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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 15 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनI

1. रानी कमलापति

2. बिरसा मुंडा

 

सामान्य अध्ययनII

1. नोरोवायरस

2. H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथी के लिए नौकरी हेतु स्वतः अनुज्ञप्ति

 

सामान्य अध्ययनIII

1. वर्ष 1900 का पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम, और इसमें संशोधन

2. भू-प्रजातियाँ (Landraces)

3. नासा का DART मिशन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. कामो’ओलेवा

2. देवासहायम

 


सामान्य अध्ययनI


 

विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।

रानी कमलापति


संदर्भ:

हाल ही में, भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर ‘रानी कमलापति’ स्टेशन कर दिया गया है।

लगभग 100 करोड़ रुपये की लागत से निजी भागीदारी के साथ इस स्टेशन का पुनर्विकास किया गया है। ‘सार्वजनिक-निजी भागीदारी’ मॉडल के तहत पिछले कुछ वर्षों के दौरान कराए गए कार्यों में, यह भारत में ‘स्टेशन पुनर्विकास’ क्षेत्र में इस तरह का पहला बड़ा कार्य है ।

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‘रानी कमलापति’ कौन थी?

  • ‘रानी कमलापति’ (Rani Kamlapati), 18वीं शताब्दी में ‘गोंड वंश’ के शासक ‘निज़ाम शाह’ की विधवा पत्नी थीं। भोपाल से 55 किमी दूर तत्कालीन गिन्नौरगढ़ रियासत पर इनका शासन था।
  • अपने पति की हत्या के बाद, ‘रानी कमलापति’ अपने शासनकाल के दौरान हमलावरों का बहादुरी से सामना करने के लिए जानी जाती हैं।
  • कमलापति “भोपाल की अंतिम हिंदू रानी” थीं। इन्होने अपने शासनकाल में जल प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए तथा कई पार्कों और मंदिरों की स्थापना की।

‘गोंड’ कौन हैं?

गोंड (Gonds) भारत के सबसे बड़े आदिवासी समुदायों में से एक हैं। इस जनजातीय समुदाय के लोग मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार और ओडिशा में पाए जाते हैं।

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इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि, भले ही रेलवे केंद्र सरकार से संबंधित है, लेकिन स्टेशनों के नाम बदलना पूरी तरह से ‘राज्य के अधीन’ विषय है? इससे संबंधित प्रक्रिया की जानकारी हेतु पढ़िए

प्रीलिम्स लिंक:

  1. रानी कमलापति कौन थीं?
  2. गोंड जनजाति।
  3. भारत की विभिन्न जनजातियाँ।

मेंस लिंक:

रानी कमलापति पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: स्वतंत्रता संग्राम- इसके विभिन्न चरण और देश के विभिन्न भागों से इसमें अपना योगदान देने वाले महत्त्वपूर्ण व्यक्ति/उनका योगदान।

बिरसा मुंडा


संदर्भ:

15 नवंबर को आदिवासी नेता बिरसा मुंडा (Birsa Munda) की जयंती के रूप में मनाया जाता है।

राष्ट्रीय आंदोलन में उनके महत्वपूर्ण योगदान को स्वीकार करते हुए वर्ष 2000 में उनके जन्मदिवस पर झारखंड राज्य का गठन किया गया था।

बिरसा मुंडा के बारे में:

बिसरा मुंडा एक लोक नायक और मुंडा जनजाति का एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी थे।

  • उन्होंने 19 वीं शताब्दी में ब्रिटिश उपनिवेश के अधीन बिहार और झारखंड क्षेत्र में धार्मिक, सामाजिक, तथा राजनीतिक आंदोलन (Millenarian Movement) का नेतृत्व किया।
  • इन्हें धरती आबा‘ (Dharti Abba) या ‘जगत पिता’ के रूप में भी जाना जाता है।

बिरसाइत (Birsait)

उलगुलान के नेतृत्वकर्ता जननायक बिरसा मुंडा को झारखंड सहित छत्तीसगढ़ के लोग भगवान की तरह पूजते हैं। बिसरा मुंडा, आदिवासी समाज में सुधार करना चाहते थे और इसलिए उन्होंने लोगों से जादू टोने में विश्वास न करने और इसके बजाय प्रार्थना करने पर जोर दिया तथा शराब से दूर रहने, ईश्वर में विश्वास रखने और सही आचरण का पालन करने का आग्रह किया। इसी आधार पर उन्होंने बिरसा- धर्म की शुरुआत की और इस धर्म के अनुयायियों को बिरसाइत कहा जाता है।

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उपलब्धियां:

बिसरा मुंडा ने उलगुलान (Ulgulan)  आंदोलन का आरंभ किया, इसे ‘महान विद्रोह’ (The Great Tumult) भी कहा जाता है।

आदिवासियों के शोषण और भेदभाव के खिलाफ उनका संघर्ष ब्रिटिश सरकार पर बहुत भारी पड़ा, और इसके परिणामस्वरूप वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (Chotanagpur Tenancy Act) पारित किया गया, जिसके द्वारा आदिवासी लोगों से गैर-आदिवासियों के लिए भूमि के हस्तांतरण को प्रतिबंधित कर दिया गया।

मुंडा विद्रोह:

  • यह सबसे महत्वपूर्ण जनजातीय आंदोलनों में से एक है।
  • इस विद्रोह का नेतृत्व 1899-1900 में, रांची के दक्षिण में ‘बिरसा मुंडा’ ने किया था।

इस आंदोलन में मुंडा समुदाय के लोगों की दुर्दशा के लिए निम्नलिखित कारणों को चिह्नित किया गया था:

  1. अंग्रेजों की भूमि नीतियां, उनकी पारंपरिक भूमि व्यवस्था को नष्ट कर रही थीं।
  2. हिंदू जमींदार और साहूकार उनकी जमीनों पर कब्जा कर रहे थे।
  3. मिशनारियों द्वारा उनकी पारंपरिक संस्कृति की आलोचना की जा रही थी।

मुंडा विद्रोह का महत्व:

  • इस विद्रोह ने औपनिवेशिक सरकार को एक कानून (छोटानागपुर किरायेदारी अधिनियम, 1908) बनाने और लागू करने पर विवश कर दिया, ताकि दिकू लोग (Dikus) आदिवासियों की भूमि आसानी से नहीं हथिया सकें।
  • इस विद्रोह से पता चलता है, कि आदिवासी लोगों में अन्याय का विरोध करने और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ अपना गुस्सा व्यक्त करने की क्षमता थी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप विश्व के ‘अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस’ (International Day of the World’s Indigenous People) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. बिरसा मुंडा का जन्म कहाँ हुआ था?
  2. उलगुलान क्या है?
  3. छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 का अवलोकन

मेंस लिंक:

बिरसा मुंडा और भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके महत्वपूर्ण योगदान पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: पीआईबी

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

नोरोवायरस


संदर्भ:

हाल ही में, केरल के वायनाड जिले में कम से कम 13 लोग ‘नोरोवायरस’ (Norovirus) से संक्रमित पाए गए हैं। राज्य सरकार द्वारा लोगों से सतर्क रहने को कहा गया है, और वायरस के प्रसार को रोकने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

‘नोरोवायरस’ के बारे मे:

‘नोरोवायरस’ (Norovirus), डायरिया फ़ैलाने वाले ‘रोटावायरस’ (Rotavirus) के समान एक संक्रामक बग है।

  • यह जठरांत्र संबंधी / गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल (Gastrointestinal) बीमारी फ़ैलाने वाले विषाणुओं का एक समूह है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रोग (पेट और आंतों की सूजन) के प्रकोप से संबंधित सबसे आम रोगज़नक़ (Pathogen) है।
  • नोरोवायरस के कारण, पेट और आंतों की परत में सूजन, उल्टी और दस्त का आना आदि जैसी, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल से संबंधित समस्याएं पैदा होती हैं।

लक्षण:

नोरोवायरस के संक्रमण से पीड़ित होने वाले व्यक्ति में उल्टी और दस्त जैसे लक्षण दिखाई देते हैं, जोकि  वायरस के संपर्क में आने के एक या दो दिन बाद दिखाई देते हैं। मरीजों को मिचली भी आती है और पेट दर्द, बुखार, सिरदर्द और शरीर में दर्द होता है। गंभीर मामलों में, तरल पदार्थों के अधिक मात्रा में निकल जाने से शरीर में पानी की कमी भी हो सकती है।

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प्रसार:

  • इस रोग का प्रकोप आमतौर पर क्रूज जहाजों, नर्सिंग होम, सामूहिक शयनकक्षों / डॉर्मिटरी और अन्य बंद स्थानों में फैलता है।
  • नोरोवायरस अत्यधिक संक्रामक होता है, और दूषित भोजन, पानी और संक्रमित सतहों को छूने से फ़ैल सकता है। यह वायरस मुख्य रूप से संक्रमित व्यक्ति के मल और उल्टी से फैलता है। इस वायरस के भिन्न-भिन्न कई उपभेद होते है, अतः एक व्यक्ति कई बार संक्रमित हो सकता है।
  • नोरोवायरस, कई कीटाणुनाशकों के प्रति ‘प्रतिरोधी’ अर्थात कई कीटाणुनाशकों इसके लिए प्रभावहीन होते है, और यह 60 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सहने में सक्षम है। इसलिए, केवल भोजन को भाप देने या पानी को क्लोरीनेट करने से यह वायरस नहीं मरता है। यह वायरस कई आम ‘हैंड सैनिटाइज़र’ से भी बच निकलता है।

उपचार:

यह बीमारी स्वतः सीमित होती है, अर्थात इस संक्रमण की वजह से रोगी को बहुत कष्ट होता है और उसके शरीर से बहुत कुछ निकल जाता है, किंतु आम तौर पर इसका असर केवल दो या तीन दिनों तक ही रहता है। बहुत छोटे, बहुत बूढ़े या कुपोषित व्यक्तियों को छोड़कर अधिकांश व्यक्ति, आराम लेने और शरीर में पानी की पर्याप्त मात्रा बनाए रखने पर आसानी से ठीक हो जाते हैं।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. नोरोवायरस के बारे में
  2. रोग
  3. प्रसार
  4. लक्षण
  5. कारण
  6. उपचार

मेंस लिंक:

नोरोवायरस पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथी के लिए नौकरी हेतु स्वतः अनुज्ञप्ति


संदर्भ:

संयुक्त राज्य अमेरिका, ‘H-1B वीजा धारकों के जीवनसाथी के लिए नौकरी हेतु स्वतः अनुज्ञप्ति परमिट’ (Automatic Work Authorisation Permits to the spouses of H-1B visa holders) देने को सहमत हो गया है। इस कदम से, अमेरिका में बसे हजारों भारतीय पेशेवरों को फायदा होने की संभावना है।

नवीनतम संशोधनों के अनुसार, एल-1 (L-1) वीज़ा धारक पति या पत्नी को, जीवनसाथी की नौकरी के लिए अलग से आवेदन नहीं करना पड़ेगा, जबकि ‘एच -4’ (H-4) वीजा धारकों को उनके रोजगार परमिट की समय सीमा समाप्त होने के बाद, कार्य-परमिट में विस्तार के लिए आवेदन करना होगा।

इस निर्णय का महत्व:

इस नीतिगत संशोधन से, एच-1बी या एल-1 वीजा धारकों के जीवनसाथियों, विशेषकर भारतीय महिलाओं विशेष रूप से लाभ होने की संभावना है, क्योंकि इसके बाद उनके लिए कार्य-अनुज्ञप्ति (work authorization) पर 180 दिनों तक के विस्तार की स्वतः अनुमति मिल जाएगी।

आवश्यकता:

‘अमेरिकन इमिग्रेशन लॉयर्स एसोसिएशन’ ने अप्रवासी पत्नियों की ओर से एक ‘क्लास-एक्शन मुकदमा’ (class-action lawsuit) दायर किया था। इनमे से कई महिलाओं को ‘कार्य-अनुज्ञप्ति’ हासिल करने में लगने वाली देरी की वजह से, अपनी नौकरी छोडनी पड़ी थी।

H-4 और L2 वीजा: अंतर

H-1B वीजा धारकों के परिवार के सगे सदस्यों (पति या पत्नी और 21 वर्ष से कम उम्र के बच्चों) को H-4 वीजा जारी किया जाता है। एच4 वीजा धारकों में 94 फीसदी से ज्यादा महिलाएं होती हैं और इनमें से करीब 93 फीसदी भारत से हैं।

L-1 वीजा गैर-आप्रवासी वीजा होता है, जो अपेक्षाकृत कम समय के लिए वैध होते हैं। इस वीजा के तहत, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, विदेशी कर्मचारियों को विशेष पदों के लिए अपने अमेरिकी कार्यालयों में अस्थायी आधार पर स्थानांतरित कर सकती हैं। एल-1 वीजा धारक के आश्रित पति या पत्नी या 21 वर्ष से कम उम्र के अविवाहित बच्चों को संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश करने के लिए एल-2 वीजा जारी किया जाता है। L2 वीजा धारक रोजगार खोजने के लिए ‘रोजगार अनुज्ञप्ति दस्तावेज’ (Employment Authorisation Documents – EAD) प्राप्त कर सकते हैं।

H-1B वर्क वीजा’ क्या होता हैं?

  • वर्ष 1952 में, जब अमेरिका ने विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित विषयों में अपनी मौजूदगी का विस्तार करना शुरू किया, तो देश को इन क्षेत्रों में उचित लागत पर नवाचार हासिल करने में मदद करने हेतु, गुणवत्तापूर्ण कर्मचारियों को काम पर रखने की आवश्यकता महसूस हुई। श्रमिकों को काम पर रखने की आवश्यकता ने, अमेरिका में एच-1 कार्य वीजा प्रणाली की शुरूआत का मार्ग प्रशस्त किया।
  • इस कार्य वीजा प्रणाली को आगे H-1B, H-2B, L1, O1 और E1 वीजा में उप-विभाजित किया गया था, जो आवश्यक योग्यता और श्रमिकों की मांग वाले क्षेत्र पर निर्भर करता है।
  • इनमें से एच-1बी वीजा अपेक्षाकृत बेहतर वैतनिक अवसरों के कारण सबसे लोकप्रिय बना हुआ है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. H1B, F1 और M1 वीज़ा के मध्य अंतर
  2. NRI और OCI कार्डधारक के बीच अंतर
  3. OCI और PIO का विलय कब किया गया था?
  4. नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 के तहत किसे नागरिकता प्रदान की जाती है?
  5. भारत में नागरिकता से संबंधित संवैधानिक प्रावधान

मेंस लिंक:

अमेरिकी वीजा नियमों में हाल के बदलावों से अमेरिका में भारतीय छात्रों पर प्रभाव के संबंध में चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: भारत में खाद्य प्रसंस्करण एवं संबंधित उद्योग- कार्यक्षेत्र एवं महत्त्व, स्थान, ऊपरी और नीचे की अपेक्षाएँ, आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन।

वर्ष 1900 का पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम, और इसमें संशोधन


संदर्भ:

पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम (Punjab Land Preservation Act PLPA), वर्ष 1900 में पंजाब की तत्कालीन सरकार द्वारा अधिनियमित किया गया था। राज्य सरकार द्वारा ‘पंजाब भूमि संरक्षण (हरियाणा संशोधन) विधेयक’, 2019 (Punjab Land Preservation (Haryana Amendment) Bill, 2019) के माध्यम से इस अधिनियम में कई बदलावों का प्रस्ताव रखा गया है।

संबंधित विवाद:

मूल कानून अर्थात ‘पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम’ 1900 में, उपमृदा जल के संरक्षण और/या ‘अपरदन’ या ‘कटाव’ से ग्रस्त या कटाव की संभावना वाले क्षेत्रों में, कटाव की रोकथाम के लिए प्रावधान किए गए हैं।

  • मूल अधिनियम की धारा 3 के अनुसार, सरकार के लिए, ‘कटाव’ के ग्रस्त या कटाव के लिए उत्तरदायी होने की संभावना’ वाले किसी भी क्षेत्र को, एक अधिसूचना के माध्यम से ‘पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम’ (PLPA) के के दायरे लाने की शक्ति प्राप्त है।
  • अब, कुछ क्षेत्रों को अधिनियम के दायरे से बाहर करने हेतु इस नए विधेयक में, एक नई धारा- धारा 3A शामिल की गई है।

संबंधित चिंताएं:

  • विधेयक के प्रावधानों के तहत, हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994, गुरुग्राम महानगर विकास प्राधिकरण अधिनियम, 2017 जैसे कई कानूनों के प्रावधानों के तहत प्रकाशित, विकास योजनाओं, किसी भी अन्य शहर सुधार योजनाओं या परियोजनाओं में शामिल भूमि’ पर PLPA लागू नहीं होगा।
  • पर्यावरणविदों के अनुसार, सरकार ने अपने इस नवीनतम कदम से, अरावली की पहाड़ियों और तलहटी में विस्तारित हजारों एकड़ भूमि, जो गुड़गांव और फरीदाबाद जिलों में 26,000 एकड़ से अधिक क्षेत्र में फ़ैली है, को खनन और रियल एस्टेट के विकास हेतु खुला छोड़ दिया है।

संरक्षण की आवश्यकता:

मई 2019 में जल शक्ति मंत्रालय के अधीन ‘केंद्रीय भूजल बोर्ड’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र के कुल 138 ब्लॉक में से 105 ब्लॉक ‘डार्क जोन’ में हैं। जलभराव रिक्तीकरण की वर्तमान दरों से, पहले, जलभृतों में 100 मीटर की गहराई तक अच्छी गुणवत्ता वाला पानी 10 वर्षों में समाप्त हो जाएगा, और इसके बाद, पूरे उपसतही जल संसाधन, अगले 22 वर्षों में समाप्त हो सकते हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

पिछले साल पंजाब कैबिनेट ने शामलात जमीन (Shamlat Land) को लेकर एक कानून को मंजूरी दी थी। ‘शामलात भूमि’ क्या है?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम’ के बारे में
  2. प्रमुख प्रावधान
  3. प्रस्तावित संशोधन
  4. अरावली के बारे में

मेंस लिंक:

‘पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम’ में प्रस्तावित संशोधनों से जुड़ी चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

भू-प्रजातियाँ (Landraces)


संदर्भ:

हाल ही में महाराष्ट्र के अहमदनगर के अकोले तालुका की निवासी राहीबाई पोपेरे (Rahibai Popere) को ‘पद्म श्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

  • राहीबाई पोपेरे को ‘सीडमदर’ (Seedmother) के नाम से जाना जाता है।
  • उन्हें, गाँव स्तर पर सैकड़ों भू-प्रजातियों / ‘Landraces’ (आमतौर पर उगाई जाने वाली फसलों की जंगली किस्मों) को बचाने में मदद करने हेतु किए गए कार्यों के लिए ‘पद्म श्री’ पुरुस्कार प्रदान किया गया है।

भू-प्रजातियाँ (Landraces) क्या हैं?

भू-प्रजातियाँ (Landraces) आमतौर पर खेती की जाने वाली फसलों के ‘प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले प्रकारों’ को संदर्भित करती हैं।

ये, चयनात्मक प्रजनन (संकर) या जेनेटिक इंजीनियरिंग के माध्यम से दूसरी फसल प्रजातियों पर, एक निश्चित विशेषता दिखाने के लिये विकसित की जाने वाली व्यावसायिक रूप से उगाई जाने वाली फसलों के विपरीत होती हैं।

भू-प्रजातियों पर चयन और प्रजनन का प्रभाव:

जैव विविधता, फसलों को चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने हेतु लक्षण विकसित करने के लिए एक प्राकृतिक तंत्र प्रदान करती है। हालांकि, फसल चयन में बड़े पैमाने पर मानवीय हस्तक्षेप को देखते हुए, अधिकांश व्यावसायिक फसलों में यह क्षमता अब खो गई है।

कई दशकों में ‘चयन और प्रजनन’ (Selection and Breeding) के माध्यम से किए जाने वाले फसल सुधार की वजह से अधिकांश फसलों का आनुवंशिक आधार संकुचित हो गया है।

भू-प्रजातियों की आवश्यकता और महत्व:

जलवायु परिवर्तन के खतरे के बीच, वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं के सामने ऐसी किस्मों को विकसित करना एक चुनौती है जो अजैविक और जैविक दोनों प्रकार के खतरों का सामना कर सकें।

  • प्राकृतिक रूप उगने वाली भू-प्रजातियों में अभी भी अप्रयुक्त आनुवांशिक गुणों का एक बड़ा पूल या समूह मौजूद है, जो इन समस्याओं का समाधान प्रदान कर सकता है।
  • आनुवंशिक विविधता, प्रकृति की उत्तरजीविता क्रियाविधि है। जीन पूल जितना व्यापक होगा, प्रजातियों में चरम जलवायु घटनाओं से बचने में मदद करने में सक्षम ‘लक्षण’ विकसित करने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।

आगे की राह:

भू-प्रजातियों के जर्मप्लाज़्म (Germplasms) के बारे में अभी बहुत कुछ समझा जाना बाकी है। इस संबंध में अनुसंधान कार्य अपने प्रारंभिक चरण में है। यह समझना आवश्यक है कि ये भू-प्रजातियां जलवायु-अनुकूलित कृषि (Climate-Resilient Agriculture) में किस प्रकार अपना योगदान दे सकती हैं, पोषण संबंधी रूपरेखा भी कमियों से लड़ने में कारगर साबित हो सकती है, क्योंकि कई भू-प्रजातियां, व्यावसायिक रूप से विकसित किस्मों की तुलना में पोषक तत्वों से अधिक भरपूर होती हैं।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

नासा का DART मिशन


संदर्भ:

24 नवंबर को, लगभग 11.50 बजे (IST), नासा द्वारा अपना पहला ग्रह रक्षा परीक्षण मिशन ‘डबल एस्ट्रॉयड रिडायरेक्शन टेस्ट’ (DART) लॉन्च किया जाएगा।

DART अंतरिक्ष यान को कैलिफोर्निया के वैंडेनबर्ग स्पेस फोर्स बेस से ‘स्पेसएक्स’ फाल्कन 9 रॉकेट द्वारा लॉन्च किया जाएगा।

DART मिशन के बारे में:

‘डबल एस्ट्रॉयड रिडायरेक्शन टेस्ट’ (DART) मिशन का मुख्य उद्देश्य नई तकनीक का परीक्षण करना है, जो एक अंतरिक्ष यान को किसी क्षुद्रग्रह से टकराकर उसकी दिशा को बदलने के लिए विकसित की गयी है।

  • ‘DART’ एक कम लागत वाला अंतरिक्षयान है, जिसका वजन प्रक्षेपण के समय लगभग 610 किलोग्राम और टकराव के दौरान 550 किलोग्राम होगा।
  • इसमें लगभग 10 किलोग्राम ‘ज़ेनॉन’ (Xenon) भी होगा, जिसका उपयोग नए थ्रस्टर्स को प्रदर्शित करने के लिये किया जाएगा, जिसे ‘नासा इवोल्यूशनरी ज़ेनॉन थ्रस्टर-कमर्शियल (NEXT-C)) कहा जाता है।
  • इस अंतरिक्षयान में एक उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजर लगाया गया है जिसे ‘डिडिमोस रिकोनिसेंस एंड एस्ट्रॉयड कैमरा फॉर ऑप्टिकल नेविगेशन’ (DRACO) कहा जाता है।
  • ‘DRACO’ से प्राप्त छवियों को वास्तविक समय में पृथ्वी पर भेजी जाएगा और ये ‘डिमोर्फोस’ नामक लक्षित क्षुद्रग्रह के टकराव स्थल और सतह का अध्ययन करने में मदद करेंगी।
  • साथ ही ‘DART’ मिशन अपने साथ ‘लाइट इटालियन क्यूबसैट फॉर इमेजिंग ऑफ एस्ट्रॉयड’ (LICIACube) नामक एक छोटा उपग्रह या क्यूबसैट भी ले जाएगा। ‘LICIACube’ से टक्कर के परिणामस्वरूप उत्पन्न प्रभाव और इससे निर्मित क्रेटर की छवियों को कैप्चर करेगा। यह टकराव के दौरान बने किसी भी धूल के बादल की छवियों को भी कैप्चर कर सकता है।

किस क्षुद्रग्रह को विक्षेपित किया जाएगा?

‘DART’ अंतरिक्ष यान का लक्ष्य ‘डिमोर्फोस’ (Dimorphos) – ग्रीक भाषा में ‘दो रूपों वाला’ – नामक एक मूनलेट (moonlet) है। इसका व्यास लगभग 160 मीटर है और इसके पृथ्वी से 11 मिलियन किलोमीटर दूर अंतरिक्ष यान से टकराने की आशंका है।

डिमोर्फोस, ‘डिडिमोस’ (“जुड़वां” के लिए ग्रीक) नामक एक बड़े क्षुद्रग्रह की परिक्रमा करता है जिसका व्यास 780 मीटर है।

current affairs

 

कार्य-योजना:

‘DART’ अंतरिक्ष यान, डिमोर्फोस’ मूनलेट तक यात्रा करेगा और लगभग 6.6 किलोमीटर प्रति सेकंड या 24,000 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से उससे टकराएगा। यह टकराव 26 सितंबर से 1 अक्टूबर 2022 के बीच होने की संभवना है।

current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह (Potentially Hazardous Asteroids – PHAs) क्या हैं? संदर्भ: इसे पढ़ें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘नीयर अर्थ ऑब्जेक्ट’ (NEO) क्या हैं?
  2. क्षुद्रग्रहों का वर्गीकरण
  3. मंगल और बृहस्पति के बीच क्षुद्रग्रह पेटी में सबसे अधिक क्षुद्रग्रह क्यों पाए जाते हैं?
  4. संभावित खतरनाक क्षुद्रग्रह क्या हैं? उनका वर्गीकरण कैसे किया जाता है?
  5. नासा के DART मिशन का अवलोकन।

मेंस लिंक:

उल्कापिंड और क्षुद्रग्रह के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


कामोओलेवा

वर्ष 2006 में, हवाई द्वीप में स्थित PanSTARRS टेलीस्कोप से एक ‘अर्ध-उपग्रह’ (Quasi-Satellite) देखा गया था। ‘अर्ध-उपग्रह’, पृथ्वी के निकट अवस्थित वे पिंड होते हैं, जो परिक्रमा सूर्य की करते हैं और फिर भी पृथ्वी के करीब रहते है।

वैज्ञानिकों ने इसे कामो’ओलेवा (Kamo’oalewa) नाम दिया है। यह ‘शब्द’ हवाई द्वीप में प्रचलित धार्मिक गीतों का एक हिस्सा है, जो अपने आप यात्रा करने वाली एक संतान के लिए संकेत करता है।

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देवासहायम

देवासहायम पिल्लई (Devasahayam Pillai) का जन्म एक हिंदू परिवार में, तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले में हुआ था। 18वीं शताब्दी में इन्होने ईसाई धर्म अपना लिया था।

  • इनके लिए 15 मई, 2022 को वेटिकन द्वारा ‘संत’ घोषित किया जाएगा। ‘संत’ की उपाधि पाने वाले वह पहले भारतीय आम व्यक्ति होंगे।
  • उन्होंने 1745 में अपना नाम बदलकर ‘लेज़ारूस’ (Lazarus) रख लिया।
  • ईसाई धर्म अपनाने का फैसला करने के बाद, उन्हें पहली बार फरवरी 2020 में “बढ़ती कठिनाइयों को सहन करने” के लिए ‘संत’ की उपाधि के लिए मंजूरी दी गई थी।
  • कहा जाता है, कि देवासहायम को ईसाई धर्म अपनाने का फैसला करने के बाद कठोर उत्पीड़न और कारावास झेलना पड़ा, और अंततः 1752 में उनकी हत्या कर दी गई।

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