU) और ‘अखिल असम गण संग्राम परिषद’ (AAGSP) के बीच वर्ष 1985 हस्ताक्षरित ‘असम समझौते’ (Assam Accord of 1985) के बाद शुरू की गयी थी। इस समझौते में, विदेशी नागरिकों का पता लगाने, उन्हें मताधिकार से वंचित करने और निर्वासित करने की शर्त रखी गयी थी।

असम में ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ को अद्यतन किए जाने का कारण:

वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने, नागरिकता अधिनियम, 1955 और नागरिकता नियम, 2003 के अनुसार, असम के सभी भागों में ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ को अद्यतन करने का आदेश दिया था। यह प्रक्रिया आधिकारिक तौर पर वर्ष 2015 में शुरू हुई।

मौजूदा मुद्दे:

  • वर्ष 2018 में प्रकाशित असम के ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (National Register of Citizens- NRC)  की मसौदा सूची में लाखों लोग छूट गए थे।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नियमों के अनुसार, ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (NRC) मसौदा सूची से बाहर राज जाने व्यक्तियों के लिए, खुद को ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ में शामिल करने हेतु किए जाने वाले ‘दावों’ और किसी अन्य व्यक्ति के सूची में शामिल होने पर की जाने वाली ‘आपत्ति’ की सुनवाई प्रक्रिया के दौरान, अपनी बायोमेट्रिक्स पहचान दर्ज कराना अनिवार्य था।
  • 2018 में प्रकाशित सूची से बाहर रह गए 27 लाख लोगों ने अपना बायोमेट्रिक विवरण जमा किया और इनमें से केवल 8 लाख लोगों को वर्ष 2019 में प्रकाशित अद्यतन मसौदा सूची में शामिल किया गया। किंतु, ये 8 लाख लोग अपना ‘आधार’ कार्ड बनवाने के लिए के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और इनको ‘आधार कार्ड’ से जुडी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
  • कोई स्पष्ट रास्ता नहीं मिल पाने और ‘आधार’ आधरित लाभों के नहीं मिलने की वजह से इन व्यक्तियों पर अत्यधिक मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है।
  • यह स्थिति मुख्य रूप से ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ प्रक्रिया पर स्पष्टता की कमी के कारण उत्पन्न हुई है। चूंकि, अभी तक क्योंकि पूर्ण और अंतिम ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ सूची प्रकाशित नहीं हुई है, और इस वजह से सरकार ने अद्यतन सूची में शामिल किए गए इन व्यक्तियों को ‘आधार संख्या’ प्रदान करने पर रोक लगा रखी है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (National Population Register- NPR) क्या है? क्या यह ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ (NRC)  से संबंधित है? जानकारी के लिए पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जनगणना और NPR के बीच संबंध।
  2. NPR बनाम NRC
  3. NRC, असम समझौते से किस प्रकार संबंधित है।
  4. नागरिकता प्रदान करने और रद्द करने के लिए संवैधानिक प्रावधान।
  5. जनगणना किसके द्वारा की जाती है?

मेंस लिंक:

एक राष्ट्रव्यापी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC)  प्रक्रिया क्यों नहीं संभव हो सकती है, चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

विश्व बैंक की STARS परियोजना


संदर्भ:

हाल ही में, विश्व बैंक से सहायता प्राप्त STARS परियोजना के प्रदर्शन की समीक्षा की गई।

‘स्‍टार्स’ (STARS) परियोजना के बारे में:

STARS का पूरा नाम (Strengthening Teaching-Learning and Results for States Program- STARS) है।

स्‍टार्स परियोजना, स्‍कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय (Ministry of Education- MOE) के तहत एक केन्‍द्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना के रूप में लागू की जाएगी।

  • यह छह भारतीय राज्यों में स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता और शासन में सुधार करने हेतु विश्व बैंक समर्थित एक परियोजना है।
  • परियोजना में सम्मिलित छह राज्य- हिमाचल प्रदेश, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और राजस्थान हैं।
  • इस परियोजना से 1.5 मिलियन स्कूलों में 10 मिलियन शिक्षक और 250 मिलियन स्कूली छात्र (6 से 17 वर्ष की आयु के बीच) लाभान्वित होंगे।

परियोजना के अंतर्गत शामिल किए जाने वाले सुधार बिंदु:

  1. स्कूल सुधार की दिशा में स्थानीय स्तर पर विशिष्ट रूप से निर्मित उपायों के माध्यम से राज्य, जिला और उप जिला स्तरों पर शिक्षा सेवाओं के प्रतिपादन पर ध्यान केंद्रित करना।
  2. अध्ययन गुणवत्ता का आकलन करने हेतु बेहतर डेटा संग्रह करना; बृहत्तर जवाबदेही तथा समावेशन हेतु हितधारकों, विशेष रूप से माता-पिता की मांगों का समाधान करना; और कमजोर वर्ग के छात्रों पर विशेष ध्यान देना।
  3. इन परिवर्तनों के प्रबंधन हेतु शिक्षकों को तैयार करना।
  4. भारत की मानव-पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु प्राथमिक कक्षाओं (कक्षा 1 से 3 तक) के छात्रों की शिक्षा पर निवेश करना, तथा इनका संज्ञानात्मक, सामाजिक-व्यवहार और भाषा कौशल विकास सुनिश्चित करना।

परियोजना के विशिष्ट घटक

आकस्मिकता आपातकालीन प्रतिक्रिया घटक (CERC):

स्टार्स परियोजना में राष्‍ट्रीय घटक के तहत आकस्मिकता, आपातकालीन प्रतिक्रिया घटक (Contingency Emergency Response Component CERC) शामिल हैं जो इसे किसी प्राकृतिक, मानव निर्मित और स्‍वास्‍थ्‍य आपदाओं के लिए अधिक जवाबदेह बनाएंगे।

  • ये स्‍कूल बंदी/ बुनियादी ढांचा हानि, अपर्याप्‍त सुविधाएं और रिमोर्ट लर्निंग में सहायता प्रदान करने के लिए प्रौद्योगिकी के उपयोग जैसी शिक्षण हानि को बढ़ावा देने वाली स्थितियों से निपटने में सरकार की मदद करेंगे।
  • CERC घटक वित्त पोषण के त्‍वरित पुन: वर्गीकरण और सहज वित्तीय अनुरोध प्रकियाओं को सुव्यवस्थित करने में सहयोग करेगा।

परख (PARAKH):

परियोजना का एक प्रमुख घटक एक राष्‍ट्रीय आकलन केन्‍द्र ‘परख’ (Performance Assessment, Review, and Analysis of Knowledge for Holistic Development- PARAKH) की स्थापना करना है।

  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में शामिल, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के तहत ‘परख’ एक स्वायत्त संस्थान के रूप में कार्य करेगा तथा यह देश में सभी स्कूल बोर्डों के लिए छात्र आकलन तथा मूल्यांकन मानक निर्धारित करेगा। वर्तमान में अधिकांश स्कूल बोर्ड, राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित मानदंडों का पालन करते हैं।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार, यह राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर अध्ययन-परिणामों की निगरानी हेतु मानकीकृत परीक्षण के लिए दिशा-निर्देश देगा।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. STARS परियोजना के तहत शामिल राज्य
  2. विश्व बैंक और इसके वित्त पोषण के बारे में
  3. विश्व बैंक की संस्थाएँ
  4. विश्व बैंक समूह
  5. ओपन डेटा पहल क्या है?
  6. परख (PARAKH) क्या है?

मेंस लिंक:

विश्व बैंक की STARS परियोजना पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

विशिष्ट भू-खंड पहचान संख्या (ULPIN) योजना


संदर्भ:

हाल ही में, राष्ट्रीय राजधानी के ‘इंडिया हैबिटेट सेंटर’ में ‘भूमि संवाद’- डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (Digital India Land Record Modernisation Programme) पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की गई थी।

  • विशिष्ट भूखंड पहचान संख्या (Unique Land Parcel Identification Numbers – ULPIN) के महत्व के बारे में बात करते हुए ‘ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज मंत्री’ ने इसे एक प्रकार से भूखंड के आधार नंबर की तरह बताया।
  • इस अनूठी प्रणाली में भूखंड के लिए भू-निर्देशांक के आधार पर एक विशिष्ट पहचान संख्या तैयार की जाती है और उक्त भूखंड की पहचान के लिए इसे अंकित किया जाता है।

current affairs

 

योजना के बारे में:

  • इस योजना के तहत, देश में प्रत्येक भूखंड को एक 14-अंकीय पहचान संख्या जारी की जाएगी।
  • इसे ‘जमीन की आधार संख्या’ भी कहा जा रहा है। यह संख्या, जमीन के सर्वेक्षण किये जा चुके प्रत्येक खंड की विशिष्ट रूप से पहचान करेगी तथा विशेष रूप से ग्रामीण भारत में, जहाँ आमतौर पर भूमि-अभिलेख काफी पुराने तथा विवादित होते हैं, भूमि-संबंधी धोखाधड़ी पर रोके लगाएगी।
  • इसके तहत भू-खंड की पहचान, उसके देशांतर और अक्षांशो के आधार पर की जाएगी और विस्तृत सर्वेक्षण और भू-संदर्भित भूसंपत्‍ति-मानचित्र पर निर्भर होगी।

लाभ:

ULPIN के बहुपक्षीय लाभ हैं। जानकारी का यह एकल स्रोत, भू-स्वामित्व प्रमाणित कर सकता है और इससे भू-स्वामित्व संबंधी संदिग्ध दावे समाप्त होंगे। यह आसानी से सरकारी भूमि की पहचान करने में सहायक होगा तथा न्यायहीन भूमि-लेनदेन से बचाएगा।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ULPIN के बारे में।
  2. प्रमुख विशेषताएं।
  3. DILRMP के बारे में।

मेंस लिंक:

‘डिजिटल भारत भू-अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम’ (DILRMP) पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


अड्डू प्रवालद्वीप

अड्डू प्रवालद्वीप / एडु एटोल (Addu Atoll) मालदीव में स्थित है।

हिंद महासागर में अपनी रणनीतिक स्थिति के अलावा, अड्डू, मालदीव द्वीपसमूह का दूसरा सबसे बड़ा शहर है, और इसकी आबादी 30,000 से अधिक है।

चर्चा का कारण:

राष्ट्रपति इब्राहिम मोहम्मद सोलिह ने कहा है, कि मालदीव द्वारा अपने दक्षिणी अड्डू प्रवालद्वीप में भारतीय वाणिज्य दूतावास खोलने पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।

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