विषय सूची:
सामान्य अध्ययन-I
1. सर सैयद अहमद खान
सामान्य अध्ययन-II
1. अग्रिम जमानत
2. अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति
सामान्य अध्ययन-III
1. तमिलनाडु शहरी रोजगार योजना
2. विश्व खाद्य दिवस
3. अंतर्राष्ट्रीय ई-कचरा दिवस
4. जैव विविधता संरक्षण पर कुनमिंग घोषणा
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
1. DLX1 प्रोटीन
2. कैम्ब्रियन पेट्रोल युद्धाभ्यास
3. ढोल (एशियाई जंगली कुत्ता)
सामान्य अध्ययन- I
विषय: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय।
सर सैयद अहमद खान
संदर्भ:
हाल ही में, सर सैयद अहमद खान की 204वीं जयंती मनाई गई। उनका जन्म 17 अक्टूबर, 1817 को हुआ था।
‘सर सैयद अहमद खान’ के बारे में:
- सर सैयद अहमद खान एक प्रसिद्द शिक्षक, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक और कई प्रतिभाओं के धनी थे।
- वह ‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ के संस्थापक भी थे।
इनसे जुड़े हुए विवाद:
- सर सैयद अहमद खान को अक्सर ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ (Two nation theory) का जनक बताते हुए इनकी आलोचना की जाती है। इसी सिद्धांत के आधार पर आगे चलकर दो अलग राष्ट्रों यानी भारत और पाकिस्तान का गठन हुआ।
- कुछ इतिहासकारों द्वारा गलत तरीके से यह समझा जाता है कि, भारत में हिंदू और मुस्लिम के विभाजन ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ का उपोत्पाद था, और इस ‘सिद्धांत’ की उत्पत्ति सर सैयद की विचारधारा से हुई थी।
क्या उनके समय में “द्वि-राष्ट्र” सिद्धांत का कोई अस्तित्व था?
“राष्ट्रवाद” (Nationalism), एक सचेतन विचार के रूप में यूरोप में भी 20वीं सदी की एक घटना थी, और यही से इसे भारत में आयात किया गया था।
प्रख्यात इतिहासकार ‘अनिल सील’ ने ठीक ही कहा है कि सर सैयद के समय में, “कोई दो राष्ट्र नहीं थे, कोई एक राष्ट्र नहीं था और कोई राष्ट्र था ही नहीं।”
- सर सैयद अहमद खान की मृत्यु के समय तक, अर्थात सन 1898 तक, भारतीय “राष्ट्र” जैसा कुछ नहीं था, और न ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों द्वारा ऐसा कोई दावा किया गया था।
- कांग्रेस के संस्थापक सर ‘ऑक्टेवियन ह्यूम’ ने “समुदायों के एक समूह” की बात की थी, न कि एक राष्ट्र की।
सर सैयद की राष्ट्र की अवधारणा:
- सर सैयद की ‘राष्ट्र की अवधारणा’ धर्मनिरपेक्ष आदर्शों के साथ अटूट रूप से गुथित थी।
- वह बहुसंस्कृतिवाद में विश्वास करते थे, जिसके तहत सभी सांस्कृतिक समुदायों को देश के भीतर समान दर्जा प्राप्त होना चाहिए।
‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ की स्थापना के पीछे तर्क:
‘अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय’ की स्थापना के पीछे मुख्य कारण मुसलमानों की दयनीय निर्भरता और विश्वास था। मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता ने, उन्हें सरकारी स्कूलों और कॉलेजों द्वारा प्रदान की जाने वाली शैक्षिक सुविधाओं का लाभ नहीं उठाने दिया। इसलिए उनकी शिक्षा के लिए कुछ विशेष व्यवस्था करना आवश्यक समझा गया।
इंस्टा जिज्ञासु:
‘अगस्त प्रस्ताव’ (August Offer) वर्ष 1940 में वायसराय लिनलिथगो द्वारा प्रस्तुत किए गया एक प्रस्ताव था। इसमें की गई प्रमुख सिफारिशें क्या थीं?
प्रीलिम्स लिंक:
- सर सैयद अहमद खान के बारे में
- राष्ट्रवाद में उनका योगदान
- शिक्षा के क्षेत्र में योगदान
- “द्वि-राष्ट्र” सिद्धांत के बारे में
मेंस लिंक:
देश के युवाओं को शिक्षित करने में सर सैयद अहमद खान द्वारा निभाई गई भूमिका पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
सामान्य अध्ययन- II
विषय: विभिन्न घटकों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।
अग्रिम जमानत
संदर्भ:
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि, ‘अग्रिम जमानत’ (Anticipatory Bail) दिए जाने के मामले में ‘अपराध की गंभीरता’ और ‘अपराध में आरोपी की भूमिका’ जैसे कारकों पर निचली अदालत द्वारा पर्याप्त रूप से विचार नहीं किए जाने का संकेत देने संबंधी पर्याप्त सामग्री होने पर, वरिष्ठ अदालत द्वारा ‘अग्रिम जमानत’ के आदेश को रद्द किया जा सकता है।
‘अग्रिम जमानत’ की अवधारणा:
- वर्ष 1973 में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) में संशोधन करने के दौरान, धारा 438 के तहत ‘अग्रिम जमानत’ (Anticipatory Bail) का प्रावधान लागू किया गया था।
- गिरफ्तार होने के बाद किसी व्यक्ति को दी जाने वाली साधारण जमानत के विपरीत, अग्रिम जमानत में, व्यक्ति को गिरफ्तारी से पहले ही जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया जाता है।
- समय सीमा: सुशीला अग्रवाल बनाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (2020) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सुनाते हुए कहा, कि अग्रिम जमानत देते समय कोई समय सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती है और यह, मामले की सुनवाई के अंत तक जारी रह सकती है।
- ‘अग्रिम जमानत’ केवल सत्र न्यायालय और उच्च न्यायालय द्वारा प्रदान की जाती है।
महत्व:
एक स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्वपूर्ण आधार को प्राप्त संसदीय स्वीकृति की वजह से, दंड प्रक्रिया संहिता में धारा 438 को अधिनियमित किया गया था।
- संसद का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व को बढ़ावा देना था, और इसके साथ ही, यह आपराधिक न्यायशास्त्र के एक मौलिक सिद्धांत को प्राथमिकता प्रमुखता प्रदान करना चाहती थी, जिसमे कहा गया है, कि ‘जब तक कोई व्यक्ति दोषी साबित नहीं हो जाता, तब तक उसे निर्दोष माना जाता है’।
इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाल ही में की गई टिप्पणियां:
- संविधान में अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्याभूत ‘स्वतंत्रता के अधिकार’ के लिए दिए गए अधिमूल्य के मद्देनजर उच्च न्यायालय तथा उच्चत्तम न्यायालय के लिए, किसी आरोपी को ‘अग्रिम जमानत’ देने की शक्तियां दी गई हैं।
- दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत किसी आवेदन को मंजूर करने अथवा रद्द करने का किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार पर सीधा प्रभाव पड़ता है। इसलिए, इस प्रावधान को उदारतापूर्वक पढ़ने और इसके लाभकारी स्वरूप पर विचार करने की आवश्यकता है। अदालतों के लिए, इन प्रतिबंधों को, विधायिका द्वारा बनाए गए क़ानून के स्पष्ट उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए देखना चाहिए।
- इस हेतु अदालत, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए भी इस तरह के आदेश पारित कर सकती हैं।
इस प्रकार के संरक्षोपाय की आवश्यकता:
- कोई अभियुक्त, सिर्फ एक आरोपी होने के अलावा, अपने परिवार का मुख्य देखभाल करने वाला या एकमात्र कमाने वाला भी हो सकता है। उसकी गिरफ्तारी से उसके प्रियजनों को भुखमरी और उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है।
- वर्ष 1980 के गुरबख्श सिंह सिब्बिया बनाम पंजाब राज्य मामले में, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने फैसला सुनाया था, कि धारा 438 (1) की व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) के आलोक में की जानी चाहिए है।
इंस्टा जिज्ञासु:
अनुच्छेद 21 के तहत आने वाले मूल अधिकारों के बारे में आप क्या जानते हैं?
प्रीलिम्स लिंक:
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत प्रदत्त विभिन्न अधिकार
- ‘जमानत’ क्या होती है?
- अग्रिम जमानत क्या होती है?
- जमानती और गैर-जमानती अपराधों के मध्य अंतर
- अग्रिम जमानत देने की शर्तें
- अग्रिम जमानत हेतु समय सीमा
मेंस लिंक:
‘अग्रिम जमानत’ की आवश्यकता और महत्व पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, संस्थाएँ और मंच- उनकी संरचना, अधिदेश।
अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति
संदर्भ:
हाल ही में, ‘अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति’ (International Monetary and Financial Committee – IMFC) की बैठक आयोजित की गई थी।
- बैठक में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के 190 सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करने वाले गवर्नरों / वैकल्पिक गवर्नरों ने भाग लिया।
- बैठक में की जाने वाली चर्चा “टीकाकरण, जांच करना और इसकी गति ने तेजी लाना” पर केंद्रित थी, जो प्रबंध निदेशक की ‘वैश्विक नीति एजेंडा’ की थीम भी है।
- IMFC के सदस्यों ने कोविड-19 का मुकाबला करने और आर्थिक सुधार के लिए सदस्य देशों द्वारा किए गए कार्यों और उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी भी दी।
‘अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति’ (IMFC) के बारे में:
संरचना: ‘अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति’ में 24 सदस्य होते हैं, जिनका चुनाव 187 गवर्नरों के समूह से किया जाता है। समिति की संरचना, ‘कार्यकारी बोर्ड’ और उसके 24 निर्वाचन क्षेत्रों को दर्शाती है। वैसे तो ‘अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति’, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के सभी सदस्य देशों का प्रतिनिधित्व करती है।
कार्य: आईएमएफसी के सदस्य साल में दो बार, एक बार बसंत के महीने में आयोजित बैठक में और दूसरी बार वार्षिक रूप से आयोजित बैठक में मिलते हैं। यह समिति, वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाले सामान्य सरोकार के मामलों पर चर्चा करती है और आईएमएफ को उसके काम की दिशा पर सलाह भी देती है।
बैठकों के अंत में, समिति अपने विचारों का सारांश देते हुए एक संयुक्त विज्ञप्ति जारी करती है। इन विज्ञप्तियों में, आगामी वसंत बैठक या वार्षिक बैठक तक के लिए ‘आईएमएफ’ के छह महीनों की अवधि के दौरान निष्पादित किए जाने वाले कार्य-कार्यक्रमों के लिए मार्गदर्शन प्रदान किया जाता है। IMFC में कोई औपचारिक मतदान नहीं होता है, और यह सर्वसम्मति से कार्य करती है।
महत्व:
- आईएमएफसी, अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय प्रणाली के पर्यवेक्षण और प्रबंधन पर ‘आईएमएफ’ बोर्ड ऑफ गवर्नर्स को सलाह देती है और रिपोर्ट करती है। साथ ही यह समिति, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के लिए ‘व्यवस्था’ को बाधित करने वाली घटनाओं पर प्रतिक्रिया के बारे में जानकारी भी देती है।
- ‘अंतर्राष्ट्रीय मौद्रिक और वित्तीय समिति’ (IMFC), कार्यकारी बोर्ड द्वारा ‘समझौतों के अनुच्छेदों’ में संशोधन करने के प्रस्तावों पर भी विचार करती है और ‘बोर्ड ऑफ गवर्नर्स’ द्वारा संदर्भित किसी भी अन्य मामलों पर सलाह भी देती है।
- हालांकि आईएमएफसी के पास कोई निर्णय लेने की औपचारिक शक्ति नहीं है, किंतु व्यवहार में, यह ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ के कार्य और नीतियों को रणनीतिक दिशा प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण साधन बन गयी है।
इंस्टा जिज्ञासु:
‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ कोटा (IMF Quotas) क्या होता है? इसका निर्धारण किस प्रकार किया जाता है?
प्रीलिम्स लिंक:
- IMFC बनाम ‘विकास समिति’- कार्य और संरचना
- आईएमएफ के सदस्य और प्रशासन
- आईएमएफ द्वारा जारी की जाने वाले विभिन्न रिपोर्ट्स
- आईएमएफ के अंतर्गत वित्त-पोषण तंत्र
मेंस लिंक:
वर्तमान समय में ‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष’ की भूमिका, क्षमता और प्रदर्शन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
स्रोत: पीआईबी।
सामान्य अध्ययन- III
विषय: केन्द्र एवं राज्यों द्वारा जनसंख्या के अति संवेदनशील वर्गों के लिये कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का कार्य-निष्पादन; इन अति संवेदनशील वर्गों की रक्षा एवं बेहतरी के लिये गठित तंत्र, विधि, संस्थान एवं निकाय।
तमिलनाडु शहरी रोजगार योजना
संदर्भ:
हाल ही में, तमिलनाडु सरकार द्वारा राज्य में ‘शहरी रोजगार योजना’ को प्रायोगिक आधार पर लागू करने संबंधी आदेश जारी कर दिए गए हैं।
इस योजना का उद्देश्य, रोजगार के अवसरों में वृद्धि और सार्वजनिक संपत्ति के निर्माण और रखरखाव के माध्यम से आजीविका और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना है।
योजना के बारे में:
तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रस्तावित यह एक शहरी रोजगार योजना है, जिसे ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ (Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme – MGNREGS) की तर्ज पर लागू किया जाएगा।
इस योजना का उद्देश्य शहरी गरीबों की आजीविका में सुधार करना है।
आवश्यकता:
- अन्य राज्यों के विपरीत, तमिलनाडु में शहरी आबादी तेजी से बढ़ रही है और यह वर्ष 2036 तक राज्य की कुल आबादी का 60% तक हो जाएगी।
- वर्तमान में, कुल चार करोड़ लोग शहरी क्षेत्रों में रह रहे हैं, जोकि राज्य की कुल जनसंख्या का 53 प्रतिशत है।
- कोविड-19 महामारी के कारण, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले कई लोगों की नौकरियां छूट चुकी हैं।
योजना का कार्यान्वयन एवं प्रमुख विशेषताएं:
इस योजना के तहत श्रमिकों का उपयोग जल निकायों से गाद निकालने और सार्वजनिक पार्कों एवं अन्य स्थानों के रखरखाव जैसे कार्यों के लिए किया जाएगा।
- योजना के तहत, कुल व्यक्ति-दिवस का 50% महिलाओं के लिए निर्धारित किया जाएगा।
- महिलाओं और पुरुषों को ‘एक समान अकुशल और अर्धकुशल काम के लिए’ समान मजदूरी का भुगतान किया जाएगा।
- तमिलनाडु शहरी रोजगार योजना, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर सी. रंगराजन के नेतृत्व में गठित एक समिति द्वारा की गई सिफारिशों पर आधारित है।
‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) के बारे में:
मनरेगा (MGNREGA) को भारत सरकार द्वारा वर्ष 2005 में एक सामाजिक उपाय के रूप में प्रस्तुत किया गया था। जिसके अंतर्गत ‘काम करने के अधिकार’ (Right to Work) की गारंटी प्रदान की जाती है।
- इस सामाजिक उपाय और श्रम कानून का मुख्य सिद्धांत यह है, कि स्थानीय सरकार को ग्रामीण भारत में न्यूनतम 100 दिनों का वैतनिक रोजगार प्रदान करना होगा ताकि ग्रामीण श्रमिकों के जीवन स्तर में वृद्धि की जा सके।
मनरेगा कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य:
- मनरेगा कार्यक्रम के तहत प्रत्येक परिवार के अकुशल श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिये न्यूनतम 100 दिन का वैतनिक रोजगार।
- ग्रामीण निर्धनों की आजीविका के आधार को सशक्त करके सामाजिक समावेशन सुनिश्चित करना।
- कुओं, तालाबों, सड़कों और नहरों जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में स्थाई परिसंपत्ति का निर्माण करना।
- ग्रामीण क्षेत्रों से होने वाले शहरी प्रवासन को कम करना।
- अप्रशिक्षित ग्रामीण श्रम का उपयोग करके ग्रामीण अवसंरचना का निर्माण करना।
मनरेगा योजना के तहत लाभ प्राप्त करने हेतु पात्रता मानदंड:
- मनरेगा योजना का लाभ लेने के लिए भारत का नागरिक होना चाहिए।
- कार्य हेतु आवेदन करने के लिए व्यक्ति की आयु 18 वर्ष अथवा इससे अधिक होनी चाहिए।
- आवेदक के लिए किसी स्थानीय परिवार का हिस्सा होना चाहिए (अर्थात, आवेदन स्थानीय ग्राम पंचायत के माध्यम से किया जाना चाहिए)।
- आवेदक को स्वेच्छा से अकुशल श्रम के लिए तैयार होना चाहिए।
योजना का कार्यान्वयन:
- आवेदन जमा करने के 15 दिनों के भीतर या जिस दिन से काम की मांग होती है, उस दिन से आवेदक को वैतनिक रोजगार प्रदान किया जाएगा।
- रोजगार उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में, आवेदन जमा करने के पंद्रह दिनों के भीतर या काम की मांग करने की तिथि से बेरोजगारी भत्ता पाने का अधिकार होगा।
- मनरेगा के कार्यों का सामाजिक लेखा-परीक्षण (Social Audit) अनिवार्य है, जिससे कार्यक्रम में जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित होती है।
- मजदूरी की मांग करने हेतु अपनी आवाज उठाने और शिकायतें दर्ज कराने के लिए ‘ग्राम सभा’ इसका प्रमुख मंच है।
- मनरेगा के तहत कराए जाने वाले कार्यों को मंजूरी देने और उनकी प्राथमिकता तय करने का दायित्व ‘ग्राम सभा’ और ‘ग्राम पंचायत’ का होता है।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप जानते हैं कि भारतीय संविधान में स्पष्ट रूप से ‘काम करने के अधिकार’ को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गयी है? फिर, संविधान के अंतर्गत इस संदर्भ में क्या प्रावधान किए गए हैं?
प्रीलिम्स लिंक:
- मनरेगा के तहत ग्राम सभा, ग्राम पंचायत, राज्यों, राज्य खाद्य आयोग, केंद्र की भूमिकाएँ क्या हैं?
- जॉब कार्ड क्या हैं, इन्हें कौन जारी करता है?
- ‘राज्य रोजगार गारंटी कोष’ की स्थापना कौन करता है?
- वैतनिक रोजगार क्या होता है?
- सामाजिक लेखा परीक्षण (सोशल ऑडिट) किसके द्वारा किया जाता है?
मेंस लिंक:
मनरेगा की प्रमुख विशेषताओं और महत्व पर चर्चा कीजिए।
स्रोत: द हिंदू।
विषय: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सहायता तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित विषय; जन वितरण प्रणाली- उद्देश्य, कार्य, सीमाएँ, सुधार; बफर स्टॉक तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी विषय; प्रौद्योगिकी मिशन; पशु पालन संबंधी अर्थशास्त्र।
विश्व खाद्य दिवस
संदर्भ:
हर साल 16 अक्टूबर को ‘विश्व खाद्य दिवस’ (World Food Day) मनाया जाता है। वर्ष 1945 में इसी तारीख को ‘संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन’ (United Nations Food and Agriculture Organisation – FAO) की स्थापना की गयी थी।
विश्व खाद्य दिवस-2021 की विषय-वस्तु (थीम) है: “हमारे कार्य ही हमारा भविष्य हैं- बेहतर उत्पादन, बेहतर पोषण, बेहतर वातावरण और बेहतर जीवन” (Our actions are our future- Better production, better nutrition, a better environment and a better life)।
पृष्ठभूमि:
हंगरी के पूर्व कृषि और खाद्य मंत्री डॉ पाल रोमानी के सुझाव पर ‘विश्व खाद्य दिवस’ की स्थापना नवंबर 1979 में खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के सदस्य देशों द्वारा की गई थी। बाद के वर्षों में, यह दिवस भूख, कुपोषण, स्थिरता और खाद्य उत्पादन के बारे में जागरूकता बढ़ाने का एक तरीका बन गया।
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के बारे में:
यह संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भूख समाप्त करने हेतु किये जाने वाले प्रयासों का नेतृत्व करती है।
मुख्यालय: रोम, इटली
स्थापना: 16 अक्टूबर 1945
FAO का लक्ष्य: खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) का लक्ष्य सभी के लिए खाद्य सुरक्षा प्राप्त करना है और लोगों तक सक्रिय, स्वस्थ जीवन जीने के लिए पर्याप्त उच्च गुणवत्ता वाले भोजन की नियमित पहुंच सुनिश्चित कराना है।
महत्वपूर्ण रिपोर्ट और कार्यक्रम (संक्षिप्त विवरण):
- खाद्य संकट पर वैश्विक रिपोर्ट
- प्रति दो वर्ष में, वैश्विक वन-स्थिति का प्रकाशन
- वर्ष 1961 में FAO और विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा खाद्य मानकों तथा दिशानिर्देशों को विकसित करने हेतु कोडेक्स एलेमेंट्रिस आयोग (Codex Alimentarius Commission) का गठन
- वर्ष 1996 में, FAO ने विश्व खाद्य सम्मलेन (World Food Summit) का आयोजन किया। इस शिखर सम्मेलन रोम घोषणा (Rome Declaration) पर हस्ताक्षर किये गए, जिसके तहत वर्ष 2015 तक भूख से पीड़ित लोगों की संख्या को आधा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।
- वर्ष 1997 में, FAO ने भूख से लड़ने में सहायता प्राप्त करने हेतु टेलीफूड, संगीत, खेल कार्यक्रमों और अन्य गतिविधियों का एक अभियान शुरू किया।
- वर्ष 1999 में FAO सद्भावना राजदूत कार्यक्रम शुरू किया गया था। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य लगभग 1 अरब लोग भरपूर खाद्य सामग्री होने के दौरान भी भूख और कुपोषण से पीड़ित व्यक्तियों की ओर जनता और मीडिया का ध्यान आकर्षित करना है।
- वर्ष 2004 में भोजन के अधिकार संबंधी दिशा-निर्देशों को अपनाया गया, जिसके तहत राष्ट्रों के लिए ‘भोजन के अधिकार’ संबंधी उनके दायित्वों को पूरा करने हेतु मार्गदर्शन दिए गया।
- FAO ने 1952 में ‘इंटरनेशनल प्लांट प्रोटेक्शन कन्वेंशन’ (International Plant Protection Convention – IPPC) गठित किया।
- 29 जून 2004 को ‘खाद्य एवं कृषि हेतु पादप आनुवांशिक संसधानों पर अन्तराष्ट्रीय संधि’ (International Treaty on Plant Genetic Resources for Food and Agriculture, also called Plant Treaty- ITPGRFA), जिसे ‘सीड ट्रीटी’ (Seed Treaty) भी कहा जाता है, लागू की गयी।
- दक्षिण अफ्रीका में जोहान्सबर्ग में सतत विकास पर विश्व शिखर सम्मेलन के दौरान 2002 में विश्व स्तर पर महत्वपूर्ण कृषि विरासत प्रणाली (Globally Important Agricultural Heritage Systems- GIAHS) भागीदारी पहल की अवधारणा तैयार की गई थी।
इंस्टा जिज्ञासु:
- क्या आप जानते हैं कि ‘खाद्य एवं कृषि संगठन’ (FAO) की 75वीं वर्षगांठ (16 अक्टूबर 2020) पर 75 रुपये मूल्य का स्मारक सिक्का जारी किया था।
- क्या आपको भारत की ‘किसान रेल सेवा’ के बारे में जानकारी है?
प्रीलिम्स लिंक:
- FAO, स्थापना और उद्देश्यों के बारे में
- महत्वपूर्ण रिपोर्ट और कार्यक्रम
मेंस लिंक:
विश्व खाद्य कार्यक्रम पर एक टिप्पणी लिखिए।
स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।
विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
अंतर्राष्ट्रीय ई-कचरा दिवस
संदर्भ:
वर्ष 2018 से हर साल 14 अक्टूबर को ‘अंतर्राष्ट्रीय ई-कचरा दिवस’ (International E-Waste Day) मनाया जाता है।
संपूर्ण विश्व में उत्पन्न होने वाले ई-कचरा / ई-अपशिष्ट की मात्रा:
- पिछले साल की ‘वैश्विक ई-कचरा मॉनिटर’ (Global E-waste Monitor) रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2019 में इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरणों का 6 MT अपशिष्ट उत्पादित हुआ था।
- इस कचरे में, 2014 के बाद पांच वर्षों में 21 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके अलावा वर्ष 2030 तक ई-कचरे का उत्पादन 74 MT तक पहुँच जाने की संभवना है।
- ई-कचरा उत्पादन में सालाना 2 मीट्रिक टन की दर से वृद्धि हुई है।
- इस वृद्धि का श्रेय, इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों की उच्च खपत दर, उत्पादों का छोटा जीवनचक्र और मरम्मत के सीमित विकल्पों को दिया जाता है।
ई-अपशिष्ट के प्रभाव:
विषाक्तता (Toxicity): ई-कचरे (e-waste) में सोना, तांबा, सीसा, पारा, कैडमियम, क्रोमियम, पॉलीब्रोमिनेटेड बाइफिनाइल और पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन आदि जैसे जहरीले तत्व होते हैं।
मनुष्यों पर प्रभाव: ई-कचरे से उत्पन्न जहरीले धुएं के साँस लेने के कारण, भारी धातुओं के संपर्क में आने से, मनुष्य को फेफड़े का कैंसर, श्वसन संबंधी समस्याएं, ब्रोंकाइटिस, मस्तिष्क-रोग जैसी गंभीर बीमारियां आदि का सामना करना पड़ सकता है।
पर्यावरण पर प्रभाव: ई-कचरा एक पर्यावरणीय खतरा है जिससे जल प्रदूषण, मृदा-अम्लीकरण और भूजल प्रदूषण, तथा प्लास्टिक और अन्य अपशिष्टों के जलने से वायु प्रदूषण होता है।
भारत में ई-कचरा:
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार, भारत में वर्ष 2019-20 के दौरान 10 लाख टन से अधिक ई-कचरा उत्पन्न हुआ, जबकि वर्ष 2017-18 में इसकी मात्रा 7 लाख थी। इसके लिए, ई-कचरा निराकरण क्षमता वर्ष 2017-18 में 7.82 लाख टन थी, और इसमें कोई वृद्धि नहीं की गई है।
- 2018 में, पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ‘ट्रिब्यूनल’ को दी गयी जानकारी के अनुसार, भारत में 95% ई-कचरे का अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा किया जाता है और स्क्रैप डीलर अवैज्ञानिक रूप से, एसिड में जलाकर या घोलकर इसका निपटान करते हैं।
भारत में ई-कचरे का प्रबंधन:
ई-कचरे के प्रबंधन हेतु भारत में वर्ष 2011 से क़ानून लागू है, जिसके तहत केवल अधिकृत विघटनकर्ताओं और पुनर्चक्रणकर्ताओं द्वारा ही ई-कचरा एकत्र किए जाने का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा वर्ष 2017 में, ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2016 (e-waste (Management) Rules, 2016) अधिनियमित किए गए थे।
ई–अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016:
- पर्यावरण, वन तथा जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा ‘ई-अपशिष्ट (प्रबंधन तथा निपटान) नियम’, 2016 (E-Waste Management Rules, 2016) अधिसूचित किए गए हैं। यह नियम ‘ई-अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2011’ (E-waste (Management & Handling) Rules, 2011) का स्थान लेंगे।
- नए नियमों के तहत, 21 से अधिक उत्पादों (अनुसूची-I) को नियम के दायरे में शामिल किया गया है। इसमें कॉम्पैक्ट फ्लोरोसेंट लैंप (CFL) और पारा युक्त अन्य प्रकार के लैंप और इसी तरह के अन्य उपकरण शामिल हैं।
- पहली बार, इन नियमों के द्वारा उत्पादकों को निर्माता उत्तरदायित्व (EPR) के अधीन लाया गया है, साथ ही इनके लिए लक्ष्यों के निर्धारण का प्रावधान भी किया गया है। नियमों में, उत्पादकों को ई-कचरे के संग्रह और उसके विनिमय के लिए जिम्मेदार बनाया गया है।
- विभिन्न उत्पादकों के लिए एक अलग ‘उत्पादक उत्तरदायित्व संगठन’ (PRO) गठित करने की सुविधा दी गयी है, जिसके माध्यम से निर्माता, ई-कचरे का सुनिश्चित संग्रह और पर्यावरणीय-अनुकूलित तरीके से इसका निपटान भी कर सकते है।
- नियमो में, ‘जमा वापसी योजना’ को एक अतिरिक्त आर्थिक साधन के रूप में पेश किया गया है। जिसके तहत, बिजली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की बिक्री के समय निर्माता द्वारा जमा के रूप में एक अतिरिक्त राशि ली जाएगी और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण का जीवन समाप्त हो जाने के बाद इसे वापस करने पर उपभोक्ता को निर्माता के पास जमा राशि ब्याज के साथ वापस की जाएगी।
- ई-अपशिष्ट के विघटन और पुनर्चक्रण कार्यों में लगे श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास सुनिश्चित करने के लिए राज्य सरकारों के लिए भी भूमिका सौंपी गई है।
- इन नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।
- शहरी स्थानीय निकायों (नगर समिति/परिषद/निगम) को लावारिस उत्पादों को एकत्र करने और अधिकृत विघटनकर्ताओं या पुनर्चक्रण करने वालों को काम पर लगाने का कार्य सौंपा गया है।
खतरनाक अपशिष्टों के सीमा-पार परिवहन नियंत्रण पर बेसल कन्वेंशन, 1992:
बेसल कन्वेंशन (Basel Convention) के तहत वर्ष 2002 से ई-अपशिष्ट से संबंधित मामलों, जैसेकि पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल ई-अपशिष्ट प्रबंधन; विकासशील देशों में अवैध व्यापार पर रोकथाम; ई-कचरे के बेहतर प्रबंधन हेतु दुनिया भर में क्षमता निर्माण आदि का समाधान किया जा रहा है।
- ‘बेसल कन्वेंशन’ के ‘पक्षकार सम्मेलन’ की छठी बैठक में ‘मोबाइल फोन पार्टनरशिप इनिशिएटिव’ (MPPI) को अपनाया गया था।
- विद्युत और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पर्यावरणीय रूप से अनुकूलित प्रबंधन पर ‘नैरोबी घोषणा’ और पक्षकार सम्मेलन’ की नौवीं बैठक (COP9) द्वारा अपनाए गए निर्णय IX/6 के तहत सचिवालय को ई-अपशिष्ट के पर्यावरणीय रूप से अनुकूलित प्रबंधन के लिए एक कार्य योजना को लागू करने का अधिकार दिया गया था।
रॉटरडैम कन्वेंशन, 2004:
रॉटरडैम कन्वेंशन (Rotterdam Convention) का उद्देश्य निर्यात या आयात किए जाने वाले ‘संभावित खतरनाक रसायनों (कीटनाशकों और औद्योगिक रसायनों सहित) पर पक्षकारों के बीच जानकारी के आदान-प्रदान (पूर्व सूचित सहमति के माध्यम से) को बढ़ावा देना है।
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप जानते हैं कि भारत में घरेलू और व्यावसायिक इकाइयों से उत्पन्न अपशिष्ट को अलग करने, प्रसंस्करण और निपटान के लिए ‘ई-अपशिष्ट क्लिनिक’ स्थापित किए गए हैं? भारत में इस तरह का पहला क्लिनिक कहाँ स्थापित किया गया था?
स्रोत: डाउन टू अर्थ।
विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।
जैव विविधता संरक्षण पर कुनमिंग घोषणा
संदर्भ:
जैव विविधता पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (United Nations Convention on Biological Diversity – UNCBD) के पक्षकारों के सम्मलेन (COP) की चीन में जारी 15वीं बैठक में 100 से अधिक देशों द्वारा कुनमिंग घोषणा (Kunming Declaration) को अपनाया गया है।
COP-15 का विषय: “पारिस्थितिक सभ्यता: पृथ्वी पर सभी जीवों के लिए एक साझा भविष्य का निर्माण” (Ecological Civilization: Building a Shared Future for All Life on Earth)।
कुनमिंग घोषणा:
- इसमें सभी पक्षकारों से निर्णय लेने में जैव विविधता संरक्षण को मुख्यधारा में लाने और मानव स्वास्थ्य की रक्षा में संरक्षण के महत्त्व को पहचानने का आह्वान करता है।
- यह कोई बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय समझौता नहीं है।
- राष्ट्रों ने ‘कुनमिंग घोषणा’ को अपनाकर जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल के लिये क्षमता निर्माण कार्य योजना, 2020 के बाद एक प्रभावी कार्यान्वयन योजना के विकास, अंगीकरण और कार्यान्वयन में सहयोग करने हेतु स्वयं को प्रतिबद्ध किया है।
- इस घोषणा के अनुसार, हस्ताक्षरकर्त्ता राष्ट्र, महामारी के बाद की रिकवरी नीतियाँ, कार्यक्रम और योजनाएँ जैव विविधता के संरक्षण एवं सतत् उपयोग में योगदान देने, संधारणीय तथा समावेशी विकास को बढ़ावा दिए जाने को सुनिश्चित करेंगे।
- घोषणापत्र में हस्ताक्षरकर्ता राष्ट्रों से जैव विविधता योजनाओं को, ‘सतत विकास’, ‘पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली’, ‘संधारणीय विकास हेतु महासागर विज्ञान’ पर संयुक्त राष्ट्र के तीन दशकों के कार्यक्रम के साथ समक्रमिक बनाने की अपेक्षा की जाती है।
जैव विविधता अभिसमय, 1992:
जैव विविधता अभिसमय (Convention on Biological Diversity – CBD) 29 दिसंबर 1993 को लागू हुआ था। इसके 3 मुख्य उद्देश्य हैं:
- जैव विविधता का संरक्षण
- जैव विविधता घटकों का सतत उपयोग
- आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त होने वाले लाभों में उचित और समान भागीदारी
जैव विविधता अभिसमय (CBD) को वर्ष 1992 में रियो डि जेनेरियो में आयोजित ‘पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (पृथ्वी शिखर सम्मेलन) के दौरान 5 जून को हस्ताक्षर के लिए खोला गया था।
- यह अभिसमय एक कानूनी रूप से बाध्यकारी फ्रेमवर्क संधि है, और इसे 180 देशों द्वारा अनुमोदित किया जा चुका है।
- जैव विविधता अभिसमय (सीबीडी) का सचिवालय मॉन्ट्रियल, कनाडा में स्थित है और यह संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के तहत कार्य करता है।
- इस अभिसमय के अंतर्गत, जैव विविधता का संरक्षण, जैविक संसाधनों का सतत उपयोग और उनके स्थायी उपयोग से होने वाले लाभों का समान बंटवारा आदि से संबंधित मामलों को निपटाया जाता है।
- यह अभिसमय वर्ष 1993 में प्रभावी है, और इसके तहत आवास संरक्षण, बौद्धिक संपदा अधिकार, जैव सुरक्षा और स्वदेशी लोगों के अधिकार जैसे कई जैव विविधता मुद्दों का समाधान किया जाता है।
30x30 संरक्षण लक्ष्य:
‘कुनमिंग घोषणा’ में ’30×30 लक्ष्य’ (’30 by 30′ target) की अवधारणा प्रस्तुत की गयी है। इस लक्ष्य को COP15 में प्रस्तुत किया गया था और इसके तहत वर्ष 2030 तक पृथ्वी पर स्थल और महासागरों की संरक्षित भाग के 30% को मूल रूप में बनाए रखने का प्रस्ताव किया गया है।
इसके अतिरिक्त, ‘घोषणा’ में कृषि में रसायनों के इस्तेमाल को आधा करने और प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न करने पर रोक लगाने के लक्ष्य पर भी चर्चा की गईI
इंस्टा जिज्ञासु:
क्या आप ‘वैश्विक पर्यावरण कोष’ (Global Environment Fund – GEF) के बारे में जानते हैं?
स्रोत: डाउन टू अर्थ।
प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य
DLX1 प्रोटीन
हाल ही में, शोधकर्ताओं ने एक विशेष जीन (DLX1) के बारे में खोज की है। DLX1 को शरीर की बनावट (पैटर्न) में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है, उदाहरण के लिए, जबड़े का निर्माण, तंत्रिका तंत्र और अस्थिपंजर ढांचा, आदि। DLX1 भ्रूण के विकास के समय एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, लेकिन असंबंधित रूप से, उच्च और फैलने वाले प्रोस्टेट कैंसर चरणों के 60% रोगियों में DLX1 का उच्च स्तर दिखाई देता है।
कैम्ब्रियन पेट्रोल युद्धाभ्यास
भारतीय सेना की 4/5 गोरखा राइफल्स (फ्रंटियर फोर्स) की एक टीम ने ब्रिटेन के ब्रेकन, वेल्स में प्रतिष्ठित कैम्ब्रियन पेट्रोल युद्धाभ्यास (Exercise Cambrian Patrol) में भारतीय सेना का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया।
- कैम्ब्रियन पेट्रोल युद्धाभ्यास को दुनियाभर की सेनाओं के बीच मिलिट्री पेट्रोलिंग के ओलंपिक के रूप में जाना जाता है।
- ब्रिटेन की सेना द्वारा आयोजित एक्स कैम्ब्रियन पेट्रोल को मानवीय सहनशक्ति, टीम भावना की महत्वपूर्ण परीक्षा माना जाता है।
ढोल (एशियाई जंगली कुत्ता)
- ढोल (Dhole), दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के उष्णकटिबंधीय वन क्षेत्रों में पाया जाने वाला एक जंगली मांसाहारी जानवर है।
- IUCN स्थिति: लुप्तप्राय (Endangered)
- CITES स्थिति: परिशिष्ट II में सूचीबद्ध
- वन्यजीव अधिनियम की अनुसूची II में सूचीबद्ध
- अधिकांश क्षेत्रों में ढोल प्रजाति के कुत्तों की संख्या कम हो रही है जिसका मुख्य कारण इनके आवासों का नष्ट होना, शिकार की कमी, घरेलू कुत्तों से बीमारी का संचरण और अन्य प्रजातियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा है।
चर्चा का कारण:
हाल के एक अध्ययन में भारत में लुप्तप्राय ‘ढोल’ (Dhole- एशियाटिक वाइल्ड डॉग, इंडियन वाइल्ड डॉग तथा रेड डॉग भी कहा जाता है) के संरक्षण हेतु आवासों को समेकित किए जाने के लिए 114 प्राथमिकता वाले तालुकों / तहसीलों की पहचान की गयी है।
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