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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 30 October 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-I

1. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक

2. मनरेगा का खजाना खाली

3. न्यूमोकोकल 13-वैलेंट कंजुगेट वैक्सीन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. वर्ष 2020 में कृषि श्रमिक आत्महत्या में 18% की वृद्धि

2. डेटा संरक्षण विधेयक 2019

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. सूरत के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक परिवहन’ पुरस्कार

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

 भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक


संदर्भ:

हाल ही में, भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India – CAG) और ‘मालदीव’ के महालेखा परीक्षक (Auditor General of Maldives) ने लोक वित्त लेखा परीक्षा प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं।

इस समझौता ज्ञापन (MoU) का एक उद्देश्य दोनों देशों के मध्य ‘सार्वजनिक क्षेत्र के ऑडिट’ के क्षेत्र में सूचनाओं का आदान-प्रदान करना भी है।

CAG के बारे में:

  • भारत के संविधान के भाग V के अंतर्गत अध्याय V में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) के एक स्वतंत्र पद का प्रावधान किया गया है।
  • भारत के संविधान में CAG का उल्लेख अनुच्छेद 148 – 151 के तहत किया गया है।
  • यह भारतीय लेखा परीक्षण तथा लेखा विभाग के प्रमुख होते हैं।
  • यह लोक वित्त के संरक्षक तथा देश की संपूर्ण वित्तीय व्यवस्था के नियंत्रक होते हैं। इसका नियंत्रण राज्य एवं केंद्र दोनों स्तरों पर होता है।
  • इसका कर्तव्य भारत के संविधान एवं संसद की विधियों के तहत वित्तीय प्रशासन को बनाए रखना है।

संवैधानिक पद पर नियुक्ति एवं कार्यकाल:

  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति राष्ट्रपति के हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा की जाती है।
  • CAG का कार्यकाल 6 वर्ष अथवा 65 वर्ष की आयु, जो भी पहले हो, तक होता है।

 

कर्तव्य:

  1. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, भारत की संचित निधि, प्रत्येक राज्य की संचित निधि तथा प्रत्येक संघ शासित प्रदेश, जहाँ विधान सभा हो, से सभी व्यय संबंधी लेखाओं की लेखा परीक्षा करता है।
  2. वह भारत की संचित निधि और भारत के लोक लेखा सहित प्रत्येक राज्य की आकस्मिक निधि तथा लोक लेखा से सभी व्यय की लेखा परीक्षा करता है।
  3. वह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के किसी भी विभाग द्वारा सभी ट्रेडिंग, विनिर्माण, लाभ और हानि खातों, बैलेंस शीट और अन्य अनुषंगी लेखाओं की लेखा परीक्षा करता है।
  4. वह केंद्र और प्रत्येक राज्य द्वारा अनुदान प्राप्त सभी निकायों और प्राधिकरणों की प्राप्तियों और व्यय की लेखा परीक्षा करता है, इसके साथ ही संबध नियमों द्वारा आवश्यक होने पर सरकारी कंपनियों, अन्य निगमों एवं निकायों का भी लेखा परीक्षण करता है।
  5. वह किसी कर अथवा शुल्क की शुद्ध आगमों का निर्धारण एवं प्रमाणन करता है और इन मामलों में उसका प्रमाणपत्र अंतिम होता है।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) संसद की ‘लोक लेखा समिति’ (Public Accounts Committee– PAC) के मार्गदर्शक, मित्र और दार्शनिक के रूप में कार्य करते हैं।

प्रतिवेदन (रिपोर्ट):

  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, केंद्र और राज्य के खातों से संबंधित अपनी लेखा प्रतिवेदन राष्ट्रपति और राज्यपाल को सौंपते है, जिसे वे क्रमशः संसद और राज्य विधानमंडल के दोनों सदनों के समक्ष रखवाते हैं।
  • CAG राष्ट्रपति को तीन लेखा प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है: विनियोग लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट, वित्त लेखाओं पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट तथा सार्वजनिक उपक्रमों पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की स्वतंत्रता एवं सुरक्षा हेतु संवैधानिक प्रावधानों के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारत के संचित निधि तथा आकस्मिक निधि में अंतर।
  2. लोक लेखा समिति के बारे में
  3. CAG द्वारा राष्ट्रपति को सौंपी गई रिपोर्ट
  4. CAG की नियुक्ति किसके द्वारा की जाती है?
  5. CAG की नियुक्ति तथा पदत्याग

 

मेंस लिंक:

CAG संसद के प्रति वित्तीय प्रशासन के क्षेत्र में कार्यकारणी की जवाबदेही तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समझाइये। CAG की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक प्रावधानों को सूचीबद्ध कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।

मनरेगा का खजाना खाली


संदर्भ:

सरकार के अपने वित्तीय विवरण (financial statement) के अनुसार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (MGNREGA) योजना के लिए राशि, चालू वित्त वर्ष के बीच में ही समाप्त हो गयी है, और योजना को इस संकट से निकालने के लिए ‘अनुपूरक बजटीय आवंटन’ अगला संसदीय सत्र शुरू होने से पहले नहीं किया जा सकता। अगला संसदीय सत्र शुरू होने में अभी कम से कम एक महीने का समय है।

current affairs

 

निहितार्थ:

इसका मतलब यह है, कि मौजूदा परिस्थिति में यदि राज्यों द्वारा योजना के लिए राशि जारी नहीं की जाती है, तो मनरेगा श्रमिकों के भुगतान और प्रयुक्त सामग्री की लागत में देरी होगी।

कार्यकर्ताओं का कहना है, कि केंद्र सरकार आर्थिक संकट के समय मजदूरी भुगतान में देरी करके श्रमिकों को “जबरन श्रम” करने के हालात में धकेल रहा है।

केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया:

केंद्र सरकार द्वारा, अब कई राज्यों पर जमीन पर काम संबंधी मांग ‘कृत्रिम रूप से पैदा करने” का आरोप लगाया जा रहा है।

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) के बारे में:

  • मनरेगा (MGNREGA) को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में एक सामाजिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके अंतर्गत ‘काम करने के अधिकार’ (Right to Work) की गारंटी प्रदान की जाती है।
  • इस सामाजिक उपाय और श्रम कानून का मुख्य सिद्धांत यह है, कि स्थानीय सरकार को ग्रामीण भारत में न्यूनतम 100 दिनों का वैतनिक रोजगार प्रदान करना होगा ताकि ग्रामीण श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि की जा सके।

मनरेगा कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य:

  1. मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रत्येक परिवार के अकुशल श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिये न्यूनतम 100 दिन का वैतनिक रोजगार।
  2. ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को सशक्त करके सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना।
  3. कुओं, तालाबों, सड़कों और नहरों जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण करना।
  1. ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले शहरी प्रवासन को कम करना।
  2. अप्रशिक्षित ग्रामीण श्रम का उपयोग करके ग्रामीण अवसंरचना का निर्माण करना।

मनरेगा योजना के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु पात्रता मानदंड:

  1. मनरेगा योजना का लाभ लेने के लिए भारत का नागरिक होना चाहिए।
  2. कार्य हेतु आवेदन करने के लिए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष अथवा इससे अधिक होनी चाहिए।
  3. आवेदक के लिए किसी स्थानीय परिवार का हिस्सा होना चाहिए (अर्थात, आवेदन स्थानीय ग्राम पंचायत के माध्यम से किया जाना चाहिए)।
  4. आवेदक को स्वेच्छा से अकुशल श्रम के लिए तैयार होना चाहिए।

योजना का कार्यान्वयन:

  1. आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग होती है, उस दिन से आवेदक को वैतनिक रोजगार प्रदान किया जाएगा।
  2. रोजगार उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, आवेदन जमा करने के पंद्रह दिनों के भीतर या काम की मांग करने की तिथि से बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार होगा।
  3. मनरेगा के कार्यों का सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit) अनिवार्य है, जिससे कार्यक्रम में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
  4. मजदूरी की मांग करने हेतु अपनी आवाज उठाने और शिकायतें दर्ज कराने के लिए ‘ग्राम सभा’ इसका प्रमुख मंच है।
  5. मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों को मंजूरी देने और उनकी प्राथमिकता तय करने का दायित्व ‘ग्राम सभा’ और ‘ग्राम पंचायत’ का होता है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप वेतन-विभेद (WAGE RIFT) के बारे में जानते हैं? वेतन से संबंधित विषय के बारे में जानकारी हेतु पढ़िए

क्या आप जानते हैं कि योजना के अंतर्गत ‘जॉब कार्ड’ जारी करने के लिए ग्राम पंचायतें जिम्मेदार हैं?  ग्राम पंचायत की भूमिकाओं के बारे में जानने हेतु पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. मनरेगा के तहत ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, राज्यों, राज्य खाद्य आयोग, केंद्र की भूमिकाएँ क्या हैं?
  2. जॉब कार्ड क्या हैं, इन्हें कौन जारी करता है?
  3. ‘राज्य रोजगार गारंटी कोष’ की स्थापना कौन करता है?
  4. वैतनिक रोजगार क्या होता है?
  5. सामाजिक लेखा परीक्षण (सोशल ऑडिट) किसके द्वारा किया जाता है?

मेंस लिंक:

मनरेगा की प्रमुख विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय।

न्यूमोकोकल 13-वैलेंट कॉन्जुगेट वैक्सीन


संदर्भ:

स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ के एक भाग में रूप में ‘सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम’ (Universal Immunisation Programme – UIP) के तहत न्यूमोकोकल 13-वैलेंट कॉन्जुगेट वैक्सीन (Pneumococcal 13-valent Conjugate VaccinePCV) को राष्ट्रव्यापी स्तर पर उपलब्ध कराए जाने हेतु एक अभियान का शुभारंभ किया।

  • न्यूमोकोकल कॉन्जुगेट वैक्सीन (PCV) देश में पहली बार ‘सार्वभौमिक उपयोग’ के लिए उपलब्ध होगा।
  • PCV13, न्यूमोकोकल रोग पैदा करने वाले 13 प्रकार के जीवाणुओं से रक्षा करता है।

 

निमोनिया क्या है?

  • न्यूमोकोकस के कारण होने वाला निमोनिया बच्चों में गंभीर निमोनिया (Pneumonia) रोग का सबसे आम कारण है।
  • निमोनिया विश्व स्तर पर और भारत में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। भारत में लगभग 16 प्रतिशत बच्चों की मृत्यु निमोनिया के कारण होती है।

 

‘न्यूमोकोकल रोग’ क्या होते है?

न्यूमोकोकल बीमारियों (Pneumococcal disease) का तात्पर्य न्यूमोकोकल बैक्टीरिया के कारण होने वाली किसी भी बीमारी से होता है। यह बैक्टीरिया, निमोनिया (जोकि फेफड़ों का संक्रमण होता है) सहित कई तरह की बीमारियों का कारण बन सकता है। न्यूमोकोकल बैक्टीरिया, निमोनिया के सबसे आम कारणों में से एक है।

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम:

वर्ष 1985 में शुरू किया गया ‘सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम’ (UIP) सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों में से एक है, जिसमें सालाना करीब 2.67 करोड़ नवजात शिशुओं और 2.9 करोड़ गर्भवती महिलाओं को कवर किया जाता है।

  • ‘यूआईपी’ के तहत टीके से बचाव योग्य 12 बीमारियों के खिलाफ नि:शुल्क टीकाकरण प्रदान किया जा रहा है।
  • यह कार्यक्रम, राष्ट्रीय स्तर पर 10 बीमारियों- डिप्थीरिया, पर्टुसिस, टेटनस, पोलियो, खसरा, रूबेला, तपेदिक का गंभीर रूप, रोटावायरस डायरिया, हेपेटाइटिस बी और हीमोफिलस इन्फ्लुएंजा टाइप बी के कारण होने वाला मेनिनजाइटिस और निमोनिया- के खिलाफ टीकारकण चलाया जा रहा है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आपने ‘मिशन इंद्रधनुष’ (Mission Indradhanush) के बारे में सुना है? इसके उद्देश्य क्या हैं?

क्या आप जानते हैं, कि दिसंबर 2020 में, भारत का पहला पूरी तरह से स्वदेशी रूप से विकसित न्यूमोकोकल कंजुगेट वैक्सीन “न्यूमोसिल” (Pneumosil) लॉन्च किया गया था?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. निमोनिया- प्रकार, कारण और लक्षण
  2. एंटीजन बनाम एंटीबाडी।
  3. टीका कैसे काम करता है?
  4. टीकों के प्रकार।
  5. DGCI के बारे में।
  6. भारत में वैक्सीन की मंजूरी के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।

मेंस लिंक:

‘न्यूमोकोकल रोग’ क्या है? इससे जुड़ी चिंताएं क्या हैं? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: मुख्य फसलें- देश के विभिन्न भागों में फसलों का पैटर्न- सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणाली- कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, संबंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी।

वर्ष 2020 में कृषि श्रमिक आत्महत्या में 18% की वृद्धि


संदर्भ:

हाल ही में, ‘राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो’ (National Crime Records Bureau – NCRB) ने कृषि श्रमिकों (Agricultural Labourers) द्वारा की गयी आत्महत्याओं पर एक रिपोर्ट जारी की है।

रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु:

  1. वर्ष 2020 में आत्महत्या से मरने वाले ‘खेतिहर मजदूरों’ / कृषि श्रमिकों की संख्या पिछले वर्ष की तुलना में 18% अधिक थी।
  2. कुल मिलाकर, वर्ष 2020 में कृषि क्षेत्र में लगे 10,677 लोगों की आत्महत्या से मृत्यु हुई है।
  3. यद्यपि, महामारी के साल में भू-स्वामित्व रखने वाले किसानों की आत्महत्याओं में थोड़ी गिरावट आई है।
  4. भूमिहीन खेतिहर मजदूर, जिन्हें ‘पीएम किसान’ जैसी आय सहायता योजनाओं का लाभ नहीं मिला, उन्हें महामारी के दौरान उच्च स्तर के संकट का सामना करना पड़ रहा है।
  5. कृषि क्षेत्र में लगे व्यक्तियों द्वारा आत्महत्याओं के मामले में महाराष्ट्र की स्थिति, 4,006 आत्महत्याओं के साथ, सभी राज्यों की तुलना में सबसे ख़राब है। महाराष्ट्र में कृषि श्रमिकों की आत्महत्याओं में 15% की वृद्धि हुई है।
  6. इस मामले में खराब रिकॉर्ड वाले अन्य राज्यों में कर्नाटक (2016), आंध्र प्रदेश (889) और मध्य प्रदेश (735) शामिल हैं।
  7. वर्ष 2020 के दौरान कर्नाटक में कृषि श्रमिकों की आत्महत्याओं की संख्या में निराशाजनक रूप से 43 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई।

current affairs

 

 

कृषि क्षेत्र के सामने आने वाले मुद्दे:

कुछ प्रमुख कृषि उत्पादों के रिकॉर्ड उत्पादन और निर्यात में वृद्धि के बावजूद, भारत का कृषि क्षेत्र कुछ अंतर्निहित चुनौतियों, जैसेकि कम फसल उपज, मानसून पर निर्भरता, वैश्विक बाजारों में निर्यात का कम हिस्सा, कृषि मशीनीकरण में अंतराल, ऋण का बोझ और किसान आत्महत्या आदि का सामना कर रहा है। यह सब चुनौतियाँ, पहले से ही संघर्ष कर रहे कृषि उद्योग पर और भार डालती है, जिससे इसके विकास पर गंभीर असर पड़ता है।

किसानों की आत्महत्या के कारण:

किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण क्या हो सकते हैं, इस पर कोई मतैक्य नहीं है, लेकिन अध्ययनों से पता चलता है कि आत्महत्या करने वाले किसान, एक से अधिक कारणों की वजह से मौत को गले लगाते हैं। हालांकि, इसका मुख्य कारण ‘ऋण चुकाने में असमर्थता’ देखा गया है।

  1. किसानों की आत्महत्या के मुख्य कारण, दिवालियेपन/ऋणग्रस्तता, परिवारों में समस्याएं, फसल खराब होना, बीमारी और शराब/नशीले पदार्थों का दुरुपयोग आदि माने जाते हैं।
  2. कृषि-क्षेत्र में प्रच्छन्न बेरोजगारी की उच्च दर बनी हुई है। भूमि जोत के विखंडन होने से अधिकाँश किसानों के पास कम-आकार के कृषि-योग्य खेत बचे हैं, जिनसे लाभ होने की संभवना काफी कम होती है।
  3. ऋण, सिंचाई और प्रौद्योगिकी तक कम पहुंच, उनकी आरामदायक जीवनयापन करने की क्षमता को खराब करती है। देश में हर दसवां किसान भूमिहीन है।
  4. किसानों द्वारा खेती के लिए प्रायः किराए की भूमि का उपयोग किया जाता है, लेकिन भूमि-पट्टा तंत्र की अपर्याप्तता के कारण उनके लिए कृषि-उत्पादन बढ़ाना मुश्किल हो जाता है।
  5. सबसे ज्यादा आत्महत्याएं, कपास और गन्ना जैसी नकदी फसलों के क्षेत्रों में हुई है। इन फसलों के लिए ऊँची लागत की जरूरत होती है, लेकिन पैदावार एक जुआ (Gambling) की तरह होती है, जोकि ‘निरंतर और अनुकूल उच्च उपज’ के सिद्धांत पर आधारित नहीं है।

 

आगे की चुनौतियां:

  • भारत में सिंचाई की सुविधा कुल कृषि भूमि के आधे से भी कम क्षेत्र तक ही उपलब्ध है। इस तस्वीर में पिछले एक दशक से बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारे 60% से अधिक किसान, वर्षा की विसंगतियों के लिए अतिसंवेदनशील हैं।
  • वर्षा आधारित खेती की पैदावार, आमतौर पर सिंचित कृषि भूमि के आधे से भी कम होती है।
  • हालांकि, भारत ने उर्वरक उपयोग वैश्विक स्तर के बराबर होने लगा है, किंतु यह न तो फलोत्पदक है और न ही पर्यावरणीय रूप से संधारणीय है। और इससे खेती की लागत और बढ़ जाती है।
  • हरित क्रांति के दौरान शुरुआती दौर में पैदावार- प्रस्फोट होने के बाद अधिक उपज देने वाली फसलों पर अनुसंधान ठहर गया है, और किसानों को अपनी छोटी जोत भूमि से अधिक पैदावार के लिए पेटेंट बीजों का सहारा लेना पड़ता है।
  • eNAM जैसी पहल, किसानों की उपज को सीधे बाजार के साथ एकीकृत करने में मदद कर रही है, हालांकि, बिचौलियों की भूमिका में कटौती अभी भी काफी पीछे है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘स्वामीनाथन आयोग’ के बारे में जानते हैं? इसके उद्देश्य क्या थे? इसकी सिफारिशें क्या थीं? इस बारे में जानकारी के लिए पढ़िए

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संचार नेटवर्क के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को चुनौती, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों में मीडिया और सामाजिक नेटवर्किंग साइटों की भूमिका, साइबर सुरक्षा की बुनियादी बातें, धन-शोधन और इसे रोकना।

डेटा संरक्षण विधेयक 2019


संदर्भ:

हाल ही में, ‘भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण’ (Unique Identification Authority of India – UIDAI) द्वारा ‘निजी डेटा संरक्षण’ (Personal Data ProtectionPDP) कानून से छूट दिए जाने की मांग की गयी है।

कारण:

UIDAI के पदाधिकारियों का कहना है, कि प्राधिकरण पहले से ही ‘आधार अधिनियम’ (Aadhaar Act) द्वारा शासित है, और इसे दोहरे कानून के तहत नहीं लाया जा सकता है।

निजी डेटा संरक्षण (PDP) विधेयक 2019:

  • इस विधेयक की उत्पत्ति का स्रोत, न्यायमूर्ति बी.एन. श्री कृष्णा की अध्यक्षता में गठित एक विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट में देखा जा सकता है।
  • ‘निजता के अधिकार’ संबंधी मामले (जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ) में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सुनवाई के दौरान, सरकार द्वारा इस समिति का गठन किया गया था।

निजी डेटा संरक्षण विधेयक, 2019 में डेटा विनियमन:

विधेयक में तीन प्रकार की निजी जानकारी को शामिल किया गया हैं:

  1. गंभीर
  2. संवेदनशील
  3. सामान्य

 

अन्य प्रमुख प्रावधान:

  • डेटा स्वामी: विधेयक के अनुसार, डेटा स्वामी (Data principal) वह व्यक्ति है जिसका डेटा संग्रहीत और संसाधित किया जा रहा है।
  • सोशल मीडिया कंपनियां: जिन सोशल मीडिया कंपनियों को डेटा की मात्रा और संवेदनशीलता के साथ-साथ उनके कारोबार जैसे कारकों के आधार पर महत्वपूर्ण डेटा न्यासी माना जाता है, उन्हें अपना स्वयं का उपयोगकर्ता सत्यापन तंत्र विकसित करना होगा।
  • एक स्वतंत्र नियामक ‘डेटा प्रोटेक्शन एजेंसी’ (DPA) द्वारा आकलन और ऑडिट की देखरेख की जाएगी।
  • प्रत्येक कंपनी में एक डेटा संरक्षण अधिकारी (DPO) होगा, जो लेखा परीक्षा, शिकायत निवारण, रिकॉर्डिंग रखरखाव और अधिक के लिए DPA के साथ संपर्क करेगा।
  • विधेयक के अंतर्गत, व्यक्तियों को डेटा पोर्टेबिलिटी का अधिकार, और अपने स्वयं के डेटा तक पहुंचने और स्थानांतरित करने की अधिकार भी प्रदान किया गया है।
  • भुलाए जाने का अधिकार: इस अधिकार के तहत, किसी व्यक्ति को डेटा संग्रह और इसके प्रकाशित करने के संबंध में सहमति को हटाने की अनुमति दी गयी है।

 

अपवाद एवं छूट:

निजी डेटा संरक्षण (पीडीपी) विधेयक 2019 में, एक विवादास्पद धारा 35 शामिल है,  जिसके तहत “भारत की संप्रभुता और अखंडता,” “सार्वजनिक व्यवस्था”, “विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध” और “राज्य की सुरक्षा” संबंधी मामले का हवाला देकर केंद्र सरकार को सरकारी एजेंसियों के लिए इस अधिनियम के सभी या किसी भी प्रावधान को निलंबित करने की शक्ति प्रदान की गयी है।

विधेयक से संबंधित चिंताएं:

यह विधेयक दोधारी तलवार की तरह है। एक ओर यह विधेयक, भारतीयों को डेटा-स्वामित्व का अधिकार देकर उनके निजी डेटा की रक्षा करता है, वहीं दूसरी ओर, विधेयक में केंद्र सरकार को छूट दी गयी है, जोकि निजी डेटा को संसाधित करने के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

सरकार द्वारा, जरूरत पड़ने पर ‘डेटा-स्वामियों’ की स्पष्ट अनुमति के बगैर संवेदनशील निजी डेटा को भी संसाधित किया जा सकता है।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


सूरत के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ सार्वजनिक परिवहन’ पुरस्कार

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सूरत को बेहतरीन सार्वजनिक परिवहन के लिए लिए सम्मानित किया है।

यह पुरस्कार आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा प्रदान किया गया।

अन्य विजेता:

  • कोच्चि को सबसे संवहनीय परिवहन प्रणाली के लिए सम्मानित किया गया है।
  • दिल्ली को चांदनी चौक पुनर्विकास परियोजना के लिए सर्वश्रेष्ठ गैर-मोटर चालित परिवहन प्रणाली वाले शहर का पुरस्कार दिया गया है।
  • दिल्ली मेट्रो को ‘बेहतरीन यात्री सेवा और संतुष्टि’ के लिए सम्मानित किया गया।
  • इंदौर को सबसे अधिक नवोन्मेषी वित्तीय व्यवस्था अपनाने के लिए सम्मानित किया गया।

 

 

 


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