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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 6 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनII

1. खासी उत्तराधिकार संपत्ति विधेयक, 2021

2. चीन- ताइवान संबंध

3. हमास और गाजा पट्टी

 

 

सामान्य अध्ययनIII

1. खाद्य तेल की कीमतें

2. तकनीकी वस्त्र

3. इनपुट टैक्स क्रेडिट

4. ईरान और संवर्धित यूरेनियम

5. पराली दहन और स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. वन्नियार समुदाय

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

खासी उत्तराधिकार संपत्ति विधेयक, 2021


संदर्भ:

हाल ही में, मेघालय राज्य की एक ‘जिला स्वायत्त परिषद’ द्वारा ‘खासी उत्तराधिकार संपत्ति विधेयक’, 2021 (Khasi Inheritance of Property Bill, 2021) पेश करने की घोषणा की गयी।

इस विधेयक का उद्देश्य, खासी समुदाय में भाई-बहनों के बीच पैतृक संपत्ति का “समान वितरण” करना है।

निहितार्थ:

यदि यह प्रस्तावित विधेयक लागू कर दिया जाता है, तो इससे खासी जनजाति में सदियों से चली आ रही मातृवंशीय विरासत की प्रथा में संशोधन होगा।

विधेयक के उद्देश्य एवं लक्ष्य:

  1. माता-पिता की संपत्ति का भाई-बहनों के बीच समान वितरण।
  2. माता-पिता को यह निर्णय करने का अधिकार होगा, कि वे अपनी संपत्ति विरासत में किसको देना चाहते हैं।
  3. भाई-बहन में से किसी के भी द्वारा, गैर खासी-व्यक्ति से विवाह करने और जीवनसाथी के रीति-रिवाजों और संस्कृति को स्वीकार करने पर पैतृक संपत्ति में हिस्सा दिए जाने पर रोक लगाना।

विधेयक की आवश्यकता:

कई बार वयस्क पुरुषों को ऋण लेने में दिक्कत का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनके पास जमानत के रूप में दिखाने के लिए कोई संपत्ति नहीं होती है। जब कभी किसी दंपत्ति के कोई संतान नहीं होती है, और उसका कोई वास्तविक उत्तराधिकारी भी नहीं होता है, तो प्रथा के अनुसार उनकी संपत्ति पर उनके ‘कबीले’ का अधिकार हो जाता है। इस सबकी वजह से बच्चों द्वारा अपने माता-पिता के खिलाफ मुकदमेबाजी के मामले देखे हैं।

मेघालय में मातृवंशीय व्यवस्था और महिलाओं के सशक्तिकरण में विरोधाभास:

  • संरक्षकत्व / कस्टोडियनशिप (Custodianship) को प्रायः गलत तरीके से समझा जाता है, कि संपत्ति का स्वामित्व केवल एक व्यक्ति, अर्थात परिवार की सबसे छोटी बेटी में निहित होता है। जबकि, संरक्षकता के अधिकार के साथ, वृद्ध माता-पिता, अविवाहित या निराश्रित भाई-बहनों और कबीले के अन्य सदस्यों की देखभाल करने की जिम्मेदारी भी जुडी होती है।
  • इसके अलावा, संरक्षक / कस्टोडियन को अपने मामा की अनुमति के बगैर जमीन खरीद या बेचने का अधिकार नहीं होता है।
  • साथ ही, संरक्षक के अधिकार में आने वाली अधिकांश संपत्ति, कबीले की संपत्ति या सामुदायिक संपत्ति होती है।

मेघालय में मातृवंशीय प्रथा:

मेघालय की तीन जनजातियों – खासी, जयंतिया और गारो – विरासत के संबंध में ‘मातृवंशीय प्रथा’ (Matrilineal System of Inheritance) का प्रचलन है। इस प्रथा में, कुल और वंश की जानकारी, माता के वंश से पता चलती है।

  • इस प्रथा में, बच्चों को माँ का उपनाम प्राप्त होता है, विवाह के पश्चात् पति को पत्नी के घर रहना होता है, और परिवार की सबसे छोटी बेटी (खतदुह – Khatduh) को पुश्तैनी या कबीले की संपत्ति का पूरा हिस्सा विरासत में दिया जाता है।
  • प्रथा के अनुसार, ‘खतदुह’ अपनी मां के भाई अर्थात मामा की अनुमति के बगैर अपनी संपत्ति नहीं बेच सकती और, चूंकि तकनीकी रूप से वह अपनी मां के कबीले से जुडी होती है, जिसके माध्यम से उसके वंश का पता चलता है।
  • यह विरासत परंपरा, केवल वर्षों से परिवार के अधिकार में चली आ रही पैतृक या कबीले/सामुदायिक संपत्ति पर लागू होती है।
  • इस पारंपरिक व्यवस्था में, यदि किसी दंपति के कोई बेटी नहीं होती है, तो उसकी संपत्ति ‘पत्नी’ की बड़ी बहन और उसकी बेटियों के पास चली जाती है, और यदि पत्नी की भी कोई बहन नहीं होती है, तो आमतौर पर कबीला, संपत्ति पर कब्जा कर लेता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि पारंपरिक खासी गांव के शासी निकाय ‘दोरबार शोंग’ (Dorbar Shnong) द्वारा महिलाओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगायी जाती है?

 

प्रीलिम्स लिंक्स:

  1. खासी जनजाति
  2. उत्तर पूर्वी राज्यों में मातृवंशीय प्रथा
  3. मेघालय में उत्तराधिकार संपत्ति विधेयक
  4. मेघालय में जनजातियाँ

 

मेंस लिंक:

मेघालय के उत्तराधिकार विधेयक से संबंधित चिंताओं पर चर्चा कीजिए।

 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

 

 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

चीन-ताइवान संबंध (China- Taiwan relations)


संदर्भ:

यूरोपीय संसद द्वारा ताइवान के लिए गठित पहले आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल ने ‘ताइवान’ का समर्थन करते हुए कहा है कि राजनयिक रूप से अलग-थलग किया गया यह द्वीपीय देश अकेला नहीं है। ताइपे पर बीजिंग के बढ़ते दबाव के मद्देनजर ‘यूरोपीय संसद के प्रतिनिधिमंडल’ ने यूरोपीय संघ-ताइवान संबंधों को मजबूत करने हेतु सुस्पष्ट एवं साहसिक कार्रवाइयों की मांग की है।

आवश्यकता:

  • वर्तमान में, ताइवान के ‘वेटिकन सिटी’ को छोड़कर किसी भी यूरोपीय राष्ट्र के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। अब ताइवान, यूरोपीय संघ के सदस्यों के साथ संबंधों को प्रगाढ़ करने का इच्छुक है।
  • इसके अलावा, चीन द्वारा ताइवान पर सैन्य दबाव लगातार बढ़ाया जा रहा है, जिसके तहत चीन, इस लोकतांत्रिक ताइवान के समीप चीनी युद्धक विमानों के अभियान चला रहा है। बीजिंग, ताइवान अपना दावा करता है और इस पर बलपूर्वक कब्ज़ा करने से इसे कोई गुरेज नहीं है।

चीन- ताइवान संबंध: पृष्ठभूमि

चीन, अपनी ‘वन चाइना’ (One China) नीति के जरिए ताइवान पर अपना दावा करता है। सन् 1949 में चीन में दो दशक तक चले गृहयुद्ध के अंत में जब ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ के संस्थापक माओत्से तुंग ने पूरे चीन पर अपना अधिकार जमा लिया तो विरोधी राष्ट्रवादी पार्टी के नेता और समर्थक ताइवान द्वीप पर भाग गए। इसके बाद से ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ ने ताइवान को बीजिंग के अधीन लाने, जरूरत पड़ने पर बल-प्रयोग करने का भी प्रण लिया हुआ है।

  • चीन, ताइवान का शीर्ष व्यापार भागीदार है। वर्ष 2018 के दौरान दोनों देशों के मध्य 226 बिलियन डॉलर के कुल व्यापार हुआ था।
  • हालांकि, ताइवान एक स्वशासित देश है और वास्तविक रूप से स्वतंत्र है, लेकिन इसने कभी भी औपचारिक रूप से चीन से स्वतंत्रता की घोषणा नहीं की है।
  • एक देश, दो प्रणाली” (one country, two systems) सूत्र के तहत, ताइवान, अपने मामलों को खुद संचालित करता है; हांगकांग में इसी प्रकार की समान व्यवस्था का उपयोग किया जाता है।

वर्तमान में, चीन, ताइवान पर अपना दावा करता है, और इसे एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देने वाले देशों के साथ राजनयिक संबंध नहीं रखने की बात करता है।

भारत-ताइवान संबंध:

  • यद्यपि भारत-ताइवान के मध्य औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं,  फिर भी ताइवान और भारत विभिन्न क्षेत्रों में परस्पर सहयोग कर रहे हैं।
  • भारत ने वर्ष 2010 से चीन की ‘वन चाइना’ नीति का समर्थन करने से इनकार कर दिया है।

 

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि चीन की आपत्तियों के कारण ताइवान आज तक WHO का सदस्य नहीं बन सका है? इस विषय के बारे में और जानने हेतु पढ़ें

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ताइवान की अवस्थिति और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।
  1. वन चाइना नीति के तहत चीन द्वारा प्रशासित क्षेत्र।
  2. क्या ताइवान का WHO और संयुक्त राष्ट्र में प्रतिनिधित्व किया गया है?
  3. दक्षिण चीन सागर में स्थित देश।
  4. कुइंग राजवंश (Qing dynasty)।

मेंस लिंक:

भारत- ताइवान द्विपक्षीय संबंधों पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

हमास और गाजा पट्टी


संदर्भ:

मिस्र (Egypt) द्वारा गाजा पट्टी में ‘इजरायल’ और फिलिस्तीनी के विद्रोही समूह ‘हमास’ के मध्य संघर्ष-विराम हेतु एक समझौता कराने का प्रयास किया जा रहा है।

समझौते में शामिल विषय:

दीर्घकालिक संघर्ष विराम, कैदियों की अदला-बदली, गाजा के लिए मानवीय सहायता और पुनर्निर्माण।

‘हमास’ के बारे में:

हमास (Hamas) एक फिलिस्तीनी इस्लामिक राजनीतिक संगठन और आतंकवादी समूह है। इस संगठन की स्थापना वर्ष 1987 में हुई थी और तब से यह आत्मघाती बम विस्फोट और रॉकेट हमलों के माध्यम से इजरायल के विरुद्ध युद्ध छेड़े हुए है।

यह इजराइल की जगह एक फिलीस्तीनी राज्य की स्थापना करना चाहता है। हमास, फिलिस्तीनी प्रशासन से पृथक, स्वतंत्र रूप से गाजा पट्टी को नियंत्रित करता है।

समझौते की आवश्यकता:

गाजा पट्टी क्षेत्र पर वर्ष 2007 से इजरायल द्वारा कड़ी नाकाबंदी की जा रही है, जिसके चलते इस क्षेत्र में अधिकांश बुनियादी सामान अभी भी अत्यधिक प्रतिबंधित नियमों का सामना करने के बाद पहुँच पाता है।

मई में, इजरायल द्वारा किए गए एक हमले में लगभग 260 फिलिस्तीनी मारे गए और हजारों घायल हो गए और साथ ही गाजा में विनाश का एक बड़ा निशान शेष रह गया। फिलिस्तीनी विद्रोही समूहों द्वारा इस हमले के जबाव में इजरायली क्षेत्रों में रॉकेट दागे गए जिसमें लगभग 13 इजरायली मारे गए।

‘गाजा पट्टी’ की अवस्थिति:

गाजा पट्टी (Gaza Strip) पूर्णतयः कृत्रिम रूप से निर्मित एक ‘रचना’ / ‘सृजन’ है, जिसे इज़राइल के बनने के दौरान, 1948 में फिलिस्तीन की लगभग तीन-चौथाई विस्थापित, कुछ मामलों में निष्कासित, अरब आबादी को बसाने के लिए निर्मित किया गया था।

  • इस दौरान, अधिकांश शरणार्थी, पड़ोसी देशों, जैसकि जॉर्डन, सीरिया और लेबनान में बिखरे गए।
  • कुछ शरणार्थी आबादी ‘वेस्ट बैंक’ में बस गई, जिस पर 1948 के बाद जॉर्डन ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया।
  • विस्थापित आबादी की बड़ी संख्या ‘गाजा पट्टी’ में जाकर बस गई, जोकि मिस्र और वर्तमान इजराइल के मध्य स्थित एक संकरी सी तटीय पट्टी है।
  • वर्तमान में, गाजा पट्टी की कुल आबादी में से लगभग 70% आबादी शरणार्थी हैं।

‘गाजा पट्टी’ पर नियंत्रण:

‘हमास’ (Hamas) ने वर्ष 2007 में गाजा पट्टी पर बलपूर्वक कब्जा कर लिया था। इसके तुरंत बाद, इज़राइल ने गाजा की सीमाओं को पूरी तरह से बंद कर दिया और गाजा को एक दुश्मन इकाई घोषित कर दिया। गाजा को एक देश का दर्जा प्राप्त नहीं है।

‘हमास’ को इसके द्वारा आम नागरिकों पर किए गए हमलों के इतिहास को देखते हुए, इज़राइल तथा संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अधिकांश अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा एक आतंकवादी संगठन के रूप में देखा जाता है।

 

वर्तमान परिदृश्य:

  • इज़राइल का अभी भी वेस्ट बैंक पर कब्जा है, हालांकि इसने गाजा पर अपना अधिकार छोड़ दिया है किंतु, संयुक्त राष्ट्र अभी भी भूमि के इस भाग को अधिकृत क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
  • इज़राइल, पूरे यरुशलम को अपनी राजधानी होने का दावा करता है, जबकि फिलिस्तीनी, पूर्वी यरुशलम को भविष्य के फिलिस्तीनी राष्ट्र की राजधानी होने का दावा करते हैं।
  • अमेरिका, पूरे यरुशलम शहर पर इज़राइल के दावे को मान्यता देने वाले गिने-चुने देशों में से एक है।

वर्तमान घटनाक्रम:

  • पूर्वी यरुशलम, गाजा और वेस्ट बैंक में रहने वाले इज़राइल और फिलिस्तीनियों के बीच अक्सर तनाव में वृद्धि होती रहती है।
  • गाजा पर ‘हमास’ नामक एक फिलीस्तीनी उग्रवादी समूह का शासन है, जो कई बार इज़राइल से संघर्ष कर चुका है। ‘हमास’ को प्राप्त होने वाले हथियारों की आपूर्ति पर रोक लगाने हेतु इज़राइल और मिस्र ने गाजा की सीमाओं पर कड़ा नियंत्रण लगाया हुआ है।
  • गाजा और वेस्ट बैंक में फिलीस्तीनियों का कहना है, कि वे इज़राइल की कार्रवाइयों और प्रतिबंधों के कारण पीड़ित हैं। इज़राइल का कहना है कि वह केवल फिलिस्तीनी हिंसा से खुद को बचाने के लिए कार्रवाइयां कर रहा है।
  • अप्रैल 2021 के मध्य में रमजान के पवित्र मुस्लिम महीने की शुरुआत के बाद से पुलिस और फिलिस्तीनियों के बीच हुई झड़पों के साथ तनाव में वृद्धि हो गई है।
  • पूर्वी यरुशलम में कुछ फिलीस्तीनी परिवारों को बेदखल किए जाने की धमकी से भी आग और भड़की है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. वेस्ट बैंक कहाँ है?
  2. गाजा पट्टी
  3. गोलन हाइट्स
  4. ‘हमास’ कौन हैं?
  5. ‘अल-नकबा’ क्या है?
  6. इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष के बारे में

 

मेंस लिंक:

लंबे समय से जारी इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को समाप्त करने के उपाय सुझाएं।

स्रोत: द हिंदू।

 

 


सामान्य अध्ययनIII


विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

खाद्य तेल की कीमतें (Edible Oil Prices)


संदर्भ:

दिवाली का त्यौहार आने तक, देश भर में अधिकांश प्रमुख खाना पकाने के तेलों की कीमतों में गिरावट हुई है और ये स्थिर हो गई हैं।

कीमतों में गिरावट के कारण:

  1. वैश्विक कीमतों का स्थिरीकरण
  2. प्रशुल्कों में कटौती
  3. प्रमुख निजी कंपनियों द्वारा थोक कीमतों में कटौती
  4. ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ के प्रावधानों का उपयोग करते हुए केंद्र द्वारा ‘भंडारण’ पर लगाई गई सीमाएं।

खाद्य तेल की कीमतों में हुई वृद्धि के कारण:

पिछले साल, छह खाद्य तेलों- मूंगफली, सरसों, वनस्पति, सोया, सूरजमुखी और ताड़ / पाम तेल की खुदरा कीमतों में 48 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई थी। इसके निम्नलखित कारण थे:

  • वैश्विक कीमतों में उछाल, और सोयाबीन का कम घरेलू उत्पादन। सोयाबीन, भारत की सबसे बड़ी तिलहन फसल है।
  • वैश्विक कमोडिटी की कीमतें बहुत जयादा थी। आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित करने और उद्योगों को बंद करने में कोविड-19 एक प्रमुख कारक रहा है।
  • चीन द्वारा खाद्य तेल की अत्यधिक खरीद।
  • कई प्रमुख तेल उत्पादकों द्वारा आक्रामक रूप से जैव ईंधन नीतियों का अनुसरण किया जा रहा है, और इसके लिए खाद्य तेल फसलों का उपयोग ‘जैव ईंधन’ उत्पादन हेतु किया जा रहा है।
  • भारत में खाद्य तेलों के खुदरा मूल्य में सरकारी करों और शुल्कों का भी एक बड़ा हिस्सा रहता है।

खाद्य तेल के आयात पर भारत की निर्भरता:

  • भारत, विश्व का सबसे बड़ा वनस्पति तेल आयातक देश है।
  • भारत अपनी खाद्य तेल जरूरतों का लगभग 60% आयात करता है, जिससे देश में खाद्य तेल की खुदरा कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं।
  • देश में, मुख्य रूप से इंडोनेशिया और मलेशिया से पाम तेल, ब्राजील और अर्जेंटीना से सोया तेल और रूस और यूक्रेन से सूरजमुखी तेल का आयात किया जाता है।

खाद्य तेलों के बारे में तथ्य:

  • खाद्य तेल के प्राथमिक स्रोत, सोयाबीन, सफ़ेद सरसों (रेपसीड) और सरसों, मूंगफली, सूरजमुखी, कुसुम और नाइजर होते हैं।
  • खाद्य तेल के द्वितीयक स्रोत, ‘ताड़ का तेल’, नारियल, चावल की भूसी, कपास के बीज और वृक्ष-उत्पादित तिलहन (Tree Borne Oilseeds) होते हैं।

भारत में तिलहन उत्पादन में प्रमुख चुनौतियाँ:

  • तिलहन का उत्पादन, मुख्य रूप से ‘वर्षा आधारित’ क्षेत्रों (लगभग 70% क्षेत्र) में किया जाता है,
  • बीजों की काफी अधिक कीमत (मूंगफली और सोयाबीन),
  • सीमित संसाधनों के साथ छोटी जोतें,
  • कम बीज प्रतिस्थापन दर और कम उत्पादकता।

हाल ही में, सरकार द्वारा घरेलू तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देने और देश को ‘खाना पकाने के तेल’ में आत्मनिर्भर बनाने हेतु ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन’-ताड़ तेल’ (National Mission on Edible Oil-Oil Palm – NMEO-OP) की घोषणा की गयी है।

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘खाद्य तेल’ के बारे में
  2. खाद्य तेल के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोत
  3. प्रमुख खाद्य तेल आयातक देश
  4. ‘राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन- ताड़ तेल’ (NMEO-OP) और इसके प्रावधानों के बारे में

मेंस लिंक:

भारत को खाद्य तेलों का आयात क्यों करना पड़ता है? सरकार के खजाने पर खाद्य तेलों के आयात का कितना बोझ है? खाद्य तेलों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए हम क्या कर सकते हैं? विस्तार से चर्चा कीजिए।

 

स्रोत: द हिंदू।

 

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव।

तकनीकी वस्त्र


संदर्भ:

केंद्र सरकार द्वारा आगामी तीन वर्षों में तकनीकी वस्त्रों (Technical Textiles) के निर्यात में पांच गुना वृद्धि का लक्ष्य बनाया जा रहा है।

तकनीकी वस्त्र बाजार और इसमें भारत का हिस्सा:

तकनीकी वस्त्रों का वर्तमान वैश्विक बाजार 250 अरब डॉलर (18 लाख करोड़) का है और इसमें भारत की हिस्सेदारी 19 अरब डॉलर है।

  • भारत (8 प्रतिशत हिस्सेदारी) इस बाजार में 40 अरब डालर के साथ एक महत्वाकांक्षी भागीदार है।
  • इसमें सबसे बड़े भागीदार अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, चीन और जापान हैं।

इस संबंध में सरकार के प्रयास:

  • जनवरी 2019 में भारत में पहली बार तकनीकी वस्त्र के लिए 207 एचएसएन कोड (HSN Codes for technical textiles) जारी किए गए और दो साल से भी कम समय में भारत तकनीकी वस्त्र का शुद्ध निर्यातक बन गया है।
  • भारत सरकार द्वारा पिछले साल फरवरी माह में राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन का भी अनावरण किया गया।
  • कृषि/बागवानी, राजमार्ग, रेलवे, जल संसाधन, चिकित्सा अनुप्रयोगों को कवर करने वाले सरकारी संगठनों के उपयोग के लिए 92 वस्तुओं को अनिवार्य कर दिया गया है।

‘राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन’ के बारे में:

वर्ष 2020 में, आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) द्वारा एक 1,480 करोड़ रुपए के कुल परिव्यय से ‘राष्ट्रीय तकनीकी वस्त्र मिशन’ की स्थापना को मंजूरी दी गई थी।

उद्देश्य:

देश को तकनीकी वस्त्रों के क्षेत्र में अग्रणी बनाना तथा घरेलू बाजार में तकनीकी वस्त्रों के उपयोग में वृद्धि करना।

यह मिशन 2020-2021 से आरंभ होकर चार वर्षों की अवधि के लिए लागू किया जाएगा और इसमें चार घटक होंगे:

  1. पहले घटक में ‘अनुसंधान, नवाचार और विकास’ पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा और इस घटक में 1,000 करोड़ रुपए का परिव्यय होगा। इसमें फाइबर तथा भू-टेक्‍सटाइल, कृषि-टेक्‍सटाइल, चिकित्‍सा-टेक्‍सटाइल, मोबाइल-टेक्‍सटाइल और खेल-टेक्‍सटाइल के विकास पर आधारित अनुसंधान अनुप्रयोगों दोनों स्तर पर अनुसंधान किया जाएगा तथा जैव-निम्नीकरणीय तकनीकी वस्त्रों का विकास किया जाएगा।
  2. दूसरा घटक तकनीकी वस्त्रों के संवर्द्धन और विपणन विकास पर केन्द्रित होगा। इस घटक के तहत मिशन का लक्ष्य वर्ष 2024 तक घरेलू बाजार का आकार $ 40 बिलियन से बढाकर $ 50 बिलियन तक करने का निर्धारित किया गया है।
  3. तीसरा घटक निर्यात संवर्धन पर ध्यान केंद्रित करेगा, जिसके तहत देश में तकनीकी कपड़ा निर्यात को 14,000 करोड़ रुपए से बढाकर वर्ष 2021-2022 तक 20,000 करोड़ रुपए तक किया जाएगा और मिशन के समाप्त होने तक हर साल 10% औसत वृद्धि सुनिश्चित की जाएगी।
  4. अंतिम घटक में ‘शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

‘तकनीकी वस्त्र’ क्या होते हैं?

तकनीकी वस्त्रों को मुख्य रूप से, सौंदर्यपरक विशेषताओं की अपेक्षा तकनीकी कार्य निष्पादन और कार्यात्मक आवश्यकताओं लिए निर्मित वस्त्र सामग्री और उत्पादों के रूप में परिभाषित किया जाता है।

तकनीकी वस्त्र उत्पादों को उनके अनुप्रयोग क्षेत्रों के आधार पर 12 व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया गया है: एग्रोटेक, बिल्डटेक, क्लॉथटेक, जियोटेक, होमटेक, इंड्यूटेक, मोबिलटेक, मेडिटेक, प्रोटेक, स्पोर्ट्सटेक, ओइकोटेक, पैकटेक।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. तकनीकी वस्त्र क्या होते हैं?
  2. विशेषताएं
  3. प्रकार
  4. लाभ

 

मेंस लिंक:

तकनीकी वस्त्रों के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: पीआईबी

स्रोत: द हिंदू।

 

 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC)


संदर्भ:

केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (Central Board of Indirect Taxes and CustomsCBIC) द्वारा जीएसटी फील्ड ऑफिसर्स द्वारा टैक्स क्रेडिट अवरुद्ध करने संबंधी नए मानदंड जारी किए गए है। CBIC के अनुसार, इस तरह का टैक्स क्रेडिट अवरोधन, केवल ‘संदेह’ के आधार पर करने की बजाय ‘भौतिक साक्ष्यों’ के आधार पर होना चाहिए।

नए मानदंड:

  • नए मानदंडों के तहत किसी वरिष्ठ कर अधिकारी द्वारा इस तरह के क्रेडिट को अवरुद्ध करने हेतु पांच विशिष्ट परिस्थितियों को निर्धारित किया गया है। इनमे, विक्रेताओं द्वारा जीएसटी का भुगतान नहीं किए गए ‘चालानों’ (Invoices) को भी शामिल किया गया है।
  • ‘आयुक्त’ या उसके द्वारा अधिकृत किसी अधिकारी, जोकि सहायक आयुक्त के पद से नीचे का नहीं होगा, को मामले से संबंधित सभी तथ्यों पर विचार करते हुए ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट’ (आईटीसी) को अवरुद्ध करने हेतु ‘उचित विचार करने’ के बाद ही कोई निर्णय लिया जाएगा।

इनपुट टैक्स क्रेडिट’ (ITC) क्या होता है?

  • यह किसी कारोबार द्वारा माल की ‘खरीद’ पर भुगतान किया जाने वाला ‘कर’ होता है, और माल की बिक्री करने पर ‘कर-देयता’ (Tax Liability) को कम करने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है।
  • सरल शब्दों में, इनपुट क्रेडिट का मतलब आउटपुट पर टैक्स देते समय इनपुट पर चुकाए गए टैक्स को घटाकर शेष राशि का भुगतान करना है।

अपवाद: ‘कंपोजिशन स्कीम’ के तहत कोई व्यवसाय इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ नहीं उठा सकता है। ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट’ (Input Tax Credit – ITC) का उपयोग व्यक्तिगत उपयोग के लिए अथवा छूट वाले सामानों के लिए  नहीं किया जा सकता है।

इसके दुरुपयोग पर चिंता:

  1. केवल टैक्स क्रेडिट का दावा करने के लिए नकली चालान बनाकर बेईमान व्यवसायों द्वारा प्रावधान के दुरुपयोग की संभावना हो सकती है।
  2. कुल जीएसटी देयता का 80% तक ITC द्वारा निपटान किया जा रहा है और केवल 20% नकद के रूप में जमा किया जा रहा है।
  3. वर्तमान व्यवस्था के तहत, इनपुट आपूर्तिकर्ताओं द्वारा पहले ही भुगतान किए गए करों और ITC दावों के उसी समय मिलान करने का कोई प्रावधान नहीं उपलब्ध नहीं है।
  4. वर्तमान में ITC दावे और आपूर्तिकर्ताओं द्वारा भुगतान किए गए करों के साथ मिलान करने के समय में काफी अंतर रहता है। इसलिए फर्जी चालान के आधार पर आईटीसी का दावा किए जाने की संभावना अधिक रहती है।

current affairs

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा पिछले साल दिए गए एक फैसले के अनुसार, केंद्रीय माल और सेवा कर (Central Goods and Service Tax – CGST) अधिनियम की धारा 54 (3), जिसके तहत ‘व्युत्क्रमित शुल्क-संरचना’ (Inverted Duty Structure) की वजह से कर-संचय होने पर ‘इनपुट टैक्स क्रेडिट’ (ITC) की वापसी का प्रावधान है, संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं करती है? अधिनियम में कहा गया है, कि ‘व्युत्क्रमित शुल्क-संरचना’ के तहत कर-वापसी केवल चुकाए गए टैक्स पर की जाएगी न कि निवेशित सेवाओं पर।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. जीएसटी क्या है?
  2. कंपोजिशन स्कीम क्या है?
  3. इनपुट टैक्स क्रेडिट क्या है?

 

मेंस लिंक:

‘इनपुट टैक्स क्रेडिट’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

 

स्रोत: द हिंदू

 

 

 

विषय: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- विकास एवं अनुप्रयोग और रोज़मर्रा के जीवन पर इसका प्रभाव।

 

ईरान और संवर्धित यूरेनियम


संदर्भ:

ईरान का ‘20% संवर्धित यूरेनियम’ (20% enriched uranium) का भंडार 210 किलोग्राम से अधिक का हो चुका है। इसे पश्चिमी देशों के साथ होने वाली आगामी परमाणु वार्ता से पहले नवीनतम उपेक्षापूर्ण कदम माना जा रहा है।

साथ ही, अब तक ईरान की परमाणु एजेंसी द्वारा 25 किलोग्राम ‘60% संवर्धित यूरेनियम’ का भी उत्पादन किया जा चुका है। इस स्तर के ‘संवर्धित यूरेनियम’ को उत्पादन करने की भौतिक क्षमता केवल परमाणु हथियारों वाले देशों के पास होती है।

वर्तमान चिंता का कारण:

  • ईरान और विश्व शक्तियों के मध्य वर्ष 2015 में हस्ताक्षरित ऐतिहासिक परमाणु समझौते के तहत, ईरान के लिए यूरेनियम को 3.67% से अधिक संवर्धित करने पर प्रतिबंधित किया गया था।
  • अमेरिका ने 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तहत परमाणु समझौते से एकतरफा रूप से हाथ खींच लिया, लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन और रूस द्वारा इस समझौते को बरकरार रखने की कोशिश की जा रही है।
  • कृपया ध्यान दें: कि 90% से अधिक ‘संवर्धित यूरेनियम’ का उपयोग परमाणु हथियारों के लिए किया जा सकता है।

पृष्ठभूमि:

सितंबर में, ‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी’ (International Atomic Energy Agency – IAEA) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, ईरान के यूरेनियम भंडार में 20% तक विखंडनीय शुद्धता की मात्रा अनुमानतः 84.3 किलोग्राम (185 पाउंड) तक पहुँच चुकी है, जबकि तीन महीने पहले यह 62.8 किलोग्राम (138 पाउंड) थी।

संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (JCPOA):

‘ईरान परमाणु समझौते’ को ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’ (Joint Comprehensive Plan of Action – JCPOA) के रूप में भी जाना जाता है।

  • यह समझौता अर्थात ‘संयुक्त व्यापक कार्य योजना’, ईरान तथा P5 + 1+ EU (चीन, फ्रांस, रूस, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका तथा जर्मनी, और यूरोपीय संघ) के मध्य वर्ष 2013 से 2015 से तक चली लंबी वार्ताओं का परिणाम था।
  • समझौते के तहत, ईरान, अपने ऊपर लगाए गए प्रतिबंधों को हटाने और वैश्विक व्यापार तक पहुंच प्रदान किए जाने के बदले में अपनी परमाणु गतिविधियों को सीमित करने पर सहमत हुआ था।
  • इस समझौते के तहत, ईरान के लिए अनुसंधान कार्यों हेतु अल्प में यूरेनियम के भंडारण हेतु अनुमति दी गई किंतु रिएक्टर ईंधन और परमाणु हथियार बनाने में प्रयुक्त होने वाले, यूरेनियम के संवर्धन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
  • विश्व शक्तियों के साथ हुए इस समझौते के तहत, अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ईरान को उसके अनुसंधान रिएक्टर के लिए आवश्यक 20% संवर्धित यूरेनियम प्रदान किए जाने पर सहमति हुई थी।
  • परमाणु समझौते की शर्तों के तहत, ईरान को अपनी अनुसंधान रिएक्टर गतिविधियों को छोड़कर अन्य प्रयोजनों के लिए 3.67% से अधिक यूरेनियम को संवर्धित करने से प्रतिबंधित किया गया था।
  • अमेरिका ने 2018 में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के तहत परमाणु समझौते से एकतरफा रूप से हाथ खींच लिया, लेकिन ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन और रूस द्वारा इस समझौते को बरकरार रखने की कोशिश की जा रही है।

current affairs

 

‘यूरेनियम संवर्धन’ का लक्ष्य:

  • यूरेनियम में एक दुर्लभ रेडियोधर्मी समस्थानिक ‘U-235’ पाया जाता है, जिसे निम्न संवर्धित स्तर पर परमाणु रिएक्टरों के ईंधन के रूप में तथा अति उच्च संवर्धित स्तर पर परमाणु बमों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
  • यूरेनियम संवर्धन का लक्ष्य U-235 के प्रतिशत स्तर में वृद्धि करना होता है, जिसे अक्सर सेंट्रीफ्यूज (Centrifuges) के माध्यम से किया जाता है। अपकेन्द्रण यंत्र (Centrifuges), अपरिष्कृत यूरेनियम के एक रूप को उच्च गति पर घुमाने वाली मशीनें होती हैं।

चिंता का विषय:

60 प्रतिशत संवर्धन स्तर को विशेष रूप से खतरनाक बनाने वाली ‘संवर्धन की पेचीदा प्रकिया’ है, जिसके तहत जैसे-जैसे शुद्धता का स्तर बढ़ता जाता है, संवर्धन प्रक्रिया आसान होती जाती है, और इसके लिए आवश्यक अपकेन्द्रण यंत्रों की संख्या भी घटती जाती है।

  • दूसरे शब्दों में, 20 प्रतिशत शुद्धता स्तर से संवर्धन शुरू करने पर 90 प्रतिशत शुद्धता प्राप्त करना आसान होता है, तथा 60 प्रतिशत शुद्धता स्तर से शुरू करने पर और भी आसान हो जाता है।

centrifuge

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जल, थल और वायु तीनों जगहों से परमाणु हमला करने में सक्षम भारत की ‘परमाणु त्रयी’ (Nuclear Triad) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. JCPOA क्या है? हस्ताक्षरकर्ता
  2. ईरान और उसके पड़ोसी।
  3. IAEA क्या है? संयुक्त राष्ट्र के साथ संबंध
  4. IAEA के सदस्य
  5. IAEA के कार्यक्रम।
  6. बोर्ड ऑफ गवर्नर- रचना, मतदान और कार्य
  7. यूरेनियम संवर्धन क्या है?

 

मेंस लिंक:

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA)  पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

पराली दहन और स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव


संदर्भ:

हाल ही में, पंजाब के पटियाला जिले के छह गांवों में पराली जलाने और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर एक अध्ययन किया गया था।

अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष:

  • पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण की वजह से फेफड़ों का कार्य करना काफी कम हो गया और यह ग्रामीण महिलाओं के लिए विशेष रूप से हानिकारक था।
  • अध्ययन के दो चरणों के बीच PM 2.5 की सांद्रता, गैर जले कार्बन कणों की एक श्रेणी जिसे श्वसन संबंधी स्वास्थ्य के लिए सबसे हानिकारक माना जाता है, दोगुना से अधिक अर्थात 100 g/m3 से बढ़कर 250 g/m3 तक पहुँच गयी।
  • फसल अपशिष्ट जलाने की अवधि के दौरान, सभी आयु समूहों (10-60 वर्ष) में श्वसन संबधी लक्षणों में दो से तीन गुना वृद्धि देखी गई। इन लक्षणों में घरघराहट, मेहनत करने पर सांस फूलना, सुबह और रात के समय खांसी, त्वचा पर चकत्ते, नाक बहना या आंखों में खुजली आदि शामिल हैं।
  • फसल अपशिष्ट जलाने के दौरान बुजुर्ग आबादी (>40-60) और सबसे निचले आयु वर्ग (>10-18) में श्वसन संबंधी शिकायतों की सबसे अधिक संख्या दर्ज की गई।
  • खाना पकाने के ईंधन, वेंटिलेशन, सड़क से दूरी आदि जैसे कई अन्य जोखिम कारकों को नियंत्रित करने के बाद भी,PM 2.5 सांद्रता में वृद्धि हुई तथा साथ ही सभी आयु समूहों में फेफड़ों के कार्य में गिरावट देखी गयी।

पराली दहन’ (stubble Burning) क्या है?

किसानों द्वारा नवंबर में गेहूं की बुवाई के लिए खेत तैयार करने के दौरान ‘पराली दहन’ या पराली जलाना, एक आम बात है, क्योंकि धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच बहुत कम समय बचता है।

प्रभाव: पराली जलाने से हानिकारक गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के साथ-साथ पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन होता है।

किसानों द्वारा ‘पराली जलाने’ का विकल्प चुनने का कारण:

  1. किसानों के पास, पराली का प्रभावी ढंग से उपयोग करने के विकल्प नहीं होते हैं।
  2. किसान, इस कृषि-अपशिष्ट से निपटने में अक्षम होते हैं क्योंकि वे अपशिष्ट पदार्थो का निपटान करने के लिए उपलब्ध नई तकनीक को वहन नहीं कर सकते।
  3. बहुधा, फसल खराब होने जाने की वजह से किसान की आय पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है, ऐसी स्थिति में किसान लागत में कटौती करने और पराली प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों पर खर्च करने की बजाय, खेत में ही पराली जलाने का विकल्प चुनता है।

पराली जलाने के फायदे:

  • इससे खेत, जल्दी साफ हो जाता है और यह सबसे सस्ता विकल्प है।
  • खरपतवार नाशकों सहित खरपतवारों को नष्ट हो जाते हैं।
  • सुंडिया और अन्य कीट मर जाते हैं।
  • नाइट्रोजन बंध दुर्बल हो जाते हैं।

पराली जलाने के प्रभाव:

  • प्रदूषण: खुले में पराली जलाने से वातावरण में बड़ी मात्रा में जहरीले प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं जिनमें मीथेन (CH4), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (VOC) और कार्सिनोजेनिक पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन जैसी हानिकारक गैसें होती हैं। अंततः ये स्मॉग का कारण बन जाते हैं।
  • मृदा उर्वरता: पराली को खेत में जलाने से मिट्टी के पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे यह कम उपजाऊ हो जाती है।
  • ऊष्मा का प्रवेश: पराली जलाने से उत्पन्न गर्मी मिट्टी में प्रवेश करती है, जिससे जमीन में नमी और लाभकारी जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।

current affairs

 

पराली जलाने से बचने हेतु वैकल्पिक उपाय:

  1. धान की पुआल आधारित बिजली संयंत्रों को बढ़ावा देना। इससे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
  2. मृदा में फसल अवशेषों को शामिल करने से मिट्टी की नमी में सुधार हो सकता है, और बेहतर पौधों की वृद्धि के लिए मृदा के सूक्ष्मजीवों के विकास को सक्रिय करने में मदद मिल सकती है।
  3. कृषि-अवशिष्टों को कम्पोस्टिंग के माध्यम से समृद्ध जैविक खाद में परिवर्तित किया जा सकता है।
  4. वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से ‘यीस्ट प्रोटीन के निष्कर्षण’ जैसे औद्योगिक उपयोग के नए अवसरों की खोज की जा सकती है।

आवश्यकता: सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियां?

  1. पराली नहीं जलाने वालों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है और इस पद्धति को जारी रखने वालों पर दंड लगाया जा सकता है।
  2. मौजूदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) योजना की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए, जिसके तहत, कृषि-अवशिष्टों को जलाने वाले लोगों को संबंधित राज्य MSP के लाभ से पूर्ण या आंशिक रूप से वंचित कर सकें।

छत्तीसगढ़ मॉडल:

छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ‘गौठान’ स्थापित कर एक अभिनव प्रयोग किया गया है।

  • ‘गौठान’ (Gauthans), प्रत्येक गाँव में पांच एकड़ का एक सामूहिक भूखंड होता है, जहाँ गाँव के सभी लोग अपनी-अपनी अप्रयुक्त पराली को इकठ्ठा करते हैं और इस पराली को गाय के गोबर और कुछ प्राकृतिक एंजाइमों को मिलाकर जैविक उर्वरक में परिवर्तित किया जाता है।
  • इस योजना से ग्रामीण युवाओं के लिए ‘रोजगार’ भी उत्पन्न होता है।
  • सरकार द्वारा ‘पराली’ को खेत से नजदीकी गौठान तक पहुंचाने में सहायता प्रदान की जाती है।
  • छत्तीसगढ़ में अब तक 2,000 गौठानों को सफलतापूर्वक विकसित किया जा चुका है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप पराली के निपटान हेतु ‘पूसा’ (PUSA) नामक जैव-अपघटक घोल के बारे में जानते हैं?

क्या आप WHO द्वारा निर्धारित वायु गुणवत्ता मानकों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. EPCA के बारे में
  2. NGT के बारे में
  3. CPCB के बारे में
  4. राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग विधेयक, 2021 का अवलोकन
  5. पराली दहन के उपोत्पाद

 

मेंस लिंक:

‘पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम एवं नियंत्रण) प्राधिकरण’ (Environment Pollution (Prevention and Control) Authority) अर्थात EPCA को क्यों भंग किया गया? EPCA की जगह किस संस्था का गठन किया गया है? चर्चा कीजिए।

 

स्रोत: द हिंदू।


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

वन्नियार समुदाय

वन्नियार (Vanniyars) तमिलनाडु में सबसे बड़े और सबसे संगठित पिछड़े समुदायों में से एक है। इस समुदाय के द्वारा 1980 के दशक के मध्य में राज्य में 20% आरक्षण और केंद्रीय सेवाओं में 2% की मांग करते हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था।

चर्चा का कारण:

मद्रास उच्च न्यायालय ने ‘सर्वाधिक पिछड़ी जाति’ (Most Backward Caste – MBC) वन्नियार को तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रदान किए गए 10.5% विशेष आंतरिक आरक्षण को रद्द कर दिया है।

अदालत ने इस आरक्षण को संविधान के खिलाफ बताया है।


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