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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 2 November 2021

 

 

विषयसूची

 

सामान्य अध्ययनIII

  1. भारत द्वारा वर्ष 2070 तक ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन’ हासिल करने की घोषणा
  2. COP26 जलवायु सम्मेलन
  3. पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध की व्यवहार्यता
  4. बॉटम ट्रॉलिंग और संबंधित मुद्दे
  5. गिनीज रिकॉर्ड में गंगा मिशन

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

  1. गंगा नदी डॉल्फिन के बचाव हेतु दिशा-निर्देश
  2. BASIC देश

 


सामान्य अध्ययनIII


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 

भारत द्वारा वर्ष 2070 तक ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन’ हासिल करने की घोषणा


संदर्भ:

जलवायु परिवर्तन से लड़ने के प्रयास में, प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लासगो में जारी COP26 शिखर सम्मेलन में निम्नलिखित घोषणाएँ की हैं:

  1. भारत, वर्ष 2070 तक ‘शुद्ध शून्य उत्सर्जन’ हासिल कर लेगा।
  2. वर्ष 2030 तक, भारत यह सुनिश्चित करेगा कि उसकी 50% ऊर्जा आवश्यकताएं अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरी की जाएगी।
  3. भारत, अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा।
  4. भारत अपने ‘सकल घरेलू उत्पाद’ की प्रति इकाई उत्सर्जन तीव्रता को 45% से कम करेगा।
  5. भारत, वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु सिस्टम भी स्थापित करेगा, जोकि हमारे मौजूदा लक्ष्य से ‘50 गीगावाट की वृद्धि’ होगी।

आगे की कार्यवाही हेतु भारत के सुझाव:

  1. ‘जलवायु न्याय’ की भावना के अनुरूप, समृद्ध विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों और सबसे कमजोर लोगों की सहायता हेतु ‘जलवायु वित्त’ में कम से कम $ 1 ट्रिलियन राशि प्रदान की जानी चाहिए।
  2. ‘समानता के सिद्धांत’ और ‘सामूहिक किंतु विभेदित जिम्मेदारियों’ तथा संबंधित क्षमताओं (Common but Differentiated Responsibilities and Respective Capabilities: CBDR-RC) और, देशों की भिन्न-भिन्न राष्ट्रीय परिस्थितियों काअभिज्ञान लेते हुए इनका सम्मान किया जाना चाहिए।
  3. कुछ पारंपरिक समुदायों में प्रचलित जीवन-यापन के संवहनीय तरीकों को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
  4. ‘जल जीवन मिशन’, ‘स्वच्छ भारत मिशन’ और ‘उज्ज्वला मिशन’ जैसे कार्यक्रमों को अपनाए जाने में भारत के प्रयासों से मिली सीख को विश्व स्तर पर प्रचलित किया जाना चाहिए।
  5. उत्सर्जन न्यूनीकरण के साथ-साथ ‘जलवायु अनुकूलन’ पर समान रूप से ध्यान देना चाहिए।

 

 

 ‘नेट-जीरो’ लक्ष्य घोषित करने वाले राष्ट्र:

  1. वर्ष 2019 में न्यूजीलैंड सरकार द्वारा ‘जीरो कार्बन अधिनियम’ पारित किया गया और इसके तहत देश को वर्ष 2050 तक ‘जीरो कार्बन उत्सर्जन’ का लक्ष्य हासिल करने करने हेतु प्रतिबद्ध किया गया।
  2. ब्रिटेन की संसद द्वारा एक कानून पारित किया गया है, जिसके तहत सरकार को यूनाइटेड किंगडम में ग्रीनहाउस गैसों के शुद्ध उत्सर्जन को 100 प्रतिशत तक कम करने का दायित्व सौंपा गया है।
  3. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन द्वारा वर्ष 2030 तक देश के ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में वर्ष 2005 के स्तर से न्यूनतम 50 प्रतिशत की कटौती करने की घोषणा की गयी है।
  4. जलवायु परिवर्तन पर अनिच्छुक सहयोगियों को एक साथ लाने और वर्ष 2050 तक देश में ‘नेट-जीरो’ कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्य तक पहुंचने के साथ वर्ष 2019 में ‘वर्ल्ड वॉर जीरो’ की शुरुआत की गई।
  5. यूरोपीय संघ की ‘फिट फॉर 55’ योजना: इसके तहत, यूरोपीय आयोग ने अपने सभी 27 सदस्य देशों को अपने उत्सर्जन में 2030 तक 1990 के उत्सर्जन स्तर से 55 प्रतिशत तक कटौती करने के लिए कहा है।
  6. चीन ने वर्ष 2060 तक ‘नेट-जीरो’ का लक्ष्य हासिल करने की घोषणा की है और अपने उत्सर्जन को वर्ष 2030 के स्तर तक सीमित करने की बात कही है।

‘नेट-ज़ीरो’ से तात्पर्य:

‘नेट-ज़ीरो’  (Net-Zero), जिसे ‘कार्बन-तटस्थता’ (carbon-neutrality) भी कहा जाता है, का मतलब यह नहीं है, कि कोई देश अपने सकल उत्सर्जन को शून्य तक ले जाएगा।

  • बल्कि, ‘नेट-ज़ीरो’ एक ऐसी स्थिति होती है, जिसमें किसी देश के उत्सर्जन को, ‘वायुमंडल से ग्रीनहाउस गैसों के अवशोषण तथा निराकरण’ के द्वारा क्षतिपूरित (compensated) किया जाता है।
  • उत्सर्जन का अवशोषण करने में वृद्धि करने हेतु अधिक संख्या में कार्बन सिंक, जैसे कि जंगल, तैयार किये जा सकते हैं, जबकि वायुमंडल से गैसों का निराकरण करने अथवा निष्कासित करने के लिए कार्बन कैप्चर और भंडारण जैसी अत्याधुनिक तकनीकों की आवश्यकता होती है।

इंस्टा जिज्ञासु:

ब्लू कार्बन, ब्लैक कार्बन और ब्राउन कार्बन क्या होते हैं?  इसके बारे में जानकारी हेतु पढ़िए

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘जलवायु नेताओं’ के शिखर सम्मेलन के बारे में।
  2. नेट-ज़ीरो क्या है?
  3. नेट-ज़ीरो के लिए प्रतिबद्ध देश।
  4. पेरिस समझौते के बारे में।

मेंस लिंक:

कार्बन सिंक’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

 

स्रोत: द हिंदू।

 


विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 

COP26 जलवायु सम्मेलन

 

संदर्भ:

यूनाइटेड किंगडम द्वारा 31 अक्टूबर से 12 नवंबर तक आयोजित ‘COP 26 संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन’ की मेजबानी की जाएगी।

इस वर्ष ‘पक्षकारों का 26वां सम्मेलन’ (Conference of Parties – COP26) आयोजन किया जा रहा है और इसे ‘ग्लासगो’ के ‘स्कॉटिश इवेंट कैंपस’ में आयोजित किया जाएगा।

 

‘पक्षकार सम्मेलन’ क्या है?

‘पक्षकार सम्मेलन’ (Conference of Parties – COP), वर्ष 1994 में स्थापित ‘संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय’ (United Nations Climate Change Framework Convention – UNFCCC) के अधीन कार्य करता है।

  1. UNFCCC की स्थापना “वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों सांद्रता को स्थिर करने” की दिशा में कार्य करने के लिए की गई थी।
  2. वर्ष 1995 से COP सदस्यों के सम्मलेन का हर साल आयोजन किया जा रहा है। पहला COP सम्मलेन (COP1) वर्ष 1995 में बर्लिन में आयोजित किया गया था।

पहले ‘पक्षकार सम्मेलन’ (COP1)  में सदस्य देशों के लिए जिम्मेदारियों की एक सूची तैयार की गयी,  जिसमें शामिल हैं:

  1. जलवायु परिवर्तन को कम करने के उपाय तैयार करना।
  2. जलवायु परिवर्तन प्रभाव के लिए ‘अनुकूलन’ की तैयारी में सहयोग करना।
  3. जलवायु परिवर्तन से संबंधित शिक्षा, प्रशिक्षण और जन जागरूकता को बढ़ावा देना।

 

UNFCCC के अनुसार, COP26 में चार लक्ष्यों पर कार्य किया जाएगा:

  1. सदी के मध्य तक वैश्विक स्तर पर ‘नेट-जीरो’ उत्सर्जन को सुनिश्चित करना और 1.5 डिग्री के तापमान लक्ष्य को पहुँच के भीतर रखना।
  2. समुदायों और प्राकृतिक आवासों की रक्षा के लिए सामंजस्य स्थापित करना।
  3. वित्त जुटाना: पहले दो लक्ष्यों को पूरा करने के लिए, विकसित देशों द्वारा वर्ष 2020 तक प्रति वर्ष जलवायु वित्त में कम से कम $ 100 बिलियन की राशि जुटाने संबंधी अपने वादे को पूरा करना।
  4. पेरिस नियम पुस्तिका को अंतिम रूप देना: पेरिस समझौते को पूरा करने में सहायक, विस्तृत नियमों की एक सूची तैयार करने के लिए वैश्विक नेताओं द्वारा मिलकर कार्य करना।

 

UNFCCC के बारे में:

‘संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क अभिसमय’ (United Nations Climate Change Framework Convention – UNFCCC) को वर्ष 1992 में आयोजित ‘रियो पृथ्वी शिखर सम्मलेन’ में अपनाया गया था।

  1. इस शिखर सम्मलेन को जलवायु परिवर्तन की समस्या का सामना करने हेतु अंतर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा किया गया पहला ठोस प्रयास माना जाता है।
  2. UNFCCC को ‘रियो अभिसमय’ (Rio Convention) के रूप में भी जाना जाता है, यह पृथ्वी के वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के संकेंद्रण को स्थिर करने के लिए कार्रवाई के लिए एक रूपरेखा निर्धारित करता है।
  3. UNFCCC को वर्ष 1994 से लागू किया गया है और विश्व के लगभग सभी देशों ने इस अभिसमय पर हस्ताक्षर किए हैं।
  4. यह वर्ष 2015 में हुए ‘पेरिस समझौते’ की मूल संधि है, इसके अलावा यह क्योटो प्रोटोकॉल-1997 की मूल संधि भी है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

ग्यारहवां एवं अब तक का पहला वर्चुअल जलवायु सम्मलेन ‘पीटर्सबर्ग जलवायु वार्ता’ (Petersberg Climate Dialogue) 28 अप्रैल 2020 को आयोजित किया गया था। यह किस बारे में था?

प्रीलिम्स लिंक:

  1. UNFCCC क्या है?
  2. ‘कोपेनहेगन शिखर सम्मेलन’ क्या है?
  3. पीटर्सबर्ग जलवायु वार्ता का आयोजन किसके द्वारा किया जाता है?
  4. ‘पक्षकार सम्मेलन’ (COP) क्या है?

 

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 

पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध की व्यवहार्यता

 

संदर्भ:

हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पटाखों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना संभव नहीं है।

इससे पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा 29 अक्टूबर को पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने संबंधी आदेश जारी किया गया था, शीर्ष अदालत ने, उच्च न्यायालय के इस आदेश को रद्द कर दिया है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गयी टिप्पणियाँ:

  1. पटाखों के दुरुपयोग को रोकने के लिए तंत्र को मजबूत किया जाए।
  2. पटाखों में जहरीले रसायनों के प्रयोग को रोकने संबंधी उपाय किए जाने चाहिए।
  3. किसी भी राज्य में प्रतिबंधित किस्म के पटाखों का इस्तेमाल पाए जाने पर मुख्य सचिव, शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे।

अर्जुन गोपाल मामले में अदालत का फैसला:

सुप्रीम कोर्ट ने 23 अक्टूबर, 2018 को सुनाए गए अपने फैसले में दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पटाखों की बिक्री और उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया था और देश भर में पटाखों के उपयोग को विनियमित किया था।

  • ‘बेरियम’ आधारित पटाखों पर विशेष रूप से प्रतिबंध लगाया गया था।
  • पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

अदालत ने यह फैसला, वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने हेतु देश भर में पटाखों के निर्माण और बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया था।

पटाखों के उपयोग पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल की टिप्पणियां:

  • पटाखों पर प्रतिबंध लगाने पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह “कुछ लोगों के रोजगार की आड़ में” अन्य नागरिकों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन नहीं कर सकता है।
  • रोजगार, बेरोजगारी और जीवन के अधिकार के मध्य ‘संतुलन’ बनाना होगा।

पटाखों की क्रियाविधि:

पटाखों (Firecrackers) में एक दहन प्रतिक्रिया उत्पन्न करने के लिए ‘ईंधन’ और ‘ऑक्सीकारकों’ (oxidisers) का प्रयोग किया जाता है, और इनके दहन से होने वाले परिणामी विस्फोट में पटाखों में भरी हुई सामग्री अत्यधिक गर्म अवस्था में, वातावरण में विखर जाती है। विस्फोटक मिश्रण में मिलाए गए धातु के कण ‘संदीप्त’ होकर प्रकाश उत्सर्जित करते हैं।

संबंधित विवाद:

पटाखों के विस्फोटक मिश्रण में मिलाए गए धात्विक कणों में इनके नाभिक के बाह्य आवरण में इलेक्ट्रॉनों की एक अलग व्यवस्था होती है। पटाखों को जलाए जाने की प्रतिक्रिया में प्रकाश की विभिन्न तरंग दैर्ध्य उत्पन्न होती हैं, जिससे शानदार रंग निकलते हैं। लेकिन, जैसा कि कई अध्ययनों से पता चलता है, पटाखों का जलना, कणों और गैसों से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण का एक असामान्य और चरम स्रोत है।

  • इटली के मिलान शहर में किए गए एक अध्ययन में, पटाखों जलाए जाने पर पर वायु में एक घंटे के दौरान कई तत्वों की मात्रा के स्तर में – स्ट्रोंटियम का 120 गुना, मैग्नीशियम का 22 गुना, बेरियम का 12 गुना, पोटेशियम का 11 गुना और कॉपर का छह गुना- वृद्धि निर्धारित की गयी।
  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा वर्ष 2016 में दिल्ली में एक अध्ययन किया गया, जिसके अनुसार- दीपावली की रात को वायु में एल्युमिनियम, बेरियम, पोटेशियम, सल्फर, आयरन और स्ट्रोंटियम के स्तर में ‘निम्न से अत्यधिक उच्च तक’ तेजी से वृद्धि हुई थी।
  • चीन और यूनाइटेड किंगडम में भी इसी तरह की प्रासंगिक बढ़त दर्ज की गयी है। पटाखों से होने वाला प्रदूषण, लोगों और जानवरों के स्वास्थ्य को प्रभावित करता है, और भारतीय शहरों में पहले से ही खराब परिवेशी वायु गुणवत्ता को और ख़राब करता है।

इसके परिणामस्वरूप अदालत में दायर की गयी याचिकाओं में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है, और अदालत द्वारा अपने आदेश में, पटाखों में इस्तेमाल किए जाने वाले रसायनों के प्रकार के साथ-साथ उनकी मात्रा को भी प्रतिबंधित किया गया है। कई पटाखे, ध्वनि के संबंध में निर्धारित की गयी कानूनी सीमा का भी उल्लंघन करते हैं।

क्या ग्रीन पटाखों से कोई फर्क पड़ सकता है?

वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद के ‘राष्ट्रीय पर्यावरण इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान’ (CSIR-NEERI), नागपुर द्वारा पटाखों का एक विकल्प पेश किया गया है, जिसमें उत्सर्जित होने वाले प्रकाश और ध्वनि की मात्रा कम होती है और ऑक्सीडेंट के रूप में पोटेशियम नाइट्रेट की कम मात्रा का इस्तेमाल किया जाता है, जिसकी वजह से उत्सर्जित पार्टिकुलेट पदार्थों की मात्रा 30% तक कम हो जाती है।

इन पटाखों को ‘सेफ वाटर रिलीजर’ (Safe Water Releaser) नाम दिया गया है, और इनमे पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर का कम उपयोग किया जाता है, लेकिन इनसे निकलने वाली आवाज, पारंपरिक पटाखों की ध्वनि तीव्रता के समान ही होती है। इनमे एल्युमीनियम का इस्तेमाल भी काफी कम और सुरक्षित सीमा के भीतर किया जाता है, और यह पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर की कम मात्रा वाले सुरक्षित थर्माइट पटाखे होते हैं।

समय की आवश्यकता:

पटाखों पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेते समय, पटाखा निर्माताओं के ‘आजीविका के मौलिक अधिकार’ और देश के 1.3 बिलियन से अधिक लोगों के ‘स्वास्थ्य के अधिकार’ को ध्यान में रखने की आवश्यकता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप पटाखों से विभिन्न रंग निकलने के कारणों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘हरित पटाखे’ क्या होते हैं?
  2. इनके निर्माण में उपयोग किए जाने वाले प्रमुख तत्व
  3. पटाखों में विभिन्न रंगों के कारक

मेंस लिंक:

‘हरित पटाखे’ क्या होते हैं? इनके महत्व पर चर्चा कीजिए।

 

स्रोत: द हिंदू।

 


विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

बॉटम ट्रॉलिंग और संबंधित मुद्दे

 

संदर्भ:

कोलंबो में भारतीय उच्चायुक्त ने उत्तरी श्रीलंका के मछुआरों को, पाक जलडमरूमध्य में भारतीय मछुआरों की बॉटम ट्रालिंग (Bottom-Trawling) संबंधी चिंताओं से नई दिल्ली और तमिलनाडु, दोनों को अवगत कराने और समस्या के समाधान हेतु कुछ तत्काल उपाय देखने का आश्वासन दिया है।

वर्तमान प्रकरण:

भारतीय पक्ष द्वारा दो बार – 2010 और 2016 में – ‘बॉटम ट्रालिंग’ की प्रथा को समाप्त करने पर सहमति दी जा चुकी है, लेकिन मत्स्यन की यह पद्धति अभी भी जारी है।

‘बॉटम ट्रॉलिंग’ के साथ समस्या:

बॉटम ट्रालिंग (Bottom-Trawling), मत्स्यन की पारिस्थितिक रूप से विनाशकारी पद्धति है। इस पद्धति में, बड़े आकार के मत्स्यन पोत (Trawlers) मछली पकड़ने के जालों में वजन बांधकर समुद्र की तली में फेंक देते है, जिससे सभी प्रकार के समुद्री जीव जाल में फंस जाते है और क्षेत्र में मत्स्यन संसाधनों का अभाव हो जाता है।

बॉटम ट्रॉलिंग में, अल्पविकसित मछलियां भी फंस जाती है, जिससे समुद्री संसाधन भी समाप्त होने लगते हैं और समुद्री संरक्षण के प्रयास भी प्रभावित होते है। यह पद्धति, पाक की खाड़ी में तमिलनाडु के मछुआरों द्वारा शुरू की गई थी और बाद में श्रीलंका में गृहयुद्ध के दौरान काफी तेजी से इस पद्धति का प्रयोग किया गया था।

‘बॉटम ट्रालिंग’ समस्या का समाधान: ‘गहरे समुद्र में मत्स्यन योजना’ के बारे में:

‘बॉटम ट्रालिंग’ की समस्या का समाधान, ‘ट्रॉलिंग’ की बजाय ‘गहरे समुद्र में मत्स्यन’ किए जाने में निहित है।

  • समुद्र/महासागर के भीतरी भागों में रहने वाली मछलियों को पकड़ने की गतिविधियों को गहरे समुद्र में मत्स्यन’ या ‘डीप सी फिशिंग’ कहा जाता है।
  • इसके लिए नौकाओं को इस तरह से डिजाइन किया जाता है, जिससे मछुआरों को समुद्र के भीतरी हिस्सों और मछली प्रजातियों तक पहुंचने में आसानी हो सके।
  • यह पद्धति दुनिया भर में, विशेष रूप से तटीय क्षेत्रों में प्रचलित है और इसमें पारिस्थितिक तंत्र को किसी प्रकार की क्षति भी नहीं पहुँचती है।
  • जिन क्षेत्रों में पानी की गहराई न्यूनतम 30 मीटर होती है, उन्हें ‘गहरे समुद्र में मत्स्यन’ क्षेत्र माना जाता है।

 

सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास- पाक खाड़ी योजना:

‘पाक खाड़ी योजना’ (Palk Bay scheme)  की शुरुआत ‘नीली क्रांति कार्यक्रम’ के तहत जुलाई 2017 में की गयी थी।

  • इस योजना को, लाभार्थीयों की भागीदारी सहित केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा वित्तपोषित किया जाता है।
  • इसके अंतर्गत, राज्य के मछुआरों को तीन साल में 2,000 जहाज उपलब्ध कराए जाने और इनको ‘बॉटम ट्रालिंग (Bottom Trawling) पद्धति को छोड़ने के लिए प्रेरित की परिकल्पना की गयी थी।

स्रोत: द हिंदू।

 


 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

 

गिनीज रिकॉर्ड में गंगा मिशन

संदर्भ:

गंगा उत्सव के पहले दिन ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ द्वारा एक घंटे में फेसबुक पर हस्तलिखित नोटों की रिकॉर्ड संख्या में तस्वीरें अपलोड करने का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया गया है।

पृष्ठभूमि:

गंगा उत्सव कार्यक्रम का आयोजन गंगा कायाकल्प के बारे में जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ कार्यक्रम की पहुंच को गति प्रदान करने के लिए किया गया था।

इसके तहत लोगों द्वारा ‘नमामि गंगे फेसबुक पेज’ पर ‘माँ गंगा’ विषय पर कविताएँ या लेख पोस्ट किए गए थे।

गंगा नदी संरक्षण पर ‘राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन’ (NMCG) नीति दस्तावेज:

  1. गंगा नदी के किनारे बसे शहरों को अपना मास्टर प्लान तैयार करते समय ‘नदी संरक्षण योजनाओं’ को शामिल किया जाए।
  2. ‘नदी के प्रति संवेदनशील’ इन योजनाओं को व्यावहारिक होना चाहिए और इन्हें तैयार करते समय अतिक्रमण और भूमि स्वामित्व संबंधी सवालों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
  3. पुनर्वास रणनीति के अलावा वैकल्पिक आजीविका विकल्पों पर जोर देने वाली अतिक्रमणकारी संस्थाओं के लिए एक व्यवस्थित पुनर्वास योजना भी तैयार करने की आवश्यकता है।
  4. मास्टर प्लान में ‘विशिष्ट तकनीकों’ को अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए, किंतु इसमें नदी प्रबंधन हेतु अत्याधुनिक तकनीकों (प्रदाताओं का नाम लिए बगैर) के उपयोग को आसान बनाने हेतु ‘उपयुक्त वातावरण’ तैयार किया जा सकता है।

प्रयोज्यता:

ये सिफारिशें वर्तमान में गंगा नदी की मुख्य धारा पर बसे शहरों के लिए जारी की गईं हैं। इन शहरों में 5 राज्यों -उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल- के 97 शहर शामिल है।

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान (NMCG)  के बारे में:

NMCG को सोसाइटी पंजीकरण अधिनियमन, 1860 के अंतर्गत 12 अगस्त 2011 को एक सोसाइटी के रुप में पंजीकृत किया गया था।

यह ‘पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम’ (EPA), 1986 के प्रावधानों के तहत गठित ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGRBA) की कार्यान्वयन शाखा के रूप में कार्य करता था।

कृपया ध्यान दें: ‘राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGRBA) को ‘गंगा नदी के पुनरुद्धार, संरक्षण और प्रबंधन हेतु राष्ट्रीय परिषद’ (National Council for Rejuvenation, Protection and Management of River Ganga), जिसे ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (National Ganga Council – NGC) भी कहा जाता है, का गठन किए जाने बाद 7 अक्टूबर 2016 को भंग कर दिया गया था।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ की अध्यक्षता भारत के प्रधानमंत्री करते हैं? इसके कार्यों और अन्य संबंधित संस्थानों के बारे में अधिक जानने हेतु देखें: राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन | एनएमसीजी (nmcg.nic.in)

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘राष्ट्रीय गंगा परिषद’ (NGC) की संरचना
  2. राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण’ (NGRBA) के बारे में
  3. राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा अभियान (NMCG) क्या है?
  4. नमामि गंगे कार्यक्रम के घटक
  5. विश्व बैंक समूह

स्रोत: द हिंदू।

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

 

गंगा नदी डॉल्फिन के बचाव हेतु दिशा-निर्देश

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा गंगा नदी में फंसे डॉल्फ़िन के सुरक्षित बचाव और उन्मुक्ति के लिए एक दिशा-निर्देश जारी किए है।

  • इस दस्तावेज़ को ‘टर्टल सर्वाइवल एलायंस’ और उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग (EFCCD) द्वारा तैयार किया गया है।
  • यह मैनुअल IUCN Cetacean Specialist Group द्वारा समर्थित है।

गंगा डॉल्फिन के बारे में:

गंगा नदी की डॉल्फिन, भारत का राष्ट्रीय जलीय जंतु है।

  • इसे IUCN रेड लिस्ट आकलन, भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम (1972) की अनुसूची I, वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्राय प्रजातियों (CITES) में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन के परिशिष्ट I के तहत ‘लुप्तप्राय’ के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
  • जिन प्रजातियों की वैश्विक जनसंख्या 4,000 आंकी गई है, वे ज्यादातर भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाती हैं।
  • गंगा नदी की डॉल्फ़िन केवल मीठे पानी में रह सकती है और अधिकांशतः अंधी होती है।

संकट:

डॉल्फ़िन, प्रायः गलती से उत्तरी भारत में नहरों में प्रवेश कर जाती हैं और ढाल के विपरीत तैरने में असमर्थ होती हैं। वे लोगों द्वारा नुकसान की चपेट में भी हैं।

 

BASIC देश

28 नवंबर, 2009 को चार देशों द्वारा हस्ताक्षरित एक समझौते के परिणामस्वरूप बेसिक समूह (BASIC group) का गठन किया गया था।

  • वे चार बड़े नव औद्योगीकृत देशों – ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन का एक गुट हैं।
  • इन चारों देशों द्वारा ‘कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मेलन’ में संयुक्त रूप से कार्य करने के लिए प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी थी, जिसके तहत, विकसित देशों द्वारा उनकी सामान्य न्यूनतम मांगों को पूरा नहीं किया एक संभावित संयुक्त वाक-आउट भी प्रस्तावित है।
  • इस उभरते हुए भू-राजनीतिक गठबंधन की शुरुआत और नेतृत्व चीन द्वारा किया गया था, बाद में पिछले कोपेनहेगन समझौते के दौरान ‘संयुक्त राज्य अमेरिका’ के साथ समझौता किया गया था।
  • यह समूह, उत्सर्जन में कटौती और जलवायु सहायता राशि पर एक सामूहिक स्थिति को परिभाषित करने के लिए कार्य कर रहा है, और इसके अलावा अन्य देशों को कोपेनहेगन समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहा है।

 


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