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[Mission 2022] INSIGHTS करेंट अफेयर्स+ पीआईबी नोट्स [ DAILY CURRENT AFFAIRS + PIB Summary in HINDI ] 12 October 2021

12 Oct CA Hindi

 

 

विषय सूची:

सामान्य अध्ययन-I

1. राजस्थान का विवाह पंजीकरण विधेयक

 

सामान्य अध्ययन-II

1. कालापानी विवाद

2. ईरान में 20% संवर्धित यूरेनियम का अधिक उत्पादन

 

सामान्य अध्ययन-III

1. भारतीय अंतरिक्ष संघ

2. पराली दहन से निपटने हेतु बायो डीकंपोजर

3. मवेशियों के चारे के रूप में धान की पराली के प्रयोग का प्रस्ताव

 

प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य

1. हॉट स्प्रिंग्स

2. तेजस्विनी पहल

3. लूखा नदी

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन, जनसंख्या एवं संबद्ध मुद्दे, गरीबी और विकासात्मक विषय, शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।

राजस्थान का ‘विवाह पंजीकरण विधेयक’


संदर्भ:

हाल ही में, राजस्थान सरकार ने काफी आलोचना किए जाने के बाद ‘राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण संशोधन विधेयक, 2021’ (Rajasthan Compulsory Registrations of Marriage Amendment Bill, 2021) को वापस ले लिया है। यह विधेयक, नाबालिगों सहित सभी विवाहों के अनिवार्य पंजीकरण संबंधी प्रावधान को लेकर विवाद में फंस गया था।

विधेयक के प्रमुख प्रावधान:

  • इस विधेयक में विवाह पंजीकरण अधिकारियों की नियुक्ति और विवाह करने वालों के लिए ‘पंजीकरण’ हेतु ज्ञापन देने के कर्तव्यों से संबंधित ‘‘राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009’ की धारा 5 और धारा 8 में संशोधन करने की मांग की गई थी।
  • संशोधित विधेयक में 18 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं को अपनी शादी की जानकारी स्वयं प्रदान करने के लिए अधिकृत किया गया था।

विवादास्पद प्रावधान:

संशोधन विधेयक में, “ज्ञापन देने करने के कर्तव्य” से संबंधित ‘राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण अधिनियम, 2009’ की धारा 8 में संशोधन किया गया है।

  • कानून में मूल प्रावधान के अनुसार, वर और वधू की आयु 21 वर्ष से कम होने पर 30 दिनों के भीतर विवाह का पंजीकरण कराया जाना अनिवार्य है। अधिनियम में, पुरुषों और महिलाओं, दोनों के लिए ‘आयु संबंधी मानदंड’ एक समान थे और विवाह का पंजीकरण वर और वधू के माता-पिता द्वारा कराए जाने का प्रावधान था।
  • अधिनयम के संशोधित संस्करण में कहा गया है, कि वर और वधू की आयु क्रमशः 21 वर्ष और 18 वर्ष से कम होने पर, विवाह के 30 दिनों के भीतर इनके माता-पिता के लिए विवाह को पंजीकृत कराना अनिवार्य होगा।

current affairs

संशोधन किए जाने के पीछे तर्क:

राज्य सरकार का तर्क था, कि इस संशोधन से विवाह के लिए निर्धारित आयु ‘केंद्रीय कानून’ के अनुरूप हो जाएगी। ‘केंद्रीय कानून’ में विवाह के लिए लड़की की न्यूनतम आयु 18 वर्ष और लड़के की न्यूनतम आयु 21 वर्ष निर्धारित है।

बाल विवाह का पंजीकरण किए जाने से, ऐसे विवाहों को शीघ्रता से रद्द किया जा सकेगा और सरकार को अधिक संख्या में पीड़ितों, विशेषकर विधवाओं तक पहुंचने में मदद मिलेगी।

इस कदम के निहितार्थ:

  1. यदि ‘राजस्थान अनिवार्य विवाह पंजीकरण संशोधन विधेयक’ पारित हो जाता है, तो इससे राज्य में ‘बाल विवाहों’ की संख्या में वृद्धि होगी और इस ‘सामाजिक बुराई’ को कानूनी मान्यता मिलेगी।
  2. ‘बाल विवाह’ का अनिवार्य पंजीकरण, इस तरह के विवाहों को वैधता प्रदान करेगा।
  3. कार्यकर्ताओं का कहना है कि, सरकारी दावों के विपरीत ‘विवाह प्रमाण पत्र’ वास्तव में विवाह को बाद में रद्द करने में बाधा बन सकता है, क्योंकि अदालतों द्वारा ‘विवाह प्रमाण पत्र का नहीं होना’, ‘विवाह’ को रद्द नहीं करने का कारण बताया जा सकता है।

current affairs

पृष्ठभूमि:

राजस्थान में ‘बाल विवाह निषेध अधिनियम’, 2006 लागू करके ‘बाल विवाह’ पर प्रतिबंध लगा दिया था।

वर्ष 2015-16 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़ों के अनुसार, इस क़ानून की वजह से बाल विवाह की घटनाओं में कमी देखी गयी थी।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं, कि ‘बाल विवाह’ अपने आप में गैर-कानूनी नहीं है, हालांकि इस तरह के विवाहों पर रोक लगाने के लिए एक कानूनी ढांचा बनाया गया है? इसके बारे में अधिक जानकारी के लिए पढ़िए

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. भारतीय संविधान के अंर्तगत ‘बच्चों के अधिकारों’ के बारे में
  2. संबंधित अभिसमयों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का अवलोकन
  3. भारत में बाल विवाह को रोकने के लिए कानून
  4. राजस्थान विवाह विधेयक के बारे में

मेंस लिंक:

भारत में बाल विवाह रोकने के उपाय सुझाइए।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


सामान्य अध्ययन- II


 

विषय: भारत एवं इसके पड़ोसी- संबंध।

कालापानी विवाद


संदर्भ:

नेपाल के पूर्व विदेश मंत्री द्वारा दिए गए गए एक व्यक्तव्य के अनुसार, सभी नेपाली राजनीतिक दलों की इस तथ्य पर आम सहमति है कि उत्तराखंड में ‘कालापानी’ नेपाल के संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा है। हालांकि, भारत ने इस दावे को खारिज कर दिया है।

current affairs

‘कालापानी’ की अवस्थिति:

‘कालापानी’ (Kalapani), उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के पूर्वी छोर पर स्थित है।

  • यह, उत्तर में चीन के अधीन तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ तथा पूर्व और दक्षिण में नेपाल के साथ सीमा बनाता है।
  • यह लिंपियाधुरा और लिपुलेख के बीच में स्थित है।
  • ‘कालापानी क्षेत्र’ नेपाल और भारत के बीच सबसे बड़ा क्षेत्रीय विवाद है। इस क्षेत्र के अंतर्गत उच्च हिमालय में कम से कम 37,000 हेक्टेयर भूमि शामिल है।

‘कालापानी क्षेत्र’ पर नियंत्रण:

यह क्षेत्र भारत के नियंत्रण में है लेकिन नेपाल ऐतिहासिक और मानचित्रक (कार्टोग्राफिक) कारणों से इस क्षेत्र पर अपना दावा करता है।

विवाद की वजह:

‘कालापानी क्षेत्र’ का नाम इससे होकर बहने वाली ‘काली नदी’ के नाम पर पड़ा है। इस क्षेत्र पर नेपाल का दावा इसी नदी पर आधारित है। 1814-16 में हुए ‘गोरखा युद्ध’ / ‘एंग्लो-नेपाल युद्ध’ के पश्चात् काठमांडू के गोरखा शासकों और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हस्ताक्षरित ‘सुगौली की संधि’ में ‘काली नदी’ को नेपाल की सीमा के रूप में निर्धारित किया गया था। सन् 1816 में संधि की पुष्टि की गई।

  • संधि के अंतर्गत, नेपाल को पश्चिम में कुमाऊं-गढ़वाल और पूर्व में सिक्किम के अपने क्षेत्रों को खोना पड़ा था।
  • संधि के अनुच्छेद 5 के अनुसार, नेपाल के राजा ने काली नदी के पश्चिम में स्थित क्षेत्र पर अपना दावा छोड़ दिया। काली नदी, उच्च हिमालय से निकलती है और भारतीय उपमहाद्वीप के विस्तृत मैदानों से होकर प्रवाहित होती है।
  • संधि के अनुसार, ब्रिटिश शासकों ने काली नदी के पूर्व में पड़ने वाले क्षेत्र पर नेपाल के अधिकार को मान्यता दी थी।

वर्तमान मुद्दे:

  1. नेपाल के विशेषज्ञों के अनुसार, काली नदी के पूर्वी क्षेत्र की शुरुआत, नदी के उद्गम स्थल से मानी जानी चाहिए। इनके अनुसार नदी का उद्गम स्रोत ‘लिंपियाधुरा’ के समीप पहाड़ों में है, जोकि नदी के शेष प्रवाह क्षेत्र की तुलना में अधिक ऊंचाई पर है।
  2. नेपाल का दावा है, लिंपियाधुरा से नीचे की ओर बहती हुए नदी की संपूर्ण धारा के पूर्व में स्थित उच्च-पर्वतीय क्षेत्र उनका है।
  3. दूसरी ओर भारत का कहना है, नदी का उद्गम कालापानी से होता है, और यही से उसकी सीमा शुरू होती है।
  4. दोनों देशों के मध्य यह विवाद, मुख्य रूप से काली नदी के उद्गम स्थल और पहाड़ों से होकर बहने वाली इसकी कई सहायक नदियों की अलग-अलग व्याख्या के कारण है।
  5. काली नदी के पूर्व में स्थित क्षेत्र पर नेपाल का दावा, नदी के लिंपियाधुरा उद्गम पर आधारित है, जबकि भारत का कहना है, कि नदी वास्तव में कालापानी के पास निकलती है और इसीलिए इसका नाम ‘काली’ पड़ा है।

वर्तमान स्थिति:

  • कुछ समय पूर्व, नेपाल द्वारा संशोधित आधिकारिक नक्शा प्रकाशित किया गया था, जिसमे काली नदी के उद्गम स्रोत लिंपियाधुरा से लेकर त्रिकोणीय क्षेत्र के उत्तर-पूर्व में कालापानी और लिपुलेख दर्रे तक के क्षेत्र को अपने क्षेत्र के रूप में शामिल किया गया है।
  • पिछले साल प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने मानचित्र को संवैधानिक दर्जा देने के लिए संविधान संशोधन प्रस्ताव भी प्रस्तुत किया था।
  • भारतीय पर्यवेक्षकों का कहना है, कि नेपाल सरकार का यह कदम ‘कालापानी मुद्दे’ पर भविष्य में किसी भी समाधान को लगभग असंभव बना सकता है, क्योंकि इस प्रस्ताव को संवैधानिक गारंटी मिलने से इस विषय पर ‘काठमांडू’ की स्थिति दृढ़ हो जाएगी।

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इंस्टा जिज्ञासु:

नाकू ला कहाँ है और इस पर क्या विवाद है?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. लिपुलेख कहाँ है?
  2. काली नदी का स्रोत
  3. भारत और नेपाल सीमा
  4. कालापानी कहाँ है?
  5. कैलाश पर्वत और मानसरोवर के लिए मार्ग
  6. चीन और भारत से होकर बहने वाली नदियाँ

मेंस लिंक:

कालापानी विवाद को कैसे सुलझाया जा सकता है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय।

ईरान में 20% संवर्धित यूरेनियम का अधिक उत्पादन


संदर्भ:

पिछले महीने ‘संयुक्त राष्ट्र के परमाणु प्रहरी’ (U.N. nuclear watchdog) द्वारा जारी रिपोर्ट की तुलना में, ईरान ने 120 किलोग्राम (265 पाउंड) से अधिक 20% संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन किया है।

पृष्ठभूमि:

‘अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी’ (IAEA) द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में ईरान के यूरेनियम भंडार में 20% तक विखंडनीय शुद्धता युक्त संवर्धित यूरेनियम की मात्रा लगभग 84.3 किलोग्राम (185 पाउंड) थी, जबकि तीन माह पहले इसकी मात्रा लगभग 62.8 किलोग्राम (138 पाउंड) थी।

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA):

वर्ष 2015 में हस्ताक्षरित परमाणु समझौते के अंतर्गत, ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रमों को सीमित करने के बदले ‘आर्थिक प्रोत्साहन’ देने का वादा किया गया था। इस समझौते का उद्देश्य ‘तेहरान’ को परमाणु बम विकसित करने से रोकना है।

  • वर्ष 2018 में अमेरिका ने, तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान इस समझौते से एकतरफा तरीके से हाथ खीच लिए, किंतु समझौते में शामिल अन्य देशों- ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन और रूस ने इस समझौते को बनाए रखने की कोशिश की है।
  • विश्व शक्तियों के साथ हुए इस समझौते में, अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं द्वारा ईरान को उसके अनुसंधान रिएक्टर के लिए आवश्यक 20% संवर्धित यूरेनियम प्रदान किए जाने पर सहमति हुई थी।
  • परमाणु समझौते की शर्तों के तहत, ईरान को अपनी अनुसंधान रिएक्टर गतिविधियों को छोड़कर, 67% से अधिक संवर्धित यूरेनियम का उत्पादन करने से प्रतिबंधित किया गया था।

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‘यूरेनियम संवर्धन’ (Uranium Enrichment) का लक्ष्य:

  • यूरेनियम में एक दुर्लभ रेडियोधर्मी समस्थानिक ‘U-235’ पाया जाता है, जिसे निम्न संवर्धित स्तर पर परमाणु रिएक्टरों के ईंधन के रूप में तथा अति उच्च संवर्धित स्तर पर परमाणु बमों के ईंधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है।
  • यूरेनियम संवर्धन का लक्ष्य U-235 के प्रतिशत स्तर में वृद्धि करना होता है, जिसे अक्सर सेंट्रीफ्यूज (Centrifuges) के माध्यम से किया जाता है। अपकेन्द्रण यंत्र (Centrifuges), अपरिष्कृत यूरेनियम के एक रूप को उच्च गति पर घुमाने वाली मशीनें होती हैं।

वर्तमान में ईरान के पास संवर्धित यूरेनियम की मात्रा:

संयुक्त राष्ट्र की परमाणु-निगरानी शाखा, अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, ईरान फरवरी माह तक 2,967.8 किलोग्राम यूरेनियम एकत्रित कर चुका था। परमाणु समझौते के तहत निर्धारित सीमा से लगभग 14 गुना अधिक है, और इसे यदि हथियार ग्रेड के लिए परिष्कृत किया जाए तो यह तीन परमाणु बमों के निर्माण हेतु पर्याप्त होगा।

इस भंडार में 17.6 किलोग्राम यूरेनियम 20 प्रतिशत तक संवर्धित है, जिसके लिए भी, समझौते के तहत निषिद्ध वर्ष 2030 तक किया गया था।

वर्तमान चिंता का विषय:

60 प्रतिशत संवर्धन स्तर को विशेष रूप से खतरनाक बनाने वाली ‘संवर्धन की पेचीदा प्रकिया’ है, जिसके तहत जैसे-जैसे शुद्धता का स्तर बढ़ता जाता है, संवर्धन प्रक्रिया आसान होती जाती है, और इसके लिए आवश्यक अपकेन्द्रण यंत्रों की संख्या भी घटती जाती है।

  • दूसरे शब्दों में, 20 प्रतिशत शुद्धता स्तर से संवर्धन शुरू करने पर 90 प्रतिशत शुद्धता प्राप्त करना आसान होता है, तथा 60 प्रतिशत शुद्धता स्तर से शुरू करने पर और भी आसान हो जाता है।

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इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप भारत की ‘परमाणु मारक क्षमता’ (Nuclear Triad) के बारे में जानते हैं?

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. JCPOA क्या है? हस्ताक्षरकर्ता
  2. ईरान और उसके पड़ोसी।
  3. IAEA क्या है? संयुक्त राष्ट्र के साथ संबंध
  4. IAEA के सदस्य
  5. IAEA के कार्यक्रम।
  6. बोर्ड ऑफ गवर्नर- रचना, मतदान और कार्य
  7. यूरेनियम संवर्धन क्या है?

मेंस लिंक:

संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA)  पर एक टिप्पणी लिखिए।

स्रोत: द हिंदू।

 


सामान्य अध्ययन- III


 

विषय: सूचना प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष, कंप्यूटर, रोबोटिक्स, नैनो-टैक्नोलॉजी, बायो-टैक्नोलॉजी और बौद्धिक संपदा अधिकारों से संबंधित विषयों के संबंध में जागरुकता।

भारतीय अंतरिक्ष संघ


संदर्भ:

हाल ही में, प्रधान मंत्री मोदी द्वारा ‘इंडियन स्पेस एसोसिएशन’ / ‘भारतीय अंतरिक्ष संघ’ (Indian Space Association – ISpA) का औपचारिक रूप से शुभारंभ किया गया।

‘इंडियन स्पेस एसोसिएशन’, अंतरिक्ष और उपग्रह कंपनियों के प्रमुख औद्योगिक संघ के रूप में कार्य करेगा।

current affairs

अभिप्राय और उद्देश्य:

  • ‘इंडियन स्पेस एसोसिएशन’ (ISpA) का उद्देश्य, भारतीय निजी क्षेत्र में ‘अंतरिक्ष उद्योग’ के लिए मंच प्रदान करना और अंतरिक्ष उद्योग क्षेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने तथा वैश्विक सेवा प्रदाता बनाने के लिए भारत सरकार और अंतरिक्ष उद्योग के अन्य प्रमुख हितधारकों के साथ भागीदारी करना है।
  • आईएसपीए (ISpA) का लक्ष्य, भारत को आत्मनिर्भर बनाने और मानव जाति हेतु विकास की अगली सीमा के रूप में तेजी से उभर रहे ‘अंतरिक्ष क्षेत्र’ में देश को एक वैश्विक नेता बनाने की भारत सरकार की परिकल्पना में योगदान करना है।

संरचना / सदस्य:

इंडियन स्पेस एसोसिएशन’ (ISpA) का प्रतिनिधित्व अंतरिक्ष और उपग्रह टेक्नोलॉजी में उन्नत क्षमताएं रखने वाली प्रमुख देशी कंपनियों के साथ-साथ वैश्विक कंपनियों द्वारा किया जाएगा।

  • आईएसपीए के संस्थापक सदस्यों में लार्सन एंड टुब्रो, नेल्को (टाटा ग्रुप), वनवेब, भारती एयरटेल, मैपमायइंडिया, वालचंदनगर इंडस्ट्रीज और अनंत टेक्नोलॉजी लिमिटेड शामिल हैं।
  • इसके अन्य प्रमुख सदस्यों में गोदरेज, ह्यूजेस इंडिया, अजि‍स्ता-बीएसटी एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड, बीईएल, सेंटम इलेक्ट्रॉनिक्स, मैक्सार इंडिया शामिल हैं।

कार्य:

  • इंडियन स्पेस एसोसिएशन’ (ISpA) का कार्य सरकार की परिकल्पना को पूरा करने में एक सक्षम नीतिगत ढांचे के निर्माण हेतु संपूर्ण पारितंत्र के हितधारकों को शामिल करना होगा।
  • आईएसपीए, देश में महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकी और निवेश लाने तथा अधिक उच्च कौशल वाली नौकरियों के सृजन हेतु भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के लिए वैश्विक संपर्क बनाने की दिशा में भी काम करेगा।
  • ISpA सरकार की अंतरिक्ष परिकल्पना को आगे बढ़ाने के लिए IN-SPACe के साथ निकट समन्वय में काम करने की भी योजना बना रहा है।

महत्व:

विशाल प्रतिभा समूह, घरेलू प्रौद्योगिकी स्टार्टअप्स और निजी उद्यमों के वृद्धिमान कौशल के साथ, हमारा देश अंतरिक्ष क्षेत्र में एक बड़ी छलांग लगाने के लिए तैयार है।

  • भारत में वैश्विक अंतरिक्ष उद्योग के लिए एक प्रौद्योगिकी नेता और मितव्ययी सेवा प्रदाता बनने की क्षमता है।
  • वैश्विक स्तर पर, निजी उद्यम भी अंतरिक्ष में संभावनाओं का विस्तार करने में तेजी से योगदान दे रहे हैं।

अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार:

आजादी के बाद से 75 वर्षों तक, भारतीय अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत सरकार और सरकारी संस्थानों की एकल छतरी का प्रभुत्व रहा है।

  • इन दशकों में, भारतीय वैज्ञानिकों ने बहुत बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन समय की मांग है कि भारतीय प्रतिभाओं पर कोई पाबंदी न रहे, चाहे वह सार्वजनिक क्षेत्र में हो या निजी क्षेत्र में।
  • इसके अलावा, इसरो के अनुसार, वर्तमान में ‘वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था’ लगभग 360 बिलियन अमरीकी डॉलर की हो चुकी है। हालांकि, इसमें भारत की भागीदारी मात्र 2% है और वर्ष 2030 तक वैश्विक बाजार में केवल 9% हिस्सेदारी होने की संभावना है।

अंतरिक्ष आधारित संचार नेटवर्क में वृद्धि:

कई भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने खुदरा स्तर पर इंटरनेट कनेक्टिविटी प्रदान करने के लिए अगली सीमा के रूप में संचार उपग्रहों पर दांव लगाया है। इसमें स्पेसएक्स का स्टारलिंक, सुनील भारती मित्तल का वनवेब, अमेज़ॅन का प्रोजेक्ट कुइपर, यूएस सैटेलाइट निर्माता ह्यूजेस कम्युनिकेशंस आदि शामिल हैं।

सैटेलाइट इंटरनेट के लाभ:

  • उद्योग के विशेषज्ञों का सुझाव है, कि दूरदराज के क्षेत्रों और कम आबादी वाले स्थानों में, जहां स्थलीय नेटवर्क अभी तक नहीं पहुंच सका है, वहां ब्रॉडबैंड सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए ‘उपग्रह आधारित इंटरनेट’ (Satellite Internet) अत्याधिक महत्वपूर्ण होगा।
  • हालांकि अभी तक, उपग्रह आधारित संचार केवल कॉरपोरेट्स और कुछ संस्थानों तक ही सीमित है। इनके द्वारा आपातकालीन स्थिति में, तथा महत्वपूर्ण अंतर-महाद्वीपीय संचार और बिना कनेक्टिविटी वाले दूरदराज के क्षेत्रों से जुड़ने के लिए ‘उपग्रह आधारित इंटरनेट’ का उपयोग किया जाता है।

चिंताएं और चुनौतियां:

कई सारे संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजे जाने से अंतरिक्षीय कक्षा में भीड़भाड़ होने पर चिंताएं व्यक्त की जा हैं। इससे अंतरिक्ष मलबे में भी वृद्धि हो सकती है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि अंतरिक्ष इंटरनेट के लिए भूस्थैतिक के बजाय पृथ्वी की निचली कक्षा का उपयोग किया जाता है? इस बारे में अधिक जानकारी हेतु पढ़िए

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

पराली दहन से निपटने हेतु बायो डीकंपोजर


संदर्भ:

दिल्ली सरकार द्वारा फसल कटाई के बाद बची पराली को सड़ाने के लिए खेतों में ‘जैव-अपघटक घोल’ /  ‘बायो-डीकंपोजर घोल’ (Bio-Decomposer Solution) का छिड़काव शुरू कर दिया गया है।

पृष्ठभूमि:

दिल्ली सरकार, इस ‘जैव-अपघटक’ घोल को पराली दहन के समाधान के रूप में देखती है और अन्य राज्यों से इस पद्धति को अपनाने का आग्रह करती रही है। सरकार ने पिछले साल सबसे पहले इसका छिड़काव किया था और सकारात्मक परिणाम मिलने का दावा किया था।

जैव-अपघटक का निर्माण:

इस तकनीक में प्रयुक्त जैव-अपघटक घोल को पूसा डीकंपोजर (Pusa Decomposer) भी कहा जा रहा है।

  • पूसा डीकंपोजर सात कवकों का एक मिश्रण होता है जो पराली (Paddy Straw) में पाए जाने वाले सेल्युलोज, लिग्निन और पेक्टिन को गलाने वाले एंजाइम का उत्पादन करता है।
  • यह कवक 30-32 डिग्री सेल्सियस तापमान वाले वातावरण विकसित होते है, और धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के समय यही तापमान होता है।

पूसा डीकंपोजर का खेतों में उपयोग किस प्रकार किया जाता है?

पूसा डीकंपोज़र कैप्सूल (Decomposer Capsules) का उपयोग करके एक ‘अपघटक घोल’ बनाया जाता है।

  • अपघटक घोल को 8-10 दिन किण्वित (fermenting) करने के पश्चात तैयार मिश्रण का फसल अपशिष्ट/पराली के शीघ्र जैव-अपघटन के लिए खेतों में छिड़काव किया जाता है।
  • किसान, चार पूसा डीकंपोज़र कैप्सूल, गुड़ और चने के आटे से 25 लीटर अपघटक घोल मिश्रण को तैयार कर सकते हैं, और यह 1 हेक्टेयर भूमि पर छिड़काव करने के लिए पर्याप्त होता है।
  • जैव अपघटन की प्रक्रिया को पूरा होने में लगभग 20 दिनों का समय लगता है। इसके बाद किसान पराली को जलाए बिना फिर से बुवाई कर सकते हैं।

पूसा डीकंपोजर के लाभ:

  • इस तकनीक के प्रयोग से मृदा की उर्वरता और उत्पादकता में सुधार होता है क्योंकि पराली फसलों के लिए उर्वरक का काम करती है और भविष्य में कम खाद लगाने की आवश्यकता होती है।
  • यह फसल-अपशिष्ट / पराली को जलाने से रोकने हेतु एक प्रभावी, सस्ती और व्यावहारिक तकनीक है।
  • यह पर्यावरण के अनुकूल और पर्यावरण की दृष्टि से उपयोगी तकनीक भी है।

 

प्रीलिम्स लिंक:

  1. पूसा डीकंपोजर किस प्रकार विकसित किए गया है?
  2. इनका किस लिए उपयोग किए जाता है?
  3. पराली जलाने पर उत्सर्जित प्रदूषक तत्व

मेंस लिंक:

पंजाब और हरियाणा के राज्यों में पराली जलने से दिल्ली की वायु गुणवत्ता किस प्रकार प्रभावित होती है? चर्चा कीजिए।

स्रोत: द हिंदू।

 

विषय: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

मवेशियों के चारे के रूप में धान की पराली के प्रयोग का प्रस्ताव


संदर्भ:

पंजाब सरकार ने धान की फसल के अपशिष्ट (पराली) को मवेशियों के चारे के रूप में उपयोग करने का प्रस्ताव किया है।

इस कदम के संभावित लाभ:

  • पंजाब में हर साल 20 मिलियन टन धान की पराली का उत्पादन होता है। इसका अधिकांश भाग किसानों द्वारा खेतों में जला दिया जाता है, जिससे काफी ज्यादा वायु प्रदूषण होता है जोकि पड़ोसी राज्यों में भी फैल जाता है।
  • औसतन 200 रुपये प्रति क्विंटल की दर से गणना करने पर, इस पराली का कुल मूल्य लगभग 400 करोड़ रुपये होता है। और यह लगभग सारी पराली खेतों में जला दी जाती है।
  • आर्थिक नुकसान के साथ-साथ इससे उत्पादित हो सकने वाली 77,000 टन नाइट्रोजन और 5.6 मिलियन टन ‘सकल पचनीय पोषक तत्वों’ / ‘टोटल डाइजेस्टिबल न्यूट्रिएंट्स’ (TDN) का नुकसान होता है।
  • 20 मिलियन टन धान की पराली में पोषक तत्वों के रूप में, 10 लाख टन कच्चा प्रोटीन (crude protein – CP), 3 लाख टन पचने योग्य कच्चा प्रोटीन (digestible crude protein – DCP), 80 लाख टन सकल पचनीय योग्य पोषक तत्व (Total Digestible Nutrients – TDN) और फास्फोरस होते हैं।
  • इसलिए, सरकार के इस कदम से वर्ष 2021 की खरीफ सीजन के दौरान पराली दहन को नियंत्रित करने और पर्यावरण की रक्षा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

चुनौतियां:

धान की पराली को सीधे खेतों से लाकर जानवरों को नहीं खिलाया जा सकता है।

  • क्योंकि, इसमें सिलिका और ‘काष्‍ठ अपद्रव्यता’ (lignin) की उच्च मात्रा होने की वजह से इसके पाचन गुण कम हो जाते हैं।
  • धान की पराली में ‘सेलेनियम’ (Selenium) की मात्रा अधिक होने से भी, गेहूं के भूसे की तुलना में, पशुओं में चारे के रूप में इसका उपयोग सीमित कर दिया जाता है।
  • धान में ऑक्सलेट (2-2.5%) भी पाया जाता है, जिसकी वजह से कैल्शियम की कमी हो जाती है।

इन चुनौतियों से निपटने के तरीके:

  • यदि धान की पराली को मध्यम मात्रा में (प्रति पशु प्रति दिन 5 किलो तक) दिया जाए, तो सेलेनियम से पशु के स्वास्थ्य पर कोई खतरा नहीं होता है।
  • ऑक्सालेट के प्रभाव को कम करने के लिए, पराली के साथ हमेशा खनिज मिश्रण को खिलाना चाहिए।
  • अन्य विधियों में, धान की पराली का यूरिया उपचार और यूरिया प्लस शीरा उपचार भी शामिल है।

 

इंस्टा जिज्ञासु:

क्या आप जानते हैं कि पराली जलाने से हानिकारक गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के साथ-साथ पार्टिकुलेट मैटर का भी उत्सर्जन होता है।

स्रोत: इंडियन एक्सप्रेस।

 


प्रारम्भिक परीक्षा हेतु तथ्य


हॉट स्प्रिंग्स

लद्दाख में ‘हॉट स्प्रिंग्स’ (Hot Springs) पॉइंट, उन चार जगहों में से एक है, जहां मई 2020 में गतिरोध के दौरान भारतीय और चीनी सेना का आमना-सामना हुआ था।

  • हॉट स्प्रिंग्स, जिसे पारंपरिक रूप से ‘क्याम’ (Kyam) के नाम से जाना जाता है, चीन के साथ विवादित सीमा के नजदीक लद्दाख की ‘चांग चेन्मो नदी घाटी’ (Chang Chenmo River Valley) में एक भारतीय सीमा चेक-पोस्ट – पेट्रोल प्वाइंट 15 – की एक कैंपसाइट है।
  • इस क्षेत्र में एक गर्म पानी का झरने होने की वजह से इस स्थान का नाम ‘हॉट स्प्रिंग्स’ पड़ा है।
  • यह ‘गलवान घाटी’ के दक्षिणपूर्व में स्थित है।
  • यह वास्तविक नियंत्रण रेखा को चिह्नित करने वाले ‘कोंगका ला’ (Kongka La) दर्रे के नजदीक है।
  • यह दर्रा, चीन के दो सबसे संवेदनशील प्रांतों – उत्तर में शिनजियांग और दक्षिण में तिब्बत के बीच की सीमा को भी चिह्नित करता है।
  • ‘कोंगका ला’ शिनजियांग और तिब्बत को जोड़ने वाले चीन के G219 राजमार्ग के पश्चिम में स्थित है।

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तेजस्विनी पहल

यह दिल्ली के ‘उत्तर-पश्चिम जिले’ की एक महिला-केंद्रित सुरक्षा पहल है।

  • इस पहल का उद्देश्य, समाज के सभी वर्गों की महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों तक पहुंचना और महिलाओं और बच्चों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा करना है।
  • तेजस्विनी पहल के अंतर्गत, सारे कार्य और असाइनमेंट पुलिस की महिला बीट स्टाफ द्वारा किए जाते हैं।
  • जिसके परिणामस्वरूप तेजस्विनी पहल की पहुंच और कार्य के दायरे में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

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लूखा नदी

मेघालय राज्य सरकार के अनुसार, एक डिटॉक्सिंग पायलट प्रोजेक्ट ने लूखा नदी (River Lukha) को फिर से जीवित कर दिया है।

  • लूखा नदी, मेघालय के पूर्वी जयंतिया हिल्स जिले में बहती है।
  • लूखा नदी, पूर्वी जयंतिया पहाड़ियों के दक्षिणी भाग से होकर प्रवाहित होती है और इसमें, इसकी मुख्य सहायक नदी – लूनर नदी तथा नरपुह रिजर्व फ़ॉरेस्ट की पहाड़ियों से बहने वाली कई धाराओं से जलापूर्ति होती है।
  • यह नदी पूर्वी जयंतिया हिल्स से होती हुई आगे बांग्लादेश में बहती है।
  • लूखा नदी – स्थानीय पनार भाषा में “मछली जलाशय” – को एक दशक पहले विषाक्त माना जाता था और कहा जाता था कि इसे फिर से जीवित नहीं किया जा सकता।

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