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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 21 October 2021

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-I

1. बौद्ध तीर्थ नगरी – कुशीनगर

2. ‘माउंट हैरियट’ का नाम परिवर्तन

 

सामान्य अध्ययन-II

1. सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन

2. गोवा में भूमिपुत्र विधेयक

3. अमेरिका, भारत, इज़राइल और यूएई का एक ‘नया क्वाड’

 

सामान्य अध्ययन-III

1. जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप।

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. नेब्रा स्काई डिस्क

2. अर्थशॉट पुरस्कार

3. भास्करबडा

 


सामान्य अध्ययन- I


 

विषय: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू शामिल होंगे।

बौद्ध तीर्थ नगरी – कुशीनगर


संदर्भ:

हाल ही में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे’ का उद्घाटन किया गया।

पूर्वी उत्तर प्रदेश का यह हवाईअड्डा, कुछ समय पश्चात चुनाव होने वाले प्रदेश में तीसरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है और यह मुख्य रूप से ‘बौद्ध पर्यटन सर्किट’ के लिए अपनी सेवाएं पर्दान करेगा।

इस हवाईअड्डे पर, सबसे पहले श्रीलंकाई एयरलाइंस का एक वायुयान उतरा, इस उड़ान से ‘भिक्षुओं और अन्य गणमान्य व्यक्ति ‘कुशीनगर’ पहुंचे थे।

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कुशीनगर का ऐतिहासिक महत्व:

  • कुशीनगर को सभी बौद्ध तीर्थ स्थलों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, इसी स्थान पर महात्मा बुद्ध ने 483 ई.पू. महापरिनिर्वाण (परम मोक्ष) प्राप्त किया था।
  • वर्तमान कुशीनगर की पहचान प्राचीन मल्ल गणराज्य की राजधानी ‘कुशीनारा’ के रूप में की जाती है। ईसा पूर्व छठी-चौथी शताब्दी में ‘मल्ल गणराज्य’ तत्कालीन 16 महाजनपदों में से एक था।
  • इस क्षेत्र पर मौर्य, शुंग, कुषाण, गुप्त, हर्षवर्धन और पाल शासकों ने भी शासन किया।
  • ‘अलेक्जेंडर कनिंघम’ और ‘ए सी एल कार्लली’ (ACL Carlleyle) द्वारा ‘कुशीनगर’ में पहली बार उत्खनन किया गया, जिसमे उन्होंने वर्ष 1876 में एक ‘मुख्य स्तूप’ और बुद्ध की लेटी हुई 6 मीटर लंबी प्रतिमा का पता लगाया था।
  • कुशीनगर, भारत के उन गिने-चुने स्थानों में से है जहां बुद्ध को लेटे हुए रूप में चित्रित किया गया है।

सरकार के इस कदम का महत्व:

  • हालांकि बौद्ध धर्म की उत्पत्ति भारत में हुई और आठ प्रमुख बौद्ध तीर्थ स्थलों में से सात तीर्थ स्थलो भारत में हैं, फिर भी हमारे देश में विश्व में कुल बौद्ध तीर्थयात्रियों का एक प्रतिशत भी नहीं आ पाता है।
  • सरकार को इस बात की जानकारी है कि कम संख्या में पर्यटक आने का प्रमुख कारण बुनियादी ढांचे का अभाव है, और इसी वजह से पर्यटन के क्षेत्र में भारत, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे दक्षिण पूर्व एशियाई देशों से पीछे रह जाता है।
  • यह उम्मीद की जाती है कि इस तरह की ‘विश्व स्तरीय सुविधाएं’, बौद्ध पर्यटकों को भारत आने के लिए आकर्षित करने में सफल होंगी, और इससे राजस्व तथा रोजगार सृजन में भी वृद्धि होगी।

इसलिए, सरकार का यह नवीनतम कदम देश में महत्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थलों को प्रोत्साहन देने में सहायक होगा।

‘बौद्ध परिपथ’ के बारे में:

केंद्र सरकार द्वारा ‘बौद्ध परिपथ’ / ‘बौद्ध सर्किट’ परियोजना की घोषणा वर्ष 2016 में की गयी थी। तब से लेकर अब तक विभिन्न योजनाओं के तहत, इस परियोजना के लिए 343 करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की जा चुकी है।

‘बौद्ध परिपथ’, बुद्ध के जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण स्थानों को आपस में जोड़ने वाला एक मार्ग है। मंत्रालय के मानचित्र में, बौद्ध सर्किट में, बिहार के बोधगया, वैशाली और राजगीर, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर, सारनाथ और श्रावस्ती और नेपाल के लुंबिनी को शामिल किया गया है।

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इंस्टा जिज्ञासु:

भगवान् बुद्ध के जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण स्थानों के बारे में जानिए।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. कुशीनगर के बारे में
  2. बौद्ध सर्किट
  3. भारत और दुनिया में बौद्ध तीर्थ स्थल।
  4. लेटे हुए बुद्ध

मेंस लिंक:

बौद्ध सर्किट के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।

‘माउंट हैरियट’ का नाम परिवर्तन


संदर्भ:

हाल ही में, केंद्र सरकार द्वारा ‘अंडमान और निकोबार द्वीप समूह’ के ऐतिहासिक पर्यटन स्थल ‘माउंट हैरियट’ (Mount Harriet) का नाम बदलकर ‘माउंट मणिपुर’  (Mount Manipur) कर दिया गया है।

‘मणिपुर’ और ‘माउंट हैरियट’ का क्या संबंध है?

1891 के एंग्लो-मणिपुर युद्ध में महाराजा कुलचंद्र ध्वज सिंह सहित मणिपुर के कई लोगों ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी थी। इस युद्ध के बाद इन सभी को सजा के तौर पर अंडमान निकोबार के सेलुलुर जेल (कालापानी) भेजा गया था।

लेकिन, उस समय तक इस जेल का निर्माण पूरा नहीं हुआ था, इस कारण से कैदियों को ‘माउंट हैरियट’ पर रखा गया था। ‘माउंट हैरियट’ दक्षिण अंडमान जिले की फेरगुंज तहसील में स्थित एक पहाड़ी है।

1891 का आंग्ल-मणिपुर युद्ध- कारण:

‘आंग्ल-मणिपुर युद्ध’ (Anglo-Manipur War) को मणिपुर के इतिहास में एक विशिष्ट युग माना जाता है। यह युद्ध वर्ष  1891 में ‘मणिपुर राज्य’ और अंग्रेजों के बीच एक महीने से अधिक समय तक जारी रहा।

  • इस युद्ध की शुरुआत, मणिपुर के राजमहल में तख्तापलट से शुरू हुई थीऔर जिसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने हमला कर दिया था। राजमहल में वर्षों से चली आ रही आंतरिक गुटबाजी के चलते 1891 में युद्ध की नौबत आ गयी।
  • और इसमें, ब्रिटिश सरकार ने शाही परिवार के राजकुमारों के बीच “आंतरिक कलह” का फायदा उठाया।
  • युद्ध के पहले चरण में अंग्रेजों को आत्मसमर्पण करना पड़ा था लेकिन दूसरे चरण में अंग्रेजों ने तीन ओर से इंफाल के कांगला किले पर हमला कर मणिपुर को अपना नया रियासत बना लिया था।

इस युद्ध का महत्व:

कई लोग इस लड़ाई को “ब्रिटिश प्रतिष्ठा के लिए आघात” के रूप में वर्णित करते हैं। युद्ध में अंग्रेजों की जीत हुई थी, लेकिन इसमें उनके पांच महत्वपूर्ण अधिकारी मारे गए थे।

  • भारत में, इस युद्ध को सन 1857 के विद्रोह के तुरंत बाद, ब्रिटिश शासन के खिलाफ होने वाले आम विद्रोहों का एक हिस्सा माना जाता है।
  • इस युद्ध के बाद ‘मणिपुर’, ब्रिटिश ताज के अप्रत्यक्ष शासन के अधीन आधिकारिक तौर पर एक ‘रियासत’ बन गया।

‘माउंट हैरियट’ के बारे में:

  • ‘माउंट हैरियट’ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की तीसरी सबसे ऊंची चोटी है। ब्रिटिश राज के दौरान यह चीफ कमिशनर की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी।
  • ऐसा माना जाता है कि इसका नाम ब्रिटिश कलाकार और फोटोग्राफर, हैरियट क्रिस्टीना टाइटलर के नाम पर रखा गया था, जो ब्रिटिश भारतीय सेना में सेवा करने वाले एक सैनिक रॉबर्ट क्रिस्टोफर टाइटलर की पत्नी थीं।

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प्रीलिम्स लिंक:

  1. माउंट हैरियट के बारे में
  2. आंग्ल-मणिपुर युद्ध
  3. कारण
  4. परिणाम

मेंस लिंक:

आंग्ल-मणिपुर युद्ध के महत्व के बारे में चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व।

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का निर्वाचन


हाल ही में, हरदोई से विधायक नितिन अग्रवाल को उत्तर प्रदेश विधानसभा का उपाध्यक्ष (Deputy Speaker) का चुना गया है। विदित हो कि, उत्तर प्रदेश में वर्तमान विधानसभा के कार्यकाल में मुश्किल से पांच महीने बचे हैं।

सदन के अध्यक्ष एव उपाध्यक्ष पद हेतु निर्वाचन प्रक्रिया:

संविधान के अनुच्छेद 93 में लोकसभा और अनुच्छेद 178 में राज्य विधानसभाओं के संदर्भ में किए गए प्रावधानों के अनुसार, “सदन, यथाशीघ्र अपने दो सदस्यों को अपने अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनेंगे।

  • लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में, अध्यक्ष (Speaker) का चुनाव करने हेतु राष्ट्रपति / राज्यपाल द्वारा एक तिथि निर्धारित की जाती है, इसके पश्चात निर्वाचित अध्यक्ष, उपाध्यक्ष का चुनाव करने हेतु तारीख तय करता है।
  • संबंधित सदनों के सांसद / विधायक, इन पदों पर सदन के सदस्यों में से किसी एक का निर्वाचन करने हेतु मतदान करते हैं।

क्या संविधान के अनुसार सदन में ‘डिप्टी स्पीकर’ का होना अनिवार्य है?

संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, अनुच्छेद 93 और अनुच्छेद 178 दोनों में “होगा” (Shall) तथा “जितनी जल्दी हो सके” (as soon as may be) शब्दों का उपयोग किया गया है, जोकि यह दर्शाता है कि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव न केवल अनिवार्य है, बल्कि इसे जल्द से जल्द कराया जाना चाहिए।

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की भूमिकाएं और कार्य:

  1. अध्यक्ष, “सदन का प्रमुख प्रवक्ता होता है, और सदन का सामूहिक रूप से प्रतिनिधित्व करता है। वह शेष विश्व के लिए सदन का एकमात्र प्रतिनिधि होता है”।
  2. अध्यक्ष, सदन की कार्यवाही और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठकों की अध्यक्षता करता है।
  3. अध्यक्ष, किसी विधेयक के, ‘धन विधेयक’ होने अथवा न होने संबंधी और इसके ‘धन विधेयक’ होने पर दूसरे सदन के अधिकार-क्षेत्र से बाहर होने संबंधी निर्णय करता है।
  4. आमतौर पर, अध्यक्ष को सत्ताधारी दल से चुना जाता है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों के दौरान, लोकसभा उपाध्यक्ष के मामले में यह स्थिति भिन्न रही है।
  5. संविधान में ‘लोकसभा अध्यक्ष’ की स्वतंत्रता व निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु, इसका वेतन ‘भारत की संचित निधि’ पर भारित किया गया है, और इस पर संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है।
  6. किसी विधेयक पर बहस या सामान्य चर्चा के दौरान संसद सदस्यों द्वारा केवल ‘अध्यक्ष’ को ही संबोधित किया जाता है।

कार्यकाल एवं पदत्याग:

अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष, एक बार निर्वाचित होने के बाद सदन के जीवनपर्यंत पद पर बने रहते हैं। अनुच्छेद 94 (राज्य विधानसभाओं के लिए अनुच्छेद 179) के तहत, ये निम्नलिखित तीन स्थितियों द्वारा अपना पद त्याग सकते है:

  1. उनके सदन के सदस्य न रहने पर;
  2. अध्यक्ष या उपाध्यक्ष परस्पर एक दूसरे को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित त्यागपत्र द्वारा;
  3. सदन के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा पद से हटाये जाने पर। किंतु, इस प्रस्ताव को पारित करने से पूर्व उसे 14 दिन पहले सूचना देना अनिवार्य होता है।

 

डिप्टी स्पीकर की शक्तियां:

सदन की बैठक की अध्यक्षता करते समय ‘उपाध्यक्ष’ के पास ‘अध्यक्ष’ के समान शक्तियां होती हैं। सदन के अध्यक्षता करने दौरान ‘कार्य-प्रक्रिया नियमों’ में ‘अध्यक्ष’ के सभी संदर्भों को ‘उपाध्यक्ष’ के ‘अध्यक्ष’ के रूप में माना जाता है।

चुनाव कराने हेतु समय-सीमा निर्दिष्ट करने वाले राज्य:

संविधान में ‘सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष’ हेतु चुनावों के लिए कोई प्रक्रिया या समय सीमा निर्धारित नहीं की गयी है। इन पदों पर चुनाव आयोजित करने संबंधी निर्णय लेने का दायित्व विधायिकाओं पर छोड़ दिया गया है।

उदाहरण के लिए, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों में ‘अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष’ पदों के निर्वाचन हेतु एक समय-सीमा निर्दिष्ट की गयी है।

हरियाणा:

  1. हरियाणा में विधानसभा अध्यक्ष का चुनाव, आम चुनाव संपन्न के पश्चात शीघ्रातिशीघ्र किया जाता है। और फिर, इसके सात दिनों के भीतर उपाध्यक्ष का चुनाव किया जाता है।
  2. निर्धारित नियमों के अनुसार, इन पदों में से कोई पद रिक्त होने पर, विधायिका के अगले सत्र में पहले सात दिनों के भीतर इसके लिए चुनाव किया जाना चाहिए।

उत्तर प्रदेश:

  1. विधानसभा की अवधि के दौरान यदि किसी कारणवश ‘अध्यक्ष’ का पद रिक्त हो जाता है, तो इस पद के हेतु, पद-रिक्त होने की तिथि से 15 दिन के भीतर चुनाव करने हेतु समय सीमा निर्धारित की गई है।
  2. ‘उपाध्यक्ष’ पद के मामले में, पहली बार चुनाव की तारीख ‘अध्यक्ष’ द्वारा तय की जाती है, और इसके बाद में हुई की रिक्तियों को भरने हेतु चुनाव के लिए 30 दिन का समय दिया जाता है।

लोकसभा अध्यक्ष की भूमिकाओं और कार्यों के बारे में अधिक जानने हेतु देखें

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या डिप्टी स्पीकर होने से किसी सांसद या विधायक को अयोग्यता के कानून से बचाया जा सकता है? संदर्भ: इसे पढ़ें।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के पद से संबंधित संवैधानिक प्रावधान
  2. निर्वाचन
  3. भूमिका और कार्य
  4. शक्तियां
  5. कार्यकाल और पदत्याग
  6. समितियों से सम्बद्ध

मेंस लिंक:

सदन के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष की भूमिकाओं और कार्यों पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।

गोवा में भूमिपुत्र विधेयक


संदर्भ:

हाल ही में, गोवा के मुख्यमंत्री ने स्पष्ट करते हुए कहा है, कि ‘भूमिपुत्र विधेयक’ (Bhumiputra Bill) राज्यपाल को नहीं भेजा जाएगा।

संबंधित प्रकरण:

गोवा विधानसभा द्वारा 30 जुलाई को ‘गोवा भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक, 2021’ (Goa Bhumiputra Adhikarini Bill, 2021) पारित किया गया था, तब से यह विधेयक राजनीतिक हंगामों का केंद्र बना हुआ है।

  • इस विधेयक का उद्देश्य, न्यूनतम 30 वर्षों से गोवा में रहने वाले व्यक्ति को ‘भूमिपुत्र’ का दर्जा देना और लोगों को 1 अप्रैल 2019 से पहले 250 वर्ग मीटर तक में क्षेत्रफल में निर्मित अपने घर पर ‘स्वामित्व’ का दावा करने की अनुमति देना था।
  • हालांकि ऐसा होने पर भी, कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस विधेयक से राज्य की आदिवासी आबादी की भावनाओं को ठेस पहुंची है।

विधेयक के प्रमुख बिंदु:

  1. विधेयक में, 30 साल या उससे अधिक समय से राज्य में रहने वाले किसी भी व्यक्ति को ‘भूमिपुत्र (मिट्टी का पुत्र)’ के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है।
  2. इसके तहत, यदि किसी व्यक्ति का अपने ‘छोटे आवास’ पर मालिकाना हक़ अब तक अनिश्चित था, तो उसे अपने आवास पर मालिकाना हक़ देने का प्रावधान किया गया है।
  3. एक बार ‘भूमिपुत्र’ (Bhumiputra) के रूप में मान्यता प्राप्त होने के बाद, कोई व्यक्ति 1 अप्रैल, 2019 से पहले निर्मित 250 वर्ग मीटर तक क्षेत्रफल वाले अपने घर पर ‘स्वामित्व’ का दावा कर सकता है।

कार्यान्वयन:

  1. विधेयक में ‘भूमिपुत्र अधिकारिणी’ नामक एक समिति के गठन का प्रावधान किया गया है। इस समिति की अध्यक्षता उप-जिलाधिकारी द्वारा की जाएगी और ‘टाउन एंड कंट्री प्लानिंग’, ‘वन और पर्यावरण विभागों’ के अधिकारी और संबंधित तालुकों के मामलातदार (Mamlatdars) समिति के सदस्य के रूप में शामिल होंगे।
  2. कोई भी भूमिपुत्र – यदि उसका घर निर्धारित तिथि से पहले निर्मित किया गया है – समिति के समक्ष अपने घर पर मालिकाना हक़ प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकता है।
  3. ‘भूमिपुत्र अधिकारिणी’ समिति द्वारा संबधित भूमि के मालिक को – जो एक स्थानीय निकाय भी हो सकता है –आपत्तियां दर्ज करने के लिए 30 दिन का समय दिया जाएगा, और इसके बाद समिति ‘भूमिपुत्र’ को उस भूमि का स्वामित्व देने का निर्णय लेगी।
  4. भूमिपुत्र अधिकारी के फैसले के खिलाफ, 30 दिनों के भीतर प्रशासनिक न्यायाधिकरण के समक्ष अपील दायर की जा सकती है।

 

इस मामले में अदालत का हस्तक्षेप:

इस अधिनियम के तहत, किसी भी अदालत के पास “भूमिपुत्र अधिकारिणी और प्रशासनिक न्यायाधिकरण द्वारा तय किए जाने वाले किसी भी प्रश्न पर विचार करने, निर्णय लेने या समाधान करने’ का क्षेत्राधिकार नहीं होगा”।

इन उपायों की आवश्यकता:

  • पिछले कई सालों से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जिनमे किसी व्यक्ति या उसके माता-पिता द्वारा घर का निर्माण किया गया था, लेकिन घर की जमीन उसके नाम पर नहीं है। इसकी वजह से इनके सिर पर हमेशा तलवार लटकी रहती है कि कोई उनके खिलाफ (स्वामित्व को लेकर) केस दर्ज कर देगा।
  • प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य, एक छोटे आवासीय घर पर, उसमें रहने वाले को मालिकाना हक़ प्रदान करना है, ताकि वह गरिमा और आत्म-सम्मान के साथ अपने घर में रह सके और अपने ‘जीवन के अधिकार’ का प्रयोग कर सके।

संबंधित चिंताएं:

सबसे बड़ी चिंता यह है, कि इस विधेयक के लागू होने के बाद ‘अवैध रूप से बनाए गए मकानों’ के नियमितीकरण संबंधी मामले सामने आ सकते है। इस विधेयक से, गोवा के घनी आबादी वाले क्षेत्रों में गैर-कानूनी तरीके से रह रही प्रवासी आबादी के लिए वैधता हासिल करने का अवसर मिल सकता है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. ‘गोवा भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक’ का अवलोकन
  2. पात्रता
  3. कार्यान्वयन
  4. लाभ

मेंस लिंक:

‘गोवा भूमिपुत्र अधिकारिणी विधेयक’ के महत्व पर चर्चा कीजिए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।

अमेरिका, भारत, इज़राइल और यूएई का एक ‘नया क्वाड’


संदर्भ:

हाल ही में, अमेरिका, भारत, इजरायल और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के विदेश मंत्रियों का पहला शिखर सम्मेलन आभासी प्रारूप में आयोजित किया गया था।

बैठक के अंत में, चारो देश “क्षमताओं, ज्ञान और अनुभव की अनूठी श्रंखला” का उपयोग करने हेतु एक नया अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंच बनाने पर सहमत हुए हैं।

नए ‘क्वाड समूह के बारे में:

चतुर्पक्षीय सुरक्षा वार्ता (Quadrilateral Security Dialogue – QSD) की तर्ज पर इस समूह को, इसके औपचारिक गठन से पहले ही ‘नया क्वाड’ या ‘मध्य-पूर्वी क्वाड’ (Middle-Eastern Quad) कहा जा रहा है।

‘नए क्वाड’ के उद्देश्य और फोकस क्षेत्र:

इस समूह का उद्देश्य “अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक मंच” के रूप में कार्य करना है, जो चारो सदस्य देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को आगे बढ़ाने पर कार्य करेगा।

महत्व:

विशेषज्ञों का मानना ​​है, कि ‘मिडिल-ईस्ट’ को संतुलित और स्थिर रखने में प्रयासरत देशों के मध्य आपसी सहयोग हेतु यह नया समूह काफी महत्वपूर्ण है।

चतुर्पक्षीय सुरक्षा वार्ता (QSD) के साथ तुलना:

प्रायः ‘क्वाड’ के रूप में चर्चित ‘चतुर्पक्षीय सुरक्षा वार्ता’ (QSD), संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच एक ‘रणनीतिक वार्ता’ समूह है।

  • इस रणनीतिक संवाद की शुरुआत, वर्ष 2007 में दक्षिण चीन सागर में बढ़ती चीनी आक्रामकता के जवाब में की गई थी, और आधुनिक काल के सबसे बड़े ‘संयुक्त सैन्य अभ्यासों’ में से एक, ‘मालाबार सैन्याभ्यास’ को भी इसमें शामिल किया गया था।
  • चीन के साथ पिछले एक दशक के दौरान बढे हुए आर्थिक संबंधो को देखते हुए, ऑस्ट्रेलिया इस वार्ता से अलग हो गया था। इसके बाद वर्ष 2017 में इस ‘वार्ता समूह’ को फिर से संगठित किया गया।

‘नया क्वाड’ समूह किन बिन्दुओं पर ध्यान केंद्रित करेगा?

वार्ता के दौरान भागीदार देशों द्वारा ‘व्यापार संबंधों में सुधार’, ‘क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा में सहयोग’, ‘वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संयुक्त चर्चा’ तथा ‘परिवहन एवं प्रौद्योगिकी पर केंद्रित संयुक्त बुनियादी ढांचा परियोजनाओं’ जैसे कुछ क्षेत्रों पर प्रकाश डाला गया है।

नए क्वाड के लाभ:

  1. व्यापार के अलावा, भारत, संयुक्त अरब अमीरात और इज़राइल के मध्य – सेमीकंडक्टर डिजाइन और निर्माण से लेकर अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी तक – कई क्षेत्रों में सहयोग किए जाने की संभवना है।
  2. इस नए गठबंधन से, भारत द्वारा इस मंच का उपयोग विभिन्न अवसरों जैसे बिग डेटा, क्रत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, अपने उत्पादों को अन्य सदस्य देशों के बाजार में निर्यात करने, आदि के लिए कर सकता है।
  3. यह समूह, व्यापार, ऊर्जा और पर्यावरण जैसे गैर-सैन्य मुद्दों पर और सार्वजनिक वस्तुओं को बढ़ावा देने पर ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा।
  4. यह मंच, भारत को इस क्षेत्र में व्यापक स्तर पर बहु-पक्षीय भागीदारी बनाने में मदद करेगा। फ्रांस, रूस, चीन जैसी प्रमुख शक्तियों के इस क्षेत्र में आने से, यह गठबंधन भारत को इस क्षेत्र की भू-राजनीति को बदलने में अपनी स्थिति को एक आकार देने में मदद करेगा।

इस समूह की आवश्यकता और महत्व:

  • इन चारो देशों के पास “क्षमताओं, ज्ञान और अनुभव का एक अनूठा सेट” है जिसका उपयोग सहयोग का एक नया नेटवर्क बनाने के लिए किया जा सकता है।
  • इन देशों ने यह भी स्वीकार किया है कि उनके मध्य, खासकर ऊर्जा, जलवायु, व्यापार और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में कई अतिव्यापी हित भी हैं। ।

तो, कुल मिलकर यह ‘नया क्वाड’ प्रारूप, इन देशों के लिए उपरोक्त क्षेत्रों को और विकसित करने में मदद करेगा।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

अब्राहम समझौते के बाद से भारत, इज़राइल और यूएई के बीच व्यापार और निवेश में त्रिपक्षीय सहयोग पहले ही स्थापित हो चुका है। ‘अब्राहम समझौता’ क्या हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. क्वाड- संरचना
  2. पहली बार इसे कब प्रस्तावित किया गया था?
  3. हिंद महासागर क्षेत्र में देश और महत्वपूर्ण द्वीप।
  4. भारत-प्रशांत क्षेत्र का भौगोलिक अवलोकन
  5. इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण समुद्र और जलडमरूमध्य

मेंस लिंक:

शांति और सुरक्षा बनाए रखने और संयुक्त राष्ट्र के समुद्रीय कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए क्वाड की औपचारिक बहाली और पुन: सक्रिय की आवश्यकता है। परीक्षण कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप


संदर्भ:

हाल ही में, इंजीनियरों ने फ्रेंच गुयाना में ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ (James Webb Space Telescope – JWST) को अनबॉक्स कर दिया है और अब इसे लॉन्च के लिए तैयार किया जाएगा।

‘जेडब्लूएसटी’ 21वीं सदी की सबसे शानदार वैज्ञानिक परियोजनाओं में से एक है, और इसे 18 दिसंबर को कक्षा में स्थापित किया जाएगा।

current affairs

 

‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ (JWST) के बारे में:

जेडब्लूएसटी, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी (NASA), यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (European Space Agency) और केनेडियन अंतरिक्ष एजेंसी (Canadian Space Agency) का एक संयुक्त उपक्रम है।

  • ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’, अंतरिक्ष में परिक्रमा करती हुए एक अवरक्त वेधशाला (Infrared Observatory) है, जो लंबी तरंग दैर्ध्य कवरेज और बहुत बेहतर संवेदनशीलता के साथ ‘हबल स्पेस टेलिस्कोप’ (Hubble Space Telescope) के कार्यों में सहायक होगी तथा इसकी खोजों का विस्तार करेगी।
  • इससे पूर्व, जेडब्ल्यूएसटी (JWST) को एनजीएसटी (New Generation Space Telescope – NGST) के नाम से जाना जाता था, फिर वर्ष 2002 में इसका नाम बदलकर नासा के पूर्व प्रशासक ‘जेम्स वेब’ के नाम पर कर दिया गया|
  • यह 6.5 मीटर प्राथमिक दर्पण युक्त एक बड़ी अवरक्त दूरबीन होगी।

current affairs

 

दूरबीन के उद्देश्य और कार्य:

‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ (JWST) को बिग बैंग के पश्चात् बनने वाले प्रथम तारों और आकाशगंगाओं की खोज करने तथा तारों के चारों ओर के ग्रहों के परिवेश का अध्ययन करने संबंधी कार्य करने के उद्देश्य से निर्मित किया गया है|

  1. यह दूरबीन, ब्रह्मांड में गहराई से अवलोकन करेगी और ‘हबल स्पेस टेलीस्कोप’ के साथ कार्य करेगी।
  2. दूरबीन में 22 मीटर (टेनिस कोर्ट के आकार की) की लम्बाई वाले सौर-सुरक्षाकवच (Sunshield) और 6.5 मीटर चौड़ाई के दर्पण और इन्फ्रारेड क्षमताओं से लैस उपकरण लगे होंगे।
  3. वैज्ञानिकों को उम्मीद है, कि यह ‘सेट-अप’ ब्रह्मांड 13.5 अरब साल पहले घटित हुई बिग बैंग की घटना के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली प्रथम आकाशगंगाओं को भी देख सकने में सक्षम होगी।

कक्षीय परिक्रमा:

  • ‘हबल स्पेस टेलीस्कॉप’ लगभग 570 किमी की ऊंचाई पर पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमा करता है।
  • ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ वास्तव में पृथ्वी की परिक्रमा नहीं करेगा, बल्कि यह 1.5 मिलियन किमी दूर पृथ्वी-सूर्य लेगरेंज़ बिंदु 2 (Earth-Sun Lagrange Point 2) पर स्थापित किया जाएगा।
  • लेगरेंज़ बिंदु 2 (L 2) पर ‘जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप’ का सौर-कवच, सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा से आने वाले प्रकाश को अवरुद्ध कर देगा, जिससे दूरबीन को ठंडा रहने में मदद करेगी। किसी ‘अवरक्त दूरबीन’ के लिए ठंडा रहना बहुत महत्वपूर्ण होता है।

इंस्टा जिज्ञासु:

हबल स्पेस टेलीस्कोप के बारे में जानने के लिए पढ़िए

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


नेब्रा स्काई डिस्क

लंदन के ब्रिटिश संग्रहालय में ‘नेब्रा स्काई डिस्क’ (Nebra Sky Disc) नामक एक प्राचीन वस्तु को प्रदर्शित किया जाएगा। ‘नेब्रा स्काई डिस्क’ को सितारों का दुनिया का सबसे पुराना नक्शा माना जाता है।

नेब्रा स्काई डिस्क लगभग 3,600  साल पुरानी डिस्क है जिसे जर्मनी के नेब्रा में दो तलवारों, कुल्हाड़ियों, एक कांस्य छेनी और दो सर्पिल आर्म रिंगों के साथ दफनाया गया था। ऐसा माना जाता है कि देवताओं को समर्पित करते हुए इन वस्तुओं को दफनाया गया था।

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अर्थशॉट पुरस्कार

“इको ऑस्कर” के रूप में प्रख्यात ‘द अर्थशॉट पुरस्कार’ (The Earthshot Prize), प्रिंस विलियम तथा ड्यूक और डचेस ऑफ कैम्ब्रिज द्वारा स्थापित चैरिटी संस्था ‘रॉयल फाउंडेशन’ और इतिहासकार डेविड एटनबरो द्वारा स्थापित एक पुरस्कार है।

  • जलवायु संकट से लड़ने के उपाय विकसित करने के लिए वर्ष 2021 से 2030 के बीच, हर साल पांच व्यक्तियों/ संस्थाओं को इस पुरुस्कार से सम्मानित किया जाता है।
  • वर्ष 2020 में स्थापित यह पुरुस्कार, पहली बार वर्ष 2021 में पांच व्यक्तियों / संस्थाओं को – संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों, यथा, प्रकृति की बहाली और संरक्षण, वायु स्वच्छता, महासागर पुनरुद्धार, अपशिष्ट मुक्त जीवन और जलवायु कार्रवाई के लिए- उनके योगदान के लिए दिए गए थे।
  • भारत के विद्युत मोहन की तकनीक, को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के विजेताओं में नामित किया गया था। यह तकनीक ईंधन बनाने के लिए कृषि अपशिष्ट का पुनर्चक्रण करती है।

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पुरुस्कार के बारे में:

अर्थशॉट पुरस्कार, पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. केनेडी (John F. Kennedy) द्वारा शुरू किये गए ‘मूनशॉट पुरस्कार’ मूनशॉट पुरस्कार (Moonshot Award) से प्रेरित है जिसने मनुष्य को चंद्रमा पर भेजने के लिये एक संगठित लक्ष्य के आसपास लाखों लोगों को एकजुट किया और 1960 के दशक में नई तकनीक के विकास को उत्प्रेरित किया।

पुरस्कार और पात्रता:

  • पृथ्वी की समस्याओं के प्रभावशाली समाधान प्रस्तुत करने वाले पांच व्यक्ति या संगठनों को हर साल एक मिलियन यूरो से सम्मानित किया जाएगा।
  • प्रत्येक वर्ष पांच विजेताओं का चयन किया जाएगा, और संयुक्त राष्ट्र ‘एसडीजी लक्ष्य श्रेणियों’ में से प्रत्येक के लिए एक, वर्ष 2030 तक कुल 50 मिलियन यूरो का पुरस्कार दिया जाएगा।

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भास्करबडा

असम सरकार के आधिकारिक कैलेंडर में ‘भास्करबडा’ (Bhaskarabda) को ‘शक’ और ‘ग्रेगोरियन युग’ में जोड़ा जाएगा।

  • भास्करबडा एक ‘युग’ है जिसे सातवीं शताब्दी के स्थानीय शासक के स्वर्गारोहण की तारीख से गिना जाता है।
  • भास्करबडा की शुरुआत ‘भास्करवर्मन’ को कामरूप साम्राज्य के सिंहासन पर बैठने की तिथि से मानी जाती है। ‘भास्करवर्मन’, उत्तर भारतीय शासक हर्षवर्धन के समकालीन और राजनीतिक सहयोगी थे।

ग्रेगोरियन बनाम भास्करबडा

  • ग्रेगोरियन के विपरीत, जहां दिन की शुरुआत मध्यरात्रि से मानी जाती है, असमिया कैलेंडर की शुरुआत और अंत 24 घंटों में सूर्योदय के साथ होती है।
  • ग्रेगोरियन कैलंडर में ‘सौर चक्र’ के अनुसार गणना की जाती है, जबकि शक कैलंडर और भास्करबडा कैलंडर में चंद्र सौर प्रणाली का उपयोग किया जाता है।
  • भास्करबडा और ग्रेगोरियन के मध्य 593 वर्ष का अंतर है।

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