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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 3 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनIII

1. आरबीआई द्वारा बैंकों के लिए संशोधित त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई फ्रेमवर्क जारी

2. आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों पर आरबीआई समिति

3. वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड

4. प्रत्यास्थी द्वीप राज्यों हेतु आधारभूत संरचनाएं

5. अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद रोधी एजेंसी का गठन

2. रक्षा अधिग्रहण परिषद

 


सामान्य अध्ययनII


 

विषय: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।

आरबीआई द्वारा बैंकों के लिए संशोधित त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई फ्रेमवर्क जारी


संदर्भ:

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बैंकों के लिए खास संशोधित ‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ (Prompt Corrective Action – PCA) फ्रेमवर्क जारी किया है। इस फ्रेमवर्क के जरिए बैंक उचित समय पर पर्यवेक्षी हस्तक्षेप कर सकेंगे। साथ ही ‘PCA फ्रेमवर्क’ बाजार अनुशासन के लिए एक प्रभावी उपकरण के रूप में भी कार्य करेगा।

संशोधित फ्रेमवर्क के बारे में:

  1. संशोधित पीसीए फ्रेमवर्क 1 जनवरी, 2022 से प्रभावी होगा।
  2. संशोधित फ्रेमवर्क के तहत, पूंजी, परिसंपत्ति गुणवत्ता और प्रभावन क्षमता की मुख्य रूप से निगरानी की जाएगी।
  3. संशोधित ढांचे के मुताबिक, पूंजी, परिसंपत्ति गुणवत्ता और प्रभावन क्षमता को ट्रैक करने के लिए, CRAR या सामान्य इक्विटी टियर 1 अनुपात, शुद्ध NPA अनुपात और टियर 1 प्रभावन क्षमता अनुपात को संकेतक के रूप में प्रयुक्त किया जाएगा।

‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ (पीसीए) के बारे में:

‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ (Prompt Corrective Action – PCA) एक फ्रेमवर्क है, जिसके जरिये आरबीआई कमजोर वित्तीय संकेतकों वाले बैंकों पर की नजर रखता है।

  • ‘PCA फ्रेमवर्क’ को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा वर्ष 2002 में, खराब परिसंपत्ति गुणवत्ता के कारण पूंजी में कमी से ग्रसित होने वाले बैंकों या लाभप्रदता में कमी आने से कमजोर बैंकों के लिए एक संरचित प्रारंभिक-हस्तक्षेप तंत्र के रूप में शुरू किया गया था।
  • इसका उद्देश्य भारतीय बैंकिंग क्षेत्र में ‘गैर-निष्पादित आस्तियों’ (NPAs) की समस्या पर रोक लगाना है।
  • भारत में वित्तीय संस्थानों के लिए समाधान व्यवस्था पर ‘वित्तीय स्थिरता और विकास परिषद’ के कार्यकारी समूह तथा ‘वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग’ की सिफारिशों के आधार पर वर्ष 2017 में ‘PCA फ्रेमवर्क’ की समीक्षा की गई थी।

 

‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई फ्रेमवर्क’ कब लागू किया जाता है?

कुछ जोखिमों की सीमा-रेखा का उल्लंघन किए जाने पर ‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ (PCA) लागू किया जाता है। ‘PCA फ्रेमवर्क’ लागू करने के लिए परिसंपत्ति गुणवत्ता, लाभप्रदता, पूंजी और इसी तरह के कुछ स्तरों पर आधारित तीन जोखिम सीमा-रेखाएं निर्धारित की गयी है।

प्रतिबंधों के प्रकार:

‘PCA फ्रेमवर्क’ के तहत दो प्रकार के प्रतिबंध लागू किए जाते हैं, अधिदेशी (Mandatory) और विवेकाधीन (Discretionary)। लाभांश, शाखा विस्तार, निदेशकों के मुआवजे पर ‘अधिदेशी’ प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जबकि विवेकाधीन प्रतिबंधों के तहत ‘उधार और जमा पर प्रतिबंध’ को शामिल किया जाता है।

त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ लागू होने पर बैंक की स्थिति:

  • बैंकों को मंहगी जमाराशियों को नवीनीकृत करने या उनका इस्तेमाल करने या अपनी शुल्क-आधारित आय में वृद्धि करने हेतु कोई कदम उठाने की अनुमति नहीं होगी।
  • बैंकों को ‘गैर-निष्पादित आस्तियों’ (NPAs) के स्टॉक को कम करने और नए NPA के सृजन को रोकने के लिए एक विशेष अभियान भी शुरू करना होगा।
  • बैंकों को नए व्यापार करने की भी अनुमति नहीं होगी। आरबीआई, बैंकों पर ‘अंतर-बैंक बाजार (Interbank market) से उधार लेने पर भी प्रतिबंध लगाएगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि चिह्नित किए गए संकेतकों के जोखिम-सीमा उल्लंघन के आधार पर, शाखाओं या सहायक कंपनियों के माध्यम से संचालित होने वाले विदेशी बैंकों सहित भारत में कार्यरत सभी बैंकों पर ‘PCA फ्रेमवर्क’ लागू किया जाता है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ (PCA) के बारे में
  2. विशेषताएं
  3. मापदंड

मेंस लिंक:

‘त्वरित सुधारात्मक कार्रवाई’ PCA) फ्रेमवर्क के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय।

आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों पर आरबीआई समिति


संदर्भ:

आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों (Asset Reconstruction Companies – ARCs) के कामकाज को सुव्यवस्थित करने के लिए, रिजर्व बैंक द्वारा गठित एक समिति ने कई सुझाव प्रस्तुत किए हैं।

पृष्ठभूमि:

भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा वित्तीय क्षेत्र के पारितंत्र में ‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों’ (ARCs) के कामकाज की व्यापक समीक्षा करने और बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वित्तीय क्षेत्र को सक्षम बनाने हेतु उपयुक्त उपायों की सिफारिश करने के लिए ‘सुदर्शन सेन’ की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था।

प्रस्तुत सुझाव:

  1. तनावग्रस्त आस्तियों / परिसम्म्पत्तियों की बिक्री के लिए एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म तैयार किया जाना चाहिए।
  2. ‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों’ को आईबीसी प्रक्रिया के दौरान ‘समाधान आवेदकों’ (Resolution Applicants) के रूप में कार्य करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
  3. AIFs, FPIs, AMCs और NBFCs सहित सभी विनियमित संस्थाओं से वित्तीय परिसंपत्ति हासिल करने हेतु ‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों’ को अनुमति देने के लिए सरफेसी अधिनियम (SARFAESI Act) की धारा 5 के दायरे का विस्तार किया जाए।
  4. ₹500 करोड़ से अधिक राशि के खातों के लिए, ऋणशोधन मूल्य (liquidation value) और उचित बाजार मूल्य निर्धारित करने हेतु, दो बैंकों द्वारा अनुमोदित बाहरी मूल्यांकनकर्ताओं द्वारा मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
  5. साथ ही, आरक्षित मूल्य पर अंतिम स्वीकृति, एक उच्च स्तरीय समिति द्वारा दी जानी चाहिए जिसके पास ऋण के संबंधित बट्टे खाते में डालने का अनुमोदन करने की शक्ति हो।

 

‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनी’ (ARC) क्या है?

‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनी’ (Asset Reconstruction Companies- ARC), ऐसे विशेष वित्तीय संस्थान होते है जो बैंकों और वित्तीय संस्थानों से ‘गैर-निष्पादित आस्तियों’ (Non-Performing Assets- NPAs) खरीदते हैं, ताकि वे अपनी बैलेंसशीट को साफ कर सकें।

‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनी’ अथवा ‘एआरसी’ (ARC), आरबीआई के अंतर्गत पंजीकृत होती हैं।

विधिक आधार:

‘वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्रचना एवं प्रतिभूति हित प्रवर्तन’ (Securitization and Reconstruction of Financial Assets and Enforcement of Security Interest -SARFAESI) अधिनियम 2002, भारत में ‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनियों’ ( ARCs) का गठन करने हेतु वैधानिक आधार प्रदान करता है।

ARCs के लिये पूंजी आवश्यकताएँ:

  • SARFAESI अधिनियम में, वर्ष 2016 में किये गए संशोधनों के अनुसार, किसी ‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनी’ (ARC) के पास न्यूनतम 2 करोड़ रुपए की स्वामित्व निधि होनी चाहिये।
  • रिज़र्व बैंक द्वारा वर्ष 2017 में इस राशि को बढ़ाकर 100 करोड़ रुपए कर गिया गया था। ‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनी’ के लिए अपनी जोखिम भारित आस्तियों / परिसंपत्तियों के 15% का पूंजी पर्याप्तता अनुपात बनाए रखना आवश्यक है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘एआरसी’ क्या हैं?
  2. ‘SARFAESI अधिनियम’ क्या है?
  3. ‘सुदर्शन सेन समिति’ किससे संबंधित है?

मेंस लिंक:

‘आस्ति पुनर्संरचना कंपनी’ (ARC) की भूमिकाओं और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि।

वन सन, वन वर्ल्ड, वन ग्रिड


संदर्भ:

COP26 के दूसरे दिन, भारत और यूनाइटेड किंगडम द्वारा सौर ऊर्जा का दोहन करने और सीमाओं के पार निर्बाध रूप से संचारण करने हेतु ‘एक विश्व, एक सूर्य, एक ग्रिड’ (One Sun One World One Grid- OSOWOG) पहल की घोषणा की गई।

OSOWOG पहल के बारे में:

वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए, भारत द्वारा वैश्विक सहयोग को सुगम बनाने हेतु एक विश्व, एक सूर्य, एक ग्रिड’ (OSOWOG) पहल का प्रस्ताव किया गया था।

  • इसका उद्देश्य विभिन्न देशों में स्थित नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को परस्पर संबद्ध कर एक वैश्विक पारितंत्र का निर्माण करना है।
  • OSOWOG पहल के पीछे की परिकल्पना है, कि ‘सूर्य कभी अस्त नहीं होता है’ (The Sun Never Sets) और वैश्विक स्तर पर, किसी भी भौगोलिक स्थिति में, एक निश्चित समय पर सदैव स्थिर रहता है।

कार्यान्वयन:

  • राष्ट्रीय सीमाओं के पार विस्तारित, महाद्वीपीय-स्तर के ग्रिड द्वारा परस्पर संबद्ध सर्वोत्तम स्थानों पर बड़े सौर ऊर्जा स्टेशनों और पवन फार्मों के निर्माण में तेजी लाने की दिशा में, एक मंत्रिस्तरीय संचालन समूह द्वारा कार्य किया जाएगा।
  • इस मंत्रिस्तरीय संचालन समूह में फ्रांस, भारत, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका शामिल हैं, और इसमें अफ्रीका, खाड़ी, लैटिन अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया के प्रतिनिधि भी शामिल होंगे।

विश्व ग्रिड का महत्व:

एक विश्वव्यापी ग्रिड (one worldwide grid) के साथ, हम सभी स्थानों पर स्वच्छ ऊर्जा का उपयोग कर सकते हैं। इससे ऊर्जा के भंडारण की आवश्यकता भी कम होगी और सौर परियोजनाओं की व्यवहार्यता बढ़ेगी।

OSOWOG पहल के अंतर्गत संभावनाएं तथा लाभ

  1. भारत वर्ष 2030 तक गैर-जीवाश्म ईंधन से 40% ऊर्जा उत्पादित करने में सक्षम हो जायेगा तथा भारत ने एक विश्व, एक सूर्य, एक ग्रिड’ (OSOWOG) का मंत्र देते हुए सौर ऊर्जा आपूर्ति को परस्पर संबद्ध करने के लिए सभी देशों का आह्वान किया है।
  2. प्रस्तावित एकीकरण सभी भाग लेने वाली संस्थाओं के लिए परियोजना लागतों को कम करेगा और उच्च दक्षता तथा परिसम्पत्तियों के अधिकतम उपयोग को बढ़ावा देगा।
  3. इस योजना के लिए केवल वृद्धिशील निवेश की आवश्यकता होगी, इस योजना में मौजूदा ग्रिड के कार्यशील होने के कारण नई समानांतर ग्रिड अवसंरचना की आवश्यकता नहीं होगी।
  4. यह योजना सभी सहभागी संस्थाओं के लिए नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में निवेश को आकर्षित करने के साथ-साथ कौशल, प्रौद्योगिकी और वित्त के उपयोग करने में मदद करेगी।
  5. इस योजना के परिणामस्वरूप होने वाले आर्थिक लाभ से गरीबी उन्मूलन, जल, स्वच्छता, भोजन और अन्य सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने में मदद मिलेगी।
  6. यह पहल, भारत में स्थित राष्ट्रीय अक्षय ऊर्जा प्रबंधन केंद्रों को क्षेत्रीय और वैश्विक प्रबंधन केंद्रों के रूप में विकसित करने में सहायता करेगी।
  7. OSOWOG पहल से वर्ष 2050 तक वैश्विक स्तर पर, लगभग 2,600 GW इंटरकनेक्शन क्षमता संभव हो सकती है, जिससे प्रति वर्ष 226 बिलियन यूरो की अनुमानित बिजली बचत होगी।

 

‘वन सन’ घोषणा:

OSOWOG पहल की घोषणा के साथ “एक सूर्य घोषणा” (One Sun Declaration) भी की गयी, जिसमें कहा गया है कि, “एक सूर्य, एक विश्व, एक ग्रिड’ की परिकल्पना को परस्पर संबद्ध हरित ग्रिड के माध्यम से साकार करना परिवर्तनकारी हो सकता है, जिससे हम सभी को, विनाशकारी जलवायु परिवर्तन को रोकने, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण में तेजी लाने और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ‘पेरिस समझौते’ के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद मिलेगी।

इस घोषणा का 80 अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) सदस्य देशों द्वारा समर्थन किया गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि सूर्य सिर्फ एक घंटे में इतनी उर्जा उत्पन्न करता है, जितनी सभी इंसानों द्वारा एक साल में व्यय की जाती है? यह ऊर्जा पूरी तरह से स्वच्छ और संधारणीय होती है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. OSOWOG पहल- उद्देश्य।
  2. इसे कब लॉन्च किया गया था?
  3. कार्यान्वयन एजेंसी।
  4. गैर-जीवाश्म ईंधन क्या हैं? उदाहरण।

मेंस लिंक:

OSOWOG पहल के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 प्रत्यास्थी द्वीप राज्यों हेतु आधारभूत संरचनाएं


संदर्भ:

भारत ने जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील छोटे द्वीप राष्ट्रों के बुनियादी ढांचे के विकास के लिए ‘प्रत्यास्थी द्वीप राज्यों हेतु आधारभूत संरचनाएं’ (Infrastructure for Resilient Island States – IRIS) पहल का आरंभ किया है।

यह नई पहल भारत, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग का परिणाम है और इसमें फिजी, जमैका और मॉरीशस जैसे छोटे द्वीप राष्ट्रों के नेताओं की भागीदारी है।

कार्यान्वयन:

‘प्रत्यास्थी द्वीप राज्यों हेतु आधारभूत संरचनाएं’ (IRIS) पहल, अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन (Coalition for Disaster Resilient Infrastructure – CDRI) का एक हिस्सा है, जिसके तहत विशेष रूप से छोटे द्वीपीय विकासशील देशों में पायलट परियोजनाएँ शुरू करने एवं क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।

आवश्यकता:

  • पिछले कुछ दशकों यह साबित हो चुका है, कि जलवायु परिवर्तन के प्रकोप से कोई भी अछूता नहीं है, चाहे वे विकसित देश हों या प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध देश, यह सबके लिए एक बड़ा खतरा है। लेकिन, छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (Small Island Developing States – SIDS) के लिए जलवायु परिवर्तन से सबसे बड़ा खतरा है।
  • छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) में उनकी पूरी आबादी का एक तिहाई हिस्सा, समुद्र तल से पांच मीटर से नीचे की जमीन पर निवास करता है। जिसकी वजह से समुद्र के स्तर में वृद्धि, इनके लिए तूफानों और तटीय विनाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देती है।
  • ये देश वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में केवल 1 प्रतिशत का योगदान करते हैं, और फिर भी जलवायु परिवर्तन के सबसे हानिकारक प्रभावों का सबसे पहले सामना करना पड़ता है।
  • जलवायु परिवर्तन की वजह से आजीविका और आर्थिक विकास को खतरा होने के कारण कृषि उत्पादन, मत्स्य पालन और संबंधित क्षेत्रों में गिरावट आ रही है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चरम मौसम आर्थिक रूप से, विनाशकारी प्रभावों के साथ-साथ छोटे द्वीपीय विकासशील देशों की भूमि, अचल संपत्ति और बुनियादी ढांचे को नष्ट हो रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन अवसंरचना गठबंधन (CDRI)

  • CDRI की शुरुआत भारतीय प्रधान मंत्री द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु कार्रवाई शिखर सम्मेलन 2019 में की गई थी।
  • यह एक स्वैच्छिक अंतर्राष्ट्रीय समूह है।
  • यह आपदा के विभिन्न पहलुओं और बुनियादी ढांचे के जलवायु प्रत्यास्थता पर जानकारी का आदान-प्रदान करने हेतु एक मंच है।
  • इसका उद्देश्य सरकारों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों, बैंकों, निजी क्षेत्र के समूहों और शिक्षाविदों के साथ मिलकर जलवायु और आपदा जोखिमों के लिए अवसंरचना प्रणालियों में लचीलापन विकसित करना है।
  • इसके तहत सदस्य देशों के लिए उनकी जोखिम संदर्भ और आर्थिक जरूरतों के मुताबिक बुनियादी ढांचे के विकास के संबंध में उनकी क्षमताओं और प्रणालियों को उन्नत करने हेतु सहायता करने के लिए एक तंत्र का निर्माण किया जायेगा।

छोटे द्वीपीय विकासशील देश:

छोटे द्वीपीय विकासशील देश (Small Island Developing States – SIDS), अद्वितीय सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय अतिसंवेदनशीलता का सामना करने वाले, संयुक्त राष्ट्र के 38 सदस्य देशों और संयुक्त राष्ट्र क्षेत्रीय आयोगों के 20 गैर-संयुक्त राष्ट्र सदस्यों/सहयोगी सदस्यों का एक विशिष्ट समूह है।

  • जून 1992 में आयोजित ‘पर्यावरण एवं विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ में छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS), को विकासशील देशों के एक विशिष्ट समूह के रूप में मान्यता दी गई थी।
  • जून 2012 में ब्राजील के रियो डी जनेरियो में आयोजित ‘संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सम्मेलन’ (जिसे रियो +20 भी कहा जाता है) में अपनाए गए विषय ‘द फ्यूचर वी वांट’ में ‘छोटे द्वीपीय विकासशील देशों’ (SIDS) की अनूठी और विशेष कमजोरियों को उजागर किया गया है।
  • ‘छोटे द्वीपीय विकासशील देश’, कैरिबियन, प्रशांत महासागर और AIS (अटलांटिक, हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर) भौगोलिक क्षेत्रों में स्थित है।
  • ‘छोटे द्वीपीय विकासशील देशों’ (SIDS) को उनके सतत विकास प्रयासों में सहायता करने हेतु वर्ष 1994 में ‘बारबाडोस प्रोग्राम ऑफ एक्शन’ तैयार किया गया था।
  • न्यूनतम विकसित देशों, स्थलरुद्ध विकासशील देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों’ के लिए उच्च प्रतिनिधि का संयुक्त राष्ट्र कार्यालय (The United Nations Office of the High Representative for the Least Developed Countries, Landlocked Developing Countries and Small Island Developing States: UN-OHRLLS) इन देशों के समूह का प्रतिनिधित्व करता है।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम


संदर्भ:

भारत के राष्ट्रपति द्वारा (संविधान के अनुच्छेद 239 के खंड (1) के तहत) लद्दाख के उपराज्यपाल को केंद्र शासित प्रदेश के भीतर ‘अनुसूचित जाति एवं अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम, 2006’ (The Scheduled Tribes and Other Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) के तहत राज्य सरकार की शक्तियों का प्रयोग करने और कार्यों का निर्वहन करने का अधिकार प्रदान किया गया है।

वन अधिकार अधिनियम (FRA) के बारे में:

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन क्षेत्र के निवासियों को (वन अधिकार मान्यता) अधिनियम 2006 , जिसे वन अधिकार अधिनियम (Forest Rights Acts- FRA) भी कहा जाता है, वर्ष 2006 में पारित किया गया था। यह अधिनियम पारंपरिक वन वासी समुदायों के अधिकारों को कानूनी मान्यता प्रदान करता है।

अधिनियम के तहत अधिकार:

  • स्वामित्व अधिकार – वनवासियों अथवा आदिवासियों द्वारा 13 दिसंबर 2005 तक कृषि की जाने वाली भूमि पर, जो कि 4 हेक्टेयर से अधिक नहीं होनी चाहिए, उक्त तारीख तक वास्तव में कृषि करने वाले संबंधित परिवार को स्वामित्व अधिकार प्रदान किए जाएंगे। अर्थात, कोई अन्य नयी भूमि प्रदान नहीं की जाएगी।
  • अधिकारों का उपयोग- वनवासियों अथवा आदिवासियों के लिए, लघु वन उपज (स्वामित्व सहित), चारागाह क्षेत्र, तथा पशुचारक मार्ग संबंधी अधिकार उपलब्ध होंगे।
  • राहत और विकास अधिकार – वनवासियों अथवा आदिवासियों के लिए अवैध निकासी या बलपूर्वक विस्थापन के मामले में पुनर्वास का अधिकार तथा वन संरक्षण हेतु प्रतिबंधों के अधीन बुनियादी सुविधाओं का अधिकार प्राप्त होगा।
  • वन प्रबंधन अधिकार – जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करने संबधी अधिकार होंगे।

पात्रता मापदंड:

वन अधिकार अधिनियम (FRA) की धारा 2(c) के अनुसार, वनवासी अनुसूचित जनजाति (Forest Dwelling Scheduled Tribe FDST) के रूप में अर्हता प्राप्त करने और FRA के तहत अधिकारों की मान्यता हेतु पात्र होने के लिए, आवेदक द्वारा निम्नलिखित तीन शर्तों को पूरा किया जाना आवश्यक है।

व्यक्ति अथवा समुदाय:

  1. अधिकार का दावा किये जाने वाले क्षेत्र में अनुसूचित जनजाति का सदस्य होना चाहिए;
  2. 13-12-2005 से पहले मूल रूप से वन अथवा वन भूमि का निवासी होना चाहिए;
  3. आजीविका हेतु वास्तविक रूप से वन अथवा वन भूमि पर निर्भर होना चाहिए।

तथा, अन्य पारंपरिक वनवासियों (Other Traditional Forest Dweller OTFD) के रूप में अर्हता प्राप्त करने और FRA के तहत अधिकारों की मान्यता हेतु पात्र होने के लिए,  निम्नलिखित दो शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:

व्यक्ति अथवा समुदाय:

  1. जो 13 दिसम्बर, 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढि़यों (75 वर्ष) तक मूल रूप से वन या वन भूमि में निवास करता हो।
  2. आजीविका हेतु वास्तविक रूप से वन अथवा वन भूमि पर निर्भर हो।

अधिकारों को मान्यता देने संबंधी प्रक्रिया:

  • प्रक्रिया के आरंभ में, ग्राम सभा द्वारा एक प्रस्ताव पारित किया जाएगा, जिसमे यह सिफारिश की जाएगी कि, किस व्यक्ति को किस संसाधन पर अधिकार को मान्यता दी जानी चाहिए।
  • इसके बाद, प्रस्ताव का उप-मंडल (या तालुका) के स्तर पर और फिर जिला स्तर पर, अनुवीक्षण और अनुमोदन किया जाता है।

अनुवीक्षण समिति (Screening Committee) में तीन सरकारी अधिकारी (वन, राजस्व और आदिवासी कल्याण विभाग) और संबंधित स्तर पर स्थानीय निकाय के तीन निर्वाचित सदस्य होते हैं। ये समितियां अपील पर सुनवाई भी करती हैं।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘वन अधिकार अधिनियम’, 2006 के तहत परिभाषित ‘संकटपूर्ण वन्यजीव आवासों’ के बारे में जानते हैं जिन्हें किया गया है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पांचवी अनुसूची के तहत क्षेत्रों को सम्मिलित करने अथवा बहिष्कृत करने की शक्ति
  2. अनुसूचित क्षेत्र क्या होते हैं?
  3. वन अधिकार अधिनियम- प्रमुख प्रावधान
  4. इस अधिनियम के तहत अधिकार
  5. पात्रता मानदंड
  6. इन अधिकारों को मान्यता देने में ग्राम सभा की भूमिका
  7. ‘संकटपूर्ण वन्यजीव वास स्थल’ क्या होते हैं?

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


 

जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद रोधी एजेंसी का गठन

  • जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा “केंद्र शासित प्रदेश में उग्रवाद से संबंधित मामलों की त्वरित और प्रभावी जांच और अभियोजन” के लिए एक नई ‘राज्य जांच एजेंसी’ (State Investigation Agency – SIA) की स्थापना की गई है।
  • SIA, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) और अन्य केंद्रीय एजेंसियों के साथ समन्वय हेतु एक नोडल एजेंसी होगी।
  • सीआईडी ​​विंग का प्रमुख ‘राज्य जांच एजेंसी’ (SIA) का पदेन निदेशक होगा।

 

रक्षा अधिग्रहण परिषद

भ्रष्टाचार पर रोक लगाने और सैन्य खरीद संबंधी निर्णय लेने में तेजी लाने के लिए, भारत सरकार द्वारा वर्ष 2001 में एक एकीकृत ‘रक्षा अधिग्रहण परिषद’ (Defence Acquisition Council – DAC) स्थापित करने का निर्णय लिया गया था।

  • ‘रक्षा अधिग्रहण परिषद’ (DAC) के अध्यक्ष भारत के ‘रक्षा मंत्री’ होते हैं।
  • उद्देश्य: डीएसी का उद्देश्य आवंटित बजटीय संसाधनों का इष्टतम उपयोग करके सशस्त्र बलों की स्वीकृत आवश्यकताओं की मांग की गई क्षमताओं और निर्धारित समय सीमा के अनुसार शीघ्र खरीद सुनिश्चित करना है।
  • कार्य: ‘रक्षा अधिग्रहण परिषद’ लंबी अवधि की खरीद योजनाओं के आधार पर अधिग्रहण के लिए नीतिगत दिशानिर्देश देने के लिए जिम्मेदार है। यह आयातित और स्वदेशी या विदेशी लाइसेंस के तहत उत्पादित सभी अधिग्रहणों को मंजूरी भी देती है।

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