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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 29 October 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-I

1. साबरमती आश्रम का पुनरुद्धार

 

सामान्य अध्ययन-II

1. राज्यसभा सदस्यों को सदन में कदाचार के लिए दंड-प्रक्रिया

2. राजनीतिक दलों में आंतरिक चुनाव की मांग

3. ‘बाल कल्याण समितियों’ हेतु केंद्र द्वारा कड़े नियमों का प्रस्ताव

4. द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौता

5. ‘अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को प्रतिबंधो के माध्यम से प्रत्युत्तर अधिनियम‘

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. चीन द्वारा ताजिकिस्तान में सैन्य अड्डा का निर्माण

2. विश्व स्वर्ण परिषद

3. फेसबुक द्वारा अपनी मूल कंपनी का नाम परिवर्तन

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

साबरमती आश्रम का पुनरुद्धार


संदर्भ:

गुजरात सरकार द्वारा 1,200 करोड़ रुपये लागत से अहमदाबाद में साबरमती आश्रम को पुनर्विकसित करने की योजना पर कार्य किया जा रहा है। महात्मा गांधी के पड़पोते ‘तुषार गांधी’ ने इस योजना के खिलाफ गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया है।

परियोजना से संबद्ध विवाद:

पुनर्विकास योजना के तहत ‘साबरमती आश्रम’ के क्षेत्र में पांच से 55 एकड़ तक विस्तार किया जाना, और इस विस्तारित क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अन्यत्र स्थानों में बसाया जाना प्रस्तावित है।

  • तुषार गांधी का कहना है, कि यह योजना महात्मा गांधी की वैयक्तिक इच्छाओं के बिल्कुल विपरीत है।
  • इस परियोजना से स्वतंत्रता आंदोलन के मंदिर और स्मारक की महत्ता कम होगी और आश्रम को एक व्यावसायिक पर्यटक आकर्षण स्थल में बदल दिया जाएगा।

सरकार द्वारा अपने निर्णय के पक्ष में दिए जाने वाले तर्क:

  • गुजरात सरकार का कहना है, आश्रम परिसर में स्थित किसी भी इमारत में कोई बदलाव या परिवर्तन नहीं किया जाएगा। सभी धरोहर भवनों को गांधीवादी लोकाचार के अनुसार पुनःस्थापित / बहाल किया जाएगा।
  • सरकार का यह भी कहना है, कि आश्रम के पुनर्विकास प्रस्ताव का उद्देश्य ‘अधिग्रहण’ करना नहीं है, इसके क्षेत्र में विस्तार और न्यूनतम बुनियादी ढांचे का निर्माण करके इसका पुनर्विकास करना है।

‘साबरमती आश्रम’ के बारे में:

‘साबरमती आश्रम’ की स्थापना महात्मा गांधी द्वारा की गयी थी और वर्ष 1917 से 1930 तक यही उनका निवास स्थान रहा था।

  • इसी जगह से गांधी ने 12 मार्च 1930 को दांडी यात्रा का नेतृत्व किया था, जिसे ‘नमक सत्याग्रह’ के नाम से भी जाना जाता है।
  • शुरुआत में इसे ‘सत्याग्रह आश्रम’ कहा जाता था, जोकि महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए ‘सत्याग्रह’ / ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ आंदोलन को दर्शाता है। यह आश्रम, भारत को स्वतंत्र कराने वाली विचारधारा का घर बन गया था।

‘स्वतंत्रता संग्राम’ में इसकी भूमिका:

  • जीवन जीने की पद्धति, खेती, पशुपालन, गौ पालन, खादी और संबंधित रचनात्मक गतिविधियों की प्रयोग-भूमि: गांधी के लिए स्वतंत्रता का मतलब, केवल ब्रिटिश शासन से आजादी नहीं था, बल्कि सामाजिक बुराइयों से मुक्ति और सत्याग्रही जीवन-शैली जीने की स्वतंत्रता था। साबरमती में उन्होंने इस जीवन-शैली को विकसित किया था।
  • श्रम में गरिमा का विचार: आम जनता का उत्थान, स्वतंत्रता आंदोलन में अंतर्भूत था। ‘स्वच्छता अभियान’, एक नए भारत के गांधीवादी विचार का एक हिस्सा बन गया और गांधी जी एवं कस्तूरबा जी दोनों साबरमती आश्रम में स्वयं सफाई करते थे।
  • विद्यालय: आश्रम में रहते हुए, गांधी ने आत्मनिर्भरता संबंधी अपने प्रयासों को आगे बढ़ाने के लिए शारीरिक श्रम, कृषि और साक्षरता पर ध्यान केंद्रित एक विद्यालय की स्थापना की। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, ब्रिटिश स्कूलों के विकल्प के रूप में कई भारतीय स्कूल खोले गए।
  • दांडी मार्च: 12 मार्च 1930 को, साबरमती आश्रम से गांधी जी ने ब्रिटिश नमक कानून के विरोध में प्रसिद्ध दांडी मार्च (78 साथियों के साथ) शुरू किया।
  • नेताओं का घर: विनोबा भावे और मीराबेन जैसे स्वतंत्रता सेनानी यहां रहते थे।

वर्तमान में आश्रम की प्रासंगिकता:

  • साबरमती आश्रम, हमें आशावान और आशावादी होने की याद दिलाता है। यह बताता है कि, हमें अत्यधिक प्रतिकूल परिस्थितियों में भी महात्मा की परिकल्पना को विफल नहीं होने देना है। यह आश्रम गांधी की सच्ची स्मृति, उनके शुद्ध सत्य और उनके जीवन के तरीके के रूप में, उनकी अत्यंत विनम्रता का प्रतीक है।
  • यह आश्रम, आज भी एक ऐसे व्यक्ति के सत्य और नम्रता के आदर्शों का प्रतीक है जो कभी वहां रहा और राष्ट्र के लिए जिया और राष्ट्र के लिए मर गया। वह व्यक्ति जो चाहता था, कि भारत जैसे महान राष्ट्र द्वारा इन उच्च आदर्शों को हमेशा ऊंचा रखा जाए।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि दक्षिण अफ्रीका से लौटने पर भारत में महात्मा गांधी का पहला आश्रम 25 मई 1915 को अहमदाबाद के कोचराब इलाके में स्थापित किया गया था।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. साबरमती आश्रम के बारे में
  2. वर्तमान में इसकी प्रासंगिकता
  3. आश्रम से जुड़ी प्रमुख घटनाएं
  4. गांधी का आश्रम में निवास-काल

मेंस लिंक:

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में साबरमती आश्रम द्वारा निभाई गई भूमिका और इसके वर्तमान में महत्व पर टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

राज्यसभा सदस्यों को सदन में कदाचार के लिए दंड-प्रक्रिया


संदर्भ:

लगभग दो माह पूर्व, भारत सरकार के आठ मंत्रियों ने एक संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में, संसद के मानसून सत्र के आखिरी दिन विपक्ष द्वारा सुरक्षा अधिकारियों पर हमले का आरोप लगाया गया था। दो महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी किसी के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।

संबंधित प्रकरण:

11 अगस्त को, विवादास्पद बीमा विधेयक के पारित होने के दौरान, सदन में विपक्षी सदस्यों और सुरक्षा कर्मचारियों के बीच एक हाथापाई हुई थी। 22 विपक्षी दलों द्वारा इस विधेयक को आगे की संवीक्षा के लिए एक ‘प्रवर समिति’ को भेजने की मांग की जा रही थी।

  • अगले ही दिन, आठ मंत्रियों ने विपक्ष पर “सड़कों से संसद में अराजकता लाने” का आरोप लगाया।
  • राज्य सभा सचिवालय द्वारा पहले ही आंतरिक जांच पूरी कर ली गई है, और इसी तरह के मामलों में की गई कार्रवाई के उदाहरणों का अध्ययन किया जा चुका है।

सजा के लिए आधार:

सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से जारी रखने की शक्ति ‘सभापति’ / अध्यक्ष के पास होती है।

  • यदि किसी नियम का उल्लंघन किया जाता है, तो अध्यक्ष द्वारा अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जा सकती है।
  • लेकिन सदन के नियम, संसद को सदन में अव्यवस्था पैदा करने के लिए ‘संसद सदस्यों को निलंबित करने’ के अलावा अन्य कोई दंड देने का अधिकार नहीं देते हैं।

राज्यसभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालक विषयक नियमों का नियम 256:

‘नियम 256’ में सदन में कदाचार संबंधी कृत्यों को निर्दिष्ट किया गया है;

  • इसके तहत किसी सांसद को सभापति के अधिकार की उपेक्षा करने या जानबूझकर नियमों का उल्लंघन करने या सदन के कामकाज में बाधा डालने पर निलंबित किया जा सकता है।
  • हालांकि, किसी सांसद को निलंबित करने की शक्ति ‘सदन’ में निहित होती है, अध्यक्ष में नहीं। अध्यक्ष केवल ‘सदस्य’ का नाम लेता है, जबकि संसदीय कार्य मंत्री या कोई अन्य मंत्री संबंधित सदस्य को निलंबित करने के लिए सदन में प्रस्ताव पेश करता है।

राज्यसभा सांसद के निलंबन हेतु अपनाई जाने वाली प्रक्रिया:

  1. सभापति, सभापीठ के अधिकार की उपेक्षा करने या बार-बार और जानबूझकर बाधा डालकर राज्यसभा के कार्य में बाधा डालकर राज्यसभा के नियमों का दुरुपयोग करने वाले सदस्य का नाम ले सकता है।
  2. यदि सभापति द्वारा किसी सदस्य का इस तरह से नाम लिया जाए, तो वह प्रस्ताव पेश किया जाने पर तत्काल बिना किसी संशोधन, स्थगन या वाद-विवाद के, उस सदस्य को राज्यसभा की सेवा से मौजूदा सत्र की अवशिष्ट अवधि तक के लिए निलंबित करने का निदेश दे सकता है।
  3. परन्तु, राज्यसभा किसी भी समय, प्रस्ताव किए जाने पर निलंबन को समाप्त कर सकती है।

निलंबन की शर्तें:

  1. किसी सदस्य को अधिकतम, जारी सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित किया जा सकता है।
  2. निलंबित सदस्य, कक्ष में प्रवेश नहीं कर सकते और समितियों की बैठकों में भाग नहीं ले सकते।
  3. निलंबित सदस्य चर्चा करने या कुछ पेश करने हेतु नोटिस देने के पात्र नहीं होंगे।
  4. निलंबित सदस्य अपने प्रश्नों का उत्तर पाने का अधिकार खो देता है।

‘विशेष समिति’ की नियुक्ति:

  • इन तदर्थ समितियों (ad-hoc committees) की नियुक्ति सदन के बाहर सांसदों द्वारा किए गए गंभीर कदाचार की जांच के लिए ही की जाती हैं।
  • इनकी नियुक्ति आमतौर पर तब की जाती है, जब कदाचारके आरोप काफी गंभीर होते हैं और सदन द्वारा सदस्य को निष्कासित करने का निर्णय लिया जाता है।
  • सभा में पीठासीन अधिकारी की आंखों के सामने होने वाली घटनाओं की जांच के लिए किसी विशेष समिति की आवश्यकता नहीं होती है। सदन के नियमों के अनुसार, उन्हें तत्काल निपटाए जाने की जरूरत होती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप सांसदों के निलंबन के संबंध में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति की शक्तियों में अंतर के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सांसदों को निलंबित करने व निलंबन रद्द करने संबंधी शक्तियां।
  2. इस संबंध में लोकसभा और राज्यसभा की प्रक्रियाओं में अंतर।
  3. सांसदों के निर्वाचन के संबंध में अपील।
  4. इस संबंध में नियम।

मेंस लिंक:

सांसदों के अनियंत्रित व्यवहार का समाधान दीर्घकालिक और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप होना चाहिए। टिप्पणी कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

राजनीतिक दलों में आंतरिक चुनाव की मांग


संदर्भ:

दिल्ली उच्च न्यायालय ने, सभी राजनीतिक दलों में आंतरिक चुनाव कराए जाने के लिए एक मॉडल प्रक्रिया तैयार करने और अधिसूचित करने की मांग करने वाली एक याचिका पर ‘निर्वाचन आयोग’ से प्रतिक्रिया माँगी है।

उच्च न्यायालय ने यह आदेश उसके समक्ष दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किया है, इस याचिका में निर्वाचन आयोग से ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम’ की धारा 29-A के तहत पंजीकरण कराने के इच्छुक सभी राजनीतिक दलों के लिए आंतरिक चुनाव अनिवार्य किए जाने का आग्रह किया गया है।

राजनीतिक दलों में आंतरिक चुनाव की आवश्यकता:

वर्ष 1996 में ‘निर्वाचन आयोग’ द्वारा सभी मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय स्तर और राज्य स्तर के राजनीतिक दलों तथा पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त पार्टियों को एक पत्र जारी किया गया था, जिसमें इन राजनीतिक दलों द्वारा संगठनात्मक चुनावों से संबंधित विभिन्न प्रावधानों का पालन नहीं किए जाने का उल्लेख किया गया था और इनसे संगठनात्मक चुनावों से संबंधित अपने-अपने संविधान का ईमानदारी से पालन करने को कहा गया था।

इसके बावजूद, राजनीतिक दलों में आंतरिक चुनावों पर निर्वाचन आयोग द्वारा नियामक निरीक्षण का अभाव बना हुआ है।

वर्तमान चुनौतियां और चिंताएं:

  • अधिकांश पार्टियों के आंतरिक चुनाव “अक्सर राजनीतिक दल के भीतर स्थापित राजनीतिक परिवारों के लिए, पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के रूप में अपनी सत्ता बनाए रखने हेतु, एक ढकोसला या दिखावा मात्र होते हैं”।
  • राजनीतिक दलों में ‘पारदर्शिता’ और ‘आंतरिक लोकतंत्र’ की कमी, राजनीतिक दल के सत्ता में आने पर, प्रायः गैर-लोकतांत्रिक शासन मॉडल के समान परिलक्षित होती है।

पृष्ठभूमि:

देश में कुल 2,598 राजनीतिक दल पंजीकृत हैं, जिनके पास आयोग द्वारा प्रदान किए गए अपने अलग प्रतीक-चिह्न हैं।

इस कदम के निहितार्थ:

समय के हिसाब से यह याचिका काफी महत्वपूर्ण है। हाल ही में, कांग्रेस में राजस्थान और पंजाब के मामलों में आंतरिक उथल-पुथल को देखते हुए, और कोविद -19 महामारी के कारण आंतरिक चुनावों को स्थगित कर दिया गया है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

राजनीतिक दलों के पंजीकरण के बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. राजनीतिक दलों का पंजीकरण
  2. मान्यता प्राप्त बनाम गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल
  3. राज्य बनाम राष्ट्रीय दल
  4. मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के लिए लाभ
  5. स्टार प्रचारक कौन होते है?
  6. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324
  7. ‘लोक प्रतिनिधित्‍व अधिनियम’, 1951 की धारा 29ए

मेंस लिंक:

राजनीतिक दलों में आंतरिक चुनाव की आवश्यकता पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

‘बाल कल्याण समितियों’ हेतु केंद्र द्वारा कड़े नियमों का प्रस्ताव


संदर्भ:

महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने ‘किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) मॉडल नियम, 2016 में संशोधन के मसौदे पर सभी हितधारकों से टिप्पणियां/सुझाव आमंत्रित किए हैं।

सरकार ने यह कदम, संसद में ‘किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन विधेयक’, 2021 (Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Amendment Bill, 2021) पारित होने के बाद उठाया है।

प्रस्तावित संशोधनों के अनुसार:

  • निजी तौर पर या किसी संगठन के सदस्य के रूप में विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति ‘बाल कल्याण समितियों’ (Child Welfare Committees CWCs) की सदस्यता के लिए पात्र नहीं होंगे।
  • ‘केंद्रीय दत्तक ग्रहण एजेंसी’ ‘CARA’ को अनिवासी भारतीयों (NRI) और विदेशी भारतीय नागरिकों (OCI) द्वारा गोद लेने के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी करने की शक्ति प्रदान की गयी है।

किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2021 का अवलोकन:

  1. अधिनियम के तहत जिलाधिकारियों को ‘किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम के सुचारू कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के साथ-साथ संकट की स्थिति में बच्चों के पक्ष में समन्वित प्रयास करने के लिए और अधिक अधिकार दिए गए हैं।
  2. अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (ADM) सहित जिला मजिस्ट्रेट (ADM) जेजे अधिनियम के तहत, स्वतंत्र रूप से जिला बाल संरक्षण इकाइयों, बाल कल्याण समितियों, किशोर न्याय बोर्डों, विशेष किशोर पुलिस इकाइयों, बाल देखभाल संस्थानों आदि के कामकाज का मूल्यांकन करेंगे।
  3. जिलाधिकारी द्वारा ‘बाल कल्याण समितियों’ (Child Welfare Committees – CWC) के सदस्यों, जोकि आम तौर पर सामाजिक कल्याण कार्यकर्ता होते हैं, की शैक्षिक योग्यता सहित पृष्ठभूमि की जांच भी की जाएगी। वर्तमान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।
  4. विधेयक में, जिलाधिकारी से ‘बाल कल्याण समिति’ के सदस्यों की संभावित आपराधिक पृष्ठभूमि की भी जांच करने को कहा गया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नियुक्ति से पहले किसी भी सदस्य के खिलाफ बाल शोषण या बाल यौन शोषण संबंधी कोई मामला तों दर्ज नहीं था।
  5. ‘बाल कल्याण समितियों’ (Child Welfare Committees – CWC) के लिए संबंधित जिलों में उनकी कार्यक्रमों के बारे में जिलाधिकारी को नियमित रूप से रिपोर्ट करना होगा।
  6. नवीनतम संशोधनों के अनुसार, जिन अपराधों में अधिकतम सजा 7 वर्ष से अधिक कारावास है, लेकिन कोई न्यूनतम सजा निर्धारित नहीं की गई है या 7 वर्ष से कम की न्यूनतम सजा प्रदान की गई है, उन्हें इस अधिनियम के तहत गंभीर अपराध माना जाएगा।
  7. संशोधनों के अनुसार, गोद लेने के आदेश, अब अदालत के स्थान पर अब जिलाधिकारी (अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट समेत) द्वारा जारी किए जाएंगे।

बाल कल्याण समितियां:

किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (जेजे अधिनियम) की धारा 27(1) के अनुसार, राज्य सरकार द्वारा प्रत्येक जिले के लिए आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ‘बाल कल्याण समितियों’ (Child Welfare Committees – CWC) का गठन किया जाएगा।

देखरेख और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों के संबंध में इन समितियों का कार्य जेजे अधिनियम, 2015 (JJ Act, 2015) के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा।

समितियों की संरचना: ‘बाल कल्याण समिति’ में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य होंगे, जिन्हें राज्य सरकार द्वारा उपयुक्त व्यक्तियों को नियुक्त किया जाएगा। इन सदस्यों में न्यूनतम एक महिला और और एक बच्चों से संबंधित मामलों का विशेषज्ञ होगा।

पात्रता शर्तें: जेजे अधिनियम, 2015 के तहत बनाए गए किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) मॉडल नियम, 2016 के नियम के अनुसार, अध्यक्ष और सदस्यों की आयु पैंतीस वर्ष से अधिक होनी चाहिए। इसके अलावा, इनके पास शिक्षा, स्वास्थ्य, या कल्याण गतिविधियों के क्षेत्र में बच्चों के साथ काम करने का न्यूनतम सात वर्ष का अनुभव होना चाहिए, अथवा सदस्यों के लिए बाल मनोविज्ञान या मनोचिकित्सा या सामाजिक कार्य या समाजशास्त्र या मानव विकास या कानून के क्षेत्र में एक डिग्री युक्त पेशेवर, अथवा एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी होना चाहिए।

अधिनियम और नियमों के क्रियान्वयन की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्यों/संघ राज्य क्षेत्रों को सौंपी गयी है।

किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015:

  1. किशोर अपराध कानून और किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण अधिनियम) 2000 (Juvenile Delinquency Law and the Juvenile Justice (Care and Protection of Children Act) 2000) को प्रस्थापित करने हेतु ‘किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम’ (Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act) को वर्ष 2015 में संसद में पेश किया गया और पारित किया गया था।
  2. क़ानून के तहत, अपराधों का निर्धारण करने के दौरान, कानून का उल्लंघन करने वाले 16-18 वर्ष के आयु वर्ग वाले किशोरों पर वयस्कों के रूप में मुकद्दमा चलाने की अनुमति दी गयी थी।
  3. अपराध की प्रकृति, और किशोर पर नाबालिग या बच्चे के रूप में मुकदमा चलाए जाने के संबंध में निर्णय करने का अधिकार, ‘किशोर न्याय बोर्ड’ (Juvenile Justice Board) को दिया गया था।
  4. वर्ष 2012 में हुए दिल्ली गैंगरेप के बाद इस प्रावधान पर अधिक जोर दिया गया था। दिल्ली गैंगरेप मामले में एक आरोपी की उम्र 18 साल से कुछ कम थी और इसलिए उस पर एक ‘किशोर’ के रूप में मुकदमा चलाया गया।
  5. इसके अलावा, अधिनियम के तहत ‘केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण’ (Central Adoption Resource Authority- CARA) को वैधानिक निकाय का दर्जा दिया गया, जिससे यह प्राधिकरण अपने कार्यों को प्रभावी ढंग से करने में अधिक सक्षम हुआ।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप “बीजिंग रूल्स” (The Beijing Rules) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CARA के बारे में
  2. किशोर न्याय बोर्डों के बारे में
  3. किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में प्रावधान
  4. अधिनियम में नवीनतम प्रस्तावित संशोधन
  5. बाल कल्याण समितियों के बारे में

मेंस लिंक:

‘किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम’, 2015 के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौता


संदर्भ:

भारत और यूरोपीय संघ (European Union – EU), दिसंबर तक द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते (Bilateral Trade and Investment Agreement – BTIA) के लिए बातचीत फिर से शुरू करने के लिए तैयार हैं।

आगे की चुनौतियां:

  • यूरोप द्वारा भारत के “संरक्षणवादी रुख” (Protectionist Stance) समझे जाने के कारण, इस विषय पर अंतिम हल निकालने के लिए ‘वार्ताकार’ अभी भी “काफी दूर” हैं।
  • इसके अलावा, कोविड-19 संकट के दौरान ‘मेक इन इंडिया कार्यक्रम’ को तेज कर दिया गया है और भारत द्वारा ‘आत्मनिर्भर’ होने संबंधी हाल में की गई घोषणाओं ने इस स्थिति को तीव्र किया है।

भारत-यूरोपीय संघ व्यापार:

भारत तथा यूरोपीय संघ (EU) के मध्य व्यापार, EU के कुल वैश्विक व्यापार का मात्र 3% है, जो कि दोनों पक्षों के मध्य संबंधो को देखते हुए काफी कम है।

इसके विपरीत, EU भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार तथा निवेशक है। भारत के कुल वैश्विक व्यापार का 11% यूरोपीय संघ (EU) के साथ होता है।

BTIA के बारे में:

जून 2007 में, भारत और यूरोपीय संघ द्वारा ब्रुसेल्स, बेल्जियम में एक ‘वैविध्यपूर्ण द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते’ (Broad-Based Bilateral Trade and Investment Agreement- BTIA) पर वार्ता का आरम्भ किया गया।

ये वार्ता, 13 अक्टूबर, 2006 में हेलसिंकी में आयोजित सातवें भारत यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में राजनेताओं द्वारा, भारत-यूरोपीय संघ उच्च स्तरीय तकनीकी समूह की रिपोर्ट के आधार पर एक ‘वैविध्यपूर्ण द्विपक्षीय व्यापार और निवेश समझौते’ पर विचार करने हेतु घोषित प्रतिबद्धताओं के अनुरूप थी।

महत्व:

भारत तथा यूरोपीय संघ, वस्तु तथा सेवाओं के व्यापार में आने वाली बाधाओं को दूर करके परस्पर द्विपक्षीय व्यापार, तथा अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने की अपेक्षा रखते हैं।

दोनों पक्षों का मानना है कि, WTO के नियमों और सिद्धांतों के अनुरूप, एक व्यापक और महत्वाकांक्षी समझौता, भारतीय और यूरोपीय संघ के व्यवसायों के लिए नए बाजार खोलेगा तथा अवसरों का विस्तार करेगा।

वर्तमान मामला:

  • यूरोपीय संघ द्वारा कुछ मांगों, जैसे ऑटोमोबाइल क्षेत्र, वाइन तथा स्पिरट्स, के लिए अधिक बाजार पहुँच, और बैंकिंग, बीमा तथा ई-कॉमर्स जैसे वित्तीय सेवा क्षेत्र के विस्तार आदि के मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाने के कारण आगे की वार्ताएं वर्ष 2013 से शिथिल पड़ी हुई हैं।
  • यूरोपीय संघ, श्रम, पर्यावरण और सरकारी खरीद को भी वार्ता-प्रक्रिया में सम्मिलित करना चाहता है।
  • भारत, आसान कार्य-वीजा तथा स्टडी वीज़ा मानकों के साथ-साथ सुरक्षित डेटा स्टेटस की मांग कर रहा है, जिससे जिससे यूरोपीय कंपनियां अपने व्यापार को आसानी पूर्वक भारत से आउटसोर्स कर सकेंगी। भारत की इन मांगों पर यूरोपीय संघ द्वारा उत्साहपूर्वक प्रतिक्रिया नहीं दी गयी।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. BTIA – अवलोकन
  2. Brexit क्या है?
  3. यूरोपीय संघ बनाम यूरोज़ोन

निम्नलिखित का संक्षिप्त विवरण:

  1. दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार समझौता (SAFTA)
  2. भारत-आसियान व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (CECA)
  3. भारत-कोरिया व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता (CEPA)

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को प्रतिबंधो के माध्यम से प्रत्युत्तर अधिनियम‘ (CAATSA)


संदर्भ:

अमेरिका में प्रमुख सांसदों द्वारा, रूस से एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली की खरीद पर भारत के लिए प्रतिबंधों में छूट दिए जाने के पक्ष में, अपना समर्थन दिया जाना जारी है।

संबंधित प्रकरण:

भारत के लिए, एस-400 की डिलीवरी संभवतः नवंबर में शुरू हो सकती है, जिससे वर्ष 2017 में निर्मित कानून ‘अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को प्रतिबंधो के माध्यम से प्रत्युत्तर अधिनियम‘ (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act – CAATSA) के तहत भारत पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

CAATSA क्या है?

  • ‘अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को प्रतिबंधो के माध्यम से प्रत्युत्तर अधिनियम’ (Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act- CAATSA) का प्रमुख उद्देश्य दंडात्मक उपायों के माध्यम से ईरान, उत्तर कोरिया और रूस को प्रत्युत्तर देना है।
  • 2017 में अधिनियमित किया गया था।
  • यह अधिनियम मुख्य रूप से, यूक्रेन में रूसी सैन्य हस्तक्षेप और 2016 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में कथित रूसी छेड़छाड़ की पृष्ठभूमि में रूसी हितों, जैसे कि, इसके तेल और गैस उद्योग, रक्षा और सुरक्षा क्षेत्र, और वित्तीय संस्थानों पर प्रतिबंध लगाने से संबंधित है।

current affairs

 

अमेरिका द्वारा CAATSA जैसे कानून को लागू करने का कारण:

  • संयुक्त राज्य अमेरिका में हुए चुनावों के बाद चुनावों में तथाकथित रूसी हस्तक्षेप, जिसे कुछ अमेरिकियों द्वारा मिलीभगत भी कहा गया था, का आरोप लगाया गया था। इसके बाद वाशिंगटन और मॉस्को के बीच तनाव एक नए स्तर पर पहुंच गया।
  • विश्व भर में मॉस्को की कार्रवाइयों से नाराज, अमेरिकी कानूनविदों द्वारा रूस को इसके संवेदनशील जगहों, जैसे कि रक्षा और ऊर्जा व्यवसाय, पर चोट पहुचाने के उद्देश्य से CAATSA क़ानून पारित किया गया था।

लगाये जाने वाले प्रतिबंध:

  1. अभिहित व्यक्ति (sanctioned person) के लिए ऋणों पर प्रतिबंध।
  2. अभिहित व्यक्तियों को निर्यात करने हेतु ‘निर्यात-आयात बैंक’ सहायता का निषेध।
  3. संयुक्त राज्य सरकार द्वारा अभिहित व्यक्ति से वस्तुओं या सेवाओं की खरीद पर प्रतिबंध।
  4. अभिहित व्यक्ति के नजदीकी लोगों को वीजा से मनाही।

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S-400 वायु रक्षा प्रणाली एवं भारत के लिए इसकी आवश्यकता:

  • S-400 ट्रायम्फ (Triumf) रूस द्वारा डिज़ाइन की गयी एक मोबाइल, सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली (surface-to-air missile system- SAM) है।
  • यह विश्व में सबसे खतरनाक, आधुनिक एवं परिचालन हेतु तैनात की जाने वाली लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली SAM (MLR SAM) है, जिसे अमेरिका द्वारा विकसित,टर्मिनल हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस’ (Terminal High Altitude Area Defence THAAD) से काफी उन्नत माना जाता है।
  • भारत के लिए दो मोर्चों पर लड़ाई के लिए S-400 ट्रायम्फ और अत्याधुनिक F-35 अमेरिकी लड़ाकू विमान हासिल करना बहुत महत्वपूर्ण है।

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इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप ‘मूलभूत समझौतों’ (Foundational Agreements) के बारे में जानते हैं? ये तीन मूलभूत समझौते कौन से हैं।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. CAATSA किससे संबंधित है?
  2. CAATSA के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियां।
  3. लगाये जाने वाले प्रतिबंधों के प्रकार।
  4. भारत और रूस के बीच महत्वपूर्ण रक्षा सौदे।
  5. ईरान परमाणु समझौते का अवलोकन।

मेंस लिंक:

CAATSA की विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


चीन द्वारा ताजिकिस्तान में सैन्य अड्डा का निर्माण

चीन द्वारा अफगान सीमा के पास स्थित ताजिकिस्तान में एक सैन्य अड्डे का पूर्ण नियंत्रण लिया जाएगा। चीन इस सैन्य अड्डे का चुपचाप संचालन कर रहा है। इसके अलावा, चीन द्वारा ताजिकिस्तान सरकार के लिए एक नया बेस भी बनाया जाएगा।

  • इस नए बेस पर ताजिकिस्तान के रैपिड रिएक्शन ग्रुप या विशेष बलों का स्वामित्व होगा, और 10 मिलियन की लागत से चीन द्वारा वित्तपोषित किया जाएगा।
  • यह बेस पूर्वी गोर्नो-बदख्शां (Eastern Gorno-Badakhshan) स्वायत्त प्रांत में पामीर पहाड़ों के समीप स्थित होगा, और उस पर चीनी सैनिक तैनात नहीं होंगे।
  • रूस और भारत, उन देशों में शामिल हैं जिनकी पहले से ही ताजिकिस्तान में सैन्य उपस्थिति है।
  • इस बेस का एक बार पूर्ण नियंत्रण स्थानांतरित हो जाने के बाद, ‘हॉर्न ऑफ अफ्रीका’ के पास जिबूती के बाद, केवल दूसरा ज्ञात विदेशी चीनी सुरक्षा सुविधा बन जाएगा।

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विश्व स्वर्ण परिषद

  • यह, स्वर्ण उद्योग के लिए बाजार विकास संगठन है।
  • यह सोने के खनन से लेकर निवेश तक उद्योग के सभी हिस्सों में काम करता है, और उनका उद्देश्य सोने की मांग को प्रोत्साहित करना और उसे बनाए रखना है।
  • यह एक ऐसा संघ है जिसके सदस्यों में दुनिया की अग्रणी स्वर्ण खनन कंपनियां शामिल हैं।
  • यह अपने सदस्यों को एक जिम्मेदार तरीके से सहयोग करने में मदद करता है और संघर्ष-मुक्त स्वर्ण मानक विकसित करता है।
  • इसका मुख्यालय यूनाइटेड किंगडम में स्थित है, तथा भारत, चीन, सिंगापुर, जापान और संयुक्त राज्य अमेरिका में इसके कार्यालय हैं।

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फेसबुक द्वारा अपनी मूल कंपनी का नाम परिवर्तन

फेसबुक द्वारा अपने अशांत सोशल नेटवर्क को भविष्य में अलग दिखने के लिए ‘मूल कंपनी’ का नाम बदलकर “मेटा” (META) किया जा रहा है।

इस रीब्रांडिंग के तहत फेसबुक, इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप अपने नाम बनाए रखेंगे।

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